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नापसंद अफ़सरों की छुट्टी!

एनएफएचएस-5 के आँकड़ों से नाख़ुश केंद्र सरकार ने आईआईपीएस निदेशक को निलंबित किया, क्या अगला नंबर कैग प्रमुख का है?

सुशील मानव

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आँकड़ों से नाख़ुश केंद्र सरकार ने अंतराराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (आईआईपीएस) के निदेशक के.एस. जेम्स को पद से निलंबित कर दिया है। 28 जुलाई की शाम उन्हें निलंबन पत्र भेजकर इस आशय की जानकारी दी गयी। ग़ौरतलब है कि अंतराराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (आईआईपीएस) केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीनस्थ काम करती है। यह संस्थान राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का आकलन और वैश्विक वयस्क तंबाकू सर्वेक्षण जैसे महत्त्वपूर्ण अध्ययन आयोजित करती है।

हार्वर्ड सेंटर फॉर पॉपुलेशन एंड डेवलपमेंट से पोस्ट डॉक्टोरल डिग्री धारी के.एस. जेम्स भारत के सबसे प्रतिष्ठित जनसांख्यिकीविदों में से एक हैं। वह जेएनयू में जनसंख्या अध्ययन के प्रोफेसर रहे हैं। उन्हें सन् 2018 में आईआईपीएस का निदेशक नियुक्त किया गया। उन्होंने साल 2019-21 के दौरान सम्पन्न हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के पाँचवें दौर का नेतृत्व किया। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार आगामी चुनाव के मद्देनज़र आईआईपीएस के हालिया डेटा से ख़ुश नहीं थी और सरकार द्वारा निदेशक डॉ. जेम्स को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा गया था; लेकिन इस्तीफ़ा देने से मना करने के बाद सरकार ने भर्ती में अनियमितता का हवाला देकर उन्हें बलपूर्वक निलंबित कर दिया है।

ग़ौरतलब है कि एनएफएचएस-5 का डेटा केंद्र सरकार के राजनीतिक एजेंडे के विपरीत हैं। इस अप्रिय डेटा के लिए वो सरकार के आँख की किरकिरी बने हुए थे। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 में कई ऐसे आँकड़े हैं, जो सरकार को आगामी लोकसभा चुनाव में असहज कर सकते हैं। जैसे कि भारत सरकार तमाम विज्ञापनों में दावा करती है कि देश खुले में शौच से मुक्त हो चुका है। जबकि एनएफएचएस-5 के आँकड़े बताते हैं कि सच्चाई इसके उलट है और देश में अभी भी 19 फ़ीसदी परिवार किसी भी शौचालय सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते हैं। यानी देश की 19 फ़ीसदी आबादी अभी भी खुले में शौच करती है। डेटा के मुताबिक, एक लक्षद्वीप को छोडक़र देश का कोई भी राज्य खुले में शौच से मुक्त नहीं हुआ है। इसी तरह सरकार उज्ज्वला गैस योजना को लेकर तमाम विज्ञापनों में अपनी उपलब्धि का राग अलापती रहती है, जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आँकड़े बताते हैं कि देश में 40 फ़ीसदी से अधिक घरों में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन की पहुँच नहीं है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में 57 फ़ीसदी लोगों के पास एलपीजी या प्राकृतिक गैस तक पहुँच नहीं है। इसी तरह एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट कहती है कि देश में एनीमिया बढ़ रही है। ज़ाहिर है चुनाव पूर्व ऐसे आँकड़े किसी भी सरकार को परेशान और नाख़ुश कर सकते हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 29 जुलाई को आईआईपीएस निदेशक के.एस. जेम्स के निलंबन पर एक पेज का नोट जारी करके कहा कि भर्ती और नियुक्तियों में अनियमितताओं और आरक्षण रोस्टर के अनुपालन के सम्बन्ध में विभिन्न शिकायतें प्राप्त हुई थीं। उनकी जाँच के लिए मंत्रालय द्वारा 6 मई को एक तथ्य-खोज समिति (एफएफसी) का गठन किया गया था। समिति ने दोनों शिकायतकर्ताओं के आईआईपीएस बयानों से जानकारी एकत्र की। प्रतिवादी ने विशेष लेखा परीक्षा दल, आईआईपीएस के आरक्षण और रोस्टर रजिस्टरों की जाँच करने वाली टीम और हिन्दी अधिकारी के ग़ैर-चयन की जाँच करने वाली उप-समिति की रिपोर्ट दी। इसके बाद उसने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया। एफएफसी को प्राप्त 35 शिकायतों में से 11 में प्रथम दृष्टया अनियमितताएँ मिलीं। मंत्रालय ने कहा कि ये अनियमितताएँ मुख्य रूप से कुछ नियुक्तियों, संकाय की भर्ती, आरक्षण रोस्टर और डेड स्टॉक रजिस्टर में देखी गयी ख़ामियों के सम्बन्ध में थीं।

सरकार के आरोप पर ही विचार करें, तो सवाल यह भी उठता है कि आईआईपीएस निदेशक पर लगाये गये आरोप केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया के ख़िलाफ़ भी तो लगेंगे। संस्थान के उपनियम के मुताबिक, भर्ती आदि पर फ़ैसला 22 सदस्यीय सामान्य परिषद् लेती है, जिसके अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया और उपाध्यक्ष मंत्रालय के सचिव हैं। फिर निदेशक के एस. जेम्स अकेले कैसे भर्ती आदि पर निर्णय ले सकते हैं? कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय की आंतरिक समितियों ने डॉ. जेम्स को किसी भी कदाचार के मामले में क्लीन चिट दे दी थी। उनके ख़िलाफ़ हालिया कार्रवाई ‘राजनीतिक कारणों’ से की गयी है। कांग्रेस नेता के दावों को बल प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद् की सदस्य शमिका रवि के उस लेख से भी मिलता है, जो उन्होंने 7 जुलाई को ‘द सैंपल इज राँग’ शीर्षक से एक अख़बर में लिखा था। कि ‘हमारी राष्ट्रीय सर्वेक्षण दोषपूर्ण नमूने पर आधारित हैं। प्रमुख सर्वेक्षण जिस पर नीति निर्माता भरोसा करते हैं। एनएसएस, एनएफएचएस, पीएलएफएस ख़राब डेटा संग्रह ढाँचे पर आधारित हैं और व्यवस्थित रूप से भारत की प्रगति व विकास को कम आँकते हैं।’

यानी जो आँकड़े सरकार के ख़िलाफ़ होते हैं, सरकार उन्हें नकार देती है और इन्हें बनाने वालों को सबक़ सिखाती है। यह कोई पहला वाक़िया नहीं है। इसी तरह इससे पहले 2019 लोकसभा चुनाव से पहले सरकार के जीडीपी आँकड़ों पर सवाल उठाने और ‘इलेक्टोरल बांड’ का विरोध करने पर भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को हटा दिया गया था। 10 दिसंबर, 2018 को तत्कालीन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने ‘व्यक्तिगत कारणों’ का हवाला देकर अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। पर सच्चाई यह थी कि आईआईपीएस निदेशक की तरह उन पर भी इस्तीफ़ा देने के लिए दबाव डाला गया। उनका इस्तीफ़ा 14 दिसंबर को आरबीआई की केंद्रीय बोर्ड की बैठक और शीतकालीन सत्र शुरू होने से ठीक एक दिन पहले आया था, जबकि उनके तीन साल के कार्यकाल को पूरा होने में नौ महीने बाक़ी थे। उस वक़्त केंद्रीय बैंकों की स्वायत्तता, आरबीआई के अतिरिक्त भण्डार को सरकार को हस्तांतरित करने और प्रतिबंधात्मक त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई में ढील सहित कई मुद्दों पर सरकार और आरबीआई के बीच जबरदस्त विवाद था। सरकार को जब यह लगा कि आरबीआई गवर्नर उनकी बात नहीं मान रहे हैं, तो सरकार ने एनपीए, नक़दी संकट और बिजली कम्पनियों को छूट के मुद्दों पर आरबीआई अधिनियम की धारा-7 को लागू करके आरबीआई गवर्नर को अपनी बातें मानने के लिए बाध्य कर दिया। आरबीआई एक्ट-1934 में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के समय ही बना था। और इसकी धारा-7(1) का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया था। मौज़ूदा सरकार ने इस धारा का इस्तेमाल करके आरबीआई की स्वायत्तता में दख़ल दिया।

भ्रष्टाचार और नियम-क़ायदों को लेकर मौज़ूदा केंद्र सरकार शुरू से ही दोग़ली नीति अपनाती आ रही है। जो अधिकारी सरकार की इच्छा और हितों के मुताबिक काम करता है, वो कितना भी भ्रष्ट हो, उसके ख़िलाफ़ कितनी भी शिकायतें क्यों न हो सरकार उसे दरकिनार कर देती है। वहीं, जो अधिकारी थोड़ा-सा भी सरकार को असहज करता है, सरकार उसे या तो इस्तीफ़ा देने पर बाध्य कर देती है या फिर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उसे निलंबित कर देती है। राकेश अस्थाना एक ऐसा उदाहरण है। बड़ौदा पुलिस कमिश्नर रहते उन पर भ्रष्टाचार के एक नहीं सैकड़ों आरोप लगे। भ्रष्टाचार के मामले में उनके ख़िलाफ़ केस भी चल रहा था। बावजूद इसके राकेश अस्थाना के लिए केंद्र सरकार ने सीबीआई में अलग से ‘विशेष निदेशक’ का पद सृजन किया। सीबीआई में नियुक्ति के  वक़्त उनके ख़िलाफ़ कई जाँच चल रहे थे और उनकी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गयी थी। ख़ुद तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने तत्कालीन सीबीआई ‘विशेष निदेशक’ राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में भ्रष्टाचार का केस दर्ज करवाया था। उनका नाम सीबीआई द्वारा 4,000 करोड़ रुपये की घपलेबाज़ी और मनीलॉन्डिरंग जाँच में स्टर्लिंग बायोटेक से सन् 2011 में ज़ब्त की गयी डायरी में भी आया था।

इस डायरी में राकेश अस्थाना की बेटी की शादी में ख़र्च हुए करोड़ों रुपये का हिसाब भी दर्ज था। जबकि अस्थाना का बेटा इस कम्पनी में मैनेजर था। सरकार ने 27 जुलाई, 2021 को सीमा सुरक्षा बल के डीजी पद से सेवानिवृत्त होने के चार दिन पहले राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस कमिश्नर बना दिया गया। तो राकेश अस्थाना के उदाहरण से साफ़ है कि भ्रष्टाचार या दुराचार, हत्या के आरोप से सरकार को कोई लेना-देना नहीं है। कौन-सा अफ़सर सरकार के लिए फ़ायदेमंद और कौन सा नुकसानदेह फ़र्क़ इससे पड़ता है। फ़र्क़ आँकड़ों से पड़ता है। दरअसल सरकार आँकड़ों से डरती है। राष्ट्रवादी आख्यान का खण्डन करने वाली डेटा को ख़ारिज करने का सरकार का इतिहास है। कुपोषण पर यूनिसेफ के आँकड़ों को सरकार ने नकार दिया; क्योंकि उसमें बिहार की तुलना में गुजरात मॉडल को विसंगत बताया गया था। इसी तरह सरकार ने वैश्विक भुखमरी सूचकांक, कोरोना से मौतों का आँकड़ा, प्रेस की आज़ादी सूचकांक आदि रिपोट्र्स को भी नकार दिया। बेरोज़गारी, महँगाई और महिलाओं पर हिंसा के आँकड़े भी सरकार के ख़िलाफ़ जा रहे हैं। इसी तरह सरकार ने दशकीय जनगणना जो कि 2021 में होने वाली ती उसे भी अभी तक आयोजित नहीं किया है। इसी तरह सन् 2019 में केंद्र सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में सरकार ने अपने ख़ुद के उपभोग और व्यय सर्वेक्षण को बेकार करार दिया था। जबकि सरकार ने उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (सीईएस) के ताज़ा नतीजे जारी नहीं किये हैं। जनवरी, 2019 में बेरोज़गारी के आँकड़ों को भी सरकार ने रोक लिया था और लोकसभा चुनाव सम्पन्न होने के बाद ही जारी किया था। इसके कारण राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के सदस्यों और कार्यकारी अध्यक्ष पी.सी. मोहन को इस्तीफ़ा देना पड़ा था।

क्या सरकार अब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक गिरीश चंद्र मुर्मू को भी हटाने जा रही है? ज़ाहिर है कि कैग ने अगस्त के पहले सप्ताह में पार्लियामेंट के पटल पर कई परियोजनाओं के ऑडिट रिपोर्ट पेश किये थे, जिनमें केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाये गये हैं। कैग ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में सरकार द्वारा पेंशन योजना के फंड में हेराफेरी करने, आयुष्मान भारत योजना में काग़ज़ी फ़र्ज़ीवाड़ा करके घोटाला करने का आरोप लगाया है। इसके अलावा भारत माला योजना में घोटाला और ग़लत तरी$के से अडानी को फ़ायदा पहुँचाने, द्वारका एक्सप्रेस वे निर्माण में घोटाला, अयोध्या डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में घोटाला का पर्दाफाश अपनी तमाम ऑडिट रिपोर्ट में कैग ने किया है। इसके बाद से सरकार विपक्ष और मीडिया के निशाने पर है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आये कैग के ऑडिट रिपोर्ट से सरकार मुश्किल में है। क्या गुजरात से दिल्ली तक के राजनीतिक सफ़र में सबसे वफ़ादार रहे अफ़सर और मौज़ूदा कैग गिरीश चंद्र मुर्मू को भी सरकार काँटे की तरह निकाल फेंकेगी?

पंजाब में राजनीतिक गतिरोध तेज़

वर्ष 2024 लोकसभा चुनाव भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाम कांग्रेस नीत द इंडियन नेशनल डवलपमेंटल इंक्लूसिव अलांयस (इंडिया) के बीच होगा। देश के समानर्थी इंडिया शब्द पर राजनीतिक तूफ़ान अभी जारी रहेगा। इसी दौरान केंद्र सरकार के भारत शब्द पर ज़्यादा ज़ोर देने की वजह से विपक्ष लगा कि नरेंद्र मोदी सरकार गठबंधन के इंडिया नाम से डर गयी है। रणनीति के तहत गठबंधन ने नाम और स्लोगन- ‘जुड़ेगा भारत, जीतेगा इंडिया’ रखा गया है। गठबंधन इसे लेकर बहुत उत्साहित भी है; लेकिन केवल नाम से उसे सफलता मिलेगी, इसमें संदेह है। सबसे बड़ी बात एकता को क़ायम रखने की होगी, यह बहुत आसान नहीं होगा इसे गठबंधन में शामिल नेता मानते भी हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव देश विरोधी और देशहित पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि दो महागठबंधनों के बीच होगा। एनडीए नेता जनमानस में शब्द का भ्रम दूर करने में सफल रहे तो फिर यह तूफ़ान शान्त हो जाएगा। सन् 1977 के बाद पहली बार लोकसभा चुनाव में विपक्षी दल अलग-अलग नहीं, बल्कि साझे तौर मुक़ाबला करने की भूमिका में होंगे। वैचारिक मतभेदों के बावजूद अगर विपक्षी गठबंधन अंतिम समय तक एकता को क़ायम रख सका, तो वोट प्रतिशत के हिसाब से कड़ी टक्कर देने में सक्षम साबित हो सकता है। पर क्या यह सम्भव और इतनी आसान बात है?

अभी बहुत कुछ होना बा$की है। प्रस्तावित प्रधानमंत्री की दावेदारी का मुद्दा चुनाव से पहले निश्चित तौर पर ही उठेगा। गठबंधन के लिए यह किसी भँवर से कम नहीं होगा और इससे निकलना इतना आसान भी नहीं होगा। अभी इंडिया गठबंधन दलों का केवल एक ही मक़सद एनडीए को सत्ता से बाहर करना। सीधे अर्थ में कहें, तो मोदी राज की वापसी किसी भी हालत में न होने देने की है। अभी कुछ दल सीटों के बँटवारे में घाटा उठाने की बात कह रहे हैं; लेकिन मौक़े पर वे कितने खरे उतरते हैं, यह देखने की बात रहेगी। पंजाब में इंडिया महागठबंधन में शामिल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) अभी से ही खींचतान नज़र आने लगी है। ऐसा कई राज्यों में होने वाला है। पंजाब में इसलिए सबसे पहले मुद्दा उठा, क्योंकि यहाँ सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही गठबंधन में हैं। दोनों एक दूसरे के धुर-विरोधी हैं; लेकिन अब गठबंधन की वजह से एक मंच पर आना मजबूरी है।

दोनों ही दलों के कुछ नेता अब अलग-अलग सभी 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव लडऩे की बात और खुलकर बयानबाज़ी करने लगे है। कुछ दिन पहले पंजाब के वित्तमंत्री हरपाल सिंह चीमा ने घोषणा की बताया कि वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव आप और कांग्रेस मिलकर लड़ेंगे। यह फ़ैसला बाद में होगा कि कौन-सी सीट किस पार्टी के पास रहेगी। कांग्रेस की प्रतिक्रिया तुरन्त आयी, जिसमें कहा गया कि कांग्रेस आलाकमान का अभी उन्हें किसी तरह का कोई निर्देश नहीं है। पार्टी इकाई को तो सभी 13 सीटों पर सर्वे कराने और सम्भावित प्रत्याशियों की सूची पर काम करने का निर्देश है।

कांग्रेस और आप दोनों ही मिलकर चुनाव लडऩे के ज़रा भी इच्छुक नहीं है। इसकी एक वजह यह है कि राज्य विधानसभा चुनाव में आप को प्रचंड बहुमत कांग्रेस के ख़िलाफ़ ही मिला था। ऐसे में अगर लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस के साथ मिलकर मैदान में आती है, तो मतदाता को सोचना पड़ेगा। ऐसी आशंका मंत्री अनमोल गगन मान भी जता चुकी है। आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता मालविंदर सिंह कंग तो सभी 13 सीटों पर चुनाव लडऩे और जीतने का दम भरते हैं। वह भगवंत मान का कुशल नेतृत्व और राज्य सरकार की उपलब्धियाँ बताते हुए पार्टी का आधार पहले से ज़्यादा मज़बूत होने का दावा करते हैं। प्रवक्ता होने के नाते उन्हें ऐसा कहना ही पड़ेगा; लेकिन दावे में ज़्यादा दम नहीं है। यह अलग बात है कि जालंधर लोकसभा उपचुनाव के अलावा आप के पास कोई सीट नहीं है। उधर कांग्रेस के पास सात सीटें हैं। उनका ज़्यादा सीटों का दावा तो वैसे भी बनता है, जबकि आम आदमी पार्टी छ: सीटों से कम पर राज़ी होने वाली नहीं है। सम्भव है सीटों पर तालमेल की बात बन जाए। कांग्रेस की राज्य इकाई के मौज़ूदा रुख़ को देखते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने स्पष्ट कह दिया है कि उनकी पार्टी अकेले चुनाव लडऩा और जीतना जानती है। इसके बाद अपने बूते सरकार चलाना भी उसे आता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर राजा वडि़ंग ने पिछले दिनों कांग्रेस विधायकों और सांसदों की बैठक बुलायी, जिसमें सभी 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव लडऩे मुद्दे पर चर्चा हुई। बैठक में दो पूर्व मंत्रियों गठबंधन के तहत चुनाव होने पर पार्टी छोडऩे की अपरोक्ष चेतावनी भी दी है। कांग्रेस राज्य इकाई ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए अपनी इच्छा भी जता दी है।

कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू राज्य इकाई से अलग राय रखते हैं। वह मानते हैं कि देश को एनडीए राज से मुक्त करने के लिए गठबंधन सही रास्ते पर चल रहा है। सिद्धू अभी ज़्यादा मुखर नहीं हैं। इसकी एक वजह उनकी पत्नी नवजोत कौर का उपचारधीन होना है। जब तक उन्हें कोई बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं दी जाती, वह ज़्यादा सक्रिय नहीं होंगे। भाजपा का केंद्रीय पंजाब में पार्टी का आधार मज़बूत करना चाहता है। कांग्रेस के दो दिग्गज पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और प्रदेशाध्यक्ष रहे सुनील जाखड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

इनके अलावा दो पूर्व मंत्री भी कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आ चुके हैं। इसके बावजूद पंजाब में भाजपा का असर ज़्यादा नहीं दिख रहा है। अमरिंदर सिंह तो ज़्यादा सक्रिय नहीं हैं; लेकिन जाखड़ चुनाव से पहले पार्टी को कितनी मज़बूती दे पाएँगे? यह देखना होगा। तीन कृषि क़ानूनों के मुद्दे पर एनडीएस से अलग हुए शिरोमणि अकाली दल की भूमिका क्या रहेगी? यह देखने वाली बात है। भाजपा का फ़िलहाल तो शिअद (संयुक्त) के साथ ही गठबंधन है, जिसका बहुत ज़्यादा असर नहीं है। शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल क्या पंजाब में अपने बूते ही चुनाव लड़ेंगे या फिर पहले की तरह भाजपा से कोई तालमेल हो सकता है?

राजनीति में कुछ भी सम्भव है। जब एक दूसरे के धुर-विरोधी दल मोदी राज ख़त्म करने के लिए वैचारिक मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर आ गये हैं, तो फिर सुखबीर बादल भी सत्ता में भागीदारी के लिए पाले में आ सकते हैं। सुखबीर के इंडिया गठबंधन में जाने की सम्भावना फ़िलहाल ज़रा भी नज़र नहीं आती। पड़ोसी राज्य हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं होगी। जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और आधार मज़बूत है, वहाँ तो ज़्यादा मुश्किल नहीं है; लेकिन जहाँ भाजपा कमज़ोर है और उसकी सरकार नहीं है, वहाँ इंडिया गठबंधन को फ़ायदा मिलेगा। इन राज्यों में पहले भी आमने-सामने की टक्कर होती रही है और अब भी वही रहेगा।

जाँच के घेरे में कई नेता

पंजाब में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, पूर्व उप मुख्यमंत्री ओ.पी. सोनी, पूर्व मंत्री भारत भूषण आशू, साधू सिंह धर्मसोत, ब्रहम महेंद्रा, संगत सिंह गिल्जियां, बलबीर सिंह सिद्धू, विजय इंदर सिंगला के ख़िलाफ़ विभिन्न मामलों में जाँच चल रही है। इनके अलावा गुरप्रीत सिंह कांगड़, एसएस अरोड़ा, राणा के.पी. सिंह, दलबीर सिंह गोल्डी और कुलदीप सिंह भी आरोपों से घिर हुए हैं। गठबंधन के बाद भी राज्य सरकार ने अपना रुख़ स्पष्ट कर दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान के मुताबिक, गठबंधन अपना काम करेगा; लेकिन कार्रवाई बदस्तूर जारी रहेगी।

सीटों का ब्योरा

पंजाब में अमृतसर, खडूर साहिब, आनंदपुर साहिब, लुधियाना, फ़रीदकोट, फ़तेहगढ़ साहिब और पटियाला लोकसभा सीटों पर कांग्रेस के सांसद हैं। कांग्रेस इन सीटों पर तो दावा निश्चित ही करेगी। आप सरकार के पाँच राज्यसभा सदस्य भी हैं। इस नाते वह छ: से ज़्यादा सीटों पर अपना दावा जताएगी, जबकि उसके पास जलंधर की सीट ही है, जो उपचुनाव में कांग्रेस से उसने हासिल की। फ़िरोज़पुर और बठिंडा सीटें शिरोमणि अकाली दल के, गुरदासपुर और होशियार पुर सीटें भाजपा के पास हैं और संगरूर सीट शिअद (मान) के पास है। सीटों के बँटवारे पर आप और कांग्रेस में कुछ खींचतान हो सकती है; लेकिन ज़्यादा मुश्किल की आशंका नहीं है।

विपक्ष और लोकतंत्र होंगे ज़्यादा मज़बूत

विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निरंकुश और तानाशाह प्रवृत्ति का मानते हैं। इसे देखते वो वर्ष 2024 में एनडीए की जीत से भारत में लोकतंत्र ख़त्म होने की बात भी कहते हैं। हालाँकि भारत का लोकतंत्र में विश्व में सबसे ज़्यादा मज़बूत हैं, इसे कोई ख़तरा न पहले था और न अब है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों से कोई भी जीते देश का लोकतंत्र और ज़्यादा मज़बूत ही होगा। वर्ष 2014 के क़रीब 10 साल बाद विपक्ष भी मज़बूत स्थिति में होगा। लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष की भूमिका अहम होती है। लोगों के पास वोट की ताक़त है और इसे कोई छीन नहीं सकता।

हेमंत का मनोबल बढ़ा, डर बरक़रार

डुमरी विधानसभा उपचुनाव का 8 सितंबर को नतीजा आ गया। इंडिया गठबंधन की झामुमो प्रत्याशी बेबी देवी ने रिकॉर्ड मत से जीत हासिल की। इस जीत से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राजनीतिक परिपक्वता दिखी। उनका गठबंधन दल के बीच क़द बढ़ा। उनका मनोबल बढ़ा। उधर उपचुनाव परिणाम के दूसरे दिन यानी 9 सितंबर को हेमंत सोरेन को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के सामने पेश होना था; लेकिन वह पेश नहीं हुए। हेमंत में गिरफ़्तारी का डर है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस बात की तस्दीक़ वह ख़ुद भी करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने ईडी के ख़िलाफ़ जो याचिका दायर की है, उसमें गिरफ़्तारी का डर दिखाया है। वहीं समय-समय पर हेमंत इस तरह का बयान भी दे रहे हैं।

सवाल है कि क्या हेमंत सोरेन पर लगे आरोप वाक़ई सही हैं? क्या वाक़ई 2024 के चुनाव से पहले हेमंत को गिरफ़्तार किये जाने की सम्भावना है? क्या केंद्र सरकार और भाजपा इस तरह की राजनीतिक साज़िश रच रही है?

राजनीतिक गलियारे की बातों को मानें, तो केंद्र सरकार का प्रयास तो यही दिख रहा है। जिस तरह से ग़ैर-भाजपायई राज्यों में ईडी, सीबीआई, आयकर आदि केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ काम कर रही, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। हेमंत सोरेन पर लगे आरोप सही हैं या ग़लत? यह तो जाँच का नतीजा बताएगा। लेकिन फ़िलहाल जिस तरह से भाजपा आक्रामक है। जिस तरह से जाँच एजेंसियाँ एक के बाद एक परत खोलते हुए मुख्यमंत्री को लपेटने की कोशिश कर रही हैं। जिस तरह से हेमंत सोरेन लगातार बचाव का रास्ता तलाश रहे हैं। इस स्थिति में तो आने वाले दिनों में झारखण्ड की राजनीति में काफ़ी उठापटक होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

डुमरी उपचुनाव में जीत

राज्य में नवंबर-दिसंबर 2019 में विधानसभा चुनाव हुआ था। हेमंत सरकार गठन के 3.5 साल हुए हैं। इस दौरान राज्य में कुल छ: विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इनमें से रामगढ़ विधानसभा को छोड़ कर बाक़ी सभी पर सत्तारूढ़ गठबंधन ने जीत हासिल की। डुमरी विधानसभा क्षेत्र झामुमो नेता सह शिक्षा मंत्री स्व. जगरनाथ महतो का गढ़ माना जाता है। उन्होंने लगातार चार चुनाव यहाँ से जीता था।

महतो के निधन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए उनकी पत्नी बेबी देवी को पहले कैबिनेट मंत्री बनाया। फिर अपनी पार्टी झामुमो से प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा। बेबी देवी ने रिकॉर्ड 17,153 मत से जीत हासिल की। इस चुनाव में उन्हें एक लाख से अधिक वोट मिले। डुमरी विधानसभा उपचुनाव ने भविष्य का संकेत तो दे ही दिया। क्योंकि इंडिया गठबंधन और एनडीए ने उपचुनाव में पूरी झोंक रखी थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जीत के बाद कहा कि ‘डुमरी की यह प्रचंड जीत आग़ाज़ है 2024 का। जनता ने ठान लिया है कि झारखण्ड में सिर्फ़ जनतंत्र चलेगा, धनतंत्र नहीं। यहाँ सिर्फ़ झारखण्डियों की सरकार चलेगी।’

झामुमो के साथ मुस्लिम

डुमरी उपचुनाव में इंडिया गठबंधन के झामुमो, कांग्रेस और राजद की एकजुटतता दिखी। वहीं एनडीए के भाजपा और आजसू की ताक़त भी दिखी। दोनों दलों के प्रत्याशी को पिछले चुनाव से अधिक वोट मिले। उपचुनाव के परिणाम से एक बात साफ़ हो गयी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद झामुमो का जनाधार अब भी अखण्ड है। पिछले चुनाव में झामुमो प्रत्याशी जगरनाथ महतो को कुल 71,000 से कुछ अधिक वोट मिले थे। भाजपा और आजसू ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इनके दोनों प्रत्याशियों के वोट को जोडक़र देखा जाए, तो स्व. महतो क़रीब 6,000 वोट से जीते थे। इस बार हेमंत सोरेन की अगुवाई में झामुमो ने एक लाख से अधिक वोट हासिल किया। झामुमो और आजसू प्रत्याशी के बीच वोटों का अंतर भी 17,000 से अधिक रहा।

यह दिखाता है कि झामुमो के थ्री एम यानी माझी, मुस्लिम और महतो समीकरण को तोड़ पाने में भाजपा-आजसू का गठबंधन कामयाब नहीं हो सका। तमाम आरोपों के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की लोकप्रियता बरक़रार है। एक ख़ास बात और रही कि सन् 2019 के चुनाव में एआईएमआईएम के उम्मीदवार को 26,000 से ज़्यादा वोट मिले थे। जबकि इस बार उपचुनाव में केवल 3,472 वोट मिले। यानी मुस्लिम वोट पूरी तरह से झामुमो के साथ गया। इंडिया गठबंधन के मज़बूत रहने, मुस्लिम वोट नहीं बँटने आदि 2024 में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए संजीवनी का काम करेगी। वहीं भाजपा को अपनी रणनीति पर विचार करना होगा।

हेमंत का बढ़ा क़द

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को इंडिया गठबंधन के 14 सदस्यीय संयोजक सदस्यों में रखा गया है। इस वर्ष मार्च में रामगढ़ विधानसभा का उपचुनाव हुआ था। यहाँ कांग्रेस अपनी सीट नहीं बचा सकी। आजसू ने कांग्रेस की सीट को झटक लिया। वहीं, झामुमो ढुमरी उपचुनाव में अपनी सीच बचाने में कामयाब रहा। इससे हेमंत का गठबंधन में कद ज़रूर बढ़ेगा।

हालाँकि उनके क़द को कम करने के लिए विपक्षी दल भाजपा लगातार प्रयासरत है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी संकल्प यात्रा चला रहे। हेमंत सोरेन पर लगातार आरोप लगा रहे। अवैध खनन, ज़मीन फ़र्ज़ीवाड़ा, शराब घोटाला आदि की चर्चा करते हुए 10,000 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले का दावा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जेल जाने की बात कर रहे हैं।

ईडी बार-बार भेज रही समन

बाबूलाल मरांडी की बातों को ईडी पुष्ट कर रही है। ईडी ने अवैध खनन मामले में बीते साल 17 नवंबर, 2022 हेमंत सोरेन को तलब किया था। हेमंत से आठ घंटे पूछताछ हुई थी। अब ईडी उन्हें नये मामले ज़मीन फ़र्ज़ीवाड़ा में तीन बार समन कर चुकी है। ईडी ने हेमंत सोरेन को ज़मीन फ़र्ज़ीवाड़ा मामले में 14 अगस्त को पेश होने के लिए पहली बार समन भेजा। वह ईडी कार्यालय नहीं पहुँचे। इसके बाद दूसरी बार समन भेजकर उन्हें 24 अगस्त को बुलाया गया। इस बार भी वह ईडी के सामने नहीं आये और सुप्रीम कोर्ट का रुख़ कर लिया। हेमंत ने ईडी के ख़िलाफ़ याचिका दायर की।

इस बीच ईडी ने तीसरी बार समन जारी करते हुए 9 सितंबर को रांची स्थित जोनल कार्यालय बुलाया। हेमंत सोरेन इस दिन भी ईडी के सामने पेश नहीं हुए और पेशी के दिन ही अपने कमर्चारी के मार्फ़त पत्र भेज दिया। वह राष्ट्रपति द्वारा जी-20 को लेकर बुलाये गये रात्रि भोज में शामिल होने के लिए दिल्ली चले गये। पत्र में क्या लिखा? फ़िलहाल इसका ख़ुलासा नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दूसरे समन के बाद ईडी को पत्र लिखा था। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने इस पत्र में समन को राजनीति से प्रेरित और ग़ैर-क़ानूनी बताया था। साथ ही सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने तक इंतज़ार करने का अनुरोध किया था।

सूत्रों के मुताबिक, ईडी ने राजनीतिक से प्रेरित होने की बात ख़ारिज करते हुए हेमंत सोरेन को पत्र का जवाब भी दिया। पत्र में लिखा कि ईडी प्रोफेशनल एजेंसी है। यह साक्ष्य और क़ानून के अनुसार काम करती है। यह आपके द्वारा घोषित सम्पत्ति की जाँच नहीं है, बल्कि प्रोसिड ऑफ क्राइम से अर्जित सम्पत्ति के पहलुओं की जाँच है। पहली बार आपको 17 नवंबर, 2022 को अलग मामले में समन किया गया था। इस बार अलग मामले में बुलाया गया है। ईडी मनी लॉन्ड्रिंग (पीएमएलए) के तहत जाँच कर रही है।

गिरफ़्तारी की आशंका

ग़ौरतलब है कि ज़मीन फ़र्ज़ीवाड़ा मामले में रांची के पूर्व उपायुक्त छवि रंजन, कारोबारी विष्णु अग्रवाल समेत आठ लोग पहले से जेल में हैं। हेमंत सोरेन को भी पूछताछ के दौरान अपनी गिरफ़्तारी की आशंका है। इसलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन दायर की है। रिट पिटीशन में उन्होंने पीएमएलए की धारा-50 और 63 की वैधता की चुनौती दी है। उन्होंने कहा है कि ईडी धारा-50 के तहत बयान दर्ज करने की कार्रवाई के दौरान ही गिरफ़्तार कर लेती है।

इसलिए समन जारी करने के बाद गिरफ़्तारी का डर बना रहता है। हेमंत ने कोर्ट से ईडी की कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बताते हुए स्थगित करने और पीडक़ कार्रवाई नहीं करने का आदेश देने का अनुरोध किया है। गिरफ़्तारी का डर उनके समय-समय पर बयान में भी झलकता है। हाल में उन्होंने एक जनसभा में कहा कि राज्य में जबसे हमारी सरकार बनी है, तब से विपक्ष इसे गिराने में लगा है। संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर मुझे जेल भेजने की कोशिश की जा रही है। जब तक वह मुझे जेल भेजेंगे, तब तक झारखण्ड को मज़बूत कर दूंगा।’

नये दाँव की सम्भावना

हेमंत की रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और फ़ैसले का इंतज़ार है। उधर तीसरे समन के बाद भी हेमंत सोरेन ईडी के सामने पेश नहीं हुए। अब ईडी क्या रुख़ अपनाती है? इसका इंतज़ार किया जा रहा है। क्योंकि फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट से कोई आदेश नहीं आया है; इसलिए ईडी स्वच्छंद है। सूत्रों की मानें, तो ईडी एक बार फिर समन भेजने की तैयारी में है। साथ ही क़ानूनी रास्ता अपनाने के लिए भी विचार कर रही है।

लोकसभा चुनाव में अभी छ: महीने का समय है। तय समय अनुसार राज्य में विधानसभा चुनाव में लगभग डेढ़ साल बाक़ी है। चुनाव से पहले हेमंत सोरेन की गिरफ़्तारी हो या न हो; दोनों ही स्थिति में राजनीति गतिविधियाँ तेज़ रहेंगी।

सूत्रों की मानें, तो हेमंत सोरेन नया दाँव खेलने की तैयारी भी कर रहे हैं। वह एक बार फिर विशेष सत्र बुलाकर स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण संबंधित विधेयक (जिसे राज्यपाल ने वापस कर दिया था) पारित कर राज्यपाल को भेज सकते हैं। जिससे जनता के एक ख़ास समुह का साथ बरक़रार रहे।

कब तक लड़़ते रहेंगे क़ानून के रखवाले?

उत्तर प्रदेश में क़ानून के रखवाले पुलिस वाले एवं क़ानून की लड़ाई लडऩे वाले अधिवक्ता आपस में लड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क़ानून के काले कोट एवं ख़ाकी वर्दी के बीच छिड़े विवाद को शान्त करने में विफल दिखे, तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस पुलिस के माध्यम से प्रदेश की क़ानून व्यवस्था को दुरुस्त कराते हैं, उसी पुलिस पर प्रदेश के अधिवक्ता अराजकता एवं अत्याचार फैलाने का आरोप लगा रहे हैं।

स्थिति यह है कि पूरे प्रदेश के अधिवक्ता हड़ताल पर चले गये हैं। अधिवक्ता सुमन का कहना है कि योगी राज में पुलिस इतनी निरंकुश हो चुकी है कि वो अधिवक्ताओं को पीट रही है। वहीं अधिवक्ता महेंद्र सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को मुख्यमंत्री योगी की सरकार में इतनी छूट मिली हुई है कि पुलिस ही गुण्डों का काम कर रही है। मगर एक पुलिस अधिकारी ने अपने नाम को प्रकाशित न कराने का अनुरोध करते हुए कहा कि अधिवक्ताओं के बार बने हुए हैं, जिनके चलते अधिवक्ता अपने आपको ही न्यायालय समझने की भूल कर रहे हैं। प्रदेश में सबसे अधिक क़ानून की धज्जियाँ अधिवक्ता ही उड़ाते हैं। वे पुलिस से भी नहीं डरते। अधिवक्ताओं ने पहले भी कई बार पुलिस के विरोध में काम किये हैं। हर बार ग़लती पुलिस के ऊपर ही डाल दी जाती है। इस बार हापुड़ में कुछ पुलिसकर्मियों एवं अधिवाक्ताओं के बीच मामूली सी झड़प हो गयी थी, जिसे लेकर इतना हंगामा हो रहा है।

हापुड़ में हुआ विवाद

असल में हापुड़ में एक महिला अधिवक्ता से एक पुलिसकर्मी का विवाद हो गया था। पुलिस का आरोप है कि महिला अधिवक्ता ने छोटी सी सडक़ दुर्घटना को लेकर हुई कहासुनी को लेकर एक पुलिसकर्मी की वर्दी फाड़ दी थी। मगर अधिवक्ताओं का आरोप है कि पुलिसकर्मी ने महिला अधिवक्ता को टक्कर मारी। उसके बाद उसने महिला अधिवक्ता से अभद्रता की, जब अधिवक्ताओं ने इसका विरोध किया, तो अधिवक्ताओं को पुलिसकर्मियों ने पीटना आरम्भ कर दिया।

हापुड़ के एक जानकार पत्रकार ने बताया कि बीते महीने की 25 तारीख़ को महिला अधिवक्ता प्रियंका त्यागी सडक़ मार्ग से अपने चार पहिया वाहन से हापुड़ से ग़ाज़ियाबाद जा रही थीं। उनके साथ उनके पिता एवं दो अन्य लोग थे। गढ़ रोड के निकट एक पुलिसकर्मी की लैपर्ड बाइक वकील की महिला अधिवक्ता की कार से टकरा गयी। इसके बाद दोनों के बीच कहासुनी हो गयी। पुलिसकर्मी कह रहा है कि महिला अधिवक्ता प्रियंका त्यागी ने उसे पीट दिया एवं वर्दी फाड़ दी। पुलिसकर्मी ने कोतवाली में अधिवक्ता प्रियंका त्यागी एवं उसके पिता के विरुद्ध सरकारी काम में बाधा डालने, पुलिसकर्मी को पीटने सहित विभिन्न धाराओं में मुक़दमा दर्ज करा दिया।

वहीं अधिवक्ता प्रियंका त्यागी ने पुलिसकर्मी पर उन्हें अश्लीलता से घूरने, अश्लील हरकतें करने एवं लगातार पीछा करते हुए उनकी कार में टक्कर मारने के आरोप लगाते हुए मुक़दमा दर्ज करा दिया। अधिवक्ता प्रियंका त्यागी ने पुलिसकर्मी पर उनके विरुद्ध झूठा मुक़दमा दर्ज कराने का आरोप लगाया। पीछा करने के आरोप को लेकर पुलिसकर्मी का कहना है कि वो जल्दी में था एवं उसने आगे निकलने के लिए हार्न भी बजाया था। कोतवाली पुलिस ने अधिवक्ता प्रियंका त्यागी एवं उनके पिता को वहीं बैठा लिया। अधिवक्ता प्रियंका त्यागी ने अन्य अधिवक्ताओं को घटना की सूचना मोबाइल फोन से दे दी, जिसके चलते बीसियों अधिवक्ता कोतवाली में आ जुटे। पुलिस ने अधिवक्ता प्रियंका एंव उनके पिता को रिहा कर दिया।

बाद में अधिवक्ता क्रोधित हो उठे एवं इस प्रकरण को लेकर प्रदर्शन करने लगे। अधिवक्ताओं ने सीओ सिटी को ज्ञापन देकर माँग की कि महिला अधिवक्ता के विरुद्ध दर्ज एफआईआर रद्द की जाए। इसके अलावा 29 अगस्त को हापुड़ बार एसोसिएशन के सैकड़ों सदस्य नेशनल हाईवे-9 पर इकट्ठे होकर जाम लगाकर प्रदर्शन करने लगे। यह सूचना पुलिस को मिली। पुलिस ने घटना स्थल पर पहुँची, जिसमें कई पुलिस अधिकारी भी थे। कहा तो यह जा रहा है कि पुलिस अधिकारियों ने अधिवक्ताओं को समझाने का प्रयास किया, मगर अधिवक्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने उन पर सीधे लाठियाँ भाँज दीं। पुलिस यह कह रही है कि समझाने के बीच एक अधिवक्ता ने एक महिला पुलिसकर्मी की नेम प्लेट नोच ली थी, जिसके बाद विवाद हुआ। पुलिस का यह भी कहना है कि अधिवक्ता राहगीरों से भी अभद्रता करने लगे, तब मजबूरन पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा। इस प्रकरण के बाद पुलिस ने 17 नामज़द लोगों समेत लगभग 250 अज्ञात लोगों के विरुद्ध हंगामा करने, सरकारी कार्य में बाधा डालने एवं पुलिस से हाथापाई करने, लोगों को तंग करने समेत कई धाराओं में एफआईआर दर्ज की है। हापुड़ में अधिवक्ताओं पर लाठीचार्ज के उपरांत ग़ाज़ियाबाद में एक अधिवक्ता की हत्या हो गयी।

सरकार का विरोध

इन दो घटनाओं से क्रोधित उत्तर प्रदेश की सभी बार एसोसिएशनों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ-साथ प्रदेश सरकार के विरोध में मोर्चा खोल दिया है। पूरे प्रदेश के अधिवक्ता कोतवाली थाने के सभी आरोपी पुलिसकर्मियों एवं अधिवक्ता प्रियंका त्यागी से भिडऩे वाले पुलिसकर्मी के विरुद्ध कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। अधिवक्ताओं ने पूरे प्रदेश में हड़ताल कर दी है। इस हड़ताल के चलते मुक़दमों का निपटान नहीं हो पा रहा है। पुलिस प्रशासन ने सभी पुलिसकर्मियों को सभी प्रकार के न्यायालयों के द्वार के अंदर प्रवेश करने से मना कर दिया है।

सभी जनपदों में अधिवक्ता लगातार पुलिस का विरोध करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं। न्यायिक कार्यों का बहिष्कार कर रहे हैं। इस तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए शान्ति बहाली के उत्तर प्रदेश सरकार ने मेरठ कमिश्नर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया है। सरकार ने एसआईटी को घटना के सभी पहलुओं की सघन जाँच करके उसकी रिपोर्ट सरकार को सौंपने के निर्देश दिये हैं। तनाव बढऩे की आशंका को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार ने हर नुक्कड़, हर चौराहे पर पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया है। क़ानून की राजधानी प्रयागराज में प्रदेश भर की बार काउंसलिंग के अधिवक्ता जुटे हुए हैं। पुलिस के विरुद्ध नारे लगा रहे हैं।

अधिवक्ताओं की प्रदेश व्यापी हड़ताल एवं विरोध प्रदर्शन को देखते हुए स्वत: संज्ञान लेते हुए प्रयागराज उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रीतिंकर दिवाकर एवं न्यायमूर्ति एमसी त्रिपाठी की पीठ मामले की सुनवाई कर रही है। जब तक एसआईटी की जाँच सामने आएगी तब तक किसी भी पक्ष के विरुद्ध कार्रवाई नहीं हो सकेगी। हालाँकि मुख्य न्यायाधीश प्रीतिंकर दिवाकर दो-टूक कह चुके हैं कि न्यायालयों के कार्य को इस प्रकार प्रभावित नहीं किया जा सकता, अत: न्यायिक कार्य होंगे। प्रयागराज उच्च न्यायलय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक कुमार सिंह की अध्यक्षता में आपात बैठक में बार एसोसिएशन के महासचिव नितिन शर्मा ने न्यायिक कार्यों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। अधिवक्ता पुलिस के अतिरिक्त प्रदेश सरकार के विरुद्ध भी लामबंद हो रहे हैं।

पहले भी हुए हैं झगड़े

अधिवक्ताओं एवं पुलिसकर्मियों के बीच विवाद कोई नयी बात नहीं है। इससे चार माह पूर्व इसी वर्ष कानपुर में पुलिस लाइन स्थित कमिश्नरी न्यायालय में पेशी के समय पुलिसकर्मियों एवं अधिवक्ताओं के बीच धक्कामुक्की एवं मारपीट हुई थी। इस प्रकरण में पुलिसकर्मियों ने 10 अधिवक्ताओं के विरुद्ध कोतवाली में बलवा करने की धारा-147, जानबूझकर अपमान करने की धारा-504, मारपीट की धारा-323, लोकसेवकों को चोट पहुँचाने, कार्य में वाधा डालने की धारा-332 एवं धारा-353 के तहत एफआईआर दर्ज करायी थी। 20 अक्टूबर, 2022 को ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड एवं ट्रैफिक पुलिसकर्मी को अधिवक्ताओं ने पीट दिया था। इस प्रकरण में भी तीन अधिवक्ताओं के विरुद्ध नामज़द एवं अन्य चार अज्ञात के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गयी। यह विवाद अधिवक्ताओं द्वारा सडक़ किनारे गाड़ी खड़ी करने को लेकर हुआ था। इससे पूर्व में आगरा में पुलिसकर्मियों एवं अधिवक्ताओं के बीच मारपीट हुई थी। इस प्रकरण में भी छ: अधिवक्ताओं के विरुद्ध एफआईआर दर्ज हुई थी। मेरठ में भी पुलिसकर्मियों एवं अधिवक्ताओं के बीच झड़प हो चुकी है।

कैसे हो शान्ति?

मास्टर नंदराम कहते हैं कि समस्या यह है कि अधिवक्ता एवं पुलिसकर्मी दोनों ही क़ानून के रक्षक हैं, मगर दोनों ही क़ानून को अपनी जेब में रखकर घूमते हैं। न तो पुलिसकर्मी किसी को कुछ समझते हैं एवं न ही अधिवक्ता किसी को कुछ समझते हैं। इसके चलते जहाँ पर भी दोनों का अहम टकराता है, वहीं पर झगड़ा हो जाता है। अगर इस झगड़े को मिटाना है, तो पुलिसकर्मियों एवं अधिवक्ताओं को अपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी से करना होगा।

दोनों को ही अकड़ एवं घमंड दिमाग़ से निकालना होगा एवं जनसेवा के विचार से अपना कार्य करना होगा। यदि कहीं किसी में कोई कमी हो अथवा उसकी ग़लती हो, तो उसे अपनी कमी को मानते हुए क्षमा माँगनी चाहिए। उन्हें उस समय यह घमंड नहीं पालना चाहिए कि उन्हें क़ानून के आधार पर लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ अधिकार मिले हुए हैं, तो वे उनका दुरुपयोग कर सकते हैं। 

मध्य प्रदेश में सुरक्षित नहीं दलित-आदिवासी

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र प्रदेश की शिवराज सरकार सभी को साधने की कोशिशों में लगी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कई बड़े ऐलान कर चुके हैं। शिवराज सिंह मध्य प्रदेश को हर मामले में नंबर वन प्रदेश बताने की कोशिश में लगे हैं। चुनाव के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर कई बड़े भाजपा नेता मध्य प्रदेश के दौरे कर रहे हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी भोपाल का दौरा कर चुकी हैं। प्रदेश की शिवराज सरकार यह दिखाने की कोशिश में लगी है कि उसके शासन में सभी वर्गों के लोग ख़ुश हैं; लेकिन आदिवासियों और दलितों पर अत्याचार में मध्य प्रदेश एक अग्रणी राज्य बनता जा रहा है।

पिछले दिनों पेशाब कांड के बाद जिस तरह से शिवराज सिंह ने एक आदिवासी को अपने आवास पर बुलाकर उसके पैर धोकर कहा कि किसी भी ग़रीबों पर इस तरह के अत्याचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ऑफिस ऑफ शिवराज चौहान नाम के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया कि अगर ज़रूरत पड़ी, तो अपराधियों को ज़मीन में गाड़ देंगे। सबने देखा कि इस पेशाब कांड को शिवराज सिंह ने एक अच्छे कार्यक्रम में बदलने की कोशिश की। शिवराज सिंह सरकार ने ख़ुद को दलित, आदिवासियों हितैषी दिखाने के लिए जमकर प्रचार किया। सरकार की ऐसी छवि बनायी गयी जैसे मध्य प्रदेश में अपराधियों की ख़ैर नहीं। लेकिन सच्चाई ये है कि मध्य प्रदेश में दलितों, आदिवासियों, विशेषकर दलित-आदिवासी महिलाओं पर हर रोज़ अत्याचार हो रहे हैं। अपराध और अमानवीय व्यवहार का सामना कर रहे मध्य प्रदेश के दलित और आदिवासी न्याय की माँग कर रहे हैं। लेकिन अपराध छिपाने में माहिर भाजपा और शिवराज सिंह विज्ञापनों की आड़ लेकर ख़ुद की छवि सुधारने की कोशिश में लगे हैं। क्या एक आदिवासी के पैर धोने और विज्ञापनों में इसका प्रचार करने से सरकार की ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गयी? क्या इससे दलितों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ अपराध ख़त्म हो गये? सरकार ने दलितों और आदिवासियों की सुरक्षा के लिए अब तक क्या किया?

दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार करने वालों में भाजपा के लोग ही शामिल है। भाजपा के नेता सब कुछ जानते हैं। कुछ दिन पहले ही मध्य प्रदेश के सागर ज़िले में खुरई विधानसभा के गाँव बरोदिया नौनगर में भाजपा कार्यकर्ता एक दलित लडक़ी से कई दिन से छेड़छाड़ कर रहे थे। छेड़छाड़ का विरोध करने पर आरोपियों ने उसके भाई की पीट-पीटकर हत्या कर दी और लडक़ी की माँ को नंगा करके पीटा, उसके हाथ तोड़ दिये। आरोपियों ने लडक़ी को भी पीटा। सभी आरोपी सरकार में मंत्री भूपेंद्र सिंह के क़रीबी है। लेकिन भूपेंद्र सिंह इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। दबंगों के कहर से आक्रोशित परिजनों ने कई दिन तक मृतक का अंतिम संस्कार नहीं किया। शिवराज सरकार अपने पक्ष के आरोपियों के चलते उन पर कार्रवाई भी करने से कतराती नज़र आयी।

गाँव में भारी पुलिस बल तैनात करने के अलावा शिवराज सरकार बाक़ी कुछ करने से बचती नज़र आयी। आरोपियों की हिम्मत देखिए परिवार को जान से मारने की हद तक पीटने के बाद उन्होंने पीडि़तों के घर में जमकर तोडफ़ोड़ की। घर का कोई भी सामान आरोपियों ने साबुत नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि पक्की छत को भी तोड़ दिया। इतने पर भी आरोपियों का ग़ुस्सा थमा नहीं तो वो लडक़ी के दो भाइयों की तलाश में उनकी रिश्तेदारों के घर तक गये। इस घटना को लेकर बसपा प्रमुख मायावती ने ट्वीट कर मोदी सरकार पर निशाना साधा। मायावती ने ट्वीट में लिखा कि मध्य प्रदेश के सागर ज़िले में जहाँ अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संत गुरु रविदास जी का स्मारक बनाने की नींव बड़े तामझाम से रखी, वहीं उसी क्षेत्र में उनके भक्तों के साथ ज़ुल्म-ज़्यादती चरम सीमा पर है, जो भाजपा व उनकी सरकार के दोहरे चरित्र का जीता-जागता प्रमाण है।

काफ़ी दबाव के बाद पुलिस ने हीलाहवाली के बाद नौ मुख्य आरोपियों सहित तीन अन्य लोगों पर एससी-एसटी की कुछ धाराओं समेत हत्या और बलवा करने की धाराओं में मामला दर्ज कर नौ आरोपियों को गिरफ़्तार किया।

इस निर्मम घटना से पहले भी छोला मंदिर थाना क्षेत्र में शंकर नगर में एक दलित लडक़ी से छेडख़ानी हुई। जब इस लडक़ी की माँ ने इसका विरोध किया, तो आरोपी और उसकी पत्नी ने महिला और उसकी बेटी को ख़ूब पीटा, जिससे महिला का सिर फट गया और एक पैर टूट गया। घटना को अंजाम देकर आरोपी पति-पत्नी फ़रार हो गये। बीती अप्रैल में हरदा ज़िले के रोल गाँव में रहने वाले कालबेलिया समाज की एक नाबालिग़ लडक़ी से भी छेड़छाड़ का बड़ा मामला सामने आया। छेड़छाड़ से तंग आकर घर वालों ने नाबालिग़ लडक़ी की पढ़ाई छुड़वा दी। इसके बाद जब भी लडक़ी किसी काम से बाहर निकलती, गुण्डे उसे छेड़ते। एक दिन पानी भरने लडक़ी गयी, तब भी उसे गुण्डों ने छेड़ा।

लडक़ी के परिवारवालों ने विरोध किया, तो गुण्डे उन पर लाठी, डंडे और दूसरे हथियार लेकर टूट पड़े और उनके हाथ पैर तोड़ दिये। उनकी झोपड़ी में आग लगा दी। पीडि़त घबराकर गाँव छोड़ कर चले गये। इतनी बड़ी घटना के बाद भी पुलिस ने गुण्डों की तरफ़ से भी पीडि़तों के ख़िलाफ़ क्रॉस एफआईआर दर्ज की। सब कुछ जानते हुए पुलिस गुण्डों को बचा रही है। दो महीने पहले सागर में ही एक दलित लडक़े को नंगा करके उसकी बेरहमी से पिटाई का वीडियो सामने आया था। पुलिस इस वीडियो को 8-9 अक्टूबर, 2022 की बता रही है। रिपोर्ट लिखे जाने तक इस घटना में पुलिस आरोपियों को नहीं पकड़ सकी।

अपराधों के आँकड़े

आँकड़ों को देखकर लगता है कि दलितों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर है। 2018 से लेकर 2023 तक मध्य प्रदेश दलितों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ अपराधों के मामले बढ़ते हुए दिखायी दिये। 2018 में मध्य प्रदेश में अपराध के कुल 2,48,354 मामले दर्ज हुए। 2021 में अपराध के मामले बढक़र 3,04,066 हो गये। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश अपराध के मामले में देश में चौथे नंबर पर है। राज्य में हर रोज़ पाँच हत्याएँ होने के आँकड़े दर्ज हैं। वहीं बलात्कार, अपहरण, मारपीट और आगजनी के हर दिन 8 से 15 मामले हर दिन सामने आ रहे हैं। मध्य प्रदेश में महिलाओं के ख़िलाफ़ हर घंटे में अपराध के तीन मामले दर्ज हुए हैं। मध्य प्रदेश अपराध अभिलेख ब्यूरो, पुलिस मुख्यालय ने 2023 की पहले छ: महीने के अपराधों की समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि 2022 की तुलना में 2023 के पहले छ: महीने में अपराध लगभग बराबर रहे हैं। जनवरी से जून 2022 तक भारतीय दंड संहिता के तहत कुल 1,59,762 अपराध दर्ज हुए, वहीं जनवरी से जून 2023 तक कुल 1,60,703 आपराधिक मामले दर्ज हुए। हालाँकि इसे मध्य प्रदेश अपराध अभिलेख ब्यूरो लगभग बराबर बता रहा है; लेकिन 2022 की तुलना में 2023 में अपराध के 1,059 मामले अधिक दर्ज हुए।

ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश अपराध अभिलेख ब्यूरो ने अपनी रिपोर्ट मध्य प्रदेश सरकार को ख़ुश करने के लिए पेश की है, जिसमें एक तरफ़ सभी आपराधिक आँकड़े अधिक दिखाये गये हैं, वहीं अलग-अलग अपराधों को कम करके बताया गया है। शिवराज सरकार कुछ दिन पहले ही एक मन्दिर का निर्माण कराकर उसमें खड़ताल बजाते हुए दिखे। हिन्दुत्व के नाम पर इस तरह के कार्ड खेलने में माहिर भाजपा नेता यह भूल जाते हैं कि उनके शासन में अपराधों को छिपाने की ये तरकीबें अब जनता समझ चुकी है। जनता की रक्षा करना सरकार का पहला कर्तव्य है; लेकिन शिवराज सरकार से लेकर दूसरे प्रदेशों में भाजपा की सरकारें इसमें नाकाम हैं। मध्य प्रदेश में दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार के बढ़ते आँकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि शिवराज सिंह को हिन्दुत्व कार्ड के नाम पर जीतने का भरोसा है। लेकिन शिवराज सिंह के साथ-साथ भाजपा नेताओं की यह बड़ी भूल है।

जोड़-तोड़ की सरकार बनाकर मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि मध्य प्रदेश में दलितों और आदिवासियों को नाराज़ करके सत्ता पाने का सपना देखना बेवक़ूफ़ी के अलावा कुछ नहीं है; लेकिन शिवराज सिंह ये भी जानते हैं कि हिन्दुत्व के कार्ड पर दलित भाजपा के साथ खड़े होंगे। इसी के चलते शिवराज सिंह दलितों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों को रोकने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। रही आदिवासियों की बात, तो उन्हें लगता है कि आदिवासी समुदाय को वो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आधार बनाकर अपनी तरफ़ करने में सफल रहेंगे। हालाँकि ऐसा होगा नहीं।

फ़सल अवशेषों से पैसा कमाएँ किसान

योगेश

कृषि कार्यों में दक्ष नहीं होने के चलते हमारे देश के अधिकांश किसान आर्थिक रूप से परेशान और दु:खी रहते हैं। बहुत पुराने समय से हम अपने आपको कृषि प्रधान देश कहते आ रहे हैं; लेकिन हमारे अधिकांश किसानों को खेती करने के सही तरीक़े नहीं मालूम हैं। इससे किसानों को फ़सलों में लगातार घाटा होता रहता है और किसानों पर क़र्ज़ बढ़ता जाता है। जैसे कि अधिकांश किसान अपने खेतों में पराली जलाने लगते हैं, तो इससे उन्हें बहुत नुक़सान होता है। किसानों को इस पराली को न जलाकर इसका सदुपयोग करके इससे लाभ कमाना चाहिए। अभी दो महीने में ही धान की फ़सल कटने लगेगी, जिसकी पराली को बहुत-से किसान मशीनों से धान कटवाकर खेतों में ही छोड़ देंगे और अगली बुवाई की जल्दबाज़ी में उसे खेत में ही जला देंगे। उत्तर प्रदेश में पराली जलाने वाले किसानों पर ज़ुर्माना लगता है। सरकार का मानना है कि पराली जलाने से प्रदूषण फैलता है। इसलिए किसानों को पराली जलाने से बचना ही चाहिए। लेकिन किसान इससे बच कैसे सकते हैं और उन्हें इसके क्या-क्या फ़ायदे हो सकते है? इसे समझना होगा।

वास्तव में किसानों के आगे धान या दूसरी फ़सलों की पराली को नष्ट करने की समस्या बड़ी विकराल है। कृषि विशेषज्ञ और जानकार कहते हैं कि बड़ी जोत के किसान धान और गेहूँ की फ़सलों की कटाई मशीनों से कराते हैं, जिससे फ़सलों के अवशेष खेतों में ही रह जाते हैं। इन अवशेषों को नष्ट करने का सबसे आसान तरीक़ा किसानों ने निकाल लिया है और वह है, पराली जलाने का। लेकिन किसान यह नहीं समझते कि इससे पशुओं के चारा नष्ट होता है। खेतों की उपजाऊ शक्ति नष्ट होती है। किसानों को इस पराली से होने वाली आमदनी भी नहीं मिलती। धान की फ़सल काटकर पशुओं के चारे की चिन्ता करने वाले किसान वही हैं, जिनके पास कम खेती है और जिन्होंने पशु पाले हुए हैं। कृषि विशेषज्ञों और जानकारों की सलाह है कि जो किसान फ़सलों के अवशेष नहीं चाहते, वे उन्हें या तो गत्ता फैक्टरियों को बेच दें या फिर खेतों में ट्रैक्टर में हैरों लगाकर उसे गहरे से उलट दें और खेतों में पानी भर दें।

इसके साथ ही खेत में हल्की मात्रा में यूरिया या दूसरी खरपतवार गलाने वाली किसी दवा का छिडक़ाव कर दें। इससे खेतों से खरपतवार भी नष्ट हो जाएगी और फ़सलों के अवशेष भी गल जाएँगे। लेकिन इसके लिए थोड़ी मेहनत और करते हुए किसानों को एक जुताई तब करनी होगी, जब मिट्टी में 40 से 45 प्रतिशत नमी शेष रह जाए। इसके एक सप्ताह बाद फिर से मिट्टी को पटलते हुए जुताई करनी होगी, जिससे खेतों की नमी थोड़ी और सूख जाए, और मिट्टी में पैदा होने वाले कृषि मित्र कीट पैदा हो सकें। इसके एक सप्ताह बाद किसान खेतों को जोतकर उसमें अगली फ़सल बो सकते हैं। खेतों की इस अवस्था में किसानों को ध्यान रखना होगा कि अगली फ़सल बोते समय खेतों में 20 से 25 प्रतिशत नमी शेष होनी चाहिए। अगर खेतों की नमी इससे ज़्यादा कम है, तो खेत को थोड़ा से पानी दें या पानी का छिडक़ाव करें और फिर खेतों को जोतकर अगली फ़सल की बुवाई करें।

पराली का दूसरा उपयोग किसान पशुओं के चारे के रूप में कर सकते हैं। पशुओं का सूखा चारा बहुत महँगा होता है, जिससे किसान फ़सलों के अवशेषों को चारे के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं या उसे बेचकर अच्छा पैसा कमा सकते हैं। इसके अलावा किसान फ़सलों के अवशेषों को एक गड्ढे में भरकर उससे कम्पोस्ट खाद तैयार कर सकते है। ये खाद फ़सलों के लिए बहुत अच्छी और आवश्यक होती है। हालाँकि कहने को किसानों पर प्रदूषण का आरोप जानबूझकर मढ़ दिया जाता है। सच्चाई यही है कि किसानों के फ़सलों के अवशेषों से उतना धुआँ नहीं फैलता है, जितना कि फैक्ट्रियों और गाडिय़ों से फैलता है। फ़सलों के अवशेष जलने से उनका कार्बन भी उडक़र बहुत दूर नहीं जाता है। सर्दियों में प्रदूषण तो अपने आप ही हवा में आद्रता होने के चलते बढ़ जाता है। हवा में आद्रता के कारण कार्बन बहुत उठकर नष्ट नहीं हो पाता और वो हमारे वायुमंडल में ही घुला रहता है, जो कि साँस लेने में तकलीफ़ का कारण बनता है।

सरकारों और प्रदूषण से निपटने के लिए बनी उनकी एजेंसियों को अच्छी तरह मालूम है कि प्राकृतिक ईंधन, जैसे- लकड़ी, कंडे (उपले), फ़सलों के अवशेष आदि के जलने से जो प्रदूषण फैलता है, वह उतना घातक नहीं होता जितना घातक तेल, गैस के जलने और फैक्ट्रियों के धुएँ से, गंदे केमिकल वाले पानी से फैलने वाला प्रदूषण होता है। लेकिन बिना किसी ठोस कारण के किसानों को प्रदूषण फैलाने का दोषी क़रार दे दिया जाता है। सोचना चाहिए कि आज जितने लोग दमा, साँस, खाँसी, नज़ला और पेट के रोगी हैं, उतने तब नहीं थे, जब 100 प्रतिशत घरों में हर रोज़ सुबह-शाम लकड़ी, कोयला और कंडे जलाकर खाना बनाया जाता था।

अधिकांश घरों में दूध गर्म करने करने के लिए दिन भर कंडों और कोयले की आग जलती थी। लेकिन आज जब गैस पर खाना बनता है। लकड़ी और कंडे कम जलाये जाते हैं; तब प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, और इतना अधिक है कि कोई भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं है। तो इसका कारण कुछ और ही है; किसान नहीं। हालाँकि पहले खेतो में फ़सलों के अवशेष किसान पशुओं के चारे के रूप में करते थे। अब कृषि यंत्रों से खेती होने के करण किसानों ने पशु पालने कम कर दिये हैं और फ़सलों के अवशेषों को खेत में ही छोडक़र उन्हें अगली फ़सलों की बुवाई की जल्दी में जला रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की सरकार फ़सलों के अवशेषों का उपयोग करने के लिए लम्बे समय से हल निकाल रही है। सरकार ने खेतों में अवशेष जलाने पर किसानों पर ज़ुर्माने का प्रावधान दो साल पहले ही कर दिया था। इससे किसान फ़सलों के अवशेष जलाने से डरने लगे हैं और सरकार फ़सलों के अवशेषों को बायो कम्पोस्ट में बदलने का उपाय भी कर चुकी है। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य जैव ऊर्जा नीति-2022 के तहत कृषि अपशिष्ट आधारित बायो सीएनजी, सीबीजी (कम्प्रेस्ड बायो गैस) इकाइयों को कई तरह के प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया है। इस तरह की बायो सीएनजी, सीबीजी (कम्प्रेस्ड बायो गैस) इकाइयाँ हर ज़िले में लगायी जाएँगी। सरकार मानकर चल रही है कि इससे प्रदेश के 17 से 18 लाख किसानों को बायो डी-कम्पोजर उपलब्ध कराये जा सकते हैं, जिससे किसानों को कई लाभ होंगे।

एक बायो सीएनजी, सीबीजी (कम्प्रेस्ड बायो गैस) इकाई की लागत लगभग 160 करोड़ रुपये तक आएगी। गोरखपुर के धुरियापार में एक बायो सीएनजी, सीबीजी (कम्प्रेस्ड बायो गैस) इकाई लग चुकी है। इस संयंत्र में गेहूँ और धान के अवशेषों के अलावा धान की भूसी, गन्ने की पत्तियों और गोबर आदि का उपयोग किया जाएगा। सभी फ़सलों के अवशेष बेचने वाले किसानों को उसका पैसा दिया जाएगा, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी और वे अगली फ़सलों की बुवाई इसी पैसे से कर सकेंगे। इसके अलावा कई अन्य ज़िलों में भी बायो कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) बनने वाले संयंत्र लग रहे हैं।

ऐसी इकाइयों से फ़सलों के अवशेषों का उपयोग हो सकेगा और किसानों को इसका लाभ भी मिल सकेगा। सीएनजी एवं सीबीजी के उत्पादन करने के लिए इन इकाइयों में लोगों को रोज़गार मिलेगा। किसानों को कम्पोस्ट खाद मिल सकेगी। गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप के एक अध्ययन में कहा गया है कि फ़सलों के अवशेष जलाने से प्रति एकड़ पोषक तत्त्वों के अलावा 400 किलोग्राम उपयोगी कार्बन के अलावा प्रति एक ग्राम मिट्टी में मौज़ूद 10 से 40 करोड़ कृषि मित्र बैक्टीरिया और लगभग एक से दो लाख फफूँद जलकर नष्ट हो जाते हैं।

खेतों में फ़सलों के अवशेषों को जलाने वाले किसानों को ध्यान रखना होगा कि खेतों में फ़सलों के अवशेष जलाने से खेतों के पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं और कृषि मित्र कीट भी मर जाते हैं। इससे अगली फ़सल की उतनी अच्छी पैदावार नहीं हो पाती, जितनी कि होनी चाहिए। फ़सलों के अवशेष जलने से मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। कृषि मित्र कीटों के अलावा मिट्टी में मौज़ूद कृषि उपज बढ़ाने वाले बैक्टीरिया और फफूँद भी नष्ट हो जाती है। मिट्टी के जल जाने से भी खेती उतनी अच्छी नहीं होती, जितनी अच्छी होनी चाहिए।

शोधों से पता चला है कि फ़सलों के अवशेषों से फ़सलों को अनुपात के हिसाब से 0.5 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.6 प्रतिशत फास्फोरस और 1.5 प्रतिशत पोटाश की मात्रा होती है, जो कि फ़सलों के अवशेषों के जलाने से नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा इससे मिट्टी में उपलब्ध तीनों तत्त्व भी नष्ट होते हैं। खेतों की नमी भी नष्ट हो जाती है, जिससे आगामी फ़सलों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए किसानों को खेती करने के तरी$कों के अलावा अपने लाभ और हानि के बारे में भी विचार करना चाहिए। इसके लिए किसानों को कृषि करने की जानकारी लेनी चाहिए और फ़सलों के हर अंश का सदुपयोग करना चाहिए, जिससे उन्हें लाभ हो सके। फ़सलों के सदुपयोग से किसानों को हर तरह से लाभ होगा और जलाने से हर तरह से उन्हें नुक़सान ही होगा।

विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष

भारत के पर्यटन स्थलों में सुधार की ज़रूरत

भारत चार मौसमों, छ: ऋतुओं और दर्ज़नों तरह की संस्कृति वाला एक सुंदर महाद्वीप है। यही वजह है कि दुनिया भर के पर्यटक भारत घूमने के लिए आते रहते हैं। यही वजह है कि भारत में पर्यटन कमायी का एक अच्छा ज़रिया है। आजकल घूमना-फिरना सबको अच्छा लगता है, जिनके पास ज़्यादा पैसा होता है, वो विदेशों में घूमने जाते हैं।

इससे अपना पैदा विदेशों में जाता है, जिससे काफ़ी नुक़सान भी होता है। लेकिन अगर भारत सरकार इसे रोकना चाहे, तो अपने सभी पर्यटन स्थलों को और बेहतर बनाकर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। 27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर भारत सरकार के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय को इसके लिए संकल्प लेना चाहिए।

पहली बार सन् 1980 में विश्व पर्यटन दिवस संयुक्त राष्ट्र विश्व व्यापार संगठन (यूएनडब्ल्यूटीओ) ने मनाना शुरू किया था। 27 सितंबर, 1970 को संयुक्त राष्ट्र विश्व व्यापार संगठन को मान्यता मिली थी।

सन् 2022 में विश्व पर्यटन दिवस का मेज़बान इंडोनेशिया था और इसकी थीम ‘पर्यटन पर पुनर्विचार’ यानी ‘रीथिंकिंग टूरिज्म’ थी। इस बार 2023 की विश्व पर्यटन दिवस की थीम ‘पर्यटन और हरित निवेश’ यानी ‘टूरिज्म एंड ग्रीन इन्वेस्टमेंट’ है। इस साल 43वाँ विश्व पर्यटन दिवस है, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मूल्यों को बढ़ावा देने में पर्यटन की भूमिका के बारे में जागरूकता को बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि लोगों में पर्यटन स्थलों के बारे में जागरूकता के साथ-साथ उन्हें सजाने और संवारने में रुचि पैदा हो। भारत में केंद्र से लेकर राज्यों तक की सरकारों और टूरिज्म से कमायी करने वाले लोगों को इस बात को ध्यान में रखना होगा कि भारत के पर्यटन स्थल जितने साफ़-सुधरे, आकर्षक और हरे-भरे होंगे, उतने ही ज़्यादा पर्यटकों को वो आकर्षित कर सकेंगे। इससे सरकार के साथ-साथ पर्यटन स्थलों के सहारे अपनी आजीविका चलाने वालों की इनकम बढ़ेगी। इसके साथ ही पर्यटन स्थलों को अपराध से मुक्त करना होगा।

पर्यटन स्थल जितने सुरक्षित होंगे, उतने ज़्यादा लोग वहाँ आना पसन्द करेंगे। इसके अलावा पर्यटन स्थलों और उनके आसपास के इलाकों को ठगी, भिक्षावृत्ति और नशे से मुक्त करना होगा, ताकि पर्यटकों में किसी प्रकार का डर न रहे। अक्सर देखा जाता है कि पर्यटन स्थलों पर लूटपाट, चोरी, बलात्कार, हत्या, ठगी, भिक्षावृत्ति और नशा तस्करी होती है। इससे पर्यटक इन स्थानों पर पहुँचने और ठहरने से डरते हैं। पर्यटक जल्दी किसी पर भरोसा नहीं कर पाते। इससे पर्यटकों को गाइड करने वालों को भी काम मिलने में मुश्किल होती है। सरकार को इन परेशानियों को दूर करने के साथ-साथ पर्यटन स्थलों पर व्यवसाय करने वाले लोगों को पर्यटन स्थलों को और सुन्दर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके अलावा पर्यटन स्थलों पर व्यवसाय करने वाले लोगों को पर्यटकों के प्रति अपना व्यवहार मधुर और प्रेमपूर्ण रखने की आदत डालनी चाहिए।

भारत में लाखों लोगों का जीवन पर्यटन पर निर्भर है। पर्यटन के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल 25 से 45 लाख विदेशी पर्यटक आते हैं। इससे सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। विदेशी पर्यटक भारत में सांस्कृतिक स्थानों, रमणीय स्थानों, गाँवों, पुरानी विरासतों और बाज़ारों को देखने के लिए आते हैं। ऐसे स्थानों को सजाने-सँवारने की ज़िम्मेदारी केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय को लेनी चाहिए और जर्जर हो चुके पर्यटन स्थलों का जीर्णोद्धार कराना चाहिए।

आज़ादी के एक साल बाद यानी सन् 1948 से भारत में पर्यटक यातायात समिति की स्थापना का उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देना ही था। लेकिन जितनी तेज़ी से पर्यटन स्थलों को बेहतर किया जाना था, उतनी तेज़ी से उनका विकास नहीं किया गया। आज भी कई राज्यों के पर्यटन स्थल देखभाव और पुनरुद्धार के अभाव में धूल फाँक रहे हैं, जिसके चलते वहाँ पर्यटकों के पहुँचने का सिलसिला थम-सा रहा है। इसके अलावा पर्यटन स्थलों पर महँगी चीज़ों, महँगे खानपान, महँगे कमरों और महँगे किराये के चलते लोगों का पहुँचना वहाँ कम हुआ है। हालाँकि इसके लिए भारत में होते अपराध भी ज़िम्मेदार हैं, जिसके चलते बाहरी ही नहीं, भारतीय नागरिक भी घूमने से डरते हैं। भारत में 25 जनवरी को राष्ट्रीय पर्यटन दिवस मनाया जाता है; लेकिन इसके बावजूद सरकारों का ध्यान इन समस्याओं पर नहीं जाता, जिनके समाधान की तत्काल ज़रूरत है। भारत में पर्यटन की अपार संभावनाएँ हैं और अगर केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें चाहें, तो पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कारगर उपाय करके अरबों रुपये की सालाना कमायी कर सकती हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 6.23 से 7 प्रतिशत और कुल रोज़गार में 8.78 प्रतिशत योगदान पर्यटन क्षेत्र का है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सन् 2021 में पर्यटन से विदेशी मुद्रा आय 65 हज़ार 70 करोड़ रुपये हुई थी, जो सन् 2022 में 107 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 1 करोड़ 34 लाख 543 करोड़ हो गई। सन् 2021 में 15 लाख 20 हज़ार विदेशी पर्यटक भारत भ्रमण के लिए आए थे, जबकि सन् 2022 में 61 लाख 90 हज़ार विदेशी पर्यटक यहाँ आये थे। हालाँकि भारत सरकार पर्यटन को बढ़ावा देना चाहती है; लेकिन उन कमियों को दूर नहीं कर सकी है, जिनकी वजह से पर्यटक आना नहीं चाहते।

विश्व शान्ति दिवस

विश्व पर्यटन दिवस से पहले हर साल 21 सितंबर को विश्व शान्ति दिवस मनाया जाता है। दुनिया में जब तक शान्ति नहीं होगी, कोई चैन से नहीं जी सकेगा। आज के दौर में जब पूरी दुनिया नापना इंसान के लिए बहुत आसान हो गया है, तब शान्ति की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है; क्योंकि इसके बिना न तो व्यापार सम्भव है और न ही जोखिम कम किया जा सकता है। विश्व शान्ति दिवस की सन् 2022 की थीम ‘नस्लवाद का अन्त, शान्ति की स्थापना’ थी, जबकि इस साल 2023 की थीम ‘शान्ति के लिए कार्य : प्तवैश्विक लक्ष्यों के लिए हमारी महत्त्वाकांक्षा’ है।

आज जब क़रीब चार महीने से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है और पूरी दुनिया में अशान्ति फैलाने वाले आतंकवाद का ख़ौफ़ है, तब शान्ति की स्थापना को बढ़ावा देना और ज़रूरी हो जाता है। दुनिया में शान्ति की स्थापना के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1981 में विश्व शान्ति दिवस की घोषणा की थी। लेकिन दुनिया तरक़्क़ी के जितने पायदान चढ़ती जा रही है, इंसान उतना ही अशान्त युद्धरत होता जा रहा है, जिस पर गम्भीरता से विचार करने की आज बहुत ज़रूरत है। अगर दुनिया में अशान्ति बनी रहेगी, तो न कोई चैन से जी सकेगा और न ही पर्यटन को बढ़ावा मिल सकेगा। लेकिन शान्ति के लिए इंसान को अपनी आकांक्षाओं को कम करना होगा और लालच को पूरी तरह ख़त्म करना होगा।

वैमनस्य के पुलिंदे

धर्म अगर वैमनस्य कराएँ, तो उन्हें धर्म कहना उचित नहीं है। वैमनस्य तो बँटवारा कराता है। वैमनस्य जितना बढ़ेगा, बँटवारा उतना ही बढ़ेगा। बँटवारा जितना बढ़ेगा, वैमनस्य भी उतना ही बढ़ेगा। लोगों में मरने-मारने की स्थितियाँ प्रबल होती जाएँगी। इन स्थितियों में प्यार नहीं, नफ़रत को बढ़ावा मिलता है। नफ़रत से अपराध की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं। धर्मों का यह काम नहीं होना चाहिए। धर्मों की रचना तो लोगों को सन्मार्ग पर लाने और ईश्वर से जोडऩे के लिए की गयी है। लेकिन जो धर्म इंसानों को ही जोडक़र नहीं रख पाएँ, उन धर्मों से लोगों को ईश्वर से जोडऩे की उम्मीद करना ही बेमानी है।

हालाँकि लोगों ने धर्म उन निर्जीव किताबों को समझ लिया है, जिनमें धर्म के मार्ग बताये गये हैं। और धर्म का मार्गदर्शक उन्हें समझ लिया है, जिन्हें स्वयं धर्म का ज्ञान ही नहीं है। यही वजह है कि धर्म ग्रन्थों को ढोने वालों को लोग इतना महत्त्व दे देते हैं कि उनके हर बुरे क़दम को भी सही मान लेते हैं। विडम्बना यह है कि जो स्वयंभू लोग धर्म के ठेकेदार बने हुए हैं, वही वैमनस्य और बँटवारे की खाई खोदते हैं। लोग नहीं समझते कि जो धर्म के नाम पर लोगों को बाँट रहे हैं। लोगों में वैमनस्य का भाव भर रहे हैं, वे ईश्वर से उन्हें जोडऩे का मार्ग कैसे बता सकते हैं? वे किसी को मोक्ष का सही रास्ता कैसे बता सकते हैं? उन्हें तो यही नहीं पता कि स्वर्ग और नर्क कहते किसे हैं? जिन्हें इतनी छोटी बात नहीं पता, वे मोक्ष के बारे में भला क्या समझ सकते हैं? सब लिखी-लिखायी बातों को रटकर, उसमें मिर्च-मसाला लगाकर बता देते हैं। पता किसी को कुछ नहीं। महामूर्खों की एक पूरी फ़ौज खड़ी है दुनिया के हर धर्म में, जो स्वयं भी अन्धे हैं और लोगों को लगातार मूर्ख बनाये जा रहे हैं। सब अपने-अपने तथाकथित धर्म को बचाने के लिए लोगों को आतंकवादी बनाने पर तुले हैं। और कह रहे हैं कि आप अगर अपने धर्म के लिए मर जाओगे या मार दोगे, तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा।

ये कैसी बेहूदा बातें हैं? भला किसी को मारकर कोई स्वर्ग कैसे पा सकता है? उसका पूरा जीवन ही बेचैनी में बीतेगा। जब बर्बाद हो जाएगा, तो उसे बाद में स्वर्ग कैसे मिलेगा? क्या ईश्वर इतनी अन्यायी हो सकता है कि अपने ही बच्चों को आपस में लड़वाकर, कटवाकर, मरवाकर उनमें से कुछ को स्वर्ग दे दे और कुछ को नरक? अगर ऐसा है, तो फिर ईश्वर न्यायप्रिय कैसे हुआ? फिर वह सबका पिता भी कैसे हुआ? फिर वह ईश्वर भी कैसे हुआ? वह भाग्यों का निर्णय कैसे लेगा? ईश्वर कोई तुम्हारा अन्यायी नेता तो नहीं, जो सत्ता पाने के बाद स्वयं ही न्यायाधीश बन बैठा है, और जो उसके लिए समाज में मारकाट मचाते हैं, निहत्थों और लाचारों पर अन्याय करते हैं, उन्हें बड़े-बड़े पद देता है; भले ही वे कितने भी $गलत क्यों न हों? ईश्वर आख़िर ईश्वर है। उसके लिए सब बराबर हैं। क्या मनुष्य और क्या दूसरे जीव-जन्तु। और यह बात सब जानते हैं। फिर भी इसके उलट सब मूर्खों की तरह नफ़रत की बातों स्वीकार करके तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के इशारे पर न जाने कौन-कौन से अपराध करने पर आमादा हैं। वैमनस्य को धारण किये बैठे हैं और आपस में लगातार बँटते जा रहे हैं।

वैमनस्य तो अपराध को जन्म देता है। और अपराध नरक के द्वार खोलता है। मरने के बाद ही नहीं, जीते-जीते भी। अपराध ही क्यों? जितने अवगुण हैं, सब नरक के द्वार ही तो खोलते हैं। स्वर्ग का द्वार तो प्यार, सेवा, सत्य और ईमानदारी से खुलते हैं। और यही सब धर्म के शस्त्र हैं, इन्हीं शस्त्रों की वजह से इन्हें संजोने वाली किताबों को शास्त्र कहा गया है। वैमनस्य से समाज में कोई सुखी नहीं रह सकता। केवल वही नहीं, जो वैमनस्य मन में पालकर दूसरों से नफ़रत रहा है। नित्य नये अपराध कर रहा है, बल्कि उसकी आने वाली पीढिय़ाँ भी नरक में ही जीएँगी। सबका जीना हराम होगा। समाज में सुख नहीं रहेगा। जीने में रस नहीं रहेगा। जब समाज में ही सुख नहीं रहेगा। जीने में रस नहीं रहेगा। हर तरफ़ केवल भय ही भय व्याप्त होगा, तो फिर स्वर्ग की कल्पना भी मिथ्या होगी।

आजकल के सभी तथाकथित धर्माचार्य अपने पीछे चलने वालों को इसी तरह के नरक में धकेले जा रहे हैं। धर्मों के नाम पर आज हर तरफ़ यही हो रहा है। धर्मों के ये तथाकथित ठेकेदार किसी कीटभक्षी सुन्दर पौधे की तरह हर समय नक़ली सुगन्ध बिखरते हुए लोगों को मूर्ख बना रहे हैं। जैसे ही कोई इनके चंगुल में आता है, उसका पतन तय हो जाता है। उसे स्वर्ग का सपना दिखाकर उसे नरक में धकेल दिया जाता है। और सभी धर्मों के अनजान लोग आँखों पर धर्म की पट्टी बाँधकर अपने धर्मों के ठेकेदारों के इशारों पर उस नरक को ही स्वर्ग समझकर गिरने को तैयार हो जाते हैं। कोई भी स्वयं किसी धर्म ग्रन्थ को नहीं पढ़ता। सब अपने-अपने तथाकथित ठेकेदारों से धर्म सीखने की नाहक चेष्टा करते हैं। इसलिए इन नफ़रतों के पुलिंदों को उतार फेंको। प्यार करना सीखो। स्वर्ग यहीं बन जाएगा।  

बारामूला में एनकाउंटर के चौथे दिन सुरक्षाबलों ने 2 आतंकियों को किया ढेर

जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ का आज (शनिवार) चौथा दिन है। आज की मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने दो आतंकियों को मार गिराया है।

आतंकियों को मार गिराने के लिए ड्रोन का भी इस्तेमाल किया गया है। कश्मीर जोन पुलिस ने एनकाउंटर की जानकारी देते हुए कहा कि, “बारामूला जिले के उरी में आतंकवादियों की सेना और बारामूला पुलिस के साथ मुठभेड़ हुर्इ। इस एनकाउंटर में दो आतंकवादी मारे गए है।”

बता दें, अनंतनाग जिले के जंगलों में आतंकवादियों ने डेरा डाला हुआ था और इसी डेरे को काबू करने के लिए यह अभियान चलाया जा रहा है। आज इस अभियान का लगातार चौथा दिन है।

इस अभियान में ड्रोन से निगरानी की जा रही है। और पुलिस प्रमुख ने आश्वासन दिया है कि सभी आतंकवादियों को मार गिराया जाएगा।

एनआईटी सिलचर में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के एक छात्र ने की खुदकुशी, नाराज छात्र कर रहे है विरोध प्रदर्शन

असम के कछार जिले के सिलचर में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) के छात्रावास में एक छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। यह छात्र अरुणाचल प्रदेश का था।

इस घटना के बाद से ही एनआईटी सिलचर कैंपस में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। सूत्रों के अनुसार छात्रों द्वारा रजिस्ट्रार के आधिकारिक आवास पर घेराव किया गया है।

कॉलेज कैंपस में तनाव बढ़ने के बाद प्रदर्शनकारी छात्रों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा है।

पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर लिया है। शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।

सूत्रों के अनुसार पुलिस का कहना है कि स्थिति अब नियंत्रण में है लेकिन तनाव बना हुआ है। क्योंकि आज और अधिक छात्र आंदोलन कर सकते है।

बताया जा रहा है कि छात्र इलेक्ट्रिकल विभाग के तीसरे सेमेस्टर का छात्र था। और वह बैक क्लियर नहीं कर पा रहा था। छात्र ने अधिकारियों से अगले सेमेस्टर के लिए पंजीकरण करने की अनुमति देने का अनुरोध किया था, लेकिन कथित तौर पर उसके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया था।