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कांग्रेस को बड़ा झटका: मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन रद्द

मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव लड़ रही कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को बड़ा झटका लगा है। निर्वाचन अधिकारी ने उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया है। आरोप है कि उन्होंने अपने नामांकन हलफनामे में एक मामले से जुड़ी जानकारी का खुलासा नहीं किया था, जिसके चलते उनका पर्चा निरस्त कर दिया गया।

मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की ओर से राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में थीं और पार्टी ने उन्हें मध्य प्रदेश से अपना एकमात्र उम्मीदवार बनाया था। उनका नामांकन ऐसे समय में रद्द हुआ है जब राज्यसभा चुनाव को लेकर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां पहले से ही तेज थीं।

बताया जा रहा है कि भाजपा की ओर से नामांकन प्रक्रिया को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी, जिसके बाद निर्वाचन अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच की। जांच के दौरान हलफनामे में आवश्यक जानकारी नहीं दिए जाने की बात सामने आई और नियमों के तहत नामांकन रद्द कर दिया गया।

कांग्रेस ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। पार्टी नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए कहा कि कानूनी प्रावधानों की गलत व्याख्या कर उम्मीदवार को चुनावी मैदान से बाहर किया गया है। वहीं भाजपा का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार हुई है और इसका राजनीति से कोई संबंध नहीं है।

मध्य प्रदेश में राज्यसभा की सीटों को लेकर पहले ही मुकाबला दिलचस्प बना हुआ था। भाजपा द्वारा तीसरा उम्मीदवार उतारे जाने के बाद चुनावी समीकरण बदल गए थे और कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटी थी। अब मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने से राज्यसभा चुनाव की तस्वीर और बदलती नजर आ रही है।

H-1B वीजा नियमों पर झटका: कोर्ट ने खारिज की ट्रंप प्रशासन की 1 लाख डॉलर फीस

वॉशिंगटन: अमेरिका की एक संघीय अदालत ने H-1B वीजा धारकों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 1 लाख डॉलर के अतिरिक्त H-1B वीजा शुल्क को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति प्रशासन को कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह का कर (Tax) लगाने का अधिकार नहीं है।

मैसाचुसेट्स के बोस्टन स्थित अमेरिकी जिला न्यायालय के जज लियो सोरोकिन ने अपने फैसले में कहा कि यह शुल्क वास्तव में एक कर के समान है और इसे लागू करने के लिए कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति आवश्यक थी। अदालत ने माना कि प्रशासन ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर यह फैसला लिया था।

यह शुल्क पिछले वर्ष ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किया गया था। सरकार का तर्क था कि इससे अमेरिकी नौकरियों की रक्षा होगी और कंपनियां सस्ते विदेशी श्रमिकों की बजाय स्थानीय कर्मचारियों को प्राथमिकता देंगी। हालांकि कई राज्यों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और उद्योग संगठनों ने इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे डॉक्टरों, शिक्षकों और तकनीकी विशेषज्ञों की भर्ती प्रभावित हो रही है।

इस बीच, अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार H-1B वीजा पंजीकरण में इस वर्ष 38.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2026 में जहां 3.43 लाख से अधिक आवेदन आए थे, वहीं 2027 के लिए यह संख्या घटकर करीब 2.11 लाख रह गई। प्रशासन ने इसका श्रेय कड़े नियमों और उच्च वेतन वाले आवेदकों को प्राथमिकता देने वाली नई नीति को दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस फैसले से भारतीय आईटी पेशेवरों, अमेरिकी कंपनियों और उच्च शिक्षण संस्थानों को राहत मिलेगी। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि वह इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दे सकता है।

मप्र राज्यसभा चुनाव: खरीद-फरोख्त के आरोप के बाद कांग्रेस ने विधायकों को कर्नाटक भेजा, ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ शुरू

मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर “क्रॉस-वोटिंग” और विधायकों की “खरीद-फरोख्त” (पोचिंग) की कोशिश का आरोप लगाते हुए अपने विधायकों को कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक भेजने का फैसला किया है।

यह कदम सोमवार देर रात नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के आवास पर हुई कांग्रेस विधायक दल (CLP) की एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद उठाया गया।

बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सत्तारूढ़ दल पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि भाजपा विपक्ष के विधायकों को तोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रही है।

सिंघार ने दावा किया, “हमारे कुछ विधायकों ने मुझे बताया कि भाजपा के लोगों ने ‘नोटों से भरे बैग’ के साथ उनसे संपर्क किया था, लेकिन हमारे विधायकों ने उन्हें दुत्कार दिया।” उन्होंने भरोसा जताया कि भाजपा की यह “साजिश” मतदान के दिन पूरी तरह नाकाम हो जाएगी।

कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह और बाबू जंडेल ने भी विधायकों को बाहर भेजे जाने की पुष्टि की। वहीं, सौंसर से विधायक विजय रेवनाथ चौरे ने बताया कि सभी विधायकों को विशेष रूप से बेंगलुरु (कर्नाटक) ले जाया जा रहा है। यादवेंद्र सिंह ने स्वीकार किया कि कुछ विधायक शुरू में राज्य से बाहर जाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व (हाईकमान) का फैसला होने के कारण सभी इसके लिए तैयार हो गए।

मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन खाली सीटों के लिए यह पूरी रस्साकशी चल रही है। 230 सदस्यीय राज्य विधानसभा के नियमों के मुताबिक, किसी भी उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचने के लिए 58 प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता होती है।

वर्तमान में विधानसभा की प्रभावी ताकत 229 है, जिसके हिसाब से शुरुआती गणित बेहद सीधा था:

  • भाजपा (164 विधायक): अपने 116 वोटों के दम पर दो सीटें आसानी से जीत रही है। पार्टी ने अपने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और प्रदेश सचिव रजनीश अग्रवाल को मैदान में उतारा है।
  • कांग्रेस (64 विधायक): संख्या बल के हिसाब से तीसरी सीट जीतने के लिए मजबूत स्थिति में है। पार्टी ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार बनाया है।

हालांकि, भाजपा द्वारा मध्य प्रदेश मछुआरा कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को तीसरे उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारने के बाद इस मुकाबले में नया ट्विस्ट आ गया है।

भले ही कागजों पर कांग्रेस के पास मीनाक्षी नटराजन की जीत के लिए पर्याप्त संख्या बल दिख रहा हो, लेकिन कानूनी मामलों और आंतरिक टूट के कारण उसकी राह उतनी आसान नहीं है: दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता पहले ही रद्द हो चुकी है। इसके अलावा, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने श्योपुर के विजयपुर से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा के मतदान करने पर रोक लगा दी है। सागर जिले के बीना से विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता समाप्त करने की याचिका भी हाईकोर्ट में लंबित है। सप्रे ने सोमवार को मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात की थी, जिससे साफ है कि वह भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग कर सकती हैं।

इन झटकों के बाद कांग्रेस का प्रभावी संख्या बल 64 से घटकर 62 रह सकता है। हालांकि, यह अभी भी जीत के लिए जरूरी 58 वोटों से 4 अधिक है, लेकिन पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। दूसरी ओर, अपने दो मुख्य उम्मीदवारों को जिताने के बाद भाजपा के पास 48 अतिरिक्त वोट बचेंगे, यानी महेश केवट को जिताने के लिए उसे विपक्ष से 10 और वोटों की जुगाड़ करनी होगी।

बता दें कि सोमवार रात हुई इस आपात बैठक में करीब 60 कांग्रेस विधायक व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए थे। एक विधायक दिल्ली में होने के कारण शामिल नहीं हो सके, जबकि वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वर्चुअली हिस्सा लिया।

खान सर को बड़ी राहत: पटना कोर्ट ने फिलहाल गिरफ्तारी पर लगाई रोक

पटना: चर्चित शिक्षक फैसल खान उर्फ ‘खान सर’ को कोचिंग सेंटर फायरिंग और तोड़फोड़ मामले में बड़ी राहत मिली है। पटना की एक अदालत ने उन्हें अंतरिम संरक्षण प्रदान करते हुए फिलहाल किसी भी तरह की कठोर पुलिस कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अदालत के इस फैसले से खान सर को तत्काल गिरफ्तारी के खतरे से राहत मिली है।

यह मामला 2 जून को पटना के कदमकुआं स्थित खान ग्लोबल स्टडीज संस्थान के बाहर हुई हिंसा, तोड़फोड़ और कथित फायरिंग से जुड़ा है। घटना के बाद वायरल हुए एक वीडियो में संस्थान के सुरक्षा गार्डों को कथित रूप से हवाई फायरिंग करते हुए देखा गया था। इसके बाद पुलिस ने दो गार्डों को हिरासत में लिया और जांच का दायरा बढ़ाया।

जांच के दौरान खान सर का नाम भी एफआईआर में शामिल किया गया, जिसके बाद उन्होंने गिरफ्तारी से बचाव के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनके वकील अरविंद कुमार महुअर ने अदालत में दलील दी कि खान सर को एक साजिश के तहत मामले में फंसाया गया है और उनका इस कथित फायरिंग से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने फैसल खान को अंतरिम संरक्षण देते हुए पुलिस को उनके खिलाफ फिलहाल कोई कठोर कदम न उठाने का निर्देश दिया। हालांकि मामले की जांच जारी रहेगी और अदालत में अगली सुनवाई के दौरान आगे की कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।

इस बीच, पटना में कोचिंग संस्थानों के बीच प्रतिद्वंद्विता को लेकर भी बहस तेज हो गई है। पुलिस पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है और अधिकारियों का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल अदालत के आदेश ने खान सर को बड़ी कानूनी राहत प्रदान की है।

20 टीएमसी बागी लोकसभा सांसद एनडीए में शामिल होने की तैयारी में

तृणमूल कांग्रेस को एक बड़े आंतरिक संकट का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में उसके 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत कर दी है।

बागी गुट ने कथित तौर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को आधिकारिक तौर पर पत्र लिखकर अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाली संसदीय पार्टी से संबंध तोड़ने और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल होने की घोषणा की है।

यह बड़ा संगठनात्मक फेरबदल ऐसे समय में हुआ है जब वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेन्दु शेखर रॉय ने उच्च सदन (राज्यसभा) और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया है, जो पार्टी के भीतर एक व्यापक बिखराव का संकेत देता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि निचले सदन (लोकसभा) के 28 में से 20 सदस्यों का यह बागी गुट दल-बदल विरोधी कानून के दायरे से सुरक्षित है, जिससे वे अपनी सदस्यता गंवाए बिना एक अलग विधायी गुट बना सकते हैं।

बर्धमान पूर्व से सांसद शर्मिला सरकार ने कहा, “हमने भूपेंद्र यादव के आवास पर एक बैठक की… हमें बंगाल के विकास के लिए एनडीए का समर्थन करने की आवश्यकता है। मैं दीदी का सम्मान करती हूँ। मैं काम करना चाहती थी, लेकिन नहीं कर सकी। काकोली दी के नेतृत्व में यह अलग गुट बनाया गया है।”

बताया जा रहा है कि इस नाटकीय विभाजन को केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव के दिल्ली आवास पर हुई एक हाई-प्रोफाइल बैठक के दौरान अंतिम रूप दिया गया, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी और बागी सांसद शामिल थे।

काकोली घोष दस्तिदार, जो अभी भी लोकसभा में पार्टी की मुख्य सचेतक (Chief Whip) होने का दावा करती हैं, ने इस बात पर जोर दिया कि यह निर्णय हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की करारी हार के बाद मिले जनमत के अनुरूप है।

संकट को और बढ़ाते हुए, राज्यसभा से सुखेन्दु शेखर रॉय का इस्तीफा सोमवार सुबह स्वीकार कर लिया गया। रॉय ने अपने विदाई बयान में पार्टी की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला:

“हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में, जनता ने व्यापक और अनियंत्रित भ्रष्टाचार से उत्पन्न 15 वर्षों के अराजक शासन को समाप्त करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में एक बड़ा जनादेश दिया है।” उन्होंने नवनिर्वाचित राज्य सरकार का समर्थन करते हुए यह बात कही।

बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने भी इसी भावना को दोहराते हुए कहा कि रॉय का जाना एक बड़े असंतोष की शुरुआत है। उन्होंने पार्टी के भीतर योग्यता के मूल्यांकन पर भी कड़ा प्रहार किया:

“मैं 15 महीनों तक संसद में आखिरी बेंच पर बैठा और देखा कि जूनियर नेताओं और आरटीआई कार्यकर्ताओं को आगे की सीटें दी जा रही थीं। संसदीय प्रदर्शन कभी भी मूल्यांकन का पैमाना नहीं था। मुझे सुखेन्दु दा के लिए बहुत बुरा लगा, जिन्हें भी आखिरी बेंच आवंटित की गई थी।”

यह बदलाव नई दिल्ली में सत्ता के संतुलन को पूरी तरह से बदल देता है। लोकसभा में तीसरे सबसे बड़े विपक्षी दल के बड़े हिस्से को अपने साथ मिलाकर, भाजपा ने संसद में अपनी स्थिति को और मजबूत कर लिया है। इससे एक तरफ जहां विपक्ष की रफ्तार धीमी हुई है, वहीं दूसरी तरफ टीएमसी का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया है। बागी नेताओं ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में और भी असंतुष्ट सांसद पार्टी छोड़ सकते हैं।

ममता बनर्जी को बड़ा झटका, सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा और TMC से दिया इस्तीफा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी के साथ-साथ अपनी राज्यसभा सदस्यता से भी इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। इस कदम को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

रॉय का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब TMC पहले से ही अंदरूनी असंतोष और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है। हाल के दिनों में पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए हैं और कई नेताओं द्वारा नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

सुखेंदु शेखर रॉय पिछले कुछ दिनों से पार्टी की स्थिति को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता जता रहे थे। उन्होंने संकेत दिया था कि विधानसभा में देखने को मिला असंतोष संसद तक भी पहुंच सकता है। उनके बयानों ने पहले ही राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रॉय का इस्तीफा TMC के लिए केवल एक संसदीय नुकसान नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष का संकेत भी है। विपक्षी दल इस घटनाक्रम को ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

इस बीच, पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को संभालने के प्रयास जारी हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह इस्तीफा केवल एक अलग घटना साबित होता है या फिर TMC में बड़े राजनीतिक बदलावों की शुरुआत बनता है।

जयपुर में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से पहले इंटरनेट सेवा बंद, प्रशासन अलर्ट

राजस्थान की राजधानी जयपुर में प्रस्तावित अतिक्रमण हटाने की बड़ी कार्रवाई से पहले जिला प्रशासन ने एहतियाती कदम उठाते हुए मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अफवाहों के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से लिया गया है।

प्रशासन द्वारा जारी आदेश के अनुसार, मोबाइल इंटरनेट, बल्क एसएमएस और कुछ इंटरनेट आधारित संचार सेवाओं पर निर्धारित अवधि तक रोक रहेगी। हालांकि, वॉयस कॉल और आवश्यक सेवाएं सामान्य रूप से संचालित होती रहेंगी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह कदम पूरी तरह एहतियात के तौर पर उठाया गया है।

बताया जा रहा है कि जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) की ओर से 8 जून को बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई प्रस्तावित है। प्रशासन को आशंका है कि इस दौरान सोशल मीडिया के जरिए भ्रामक सूचनाएं फैल सकती हैं, जिससे शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रोक लगाने का निर्णय लिया गया।

प्रशासन ने नागरिकों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करने की अपील की है। साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

अधिकारियों का कहना है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पूरी होने और स्थिति सामान्य रहने के बाद इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी जाएंगी। फिलहाल पूरे मामले को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क है और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है।

आतंकियों की तलाश में शहीद हुए लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी, खाई में गिरने से मौत

श्रीनगर/नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले में चल रहे आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान भारतीय सेना के युवा अधिकारी लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी का निधन हो गया। अधिकारियों के अनुसार, वह ऑपरेशन शेरावली के तहत तलाशी अभियान का नेतृत्व कर रहे थे, तभी पहाड़ी क्षेत्र में एक संकरी धार पर संतुलन बिगड़ने से गहरी खाई में गिर गए।

बताया गया है कि यह घटना शनिवार शाम को राजौरी के दुर्गम वन क्षेत्र में हुई, जहां सुरक्षा बल पिछले कई दिनों से आतंकियों की तलाश में व्यापक अभियान चला रहे हैं। ऑपरेशन शेरावली अपने 16वें दिन में प्रवेश कर चुका था और सेना की टुकड़ियां लगातार जंगलों तथा पहाड़ी इलाकों में सर्च ऑपरेशन चला रही थीं।

सेना के अधिकारियों के अनुसार, लेफ्टिनेंट गोस्वामी अपनी टीम के साथ आगे बढ़ रहे थे, तभी उनका पैर फिसल गया और वे गहरी खाई में जा गिरे। साथी जवानों ने तुरंत बचाव अभियान शुरू किया और उन्हें बाहर निकालने का प्रयास किया, लेकिन गंभीर चोटों के कारण उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।

भारतीय सेना की व्हाइट नाइट कोर ने युवा अधिकारी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। सेना ने कहा कि लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी ने कर्तव्य पालन के दौरान सर्वोच्च बलिदान दिया और उनका साहस तथा समर्पण हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।

इस घटना ने पूरे सैन्य समुदाय को झकझोर दिया है। राजौरी और पुंछ के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में चल रहे आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान जवानों को न केवल आतंकियों का सामना करना पड़ता है, बल्कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियां भी लगातार चुनौती बनी रहती हैं।

बांग्लादेश को हराकर भारत ने जीता SAFF महिला फुटबॉल खिताब, पीएम मोदी ने सराहा

भारतीय महिला फुटबॉल टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए SAFF महिला चैंपियनशिप 2026 का खिताब अपने नाम कर लिया है। फाइनल मुकाबले में भारत ने मौजूदा चैंपियन बांग्लादेश को 3-1 से हराकर रिकॉर्ड छठी बार यह प्रतिष्ठित ट्रॉफी जीती। यह मुकाबला गोवा के मडगांव में खेला गया।

टीम इंडिया की इस ऐतिहासिक जीत पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने खिलाड़ियों को बधाई दी। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय टीम ने पूरे टूर्नामेंट में शानदार खेल दिखाया और यह जीत देश के युवाओं को फुटबॉल की ओर प्रेरित करेगी।

राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने भी टीम की उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि खिलाड़ियों ने पूरे टूर्नामेंट में असाधारण कौशल, दृढ़ संकल्प और टीम भावना का परिचय दिया। वहीं उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan ने इसे भारतीय महिला फुटबॉल के लिए गर्व का क्षण बताया।

इस जीत के साथ भारत ने SAFF महिला चैंपियनशिप में अपना दबदबा एक बार फिर साबित किया है। भारतीय खिलाड़ियों के बेहतरीन प्रदर्शन ने न केवल देश को गौरवान्वित किया है, बल्कि महिला फुटबॉल को भी नई पहचान दिलाई है।

खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यह सफलता आने वाले वर्षों में देश में महिला फुटबॉल के विकास को नई गति दे सकती है और अधिक युवा खिलाड़ियों को इस खेल से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगी।

टीएमसी विधायक मदन मित्रा की कार पर हमला; 10 दिनों में पार्टी नेताओं पर तीसरा हमला

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक मदन मित्रा शनिवार देर रात उत्तर 24 परगना जिले की कमरहटी नगरपालिका के वार्ड 14 में एक उग्र भीड़ के हमले में बाल-बाल बच गए। भीड़ ने उनके वाहन को घेर लिया, उसमें तोड़फोड़ की और अंडे फेंके। पश्चिम बंगाल में बढ़ते राजनीतिक तनाव और सार्वजनिक असंतोष को रेखांकित करते हुए, पिछले महज 10 दिनों के भीतर किसी हाई-प्रोफाइल टीएमसी नेता पर यह तीसरा लक्षित हमला है।

यह हिंसा शनिवार देर रात उस समय भड़की जब मित्रा, वार्ड 14 के पार्षद अरिंदम बिस्वास के आवास के बाहर चल रहे उग्र प्रदर्शन को शांत करने के लिए आरियादहा इलाके में पहुंचे थे। स्थानीय ऑटो-रिक्शा और ई-रिक्शा चालक वहां “कट मनी” (अवैध कमीशन और जबरन वसूली) के पैसे वापस करने की मांग को लेकर जमा हुए थे, जो कथित तौर पर स्थानीय नेताओं द्वारा सालों से वसूले जा रहे थे।

जैसे ही कमरहटी विधायक ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, उत्तेजित भीड़ का गुस्सा उनकी तरफ मुड़ गया। मित्रा के अनुसार, लोहे की छड़ों, लाठियों, धारदार हथियारों और आग्नेयास्त्रों से लैस 100 से 150 लोगों की भीड़ ने उनके वाहन को घेर लिया, चोर, चोर” के नारे लगाए और कार पर अंडे फेंके।

हालांकि शुरुआती खबरों में कहा गया था कि मित्रा ने हमले के वक्त कार में न होने का दावा किया था, लेकिन बाद में विधायक ने फेसबुक लाइव पर आकर इस भयानक एक घंटे के संकट को बयां करते हुए कहा:

“मैंने अपनी आँखों के सामने मौत देखी। मुझे शर्म आती है कि लोग कह रहे हैं कि मुझ पर सिर्फ अंडों से हमला किया गया था, जबकि बीजेपी के नारे और जय श्री राम चिल्लाने वाले असामाजिक तत्वों के पास रिवॉल्वर, लोहे की रॉड और हर तरह के धारदार हथियार थे। वे मुझे जान से मारने के लिए चिल्ला रहे थे।”

मित्रा ने आरोप लगाया कि हमलावरों ने उनके ड्राइवर को कार से बाहर खींचकर पीटा और वाहन की खिड़कियाँ तोड़ दीं। विधायक ने अपनी जान बचाने का श्रेय स्थानीय महिलाओं के एक समूह और पार्षद बिस्वास को दिया, जिन्होंने उन्हें बचाया और भीड़ से छिपाने के लिए एक अंधेरे कमरे में रखा। तोड़फोड़ और अंडे फेंकने का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है।

मित्रा ने इस हमले के लिए भाजपा समर्थित गुंडों को जिम्मेदार ठहराया और पुलिस महानिदेशक (DGP) तथा बैरकपुर के पुलिस कमिश्नर से तुरंत कार्रवाई करने की मांग की। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी है।

हिंसा का पैटर्न: 10 दिनों में तीन हमले

मित्रा पर हुआ यह हमला टीएमसी के वरिष्ठ नेतृत्व को निशाना बनाकर किए गए लगातार हमलों की कड़ी में नया है:

  • 30 मई – अभिषेक बनर्जी पर हमला: दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में, चुनाव बाद हुई हिंसा से प्रभावित परिवारों से मिलने जा रहे टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के काफिले को निशाना बनाया गया। प्रदर्शनकारियों ने ईंटें, पत्थर और अंडे फेंके, जिससे भारी झड़पें हुईं और कई लोग घायल हो गए। इसके बाद कई गिरफ्तारियां की गईं।
  • 31 मई – कल्याण बनर्जी पर हमला: हुगली जिले में एक पुलिस स्टेशन के बाहर विरोध प्रदर्शन के दौरान इस वरिष्ठ नेता पर पत्थरों से हमला किया गया था। बनर्जी के सिर पर चोट आई और खून बहने लगा, जिसके बाद वे पट्टी बांधकर धरने पर बैठ गए।
  • 3-4 जून – अदालत परिसर में आक्रोश: जनता का गुस्सा अदालतों तक भी पहुंच गया। गिरफ्तार टीएमसी नेता जय प्रकाश मजूमदार और पूर्व मंत्री स्वरूप बिस्वास की अदालत में पेशी के दौरान आक्रामक भीड़ जमा हो गई, जिन्होंने जवाबदेही की मांग करते हुए नारे लगाए और नेताओं पर अंडे फेंके।

मित्रा से जुड़ी इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा सांसद राजू बिस्टा ने कहा कि हालांकि भाजपा हिंसा का समर्थन नहीं करती है, लेकिन जनता का यह गुस्सा सीधे तौर पर व्यवस्थागत भ्रष्टाचार का नतीजा है:

“जनता ने टीएमसी को इसलिए हराया क्योंकि वे इस तरह की हिंसा के खिलाफ थे। 15 वर्षों तक, टीएमसी ने लोगों को अपमानित किया और उनका पैसा लूटा। स्वाभाविक रूप से, पश्चिम बंगाल की जनता गुस्से में है। हालांकि, हिंसा सही रास्ता नहीं है—जनता को कार्रवाई के लिए पुलिस स्टेशनों में औपचारिक शिकायतें दर्ज करानी चाहिए।”

टीएमसी को तीन स्तरों पर विद्रोह का सामना

हमलों का यह सिलसिला सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर चल रहे गंभीर आंतरिक संकट के साथ मेल खाता है, जो हाल ही में आए चुनाव परिणामों के बाद से तीन अलग-अलग स्तरों पर बगावत झेल रही है:

  • विधायक (MLA) स्तर पर: निष्कासित नेता रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों के एक गुट ने अलग रुख अपना लिया है, और पार्टी की विधायी ताकत के दो-तिहाई हिस्से के समर्थन का दावा किया है।
  • सांसद (MP) स्तर पर: मीडिया रिपोर्ट्स से संकेत मिलते हैं कि तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 सांसद वर्तमान में पार्टी छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। विशेष रूप से, अल्पसंख्यक सेल के सचिव अजमल सिद्दीकी पहले ही अपना इस्तीफा सौंप चुके हैं।
  • स्थानीय निकाय स्तर पर: टीएमसी के प्रमुख गढ़ डायमंड हार्बर में, नौ पार्षदों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया, जिससे स्थानीय नगरपालिका को भंग करना पड़ा है।