नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट की राजनीति में इन दिनों तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियों के बीच एक बड़ा कदम सामने आया है—इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन का सीजफायर। माना जा रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की अहम भूमिका रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रिंस सलमान ने सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात की और उन्हें हस्तक्षेप करने के लिए कहा। इसके बाद अमेरिका ने सक्रियता दिखाते हुए इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर दबाव बनाया, जिसके चलते यह सीजफायर संभव हो सका।
इस पूरी रणनीति के पीछे असली वजह होर्मुज जलडमरूमध्य है, जो वैश्विक तेल सप्लाई का बेहद अहम रास्ता माना जाता है। ईरान-अमेरिका तनाव के चलते यह मार्ग प्रभावित हुआ है, जिससे पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ा है। सऊदी अरब नहीं चाहता कि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, क्योंकि इससे उसके आर्थिक हित भी जुड़े हैं।
जानकारों का मानना है कि सऊदी की यह चाल काफी सोच-समझकर चली गई है। पहले लेबनान में तनाव कम कराया गया ताकि ईरान के साथ बातचीत का रास्ता खुल सके। ईरान पहले ही साफ कर चुका था कि जब तक इजरायल के हमले जारी रहेंगे, तब तक वह किसी बड़े समझौते के लिए तैयार नहीं होगा।
हालांकि, यह सीजफायर अभी काफी नाजुक स्थिति में है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि सीजफायर के बावजूद छिटपुट घटनाएं जारी हैं, जिससे यह साफ है कि हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं।
सऊदी अरब की रणनीति साफ है—वह क्षेत्र में स्थिरता चाहता है ताकि तेल सप्लाई बाधित न हो और वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव कम रहे। इसके साथ ही वह अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते के लिए माहौल बनाने की कोशिश भी कर रहा है।
अब पूरी दुनिया की नजर ईरान पर टिकी है। अगर ईरान इस मौके को बातचीत के लिए इस्तेमाल करता है, तो आने वाले समय में होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से पूरी तरह खुल सकता है। लेकिन अगर तनाव फिर बढ़ता है, तो वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।




