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अपराजेय होना चाहते हैं मोदी!

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारी में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम पूरे जी-जान से लगे हैं। राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि ये मोदी के लिए अंतिम बड़ा चुनाव है। जीते तो भी, और हारे तो भी। अपनी छवि को बेदाग़ रखने की कोशिशों के साथ आगामी चुनावों की जीत में लगे प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार में अपने सभी विश्वसनीयों को हमेशा की तरह लगा दिया है। जहाँ तक भ्रष्टाचार का सवाल है, तो मोदी सरकार की छवि प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रियों के तमाम दावों के बाद भी बेदाग़ नहीं बन सकी है। हाल ही में आयी केंद्रीय सतर्कता आयोग (कैग) की कुछ रिपोट्र्स ने कई मंत्रालयों के काले चिट्ठे खोल दिये और मोदी सरकार की छवि चमकाने की कोशिशों पर पानी फिर गया।

भ्रष्टाचार की सबसे अधिक शिकायतें प्रधानमंत्री मोदी के सबसे क़रीबी अमित शाह के गृह मंत्रालय के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ थीं। केंद्र सरकार के विभागों और संगठनों में सभी श्रेणियों के अधिकारियों और कर्मचारियों के ख़िलाफ़ वर्ष 2022 में ही कुल 1,15,203 शिकायतें आयीं, जिनमें अकेले गृह मंत्रालय के कर्मचारियों और अधिकारियों के ख़िलाफ़ 46,643 शिकायतें मिलीं। हालाँकि केंद्र सरकार ने कैग की रिपोर्ट को अनदेखा किया है, वहीं केंद्रीय सडक़ और परिवहन मंत्रालय ने सडक़ घोटाले के आरोप को नकार दिया है।

मगर मोदी सरकार किसी भी हाल में अपनी नाकामियों और आरोपों को छुपाते हुए अपने शासन में हुए बड़े कामों के सहारे जनता के बीच उतरना चाहती है। मोदी सरकार यह जानती है कि अगर एक ओर उसकी कुछ उपलब्धियाँ हैं, तो दूसरी ओर उसकी कमज़ोरियाँ भी इन उपलब्धियों से कहीं ज़्यादा हैं। यही वजह है कि उसे जल्दबाज़ी में महिला आरक्षण विधेयक विशेष सत्र बुलाकर संसद के दोनों सदनों में पास कराना पड़ा।

लोकसभा चुनाव 2024 और उससे पहले पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में जीत के लिए भाजपा मेगा प्लान तैयार कर चुकी है। राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि सबसे ज़्यादा दबाव उन राज्यों के प्रभारियों पर होगा, जहाँ भाजपा की स्थिति कमज़ोर है। जिस राज्य में स्थिति जितनी ज़्यादा कमज़ोर होगी, उस राज्य के नेताओं पर उतना ही जीत का दबाव प्रधानमंत्री मोदी का होगा। जानकार कह रहे हैं कि भाजपा ने पहली बार पार्टी के कामकाज को उत्तरी क्षेत्र, दक्षिणी क्षेत्र और पूर्वी क्षेत्र के हिसाब से तीन हिस्सों में बाँटा है, ताकि सरलता से जीत मिल सके। परन्तु इस बार की जीत उसके लिए इतनी आसान नहीं है। लेकिन भाजपा की ओर से दावा किया जा चुका है कि तीसरी बार भी केंद्र में भाजपा आ रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही एक बार फिर प्रधानमंत्री बनेंगे। आगामी सभी चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, कई बड़े नेता और मंत्री लगातार बैठकें कर रहे हैं। जनता के बीच जाने का सिलसिला भी जारी हो चुका है।

आरोप हैं कि विपक्षी दलों को बदनाम करने, आरोपित करने और विपक्ष के मज़बूत नेताओं, सांसदों, विधायकों को डराने-धमकाने का काम भाजपा अंदर-ही-अंदर कर रही है। परन्तु भाजपा के गिरते वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश में भाजपा नेता जितनी शिद्दत से लगे हैं, उतनी ही शिद्दत इस आख़िरी बड़ी जीत के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी लग गया है। लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के द्वारा बैठक करना इसका एक प्रमाण है। लोकसभा चुनाव 2024 को प्रधानमंत्री मोदी की जीत का आख़िरी चुनाव इसलिए कहना उचित है, क्योंकि अमित शाह समेत कई बड़े भाजपा नेता संकेत दे चुके हैं कि 2024 के बाद देश में चुनाव नहीं होंगे। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री मोदी की उम्र को देखकर भी यही माना जा रहा है कि 2024 का चुनाव उनके लिए आख़िरी लोकसभा चुनाव होगा। यह इसलिए, क्योंकि 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 साल के क़रीब हो जाएँगे और आगामी लोकसभा चुनाव अब सीधे 2029 में ही होगा और उस समय प्रधानमंत्री मोदी लगभग 80 साल के होंगे। ज़ाहिर है वह 80 साल में चुनाव लडऩा उचित नहीं समझेंगे। आगे क्या होगा, इसकी चिन्ता छोडक़र भाजपा की पूरी टीम जीत के लिए कोशिशों में जुलाई से ही जुटी हुई है। इसी के मद्देनज़र मध्य प्रदेश दौरे के बाद प्रधानमंत्री ने अपने आवास 28 जून को भी हाई लेवल बैठक की थी।

सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में 2023 के आख़िर में होने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा हुई थी। परन्तु कुछ जानकार कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने इस बैठक में राज्यों के विधानसभा चुनावों के अतिरिक्त सभी नेताओं को 2024 के लोकसभा चुनावों में जीत की तैयारी में जी-जान से जुट जाने का आदेश दिया है। जिन नेताओं को बड़ी ज़िम्मेदारी दी गयी है, उनमें गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, भाजपा के संगठन मंत्री बी.एल. संतोष जैसे क़द्दावर नेता हैं। जानकारों के मुताबिक, अगर ज़रूरत पड़ी, तो मोदी चुनावी तैयारियों के लिए संगठन में फेरबदल करने के मूड में हैं। संगठन में कई बदलाव होने के अतिरिक्त मंत्रिमंडल में भी चुनाव से पहले फेरबदल के संकेत हैं। राजनीति के कुछ जानकार प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में मनमुटाव के दावे भी कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री बनने की चाह रखते हैं। परन्तु भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी उन्हें आगे आता नहीं देखना चाहती है। स्पष्ट है कि अगर कोई दूसरा चेहरा प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करता है, तो प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह एक बड़े झटके की तरह होगा।

हालाँकि अभी तक भाजपा में किसी भी नेता की यह हिम्मत नहीं हुई है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कृपा के बिना चुनाव मैदान में उतर सके। इसलिए भाजपा ने दावा किया है कि मोदी एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। अगर यह दावा सही साबित हुआ, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के पहले ग़ैर-कांग्रेसी नेता होंगे, जो लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री चुने जाएँगे। परन्तु मोदी के लिए ये चुनाव पिछले चुनावों की तरह आसान नहीं हैं। जी20, चंद्रयान-3, सूर्य पर आदित्य का प्रक्षेपण, महिला आरक्षण और कई अन्य योजनाओं को भुनाने में लगी भाजपा को अब इंडिया (ढ्ढ.हृ.ष्ठ.ढ्ढ.्र.) गठबंधन से डर लगने लगा है। इसी डर के चलते प्रधानमंत्री मोदी संविधान में से इंडिया शब्द हटाने का निर्णय ले चुकी है। मगर विपक्ष के पास मोदी जैसा क़द्दावर नेता नज़र नहीं आ रहा है। राहुल गाँधी को उनके सामने का चेहरा माना जा रहा है, परन्तु विपक्षी गठबंधन ने अभी तक किसी चेहरे को प्रधानमंत्री मोदी के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर जनता के सामने नहीं रखा है। कुछ जानकार विपक्षी गठबंधन के आपसी मतभेद के चलते कह रहे हैं कि इंडिया गठबंधन बहुत दिन तक नहीं रह सकेगा।

हालाँकि ऐसा लगता नहीं है और इस बार एनडीए के ख़िलाफ़ इंडिया गठबंधन कम मज़बूत नहीं है। पिछले समय में हुए गुजरात विधानसभा के चुनावों में 2019 प्रचंड जीत के बाद भाजपा नेता मोदी को अपराजेय मानने लगे हैं। परन्तु भाजपा इस एक जीत को बड़ा करके दिखा रही है, नहीं तो इसी दौरान हिमाचल को भाजपा ने ही गँवाया है। परन्तु प्रधानमंत्री मोदी का डर इतना ज़्यादा बढ़ गया है कि वह आगामी चुनाव में जीतकर एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। उन्होंने इस बार 15 अगस्त को लाल क़िले से साफ कहा कि वह अगली बार भी लाल क़िले से तिरंगा फहराने फिर आएँगे।

प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान से राजनीतिक पार्टियों ने ढेरों प्रश्न खड़े कर दिये। अब प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी दौरे पर पहुँचकर वहीं के निवासियों को कई योजनाओं के तोहफ़े दे रहे हैं। उन्होंने काशी संसद सांस्कृतिक महोत्सव में भी भाग लिया। पूरे उत्तर प्रदेश में बने 16 अटल आवासीय विद्यालयों का भी प्रधानमंत्री मोदी ने उद्घाटन किया।

राजनीति के जानकार मानकर चल रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का वाराणसी दौरा माँ गंगा से आशीर्वाद लेने के लिए है। विदित हो कि प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी से ही सांसद हैं। तीसरी बार अगर वह प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वह और ताक़तवर नेताओं में शुमार होंगे। जो लोग ये कह रहे हैं कि मोदी ही फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे, वे केंद्र की सत्ता में फिर से मोदी के आने के लिए अभी से उनके लिए प्रार्थनाएँ कर रहे हैं। इन सब गतिविधियों को देखकर प्रधानमंत्री मोदी का सीना और चौड़ा हो जाता है। हालाँकि देश में मोदी के ख़िलाफ़ एक हवा चल रही है, जिसे लेकर वह चिन्तित भी हैं। परन्तु वह राजनीति में एक अपराजेय नेता की तरह हर चुनाव जीतकर इतिहास में अमर होने की चाह रखते हैं; जिसे पूरा करने के लिए ही वह सभी हथकंडे अपना रहे हैं।

सीटों के तालमेल पर जल्दबाज़ी में नहीं कांग्रेस

इण्डिया गठबंधन की चार बैठकों के बाद भी इस मुद्दे पर अस्पष्टता

जैसे-जैसे कांग्रेस का आत्मविश्वास लौट रहा है, वैसे-वैसे इण्डिया गठबंधन में सहयोगियों से उसकी सीट शेयरिंग का पेच फँसता और लम्बा खिंचता जा रहा है। सीट शेयरिंग पर तीन मुख्य बैठकों और समन्वय समिति की एक बैठक के बाद भी इण्डिया गठबंधन अभी तक लडऩे वाली सीटों का कोई फार्मूला नहीं ढूँढ पाया है। आम आदमी पार्टी, माकपा, सपा, टीएमसी जैसे दलों के साथ कांग्रेस की सीट वाली पटरी बैठना आसान नहीं है। कांग्रेस यदि इन दोनों दलों से समझौता करती है, तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और केरल ही नहीं, बंगाल जैसे राज्यों में उसे अपने कई मज़बूत दावे छोडऩे पड़ेंगे। कांग्रेस यह किसी सूरत में नहीं चाहती। ज़ाहिर है कांग्रेस बहुत सोच समझकर ही सीटों के गणित को अंतिम रूप देना चाहती है, ताकि उसका दबदबा कम न हो। कांग्रेस इस साल होने वाले पाँच विधानसभाओं के चुनाव नतीजों का इंतज़ार करना चाहती है, ताकि वह ज़्यादा ताक़त से सीटों की माँग कर सके।

हाल में सीट शेयरिंग को लेकर इंडिया गठबंधन की समन्वय समिति के 14 नेताओं की एनसीपी प्रमुख शरद पवार के आवास पर बैठक हुई थी। लेकिन जानकारी के मुताबिक, सीट शेयरिंग को लेकर इण्डिया गठबंधन के भीतर बहुत बखेड़े हैं। क्षेत्रीय दल कांग्रेस को बहुत ज़्यादा ताक़त नहीं देना चाहते; क्योंकि वो महसूस करते हैं कि यदि कांग्रेस का उभार हुआ, तो इसकी सबसे ज़्यादा $कीमत उन्हें ही चुकानी पड़ेगी।

कांग्रेस महसूस कर रही है कि जनता में उसके प्रति रुझान बढ़ रहा है। आने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भी कांग्रेस बहुत ज़्यादा आश्वस्त है। उसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के अलावा तेलंगाना में अपनी बेहतर सम्भावनाएँ दिख रही हैं। राजस्थान को लेकर तो हाल में राहुल गाँधी भी कह चुके हैं कि वहाँ मुक़ाबला होगा, भले वहाँ किसी के पक्ष में हवा न हो।

कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक़्क़त आम आदमी पार्टी (आप) के साथ होने वाली है। वह पंजाब और दिल्ली में सत्ता में है और ज़्यादा सीटों का दावा कर रही है। कांग्रेस यूँ ही इन राज्यों को आम आदमी पार्टी को तश्तरी में रखकर किसी सूरत में नहीं देगी। इन दोनों राज्यों की कांग्रेस इकाइयाँ भी इस हक़ में नहीं है। ऊपर से आप नेता राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मैदान में उतरने के संकेत दे रहे हैं। कांग्रेस इससे बिफरी हुई है। यदि वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की बात मानें, तो आम आदमी पार्टी पर कांग्रेस को ज़्यादा भरोसा नहीं। उधर आम आदमी पार्टी की स्थिति कम-से-कम राज्य विधानसभा स्तर पर आज भी मज़बूत दिखती है। आज चुनाव हो जाएँ, तो आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर करना मुश्किल लगता है। लेकिन लोकसभा सीटों के स्तर पर ज़रूर यह स्थिति नहीं होगी।

कांग्रेस की समस्या माकपा के साथ भी आ रही है। माकपा केरल में सत्ता में है और अगले चुनाव में कांग्रेस वहाँ सत्ता में वापसी की जंग लड़ रही है। वहाँ उसकी सत्ता की लड़ाई है ही माकपा के साथ। दोनों एक-दूसरे के साथ समझौता नहीं कर सकते। कांग्रेस (यूपीए) ने वहाँ सन् 2019 के चुनाव में 20 में से 19 सीटें जीतकर माकपा का स$फाया कर दिया था। अब तो ख़ुद राहुल गाँधी केरल के वायनाड से सांसद हैं। ऐसे में वहाँ कांग्रेस और माकपा में सीटों का समझौता बहुत टेढ़ी खीर है।

हाल में माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने साफ़ कहा है कि उनकी पार्टी हर राज्य में गठबंधन नहीं करेगी। येचुरी ने कहा- ‘ज़रूरी नहीं कि जिन राज्यों में कांग्रेस से हमारी लड़ाई होती है, वहाँ गठबंधन किया जाए। इसलिए हर राज्य में गठबंधन नहीं करेंगे। उन राज्यों में गठबंधन नहीं होगा। हम तो यही कहेंगे कि हम जहाँ भी गठबंधन करेंगे ठोस परिस्थितियों के आधार पर करेंगे।’ अब केरल और पश्चिम बंगाल के अलावा माकपा का अन्य राज्यों में ज़्यादा आधार नहीं है। तो कांग्रेस को माकपा के साथ गठबंधन में क्या मिलेगा? ज़ाहिर है माकपा के साथ गठबंधन दूर की कौड़ी रहेगा।

राज्यों में पेच

इण्डिया गठबंधन में लड़ाई दिल्ली और पंजाब की ही नहीं। बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में भी है और अच्छी-ख़ासी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में ऊपर जो शान्ति दिख रही है, वह भीतर नहीं है। इन सभी राज्यों में कांग्रेस ज़्यादा है और सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस की राज्य इकाइयाँ जिनका मानना है कि पार्टी बेहतर कर सकती है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की राज्य इकाइयाँ ख़तरनाक तरीक़े से एक-दूसरे से भिड़ी हुई हैं। हरियाणा में कांग्रेस को लग रहा है कि भाजपा-जजपा की गठबंधन खट्टर सरकार से जनता का मोह भंग हो चुका है और वह सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही है।

इन सभी राज्यों में कांग्रेस सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश में कमज़ोर दिखती है। सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ़ एक सीट मिली थी। उसके बाद विधानसभा के पिछले साल में कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं आया। इसके बावजूद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 20 सीटों पर लडऩा चाहती है। इसका कारण सन् 2009 के चुनाव नतीजे हैं, जिनमें कांग्रेस को 22 सीटें मिली थीं। तब कांग्रेस अमेठी, रायबरेली, फ़र्रुख़ाबाद, सुल्तानपुर, फ़ैज़ाबाद, कानपुर, अकबरपुर, बहराइच, बाराबंकी, मुरादाबाद, बरेली, धौरहरा, डुमरियागंज, गोंडा, झाँसी, खीरी, कुशीनगर, महाराजगंज, प्रतापगढ़, श्रावस्ती और उन्नाव जीत गयी थी। भले कहा जाए कि उसके बाद काफ़ी कुछ बदल चुका है, कांग्रेस इन सीटों पर उलटफेर तो कर ही सकती है। हालाँकि समाजवादी पार्टी कभी को नहीं चाहेगी कि कांग्रेस को इतनी सीटें देकर ख़ुद को ही वह कमज़ोर कर ले। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में दलित नेता चंद्रशेखर रावण और रालोद नेता जयंत सिंह को साथ ला सकती है।

बिहार की बात करें, तो वहाँ भी पेच जबरदस्त उलझा हुआ है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 25 सितंबर को राजद नेता लालू प्रसाद यादव के साथ गुप्त बैठक की। यही नहीं, नीतीश ने मंत्रिमंडल की बैठक भी की। इससे पहले 02 सितंबर को भी वह लालू से मिले थे। ज़ाहिर है सीटों पर उनकी बात हुई होगी। यह चर्चा भी तेज़ है कि राजद-जद(यू) एक हो सकते हैं। कांग्रेस बिहार में ख़ुद को ज़्यादा सीटों का हक़दार मानती है। बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह कह चुके हैं कि बिहार में कांग्रेस की स्थिति बेहतर है। उनके दावे का आधार यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में विपक्ष से एक ही प्रत्याशी जीता था और वह कांग्रेस का था। कांग्रेस बिहार में कम-से-कम 9-10 सीटों पर लडऩा चाहती है। लालू यादव और और नीतीश कुमार के अलावा बिहार में वाम दलों का भी दावा है। महागठबंधन में पहले से ही कुछ छोटे दल भी हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन यानी सीपीआई एमएल बिहार महागठबंधन में सात सीटें माँग सकती है। ऐसे में कांग्रेस कैसे ज़्यादा सीटों का रास्ता निकालेगी? यह दिलचस्प होगा।

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जहाँ 7 सितंबर, 2022 से 30 जनवरी, 2023 तक 4080 किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा में पैदल यात्रा की थी; कांग्रेस को लगता है कि उसके प्रति जनता में स्वीकार्यता बढ़ी है। इनमें महाराष्ट्र भी है। कांग्रेस का मानना है कि अब उसका सीटों का हिस्सा एनसीपी और शिवसेना (यूटी) की टक्कर का होना चाहिए। कांग्रेस की इस माँग के पीछे ज़मीनी तर्क भी है; क्योंकि हाल के महीनों में एनसीपी और शिवसेना के कई विधायक टूटकर भाजपा में जा चुके हैं। कांग्रेस ख़ुद को टूट से बचाने में सफल रही है। पिछले चुनाव में शिवसेना ने 18, एनसीपी ने चार सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने सिर्फ़ एक सीट जीती थी। लेकिन निश्चित ही परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं। बंगाल इण्डिया गठबंधन के लिए अगला मुश्किल राज्य है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी, जो पार्टी के लोकसभा में नेता भी हैं; ने 25 सितंबर को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आलोचना की थी। वह किसी भी सूरत में ममता के साथ नहीं जाना चाहते। ममता कांग्रेस को साथ लेने को तो तैयार हैं; लेकिन वाम दलों को किसी सूरत में नहीं। इस साल हुए दो विधानसभा उपचुनावों में एक बार कांग्रेस और एक बार टीएमसी जीत चुकी है।

कांग्रेस पंजाब में भी आम आदमी पार्टी के सामने खड़ी दिखती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ही नहीं, विधानसभा में पार्टी के नेता प्रताप सिंह बाजवा भी आप से गठबंधन के सख़्त ख़िलाफ़ हैं। वडिंग पहले ही आलाकमान को संदेश दे चुके हैं कि प्रदेश इकाई की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई फ़ैसला न किया जाए। पार्टी के एक और क़द्दावर नेता नवजोत सिंह सिद्धू भी आम आदमी पार्टी के साथ जाने के ख़िलाफ़ दिखते हैं। आम आदमी पार्टी की पंजाब इकाई और मुख्यमंत्री भगवंत मान भी कह चुके हैं कि पार्टी अकेले लडऩा और जीतना जानती है। पिछले साल के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 42.3 फ़ीसदी, जबकि कांग्रेस को 23.1 फ़ीसदी वोट मिले थे। वहीं सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 40.6 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ लोकसभा की आठ सीटें मिली थीं; जबकि आम आदमी पार्टी को महज़ एक सीट।

हार का भय, जीत का प्रयास 

भारतीय जनता पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव राम मंदिर के उद्घाटन, महिला आरक्षण एवं सनातन धर्म को लेकर जीतना चाहती है। मगर इतने पर भी भारतीय जनता पार्टी को भय है कि वो कहीं चुनाव हार न जाए। इसका कारण बीते दिनों हुए घोसी विधानसभा के उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की करारी हार है। चर्चा छिड़ गयी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उत्तर प्रदेश में प्रभाव कम हो गया है।

मगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से लखनऊ में अकस्मात बुलायी गयी समन्वय बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विशेष उपस्थिति कुछ और ही संकेत कर रही है। चर्चा है कि योगी आदित्यनाथ अब और अधिक शक्तिशाली होंगे। मगर इसके लिए उन्हें लोकसभा, विधानसभा एवं पंचायती राज तक उत्तर प्रदेश की हर स्तर की सत्ता को बचाकर रखना होगा। 

लोगों की धारणा

भारतीय जनता पार्टी के योगी समर्थक कार्यकर्ता उमेश गंगवार कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रभाव कम नहीं हुआ है। एक सीट उपचुनाव में किसी के जीतने से सत्ता का निर्णय नहीं हो जाता। आगामी लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत से जीत होगी एवं केंद्र में दोबारा भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी।

मगर समाजवादी समर्थक योगेंद्र सिंह कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी के कार्यों से जनता सन्तुष्ट नहीं है। उन्हें बुलडोजर चलवाने के अतिरिक्त कुछ नहीं आता। उनके कार्यकाल में विकास शून्य रहा है। जिधर देखो सारी सडक़ें टूटी पड़ी हैं; मगर वाहनों के चालान तीव्रता से हो रहे हैं। हर वस्तु महँगी होती जा रही है। बिजली से लेकर यात्रा किराया तक बेहिसाब बढ़ाया हुआ है। रोडवेज बसों का किराया मुख्यमंत्री के साढ़े छ: साल के कार्यकाल में दोगुने के आसपास पहुँच चुका है। लोगों के पास काम नहीं है। पाँच किलो राशन देकर उसका प्रचार इतना किया जा रहा है कि राशन से अधिक व्यय विज्ञापनों पर हो रहा है। कोई ऐसा समाचार पत्र नहीं है, जिसमें हर दिन योगी सरकार का विज्ञापन न दिखता हो।

वहीं निष्पक्ष बात करने वाले विनोद कुमार कहते हैं कि हमने राज्य में तीन पार्टियों की सरकारें देखी हैं- मायावती की, अखिलेश की एवं आदित्यनाथ की। अगर सही एवं निष्पक्ष समीक्षा की जाए, तो सभी के शासनकाल में कुछ अच्छा एवं कुछ बुरा हुआ है। मायावती के शासन में क़ानून व्यवस्था दुरुस्त थी। जीटी रोड को चौड़ा करने का कार्य आरम्भ हुआ। सडक़ों की व्यवस्था ठीक हुई।

लोगों को नौकरियाँ मिलने लगीं। मगर वहीं नौकरियों में पक्षपात किया गया। एक स$फाईकर्मियों के पदों पर अवश्य जातियों के लोगों को भर्ती करने का खुला निमंत्रण रहा। वहीं मायावती ने अपनी एवं हाथी की मूर्तियाँ लगवायीं। घोटाले भी हुए। अखिलेश के शासन में जीटी रोड का शेष कार्य में शीघ्रता लायी गयी। सडक़ों का अधूरा कार्य पूरा हुआ। पुल बने। असिंचित क्षेत्रों में सिंचाई व्यवस्था करने का कार्य हुआ। मगर वहीं क़ानून व्यवस्था बिगडऩे लगी। भर्तियों में घपला हुआ। (कथित रूप से) भ्रष्टाचार बढ़ा।

अब योगी के शासन में बड़े-बड़े दबंगों पर कार्रवाई हुई। हिन्दुत्व को बल मिला। राम मन्दिर बन रहा है। ज्ञानवापी, मथुरा में मस्जिद जैसे मुद्दे उठे। कई जनपदों एवं जगहों के नाम बदले गये। मगर अपराध बढ़े, भारतीय जनता पार्टी पक्ष के अपराधी खुलेआम अपराध करने लगे। न के बराबर भर्तियाँ हुईं। सरकारी कर्मचारी दु:खी हो रहे हैं। युवा दु:खी हो रहे हैं। बेटियों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। केवल बयानों में योगी शोहदों के धमका देते हैं; मगर अपराध नहीं रुक रहे। महँगाई बहुत बढ़ी है। सरकार की कमियाँ बताने एवं सरकार के विरुद्ध बोलने वालों को सज़ा मिलती है। पुलिसकर्मी मनमानी कर रहे हैं। सडक़ें गड्ढायुक्त हो चुकी हैं। आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। किसानों तक के चालान कटने लगे हैं।

क्या योगी पर है संघ की कृपा?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के लखनऊ में समन्वय बैठक करने से उत्तर प्रदेश की राजनीति अचानक गरमा गयी है। लखनऊ में हुई बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी के बीच क्या मंत्रणा हुई, इसे लेकर तरह तरह के कयास ही लग रहे हैं।

समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक दल, बहुजन समाज पार्टी एवं अन्य पार्टियों के कान खड़े हो गये हैं। सभी पार्टियों के नेता ये जानना चाह रहे हैं कि इस बैठक में क्या मंत्रणा हुई? मगर असल बात किसी को नहीं पता चल पा रही है। अपुष्ट सूत्रों की मानें, तो यही कहा जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर कमर कसी गयी है। मगर कुछ सूत्र यह भी कह रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख योगी आदित्यनाथ को भविष्य में कुछ बड़ा देने वाले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं उनके निकटतम लोगों की इस अहम बैठक से दूरी से तो कुछ ऐसा ही लगता है।

भागवत की बैठक में मोदी नहीं!

लोगों को आशंका है कि कहीं योगी आदित्यनाथ को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर तो नहीं देखा जाने लगा है? हालाँकि ऐसी कोई चर्चा अभी कहीं नहीं है। मगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थक कई वर्षों से चुपके-चुपके इस प्रकार की चर्चा अवश्य करते दिख जाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद केंद्र का शासन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों में ही जाएगा। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक भी उत्तर प्रदेश में कम नहीं हैं, जो स्पष्ट कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के लिए ही उपयुक्त हैं, केंद्र की सत्ता सँभालने की योग्यता केवल और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में ही है।

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के इन दो गुटों में अंदर-ही-अंदर टूट पड़ी हुई है। इस टूट को अब और बल मिल गया है। इसका कारण यह है कि इधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक प्रमुख मोहन भागवत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उनके कुछ विश्वसनीय लोगों के साथ बैठक की; मगर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में नहीं दिखे। वह भागवत की लखनऊ में उपस्थिति के समय ही वाराणसी पहुँच गये।

कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की बैठक में क्या कुछ हो रहा है? इसका पता लगाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के दाहिना हाथ माने जाने वाले देश के गृह मंत्री अमित शाह की इस बैठक पर पैनी दृष्टि रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस अहम बैठक से दूरी अवश्य बनाए रखी, मगर बैठक की गतिविधियों के भेद न लें, ऐसा नहीं हो सकता। सम्भवत: इसीलिए वह वाराणसी पहुँचे हों। कुछ लोग कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री को अभी किसी से कोई डर नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में क्रिकेट स्टेडियम के आधारशिला रखी। महिलाओं की सभा को संबोधित किया; उनसे संवाद किया। महिला आरक्षण विधेयक पास होने की बधाई दी। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में जनसभा को संबोधित किया। अटल आवासीय विद्यालयों का उद्घाटन किया। अपनी उपलब्धियाँ गिनायीं और चलते बने।

वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम तीन घंटे का था, मगर उसे कार्यक्रमों की सूची को देखते हुए पूर्व में ही बढ़ाकर छ: घंटे का कर दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी पहुँचने से एक दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी में बने लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे के विस्तारीकरण के लिए 550 करोड़ रुपये के बजट को स्वीकृति दी। 

अनसुलझे प्रश्न

लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की उपस्थिति के बीच वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पहुँचना एवं अपने कार्यक्रमों को निपटाकर लौट आना, एक अनसुलझी गुत्थी बन गये हैं। प्रश्न उठ रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत से क्यों नहीं मिले? इसे लेकर लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थक इसे अपने इस प्रिय नेता के लिए सुनहरे भविष्य की आहट के रूप में देख रहे हैं एवं मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे हैं।

राजनीति में रुचि रखने वाले लोग अभी इस तरह की चर्चाओं को विश्वासपूर्ण दृष्टि से नहीं देख रहे हैं। उनका मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अभी नहीं दिख रहे हैं। अभी हर हाल में वह 2024 में तीसरी बार भी केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने की सोच को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। अगर भारतीय जनता पार्टी 2024 में सत्ता में आयी, तो भी कम-से-कम 2029 में योगी आदित्यनाथ केंद्र के लिए चुने जा सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं एवं उनकी तैयारियाँ भी उसी तरह की हैं। ये लोग ऐसा भी कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में मनमुटाव रहता है, जिसके चलते उनके समर्थक भी बँटे हुए दिखते हैं। योगी आदित्यनाथ अगर आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, तो यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की कृपा से हैं।

जो भी हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख की ओर से लखनऊ में बुलायी गयी समन्वय बैठक बेहद अहम मानी जा रही है। विपक्षी पार्टियाँ इसे लेकर सकते में हैं। उधेड़बुन यह है कि आगामी चुनाव में ज़मीनी स्तर पर भारतीय जनता पार्टी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता मिलकर कार्य कर सकते हैं। उनकी संख्या बढ़ायी जानी भी तय है। इस बार महिलाओं को भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जोड़ा जाएगा। इसे ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को कमर कस लेनी चाहिए।

विदेशी रिश्तों में कड़वाहट

सार्वजनिक रूप से राजनीतिक लड़ाई में उलझे भारत और कनाडा

भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन के आयोजन के दौरान केंद्र सरकार ने देश को यह संदेश दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से भारत के विदेशी सम्बन्ध बहुत मज़बूत और अच्छे हो रहे हैं, और भारत का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है। लेकिन जी20 में हिस्सा लेने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, जो कि निजी विमान ख़राब होने की वजह से दो दिन ज़्यादा भारत में ही रुके रहे; जैसे ही अपने देश कनाडा पहुँचे, भारत से रिश्ते ख़राब होने लगे। उनके कनाडा पहुँचते ही कनाडा ने भारत के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत रोक दिया। कनाडा के वाणिज्य मंत्री मैरी एनजी के प्रवक्ता ने यह जानकारी देते हुए कहा कि कनाडा भारत से द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत रोक रहा है।

यह सब कनाडा के वैंकूवर में तथाकथित खालिस्‍तानी सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्‍या के बाद हुआ। कनाडा ने इस हत्या का आरोप भारत पर लगाते हुए भारतीय राजनयिक को निष्कासित कर दिया, जिसके बाद भारत ने भी कनाडा के राजनयिक को निष्कासित कर दिया। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे के राजनयिकों के निष्कासन से झगड़ा और बढ़ गया है। एनएसडीएल के मुताबिक, अगस्त 2023 के अंत में भारतीय बाज़ारों में कनाडा का 1.77 लाख करोड़ रुपये का निवेश था और इसमें से इक्विटी बाज़ारों में 1.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश था।

सिख नेता की हत्या से बढ़े कूटनीतिक और राजनीतिक टकराव से साल के अंत तक सम्पन्न होने वाले एफटीए यानी मुक्त व्यापार समझौते सहित बढ़ते आर्थिक सम्बन्ध ख़राब हो गये हैं। भारतीय कम्पनियों में कनाडा के भारतीय मूल के नागरिकों के पेंशन फंड, बैंकिंग जमा, रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश है। यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि कनाडा सिख बहुल है, जिसके चलते हमेशा माना जाता रहा है कि कनाडा में भारत का दबदबा बहुत है। इसके साथ ही कनाडा से भारत को काफ़ी ज़्यादा आय भी होती है; क्योंकि पंजाब से लाखों की संख्या में सिख कनाडा में बसे हुए हैं। लेकिन सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से कनाडाई सिख तो भारत सरकार से नाराज़ दिख ही रहे हैं, पंजाब में भी इसका असर दिख रहा है। भारत सरकार के इस क़दम से पंजाब की राजनीति में हडक़ंप मच गया है। अकाली नेता सुखबीर सिंह बादल ने कनाडा के साथ भारत के रिश्तों को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को पत्र भी लिखने के अलावा गृह मंत्री अमित शाह से मुला$कात की है।  

अब दोनों देशों के राजनयिक सम्बन्ध बिगडऩे से भारत सरकार ने कनाडा में रह रहे अपने नागरिकों को सुरक्षा के ख़तरे की चेतावनी देते हुए ज़्यादा सावधानी बरतने को कहा है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की तरफ़ से जारी की गयी एक एडवाइजरी में कहा गया है कि कनाडा में रह रहे भारतीय नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए, विशेष रूप से छात्रों को सतर्क रहना चाहिए। कनाडा में रहने वाले भारतीयों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है। हर साल यहाँ से हज़ारों लोग कनाडा जाते हैं, जिनमें छात्र शामिल हैं।

कनाडा में अप्रवासी भारतीयों की एक बड़ी संख्या है, जो व्यापार, नौकरी के पेशे से जुड़े हैं। कनाडा में बसे भारतीयों की वजह से दोनों देशों के बीच कई दशकों से मज़बूत आर्थिक और निवेश सम्बन्ध रहे हैं, जो लगातार गहरे होते रहे हैं। लेकिन कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की तरफ़ से भारत पर लगाये आरोप और भारत के राजनयिक को हटाने के फ़ैसले से इन रिश्तों में कड़वाहट आयी है। बता दें कि सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर ट्रूडो ने आरोप लगाते हुए कहा- ‘भारत सरकार ने एक प्रमुख सिख अलगाववादी नेता की हत्या की साज़िश रची है।’ ट्रूडो के इस आरोप के बाद भारत ने सफ़ाई दी। लेकिन भारत कनाडा में मतभेद बढ़ गये और अब सार्वजनिक रूप से दोनों देश झगड़ रहे हैं। अमेरिका इसमें अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहा है।

विदित हो कि भारत और कनाडा के सम्बन्ध हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से ही ख़राब नहीं हुए हैं; इससे पहले जब जून, 2023 में ब्रिटेन में खालिस्तान लिबरेशन फोर्स के प्रमुख अवतार सिंह खांडा की रहस्यमयी मौत हुई थी, तब सिख अलगाववादी नेताओं ने कहा था कि खांडा को ज़हर देकर मारा गया। अलगाववादी सिख संगठनों ने इसे टारगेट किलिंग कहते हुए आरोप लगाया कि भारत सरकार सिख अलगाववादी नेताओं को मरवा रही है। वहीं भारत सरकार ने उस समय लगे इन आरोपों को लेकर अब तक कुछ नहीं कहा है।

दरअसल, भारत में सिखों की आबादी महज़ दो प्रतिशत है। इसमें से भी कनाडा में बसने वाले भारतीय सिखों की संख्या चार प्रतिशत से ज़्यादा है। भारत सरकार का आरोप है कि कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में रहकर कई सिख संगठन भारत विरोधी गतिविधियाँ चला रहे हैं। कनाडा में खालिस्तान समर्थक आन्दोलन इतना मुखर है कि सिखों के लिए अलग खालिस्तान देश को लेकर कई बार माँग उठ चुकी है। इससे भारत और कनाडा के बीच मज़बूत रिश्ते होते हुए भी हल्की कड़वाहट भरे थे, जो सिख नेता निज्जर की हत्या के बाद पूरी तरह कड़वाहट से भर गये। इस घटना का असर इतना हुआ कि आस्ट्रेलिया में स्थित स्वामीनारायण मंदिर के गेट पर खालिस्तान समर्थन में एक झण्डा लटका दिया गया। यह ख़बर ऑस्ट्रेलिया टुडे अख़बार ने दी।

मीडिया में आयी ख़बरों में कहा गया कि इस बार भी जब जी20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने ट्रूडो दिल्ली पहुँचकर मोदी से मिले, उसी दिन कनाडा के वैंकूवर में सिख नेताओं ने भारत से पंजाब को अलग करने के लिए एक जनमत संग्रह कराया। प्रधानमंत्री मोदी ने सिख नेताओं की इस गतिविधि पर खुलकर नाराज़गी जतायी और कनाडा में सिख संगठनों द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों पर एतराज़ जताया, जिसके बाद से भारत और कनाडा के रिश्तों में कड़वाहट बढऩी शुरू हो गयी।

सम्मेलन के दौरान ट्रूडो आधिकारिक अभिवादन के दौरान भी कुछ नाराज़ से दिखे। मीडिया ने यहाँ तक दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रूडो से कहा कि खालिस्तानी समर्थक तत्त्व भारतीय राजनयिकों और भारतीय दूतावासों पर हमले के लिए लोगों को भडक़ा रहे हैं। कनाडा उन्हें रोक पाने में नाकाम रहा है।

मीडिया ने यहाँ तक दावा किया कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा- ‘कनाडा हमेशा ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। ये ऐसी चीज़ है, जो कनाडा के लिए बहुत अहम है। कनाडा उस समय हिंसा को रोकने, नफ़रत को कम करने के लिए भी हमेशा उपलब्ध हैं। ये भी याद रखा जाना चाहिए कि कुछ लोगों की गतिविधियाँ समूचे कनाडाई समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं।’

लेकिन सही ख़बर यह है कि भारत के कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियाँ चलने की बात पर ट्रूडो ने भारत पर कनाडा की घरेलू राजनीति को प्रभावित करने का आरोप लगाया। कुछ जानकारों का मानना है कि कनाडा के प्रधानमंत्री जब तक ट्रूडो हैं, तब तक हालात ठीक नहीं हो सकते। ट्रूडो ने इसे निजी मुद्दा बना लिया है, जिसकी वजह उनका वोट बैंक है। अगर वह खालिस्तानी समर्थक सिख संगठनों का विरोध करते हैं, तो उनकी कुर्सी जानी तय है। ट्रूडो खुद को बैकफुट पर देख रहे हैं, इसलिए वह भारत के ख़िलाफ़ मुखर हो चुके हैं।

अर्थव्यवस्था पर होगा असर

भारत और कनाडा के बिगड़ते राजनयिक रिश्तों से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। अगर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की सलाह को मानकर कनाडा में रह रहे भारतीयों ने फ़ैसला लिया, तो कनाडा की अर्थव्यवस्था को नुक़सान होगा। लेकिन इससे भारत को भी नुक़सान होगा; क्योंकि कनाडा से भारत को जो पैसा भारतीय व्यापारियों और वहाँ रहकर नौकरी करने वालों के माध्यम से प्राप्त होता है, उसमें कमी आना तय है।

इसके अलावा भारत की कम्पनियों में कनाडा के भारतीय मूल के सिखों का निवेश कम हो सकता है। इसके अलावा दोनों देशों की पर्यटन से होने वाली आमदनी कम होगी। वहीं जो छात्र भारत से कनाडा पढऩे जाते हैं, उन पर बुरा असर पड़ेगा। हाल ही में कनाडा और भारत के बिगड़ते सम्बन्धों को लेकर कहा जा रहा है कि कनाडा में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्र घबराये हुए हैं।

किन देशों से बिगड़े रिश्ते?

भारत के रिश्ते कनाडा से बिगडऩे के बीच यह देखना ज़रूरी है कि कितने देश ऐसे हैं, जो भारत से दुश्मनी रखते हैं; और कितने देश ऐसे हैं, जो भारत के साथ दोहरी कूटनीतिक चाल चल रहे हैं। भारत के खुले दुश्मनों में चीन, पाकिस्तान, मलेशिया, तुर्की और इंडोनेशिया हैं। वहीं भारत के छिपे हुए दुश्मनों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा है। इन छिपे हुए दुश्मनों में कई ऐसे देश हैं, जिनके साथ अच्छे सम्बन्ध होने का प्रधानमंत्री मोदी दावा करते हैं।

दरअसल इन देशों से पिछले कुछ वर्षों में भारत के रिश्ते बिगड़े हैं। प्रधानमंत्री मोदी की ताबड़तोड़ विदेश यात्राओं और विदेशी नेताओं से लगाव के बावजूद रिश्ते बिगड़े हैं; भले ही भारत सरकार इसे स्वीकार न करे। इन देशों में श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान जैसे पड़ोसी देश तो शामिल हैं ही, अमेरिका, इजराइल, रूस और जापान जैसे डिप्लोमैटिक देश भी शामिल हैं।

नक़ली और घटिया दवाओं का कहर

आजकल जेनेरिक दवाओं का प्रचार-प्रसार तेज़ी से हो रहा है। तक़रीबन तीन-चार साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने की पहल की थी। इसकी वजह ग़रीबों को सस्ती दवाएँ उपलब्ध कराना है। इसके लिए केंद्र की मोदी सरकार ने जन औषधि केंद्र भी खोले। लेकिन अब कुछ शिकायतें आ रही हैं कि जेनेरिक दवाओं से जल्दी फ़ायदा नहीं हो रहा है। जेनेरिक दवाओं पर मूल्य पूरे पड़े हैं; लेकिन इनमें असली दवाओं की अपेक्षा क्षमता कम होती है और इनके दाम सामान्य दवाओं की तरह ही होते हैं, जिन पर छूट देकर उन्हें बेचा जाता है। इससे लोगों को लगता है कि उन्हें दवा सस्ती मिल गयी।

यह तो सामान्य-सी जानकारी है, जो लगभग सभी के पास है। असल मामला नक़ली और घटिया दवाओं का है। भारत में कई मेडिकल स्टोर वाले इन्हीं जेनेरिक दवाओं को असली दवाओं के रेट से बेच रहे हैं। दवा ख़रीदने वालों को पता ही नहीं चल पाता कि उनके साथ क्या धोखा हो रहा है। दरअसल सामान्य दवाओं पर ही मेडिकल स्टोर वालों को 15 से 45 प्रतिशत का फ़ायदा होता है। लेकिन और ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने के लालची कुछ मेडिकल वाले असली यानी ब्रांडेड दवाओं के नाम पर जेनेरिक या फिर दूसरी कम्पनियों की दवाएँ मरीज़ों को थमा रहे हैं, जिसके चलते मरीज़ों को फ़ायदा नहीं होता और मेडिकल स्टोर चलाने वाले चाँदी कूट रहे हैं।

इस तरह की मेडिकल वाले की हरकत को लेकर डॉक्टर सुधांशु ने अपने एक ताज़ा अनुभव को साझा किया। डॉक्टर सुधांशु ने बताया कि मैंने एक खाँसी-जुकाम से पीडि़त मरीज़ को, जो कि पहले से ही अस्थमा का मरीज़ था मोंट एयर टेबलेट लिखी। लेकिन मेडिकल वाले ने उसे जेनेरिक मोंट एयर थमा दी और उससे सिप्ला की मोंट एयर के दाम वसूल कर लिये। मरीज़ ने पाँच दिन वो दवा खायी; लेकिन उसे कोई आराम नहीं मिला। जब वो दोबारा मेरे पास आया, तो उसने बताया कि उसे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हो रहा है। मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने उसकी बीमारी का सही पता लगाने के लिए उसके चेकअप कराये; लेकिन उनमें कुछ ऐसा ख़ास नहीं था। फिर मैंने उससे कहा कि दवा लेकर मुझे दिखा देना। मरीज़ जब मेरे पास दवा लेकर आया, तो मैं हैरान था। उसके पास सारी दवाएँ जेनेरिक थीं। मैंने उससे कहा कि मेडिकल वाले के पास जाकर दवा वापस कर दो और मेरी बात करा देना। जब मरीज़ मेडिकल वाले के पास पहुँचा, तो वह मरीज़ को समझाने लगा कि दवा बिलकुल ठीक है, बस कम्पनी का फ़र्क़ है। जब मरीज़ ने कहा कि मेरे डॉक्टर से बात कीजिए, तो वह बात करने को राज़ी नहीं हो रहा था। जैसे-तैसे उसने मुझसे बात की, जब मैंने उससे कहा कि आप ओरिजनल कम्पनियों की दवा दीजिए, तो वह थोड़ी-बहुत आनाकानी करते हुए बोला ठीक है। मरीज़ मेरे पास दवा लेकर आया, मैंने दवा देखी और ठीक है कहकर मरीज़ को घर भेज दिया। तीन दिन में मरीज़ को 80 प्रतिशत फ़ायदा हो गया।

डॉक्टर सुधांशु ने बताया कि दरअसल जेनेरिक दवाओं को सरकार ने 40 प्रतिशत रेट पर बेचने की बात कही थी। इसके लिए सरकार ने अलग से जन औषधि केंद्र भी खोले। अब वही दवाएँ कई छोटी दवा कम्पनियाँ बनाने लगी हैं और मेडिकल वालों को ये जेनेरिक दवाएँ 15 से 22 प्रतिशत रेट पर मिलती हैं। इस तरह मेडिकल वालों को इन दवाओं को पूरे रेट पर बेचने पर 85 से 78 प्रतिशत तक का फ़ायदा दिखता है। लेकिन वे भूल जाते हैं कि वे अपने लालच में मरीज़ों से खिलवाड़ कर रहे होते हैं।

आज पूरी दुनिया के मरीज़ नक़ली और घटिया स्तर की दवाओं के शिकार हैं, जिसके कारण हर साल 20 प्रतिशत लोगों को डॉक्टर नहीं बचा पा रहे हैं। 55 प्रतिशत मरीज़ों की बीमारियाँ आसानी से ठीक नहीं हो रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक, दवा बाज़ार में 85 प्रतिशत खपत जेनेरिक दवाओं के अलावा नक़ली और घटिया दवाओं की हो चुकी है। नक़ली और घटिया दवाओं के चलते दुनिया में हर साल क़रीब पाँच लाख लोग जान गँवा देते हैं। इस हालत में भारत में जेनेरिक दवाओं का प्रचार-प्रसार लोगों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने के चक्कर में किया गया, ताकि लोगों को सस्ते इलाज से ख़ुशी मिल सके; लेकिन सवाल यह है कि इसका मरीज़ों को क्या फ़ायदा मिल रहा है? इलाज तो वैसे भी सस्ता होना ही चाहिए। अगर कम पॉवर की दवाएँ सस्ते में बेची जा रही हैं, तो इसमें मरीज़ों को कौन-सी राहत मिल गयी?

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की 40 प्रतिशत आबादी तक अच्छी कम्पनियों की दवाओं की पहुँच नहीं है। इसकी वजह इनका बेहद महँगा होना है। जिस 40 प्रतिशत की बात यहाँ हो रही है, वह ग़रीब वर्ग है और उसकी प्रति व्यक्ति औसत आय 100 रुपये प्रतिदिन से भी कम है। जब भी इस वर्ग को कोई सामान्य बीमारी होती है, तो वह उस बीमारी की गोली या तो मेडिकल स्टोर से ख़रीदता है या फिर अपने क़रीब के झोलाछाप डॉक्टर से दवा लेता है, जिसके पास सैकड़े वाली छोटी कम्पनियों की दवाएँ होती हैं। एक बार में मरीज़ से 20 से 40-50 रुपये लेने वाला यह डॉक्टर भी क्या करे? अगर वह प्रामाणिक कम्पनियों की दवाएँ मरीज़ों को देगा, तो ग़रीब मरीज़ दवाओं के पैसे ही नहीं दे सकेंगे। यह ग़रीब और गाँवों के रहने वाले मरीज़ों की ही बात नहीं है, बल्कि क़रीब 15 प्रतिशत मरीज़ शहरों में भी इसी तरह मेडिकल स्टोर से दवा लेकर या छोटे या झोलाछाप डॉक्टरों से दवा लेकर अपनी बीमारियाँ ठीक करने की कोशिश करते हैं।

हालाँकि नक़ली और घटिया दवाएँ बेचने वालों को यह मालूम होना चाहिए कि भारत में ड्रग एंड कॉस्मेटिक (डी एंड सी) अधिनियम, 1940 की धारा-17, 17(ए) और 17(बी) के तहत ख़राब गुणवत्ता वाली दवाएँ बेचना दंडनीय अपराध है। ख़राब गुणवत्ता वाली दवाओं में ग़लत ब्रांड की दवाएँ, नक़ली दवाएँ और मिलावटी दवाएँ शामिल हैं। सन् 2008 के ड्रग एंड कॉस्मेटिक अधिनियम में संशोधन किया गया और भारतीय दवा नियामक प्राधिकरण, जो केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन है; ने नक़ली, अत्यधिक घटिया और छोटे-छोटे दोषों वाली नक़ली दवाओं को क्रमश: ए, बी और सी जैसी तीन कैटेगरी में रखा है। इसमें मानक गुणवत्ता वाले यानी एनएसक्यू उत्पादों को वर्गीकृत नहीं किया है। ए कैटेगरी में नक़ली और मिलावटी दवाएँ शामिल की गयी हैं। इसमें वो नक़ली दवाएँ शामिल की गयी हैं, जिन दवाओं पर दवा बनाने में इस्तेमाल किये गये घटकों को छिपाकर किसी प्रसिद्ध ब्रांड के समान घटक लिखे होते हैं, जिससे मरीज़ों के साथ धोखा होता है। बी कैटेगरी में अत्यधिक घटिया दवाएँ शामिल हैं।

इन दवाओं में टैबलेट या कैप्सूल के लिए सक्रिय संघटक थर्मोलेबल और थर्मोस्टेबल उत्पाद के लिए क्रमश: 70 प्रतिशत  और 5 प्रतिशत अनुमत सीमा से नीचे मिलता है। सी कैटेगरी में इमल्शन क्रैकिंग, फॉर्मूलेशन के रंग में बदलाव, शुद्ध सामग्री में छोटे बदलाव, अवसादन, दवा के वज़न में गड़बड़ी, परीक्षण फेल होना, दवा में मलिनकिरण और असमान कोटिंग, ग़लत लेबलिंग वाले मामूली दोषों वाली दवाओं को शामिल किया गया है। इतने पर भी नक़ली और घटिया दवाओं की बिक्री में भारत का$फी आगे है। इसकी वजह यह है कि भारत में दवाओं की सही पहचान मेडिकल सम्बन्धी पढ़ाई तो करायी जाती है; लेकिन आम लोग दवाओं की कोई ख़ास जानकारी नहीं रखते। इसके साथ-साथ कई डॉक्टर भी कमीशन और ज़्यादा कमायी के चक्कर में नक़ली और घटिया दवाएँ मरीज़ों को देने से नहीं हिचकते।

भारत जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्माता है। वहीं दुनिया में क़रीब 25 प्रतिशत तक नक़ली, घटिया और दूषित दवाएँ आज बिक रही हैं। हालाँकि एक रिपोर्ट तो यहाँ तक दावा करती है कि आज दुनिया के मेडिकल बाज़ार में 30 से 40 प्रतिशत नक़ली, घटिया और दूषित दवाएँ बेची जा रही हैं। भारत में नक़ली और घटिया दवाओं से मौत के आँकड़े नहीं मिलते हैं; लेकिन चीन में हर साल 30 से 40 हज़ार लोग नक़ली और घटिया दवाओं के कारण जान गँवा देते हैं।

जनरल फिजिशियन डॉक्टर मनीष ने बताया कि ब्रांडेड दवाओं की पहचान की कमी और चंद लालची दवा विक्रेताओं, कुछ लालची डॉक्टरों की हरकत की वजह से मरीज़ों को घटिया या नक़ली दवाएँ उपलब्ध होती हैं, जिससे उनको लाभ न होने या कम लाभ होने के अलावा ख़तरा भी बना रहता है। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए और नक़ली या घटिया दवाओं के धंधे में लगे हुए लोगों को प्रतिबंधित करना चाहिए। यह डॉक्टरों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो अपने मरीज़ों को ब्रांडेड और सही दवाएँ ही लेने को कहें। मरीज़ों को कुछ पता नहीं होता और वो अपने डॉक्टर पर भरोसा भी करते हैं, इसलिए उन्हें धोखे से बचाना डॉक्टर की ज़िम्मेदारी बनती है।

नक़ली दवाओं के बाज़ार को कम करने के लिए ही फार्मास्युटिकल विभाग, रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने राज्य सरकारों के सहयोग से देश भर में जन औषधि अभियान शुरू किया था। लेकिन अब उन दवाओं की पहुँच सामान्य दवा विक्रेताओं तक भी होती जा रही है। जैसा कि डॉक्टर सुधांशु ने बताया कि उनके एक मरीज़ को मेडिकल स्टोर वाले ने जेनेरिक दवा ब्रांडेड दवा के रेट में बेच दी, जिससे मरीज़ को कोई आराम नहीं मिला। इसलिए केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों के ड्रग्स कंट्रोल विभागों को मेडिकल स्टोर वालों की जांच करने की ज़रूरत है। इसके साथ ही केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को भी नक़ली और घटिया दवाएँ बेचने और बनाने वालों के ख़िलाफ़ कड़े नियम बनाने की ज़रूरत है।

खेलों में भी चीन ने दिखाया ओछापन

रुणाचल के तीन खिलाडिय़ों को दिया स्टेपल वीजा, भारत को करनी चाहिए सख़्ती

चीन ने एक नक़्शा जारी कर एक महीना पहले भारत के राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताया था। अब उसने अरुणाचल के तीन खिलाडिय़ों को वीजा नहीं दिया, जिस कारण वे वहाँ के राज्य हांगझोऊ में चल रहे 19वें एशियाई खेलों में देश के अन्य खिलाडिय़ों के साथ नहीं जा सके। चीन एक के बाद एक विवाद खड़े करने का आदी रहा है। सीमा पर वह तनाव बनाये रखता है। ऐसे में बहुत-से भारतीय विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि भारत चीन के साथ भी वैसी ही सख़्ती दिखाए, जैसी सख़्ती उसने कनाडा के ख़िलाफ़ वहाँ के प्रधानमंत्री द्वारा खालिस्तानी कार्यकर्ता की हत्या का आरोप लगाने के विरोध में दिखायी है।

वीजा न देने की चीन की इस हरकत का नुक़सान उन भारतीय खिलाडिय़ों को हुआ, जो पूरी तैयारी करने के बावजूद 19वें एशियाई खेलों में हिस्सा लेने से वंचित हो गये। चीन के इस क़दम पर भारत ने खेल मंत्री अनुराग ठाकुर को चीन न भेजकर विरोध ज़रूर दर्ज किया; लेकिन यह कोई पहली बार नहीं है, जब चीन ने ऐसा किया हो। भारत के तीन खिलाडिय़ों- तेगा ओनिलु, लामगु मेपुंग और वांगसू न्येमान को हवाई अड्डे से वापस लौटना पड़ा। वैसे चीन ने जब अरुणाचल प्रदेश के इन तीनों एथलीट्स को वीजा जारी नहीं किया, तो सोशल मीडिया पर चीन की ख़ूब निंदा हुई। इससे पहले 26 जुलाई को भी विश्व विश्वविद्यालय खेलों के लिए इन्हीं तीनों खिलाडिय़ों को चीन ने नत्थी (स्टेपल) वीजा जारी कर दिया था। विरोध में भारत सरकार ने पूरी वूशु टीम को ही एयरपोर्ट से वापस बुला लिया था। उस समय भी चीन को फ़ज़ीहत झेलनी पड़ी थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इस मुद्दे पर चीन पर निशाना साधते हुए कहा- ‘भारत सरकार को पता चला है कि चीनी अधिकारियों ने पूर्व-निर्धारित तरीक़े से अरुणाचल प्रदेश के कुछ भारतीय खिलाडिय़ों को चीन के हांगझोऊ में होने वाले 19वें एशियाई खेलों में मान्यता और प्रवेश से वंचित करके उनके साथ भेदभाव किया है। भारत दृढ़ता से जातीयता के आधार पर भारतीय नागरिकों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार को अस्वीकार करता है।’

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इस मसले पर कहा- ‘भारत सरकार को माँग करनी चाहिए कि चीन को भविष्य में किसी भी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता की मेज़बानी के अधिकार से तब तक वंचित किया जाए, जब तक वह हर मान्यता प्राप्त एथलीट को अनुमति नहीं देता।’ एक्स (पहले ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में थरूर ने लिखा- ‘हर कोई हांगझोऊ एशियाई खेलों में भारत के प्रतिदिन जीते जा रहे पदकों का जश्न मना रहा है; लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन ने अपमानजनक तरीक़े से तीन भारतीय एथलीटों को अपने देश में प्रवेश की अनुमति देने से इनकार कर दिया था; क्योंकि वे अरुणाचल प्रदेश में पैदा हुए हैं।’

ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया (ओसीए) की भूमिका वीजा मामले में चीन सरकार समर्थक रही। ओसीए की ‘एथिक्स कमेटी’ के अध्यक्ष वेई जिजहोंग ने दावा किया- ‘इन भारतीय एथलीटों को चीन में प्रवेश करने के लिए पहले ही वीजा मिल चुका है। चीन ने किसी भी वीजा से इनकार नहीं किया। दुर्भाग्य से इन एथलीट ने इस वीजा को स्वीकार नहीं किया।’ जिजहोंग ने जो वीजा देने का दावा किया, वह स्टेपल वीजा था, जिसका भारत सरकार ने कड़ा विरोध जताया। स्टेपल वीजा के मायने हैं कि अरुणाचल को चीन भारत का हिस्सा न मानकर उसे विवादित क्षेत्र मानता है।

ओछी हरकतें करता रहता है चीन

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सरकार को चीन पर दबाव बनाना चाहिए। चीन से विदेशी कम्पनियाँ इंडोनेशिया और भारत शिफ्ट हो रही हैं। ऐसे में यह सही समय है कि दबाव में चल रहे चीन की हेकड़ी का जबाव उसी भी भाषा में दिया जाए। कनाडा को भारत ने दबाव में लिया है; चीन को भी लिया जा सकता है। वैसे तो विदेश मंत्रालय ने इस मसले पर चीन से कड़ा ऐतराज़ जताया। हालाँकि जानकारों का कहना कि यह काफी नहीं है। चीन की इस दादागीरी को चुनौती देनी चाहिए; क्योंकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। चीन कभी भारत के अरुणाचल प्रदेश को अपने नक्शे में दिखाकर उसे अपना हिस्सा बता देता है; कभी कोई और हरकत कर देता है।

शिक्षा पर राजनीतिक ग्रहण

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

छात्र राजनीति एक तरफ़ और कॉलेज, यूनिवर्सिटी का शिक्षण-प्रशिक्षण एक तरफ़। पार्टियों की राजनीति एक तरफ़ और देश व जनता एक तरफ़। इस भँवर जाल में कौन, किसका हितैषी है? इसका आकलन करना आसान नहीं। डीयू के डूसू चुनाव को ही ले लीजिए, जिसमें ख़ूब गहमा-गहमी देखने को मिली। बात प्रचार से लेकर शुरू हुई और मार-पीट तक जा पहुँची। इस दौरान वोटरों को लुभाने, प्रचार में भीड़ जुटाने के लिए 600 से लेकर 1,200 रुपये तक के रेट कार्ड चले। प्रथम वर्ष के छात्र-छात्राओं के लिए पूल पार्टी, बर्गर, पिज्जा, मूवी शो के साथ रेंजरोवर, लैंबॉर्गनी, फॉच्र्यूनर जैसी महँगी-महँगी गाडिय़ों में क़ाफ़िले भी निकले।

कुछ इसी अंदाज़ में चुनावी बिसात बिछायी गयी डूसू चुनाव में। जैसे आम वोटर को लालच दिया जाता है, वैसे कॉलेजों के छात्रों को लालच में फँसा लिया जाता है। फ़र्क़ इतना है कि आम वोटर कम पढ़े-लिखे भी हो सकते हैं और ये ज़्यादा पढ़े-लिखे ही होते हैं। लेकिन नासमझों के लालच में कोई विशेष अंतर नहीं दिखायी देता; चाहे वो ग़रीब हों या अमीर। अनपढ़ हों या पढ़े-लिखे। छात्र संगठनों की भूमिका भारत में स्वतंत्रता आन्दोलनों से अब तक बहुत बदली है। ये आन्दोलन महत्त्वपूर्ण भी रहे हैं; लेकिन आज इनमें नफ़रत और हिंसा बढ़ रही है। परिवर्तनकारी समाज में छात्र या कहें युवा देश की रीढ़ हैं और देश का भविष्य हैं।

भारत में छात्र राजनीति की जड़ें गहरी हैं। सन् 1848 भारत में सबसे पहले दादाभाई नौरोजी ने स्टूडेंट साइंटिफिक एंड हिस्टोरिक सोसाइटी की स्थापना एक छात्र मंच के रूप में की थी। भारत में इस मंच को ही छात्र आन्दोलन का सूत्रधार माना जाता है। सन् 1913 में पहली बार इस संगठन ने अंग्रेजी छात्रों और भारतीयों के बीच अकादमिक भेदभाव के विरोध में किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज, लाहौर में हड़ताल की थी। सन् 1918 तक छात्र आन्दोलन का दायरा काफ़ी बढ़ गया। सन् 1905 में यह एक स्वदेशी आन्दोलन के रूप में बहुत मज़बूती के साथ देशहित में खड़ा दिखायी दिया। इस आन्दोलन में छात्रों ने सामूहिक रूप से कॉलेजों, ब्रिटिश सामान और छात्र क्लब का बहिष्कार किया। अखिल भारतीय कॉलेज छात्र सम्मेलन में सन् 1912 में अहमदाबाद में महात्मा गाँधी के साथ पहले चरखा स्वराज और शिक्षा का नारा बुलंद किया। सन् 1919 में असहयोग आन्दोलन के दौरान भारतीय छात्रों ने स्कूल और कॉलेज का बहिष्कार किया। सन् 1936 में आरएसएस की विचारधारा के साथ हिन्दू छात्र संघ का गठन किया गया। इस संगठन ने विभिन्न माँगों को लेकर सन् 1936 में अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन लखनऊ में आयोजित किया, जिसमें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, पंजाब, उड़ीसा के छात्र और प्रतिनिधि शामिल हुए। हिन्दू छात्र संघ के बाद सन् 1937 में मुस्लिम लीग ने अखिल भारतीय मुस्लिम छात्र संघ की स्थापना की। हिन्दुओं की बहुलता को देखते हुए अपने अधिकारों को संरक्षित करने के लिए इस संघ ने मुसलमानों के लिए अलग देश की माँग। इसके लिए आन्दोलन भी चले। 

इसके बाद आज़ाद भारत में सन् 1949 में संघ कार्यकर्ता बलराज मधोक की अगुवाई में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) का गठन हुआ। धीरे-धीरे छात्र आन्दोलन का स्वरूप बदलने लगा। स्वतंत्रता के बाद देखा जाए, तो छात्र संगठन राजनेताओं के लिए एक प्रमुख राजनीतिक हथियार बनकर उभरे; लेकिन इसके बावजूद चिपको आन्दोलन, आपातकाल के दौरान हुए आन्दोलन, मंडल विरोधी आन्दोलन इत्यादि में छात्रों ने बढ़ चढक़र हिस्सा लिया। आज़ादी के बाद विभिन्न कॉलेजों में कई सारे संगठन अपनी माँगों को लेकर सामने आये।

सन् 1959 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने युवा पीढ़ी की प्रगतिशीलता और लोकतांत्रिक रूप से एकजुट करने के लिए अखिल भारतीय युवा संघ की स्थापना की। सन् 1967 में चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल ने सामंती शोषण के विरुद्ध नक्सलवादी आन्दोलन की शुरुआत की। बाद में छात्रों की एकजुटता ने इसे और भी ज़्यादा क्रांतिकारी बना दिया, जिसका आज बिगड़ा रूप हम देख सकते हैं। इंदिरा गाँधी ने सन् 1971 को एक राष्ट्रीय छात्र संगठन बनाने के लिए केरल स्टूडेंट यूनियन और पश्चिम बंगाल राज्य परिषद् के विलय के बाद नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) की स्थापना की। भगवान बुद्ध के ज्ञान को प्रचार-प्रसार के लिए बाबा साहेब अंबेडकर ने विदर्भ रिपब्लिक छात्र संघ की स्थापना की। 

आज़ादी के काफ़ी वर्ष बाद सन् 1974 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और समाजवादी छात्रों ने पहली बार एकजुट होकर संघर्ष समिति का गठन किया और आपातकाल के विरोध में आन्दोलन शुरू किया। उस दौरान राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव इसके अध्यक्ष और बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी इसके महासचिव चुने गये। इस दौरान आन्दोलन में नयी ऊर्जा भरने के लिए जयप्रकाश नारायण को छात्रों द्वारा आमंत्रित किया गया, जिसके बाद आपातकाल के विरोध में ज़ोरदार किया गया, किसके कारण कांग्रेस सरकार को घुटने टेकने पड़े। इस प्रकार देखें, तो छात्र आन्दोलनों ने देश की भागीदारी में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यह अलग बात है कि धीरे-धीरे छात्र आन्दोलन नेता और आन्दोलन नेताओं के हाथ में कठपुतली बनकर रह गये।

समय, काल परिस्थिति के हिसाब से आज छात्र संगठनों की भूमिका संकुचित हो गया है। एक दौर था, जब छात्रों की आवाज़ देश की आवाज़ होती थी, जिससे समाज को नयी दिशा और दशा मिलती थी। आज वह राजनीतिक पार्टियों, विशेषतौर पर एक पार्टी विशेष तक सीमित होकर रह गयी है और ज़्यादातर छात्र उन्हीं के एजेंडे में शामिल होकर एक एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। आज छात्रों और पढ़ाई के मुद्दे नहीं, बल्कि किसी भी तरीक़े से जीत सर्वोपरि है। आज छात्र संगठनों का सरोकार नहीं, उनका आकार मायने रखते हैं। आज बुनियादी बातें नहीं, ल$फ्फ़ाज़ी मायने रखती है। काम नहीं, प्रचार मायने रखता है। किसी चीज़ में क्या बुनियादी सुधार हो सकता है? इसकी चर्चा ही नहीं होती। राजनीति का स्तर क्या होना चाहिए? छात्रों का क्या स्तर होना चाहिए? विश्वविद्यालय में पढ़ाई का कैसा माहौल होना चाहिए? छात्रों और शिक्षकों के बीच अकादमिक संवाद को कैसे बढ़ाया जाना चाहिए? किसी भी मामले का हल सौहार्दपूर्ण तरीक़े से कैसे निकाला जाए? इन तमाम बुनियादी बातों की तरफ़ किसी का ध्यान ही नहीं है। विश्वविद्यालय में कोई नया नियम निकालने की बात हो या नया प्रोग्राम लॉन्च करने की बात हो, सब ऐसे चलते हैं कि जैसे कॉलेज प्रशासन का शिक्षकों और छात्रों से इत्तिफ़ाक़ ही न हो। कई नियम प्रशासन मनमाने तरीक़े से थोप देता है। अब चाहे उससे छात्रों को नुक़सान हो या शिक्षकों का। बस फ़रमान जारी कर दिया जाता है। ऐसे कुप्रबंधन की वजह सरकार की नीतियाँ और छात्र आन्दोलन की कमी है, जिसके कारण हालत सुधर नहीं रहे हैं। ऐसे कई मामले हैं, जो छात्रों के भविष्य को लेकर चिन्तित करते हैं। 

छत्तीसगढ़ के बस्तर विश्वविद्यालय की स्थिति भी कुछ यही बयाँ करती है। इसी साल बस्तर विश्वविद्यालय से सम्बन्धित क़रीब 23 विश्वविद्यालयों के परीक्षा परिणाम में 20,000 से अधिक छात्र फेल हो गये। माना जा रहा है कि इसकी मुख्य वजह परीक्षा में हुआ बदलाव है। वहीं दूसरी बड़ी वजह शिक्षकों की कमी बतायी जा रही है। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय ने मनमाने तरीक़े से कुछ ऐसे नियम बनाये, जिससे छात्रों को परीक्षा में बेहतर परिणाम नहीं मिल रहे हैं। वहीं जेएनयू जैसे नामी संस्थान में लगातार छात्रों की कमी से विश्वविद्यालय के कामकाज और नीति-निर्धारण को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। जेनएयू शिक्षक संघ ने एक रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि शिक्षण वर्ष 2016-17 में छात्र-छात्राओं का अनुपात 62.21 प्रतिशत था, जो कि 2021-22 में कम होकर 46 प्रतिशत रह गया। जेएनयू शिक्षक संघ के मुताबिक, यह प्रवेश परीक्षा में बदलाव की वजह से हुआ है। जेएनयू में प्रवेश अब एनटीए के ज़रिये होता है।

पहले जब यह परीक्षा जेएनयू लेता था, तब ग़रीब और वंचित तब$कों को परीक्षा में अतिरिक्त नंबर दिये जाते थे; लेकिन इसे अब ख़त्म कर दिया गया है। एनटीए द्वारा आयोजित परीक्षा केंद्र इतने दूर होते हैं कि बहुत-से छात्र-छात्राएँ पहुँच ही नहीं पाते, जिससे छात्रों का अनुपात प्रभावित हुआ है। एक तरफ़ जहाँ बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ सहित महिलाओं के सशक्तिकरण का बिल पास किया गया, तो वहीं जेएनयू जैसे संस्थान में छात्राओं की कमी देश के लिए एक गम्भीर चिन्ता का विषय है। लेकिन मौज़ूदा केंद्र की राजनीति ऐसे फ़ैसले लेने पर आमादा है। छात्र संगठनों का पार्टियों के रूप में कार्य करना छात्रों की समस्याओं को बढ़ाने की भूमिका में है। छात्र आपस में ही लड़ते रहते हैं। पार्टियों के बैनर तले छात्र संगठनों का चाल-चरित्र नेताओं की ही तरह हो गया है; चाहे बात ख़र्चे की हों या पर्चे की। दोनों एक ही सांचे में ढले हुए दिखायी देते हैं। चुनाव लडऩे वाले छात्र नेता भी आम नेताओं की तरह सत्ता हासिल करने के लिए करोड़ों ख़र्च करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के डूसू चुनाव की अगर बात करें, तो एक उम्मीदवार के ख़र्च की सीमा 5,000 रुपये तय की गयी थी। इसके बावजूद उम्मीदवारों ने करोड़ों रुपये ख़र्च किये गये और तर्क दिया कि यह ख़र्च प्रत्याशियों के समर्थक कर रहे हैं। डूसू चुनाव में आचार संहिता की भी जमकर धज्जियाँ उड़ायी गयीं।

विश्वविद्यालय में प्रत्याशियों ने जिस तरह से ताक़त झोंकी, उससे यही लगता है कि इस जीत में मलाई-ही-मलाई है, जिसके लिए वे करोड़ों ख़र्च करने से भी नहीं कतराते। ऐसा भी नहीं है कि मु$फ्त की रेवड़ी सिर्फ़ विधानसभा या लोकसभा चुनावों में बँटती है। यह ट्रेंड छात्र संघ चुनाव में भी साफ़ देखा जा सकता है। डूसू प्रत्याशी छात्र वोटरों को लुभाने के लिए यही सब करते हैं; इस बार भी किया। कैंपस में पटे पड़े बैनरों, पोस्टरों, पर्चों और धुआँधार प्रचार से साफ़ लगता है कि चुनाव में प्रत्याशियों ने जमकर पैसे उड़ाये और कैंपस को चुनावी दफ्तर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह चुनाव भले ही छात्रों का चुनाव हो; लेकिन उनकी प्रक्रिया आम चुनावों जैसी ही है। छात्र राजनीति अब एक अलग तरह की दबंग राजनीति में तब्दील हो गयी है, जिसमें अब रुतबा, पैसा, लड़ाई, नहीं है। बैनरों और पोस्टरों को देखकर लगता है कि इनके बीच कॉलेज और विश्वविद्यालय कहीं खो-से गये हैं। ऐसे माहौल को देखकर लगता नहीं कि यही छात्र देश के भविष्य हैं, जो चंद वोटों की ख़ातिर कुछ भी करने को आतुर हैं।

ऐसे में हर स्तर पर राजनीति का दूषित होना चिन्ता का विषय है। यही कारण है कि अब बड़ी संख्या छात्र इससे तौबा करने लगे हैं। डूसू चुनाव में जिस तरह से छात्रों ने जमकर नोटा का बटन दबाकर इसका विरोध किया, उससे तो यही लगता है। सचिव, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व संयुक्त सचिव पर कुल 16,559 छात्रों ने नोटा का बटन दबाया। डूसू चुनाव में भले एबीवीपी ने उपाध्यक्ष पद को छोडक़र तीनों पदों पर क़ब्ज़ा कर लिया हो; लेकिन इससे विश्वविद्यालय और छात्रों का क्या भला होता है? इसे गहनता से देखा जाना चाहिए।

विश्व गुरु का दम भरने वाला भारत शिक्षा पर जारी वैश्विक रैंकिंग में फिसड्डी साबित हुआ है। क्यूएस विश्वविद्यालय रैंकिंग-2023 के टॉप 250 में महज़ आईआईटी दिल्ली 197वें और आईआईटी मुंबई 149वें स्थान पर हैं। इस साल जारी रैंकिंग में ज़्यादातर संस्थानों की रैंकिंग में गिरावट दर्ज की गयी है। दिल्ली विश्वविद्यालय को 521 और 530 रैंकिंग मिली है। क्या भारत के टॉप 10 विश्वविद्यालयों की यह रैंकिंग हमें विश्व गुरु बना सकेगी? जिस तरह की देश की राजनीति और उसकी देखा-देखी छात्र राजनीति चल पड़ी है, क्या वो हमारी नैया पार लगा पाएगी?

महिलाओं को निगल रहा दहेज़

हाल में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण सम्बन्धी नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा व राज्यसभा में पारित हो गया। महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद क़ानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि विकसित भारत बनाने को नारी सशक्तिकरण आवश्यक है। यह महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक सहभागिता बढ़ाने का अवसर देने वाला विधेयक है।’

इसमें कोई दो-राय नहीं कि महिलाओं की भागीदारी राजनीति, आर्थिक व सामाजिक मंचों पर बढ़ती हुई दिखनी चाहिए, इससे किसी को भी एतराज़ नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यहाँ पर यह भी अहम हो जाता है कि महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उनके प्रति होने वाली हिंसा, अपराध को रोकने को लेकर सरकार कितनी गम्भीर है? आज क्यों दहेज़ जैसी प्रबल सामाजिक बुराई को रोकने में सरकार व समाज दोनों विफल हैं? दहेज़ निषेध क़ानून तो है; मगर क्या सरकार व अमल में लाने वाली एजेंसियों को इस बात की ख़बर नहीं है कि अब दहेज़ देने व लेने वाले रिवाज़ ने अलग तरह का चोला धारण कर लिया है। देश में दहेज़ सम्बन्धित मौतों के आँकड़ें सरकार के लिए मात्र सरकारी आँकड़े ही हैं, जो हर साल सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज होते रहते हैं। पर क्या वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ व बेटी आगे बढ़ाओ वाली योजना को सवालों के घेरे में खड़ा नहीं करते?

देश में रोज़ाना 20 महिलाएँ दहेज़ के कारण मार दी जाती हैं। 14 दिसंबर, 2022 को संसद में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के हवाला देते हुए यह जानकारी साझा की गयी। दरअसल केंद्रीय गृह मंत्री अजय कुमार मिश्रा द्वारा कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल को दिये गये लिखित उत्तर के अनुसार, वर्ष 2017 और वर्ष 2021 के बीच भारत में कुल 35,493 दहेज़ हत्याएँ हुईं। वर्ष 2017 में 7,466, वर्ष 2018 में 7,167, वर्ष 2019 में 7,141, वर्ष 2020 में 6,966 और वर्ष 2021 में 6,753 दहेज़ हत्याएँ सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज हैं। पर इसके साथ यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हर दहेज़ हत्या सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज हो; क्योंकि बहुत-सी घटनाओं को लेकर लोग ही पुलिस के पास नहीं जाते और फिर ज़रूरी नहीं है कि पुलिस हर दहेज़ उत्पीडऩ के मामले को गम्भीरता से ले और उपयुक्त धारा के तहत मामला दर्ज करें।

बहरहाल सरकारी आँकड़ों के विस्तार में जाएँ, तो पता चलता है कि वर्ष 2017 व वर्ष 2021 की अवधि यानी इन पाँच वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक दहेज़ हत्याएँ (11,874) दर्ज की गयीं। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार की यह लगातार दूसरी पारी है। योगी जी के नेतृत्व में पहली मर्तबा भाजपा की सरकार वर्ष 2017 में ही सत्ता में आयी थी और 2022 में फिर से सत्ता में है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, जिनकी छवि बुलडोजर वाले मुख्यमंत्री की गढ़ दी गयी है, और जो अपने राज्य में अपराधियों को किसी भी प्रकार की छूट नहीं देने का दावा करते हैं, उनके ही शासन-काल में महिला के प्रति अपराधों की सूची के तहत आने वाले दहेज़ हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश देश में शीर्ष स्थान पर है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के साथ प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर वाले बड़े-बड़े होर्डिंग के ज़रिये इस राज्य के विकास को लेकर बड़े-बड़े सरकारी दावे किये जाते हैं; मगर महिलाओं की एक असली तस्वीर यह भी है। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार का नंबर आता है, जहाँ 2017-2021 के दरमियान दहेज़ के लिए 5,354 महिलाओं की हत्या कर दी गयी।

$गौरतलब है कि देश में कुल दहेज़ हत्याओं में से लगभग आधी (48 प्रतिशत) उत्तर प्रदेश व बिहार में होती हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो बिहार में बीते कई वर्षों से लगातार मुख्यमंत्री बने हुए हैं; आख़िर दहेज़ हत्याओं को रोकने में वे कहाँ विफल हो रहे हैं। इस पर उन्हें ध्यान देने की ज़रूरत है। महिलाओं की मतदाता के तौर पर राजनीतिक ताक़त का एहसास करने वाले इस राजनेता व राज्य के मुख्यमंत्री के पास संभवत: इस सवाल का कोई जवाब होगा। इस सूची में भाजपा शासित मध्य प्रदेश तीसरे नंबर पर है, यहाँ दहेज़ हत्याओं की संख्या 2,859 है और उसके बाद पश्चिम बंगाल में 2,389 व राजस्थान में 2244 मौतें दर्ज की गयीं।

इसी तरह ओडिशा में 1,653, हरियाणा में 1,235, महाराष्ट्र में 998, कर्नाटक में 934 और तेलंगाना में 933 महिलाएँ दहेज़ के लिए मार दी गयीं। देश की राजधानी दिल्ली में इन पाँच वर्षों में 639 दहेज़ हत्याओं वाला आँकड़ा आता है। पंजाब में 336 तो उत्तराखण्ड में 317 महिलाओं की हत्या की वजह यही दहेज़ बना। राज्य जैसे कि मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, मेघालय, मणिपुर, गोवा, केरल, हिमाचल प्रदेश व तमिलनाडु में 2017-2021 के दरमियान हर साल औसतन 0-50 मामले प्रति वर्ष दर्ज किये गये। देश में दहेज़ की माँग के कारण जान गँवाने व प्रताडि़त होने वाली महिलाओं की संख्या बीते कई वर्षों से अक्सर प्रमुख चर्चा का विषय बनती नज़र नहीं आती। दिल्ली की ही एक सोसायटी में कपड़े प्रेस करने वाली रेणु (नाम असली नहीं) नामक महिला ने बताया कि उसकी बेटी जो कि स्नातक पास है, उसके लिए जो लडक़ा पसन्द आया, उसने शादी से कुछ दिन पहले एक बहुत महँगी मोटरसाइकिल की माँग कर डाली।

रेणु, जो विधवा हैं; ने लडक़े को समझाया कि मेरे पास पैसा नहीं है। लेकिन वह अपनी माँग से टस-से-मस नहीं हुआ और रेणु ने उधार लेकर उसकी इस दहेज़ की माँग को पूरा किया। लेकिन अब भी शादी के दो साल बाद वह अपनी पत्नी (रेणु की बेटी) को अपनी माँ (रेणु) से और दहेज माँगने के लिए प्रताडि़त करता रहता है। यह मसला सिर्फ़ कम आय वालों तक ही सीमित नहीं है। मध्यम आय वाले व उच्च आय वाले परिवारों की माँग महँगी कारों व फ्लैटों, प्लॉट या शेयर बाज़ार में निवेश की शक्ल में बदल गयी है। शादियों में सोने की जगह हीरे के गहनों की माँग प्रचलन में आ गयी है। डेस्टिनेशन शादी की प्रचलन रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। हाल ही में राज्यसभा सांसद व आप पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने फ़िल्म अभिनेत्री परिणति चोपड़ा से उदयपुर में शादी की है।

इस शादी में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी शिरकत की। इस शादी पर कितने करोड़ ख़र्च हुए? यह वास्तविक रक़म सामने आएगी या नहीं, पता नहीं। हाँ; यहाँ दहेज़ का मसला भी नहीं होगा। पर इस तरह की होने वाली शादियाँ समाज के अन्य तबकों पर एक दबाव बनाने का काम करती हैं, और इस दबाव में लोग उधार लेकर या अपनी अन्य कई महत्त्वपूर्ण ज़रूरतों को एक तरफ़ धकेलकर सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर बड़ी हस्तियों का अनुसरण करते हैं। इससे वे एक बोझ तले दबते चले जाते हैं। क्या राजनेताओं को सिंपल शादी करके आम जनता के सामने एक मिसाल नहीं पेश करनी चाहिए। ऐसी शान-ओ-शौक़त जो आमजन के हित में नहीं है। उसके विरोध में खड़े होकर अपनी अलग पहचान बनाने का यह मौक़ा इस युवा नेता ने संभवत: खो दिया है। बहरहाल देश में दहेज़ निशेध अधिनियम-1961 है। इस अधिनियम का मक़सद दहेज़ प्रथा पर रोक लगाना और इससे पीडि़त महिलाओं को सुरक्षा देना था। विवाहित महिलाओं के प्रति दहेज़ सम्बन्धी क्रूरता को रोकने के लिए सन् 1983 में आईपीसी की धारा-498(ए) के तहत मामले दर्ज करने का ख़ास प्रावधान किया गया। इसके तहत यह प्रावधान किया गया कि अगर शादी के सात साल के अन्दर महिला की मौत ससुराल में अस्वाभाविक तरीक़े से होती है, तो यह दहेज़ हत्या माना जाएगा। यह सच है कि इस धारा ने दहेज़ की माँग से पीडि़त कई महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने में मदद की; लेकिन इसके समानांतर यह हमेशा से आलोचना के घेरे में भी रही है।

क़ानून के कई जानकार इससे सहमत हैं कि कई महिलाएँ अपने पतियों को परेशान करने के लिए इसका बेजा इस्तेमाल करती हैं। वर्ष 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं द्वारा आईपीसी की धारा-498(ए) के दुरुपयोग को क़ानूनी आतंकवाद क़रार दिया था। यही नहीं, कुछ महीने पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान अपने फ़ैसले में कहा- ‘यदि मौत का कारण पता नहीं हो, तो शादी के सात साल के भीतर ससुराल में सभी अस्वाभाविक मौत को दहेज़ हत्या नहीं माना जा सकता है।’ न्यायालय क़ानून के साथ-साथ तर्कों, साक्ष्यों के आधार पर अक्सर अपने फ़ैसले सुनाते हैं। दहेज़ देश में आज भी क़ानून बनने के बाद भी सामाजिक कुप्रथा के तौर पर मौज़ूद है।

सामाजिक ताने-बाने में आज भी यह कुप्रथा समायी हुई है। दहेज़ को समाज एक अनुष्ठान के तौर पर लेता है। सरकार भी दहेज़ के विरोध में अधिक मुखर भूमिका निभाती नज़र नहीं आती। संसद में 2021 में महिला व बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि मंत्रालय समय-समय पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाता रहता है। राष्ट्रीय महिला आयोग व राज्य महिला आयोग सेमिनार, कार्यशालाओं के ज़रिये लोगों को दहेज़ की बुराइयों व क़ानून के ज़रिये जागरूक करते रहते हैं। भारत विश्व गुरु बनने की छवि गढऩे में कोई कसर नहीं छोड़ रहा, उसे दहेज़ से होने वाली हत्याओं को रोकने के लिए ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है।

नूह दंगा और राजनीतिक लुका-छिपी

हरियाणा में नूह (मेवात) दंगे में अब तक 100 से ज़्यादा मामलों में 595 लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है। इनमें ज़्यादातर आरोपी दंगों में सीधे तौर पर शामिल रहे हैं। वहीं कुछ की अपरोक्ष रूप से भागीदारी रही है। दंगों की भूमिका तैयार करने, लोगों को उकसाने और सोशल मीडिया पर भडक़ाऊ बयानबाज़ी के आरोप में बजरंग दल के बिट्टू बजरंगी और गौरक्षक मोहित यादव उर्फ़ मोनू मानेसर की गिरफ़्तारी के बाद पुलिस की विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने कांग्रेस विधायक मामन ख़ान को गिरफ़्तार कर लिया है।

मामन ख़ान मेवात के फ़िरोज़पुर झिरका से कांग्रेस विधायक हैं। वह चार मामलों में आरोपी हैं। दंगों में उनकी भूमिका की बातें शुरू से चल रही थीं; लेकिन बिना सुबूत पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पा रही थी। पुलिस के पास अब उनके ख़िलाफ़ कुछ सुबूत हैं, जिनके आधार पर कार्रवाई की गयी है। मामन को अपनी गिरफ़्तारी का डर सताने लगा था। उन्होंने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की अर्जी लगायी थी। उच्च न्यायालय ने उन्हें तुरन्त कोई राहत देने की बजाय निचली अदालत में जाने को कहा था। वह निचली अदालत में जाते उससे पहले पुलिस ने उन्हें अजमेर (राजस्थान) से गिरफ़्तार कर लिया।

दंगों की विस्तृत जाँच कर रही एसआईटी ने दो बार नोटिस देकर मामन ख़ान को पूछताछ के लिए बुलाया भी; लेकिन वह पेश नहीं हुए। उन्हें पूछताछ के बहाने गिरफ़्तारी का डर था; इसलिए वह पहले अग्रिम जमानत लेना चाहते थे। एसआईटी का दावा है कि मामन ख़ान की दंगों में अपरोक्ष तौर पर भूमिका रही है, उसके पास इसे साबित करने के लिए काफ़ी तथ्य हैं। भडक़ाऊ वीडियो से लोगों को उकसाने के आरोप में एसआईटी ने बजरंग दल के बिट्टू बजरंगी को तो गिरफ़्तार कर लिया; लेकिन गौरक्षक मोनू मानेसर पर कोई कार्रवाई न होने से एक विशेष समुदाय में काफ़ी रोष था। मेवात में मोनू इस विशेष समुदाय में खलनायक जैसा है।

गौरक्षा के नाम पर भरतपुर (राजस्थान) के दो चचेरे भाइयों नासिर और जुनैद की हत्या के मामले में भी मोनू आरोपी है। राजस्थान पुलिस क़रीब सात माह से उसकी तलाश में है; लेकिन वह पकड़ से बाहर है। राजस्थान पुलिस उससे इस मामले में पूछताछ करना चाहती है और कई बार उसके ठिकानों पर दबिश भी दी; लेकिन उसे पकड़ नहीं सकी। अब एसआईटी ने नूह दंगों के आरोप में उसे मानेसर ही बड़ी आसानी से क़ाबू कर लिया।

मोनू को राजस्थान पुलिस नासिर और जुनैद हत्याकांड मामले में ट्रांजिट रिमांड पर भरतपुर ले गयी है। राजस्थान पुलिस के मुताबिक, मोनू से दोहरे हत्याकांड में पूछताछ की जानी है। राजस्थान के पुलिस महानिदेशक उमेश मिश्रा के अनुसार, नासिर-जुनैद हत्याकांड में मोनू की सीधी संलिप्तता के अभी कोई सुबूत नहीं है; लेकिन इसमें उसकी भूमिका क्या थी? यह स्पष्ट होना बा$की है। मोनू मानेसर की गिरफ़्तारी के बाद हिन्दू संगठनों की तरफ़ से फ़िरोज़पुर झिरका के कांग्रेस विधायक मामन ख़ान को भडक़ाऊ बयानों के आधार पर गिरफ़्तार करने की माँग शुरू कर दी गयी। इसे संयोग कहें या फिर बैलेंस करने वाली कार्रवाई, दो दिन बाद मामन ख़ान की गिरफ़्तारी हो गयी। हरियाणा के पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के मुताबिक, एसआईटी कार्रवाई तथ्यों और सुबूतों के आधार पर कर रही है। दंगों के लगभग डेढ़ महीने के बाद गिरफ़्तारी इसी बात का सुबूत है।

विधायक मामन ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उदय भान से साझा बयान जारी कर कहा कि एसआईटी पक्षपातपूर्ण कार्रवाई कर रही है। सरकार को दंगों की जाँच न्यायिक आयोग से करानी चाहिए। उच्च न्यायालय के मौज़ूदा न्यायाधीश की अध्यक्षता में विस्तृत जाँच होनी चाहिए, तभी सच सामने आ सकेगा। मामन ने ख़ुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि सरकार अपनी नाकामी को छिपाने के लिए दंगों में उनकी भूमिका को साबित करने में लगी है। दंगों के एक आरोपी तौफ़ीक़ की मामन ख़ान से दंगे भडक़ने से पहले मोबाइल की काल डिटेल बहुत कुछ संकेत करती है। पुलिस का मानना है कि मामन ख़ान के जिस मोबाइल नंबर से बातचीत हुई है, उसे फारमेट किया गया है। तथ्य और सुबूत मिटाने का एक तरह से प्रयास किया गया है। तकनीक के माध्यम से इसे फिर से जुटाया जा सकता है।

दंगों के बाद पुलिस अधीक्षक के तौर पर तैनात नरेंद्र बिजारणिया स्पष्ट कहते हैं कि मामन ख़ान की गिरफ़्तारी ठोस साक्ष्य के आधार पर हुई है। एसआईटी पुलिस हिरासत के दौरान मामन ख़ान के असहयोगी रुख़ की बात कहती है। पूछताछ में वह किसी सवाल का स्पष्ट जवाब न देकर यही कहते रहे कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं या उन्हें ध्यान नहीं है। पाँच दिन की पुलिस हिरासत के बाद मामन ख़ान की न्यायिक हिरासत में पूछताछ होगी।

दंगा पूर्व नियोजित था, इसमें कोई संशय नहीं है। विश्व हिन्दू परिषद् की बृजमंडल यात्रा के रास्ते में जगह-जगह हथियारबंद हमले की तैयारी एकाएक नहीं हो सकती। बिना राजनीतिक संरक्षण दंगा इतने बड़े स्तर पर हो ही नहीं सकता। एसआईटी जब तक दंगों के मास्टर माइंड तक नहीं पहुँच जाती, तब तक जाँच का कोई अर्थ नहीं है। सोशल मीडिया, वीडियो फुटेज और चश्मदीदों के बयानों के आधार पर कमोबेश गिरफ़्तारियाँ हुई हैं। दंगों के तुरन्त बाद बहुत से आरोपी भाग चुके हैं, ये भी देर-सबेर पुलिस गिरफ़्तार में आएँगे। नूह दंगा हरियाणा सरकार की नाकामी से हुआ। दंगों से पहले एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट (सीआईडी) सरकार तक पहुँची थी; लेकिन उसे गम्भीरता से नहीं लिया गया। हरियाणा में सीआईडी विभाग गृहमंत्री अनिल विज की अपेक्षा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के पास है। विभाग को लेकर एक दौर में दोनों में तनातनी भी रही थी। अक्सर सीआईडी विभाग गृहमंत्री को ही रिपोर्ट करता है और मंत्री ज़रूरी होने पर मुख्यमंत्री से इसे साझा करता है। दंगों के बाद गृहमंत्री की भूमिका एकाध बयानबाज़ी के अलावा कुछ ज़्यादा नहीं रही। मोर्चा मुख्यमंत्री ने ही सँभाला; लेकिन वह स्थिति को सँभाल नहीं सके। पुलिस हर व्यक्ति की सुरक्षा न करने जैसे बयान पर मनोहर लाल खट्टर की चौतर$फा आलोचना भी हुई। लोगों की सुरक्षा सरकार का दायित्व है और मुख्यमंत्री होने के नाते उनका ऐसा बयान नेतृत्व पर ही सवालिया निशान लगाने जैसा है।

उनकी ही पार्टी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमत्री योगी आदित्य नाथ सार्वजनिक मंचों से बेधडक़ बोलते हैं कि राज्य की 22 करोड़ लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी है। इससे लोगों में सुरक्षा की भावना पैदा होती है और हरियाणा के मुख्यमंत्री के बयान से लोगों में असुरक्षा घर करती है। दंगा पीडि़तों ने लाइसेंसी हथियार मुहैया कराने की बात ऐसे ही नहीं कही थी।

मेवात में शासन-प्रशासन पूरी तरह से फेल रहा। दंगा सुनियोजित था और शासन-प्रशासन स्थिति को भाँपने में पूरी तरह विफल रहा। मेवात के पुलिस अधीक्षक का छुट्टी पर जाना, गुडग़ाँव के पुलिस अधीक्षक को अतिरिक्ति ज़िम्मेदारी देना और वह भी ऐसी स्थिति में जब हालात ख़राब होने की ख़ुफ़िया रिपोर्ट पहले से थी। ऐसे तमाम कारण है, जिनके चलते दंगा हुआ। कांग्रेस विधायक मामन ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद मेवात में स्थिति असमान्य न हो इसके लिए सरकार ने इंटरनेट सेवा बन्द कर दी। धारा-144 लगा दी और पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में बदल दिया। इसका नतीजा यह रहा कि कहीं कुछ गड़बड़ी नहीं हुई।

हरियाणा का मेवात इलाक़ा हमेशा से संवेदनशील रहा है। बाबरी ढाँचे विध्वंस के बाद यहाँ बड़े स्तर पर आगजनी हुई थी। अल्पसंख्यक समुदाय में तभी से असुरक्षा की भावना ज़्यादा घर कर गयी है। दंगे के बाद अब स्थिति कमोबेश सामान्य है; लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय में अब असुरक्षा की भावना और ज़्यादा घर कर गयी है। दंगे में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया। बन्द दुकानों के शटर तोडक़र लूटपाट कर वहाँ आग लगी दी गयी।

ऐसा ही बड़ा मामला नगीना थाना क्षेत्र का है। भाजपा ज़िला इकाई के सचिव शिवकुमार आर्य की तेल मिल को दंगाइयों ने तहस-नहस कर दिया। बडक़ली चौक पर जब 31 जुलाई को लोगों का जमाव होने लगा, तो उन्हें कुछ अनहोनी की आशंका हुई। मिल बंद कर दी गयी। इसके बाद दंगाइयों ने उसे निशाना बनाया। आर्य का सवा करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुक़सान हुआ। इस संदर्भ में प्राथमिकी नंबर 137 के आरोपियों में कांग्रेस विधायक मामन ख़ान का नाम भी है। इसमें पाँच आरोपी गिरफ़्तार हो चुके हैं।

नूह दंगे को राजनीतिक संरक्षण ज़रूर हासिल था। अब तक की जाँच में इसे साबित नहीं किया जा सका है। एसआईटी की जाँच का दायरा अब उन्हीं मास्टरमाइंड लोगों पर है, जिनकी वजह से सुनियोजित दंगा हुआ।

नूह दंगे के आरोपी बचने नहीं चाहिए और निर्दोष फँसें नहीं। इसके लिए मामले की न्यायिक जाँच हो। इसमें किसी पक्ष को कोई एतराज़ नहीं होगा। उच्च न्यायालय के मौज़ूदा न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग ही इसकी सही जाँच करने में सक्षम होगा।’’

भूपेंद्र सिंह हुड्डा

पूर्व मुख्यमंत्री, हरियाणा

नूह दंगे में आरोपियों की धरपकड़ तथ्यों और सुबूतों के आधार पर हो रही है। इसमें तुष्टिकरण नीति का सवाल नहीं है। जाँच सही दिशा में चल रही है। एसआईटी तथ्यपरक जाँच करने और निष्कर्ष तक पहुँचने में सक्षम है।’’

शत्रुजीत कपूर

पुलिस महानिदेशक, हरियाणा

ख़तरे में ‘नफ़रती’ पत्रकारों की स्वीकार्यता

विपक्षी गठबंधन इंडिया द्वारा 14 एंकरों के बहिष्कार की सूची पर मचा हडक़ंप

सुशील मानव

‘पत्रकार हूँ’ कहकर किसी से अपना तआरुफ़ करवाओ, तो लोग पलटकर पूछते हैं- ‘किस पार्टी के?’ यह कोई चुटकुला नहीं, बल्कि मौज़ूदा वक़्त की हक़ीक़त है। सत्ता का स्थायी विपक्ष कहा जाने वाला पत्रकार आजकल सत्ता का चरणचुम्बक हो गया है। अब वह सरकार से नहीं, विपक्ष से सवाल पूछता है। न्यूजरूम के स्टूडियो में एंकर सत्ताधारी दल के प्रवक्ता-सा बोलता है। विपक्ष पर चीखता है। चिल्लाता है। विपक्षी प्रवक्ता प्रतिनिधि को डराता, धमकाता है। कभी-कभार तमाचे भी मार देता है। लेकिन सहनशीलता की भी एक हद होती है।

प्रमुख विपक्षी दलों के संगठन इंडिया के 26 दलों की कोऑर्डिनेशन कमेटी के सदस्यों ने 13 सितंबर को विचार विमर्श के बाद नौ टीवी चैनल्स के 14 एंकरों को उनकी द्वेषपूर्ण बहसों, विपक्ष विरोधी नैरेटिव, जनहित के मुद्दों को ब्लैकआउट करने और उनके सोशल मीडिया प्रोफाइल के आधार पर बहिष्कार करने का फ़ैसला लिया। इन 14 एंकरों के नफ़रती और साम्प्रदायिक शो में विपक्षी गुट के प्रतिनिधि नहीं जाएँगे। इस सूची में सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, अमन चोपड़ा, अमिश देवगन, आनंद नरसिम्हा, अशोक श्रीवास्तव, अदिति त्यागी, चित्रा त्रिपाठी, गौरव सावंत, नविका कुमार, प्राची पराशर, रूबिका लियाक़त, शिव अरूर और सुशांत सिन्हा का नाम शामिल है। हालाँकि अंजना ओम कश्यप, श्वेता सिंह, सुमित अवस्थी जैसे कई नाम अभी सूची से बाहर हैं। लेकिन इंडिया गठबंधन के मीडिया कमेटी से जुड़े सूत्रों ने कहा है कि एंकरों की दूसरी सूची भी जारी करेंगे।

कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और विपक्षी गठबंधन की मीडिया समिति सदस्य पवन खेड़ा ने कहा- ‘यह कोई बॉयकाट या बहिष्कार नहीं, बल्कि एक असहयोग आन्दोलन है। हम ऐसे किसी भी श$ख्स को सहयोग नहीं कर सकते, जो समाज में नफ़रत फैलाते हैं। रोज़ शाम 5:00 बजे से कुछ चैनल्स पर नफ़रत के दुकानें सजायी जाती हैं। हम नफ़रत के बाज़ार के ग्राहक नहीं बनेंगे। हमारा उद्देश्य है- नफ़रत मुक्त भारत।’

देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राजनीतिक दल या गठबंधन ने सामूहिक तौर पर इस तरह का फ़ैसला लिया है। पर इसे इन एंकरों के प्रति विपक्षी गठबंधन का राजनीतिक पूर्वाग्रह कहकर नहीं ख़ारिज कर सकते। ऐसे कई सर्वे और तथ्य हैं, जो बताते हैं कि टीवी न्यूज चैनल विपक्ष विरोधी हैं और इन्होंने सिर्फ़ साम्प्रदायिक नफ़रत और वैमनस्य बढ़ाने का काम किया है। 13 जनवरी, 2023 को हेट स्पीच के मामलों पर सुनवाई करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने टीवी न्यूज चैनल और एंकरों पर टिप्पणी करते हुए कहा था- ‘टीवी चैनल और उनके एंकर्स शक्तिशाली विजुअल मीडियम के ज़रिये अपनी टीआरपी के लिए समाज में विभाजनकारी और हिंसक प्रवृत्ति पैदा करने के लिए कुछ ख़ास एजेंडा को बेंचने का औज़ार बन गये हैं। चैनल के पीछे लगे पैसे से वो सब तय होता है।’

27 जुलाई, 2023 को जारी ‘मीडिया इन इंडिया : ट्रेंड्स एंड पैटन्र्स’ शीर्षक वाली लोकनीति- सीएसडीएस मीडिया सर्वे रिपोर्ट में 82 प्रतिशत पत्रकारों ने माना कि उनके मीडिया संगठन भाजपा का समर्थन करते हैं। सरकारी विज्ञापन के लिए लार चुआने वाले टीवी न्यूज चैनल्स ने अपने अपने एंकरों को सरकार का वफ़ादार बना दिया है। ये एंकर लगातार सरकार के मुस्लिम विरोधी, दलित विरोधी, आदिवासी विरोधी, महिला विरोधी, छात्र विरोधी, जनविरोधी, मज़दूर विरोधी, किसान विरोधी नीतियों और एजेंडों को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं। राजनीतिक विपक्ष सरकार के एजेंडों को लेकर सडक़ और सदन में सरकार को घेरती है, तो सरकार उन पर अपने ख़ूँ-ख़्वार एंकर छोड़ देती है। ये ख़ूँ-ख़्वार भूखे भेडि़ए की तरह विपक्षी प्रतिनिधियों का शिकार करते हैं। ये एंकर विपक्षी दलों के प्रवक्ताओं पर ज़ोर-ज़ोर से चीख-चिल्लाकर उनके 70 साल का हिसाब माँगते हैं। स्टूडियो में बैठे सत्तादल के समर्थकों से हूटिंग करवाते हैं। विपक्षी प्रवक्ता प्रतिनिधि का बयान आने से पहले ही उनका माइक बन्द कर देते हैं या ख़ुद बोलने लगते हैं और विपक्ष का वक़्त काटकर विज्ञापन चला देते हैं। याद करें कि कैसे मई, 2018 में एक न्यूज चैनल के डिबेट शो में एंकर सुमित अवस्थी ने कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी को थप्पड़ मार दिया था।

यूँ तो 3 मई, 2023 विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौक़े ‘रिपोट्र्स विदाउट बॉर्डर्स’ की 180 देशों की सालाना रिपोर्ट में भारत की मीडिया को मिली 161वीं रैंक इनके पतन की कहानी बयाँ करती ही है। लेकिन विपक्षी गठबंधन द्वारा 14 न्यूज एंकरों के बहिष्कार के फ़ैसले से भारत की सत्तापरस्त मीडिया देश दुनिया में बुरी तरह एक्सपोज हो गयी है। इस घटना से दुनिया ने जाना कि भारत की कथित मेनस्ट्रीम मीडिया में पत्रकारिता के मूलभूत बुनियादी मूल्यों का भी क्षय हो चुका है। ‘मीडिया के पास इतनी ताक़त है कि वह आपके मन में पीडि़त के प्रति घृणा भर दे और उत्पीडक़ के प्रति प्रेम’- मैल्कम एक्स का यह कथन भारत की मीडिया पर हू-ब-हू लागू होता है। अजीब विडम्बना है कि निर्वाचन आयोग ने इन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि आज तमाम न्यूज चैनल्स और इनके एंकर सरकारी भोंपू बनकर लगातार जनमत को प्रभावित करते आ रहे हैं।

कैथरीन ग्राहम का कथन है कि ‘न्यूज वह होती है, जिसे कोई दबाना चाहता है। बाक़ी सब विज्ञापन है’। पर ये 14 एंकर और अन्य सरकार की ख़ुशामद और उनके एजेंडे वाली फ़र्ज़ी और बनायी हुई ख़बरें चलाते हैं। ये ऐसी कोई ख़बर नहीं चलाते, जिसे सरकार दबाना चाहती हो। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने पिछले डेढ़ महीने में कुल 22 रिपोर्ट जारी कीं। इन रिपोट्र्स ने केंद्र सरकार के कई घोटालों और वित्तीय हेराफेरी का पर्दाफाश किया है।

‘खातों की गुणवत्ता और वित्तीय रिपोर्टिंग प्रथा’ शीर्षक वाली केंद्र सरकार के खातों से सम्बन्धित सीएजी की रिपोर्ट संख्या 21 में कई गम्भीर सवाल उठाये गये हैं। पर सूचीबद्ध 14 में से एक भी एंकर ने कैग की एक भी रिपोर्ट पर कोई कार्यक्रम नहीं किया है। अगर हम पिछले नौ साल का मेनस्ट्रीम मीडिया का काम करने के पैटर्न देखें, तो इनका कार्य करने का यही पैटर्न रहा है। सरकार के ख़िलाफ़ जाने वाली ख़बरों घटनाओं और रिपोट्र्स का मेनस्ट्रीम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अघोषित बहिष्कार-सा कर रखा है। पेगासस स्पाईवेयर का मसला हो या राफेल डील का, अडानी के मुंद्रा बंदरगाह पर 3,000 किलोग्राम ड्रग्स बरामदगी हो, मीडिया ने इन ख़बरों से बराबर दूरी बनाकर रखी।

सिर्फ़ न्यूज स्टूडियो तक ही नहीं निजी सोशल मीडिया अकाउंट पर भी ये लोग विपक्षी पार्टियों और विपक्षी नेताओं को अपने निशाने पर लेते आ रहे हैं। किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए इन्होंने खालिस्तान फंडिंग और ड्रग्स तस्करी और टूलकिट विवाद खड़ा करने का काम किया। एनआरसी सीएए विरोधी आन्दोलन और शाहीन बाग़ को बदनाम करने के लिए इन्होंने फ़र्ज़ी ख़बरें चलायीं। मणिपुर में 4 मई को तीन कुकी महिलाओं को निर्वस्त्र करके परेड कराने और सामूहिक बलात्कार के वीडियो को पूरे देश ने देखा। लेकिन इन एंकरों ने सरकार को कटघरे में खड़े करने के बजाय विपक्षी दलों के सत्ता वाले राज्यों की फ़र्ज़ी ख़बरें गढक़र चलानी शुरू कर दीं।

मीडिया की धुलाई करने वाली न्यूज पोर्टल न्यूजलॉन्ड्री ने जून, 2022 में कई टीवी न्यूज एंकरों के तीन महीने के कार्यक्रमों के विषय और मुद्दों पर शोध करके यह निष्कर्ष निकाला कि अधिकांश एंकरों ने लगभग आधे कार्यक्रम हिन्दू-मुस्लिम पर किये। एक-चौथाई कार्यक्रम विपक्ष के ख़िलाफ़ और बाक़ी एक-चौथाई हिस्से में अन्य चीज़ें कवर कीं। जैसे सुधीर चौधरी ने अपने डेली न्यूज एनालिसिस के 73 कार्यक्रमों में 28 कार्यक्रम साम्प्रदायिक मुद्दे पर, पाँच कार्यक्रम विपक्ष के ख़िलाफ़ किये; पर बेरोज़गारी पर कोई कार्यक्रम नहीं। नविका कुमार ने अपने शो ‘सवाल पब्लिक का’ के 68 कार्यक्रमों में 29 कार्यक्रम साम्प्रदायिक मुद्दे पर और 13 विपक्ष विरोधी अभियान पर किये; पर महँगाई, बेरोज़गारी पर एक भी कार्यक्रम नहीं किया। ऐश्वर्य कपूर ने अपने शो ‘पूछता है भारत’ के 96 कार्यक्रमों में 45 कार्यक्रम साम्प्रदायिक मुद्दों पर, 34 कार्यक्रम यूक्रेन पर और दो विपक्ष विरोध पर किये। अमिश देवगन ने ‘नंबर वन शो’ के 68 कार्यक्रमों में 43 कार्यक्रम साम्प्रदायिक मुद्दों पर और छ: कार्यक्रम विपक्ष विरोध पर किये। पर महँगाई और बेरोज़गारी पर कोई कार्यक्रम नहीं किया। अर्णव गोस्वामी ने 182 क्रार्यक्रमों में 60 कार्यक्रम साम्प्रदायिकता पर, 34 कार्यक्रम विपक्ष विरोध पर किये। पर महँगाई बेरोज़गारी पर एक भी कार्यक्रम नहीं किया। इसी तरह रूबिका लियाक़त ने ‘हुंकार’ शो के 56 कार्यक्रमों में 36 साम्प्रदायिकता वाले किये; जबकि महँगाई, बेरोज़गारी पर एक भी कार्यक्रम नहीं किया।

जून, 1928 में ‘किरती’ नामक अख़बार में लिखे अपने लेख में शहीद भगत सिंह ने मीडिया और साम्प्रदायिक नेता के गठजोड़ वाले उस चरित्र को उजागर किया, जो उस वक़्त साम्प्रदायिक विभाजनकारी माहौल बना रहा था; और जिस पर चलकर अगस्त, 1947 में देश का साम्प्रदायिक विभाजन हुआ। यह देश का दुर्भाग्य है कि 95 साल पहले लिखा उनका वो लेख आज भी अक्षरश: सच है; यदि हम अख़बार की जगह एंकर या न्यूज चैनल करके पढ़ें तो। शहीद भगत सिंह ने लिखा है- ‘मीडिया का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था। लेकिन इन्होंने अपना प्रमुख कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगे हैं, और दिल से सवाल उठता है कि भविष्य का भारत बनेगा कैसा?’