ममता सिंह, नई दिल्ली/देहरादून: वर्ष 2026 की चारधाम यात्रा देवभूमि उत्तराखंड के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ‘डिजिटल इंडिया’ के चरमोत्कर्ष की एक वैश्विक नुमाइश बनने जा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का ‘प्रोएक्टिव’ दृष्टिकोण इस बार हिमालय की दुर्गम वादियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सी-प्लेन जैसी आधुनिक सुविधाओं के अभेद्य सुरक्षा चक्र से लैस कर रहा है। लेकिन सवाल वही है: क्या तकनीक का यह भारी-भरकम ढांचा प्रकृति के प्रचंड वेग और धरातल की कड़वी सच्चाइयों का सामना कर पाएगा?
उधर, प्रशासन का दावा है कि इस बार यात्रा का स्वरूप ‘रिएक्टिव’ से बदलकर ‘स्मार्ट’ हो गया है।केदारनाथ और बद्रीनाथ की ‘Carrying Capacity’ (वहन क्षमता) का इसरो के उपग्रहों के माध्यम से वैज्ञानिक निर्धारण करना एक साहसिक कदम है। ‘डायनामिक रजिस्ट्रेशन’ और ऋषिकेश से लेकर ऊपर तक बनाए गए पांच ‘होल्डिंग पॉइंट्स’ इस बात की गारंटी देते हैं कि अब पहाड़ों पर अनियंत्रित भीड़ का बोझ नहीं बढ़ेगा। हवाई अड्डों की तर्ज पर ट्रैफिक का स्वतः रुक जाना और ‘आभा’ डिजिटल हेल्थ अकाउंट के जरिए यात्रियों की मेडिकल हिस्ट्री ट्रैक करना स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव है। एम्स ऋषिकेश से सीधे जुड़े स्मार्ट हेल्थ एटीएम उन बुजुर्ग तीर्थयात्रियों के लिए संजीवनी हैं, जो अक्सर ऑक्सीजन की कमी और हृदय गति रुकने जैसी चुनौतियों से जूझते रहे हैं।
हालांकि, सरकारी दावों की चमक के पीछे विपक्ष की तीखी आलोचना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विपक्षी नेताओं का सीधा तर्क है कि जब तक सड़कों की हालत और भूस्खलन वाले ‘ब्लैक स्पॉट्स’ का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक सी-प्लेन और ड्रोन केवल ‘महंगे खिलौने’ नजर आएंगे। विपक्ष का आरोप है कि सरकार यात्रा का ‘कॉरपोरेटाइजेशन’ कर रही है, जिससे साधारण ग्रामीण श्रद्धालु खुद को इस हाई-टेक व्यवस्था से कटा हुआ महसूस कर रहा है। क्या एक स्मार्टफोन न चलाने वाला बुजुर्ग इस डिजिटल जाल में उलझकर नहीं रह जाएगा? क्या सी-प्लेन जैसी सेवाएं केवल ‘प्रीमियम क्लास’ के लिए हैं? ये ऐसे प्रश्न हैं जो सरकार की ‘अतिथि देवो भव:’ की समावेशी भावना पर सवाल खड़े करते हैं।
तकनीकी मोर्चे पर, ‘Early Warning System’ का 72 घंटे पहले आपदा की सूचना देना निसंदेह एक उपलब्धि है, लेकिन 2013 की त्रासदी और हाल के वर्षों के भूस्खलन हमें आगाह करते हैं कि हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र मशीनों के शोर के प्रति बेहद संवेदनशील है। ड्रोन की गूँज और बढ़ता डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कहीं शांत वादियों की जैव-विविधता को अपूरणीय क्षति तो नहीं पहुँचा रहा? साथ ही, साइबर ठगी और फर्जी वेबसाइटों के जरिए भोले-भले श्रद्धालुओं को लूटने वाले गिरोहों पर नकेल कसना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
बहरहाल, 2026 की चारधाम यात्रा आस्था और आधुनिक विज्ञान के बीच एक नाजुक संतुलन का परीक्षण है। यदि धामी सरकार तकनीक के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं और स्थानीय व्यापारियों के हितों को साधने में सफल रहती है, तो यह विश्व के लिए एक मिसाल होगी। अन्यथा, बिना जमीनी सुधार के केवल डिजिटल लेप लगाने से हिमालय की चुनौतियों को मात देना असंभव है। सफलता केवल ‘स्मार्ट’ आंकड़ों में नहीं, बल्कि हर श्रद्धालु की सुरक्षित घर वापसी में छिपी है।




