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जी20 : भारत ने विश्व को दिखायी चुनौतियों की तस्वीर

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

जी20 की मेज़बानी करना भारत के लिए गर्व की बात है। क्योंकि जी20 के देशों का पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था में 85 प्रतिशत का योगदान है। विश्व की 75 प्रतिशत व्यापार इन देशों के बीच होता है और दो-तिहाई से भी ज़्यादा जनसंख्या इन देशों में निवास करती है। इसलिए जी20 शिखर सम्मेलन भारत ही नहीं, विश्व के लिए अहम है; क्योंकि इसके ज़रिये देश दुनिया में पड़ रहे ख़राब और ख़तरनाक प्रभाव को एक आम सहमति के ज़रिये रोका जा सकता है। इसके लिए भारत ही नहीं, जी20 के सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। वैसे तो जी20 का मुख्य उद्देश्य वैश्विक वित्तीय स्थिरता के ऊपर मिलकर काम करना है; लेकिन बढ़ते वैश्विक चुनौतियों को लेकर अब अन्य मुद्दों को भी अब इसमें शामिल किया गया है। इसलिए अब जलवायु परिवर्तन को क़ाबू करना, वर्तमान माँगों और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सस्टेनेबल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने जैसे विषयों को शामिल किया गया है।

हालाँकि अन्य कई महत्त्वपूर्ण विषयों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए; लेकिन इसके पीछे 20 अलग-अलग देशों की विदेश नीति और सबका अपना-अपना एजेंडा है। यही कारण है कि सभी मुद्दों पर आम सहमति बन पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए कई बार कई देश महज़ खानापूर्ति करते हैं, तो कई बार वो जी20 की बैठक में शामिल नहीं होते; क्योंकि इसके लिए कोई बाध्यता नहीं है। यह किसी भी देश की कूटनीतिक चाल या उसके इच्छा पर निर्भर करता है कि चाहे तो वह बैठक में शामिल हो या उसका बहिष्कार कर सकता है। यही कारण है कि कुछ महीने पहले जब कश्मीर में जी20 की पर्यटन बैठक हुई, तो उसमें चीन और सऊदी अरब शामिल नहीं हुए।

ऐसा ही एक मामला सन् 2016 के जी20 शिखर सम्मेलन दौरान आया था, जब प्रसिद्ध पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते पर उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हस्ताक्षर नहीं किये; क्योंकि जी20 में किसी भी देश को किसी मुद्दे पर सहमति के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालाँकि बाद में जो बाइडेन ने इस पर हस्ताक्षर किये।

भारत में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन में चीन ने अपने प्रधानमंत्री को भेजकर सम्मेलन में महज़ खानापूर्ति की। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के न आने के पीछे कई कारण हैं। इसे हम कूटनीतिक चाल या चीन का तानाशाही रवैया कह सकते हैं। या कहें कि भारत की मेज़बानी चीन को रास नहीं आयी और ईष्र्या या द्वेष वश जिनपिंग ने ऐसा किया। वहीं रूस के शामिल नहीं होने का सबसे बड़ा कारण विभिन्न देशों का दबाव व पुतिन के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा जारी गिरफ़्तारी वारंट है। पुतिन अपनी तमाम चिन्ताओं की वजह से जी20 में शामिल नहीं हुए। वहीं सऊदी अरब के प्रमुख भी शामिल नहीं हुए।

कुल मिलाकर चीन, रूस और सऊदी अरब ने जी20 में कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी। इस प्रकार देखें, तो दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन में इन तीनों देशों के प्रमुखों को छोडक़र सारे देशों के प्रमुख शामिल हुए। हालाँकि जी20 की अध्यक्षता कर रहे भारत की मेज़बानी में सभी सदस्य देशों के अलावा नौ देशों के राष्ट्र प्रमुख जैसे बांग्लादेश, मिस्र, मॉरीशस, नीदरलैंड्स, नाइजीरिया, ओमान, सिंगापुर, स्पेन और संयुक्त अरब अमीरात भी भारत की तरफ़ से आमंत्रित देश के रूप में शामिल हुए। लेकिन जी20 में केंद्र सरकार की तरफ़ से विपक्ष के कई नेताओं को आमंत्रित नहीं किया गया, जिसको लेकर विपक्ष हमलावर दिखा। पक्ष-विपक्ष में इंडिया बनाम भारत को लेकर राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है। ऐसे में एक दूसरे के बीच मनमुटाव होना स्वाभाविक है। कांग्रेस के एक नेता विजय नामदेवराव वडेट्टीवार ने इसे केंद्र की मोदी सरकार को तानाशाही बताया। उन्होंने कहा कि यह सरकार संविधान विरोधी है। ये संविधान के तहत काम नहीं कर सकते। यही कारण है कि विपक्ष को आमंत्रित नहीं किया गया। सही मायने में तो विपक्ष को भी आमंत्रित करके उनका सम्मान किया जाना चाहिए था। यह भारत के लोकतंत्र का हिस्सा है।

जी20 की अध्यक्षता बदलती रहती है। यह नंबर के हिसाब से किसी-न-किसी देश को मिलती रहती है। यह हर साल कहीं-न-कहीं आयोजित होती रहती है। इसका आयोजन करना जी20 देशों का दायित्व है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। वहीं डिनर में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े को शामिल नहीं करने पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और पी. चिदंबरम ने मोदी सरकार पर हमला बोला और उनके इस कृत्य की निंदा की। चिदंबरम ने कहा कि मैं कल्पना नहीं कर सकता कि किसी दूसरे लोकतांत्रिक देश की सरकार विश्व नेताओं के लिए राजकीय रात्रिभोज में विपक्ष के नेता को आमंत्रित नहीं करेगी। चिदंबरम ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि अभी इंडिया यानी भारत उस स्थिति में नहीं पहुँचा है, जहाँ लोकतंत्र और विपक्ष का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा। वहीं शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि अगर लोकतंत्र में विपक्ष के नेता को स्थान नहीं है, तो यह तानाशाही है।

अगर जी20 के आयोजन की सफलता को लेकर बात की जाए, तो हम कह सकते हैं कि भारत इसमें का$फी हद तक सफल रहा है। सफलता इस बात को लेकर नहीं है कि आयोजन भव्य था। पूरा इंतज़ाम सकुशल बीत गया। कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटी, बल्कि सफलता इस बात की है कि नयी दिल्ली घोषणा-पत्र पर जी20 के देशों ने सहमति जतायी और इस पर साथ मिलकर देश दुनिया में उभरी विभिन्न चुनौतियों पर काम करने का रोडमैप तैयार हो सका है। जी20 शिखर सम्मेलन के पहले दिन इंडिया मिडिल ईस्ट ईस्ट यूरोप कनेक्टिविटी कॉरिडोर लॉन्च हुआ, जिससे भारत सहित अन्य देशों को इससे सबसे बड़ा फ़ायदा यह होगा कि इन्फ्रा डील से शिपिंग समय और लागत कम होगी, जिससे व्यापार का सस्ता और तेज़ होगा। वहीं अफ्रीकन यूनियन का जी20 में शामिल होने की मुहर लगना बड़ी बात है। वहीं इन सब के लिए भारत और जी20 के देशों के मेहनत की बात करें, तो जी20 की बैठक पिछले 8 महीने से भारत के विभिन्न राज्यों में आयोजित की गयीं। इस दौरान जी20 के बैनर तले 50 शहरों में क़रीब 200 से ज़्यादा बैठकों का आयोजन किया गया। यही कारण है कि भारत मंडपम् में पेश किये गये दिल्ली घोषणा पत्र पर आम सहमति बन पायी।

जी20 में भारत की तरफ़ से पेश किये गये घोषणा पत्र पर सहमति भारत की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इस घोषणा पत्र में आतंकवाद के सभी स्वरूपों की निंदा की गयी है और भौतिक राजनीतिक समर्थन से वंचित करने के लिए कहा गया है। इसमें आतंकवाद की कोई भी कार्रवाई आपराधिक और अनुचित है, चाहे ऐसी कार्रवाई कहीं भी घटित हुई हो। इस घोषणा पत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे आगे ले जाने के लिए चर्चा पर ज़ोर दिया गया और विश्वसनीय जवाबदेही और समावेशी डिजिटल बुनियादी ढाँचे (डीपी) का आह्वान डीपी की भूमिका को स्वीकार किया गया। साथ ही साथ जी20 समूह ने व्यक्तियों, धार्मिक प्रतीकों, पवित्र पुस्तकों के ख़िलाफ़ धार्मिक घृणा के सभी कृत्यों की निंदा की। इस घोषणा पत्र में उन्होंने धर्म या आस्था की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और शान्तिपूर्ण सभा के अधिकार पर ज़ोर दिया।

जी20 नेताओं ने दुनिया में असमान आर्थिक पुनरुद्धार के लिए एक मज़बूत टिकाऊ और समावेशी वृद्धि का आह्वान किया। साथ ही घोषित रेड ज़ोन की ज़रूरत को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं ने एक दूसरे के साथ साझा जानकारी का आह्वान किया। मुक्त व्यापार के लिए कृषि पर निर्भर उर्वरक के लिए जी20 नेताओं ने वस्तुओं की बढ़ती $कीमतें जीवन-यापन की लागत पर दबाव डाल रही कृषि खाद्य और उर्वरक क्षेत्र में खुले निष्पक्ष नियम आधारित व्यापार को सुविधाजनक बनाने और नियमों के अनुरूप निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाने की प्रतिबद्धता जतायी।

वर्ष 2050 तक उत्सर्जन शून्य हासिल करने के लिए विकासशील देशों ने 2030 से पहले अपनी जलवायु आधारित योजनाओं को लागू करने के लिए 4.9 बिलियन डॉलर की आवश्यकताओं पर बल दिया। इन योजनाओं का लक्ष्य वैश्विक तापमान में हो रही बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस के नीचे 1.5 डिग्री के नीचे रखने की बात कही गयी है। भारत में ग्लोबल साउथ देशों की मदद करने के उद्देश्य से पर्यावरण और जलवायु अवलोकन के लिए जी20 मिशन उपग्रह का प्रस्ताव किया। इसके अलावा कई मुद्दों पर चर्चा और सहमति बनी।

जी20 के आयोजन में ख़र्च की बात करें, तो इसके अलग-अलग दावे पेश किये जा रहे हैं। सरकार ने ख़र्च का पूरा ब्योरा जारी नहीं किया है। महज़ ट्वीट के ज़रिये इसकी जानकारी दी गयी है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जी20 शिखर सम्मेलन पर 10 करोड़ डॉलर से भी अधिक के ख़र्च का अनुमान लगाया। वरिष्ठ कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने एक्स पर पोस्ट किया कि जी20 शिखर सम्मेलन के लिए आवंटित बजट 990 करोड़ रुपये था; लेकिन भाजपा सरकार ने 4,100 करोड़ रुपये ख़र्च किए। वहीं कुछ रिपोट्र्स में दावा किया गया है कि जी20 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4,254 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिये। कोरोना महामारी के बाद से दुनिया भर की सरकारें सार्वजनिक कार्यक्रमों पर कम ख़र्च कर रही हैं; लेकिन भारत में ख़र्चों में बढ़ोतरी चिन्ता का विषय है।

इंडोनेशिया ने बाली शिखर सम्मेलन के लिए भारत से 10 प्रतिशत से भी कम यानी मात्र 364 करोड़ रुपये ख़र्च किये थे। वहीं केंद्र सरकार जब भी कोई सम्मेलन करती है या विदेशी नेताओं को बुलाती है, तो $गरीबी ढकने पर ही करोड़ों रुपये फूँक देती है, जबकि देश में कई तरह की समस्याएँ बढ़ रही हैं। जी20 शिखर सम्मेलन में अपनी धाक जमाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह ख़ज़ाने का मुँह खोलकर पानी की तरह पैसा बहाया, उससे भले ही कुछ लोग गदगद हों; लेकिन देश की आम जनता के लिए इसका इतना ही महत्त्व है कि आने वाले समय में महँगाई और बढ़ सकती है। शायद ही ऐसा आयोजन दुनिया में पहली बार हुआ है, जिसमें सोने और चाँदी के बर्तनों में खाना परोसा गया हो। इस तरह अरबों रुपये ख़र्च करना एक प्रकार से दो-जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करने वाली एक बड़ी आबादी का मखौल उड़ाना ही कहा जाएगा।

जल्द चुनावों की आशंका

क्या विपक्षी गठबंधन के दबाव का नतीजा है ‘भारत’ नाम और ‘एक चुनाव’?

एक साल पहले जब कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने 4,000 किलोमीटर पैदल चलने वाली ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शुरू की थी, तो किसी को आभास तक नहीं था कि साल भर में ‘भारत’ शब्द राजनीति का बड़ा अखाड़ा बन जाएगा। संयोग ही है कि इस यात्रा के एक साल के भीतर ही विपक्ष ने सत्तारूढ़ भाजपा और एनडीए के ख़िलाफ़ अपना गठबंधन भी खड़ा कर लिया, जिसका नाम इंडिया (संविधान के मुताबिक भारत का अन्य नाम) रख लिया।

मोदी सरकार अब संविधान से देश के नाम के रूप में ‘इंडिया’ शब्द हटाने की तैयारी कर रही है। दिलचस्प यह भी है कि मोदी सरकार इसी दौरान ‘एक देश, एक चुनाव’ का क़ानून लाने की तैयारी में है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में उसने आठ सदस्यीय समिति बनायी है, जो उसे इस पर रिपोर्ट देगी। मोदी सरकार के अचानक उठाये इन क़दमों से संकेत मिल रहे हैं कि वह लोकसभा के चुनाव जल्दी करा सकती है। इस बात को इससे भी बल मिलता है कि सरकार ने 18 सितंबर से संसद का विशेष अधिवेशन बुला लिया है। ऐसे समय जब सरकार (भाजपा) इंडिया गठबंधन के कारण ख़ुद को दबाव में महसूस कर रही है, सितंबर के पहले पखवाड़े में छ: राज्यों की सात सीटों के लिए लिए हुए विधानसभा उपचुनाव में चार सीटें जीतकर इंडिया गठबंधन ने भाजपा पर और दबाव बना दिया है।

लिहाज़ा सरकार चाहती है कि देश के नामों में से इंडिया हटाकर सिर्फ़ भारत करने, एक देश एक चुनाव और संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने के बिल लाकर माहौल अपने हक़ में करने की कोशिश करे। भाजपा में यह आशंका है कि लोकसभा चुनाव में देरी होने से उसे नुक़सान उठाना पड़ सकता है। लिहाज़ा समय से पहले चुनाव की थ्यूरी सामने आ रही है।

इस साल चुनाव वाले राज्य मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ने 7 सितंबर को यह कहकर कि चुनाव आयोग निर्धारित समय से छ: महीने पहले चुनाव की घोषणा करने का अधिकार रखता है; कयासों को और हवा दे दी। चूँकि मोदी सरकार लोकसभा, विधानसभाओं, नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराने के मुद्दे पर $गौर करने और जल्द-से-जल्द सिफ़ारिशें देने के लिए सितंबर के पहले हफ़्ते में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में आठ सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति के गठन की अधिसूचना जारी की थी।

भारत बनाम इंडिया

भारत का दूसरा नाम ‘इंडिया’ सिर्फ़ भारत की राजनीति तक सीमित नहीं है। इसके अंतरराष्ट्रीय मायने भी हैं। इंडिया नाम से भारत दुनिया में अब तक ख़ुद की एक सफल धर्मनिरपेक्ष राज्य की छवि दिखाने में सफल रहा है। कई जानकार मानते हैं कि इंडिया नाम हटाना मुश्किल होगा। पड़ोसी पाकिस्तान में तो इस पर जबरदस्त चर्चा भी शुरू हो गयी है। यह माना जाता है कि भारत नाम होने से पाकिस्तान ज़्यादा सहज रहेगा और भारत की छवि एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में दिखाने की कोशिश करेगा, जैसा कि भारत पाकिस्तान के एक मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते इसे कुछ मंचों पर इस्तेमाल करता रहा है। इंडिया नाम के साथ भारत की वैश्विक धर्मनिरपेक्ष पहचान रही है। इतिहास की पुस्तकें खँगालने से पता चलता है कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना इस बात से परेशान थे कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत के नाम के साथ इंडिया नाम को प्रमुखता दी, न कि हिन्दुस्तान या सिर्फ़ भारत नाम को। पाकिस्तान के निर्माण के बाद जिन्ना ने अपने देश को मुस्लिम राष्ट्र बनाया। इसका उसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नुक़सान हुआ। भारत से बाहर भारत ही इंडिया भी है। लिहाज़ा उसकी एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की छवि आज तक बनी हुई है। कह सकते हैं कि यह एक चतुराई भरा फ़ैसला था। दक्षिण एशिया क्षेत्र में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है, जिसकी लोकतांत्रिक छवि और धर्मनिरपेक्षता ही दुनिया में पहचान रही है। अभी कहना मुश्किल है कि मोदी सरकार की देश के नामों में से इंडिया हटाने की कोशिश का आख़िर क्या होगा? लेकिन यह तय है कि इसके दूरगामी नतीजे होंगे; क्योंकि ज़्यादातर लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार चुनाव की दृष्टि से यह सब कर रही है।

चुनाव का माहौल

मोदी सरकार अचानक बहुत जल्दी में कुछ फ़ैसले कर रही है। ‘एक देश-एक चुनाव’ पर चर्चा और रिपोर्ट के लिए सरकार ने आनन-फ़ानन समिति बना दी। राज्यों में हार की आशंका से भाजपा भयभीत है। ‘एक देश-एक चुनाव’ के नाम पर वह अपनी सुविधा वाला रास्ता निकाल सकती है। यही नहीं, 18 से 22 सितंबर तक संसद का विशेष अधिवेशन सरकार ने बुलाया है, जबकि संसद का मानसून सत्र अगस्त में ही ख़त्म हुआ है। इस विशेष सत्र में एक देश-एक चुनाव से जुड़ा विधेयक, यूसीसी (जिससे हाल के दो महीनों में मोदी सरकार बचती दिखी है) और महिला आरक्षण बिल भी ला सकती है। इस बीच मोदी सरकार ने एक लोकलुभावन फ़ैसला यह किया कि खाना पकाने की गैस (एलपीजी) के दाम 200 रुपये कम कर दिये; भले यह अभी भी उतनी क़ीमत में मिल रहा है कि आम आदमी पर बोझ है।

कांग्रेस और विपक्ष का कहना है कि यह ‘इंडिया’ गठबंधन के तेज़ी बढऩे के कारण उपजा दबाव है। इन सब फ़ैसलों का संकेत यह गया है कि मोदी सरकार कुछ बड़ा करने वाली है। क्या जल्द ही (दिसंबर में) लोकसभा के चुनाव हो सकते हैं? या सरकार एक देश-एक चुनाव के बहाने चुनावों को आगे खिसका देगी? आने वाले दो महीनों में तस्वीर साफ़ हो जाएगी। दिसंबर में चुनाव की बात को तब बल मिला, जब यह चर्चा शुरू हुई कि भाजपा ने दिसंबर के लिए बड़ी संख्या में हवाई जहाज़ बुक कर लिये हैं। माना जा रहा है कि ये बड़े नेताओं के प्रचार में इस्तेमाल किये जाने हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद विपक्ष ने महसूस किया कि भाजपा को हराया जा सकता है। इसके बाद ही उसके एकजुट होने की प्रक्रिया तेज़ हुई। वैसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कर्नाटक के नतीजों से पहले ही दिल्ली में कांग्रेस नेताओं सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी से मुलाक़ात कर चुके थे। इसके बाद 01 अगस्त तक विपक्ष ने तीन बैठकें कीं। हर बैठक में विपक्ष सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने में सफल रहा। उसने अपना नाम तय किया और वरिष्ठ नेताओं की एक 13 सदस्यीय समिति गठित कर दी।

एक देश-एक चुनाव क्यों?

एक देश एक चुनाव की पैरवी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन् 2020 में की थी। वैसे देश में आज़ादी के बाद सन् 1952 से लेकर सन् 1967 तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए थे। इसका कारण यह था कि उस दौरान कोई सरकार समय से पहले नहीं गिरी या गिरायी गयी। वर्तमान में लोकसभा के साथ आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव साथ ही होते हैं, जबकि लोकसभा चुनाव से छ: महीने पहले छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में और छ: महीने बाद महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव होते हैं। हाल के वर्षों में देखें, तो आज एक देश एक चुनाव की बात करने वाली भाजपा ने ही प्रदेशों में सबसे ज़्यादा सरकारें गिरायी हैं। एक राष्ट्र, एक चुनाव के लिए सरकार से लेकर चुनाव आयोग तक को मशक्क़त करनी होगी। एक राष्ट्र, एक चुनाव के समर्थन में तर्क है कि इससे चुनाव पर होने वाले ख़र्च में कमी आएगी।

रिपोट्र्स के मुताबिक, सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में 60,000 करोड़ रुपये का घोषित ख़र्च हुआ था। इसमें चुनाव लडऩे वाले राजनीतिक दलों की ख़र्च की गयी राशि और चुनाव आयोग ऑफ इंडिया के चुनाव कराने में ख़र्च की गयी राशि शामिल है। वहीं सन् 1951-1952 में हुए लोकसभा चुनाव में 11 करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे।

सन् 2014-15 में सरकार ने चुनाव आयोग से एक देश एक चुनाव पर सुझाव माँगा था। जानकारों के मुताबिक, एक देश-एक चुनाव के लिए जन प्रतिनिधित्व क़ानून में हल्का संशोधन करना पड़ेगा। जानकार एक देश-एक चुनाव को लेकर दो तरह के फॉर्मूले का सुझाव देते हैं, जिसमें ढाई-ढाई साल का स्लॉट हो। अर्थात् पहले ढाई साल के स्लॉट में लोकसभा के साथ कुछ राज्यों के चुनाव कराये जाएँ और फिर दूसरे ढाई साल के स्लॉट में बाक़ी बचे राज्यों के चुनाव हों। यदि बीच में किसी राज्य में विधानसभा भंग होती है, तो वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू कर केंद्र शासन करे। लेकिन ऐसा होने पर हो सकता है, किसी राज्य में लंबे समय तक लोगों को जनप्रतिनिधियों से वंचित रहना पड़े और उन्हें अपने काम करवाने में दिक्क़त आये। मान लें यदि ढाई-ढाई साल के फार्मूले को अपनाया जाता है, तो वर्तमान हिसाब से विपक्ष के शासन वाले 8 राज्यों में समय से पहले चुनाव करवा लिये जाएँगे। इस स्थिति में लोकसभा के साथ आंध्र प्रदेश, अरुणाचल, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखण्ड, केरल, मध्य प्रदेश, दिल्ली, ओडिशा, पुडुचेरी, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना के अलावा जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और दिल्ली में इंडिया गठबंधन की सरकारें हैं। राजस्थान और छत्तीसगढ़ को छोड़ अन्य छ: राज्यों में चुनाव के लिए एक साल से अधिक का कार्यकाल है।

दिल्ली में फरवरी 2025 में; बिहार में नवंबर 2025 में और केरल, तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल में मई 2026 में चुनाव होने हैं। इन आठ में छ: राज्यों में भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी है। दूसरी तरफ़ महाराष्ट्र, हरियाणा, सिक्किम, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी और अरुणाचल में एनडीए की सरकारें हैं, जहाँ 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव होने हैं।

ज़ाहिर है एक देश- एक चुनाव का फॉर्मूला लागू होता है, तो एनडीए के मुक़ाबले इंडिया गठबंधन को ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ेगा। इसमें भाजपा इस लिहाज़ से फ़ायदा देख सकती है कि आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के एक सर्वे के बताया गया था कि 77 फ़ीसदी मतदाता लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक ही समय पर होने की स्थिति में एक ही दल को मत देना पसन्द करते हैं।

एक देश-एक चुनाव का फॉर्मूला यदि सरकार ने इसी लोकसभा चुनाव में लागू किया, तो उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों में समय से पहले चुनाव होंगे। लोकसभा चुनाव के ढाई साल बाद बाक़ी के राज्यों में विधानसभा के चुनाव होंगे। इसके हिसाब से 2026 के मध्य में बाक़ी बचे राज्यों में चुनाव हो सकते हैं। पंजाब, उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027, गुजरात-हिमाचल विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर 2027 और कर्नाटक विधानसभा का कार्यकाल मार्च, 2028 तक है। ज़ाहिर है इतनी जल्दी चुनाव करवाने पर सवाल उठ सकते हैं और इसका विरोध हो सकता है। बहुत-से जानकार एक देश एक चुनाव को संवैधानिक अधिकारों का हनन बता रहे हैं। यह प्रस्ताव पास हुआ, तो कई राज्यों की विधानसभाएँ भंग करनी पड़ेंगी। एक देश एक चुनाव के लिए गठित रामनाथ कोविंद समिति को देखना होगा कि ऐसा करना क्या सही है?

जानकार मानते हैं कमेटी में अमित शाह और अपने समर्थक लोगों को लेना यह ज़ाहिर करता है कि सरकार (भाजपा) अपने हिसाब से चीज़ें करवाना चाहती है। अंदेशे के कारण कांग्रेस के लोकसभा में नेता अधीर रंजन चौधरी ने ख़ुद को इस समिति से अलग कर लिया है। ज़ाहिर है विपक्ष इस मनमानी का विरोध करेगा और इसे संवैधानिक अधिकारों का हनन बताएगा।

विधानसभा भंग करने के संविधान के अनुच्छेद-176 के मुताबिक, पूर्ण बहुमत नहीं होने पर ही राज्यपाल समय से पहले विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश कर सकता है। राज्य अगर यह तर्क देता है कि समय से पहले पूर्ण बहुमत की सरकार को गिराना ग़लत है, तो एक देश-एक चुनाव को लागू करना मुश्किल होगा। ऐसे में यह भी बड़ा सवाल है कि यदि लोकसभा ही बीच में भंग हो जाए, तो उस स्थिति में क्या होगा?

देश सन् 1979, सन् 1991, सन् 1997 और सन् 1999 में लोकसभा को समय से पहले भंग होते देख चुका है। अब यदि लोकसभा बीच में भंग होती है, तो क्या सभी विधानसभाओं को भी भंग कर दिया जाएगा? चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है, तो क्या होगा? लोकसभा और विधानसभा के अलावा निकाय और एमएलसी चुनाव का क्या होगा? उन्हें अलग किया जाता है, तो उन पर अलग ख़र्च होगा। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में तो निकाय चुनाव ही एक महीने तक चलता है।

हमारा कर्तव्य संवैधानिक प्रावधानों और जनप्रतिनिधित्व कानून के मुताबिक सरकार का कार्यकाल खत्म होने से पहले ही चुनाव करा देना है। अनुच्छेद 83 (2) कहता है कि संसद का कार्यकाल 5 साल का होगा और इसके अनुरूप आरपी अधिनियम की धारा 14 कहती है कि 6 महीने पहले हम चुनाव की घोषणा कर सकते हैं।’’

राजीव कुमार

मुख्य चुनाव आयुक्त (भोपाल में)

नाम हटाना आसान नहीं

एक देश एक चुनाव लागू होने से संवैधानिक, राजनीतिक, ढाँचागत चुनौतियाँ बढ़ेंगी। साथ ही विधानसभा, लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाने पर संवैधानिक संशोधन ज़रूरी होगा। सवाल है कि विधानसभाओं का कार्यकाल घटाने या बढ़ाने पर सरकार सर्वसम्मति कैसे बना पाएगी? सरकार को संवैधानिक संशोधन को पहले लोकसभा और बाद में राज्यसभा से पारित कराना होगा। इसे लागू कराने के लिए केंद्र सरकार को कम-से-कम 15 राज्यों की विधानसभाओं से इस प्रस्ताव को अनुमोदित कराना होगा। ये सरकार की सबसे बड़ी चिन्ता है, क्योंकि 15 राज्य उसके पास नहीं हैं। उधर संविधान के हिसाब से हमारे देश के इंडिया और भारत दोनों ही नाम मान्‍य हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-1 में लिखा है- ‘इंडिया दैट इज भारत, यूनियन ऑफ स्टेट्स।’ यानी इंडिया ही भारत है, जो राज्‍यों का संघ है। ऐसे में भारत सरकार को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया लिखा जाए या गवर्नमेंट ऑफ भारत, दोनों ही पूरी तरह से संवैधानिक हैं। प्रेजिडेंट ऑफ भारत को लेकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक सवाल पर साफ़ कहा कहा- ‘इंडिया मतलब भारत; यह संविधान में है। मैं हर किसी को अपने संविधान को पढऩे के लिए आमंत्रित करना चाहूँगा।’ यदि सरकार देश के नाम से सिर्फ़ भारत करना चाहती है, तो उसे संविधान संशोधन के लिए बिल लाना होगा। अनुच्छेद-1 में संशोधन करने के लिए केंद्र सरकार को कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होगी। लोकसभा में इस समय 539 सांसद हैं। ऐसे में संशोधन विधेयक को पास करने के लिए 356 सांसदों का समर्थन ज़रूरी है। वहीं राज्यसभा में 238 सांसद हैं, तो 157 सदस्यों का समर्थन चाहिए होगा। लेकिन बात सिर्फ़ संशोधन पर ही नहीं रुकेगी। अगर विधेयक दोनों सदनों में पास हो गया, तो नाम का संशोधन तो हो जाएगा; लेकिन काम यहाँ पर ख़त्म नहीं होगा। इसके बाद भारत को उन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों को सूचित करना होगा, जहाँ हमारे देश का नाम इंडिया लिखा जाता है। उन सभी को पत्र जारी करके यह बताना होगा कि अब इंडिया के नाम को बदल दिया गया है और देश को आधिकारिक रूप से भारत के नाम से संबोधित किया जाए। पत्र मिलने के बाद अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर नाम को बदला जाएगा और तब देश को ‘भारत’ के तौर पर अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता मिलेगी, और इसमें निश्चित ही काफ़ी लम्बा समय लगेगा।

भाजपा का भय

विपक्ष का इंडिया गठबंधन तीन बैठकें कर चुका है और लगातार आगे बढ़ रहा है। इसी महीने हुए 7 विधानसभा उपचुनाव उसने मिलकर लड़े और चार में जीत हासिल की। भाजपा में दरअसल कई तरह के भय हैं। रफाल ख़रीद से लेकर सन् 2019 के लोकसभा से ऐन पहले पुलवामा आतंकी हमला, अडानी से प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह के रिश्तों पर ढेरों सवाल भाजपा की कमज़ोर नस हैं और उसके नेताओं को लगता है कि विपक्ष सत्ता में आयी, तो इन सब की फाइल सरकार खोल सकती है। अडानी और प्रधानमंत्री के रिश्तों को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार आक्रामक रहे हैं। अब तो मीडिया में अडानी से जुड़े कथित घोटालों को लेकर कई ख़ुलासे हो चुके हैं। मोदी-शाह की जोड़ी किसी सूरत में चुनाव में हारना नहीं चाहती। भाजपा के भय का सबसे बड़ा कारण उनके ब्रांड नेता प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा लगातार कम होना है। सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों की बातचीत में मोदी के प्रति जनता का आकर्षण अब पहले जैसा नहीं दिखता। बहुत-से लोग अब कहने लगे हैं कि मोदी अति नाटकीय तरीक़ा अपनाकर जनता को प्रभावित करने की कोशिश करने लगे हैं। लगता है वह ख़ुद की लोकप्रियता को डाँवाडोल होता महसूस कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने देशवासियों को ‘मेरे परिवारजनों’ कहना शुरू कर दिया है, जो यह साबित करता है कि वह अपनी पुरानी लोकप्रियता खोने से चिन्तित हैं और कुछ नया कहना-करना चाहते हैं, ताकि जनता में उनकी लोकप्रियता बनी रहे। लेकिन क्या इन तरीकों से मोदी अपनी लोकप्रियता बचा पाएँगे, यह बड़ा सवाल है?

भाजपा का लक्ष्य प्रभावित करेंगे उपचुनावों के परिणाम

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जलवा उपचुनाव में खोखला दिखा। मऊ जनपद के घोसी विधानसभा में हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के दारा सिंह चौहान को 42,759 मतों से हरा दिया। दारा सिंह चौहान समाजवादी पार्टी को छोडक़र भारतीय जनता पार्टी में ये सोचकर गये थे कि सत्ता की मलाई खाने को मिलेगी, मगर करारी हार के बाद उनका सपना टूट गया।

इसके अतिरिक्त भारतीय जनता पार्टी को एक और बड़ा झटका पंचायत के उपचुनाव एवं ग्राम प्रधानी के तीन उपचुनावों में लगा है। मिर्जापुर जनपद के राजगढ़ विकासखंड ज़िला पंचायत सदस्य सहित शहर एवं कोन विकासखंड में ग्राम प्रधानों के उपचुनावों में भी समाजवादी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी को हरा दिया। समाजवादी पार्टी प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी की इस जीत को जनता की जीत बताते हुए इसका श्रेय भी जनता को ही दे डाला।

योगी को लगा झटका

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष केंद्रीय नेता एवं उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत सभी भाजपा नेता बीते दो महीने से उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटें जीतने के लिए गुणा भाग करने में लगे हैं। उत्तर प्रदेश में 80 सीटें जीतने का रिकॉर्ड अभी तक किसी ने नहीं बनाया है। भारतीय जनता पार्टी के नेता यह सपना किस आधार पर देख रहे हैं, ये तो वही जानें; मगर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सभी 80 सीटें अगर कोई पार्टी कभी उत्तर प्रदेश से निकाल ले, तो ये इतिहास की बड़ी जीत होगी एवं उस पार्टी की केंद्र में सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। मगर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी जानते हैं कि यह आसान नहीं है।

असंभव को संभव करने का प्रयास फिर भी किया जा रहा है एवं इसी प्रयास के तहत कुछ दिन पूर्व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष रूप से दिल्ली बुलाकर अकेले में लम्बी बातचीत की थी। योजना 80 को सफल बनाने के लिए ही गृह मंत्री अमित शाह राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी को मनाने के कई प्रयास कर चुके हैं।

भारतीय जनता पार्टी के सभी नेता जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिए अगर कोई अड़चन है, तो वह अखिलेश यादव हैं। इसी कारण से अखिलेश यादव की शक्ति कम करने के लिए उनके छोटे भाई प्रतीय यादव एवं उनकी पत्नी अपर्णा यादव को अखिलेश यादव के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किया, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के नेता बहुत हद तक सफल भी हुए। अब चर्चा है कि वे नेता अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल सिंह यादव को अपने साथ लाने के प्रयास में हैं।

अपुष्ट सूत्रों का कहना तो यहाँ तक है कि शिवपाल यादव को केंद्रीय मंत्री तक बनाने को भारतीय जनता पार्टी के नेता तैयार हैं। यह बात भले ही सही न हो; मगर यह तो सच है कि भारतीय जनता पार्टी कभी भी केवल अपने दम पर उत्तर प्रदेश पर एकछत्र राज नहीं कर सकेगी, चाहे वो लोकसभा हो चाहे विधानसभा। हाल ही में हुए उपचुनावों के परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी के दिग्गजों को इसका संकेत भी दे दिया है। राजनीति से जुड़े अधिवक्ता यशवंत सिंह कहते हैं कि सत्ता को जबरन हथियाने के प्रयासों में कई बार बुरी हार का सामना करना पड़ता है। जब देश में लोकतंत्र के आधार पर चुनाव कराने का नियम है, तो किसी को भी उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए अन्यथा जनता को यह बुरा लगता है। हर किसी को उसके कार्यों एवं उसकी छवि के आधार पर जनता किसी पायदान पर खड़ा करती है। उसे सहर्ष स्वीकार करने में क्या समस्या है? जबरन तो कोई अपने बच्चों पर शासन नहीं कर सकता, यह तो सत्ता है।

भाजपा हो सकती है कमज़ोर

इसी माह छ: राज्यों की सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे, जिनमें से भारतीय जनता पार्टी को केवल तीन सीटों पर जीत मिली। इनमें दो सीटें त्रिपुरा की हैं एवं एक उत्तराखंड की बागेश्वर विधानसभा सीट है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, केरल, पश्चिम बंगाल में क्रमश: समाजवादी पार्टी, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, तृणमूल कांग्रेस ने जीत प्राप्त की।

उपचुनाव के ये संकेत सिद्ध करते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की राह आसान नहीं है एवं उसके लोकसभा के 400 से अधिक सीटों पर जीत के सपने को झटका लग सकता है। 

सनातन-विरोध ही क्यों?

शिवेंद्र राणा

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के सिनेमाई हीरो बेटे एवं राज्य सरकार में खेल विकास मंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म को लेकर दिये गये विवादित बयान पर विवाद शुरू हो गया है। भाजपा नेताओं समेत कई लोग विरोध दर्ज करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म सामाजिक न्याय और समानता के ख़िलाफ़ है। कुछ चीज़ें का विरोध नहीं किया जा सकता, उन्हें ही ख़त्म किया जाना चाहिए। हम डेंगू, मच्छर, मलेरिया या कोरोना का विरोध नहीं कर सकते। हमें इसे ख़त्म करना होगा। यह सामाजिक न्याय और समानता के ख़िलाफ़ है।

यह बयान उन्होंने सनातन उन्मूलन सम्मेलन में दिया। सम्मेलन के नाम से उसके लक्ष्य को समझना कठिन नहीं है। अत: उदयनिधि की ऐसी भाषा सहज अभिव्यक्ति है। मूल प्रश्न तो ऐसे सम्मेलनों के आयोजन का औचित्य है। समझ नहीं आ रहा कि यह कैसा चुनावी रण है, जहाँ विपक्ष देश की मौज़ूदा सरकार द्वारा जनित अव्यवस्था-नीति निर्णयन की ख़ामियों के बजाय सनातन धर्म की समाप्ति की लड़ाई लड़ रहा है।

हालाँकि कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों की इस बयान के स्पष्ट विरोध न करने का औचित्य नहीं समझ आता। डीएमके के युवराज और एम.के. स्टालिन के सुपुत्र के इस वक्तव्य और उसे पर को विपक्षी दलों के मौज़ूद नेताओं की मौन सहमति का क्या अर्थ निकाला जाए? यह तो स्पष्ट रूप से धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए दूसरे पक्ष को उकसाने का प्रयास है। अब विपक्ष किस प्रकार भाजपा पर आरोप लगा सकता है कि वह धार्मिक ध्रुवीकरण में लिप्त है, जबकि बहुसंख्यक समाज की संस्कृति को अपमानित करके आप उसे उत्तेजित कर रहे हैं कि वह राजनीतिक गोलबंदी में शामिल हो जाए।

यथार्थ में निकृष्ट लोगों की जमात इस देश को अपने राजनीतिक लाभ के लिए विखंडित करने पर तुली है। अन्यथा अनावश्यक सनातन उन्मूलन सम्मेलन एवं सनातन धर्म और संस्कृति को समाप्त करने के आह्वान का क्या अर्थ लगाया जाए? सही मायने में इस देश का राजनीतिक वर्ग देश का कर्क रोग हो चुका है, जो सामाजिक-धार्मिक विघटन पर आमादा है। इन टिप्पणियों का अर्थ एक प्रकार की गोलबंदी का प्रयास है। इस विष-बोध के दो पहलू हैं। पहला सनातन धर्म संस्कृति के विरुद्ध विष-वमन और दूसरा राजनीतिक रूप से धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रयास। असल में करुणानिधि का परिवार ईसाई मान्यताओं में य$कीन करता है। च्यूँकि उदयनिधि की परवरिश सेमेटिक परम्परा वाले परिवेश में हुई है, इसलिए उन्हें सहिष्णुता की भावना का ज्ञान नहीं है। अत: उनका यह बयान बहुत विस्मयकारी नहीं है। सेमेटिक मान्यताओं में ग़ैर-धर्म-पंथों के लिए अधिक स्थान नहीं है। लेकिन उन्हें आईना दिखाना भी ज़रूरी है।

ख़ैर, जिस ईसाइयत के बूते वह समानता की बात कर रहे हैं। उसे एक उदाहरण से समझिए- ईसाइयत के अनुसार, स्त्री का जन्म ही इसलिए हुआ है कि आदम अकेला था। उसके द्वारा साथी की माँग करने पर ईश्वर ने आदम को सुला दिया और उसकी एक पसली खींचकर उसमें फूँक मार दी, तो हौव्वा यानी औरत पैदा हो गयी। हौव्वा (स्त्री) आदम (पुरुष) की सेवा, उपभोग एवं मनोरंजन के लिए पैदा हुई। उससे चाहे जैसी भी सेवा ली जा सकती है। उसमें आत्मा या चेतना नहीं होती। अब जो सेमिटिक परम्परा अपनी महिलाओं को सम्मान नहीं देता, उनकी बराबरी की बात नहीं स्वीकारता उसे ग़ैर-धर्मों में सुधार की बात करना शोभा नहीं देता। अत: स्टालिन परिवार को इसकी शुरुआत स्वयं की पंथीय मान्यताओं को सुधारने से करनी चाहिए।

सनातनधर्मी ऐसी भाषा नहीं बोल सकते। क्योंकि सनातन धर्म एकात्मता में विश्वास करता है और सेमिटिक परम्परा एकरूपता में। सनातन वही है, जो आदि और अन्त रहित है। सनातन धर्म अनादि-काल से व्यवहार में है और अनंत काल तक चलता रहेगा। क्योंकि भारतवर्ष का आधार ही सनातन धर्म पर है। अत: यह संस्कृति भी सनातन संस्कृति है। समझना होगा कि सनातन धर्म और संस्कृति इस राष्ट्र की आती-जाती श्वास है। इसके बिना यह राष्ट्र निस्तेज और मृतप्राय हो सकता है, तो मूल संस्कृति को समाप्त करने की घोषणा राष्ट्र विरोधी मानी जानी चाहिए। हालाँकि यहाँ विषय सनातन धर्म की व्याख्या और श्रेष्ठता साबित करना नहीं है। यहाँ विषय उन परिस्थितियों एवं परिणामों का मूल्यांकन करना है। यहाँ मुख्य मुद्दा उदयनिधि के बयान से उपजे विवाद के परिणाम का मूल्यांकन है।

आलोचना और समालोचना में कोई दोष नहीं। वह प्रखर या कटु भी हो सकती है; लेकिन उसे तार्किक होना चाहिए। इन सबसे बढक़र है कि आलोचना कभी भाषायी मर्यादा के स्तर को श्रीहीन न कर रही हो। किसी राष्ट्र की श्वास घोंटने की उद्घोषणा विशुद्ध गुण्डई और अराजकता वाली भाषा है। प्रतीत होता है कि इस देश का राजनीतिक तबक़ा इस देश का विखंडन करने पर तुला हुआ है। उदयनिधि स्टालिन का बयान देश के बहुसंख्यक समाज को स्पष्ट चुनौती है।

असल में भारतीय राजनीति में विमर्श और मर्यादाओं का मूल्य इतना नीचे गिर चुका है कि ऐसे वक्तव्यों पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसी घटनाएँ और बयानबाज़ी से विपक्ष के राजनीतिक समझ पर शक पैदा होता है। यदि विपक्ष को चुनाव जीतना है, तो उसकी प्राथमिकता सत्ताधारियों के धार्मिक गोलबंदी के मज़बूत क़िले का ध्वस्तीकरण होना चाहिए; किन्तु विपक्ष तो सत्ता पक्ष को धार्मिक ध्रुवीकरण का मैदान उपलब्ध करा रही है।

आज देश में जो विपक्ष भाजपा के प्रबल जनसमर्थन के लिए ख़िलाफ़ रोना रो रहा है, उसकी ज़मीन उसने ख़ुद तैयार की है। आये दिन ब्राह्मणवाद-मनुवाद के नाम पर सनातन समाज को अपमानित करने वाले विवाद निरंतर चलते रहते हैं। 90 के दशक में शुरू हुआ धार्मिक ध्रुवीकरण आज देश में विध्वंस रूप से चरम पर है।

विपक्षी दलों ने भाजपा को इसके लिए लगातार ज़िम्मेदार माना है और उसकी इन नीतियों के लिए निरंतर हमलावर भी रहे हैं। लेकिन अति सूक्ष्मता में न जाकर यदि परिस्थितियों का केवल सामान्य विश्लेषण करें, तब भी यह बात स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है कि केवल भाजपा को इसके लिए अकेले दोष देना बिलकुल ही अनुचित है। स्पष्ट शब्दों में कहें, तो भाजपा को अपनी राजनीति गोलबंदी का मैदान विपक्ष ने ख़ुद उपलब्ध कराया है। निरपेक्ष सत्य यही है कि अल्पसंख्यकवाद के नाम पर 70 के दशक में देश में तुष्टिकरण की शुरुआत की गयी। विभिन्न सेमिटिक मान्यताओं एवं उनकी पंथीय माँगों को अनावश्यक तरजीह दी गयी। वोटबैंक की राजनीति तक तो यह ठीक था। लेकिन इसके अतिरिक्त विशेषकर इस देश के बहुसंख्यक समाज को न सिर्फ़ प्रताडऩा झेलनी पड़ी, बल्कि कई बार उसके धर्म और संस्कृति को प्रगतिशीलता के नाम पर लांछित और अपमानित किया गया। वर्तमान विवाद उसी से उपजी कड़ी है।

उदयनिधि स्टालिन के बयान को इस सन्दर्भ में देखें, तो वर्तमान परिस्थितियों का सही मूल्यांकन हो पाएगा। उनका यह कथन और इंडिया गठबंधन के नेताओं द्वारा इसका समर्थन तथा मौन सहमति उनकी मानसिक-वाचिक असभ्यता को दर्शाता है। यदि यह किसी समाज के धार्मिक विश्वास को चुनौती है, तो यह धार्मिक ध्रुवीकरण को स्पष्ट आह्वान है। किन्तु यदि इसके माध्यम से चुनावी हित साधने का प्रयास किया गया है, तो यह परले दर्जे की मूर्खता है।

यह विवाद अनावश्यक है। किन्तु राष्ट्रीय विमर्श के लिए यह देखना भी ज़रूरी है कि विपक्ष किस तरह से लोकतंत्र को परिभाषित करना चाहता है? यह बयानबाज़ी सनातन धर्म के अनुयायियों के उकसावे का प्रयास लगता है। कल्पना कीजिए कि यदि इस विवाद के भीषणतम स्वरूप में देश के किसी हिस्से में दंगे हो जाए, तो बहुसंख्यक समाज पर लानत-मलानत का दौर चल पड़ेगा। और तब किसी को इस विवाद की वजह नहीं, सिर्फ़ परिणाम याद रहेगा।

चुनावी रूप से अल्पसंख्यक वोटों के एकत्रिकरण के प्रयास में यह बहुसंख्यक समाज को गोलबंद करेगा। उदाहरणस्वरूप, जब भी गुजरात दंगे की बात होती है, तो सेक्युलर एवं अल्पसंख्यक जमातें एकपक्षीय विश्लेषण करती हैं। यही वजह है कि इस विभीषिका की व्याख्या का संदर्श बिगड़ जाता है। वास्तव में इसके मूल में गोधरा-कांड था, जिससे बचकर यह वर्ग अपनी धूर्तता साबित करना चाहता है।

ऐसे ही दूसरे धार्मिक मसलों पर विपक्ष का पक्षपात रवैया उसकी तुष्टिकरण की नीति पर य$कीन दिलाता है, जिससे बहुसंख्यक समाज स्वयं को अपमानित महसूस करता है। यही वजह थी कि कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार को दो आम चुनावों में बुरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा। इससे पूर्व 90 के दशक में जाति जैसी कही अधिक संकीर्ण संस्था के आधार पर राजनीतिक गोलबंदी और हिंसक टकराव हो चुका है। तब भी धर्म का मुद्दा जातिवाद को पराजित करने में सफल रहा था। मण्डल-कमंडल की लड़ाई, भाजपा का प्रचंड उभार, वी.पी. सिंह का नेपथ्य में जाना, उत्तर भारत में भगवा राजनीति की ज़मीन तैयार होना आदि धार्मिक गोलबंदी की सफलता की पुरानी पटकथा है, जिसे यहाँ दोहराने की आवश्यकता नहीं है। अगर विपक्ष ने अपने नेताओं की अपनी भाषाई मर्यादा और अनर्गल बयानबाज़ी पर लगाम नहीं कसी, तो उसके चुनावी निहितार्थ की कल्पना कठिन नहीं है।

2024 के आम चुनाव का परिणाम तो अभी भविष्य का गर्त हैं। किन्तु इन बयानबाज़ियों के यह अंदाज़ा लगाया जा सकता आगे चुनावी राजनीति का संचालन कैसा होगा? लेकिन एक बात सुनिश्चित रूप से कही जा सकती है कि राष्ट्र के प्रारब्ध हेतु यह एक भयावह तस्वीर है, जिसके परिणीति ख़तरनाक होगी। इस मसले पर इस देश के बड़े राजनीतिक वर्ग को समझ न हो, किन्तु जनता की सचेतता आवश्यक होगी। किन्तु इन शाब्दिक विषबाणों से जिस हलाहल का प्रसार राष्ट्रीय जीवन में फैलेगा, वह भविष्य को एक बड़े टकराव की ओर धकेलेगा। 

(लेखक पत्रकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

मानवाधिकारों की अनदेखी

भारत में जी20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वियतनाम पहुँचते ही मानवाधिकारों का मुद्दा छेड़ दिया। उन्होंने कहा कि जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ, मैंने मोदी के साथ मानवाधिकारों के सम्मान और एक मज़बूत व समृद्ध देश के निर्माण में नागरिक संस्थाओं और स्वतंत्र प्रेस की महत्त्वपूर्ण भूमिका के महत्त्व को उठाया।

दरअसल यह मुद्दा जी20 शिखर सम्मेलन में मीडिया से प्रधानमंत्री मोदी की दूरी को लेकर उठा। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह से पत्रकारों से जी20 के पूरे शिखर सम्मेलन में दूरी बनायी, उससे अंतरराष्ट्रीय नेताओं के बीच मोदी की प्रेस की स्वतंत्रता के हनन और देश के मुद्दों से कतराने वाले प्रधानमंत्री की छवि बनी है। जी20 में निमंत्रण न मिलने को लेकर हमलावर कांग्रेस को मानवाधिकारों का एक नया मुद्दा मिल गया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी से मानवाधिकारों और स्वतंत्र प्रेस के बारे में बात की थी। लेकिन मिस्टर मोदी ने बाइडन से कहा कि न प्रेस कॉन्फ्रेंस करूँगा, न करने दूँगा। हालाँकि इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। बाइडन ने जो बातें भारत में मोदी के सामने कही थीं, वही वह वियतनाम में कर रहे हैं। जयराम रमेश ने इससे पहले आरोप लगाया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय बैठक के बाद विदेशी मीडिया को दोनों नेताओं से सवाल नहीं पूछने दिया गया। उन्होंने यह दावा किया था कि वियतनाम में मीडिया के सवालों का जवाब देंगे। कांग्रेस महासचिव ने यह आरोप जो बाइडेन के दल के सूत्रों के हवाले से लगाया था। जयराम रमेश ने यह भी कहा था कि इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं है; क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के राज में इसी तरह लोकतंत्र चलता है।

ग़ौरतलब है कि 10 दिसंबर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानव अधिकारों के विश्वव्यापी ऐलान किया था, जिससे दुनिया में मानव जीवन का मान-सम्मान बरक़रार रह सके। आज मानवाधिकारों के हनन की वजह से दुनिया की एक-तिहाई आबादी को उसके हक़ नहीं मिल रहे हैं। भारत सहित सभी विकासशील देशों में कुल जनसंख्या का पाँचवाँ भाग हर रात भूखा सोता है और लगभग एक-चौथाई लोगों के पास पीने के पानी से लेकर वे मूलभूत सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं, जिन्हें पाना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। इसके अलावा दुनिया के तक़रीबन एक-तिहाई लोग ग़रीबी में जी रहे हैं। यह सोचना आज बहुत ज़रूरी है कि नयी क़ानून व्यवस्था और धार्मिक सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में लगी केंद्र की सत्ता हिन्दुस्तान की बहुसंख्यक जनता के लिए मौलिक अधिकारों को किस रूप में देना चाहती है? केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले सवा नौ वर्षों की अपनी सत्ता में जिस तरह से लोगों के सवाल पूछने, ख़ामियाँ गिनाने, टिप्पणी करने और आलोचना करने पर पाबंदी लगाने की कोशिश की है, उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि सरकार को सिर्फ़ अपनी तारीफ़ ही पसंद है। आम लोगों पर ही नहीं, सरकार ने अपने ख़िलाफ़ बोलने वाले नेताओं, पूँजीपतियों और बुद्धिजीवियों पर शिकंजा कसने की कोशिश की है।

इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान के एक विवादित बयान के मामले में साफ़ किया था कि मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की बोलने की आज़ादी पर ज़्यादा पाबंदी नहीं लगायी जा सकती। दरअसल आज़म ख़ान को हेट स्पीच मामले में जेल जाना पड़ा था। इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि बोलने की आज़ादी हर नागरिक को मिली है। उस पर संविधान के परे जाकर रोक नहीं लगायी जा सकती।

फिर इसी साल अप्रैल में भी सुप्रीम कोर्ट ने बोलने की आज़ादी को लेकर दूसरी बार सख़्ती दिखायी और केरल के एक न्यूज चैनल पर केंद्र सरकार द्वारा लगाये गये प्रतिबंध को लेकर कहा कि अगर किसी मीडिया संस्थान की कवरेज या राय में सरकार की आलोचना की जाती है। तो इसे देश विरोधी नहीं माना जाएगा। इससे पहले एक मामले में तो सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नपुंसक तक कह दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने चैनल पर लगे प्रतिबंध हटाते हुए कहा कि मीडिया अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र है। ओपिनियन रखने की स्वतंत्रता को देश की सुरक्षा के नाम पर रोकने से अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस की स्वतंत्रता पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। इसी प्रकार से सन् 1950 में मद्रास सरकार ने, जो कि अब तमिलनाडु सरकार है; एक साप्ताहिक पत्रिका को प्रतिबंधित कर दिया था। इस पत्रिका में कथित रूप से तत्कालीन नेहरू सरकार की नीतियों की आलोचना की जाती थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तब भी पत्रिका पर लगाये गये प्रतिबंध को हटा दिया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य की सुरक्षा की आड़ में क़ानून व्यवस्था को सही नहीं ठहराया जा सकता। ये प्रतिबंध न सिर्फ़ असंवैधानिक है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी कुछ हद तक प्रतिबंध करता है।

बहरहाल, सन् 1947 में देश की आज़ादी के बाद बने संविधान में भारतीय नागरिकों को अनुच्छेद-19 से अनुच्छेद-22 तक कई सारे अधिकार दिये गये हैं। अनुच्छेद-19(1)(ए) के तहत देश के सभी नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। हालाँकि ये अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को हैं, किसी बाहरी व्यक्ति यानी विदेशी नागरिक को नहीं। हालाँकि अनुच्छेद-19(2) में बोलने की आज़ादी को प्रतिबंधित की जा सकने वाले नियमों का उल्लेख भी है। इस अनुच्छेद के तहत कहा गया है कि किसी नागरिक द्वारा कुछ ऐसा नहीं बोला जाना चाहिए, जिससे भारत की संप्रभुता और अखण्डता को ख़तरा हो, किसी राज्य की सुरक्षा को ख़तरा हो, पड़ोसी देश या विदेशी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बिगडऩे का ख़तरा हो, सार्वजनिक व्यवस्था बिगडऩे का ख़तरा हो, शिष्टाचार या सदाचार ख़त्म होने या ख़राब होने का ख़तरा हो, कोर्ट की अवमानना हो, किसी की मानहानि हो या अपराध को बढ़ावा मिलता हो।

ज़ाहिर है कि कुछ दिनों पहले भडक़ाऊ भाषण और हेट स्पीच को इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) के तहत शामिल करने केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पहल की थी। लेकिन केंद्र की मोदी सरकार अपनी आलोचना को भी भडक़ाऊ भाषण और हेट स्पीच बता अपने ख़िलाफ़ टिप्पणियाँ करने वालों को देशद्रोह जैसे मुक़दमों में फँसाकर उन्हें जेल भेजने की मंशा से इस क़ानून को लाना चाहती है। यही वजह है कि लोगों के सत्ता, ख़ासतौर पर मोदी सरकार और भाजपा शासित राज्यों की सरकारों के ख़िलाफ़ बोलने पर अंकुश लगाने और बोलने वालों को सज़ा दिलाने का प्रावधान करने की पहल को किसी तरह का समर्थन नहीं मिला और केंद्र की मोदी सरकार इसमें अभी तक विफल रही है। राजनीति के जानकारों की मानें, तो केंद्र की मोदी सरकार ने अब तक अपने ख़िलाफ़ बोलने वाले दर्ज़नों लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है और वो हमेशा के लिए अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों का मुँह बन्द करना चाहती है; लेकिन उसके आगे सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आख़िर हेट स्पीच को वह परिभाषित कैसे करेगी? सन् 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की मोदी सरकार से सवाल किया था कि जब अधिकांश ऐसे औपनिवेशिक क़ानूनों को निरस्त करने की प्रक्रिया चलायी जा रही है, तब राजद्रोह क़ानून को अब तक निरस्त क्यों नहीं किया गया है? ग़ौरतलब है कि राजद्रोह क़ानून औपनिवेशिक काल में बना एक ऐसा क़ानून है, जिसके तहत सरकार जिसे राजद्रोही मान ले, उसे सज़ा हो सकती है।

दरअसल यह क़ानून ब्रिटिश हुकूमत ने अपने ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को जेल भेजने, उन्हें फाँसी की सज़ा देने और उन्हें दंडित करने के लिए बनाया था। आज भी देश में ब्रिटिश हुकूमत की तरह इस क़ानून का व्यापक स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है। राजद्रोह क़ानून के दुरुपयोग को लेकर देश की संविधान सभा, संविधान विशेषज्ञों और विधि विशेषज्ञों के बीच चलता विवाद रहा है। आज भी यह विवाद का विषय बना हुआ है। ख़ास बात यह है कि राजद्रोह क़ानून की संकल्पना भारतीय दण्ड संहिता-1860 के मूल दस्तावेज़ में नहीं रखी गयी थी। इसे एक संशोधन के ज़रिये सन् 1870 में धारा-124(ए) में शामिल किया गया। धारा-124(ए) कहती है कि जो कोई बोले गये या लिखे गये शब्दों द्वारा या संकेतों के द्वारा या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, असन्तोष उत्पन्न करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, उसे आजीवन कारावास या तीन वर्ष तक की क़ैद और ज़ुर्माना अथवा सभी से दण्डित किया जाएगा।

इस प्रकार इस क़ानून में साफ़तौर पर यह कहा गया है कि राजद्रोह एक जघन्य अपराध है। लेकिन राजद्रोह को राष्ट्र यानी देशद्रोह नहीं माना जा सकता, जैसा कि आजकल इसमें लोगों को गुमराह किया जा रहा है। क्योंकि राजद्रोह क़ानून सरकार की आलोचना को ध्यान में रखकर बनाया गया एक ऐसा क़ानून है, जिसमें सरकार अपनी आलोचना को लेकर कार्रवाई करती है। लेकिन राष्ट्रद्रोह का मतलब देश के ख़िलाफ़ की गयी किसी गतिविधि से है। इसलिए इन दोनों में काफ़ी अन्तर है, जिसे आम लोगों को समझना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य-1950 और रमेश थापर बनाम मद्रास राज्य-1950 मामलों में कहा था कि दंड संहिता की धारा-124(ए) संविधान के प्रावधानों से संगत नहीं है; लेकिन बाद में न्यायालय ने केदारनाथ यादव बनाम बिहार राज्य-1962 मामले में धारा-124(ए) की संवैधानिक वैधता को स्वीकार कर लिया था।

बहरहाल अगर सवाल पूछने, टिप्पणी करने और आलोचना करने के अधिकार को अगर ख़त्म कर दिया जाएगा, तो कोई भी सरकार निरंकुश हो जाएगी। इसलिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को ही नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक को सरकारों से सवाल पूछने, उनके कार्यों पर टिप्पणी करने और उनके ग़लत कार्यों की निंदा करने का अधिकार है और यह अधिकार बरक़रार रहना चाहिए, ताकि लोगों में सरकारों की निरंकुशता और नाकारापन के ख़िलाफ़ साहस बना रहे और सरकारों में आम लोगों का डर सदैव बना रह सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

बहाल होगी धारा-370 या मिलेगा पूर्ण राज्य?

जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार 

सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर में धारा-370 हटाकर इसके पूर्ण राज्य का दर्जा ख़त्म करने के केंद्र सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर 16 दिन चली सुनवाई के बाद अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है। सबकी निगाह इस बड़े फ़ैसले पर होगी, क्योंकि सर्वोच्च अदालत में इन याचिकाओं की सुनवाई काफी विस्तार से हुई और सभी पक्षों ने अपनी बात रखी। क्या जम्मू-कश्मीर में धारा-370 बहाल होगी या इसका पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा? इसका सबको बेसब्री से इंतज़ार है। जो भी फ़ैसला होगा, निश्चित ही उसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव होंगे।

इस मामले पर सर्वोच्च अदालत की प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने सुनवाई की, जिसके अन्य सदस्य न्यायमूर्ति किशन कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत हैं। संविधान पीठ ने 16 दिन तक दोनों पक्षों की गहन जिरह सुनी और 5 सितंबर को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने संवैधानिक पहलुओं से लेकर ऐतिहासिक घटनाक्रम पर तर्क रखे। एक मौके पर तो अदालत ने इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता कश्मीर के नेता मोहम्मद अकबर लोन से यह कहकर हलफ़नामा माँग लिया कि क्या वह जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं ?

जम्मू-कश्मीर का यह मामला काफी पेचीदा है। इसे सिर्फ़ क़ानून और राजनीति के छोटे दायरे में रखकर सीमित नहीं किया जा सकता। दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक और राजनीतिक स्थिति में भारत के लिए जम्मू-कश्मीर का बहुत गहरा मतलब है, चाहे वह सामरिक हो या भौगोलिक। धार्मिक पहचान के कारण भी राज्य को भारत के साथ मज़बूती से जोड़े रखने के लिए जम्मू-कश्मीर का मामला संवेदनशील है; क्योंकि पड़ोसी देश पाकिस्तान इसी आधार पर वहाँ आतंकी गतिविधियाँ चलाता रहा है। जम्मू-कश्मीर को धारा-370 हटने से पहले विशेष दर्जा हासिल था और इसे ख़त्म करने का समर्थन राज्य के राजनीतिक दलों ने ही नहीं, आम जनता ने भी नहीं किया था। जब मोदी सरकार इससे जुड़ा बिल संसद में लायी थी, तब जम्मू-कश्मीर की विधानसभा भी चलन में नहीं थी।

आज़ादी के बाद के तमाम वर्षों को देखें, तो जम्मू-कश्मीर के लोग दृढ़ता से भारत के साथ खड़े रहे हैं। चाहे वह सन् 1962 का चीन के साथ युद्ध हो, सन् 1965 और सन् 1971 के पाकिस्तान के साथ युद्ध हों या सन् 1999 का कारगिल युद्ध। यही कारण है कि कई जानकार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि कश्मीर को देश के राजनीतिक दलों को महज़ अपनी राजनीति का औज़ार मात्र नहीं समझना चाहिए। जहाँ समर्थक मोदी सरकार के जम्मू-कश्मीर में धारा-370 और पूर्ण राज्य का दर्जा ख़त्म करने का ज़ोरदार समर्थन करते हैं, वहीं ऐसे लोगों और बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है, जो यह मानते हैं कि इस मसले को समझदारी से ही सुलझाया जाना चाहिए और इसका पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल कर वहाँ चुनाव होने चाहिए, ताकि जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिल सके।

क्यों अहम होगा फ़ैसला?

सर्वोच्च अदालत का क्या फ़ैसला आएगा? इस पर टिप्पणी नहीं की जा सकती है। संविधान पीठ ने तमाम तर्क सुने हैं और देश के आम लोगों से लेकर राजनीतिक दलों और जम्मू-कश्मीर की जनता को भी इसका इंतज़ार है। लेकिन यह साफ़ है कि यह फ़ैसला का$फी अहम होगा। अनुच्छेद-370 ख़त्म करने के मोदी सरकार के फ़ैसले पर सर्वोच्च अदालत की पाँच जजों की संविधान पीठ की मुहर लगती है, तो वह निश्चित ही चुनावों में भी भुनाएगी। राज्य में चुनाव को लेकर ज़रूर केंद्र सरकार का रवैया ढीला-ढाला रहा है।

जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों के अलावा देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस राज्य का दर्जा बहाल करने और वहाँ जल्दी चुनाव की जबरदस्त समर्थक रही है। राज्य में राजनीतिक गतिविधियाँ पिछले चार साल से लगभग ख़त्म हैं और जनता के पास कोई चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं है, जिसके पास वह अपनी समस्या ले जा सके। उप राज्यपाल हैं और अफ़सरशाही भी, लेकिन जनता का उन तक पहुँचना मुश्किल होने के कारण उसे दिक़्क़त झेलनी पड़ती है। यह स्थानीय प्रतिनिधियों के अलावा और कोई नहीं कर सकता। कश्मीर ही नहीं, हिन्दू बहुल जम्मू के लोग भी राज्य का दर्जा ख़त्म होने से नाराज़ दिखते हैं। कठुआ के बिलावर में नरेश खजुरिया ने हमसे बातचीत में कहा- ‘धारा-370 ख़त्म की तो की; लेकिन हमारा राज्य का दर्जा ख़त्म नहीं होना चाहिए था। चार साल हो गये इलेक्शन नहीं हुआ। हम किसे अपनी समस्याएँ बताएँ?’

जम्मू में कुलदीप जम्वाल ने हमसे बातचीत अनुच्छेद-370 ख़त्म करने का पूरा समर्थन किया; लेकिन राज्य का दर्जा ख़त्म करने का विरोध। उधर राहुल दासगोत्रा ने कहा- ‘बेमतलब की राजनीति करती है बीजेपी। आप जनता को हमेशा सेना के पहरे में नहीं रख सकते। इस (370 ख़त्म और राज्य दर्जा ख़त्म करने) का अच्छा नतीजा नहीं निकलेगा। सुप्रीम कोर्ट को दोनों ही बहाल कर देने चाहिए।’

राज्य के आम लोग इससे बहुत आहत रहे हैं कि उनका विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म करने के साथ ही पूर्ण राज्य का दर्जा भी छीन लिया गया। इसे वे किसी भी सूरत में सही नहीं मानते। दुकान चलाने वाले श्रीनगर के बादाम बाड़ी के अब्दुल्ल रसूल ने कहा- ‘आप (केंद्र सरकार) कहते हैं कि कश्मीर देश का ताज है। क्या आप सिर्फ़ कश्मीर की ज़मीन को अपना ताज मानते हैं या यहाँ की आवाम को भी? जो भी फ़ैसले हुए, वो अच्छे नहीं हुए। यहाँ की आवाम इससे ख़ुश नहीं; क्योंकि उन्हें आइसोलेट करके यह सब किया गया। हम उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सूबे की आवाम से इंसाफ़ करेगा।’

हालाँकि निशात बाग़ के पास मोहम्मद अज़ीज़ बेग ने कहा- ‘370 ख़त्म करना कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन उनके मुताबिक, देश को कश्मीर के लोगों और यहाँ की ज़रूरतों को समझना चाहिए। हमने इतने साल तक मिलिटेंसी झेली है। मुस्लिम ही सबसे ज़्यादा मरा है। हमारी आवाम को इंसान समझकर ट्रीट करना चाहिए। इलेक्शन होना चाहिए और वो सब कुछ मिलना चाहिए, जो दूसरे सूबों को मिलता है।’

कब, क्या हुआ?

मोदी सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को संसद ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद-370 के तहत मिला विशेष दर्जा ख़त्म करने का प्रस्ताव पास किया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर के कई बड़े नेताओं को एनएसए के तहत नज़रबन्द कर दिया गया था। मोदी सरकार ने साथ ही राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ में बाँट दिया था। इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में 20 याचिकाओं के ज़रिये चुनौती दी गयी है।

इस मामले पर प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 16 दिन सुनवाई की और फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। मामले के पहले दो याचिकाकर्ताओं शाह फ़ैसल और शेहला रशीद ने सुनवाई से पहले ही याचिकाएँ वापस ले ली थीं।

सुनवाई में उठे मुद्दे

मुख्य याचिकाकर्ता लोन की तरफ़ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए; जबकि उनके अलावा राजीव धवन, गोपाल सुब्रमण्यम, ज़फ़र शाह जैसे कई वरिष्ठ वकीलों ने अनुच्छेद-370 को बेअसर करने का फ़ैसला ख़ारिज करने की माँग की। इन वकीलों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय विशेष परिस्थितियों में हुआ था, लिहाज़ा उसे विशेष दर्जा मिला था। उनके मुताबिक, राज्य की एक अलग संविधान सभा थी, जिसका काम सन् 1957 में पूरा हो गया। भारत के संविधान से अनुच्छेद-370 हटाने का फ़ैसला जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सहमति से ही हो सकता था। लिहाज़ा संसद का फ़ैसला क़ानूनन ग़लत है।

उधर सरकार के समर्थन में वकीलों ने अपना पक्ष रखा। केंद्र सरकार की तरफ़ से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमनी और सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने जिरह की। इसके अलावा कई संगठनों ने भी केंद्र के फ़ैसले के समर्थन में पक्ष रखा, जिनके लिए हरीश साल्वे, राकेश द्विवेदी और महेश जेठमलानी जैसे कई बड़े वकील पेश हुए। केंद्र ने कोर्ट को बताया कि अनुच्छेद-370 को बेअसर करने का फ़ैसला राष्ट्रहित के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए किया गया था।

अटॉर्नी जनरल ने राष्ट्र की अखंडता के पहलू पर ज़ोर दिया और बताया कि पुरानी व्यवस्था में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-35(ए) भी लागू था, जिसके चलते राज्य में बसे लोगों की एक बड़ी संख्या को दूसरे नागरिकों जैसे अधिकार नहीं थे। वह सम्पत्ति नहीं ख़रीद सकते थे। मतदान नहीं कर सकते थे। और अब वे लोग सबके बराबर हो गये हैं।

डेटा सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ले सरकार

भारतीयों की निजी जानकारी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है; लेकिन इसके बावजूद भारतीयों की गोपनीय जानकारी सुरक्षित नहीं है। रिपोट्र्स के मुताबिक, क़रीब-क़रीब हर साल कहीं-न-कहीं भारतीयों का डेटा चोरी होता है। देश के 140 करोड़ से ज़्यादा लोगों के लिए डेटा संरक्षण क़ानून तो है; लेकिन इस क़ानून का मखौल भी सरकार ही उड़ाती है। यूरोपीय संघ (ईयू) में डेटा संरक्षण क़ानून पाँच साल पहले ही लागू हो चुका है। इस क़ानून का नाम जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर)- 2018 है। यह दुनिया का सबसे मज़बूत डेटा सुरक्षा क़ानून माना जाता है। हालाँकि इंटरनेट ने इस क़ानून के सामने भी डेटा चोरी की संभावनाएँ और चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। लेकिन केंद्र सरकार की लापरवाही के चलते भारतीयों की गोपनीयता में सेंध लगाना हैकर्स के लिए काफ़ी आसान है।

केंद्र सरकार को बीते मानसून सत्र (20 जुलाई-11 अगस्त) के दौरान संसद में भारतीयों की गोपनीयता की सुरक्षा के लिए नये डेटा संरक्षण क़ानून को लाना चाहिए था; लेकिन सरकार ने पूरे सत्र में अपने बचाव और फ़ायदे वाले क़ानूनों को बनाने और अपने लिए ख़तरा बने हुए क़ानूनों को ख़त्म करने में ही पूरा समय जाया कर दिया। अभी तक के भारतीयों के डेटा चोरी के आँकड़े चौंकाने वाले हैं। दुनिया भर में होने वाले साइबर अटैक्स पर नज़र रखने वाली वेबसाइट सीएसओ ऑनलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक- जनवरी, 2018 में आधार कार्ड का डेटा लीक हुआ। जनवरी, 2019 स्टेट बैंक आफ इंडिया (एसबीआई) के खाता धारकों का डेटा लीक हो गया। अगस्त, 2019 में 68 लाख मरीज़ों का डेटा लीक हो गया। सन् 2019 में भी कैट की साइट से डेटा लीक हो गया। मई, 2020 में एडुटेक प्लेटफॉर्म अनएकेडमी के 2.20 करोड़ उपभोक्ताओं का डेटा लीक हो गया। अक्टूबर, 2020 में ऑनलाइन ग्रासरी डिलीवरी करने वाले प्लेटफॉर्म बिगबास्केट की साइट से डेटा लीक हो गया। फरवरी, 2021 में पुलिस की साइट से ही पुलिस भर्ती में भाग लेने वाले क़रीब 5,00,000 अभ्यार्थियों के साथ-साथ पुलिस अधिकारियों का भी डेटा लीक हो गया। मई, 2021 में एयर इंडिया के 45 लाख ग्राहकों का डेटा लीक हो गया। मई, 2021 में ही आईआईएम में एडमिशन के लिए एंट्रेस परीक्षा कैट की साइट से 1.90 लाख छात्रों का डेटा लीक हो गया। जून, 2021 में एयर इंडिया के पास रखा यात्रियों का डेटा लीक हो गया। जनवरी, 2022 में कोरोना मरीज़ों का डेटा लीक हो गया। नवंबर, 2022 में एम्स से चार करोड़ मरीज़ों का डेटा चोरी हो गया। और जून, 2023 में कोविन ऐप पर मौज़ूद डेटा लीक हो गया। डेटा लीक साइबर क्राइम का बड़ा हथियार बनते जा रहा है। हेल्थ-फाइनेंस सेक्टर से जुड़े डेटा सबसे ज़्यादा चोरी हो रहे हैं। साइबर एक्सपट्र्स का मानना है कि संस्थानों की लापरवाही और कुछ लोगों के लालच में लोग शिकार हो रहे हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर दिन 23,716 लोगों का डेटा लीक होता है। इस हिसाब से एक महीने में 7,11,480 लोगों का डेटा चोरी होता है। डेटा लीक की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल यानी 2023 की पहली तिमाही में 21,34,491 लोगों का डेटी लीक हुआ था। इसके बाद की कोई जानकारी अभी तक मौज़ूद नहीं है। अगर इसी रफ़्तार से डेटा चोरी हो रहा है, तो अनुमानित तौर पर यह माना जा सकता है कि इस साल की दूसरी तिमाही में भी क़रीब इतना ही डेटा लीक हो चुका होगा। डेटा एक्सपर्ट के मुताबिक, भारत में डेटा चोरी का सिलसिला थम नहीं रहा है। सवाल यह है कि केंद्र सरकार इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी के प्रति इतनी लापरवाह है या फिर वो देश के नागरिकों की गोपनीय जानकारी को गोपनीय नहीं रख पा रही है?

पिछले साल के अन्त में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परामर्श के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) विधेयक-2022 पास किया। केंद्र सरकार की तरफ़ से डेटा सुरक्षा क़ानून का यह मसौदा तैयार किया गया था; लेकिन अभी तक यह ज़िम्मेदारी किसी पर नहीं डाली गयी है। केंद्र सरकार के पास यह बहाना है कि सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन उपलब्ध डेटा की सुरक्षा करना आसान नहीं है। लेकिन इस तरह की बहानेबाज़ी से केंद्र सरकार बच नहीं सकती। हालाँकि लोगों की डेटा सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार को तो है ही, इसके साथ-साथ यह ज़िम्मेदारी उन संस्थानों की भी होनी चाहिए, जिनके यहाँ से डेटा चोरी होता है। रिपोट्र्स के मुताबिक, डेटा सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार के अब तक के विधेयक क़रीब-क़रीब समान हैं, जिनमें गम्भीर $खामियाँ हैं। वहीं जिन कम्पनियों और सरकारी संस्थानों के पास लोगों के डाक्यूमेंट्स रहते हैं, उनके सॉफ्टवेयर काफ़ी सस्ते और कमज़ोर हैं, जिन्हें हैकर आसानी से हैक कर लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस ओर केंद्र सरकार का कई बार ध्यान खींचा है और साफ़-साफ़ कहा है कि देश के नागरिकों की गोपनीय जानकारी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत साइबर अपराधियों का नया अड्डा बन रहा है, जिसकी मुख्य वजह देश में तेज़ी से आ रही डिजिटल क्रान्ति है। प्रधानमंत्री मोदी के डिजिटल इंडिया करने की बात कहने के बाद देश में जिस तरह से देश के डिजिटलाइज्ड होने में तेज़ी आयी है, उससे क़रीब-क़रीब देश के हर नागरिक की जानकारी इंटरनेट पर मौज़ूद है। टेक रिसर्च फर्म ट्रेंड माइक्रो की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पिछले साल डेटा चोरी, ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर फ्रॉड के मामलों की अपेक्षा क़रीब 7,00,000 से ज़्यादा मामले इस साल सामने आये हैं। विपक्षी दल तो यहाँ तक आरोप लगा चुके हैं कि देश के नागरिकों का डेटा बेचा जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी संस्थानों के अलावा बैंकों, स्वास्थ्य विभागों, इंश्योरेंस, फाइनांस, मैनुफेक्चरिंग, ऑनलाइन शॉपिंग और टेक्नोलॉजी क्षेत्रों की कम्पनियों से सबसे ज़्यादा डेटा चोरी हुआ है।

सीबीआई और पुलिस देश में दर्ज़नों हैकर्स को ऑनलाइन धोखाधड़ी, डेटा चोरी और हैकिंग के दूसरे मामलों हर साल गिरफ़्तार करती है; लेकिन साइबर क्राइम के बढ़ते आँकड़े बताते हैं कि केंद्र की इतनी तत्परता नाकाफ़ी है। पूरी तरह से ऑनलाइन धोखाधड़ी को ख़त्म करना है, तो हैकर्स को गिरफ़्तार करने में तेज़ी लानी। जिन दस्तेवेज़ों के ज़रिये लोगों की गोपनीय जानकारी चोरी होती है, उसमें पैन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर आईडीकार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, नंबर, डी-मैट बैंक अकाउंट आदि मुख्य हैं। पिछले दिनों भारत में में सबसे बड़ा डेटा चोरी मामला साइबराबाद पुलिस ने पकड़ा। पुलिस के मुताबिक, उसने फ़रीदाबाद से चल रहे एक ऐसे कार्टेल साइबर गैंग का ख़ुलासा किया, जिसने क़रीब 70 करोड़ लोगों का डेटा बेचने की तैयारी कर ली थी। ये डेटा 24 राज्यों और आठ महानगरों के निवासियों का था।

डेटा चोरी में फिशिंग हैकिंग का सबसे चर्चित और कॉमन तरीक़ा माना जाता है। फिशिंग के ज़रिये साइबर क्रिमिनल्स लोगों की गोपनीय जानकारियों को चुराकर उन कम्पनियों को बेचते हैं, जो लोगों के डेटा का दुरुपयोग करने का काम करती हैं।

केंद्र सरकार ख़ुद स्वीकार करती है कि डेटा चोरी करना जीने के अधिकार के ख़िलाफ़ है। क़ानूनी तौर पर टेलीकॉम कम्पनियाँ, सोशल नेटवर्किंग कम्पनियाँ या अन्य संस्थान किसी उपभोक्ता का डेटा या उसकी निजी जानकारी किसी भी हाल में तीसरे व्यक्ति या संस्था के साथ शेयर नहीं कर सकतीं, जब तक कि तीसरा व्यक्ति या संस्था इसके लिए योग्यता नहीं रखता हो। सामरिक चिन्ता के राजनीतिक, आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा मुद्दों की देख-रेख करने वाली संस्था भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् ने भी डेटा चोरी की समस्या को गम्भीर बताया है। लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार ने इस दिशा में अभी तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाया है। न ही केंद्र सरकार ने इसके लिए कोई बजट पास किया है। केंद्र सरकार ने जो विधेयक डेटा सुरक्षा के लिए तैयार किया है, उसमें नियमों के उल्लंघन की हर एक घटना के लिए संस्थानों पर 250 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान तो किया है, लेकिन डेटा सुरक्षा की मज़बूती को उतनी प्राथमिकता नहीं दी है। जबकि दुनिया में के कई देश डेटा चोरी की सुरक्षा के लिए मोटा पैसा ख़र्च कर रहे हैं, जिससे उनके नागरिकों की गोपनीय जानकारी लीक न हो सके।

पालो ऑल्टो नेटवक्र्स की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, हैकरों के लिए सबसे लाभदायक काम डेटा चोरी है, जिसके लिए भारत मुफ़ीद है। भारत के संस्थानों में रैंसमवेयर (उपभोक्ता या किसी संस्थान पर ऑनलाइन अटैक) में 218 प्रतिशत की बढ़ोतरी इसी का नतीजा है। इसलिए केंद्र सरकार को बेहतर साइबर मज़बूती की ज़रूरत है। इसके साथ ही साइबर क्रिमिनलों के लिए सज़ा बढ़ाने की भी ज़रूरत है। आईटी अधिनियम की धारा-79(ए) को मज़बूत करते हुए केंद्र सरकार को डिजिटल साक्ष्यों से सम्बन्धित राय प्रदान करने वाले केंद्रों को बढ़ाने के साथ-साथ साइबर अपराधों से निपटने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना करने और साइबर अपराधियों से निपटने के लिए पाँच साल का रोडमैप तैयार करने की ज़रूरत है।

अच्छी नहीं है महिला क़ैदियों की दशा

आधी आबादी यानी महिलाओं की स्थिति पर गाहे-ब-गाहे चर्चा होती रहती है; लेकिन क्या जेलों में बन्द महिलाओं के हालात पर नेता व समाज अक्सर अपनी चिन्ता ज़ाहिर करता नज़र आता है। दुर्भाग्य से जबाव नहीं में ही बनता है। बहरहाल इन दिनों देश की सर्वोच्च न्यायालय भारत भर की जेलों में व्याप्त कथित अमानवीय स्थितियों से सम्बन्धित मामले की सुनवाई कर रहा है।

ग़ौरतलब है कि देश में जेलों में सुधार और महिला क़ैदियों को बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए कई समितियों का गठन किया गया; लेकिन उनकी सिफ़ारिशों पर अमल पूरी शिद्दत से नहीं किया गया। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर, 2018 में देश भर में जेल सुधारों पर ग़ौर करने और निगरानी के उपाय सुझाने के लिए अपने पूर्व न्यायमूर्ति अमिताव रॉय की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। जिस समय सर्वोच्च न्यायालय ने यह समिति गठन करने का आदेश दिया था, उस समय सर्वोच्च न्यायालय देश भर की 1,381 जेलों में अमानवीय स्थितियों से सम्बन्धित मामले की सुनवाई कर रही थी। इस न्यायालय ने देश भर की जेलों में क़ैदियों की भीड़ पर आपत्ति जतायी थी और कहा था कि क़ैदियों के भी मानवाधिकार हैं और उन्हें जानवर की तरह नहीं रखा जा सकता।

न्यायालय ने न्यायमूर्ति अमिताव रॉय समिति को जेलों में भीड़भाड़ और महिला क़ैदियों से सम्बन्धित मुद्दों सहित विभिन्न मामलों पर ग़ौर करने को कहा था। भारत में जेल सुधारों पर गठित सर्वोच्च न्यायालय की इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दी है। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश भर की जेलों में रहने की व्यवस्था दयनीय है। यह भी कहा है कि जेलों में रहने की स्थिति मॉडल जेल मैनुअल-2016 के तहत परिकल्पित स्थिातियों जैसी नहीं है। इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि जेलों में भीड़भाड़ की समस्या के हल के लिए त्वरित सुनवाई एक प्रभावी उपकरण बन सकती है।

ग़ौर करने वाली बात इस रिपोर्ट में यह भी है कि जेलों में 75 फ़ीसदी महिला वार्डों को पुरुष वार्डों के साथ रसोई और सामान्य सुविधाएँ साझा करनी पड़ती हैं। जेल सुधार समिति की इस रिपोर्ट के अनुसार, महिला क़ैदियों को विशेष तौर पर चिकित्सा देखभाल, क़ानूनी सहायता और परामर्श से लेकर सवैतानिक श्रम और मनोरंजक सुविधाओं जैसी बुनियादी ज़रूरतों तक पहुँच बनाने के लिए अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में कहीं अधिक बदतर स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विशेष महिला जेल में मिलने वाली सुविधाओं के विपरीत बड़ी जेलों में क़ैद महिलाओं को इन बुनियादी सुविधाओं को देने से इनकार कर दिया जाता है। इस रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि देश की सुधारात्मक न्याय प्रणाली स्पष्ट रूप से लिंग भेदभावकारी है। आँकड़े भी महिला क़ैदियों के हालात के बारे में बहुत कुछ बयाँ करते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार देश में विशेष महिला जेलों की संख्या-32 है। ऐसी जेलों में सिर्फ़ महिला क़ैदी ही होती हैं और अधिकांश स्टाफ भी महिलाओं का होता है। एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 के अन्त तक देश के सिर्फ़ 15 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में ख़ासतौर पर महिलाओं के लिए 32 जेल हैं। राजस्थान, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, गुजरात, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मिजोरम, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तेलगांना इस सूची में आते हैं। इन जेलों की कुल क्षमता 6,767 क़ैदियों की हैं; लेकिन 2021 के अन्त तक इन जेलों में महिला क़ैदियों की तादाद 22,918 थी।

हैरत होती है कि देश के 21 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में कोई अलग महिला जेल नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित जेल सुधार समिति की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 40 फ़ीसदी से कम जेलें ही ऐसी हैं, जो महिला क़ैदियों को सैनिटरी पैड मुहैया कराती हैं। यह जानकारी इस लिए भी हैरत मे डालती है और परेशान भी करती है; क्योंकि देश में लड़कियों / महिलाओं को माहमारी के दौरान अतिरिक्त रूप से स्वच्छता बरतने वाले परामर्श पर अमल करने के वास्ते अभियान चलाया जा रहा है।

कई राज्यों में स्कूली लड़कियों को स्कूलों में क़िफ़ायती दाम पर सेनिटरी पैड मुहैया कराये जाते हैं। और महिला के प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए ऐसी सुविधा मुहैया कराना सरकारों का काम है। महिला क़ैदियों को भी यह सुविधा मिलनी चाहिए पर राज्य सरकारों, महिला व बाल विकास और स्वास्थ्य मंत्रालय को इसकी सुध क्यों नहीं है? इसे एक निजी ज़रूरत कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक महिला की ज़िन्दगी में इसके महत्त्व को दर्शाने वाली पैडमैन फ़िल्म भी बनी, जिसमें नायक की भूमिका में अक्षय कुमार थे। इस रिपोर्ट में यह भी ख़ुलासा किया गया है कि सिर्फ़ गोवा, दिल्ली और पुदुचेरी की जेलें ही महिला क़ैदियों को अपने बच्चों से सलाखों या काँच की दीवार के बिना मिलने की इजाज़त देती हैं।

एनसीआररबी की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 के अन्त तक 31 महिला जेलों में बन्द 22,918 क़ैदियों में से 1,650 महिला क़ैदियों के साथ जेल परिसर में उनके बच्चे भी थे। इनमें से विचाराधीन महिला क़ैदियों की संख्या 1,418 थी और उनके पास 1,601 बच्चे थे। अब बच्चों के बारे में मॉडल जेल मैनुअल क्या कहता है? इस बाबत गृह मंत्रालय द्वारा जारी मॉडल जेल मैनुअल-2016 के अनुसार, छ: साल तक के बच्चे को उसकी माँ के साथ जेल में रखा जा सकता है; अगर बच्चे को रखने की कोई और व्यवस्था नहीं है, तो। मैनुअल में यह भी कहा गया है कि अगर बच्चा छ: साल का हो गया है, तो उसे जेल में प्रवेश नहीं दिया जाएगा या जेल में नहीं रखा जाएगा।

यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि बेक़सूर बच्चों का जेल में रहना और ग़रीबी दोनों ही स्थितियाँ किसी भी सूरत में बच्चों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं हो सकतीं। इसका उनके स्वास्थ्य व विकास पर प्रतिकूल असर ही पड़ता होगा। सर्वोच्च न्यायालय के वकील राजेश त्यागी देश में महिला क़ैदियों के हालात को लेकर कहते हैं कि ‘सरकार दिल्ली की तिहाड़ जेल को आदर्श जेल के तौर पर प्रस्तुत करती है। लेकिन जेल तो जेल ही होती है। बैरक तो बैरक ही होती है। देश की जेलों में बन्द अधिकतर महिला क़ैदियों की आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि बताती हैं कि वे ग़रीब, निम्न आय वर्ग से ताल्लुक़ रखती हैं। उसके परिवारजनों के पास प्रभावशाली वकील करने के लिए पैसा नहीं होता और एक समय के बाद परिवार भी उनसे किनारा करने लगता है। यह दयनीय है। ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन परिवार भी यह सोचता है कि इस पर जो आरोप लगा है, उससे समाज में उनकी हैसियत को ठेस पहुँची है। अगर वह जेल से बाहर आ भी गयी, तो कौन समाज को सच व झूठ में $फ$र्क समझाएगा। क्या समाज इसके लिए तैयार दिखता है?’

सन् 2014 से सन् 2019 के दरमियान भारतीय जेलों में महिला क़ैदियों की आबादी में 11.7 फ़ीसदी की बढ़ोतरी देखी गयी। महिला क़ैदियों को लेकर यह तथ्य भी चिन्ता पैदा करता है कि कई जेलों में विचाराधीन व सज़ायाफ़्ता महिला क़ैदियों को एक ही वार्ड में रखा जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लिंग विशिष्ट प्रशिक्षण की भी कमी है और मैट्रन यानी महिला क़ैदियों की इंचार्ज को यह नहीं बताया जाता कि महिलाओं की तलाशी कैसे ली जाए?

इस रिपोर्ट के अनुसार, महिला क़ैदियों के लिए अलग चिकित्सा और मनोरोग वार्डों की कमी, बच्चे की डिलीवरी के लिए बुनियादी न्यूनतम सुविधाओं का न होना, महिला क़ैदियों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों की कमी चिकित्सा मोर्चे पर प्रमुख चुनौतियाँ हैं। 19 राज्यों व छ: केंद्र शासित राज्यों की जेलों में महिला क़ैदियों के लिए मनोरोग वार्डों की कमी है। समिति ने क़ैदियों के लिए दूरस्थ निदान और वर्चुअल परामर्श जेसे टेली मेडिसन सुविधा शुरू करने की सिफ़ारिश की है। यह कड़वा सच है कि महिला क़ैदी मानसिक तौर पर जेल में परेशान रहती हैं। अपनों से, विशेष तौर पर बच्चों से दूर रहने के चलते वे तनावग्रस्त हो जाती हैं।

अक्सर उन पर तनाव, चिन्ता इस क़दर हावी हो जाती है कि वे जेल की ज़िन्दगी के साथ तालमेल नहीं बिठा पातीं और सारा दिन सोचती रहती हैं। अधिकांश महिलाएँ कुंठा व अवसाद से घिर जाती हैं। इसका असर उनके स्वास्थ्य पर साफ़ दिखने लगता है। इसके साथ जेलों में मनोरोग वार्डों व डॉक्टरों की कमी इस समस्या को बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। अब देखना यह है कि सरकारें महिला क़ैदियों की समस्याओं को दूर करने के लिए कब और क्या क़दम उठाती हैं? समाज में महिला क़ैदियों के रेखाचित्र यानी प्रोफाइल को एक अलग तरह से पेश करने की रवायत देखने को मिलती है, जो कि पुरुषों से अलग है। यहाँ पर भी समाज अक्सर पुरुष क़ैदी को रियायत देता हुआ नज़र आता है। महिला क़ैदी गुमनामी की क़ैदी हैं।

लद्दाख़ पर चीन की नज़र!

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी अपनी ही केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में मुक़दमा दायर करेंगे। सुब्रमण्यम स्वामी यह मुक़दमा चीन द्वारा लद्दाख़ की ज़मीन हड़प लेने को लेकर करेंगे, क्योंकि केंद्र सरकार इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया है कि चीन ने भारत की लद्दाख़ में 4,067 वर्ग किलोमीटर ज़मीन हड़प लिया है। स्वामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स लिखा है कि मोदी सरकार चीन पर सच्चाई बताए, नहीं तो इसके लिए वो अदालत का सहारा लेंगे। स्वामी के इस पोस्ट से लद्दाख़ में चीन के घुसने की ख़बर पूरी दुनिया में फैल गयी है; भले ही मुख्य मीडिया इसे कवरेज नहीं दे रहा है।

विदित हो बीते तीन वर्षों से भारत और चीन के सैनिकों में पूर्वी लद्दाख़ में एलएसी पर तनाव और झड़पें होती रही हैं। अतिक्रमणवादी चीन ने लगातार एलएसी के समझौतों का उल्लंघन किया है और कभी लद्दाख़, कभी अरुणाचल प्रदेश, तो कभी गलवान घाटी में अतिक्रमण करता रहा है। चीनी सैनिक कई बार एलएसी पार करके भारत की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की कोशिशें कर चुके हैं, उनकी यह कोशिश अभी भी जारी है। चीन की इन हरकतों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि चीनी सैनिक भारत की सीमा में नहीं आये थे। परन्तु स्वामी ने इस पर सवाल उठा दिये।

असल में यह विवाद कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के लद्दाख़ दौरे के दौरान वहाँ के लोगों से बातचीत के बाद आये बयान पर शुरू हुआ। राहुल गाँधी ने कहा कि लद्दाख़ के लोगों की बहुत सारी शिकायतें हैं। वे उस दर्जे से ख़ुश नहीं हैं, जो उन्हें दिया गया है। कांग्रेस नेता ने कहा कि लद्दाख़ के लोग प्रतिनिधित्व चाहते हैं और बेरोज़गारी की समस्या है। यहाँ के लोग कह रहे हैं कि राज्य को नौकरशाही द्वारा नहीं चलाया जाना चाहिए, परन्तु राज्य जनता की आवाज़ से चलना चाहिए। राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि वह अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान ही लद्दाख़ जाना चाहते थे, परन्तु उन्हें वहाँ नहीं जाने दिया गया। ऐसे में उन्होंने सोचा की लद्दाख़ का विस्तृत दौरा किया जाए। राहुल ने कहा कि वह पैंगोंग गये, लेह गये और अब आगे कारगिल भी जाएँगे। जो जनता के दिल की बात है, उसे सुनेंगे।

वहीं पूर्वी लद्दाख़ के चुशुल से पार्षद कोंचोक स्टेन्जिन ने कहा है कि चीन की सेना द्वारा पूर्वी लद्दाख़ के गुरुंग हिल्स में टेबल टॉप इलाक़े के चुशुल के बफर ज़ोन में चार टेंट लगाने की ख़बर है। ये चिन्ता की बात है। ये डिसएंगेजमेंट एग्रीमेंट का उल्लंघन है। हालाँकि गाँव वालों ने बताया कि भारतीय सेना के विरोध के बाद टेंटों को चीनी सैनिकों को हटाना पड़ा। सवाल यह है कि अगर चीनी सेना को चार टैंट हटाने भी पड़े, तो चार टैंट लगे ही कितनी जगह में होंगे? असल में सुब्रमण्यम स्वामी जो दावा कर रहे हैं, उसके अनुसार तो पूर्वी लद्दाख़ में चीनी सैनिक 4,067 वर्ग किलोमीटर ज़मीन क़ब्ज़ाये बैठे हैं। क्या इस पर केंद्र सरकार ग़ौर करेगी? दूसरा बड़ा सवाल यह है कि सरकार चीन की हर घुसपैठ को नकारती क्यों जा रही है? जबकि कई बार सेटेलाइट से तस्वीरें और वीडियो सामने आ चुके हैं कि चीन ने भारत की हज़ारों वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। एक गाँव बसा लिया है और कई चेक पोस्ट, कई सडक़ें, कई सैन्य अड्डे, हैलिपैड बनाये हैं। इसके अलावा कई जगहों के नाम भी बदल दिये हैं।

इसी साल जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल और देश के लगभग 350 शीर्ष पुलिस अधिकारियों के तीन दिवसीय वार्षिक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में पुलिस महानिदेशकों और पुलिस महानिरीक्षकों ने एक दस्तावेज़ में दावा किया कि भारत के इस क्षेत्र में चीन आर्थिक और रणनीतिक गतिविधियाँ चलाना चाहता है, जिसके चलते चीन आक्रामक तरीक़े से इस क्षेत्र में अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को बढ़ाता जा रहा है, जिससे वो भारत की अधिक से अधिक ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर सके। ये दस्तावेज़ भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की ओर से तैयार किये गये हैं।

दस्तावेज़ में कहा गया है कि भविष्य के लिए देश की सीमा रक्षा की रणनीति को आर्थिक प्रोत्साहन के साथ एक नया अर्थ और उद्देश्य दिया जाना चाहिए। रणनीति क्षेत्र-विशिष्ट बनायी जानी चाहिए। दस्तावेज़ में लद्दाख़ के कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सैन्य सुरक्षा बढ़ाने की बात कही गयी है और यह भी कहा गया है कि लद्दाख़ की पूर्वी सीमा क्षेत्र में चीन आक्रामक रूप से अपनी सेना तैनात कर रहा है, जिससे वो भारत के ग़ैर-बाड़बंदी वाले क्षेत्रों पर दावा जताने के लिए दबदबा क़ायम कर सके। दस्तावेज़ में डेमचोक में छोटा कैलाश पर्वत को पूजा-अर्चना करने के लिए खोलने की सलाह दी गयी है। दस्तावेज़ में कहा गया है कि इससे धर्मपरायण हिन्दू वहाँ आने-जाने लगेंगे और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने से मानसरोवर न पहुँच पाने वाले हिन्दू यहाँ पहुँचेगे, जिससे चीनी सैनिकों का मनोबल कमज़ोर होगा।

इससे पहले भारत और चीन के बीच एलएसी पर चल रहे विवाद को लेकर भारत और चीन के कोर कमांडर के बीच 13 और 14 अगस्त को चुशूल-मोल्डो सीमा पर दो दिवसीय बैठक हुई। परन्तु लगभग 17 घंटे की बातचीत का कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला। इसकी वजह चीनी सैनिकों की हेकड़ी रही, जो अपनी घुसपैठ ग़लतियों और भारत के क्षेत्रों पर क़ब्ज़े की बात मानने को तैयार नहीं हुए। हालाँकि बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि बातचीत सकारात्मक रही, बाक़ी मुद्दों को सैन्य और राजनयिक माध्यमों से जल्द सुलझाया जाएगा।

सन् 2020 के अप्रैल-मई महीने में चीनी सेना पीएलए पूर्वी लद्दाख़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यायाम के बहाने जमा हुए थे। भारत सरकार के इस छोटी-सी घटना को अनदेखा करने से बाद में कई जगहों पर चीनी सैनिकों ने घुसपैठ की कोशिश की। चीन की घुसपैठ को देखते हुए भारतीय सेना को बड़ी संख्या में संवेदनशील क्षेत्रों में सैनिक तैनात करने पड़े। हालात इतने बिगड़े कि चार दशक से अधिक समय बाद चीनी सैनिकों ने गोलीबारी कर दी, जिसके बाद भारतीय सैनिकों को भी जवाब देना पड़ा। इसके बाद 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सेना ने भारत की गलवान घाटी में क़ब्ज़ा करने की कोशिश की, जिसमें हुए ख़ूनी संघर्ष में भारत के 20 सैनिक शहीद हो गए। इस समय भारतीय सैनिक निहत्थे थे, जबकि चीनी सैनिकों के पास हथियार थे।

उसी समय ऑस्ट्रेलिया की न्यूज साइट ‘द क्लैक्सन’ ने अपनी एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में कहा कि पूर्वी लद्दाख़ में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुए हिंसक संघर्ष में चीन के 38 सैनिक मारे गये थे। विदित हो कि गलवान में बड़ी संख्या में हथियारबंद चीनी सैनिक घुसे थे; इतने पर भी भारतीय सैनिकों ने उनका जमकर मुक़ाबला किया और उन्हें खदेड़ दिया। इस ख़ूनी झड़प के बाद सीमा पर कई बार बातचीत हुई, जिसमें तय हुआ कि गलवान, पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी व दक्षिणी किनारे, पीपी-17 और पीपी-15 क्षेत्रों को बफर जोन माना जाए, जहाँ दोनों ओर की सैनिक बंकर या टेंट नहीं लगाएँगे। परन्तु चीन अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा है और भारत शान्ति चाहता है। केंद्र सरकार को चाहिए कि चीन से अगर नहीं उलझना चाहती, तो भी अपनी सीमाओं की रक्षा करे।

चीनियों ने लद्दाख़ में 4,067 वर्ग किलो मीटर ज़मीन हड़प ली, तो भी क्या मोदी यही रट लगाएँगे कोई आया नहीं? मैं संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ करूँगा, ताकि मोदी सरकार यह सच्चाई बताए कि मोदी ने कैसे चीन के सामने सरेंडर कर दिया।’’

सुब्रमण्यम स्वामी

वरिष्ठ नेता, भाजपा

लद्दाख़ में लोग कह रहे हैं कि चीन की सेना यहाँ घुस रही है। यहाँ चिन्ता की बात यह है कि चीन ने ज़मीन छीन ली है…, लोगों का कहना है कि चीन की सेना इलाक़े में घुस आयी है। लोगों की चरागाह की ज़मीन छीन ली गयी है। परन्तु पीएम ने कहा कि एक इंच ज़मीन नहीं छीनी गयी। परन्तु ऐसा नहीं है। (यह) सच है। आप यहाँ (लद्दाख़ में) किसी से भी पूछ सकते हैं।’’

राहुल गाँधी

कांग्रेस नेता

ग्रामीण विकास से ही सशक्त होगा देश

डॉ. राम प्रताप सिंह

पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में तेज़ी से परिवर्तन देखने को मिले हैं। बुनियादी ढाँचे के विकास, कौशल विकास को बढ़ावा तथा ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण ने ग्रामीण विकास को मज़बूती प्रदान की है।

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा), प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम, सांसद आदर्श ग्राम योजना, श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना जैसे कार्यक्रमों ने ग्रामीण विकास को नयी गति दी है। इन योजनाओं ने ग्रामीणों के जीवनस्तर में परिवर्तन लाया है। वंचित तबक़ों तक इन योजनाओं का लाभ पहुँचा है। केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 के अनुसार, मनरेगा के तहत वित्तीय वर्ष 2022-23 में (31 दिसंबर, 2022 तक) 5.54 करोड़ ग्रामीण परिवारों को रोज़गार मुहैया कराया गया।

इस योजना के द्वारा सृजित किये गये कुल श्रम दिवसों में महिलाओं की भागीदारी औसतन लगभग 56 फ़ीसदी रही है। ग्रामीण विकास की सबसे महत्त्वपूर्ण योजना मनरेगा के बारे में भारत समेत वैश्विक स्तर के कई रिपोर्ट ऐसा बताते हैं कि इस योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को ग़रीबी से उबरने में मदद की है। आज बड़ी तादाद में ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास किया जा रहा है, जो रोज़गार पाने से जुड़ा है। ग्रामीण भारत में रहने वाले युवाओं की आबादी अच्छी-ख़ासी है। ऐसे में उन्हें स्वरोज़गार के लिए प्रेरित करने की ज़रूरत है, ताकि वे अपने परिवार के साथ-साथ कुछ और परिवारों को भी रोज़गार दे सकें। हमें यह मानना होगा कि स्वरोज़गार ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बेरोज़गारी से बचने का एक महत्त्वपूर्ण विकल्प है।

हालाँकि गाँवों में पहले की तुलना में शिक्षा का स्तर सुधरा है; लेकिन फिर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी एक बड़ी चुनौती है। हमें इस पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। अगर हम स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें, तो यह भी पहले की तुलना में बेहतर हुआ है। लेकिन हमें इसे अभी और बेहतर करने की आवश्यकता है। अभी भी अक्सर ऐसा देखने और सुनने को मिलता है कि ग्रामीण भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में लोगों को ज़रूरत के वक़्त उन्हें दवाइयाँ नहीं मिलतीं, कई मेडिकल टेस्ट समय पर नहीं हो पाते, तो कभी-कभी डॉक्टर्स भी उपस्थित नहीं होते। ऐसे में ग्रामीण लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि सतत् विकास लक्ष्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा दो बेहद ही महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है। अतएव हमें ग्रामीण लोगों को बेहतर स्वास्थ्य तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करनी होगी। आज भी गाँवों में देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी रहती है। ऐसे में सभी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना एक बड़ी चुनौती है। केंद्र तथा राज्य सरकारों को इन क्षेत्रों में मिलकर स्थिति को बेहतर करना होगा।

ग्रामीण भारत में जिस तेज़ी से आज युवाओं का कृषि से मोहभंग हो रहा है, यह बेहद चिन्तनीय है। हमें देश की बेहतरी और ख़ुशहाली के लिए ग्रामीण युवाओं तथा महिलाओं को खेती से हर हाल में जोडक़र रखना होगा। कृषि क्षेत्रों में व्याप्त समस्याओं को हमें तत्काल दूर करनी चाहिए। कृषि क्षेत्र को सस्टेनेबल बनाने के लिए किसानों को समय पर सब्सिडी मुहैया करानी होंगी।

आत्मनिर्भर भारत तथा बढ़ती आबादी के खाद्य सुरक्षा की दृष्टिकोण से कृषि क्षेत्र को हमें हर हाल में मज़बूत करना होगा। हमें कृषि के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी रोज़गार तलाशने होंगे, ताकि गाँवों में बढ़ती आबादी को हम काम दे सकें। जिस बुलंद भारत की हम अक्सर बात करते हैं, ग्रामीण भारत उसका महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि ग्रामीण भारत के विकास के बिना हमारा देश सशक्त नहीं हो सकता।

(लेखक मणिपाल यूनिवर्सिटी जयपुर, राजस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)