ममता सिंह नई दिल्ली: लोकसभा में शुक्रवार का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़े विधायी उलटफेर के रूप में दर्ज हो गया। Nari Shakti Vandan Adhiniyam यानी ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’ का सदन में गिरना, भाजपा सरकार के लिए न केवल रणनीतिक विफलता है, बल्कि राजनीतिक साख पर भी एक बड़ा प्रहार है। प्रधानमंत्री की मौजूदगी और प्रचंड बहुमत के दावों के बीच, सरकार संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा पाई। मत विभाजन के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े। सदन में 528 सदस्यों की उपस्थिति के हिसाब से सरकार को जीत के लिए 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन वह बहुमत से 54 कदम पीछे रह गई। 24 साल बाद यह पहला मौका है जब लोकसभा में कोई महत्वपूर्ण सरकारी संशोधन बिल इस तरह परास्त हुआ हो।
कल सदन में हुई चर्चा बेहद आक्रामक रही। सत्ता पक्ष इसे महिलाओं के लिए ऐतिहासिक अवसर बता रहा था, लेकिन विपक्ष ने इसे ‘संविधान पर हमला’ और ‘चुनावी धोखा’ करार दिया। राहुल गांधी ने सदन में बेहद तल्ख लहजे में कहा कि यह बिल महिलाओं को हक देने के लिए नहीं, बल्कि देश के चुनावी नक्शे को बदलकर दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों की आवाज दबाने की साजिश है। वहीं प्रियंका गांधी की भाषण शैली ने इस विफलता को ‘मोदी सरकार की रणनीतिक हार’ के रूप में पेश किया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर इस बिल को परिसीमन और 2011 की जनगणना से जोड़कर पेचीदा बनाया, जिसका असली मकसद राजनीतिक लाभ लेना था।
आज सत्र का अंतिम दिन है और भाजपा गठबंधन के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बिल के गिरने से न केवल ‘Delimitation Bill 2026’ और ‘संघ राज्य विधि संशोधन विधेयक’ ठंडे बस्ते में चले गए हैं, बल्कि सरकार के अन्य विधायी कार्यों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू का यह कहना कि ‘मुख्य बिल गिरने के बाद अन्य विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता’, सरकार की लाचारी को दर्शाता है। भाजपा के भीतर ‘भितरघात’ और फ्लोर मैनेजमेंट की भारी कमी ने विपक्ष को एक सुनहरा मौका दे दिया है।
चुनावी मोर्चे पर, विशेषकर बंगाल और अन्य राज्यों के आगामी चुनावों में, भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। 30 साल में 7वीं बार महिलाओं को मिली यह निराशा भाजपा के ‘नारी शक्ति’ के नारे को कमजोर कर रही है। इसके विपरीत, ‘इंडिया’ गठबंधन को इस जीत से नई संजीवनी मिली है। राहुल और प्रियंका की सक्रियता ने गठबंधन के कार्यकर्ताओं में यह विश्वास पैदा किया है कि एकजुट होकर वे सत्ता को चुनौती दे सकते हैं। विपक्षी नेताओं ने इसे ‘संविधान की जीत’ बताते हुए अब इसे चुनावी राज्यों में बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी कर ली है। सत्ता पक्ष के लिए अब यह समझाना मुश्किल होगा कि बहुमत के बावजूद वह महिलाओं के लिए यह वादा क्यों पूरा नहीं कर सका।




