आप नेता संजय सिंह को राउज एवेन्यू कोर्ट ने 5 दिन की ईडी रिमांड पर भेज दिया है। आज संजय सिंह की दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में पेशी थी जिसमें ईडी ने उनकी रिमांड की मांग की थी।
संजय सिंह को ईडी ने 10 घंटे से ज्यादा की पूछताछ के बाद बुधवार को गिरफ्तार किया था और आज उनकी पेशी दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में की गई थी।
सूत्रों के अनुसार सरकारी गवाह दिनेश अरोड़ा ने कहा है कि संजय सिंह को करोड़ों रुपये दिये हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) ने दिनेश अरोड़ा और संजय सिंह के बीच लेनदेन साबित किया है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बुधवार को दिल्ली शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह को गिरफ्तार किया था।
आप नेता संजय सिंह को ईडी ने करीब 10 घंटे से ज्यादा चली लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया था। और गुरुवार को राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार ईडी संजय सिंह की रिमांड की मांग करेगी। वहीं ईडी के सूत्रों के मुताबिक सरकारी गवाह दिनेश अरोड़ा ने कहा कि उसने संजय सिंह को करोड़ों रूपये दिये हैं। सीबीआई ने दिनेश अरोड़ा और संजय सिंह के बीच लेनदेन साबित किया है।
संजय सिंह की गिरफ्तारी के बाद आप कार्यकर्ताओं प्रदर्शन कर रहे है। आप के विरोध प्रदर्शन पर दिल्ली के स्पेशल सीपी लॉ एंड ऑर्डर देपेंद्र पाठक ने कहा कि, धीरे-धीरे भीड़ जमा हो रही है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस यहां मौजूद है।
वहीं दूसरी तरफ दिल्ली भाजपा के कुछ नेता राजघाट पहुंचे है। भाजपा सांसद परवेश साहिब सिंह ने कहा कि, “यह गांधी जी का स्मारक है जिन्होंने हमेशा शराब का विरोध किया था लेकिन अरविंद केजरीवाल ने अपनी ही बात नहीं मानी। मुझे लगता है की गांधी जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से यह सब हो रहा है कि शराब घोटाले का मामला सामने आया है और उनके नेता एक के बाद एक जेल जा रहे है। वह दिन दूर नहीं जब शराब नीति के मास्टरमाइंड अरविंद केजरीवाल भी जेल जाएंगे।”
दिल्ली आबकारी नीति घोटाला मामले में जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि उसने अपराध की आय प्राप्त करने वाले राजनीतिक दल को आरोपी क्यों नहीं बनाया?
मामले की सुनवाई कर रहे दो न्यायाधीशों वाली पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई से यह सवाल किया।
जजों की बेंच ने कहा कि, “जहां तक धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) का सवाल है आपका पूरा मामला यह है कि यह पैसा एक राजनीतिक दल के पास गया। वह राजनीतिक दल अभी भी आरोपी नहीं है आप इसका जवाब कैसे देंगे?”
अदालत ने आगे कहा कि, यदि आप यह कह रहे है कि इस घोटाले का फायदा आप को मिला था तो फिर उसे पार्टी क्यों नहीं बनाया गया है?
वहीं दूसरी तरफ बुधवार को आप नेता संजय सिंह को गिरफ्तार किया गया है। और दिल्ली सरकार की मंत्री आतिशी ने कहा है कि आपने मनीष सिसोदिया को जेल में डाल दिया और सत्येंद्र जैन को एक साल तक जेल में रखा। और अब संजय सिंह को जेल भेजा है लेकिन हम इससे डरने वाले नहीं हैं। आप के कार्यकर्ता आखिरी सांस तक लड़ेंगे और हम आपकी धमकियों से नहीं डरेगा।
आतिशी ने कहा कि भाजपा के लोगों के पास तो एजेंसी से पहले भी जानकारी पहुंच जाती है इतनी जानकारी है तो बताएँ कि संजय सिंह के घर से कितने जेवर, सोने के कितने बिस्किट और कितना कैश मिला? यह तानाशाही वाली सरकार है जो कभी भी किसी के भी घर पर छापा मार सकती है, उसके लैपटॉप इत्यादि सीज करके उसे घसीटकर बाहर निकाल सकती है। ये लोग किसी भी तरह बस अपने विरोधी को चुप करना चाहते है।
अनुच्छेद-370 निरस्त होने के बाद भी घाटी में नहीं खुले हैं ग़ैर-कश्मीरी लोगों के बसने के रास्ते!
केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के निरस्त करने और ग़ैर-अधिवासित भारतीय नागरिकों द्वारा सम्पत्ति ख़रीद पर प्रतिबंध हटाने के बावजूद कश्मीर में ग़ैर-कश्मीरी यानी अन्य राज्यों के भारतीय नागरिक सम्पत्ति ख़रीदकर वहाँ नहीं रह सकते (कश्मीरी लोगों के मुताबिक)। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कश्मीर के निवासी अपनी (आवासीय, व्यावसायिक) ज़मीनें आदि बाहरी लोगों को किसी भी क़ीमत पर बेचने के इच्छुक नहीं हैं। हालाँकि केंद्र सरकार ने राज्यसभा में दावा किया है कि कश्मीर में ग़ैर-कश्मीरी लोगों ने ज़मीनें ख़रीदी हैं।
तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-
‘अगर कश्मीर में कोई अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद लालच में ग़ैर-कश्मीरियों, जिन्हें अक्सर बाहरी कहा जाता है; को ज़मीन बेचने का विकल्प चुनता है, तो ज़मीन बेचने वाले को अपने साथी कश्मीरियों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा जो बाहरी लोग कश्मीर में ज़मीन ख़रीदेंगे, उन्हें भी कश्मीर के लोगों के विरोध का सामना करना पड़ेगा; क्योंकि वे बाहरी लोगों को कश्मीर में बसने की अनुमति देने के लिए तैयार नहीं होंगे।’ कश्मीर के एक टूर ऑपरेटर गुलज़ार अहमद भट ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से बातचीत में कश्मीर के हालात कुछ इस तरह बयाँ किये।
गुलज़ार ने बताया कि अगर बाहरी लोग उन्हें (कश्मीरियों को) ज़मीन की दोगुनी क़ीमत भी दे दें, तो भी वे उन्हें (बाहरियों को) अपनी ज़मीन नहीं बेचेंगे। गुलज़ार ने दलील दी कि अनुच्छेद-370 हटाये जाने के बाद अगर कश्मीर के लोग अपनी ज़मीन बाहरी लोगों को बेचना शुरू कर देते हैं, तो बाहरी लोगों की बाढ़ आ जाएगी और वे (बाहरी लोग) घाटी में बस जाएँगे। गुलज़ार ने कहा कि इससे न केवल घाटी की जनसांख्यिकी बदलेगी, बल्कि कश्मीरी लोगों की पहचान गुम होने का एक गम्भीर ख़तरा भी पैदा होगा।
दरअसल 5 अगस्त, 2019 को संविधान के अनुच्छेद-370 के तहत जम्मू-कश्मीर विशेष दर्जा वापस लेने के बाद केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की, जिसमें कहा गया था कि कोई भी भारतीय नागरिक अब जम्मू-कश्मीर के नगरपालिका क्षेत्रों में कृषि भूमि को छोडक़र भूमि ख़रीद सकता है, भले ही वह राज्य का निवासी न हो। इस अधिसूचना के बाद केंद्र सरकार ने अप्रैल, 2023 में राज्यसभा में देश को बताया कि पिछले तीन वर्षों में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में बाहर के 185 लोगों ने ज़मीन ख़रीदी है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा को बताया कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में राज्य के बाहर के कुल 185 व्यक्तियों ने वर्ष 2020, 2021 और 2022 के दौरान ज़मीन ख़रीदी है। इनमें से एक व्यक्ति ने सन् 2020 में, 57 लोगों ने सन् 2021 में और 127 ने सन् 2022 में ज़मीन ख़रीदी। लेकिन सन् 2021 में कश्मीर घाटी में ‘तहलका’ द्वारा ज़मीनी स्तर पर की गयी एक वास्तविक जाँच से संकेत मिले कि कश्मीर के मूल निवासी ग़ैर-कश्मीरी भारतीयों को किसी भी क़ीमत पर अपनी ज़मीन बेचने के लिए तैयार नहीं हैं। केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद-370 हटाये जाने के बाद सन् 2021 में कश्मीर की एक यात्रा के दौरान ‘तहलका’ रिपोर्टर ने इस बारे में श्रीनगर के एक ट्रांसपोर्टर गुलज़ार अहमद भट से इस बारे में बातचीत की थी।
‘तहलका’ रिपोर्टर ने गुलज़ार को यह कहते हुए एक काल्पनिक सौदा दिया कि वह कश्मीर में ज़मीन ख़रीदना चाहते हैं। गुलज़ार शुरू में हमारे लिए ज़मीन की व्यवस्था करने के लिए सहमत हुए; लेकिन बाद में यह कहते हुए इनकार कर दिया कि बाहरी लोगों को घाटी में ख़रीदने के लिए ज़मीन नहीं मिलेगी। हालाँकि गुलज़ार के अनुसार, अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद बाहरी लोग क़ानूनी रूप से कश्मीर में ज़मीन ख़रीद सकते हैं। लेकिन कोई भी कश्मीरी दोगुनी क़ीमत मिलने पर भी अपनी ज़मीन ग़ैर-कश्मीरी को नहीं बेचेगा।
गुलजार
रिपोर्टर : ये बताइए, 370 हटने के बाद में इस इलाक़े में, यहाँ ज़मीन लेना चाहता हूँ। मिल जाएगी?
गुलज़ार : क़ानूनन तो आप ले सकते हैं, क्योंकि 370 तोड़ दिया ये लोग। मगर हम कश्मीरी आपको ज़मीन बेचने के लिए नहीं तैयार हैं। चाहे आप हमको डबल क़ीमत दें। क्योंकि इससे हमारी पहचान ही नहीं रहेगी। इतना बड़ा मुल्क हिन्दुस्तान, हमारी पॉपुलेशन (जनसंख्या) एक करोड़ 30 लाख है- जे एंड के (जम्मू और कश्मीर) की, उसमें 70-80 लाख टोटल कश्मीर में हैं। इसमें अगर बाहर से एक करोड़ लोग बसने आ गये, तो हमारी पहचान कहाँ रही? हम तो फिर गुम हो जाएँगे।
रिपोर्टर : मैं तो मुस्लिम हूँ। आप तो कह रहे थे, आपको बेच देंगे कश्मीरी?
गुलज़ार : नहीं, वो तो मैंने आपको ऐसे ही बोला। मुस्लिम हो, हिन्दू हो, सब इंसान ही हैं। मुझे नहीं लगता कोई बेचने को तैयार होगा। यह तो फोर्स (दबाव) के बल पर टूटा ना! हमारी तो रज़ामंदी नहीं है।
रिपोर्टर : तो आप यह कह रहे हैं, कश्मीर में कोई भी अपनी ज़मीन नॉन-कश्मीरी (ग़ैर-कश्मीरी) को नहीं बेचेगा?
गुलज़ार : नहीं बेचेगा। जहाँ तक मेरा सोचना है, मेरा तजुर्बा है, नहीं बेचेगा।
गुलज़ार ने हमें बताया कि वह एक ड्राइवर है, और अगर हम उसे उसकी ज़मीन के बाज़ार मूल्य का 10 गुना भी ऑफर करते (देते) हैं, तो भी वह ज़मीन हमें नहीं बेचेगा। गुलज़ार का कहना है कि कोई भी ईमानदार कश्मीरी व्यक्ति अपनी ज़मीन बाहरी लोगों को नहीं बेचेगा, चाहे वे (बाहरी) उसे कितनी भी ऊँची क़ीमत क्यों न दें। कश्मीरी ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जिससे अगली पीढ़ी का भविष्य ख़राब हो।
रिपोर्टर : आप इतनी बेहतरीन जगह घुमा रहे हैं, पहलगाम में; यहाँ दिलवा दीजिए।
गुलज़ार : मैं तो यही कह रहा हूँ, अगर 10के (10 हज़ार) की चीज़ के आप एक लाख दोगे, तो नहीं बेचेगा जिसके पास जमीर है। सीरियसली तो कोई नहीं बेचेगा। मैं एक ड्राइवर हूँ। अगर मेरे पास एक लाख की ज़मीन है, आप कहोगे 10 लाख दूँगा, मैं तो नहीं बेचूँगा। मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा कि आने वाली जनरेशन यह बोलेगी कि हमारे पुरखों ने ये किया।
गुलज़ार ने तर्क दिया कि ग़ैर-कश्मीरी भारत में और कहीं भी जाकर बस सकते हैं। इसके लिए कश्मीर में ही क्यों? उन्होंने कहा कि अगर किसी कश्मीरी ने लालच आकर में घाटी में अपनी ज़मीन बाहरी लोगों को बेचने का फ़ैसला किया, तो उसे स्थानीय लोगों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ेगा। और बाहरी लोगों को भी यहाँ कठिन समय का सामना करना पड़ेगा; क्योंकि स्थानीय लोग उन्हें बसने की अनुमति नहीं देंगे।
रिपोर्टर : तो आप ये चाहते हैं कि हम यानी नॉन कश्मीरी कहीं भी जाकर बस जाएँ, मगर कश्मीर में नहीं?
गुलज़ार : बिलकुल, हम तो नहीं देंगे। मुझे नहीं लगता जिसका ज़मीन होगा, अच्छी सोच होगी, वो यह करेगा। बाकी लालच वाले लोगों की कमी नहीं है। फिर भी अगर कोई करेगा, तो उसको अपने लोगों का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि वो उसका विरोध करेंगे। सपोज करो, यह इलाक़ा हो गया; यहाँ आपको कोई ज़मीन बेच दे। …तो पहले तो आप ही नहीं आ पाओगे। मगर फिर भी अगर आप आ गये, तो लोग आपको अलग नज़र से देखेंगे। आप सेटल (स्थापित) नहीं हो पाओगे।
गुलज़ार ने कहा कि बाहरी लोगों के लिए कश्मीर में आकर बसना बहुत मुश्किल होगा। स्थानीय क्षेत्र के लोग उन्हें घाटी में नहीं बसने देंगे। अगर कुछ कश्मीरी लोग ग़ैर-कश्मीरियों को अपनी ज़मीन बेच भी देते हैं, तो नये लोग (अनिवासी) $खुद को सैकड़ों स्थानीय लोगों के बीच रहने में परेशानी महसूस करेंगे; क्योंकि कश्मीर के लोग उनके साथ किसी हाल में घुल-मिल नहीं सकते। वहीं बाहरी लोग अपनी बातें और समस्याएँ उनसे साझा नहीं कर सकेंगे। स्थानीय कश्मीरी लोगों का प्रतिरोध उनका रहना बहुत कठिन बना सकता है। गुलज़ार यह भी बताते हैं कि यहाँ तक कि कश्मीरी पंडित, जो मूल रूप से कश्मीर के हैं; वापस नहीं आना चाह रहे हैं। इससे क्षेत्र में बाहरी लोगों की स्वीकृति के बारे में संदेह पैदा होता है।
रिपोर्टर : क्यों सेटल नहीं हो पाएँगे?
गुलज़ार : आप तो 2-3 लोग देख रहे हो, जो लालच में आपको बेच दें। पर 100 लोगों के बीच में आप कैसे रहोगे, जो इसका विरोध करते हैं? नहीं रह पाओगे ना!
रिपोर्टर : अच्छा, वो उनको रहने नहीं देंगे?
गुलज़ार : जब उनका विरोध होगा आपकी तरफ़, तो आप कैसे रह पाओगे? जब 100 लोगों में से 95 ऐसे होंगे, जो आपको एक्सेप्ट (स्वीकार) नहीं करेंगे अपने इलाक़े में, वो एक्सेप्ट नहीं करेंगे आउट ऑफ स्टेट (बाहरी राज्य) के आदमी को यहाँ बसना। जैसे कश्मीरी पंडित हैं, वो यहाँ के अपने लोग हैं। उनकी ज़मीनें हैं। वो आ सकते हैं। हम तो कहते (हैं) उनसे- आप आ जाओ। पर जब वो नहीं आ रहे हैं, तो आउट ऑफ दि स्टेट (बाहर के राज्य) का कोई आकर कैसे बसेगा यहाँ पर? …370 तोड़ा, क़ानूनी तो आप कुछ भी ले सकते हो। आपके डाक्यूमेंट्स (दस्तावेज़) भी बन सकते हैं। मसला ये है यहाँ आकर रहने का। वो बहुत मुश्किल है।
सन् 2021 में गुलज़ार से मिलने के बाद ‘तहलका’ रिपोर्टर ने 2023 में कश्मीर के एक और रियलिटी एस्टेट एजेंट आसिफ़ शेख़ से बात की। यह पूछे जाने पर कि क्या हम अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर में सम्पत्ति ख़रीद सकते हैं? आसिफ़ शेख़ ने जवाब दिया कि उन्होंने कश्मीर में बाहरी लोगों की कोई रजिस्ट्री नहीं देखी है। वे (मंत्री) केवल ख़बरों में प्रचार करते हैं; लेकिन वास्तविकता बिलकुल अलग है। आसिफ़ ने कहा कि कश्मीर के आधार कार्ड के बिना कश्मीर में सम्पत्ति की रजिस्ट्री सम्भव नहीं है।
आसिफ़ : समझ नहीं आ रहा, प्रॉपर्टी नाम हो रही है या नहीं?
रिपोर्टर : नॉन-कश्मीरी की रजिस्ट्री नहीं हो रही?
आसिफ़ : मैंने नहीं देखी होते हुए। न्यूज में तो ये (मंत्री) बोलते हैं, मगर पेपर्स (कागज) आने चाहिए ना हाथ में! …पेपर्स तो नहीं आ रहे।
रिपोर्टर : मतलब रजिस्ट्री नहीं हो रही है?
आसिफ़ : रजिस्ट्री का अभी कुछ समझ नहीं आ रहा; …नहीं हो रही है। जो उसमें मेन चीज़ें माँगते हैं, वो तो बाहर वाले के पास हैं नहीं। कश्मीरी जो बाहर रहता है, अगर उसके पास आधार कार्ड बाहर का है, तो वो नहीं ले पा रहा है। हाँ, बीइंग अ कश्मीरी (कश्मीरी होने पर भी) वो नहीं ले पा रहा, क्योंकि उसका आधार कार्ड बाहर का है।
रिपोर्टर : मतलब, अगर कश्मीर में प्रॉपर्टी (सम्पत्ति) लेनी है, तो आधार कार्ड होना चाहिए कश्मीर का?
आसिफ़ : नहीं मिलेगी।
आसिफ़ ने हमें बताया कि जहाँ तक उनकी जानकारी है, किसी भी बाहरी व्यक्ति ने कश्मीर में सम्पत्ति नहीं ख़रीदी है। उसने कहा कि उसे इस क्षेत्र में बाहरी (लोगों के) सम्पत्ति पंजीकरण का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है। आसिफ़ ने दावा किया कि कश्मीर में सम्पत्ति के लेन-देन के लिए जम्मू-कश्मीर का आधार कार्ड होना सख़्त ज़रूरी है। उसने गोवा में रहने वाले कुछ कश्मीरियों में से एक का मामला भी साझा किया, जिनके पास गोवा का आधार कार्ड था; लेकिन वे कश्मीर में सम्पत्ति ख़रीदने में असमर्थ थे। उन्हें इसके बजाय जम्मू-कश्मीर आधार कार्ड प्राप्त करने की सलाह दी गयी थी। आसिफ़ ने तर्क दिया कि अगर जम्मू-कश्मीर आधार कार्ड के बिना कश्मीरियों को भी सम्पत्ति की ख़रीद में बाधाओं का सामना करना पड़ता है, तो यह सवाल उठाता है कि कश्मीर आधार कार्ड के बिना बाहरी लोग भी ऐसा कैसे कर रहे हैं? उसने कहा कि अनुच्छेद-370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के ख़िलाफ़ एक याचिका उच्चतम न्यायालय में लंबित है।
रिपोर्टर : लेकिन आधार कार्ड पूरे इंडिया में वैलिड है, कहीं भी ख़रीद सकते हैं?
आसिफ़ : जनाब! जो कश्मीरी है, ख़रीद पाते हैं? न। मेरे पास तीन कश्मीरी आये हैं; मैंने बोला पहले आधार कार्ड बनवाओ, उसके बाद।
रिपोर्टर : अच्छा! जो कश्मीरी है, उसको मिल जाएगी? उसकी रजिस्ट्री हो जाएगी?
आसिफ़ : मैं ये बोल रहा हूँ, उसको कश्मीरी होकर नहीं मिल रही। यार! समझ नहीं रहे हो बात। क्लाइंट (ग्राहक) है एक मेरा। वो गोवा में रहता है तीन साल से। कश्मीरी है वो, उसका आधार कार्ड गोवा का है। उसकी रजिस्ट्री ही नहीं हो रही।
रिपोर्टर : लेकिन मैं ये पूछ रहा हूँ- अगर कश्मीरी आधार कार्ड हो, तो रजिस्ट्री हो जाएगी?
आसिफ़ : उस आधार पर तो हो जानी चाहिए।
रिपोर्टर : जी!
आसिफ़ : हाँ-हाँ।
रिपोर्टर : अभी कोई नॉन कश्मीरी की रजिस्ट्री नहीं हुई है आपके हिसाब से?
आसिफ़ : हमारे हिसाब से तो नहीं हुई है। हमने पूछा भी था बहुत लोगों से। क्योंकि इसका तो कुछ केस (मुक़दमा) चल ही रहा है ना! सुप्रीम कोर्ट कुछ ऑर्डर (आदेश) देगा। अभी नहीं हुई वो ऑर्डर।
आसिफ़ ने कहा कि जहाँ तक वह जानते हैं, बाहरी लोगों ने कश्मीर में सम्पत्ति नहीं ख़रीदी है। उसने सम्पत्ति लेन-देन के लिए जम्मू-कश्मीर आधार कार्ड की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। आसिफ़ ने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में कई अनुच्छेद-370 याचिकाओं की समीक्षा कर रहा है, और कश्मीर में सम्पत्ति ख़रीदने वाले बाहरी लोगों के बारे में परिणाम उन फ़ैसलों पर निर्भर करेगा। उसने यह भी बताया कि उचित पंजीकरण के बिना कश्मीर में सम्पत्ति में चार करोड़ रुपये का निवेश करने में बहुत जोखिम है, और इतनी बड़ी मात्रा में धन लगाना पानी में (बेकार) जा सकता है।
रिपोर्टर : हाँ, 370 की सुनवाई तो अभी चल रही है कश्मीर की?
आसिफ़ : हाँ, तो वो तो अभी चल ही रहा है ना! देखो वो पेपर्स सब लागू होते हैं; रजिस्ट्री तब होती है, जब वो केस टोटली (पूरी तरह) बन्द हो जाएगा। केस तो अभी चल ही रहा है ना!
रिपोर्टर : 370 हटने का कुछ फ़ायदा नहीं हुआ नॉन-कश्मीरी को? नहीं ख़रीद सकता कश्मीर में प्रॉपर्टी?
आसिफ़ : फ़िलहाल तो नहीं। वो (ग़ैर-कश्मीरी) न्यूज में बोलता है ख़रीदेगा; मगर बात है ना- ऑन अ ब्रॉडर लेवल (व्यापक स्तर पर)। मैं भी बोल रहा हूँ ख़रीदूँगा मैं। मगर पैसे तो मेरी जेब से निकल रहे हैं ना! गवर्नमेंट (सरकार) की जेब से थोड़ी निकल रहे हैं। और जब पैसे मेरी जेब से निकल रहे हैं, तो पेपर मुझे मिलने चाहिए ना! वहाँ जब पेपर की बात है, तो हर आदमी ये बोलता है- हमें नहीं पता। इसमें तो बंदा फँस ही जाएगा। जो चार करोड़ लेकर आएगा, या 10 करोड़ इनवेस्ट करेगा, वो तो फँस ही जाएगा ना!
अब, आसिफ़ ने ज़ोर देकर कहा कि बाहरी लोगों को ज़मीन बेचने की कश्मीरियों की इच्छा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न होती है। उसने कहा कि अगर सरकार बड़े उद्योगों को ज़मीन बेचने में कामयाब नहीं हुई है, तो यह सम्भावना नहीं है कि कश्मीरी आसानी से ग़ैर-कश्मीरियों को अपनी सम्पत्ति दे देंगे।
रिपोर्टर : वैसे, अगर ये सब नॉर्मली (सामान्य) हो, जाता है, तो कश्मीरी बेच देगा ज़मीन नॉन-कश्मीरी को या नहीं?
आसिफ़ : ऐसे तो नहीं बेचेगा। अल्लाह बेहतर जाने, क्योंकि यू डोंट नाउ दि फ्यूचर, वट (आप भविष्य को नहीं जानते हैं, लेकिन) ऐसे तो नहीं बेचेगा।
रिपोर्टर : कोई कश्मीरी नॉन-कश्मीरी को ज़मीन नहीं बेचेगा?
आसिफ़ : ऐसे तो नहीं बेचेगा। हाँ, जहाँ अभी तक गवर्नमेंट (सरकार) नहीं बेच पायी है, तो कश्मीरी कहाँ बेचेगा। …गवर्नमेंट अभी इंडस्ट्री (उद्योग जगत) को नहीं बेच पायी है। सुना आपने अभी तक कुछ हुआ, बड़ी इंडस्ट्री को बेचा? नहीं ना! वो तो गवर्नमेंट के पास है, वो तो कश्मीर के पास नहीं है। अभी कुछ समझ नहीं आ रहा; क्या किया इन्होंने, क्या नहीं किया? नॉर्मली (सामान्यत:) तो कोई कश्मीरी नॉन-कश्मीरी को ज़मीन नहीं बेचेगा। मगर दैट डिपेंड्स पर्सन टू पर्सन ( मगर ये व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है।)
रिपोर्टर : समझ गया मैं आपकी बात आसिफ़ साहब!
कश्मीरी रियल एस्टेट एजेंट आसिफ़ ने अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद हमें इस क्षेत्र में किसी भी सम्पत्ति की पेशकश करने से परहेज़ किया। आसिफ़ से बातचीत के बाद ‘तहलका’ रिपोर्टर ने एक कश्मीरी एमबीबीएस डॉक्टर अज़हर इब्राहिम से बातचीत की। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने कश्मीर में सम्पत्ति ख़रीदने का एक काल्पनिक सौदा प्रस्तुत किया और इसके लिए अज़हर से मदद माँगी। जवाब में अज़हर इब्राहिम ने दृढ़ता से कहा- ‘कश्मीरी अपनी सम्पत्ति बाहरी लोगों को नहीं बेचेंगे।’
अज़हर
रिपोर्टर : अच्छा, यह बताओ कश्मीर में कोई ज़मीन मिल जाएगी?
अज़हर : बाहर वालों को तो नहीं बेचेंगे। …नहीं बेचते।
रिपोर्टर : नॉन-कश्मीरी को?
अज़हर : नहीं-नहीं, मुश्किल है।
रिपोर्टर : नहीं, अब तो 370 हट गया है ना! अब तो कोई नॉन कश्मीरी भी कश्मीर में ज़मीन ख़रीद सकता है ना!
अज़हर : अब कोई बेचना ही नहीं चाहेगा, तो उसको क्या बोलेंगे? वो मसला है।
रिपोर्टर : देना क्यूँ नहीं चाहेगा, वजह क्या है उसकी?
अज़हर : कश्मीरी, कश्मीरी को ही देता है शुरू से; ट्रस्ट इश्यू ( विश्वास के मसले) होते हैं।
रिपोर्टर : मतलब नॉन-कश्मीरी पर ट्रस्ट (विश्वास) नहीं है?
अज़हर : बहुत सारे नहीं करते। वो प्रेफर (पसन्द) करते हैं अपनी साइड (तरफ़) के लोगों को।
अज़हर ने कहा कि उसे इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद किसी बाहरी व्यक्ति ने कश्मीर में कोई सम्पत्ति ख़रीदी है या नहीं। हालाँकि उसने कश्मीर घाटी में सम्पत्ति हासिल करने की सम्भावना के बारे में हमारी ओर से पूछताछ करने की पेशकश की।
रिपोर्टर : अभी तक 370 हटने के बाद किसी ने, नॉन-कश्मीरी ने ज़मीन ली है कश्मीर में?
अज़हर : कोई आइडिया (अंदाज़ा) नहीं है।
रिपोर्टर : मुझे दिलवा दो ज़मीन।
अज़हर : पूछना पड़ेगा किसी से, ऐसे तो आइडिया नहीं है।
रिपोर्टर : किसी से पूछोगे?
अज़हर : किसी से बोलूँगा, वो आगे पूछेगा।
रिपोर्टर : बोल देना, मुस्लिम है। और नॉन-कश्मीरी है।
अज़हर : ठीक है।
अज़हर के बाद ‘तहलका’ रिपोर्टर ने ग़ुलाम मुस्तफ़ा से बात की, जो कश्मीर घाटी का ही रहने वाला है। ग़ुलाम मुस्तफ़ा एक समाजसेवी है और एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी भी है।
जब ‘तहलका’ रिपोर्टर ने ज़मीन के एक काल्पनिक सौदा देते हुए ग़ुलाम से कहा कि वह कश्मीर घाटी में एक सम्पत्ति ख़रीदना चाहते हैं, तो उसने अन्य लोगों द्वारा व्यक्त की गयी भावनाओं को भी व्यक्त किया। ग़ुलाम ने कहा कि अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के सरकार के फ़ैसले ने कश्मीरी लोगों की भावनाओं को आहत किया है। उन्होंने (कश्मीरियों ने) अभी भी इस फ़ैसले को स्वीकार नहीं किया है और ग़ुस्से में हैं। इसलिए जो कोई भी कश्मीर में अपनी सम्पत्ति ग़ैर-कश्मीरियों को बेचने का फ़ैसला करता है, वह अन्य कश्मीरियों से सम्भावित सामाजिक बहिष्कार से बचने के लिए गुप्त रूप से ही ऐसा करे, तो अलग बात।
ग़ुलाम ने बताया कि उसकी जानकारी में किसी कश्मीरी द्वारा बाहरी लोगों को सम्पत्ति बेचने का कोई मामला नहीं मिला है; कम-से-कम अपने इलाक़े में तो नहीं। ग़ुलाम ने बताया कि अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद ग़ैर-कश्मीरियों को वास्तव में क़ानूनी रूप से कश्मीर में सम्पत्ति ख़रीदने की अनुमति है। इसके अतिरिक्त जिन कश्मीरियों को बाहरी लोगों से अपनी सम्पत्ति के अच्छे दाम के प्रस्ताव मिलते हैं, तो वे भी उन्हें (बाहरियों को) उसे बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। हालाँकि जो लोग इस तरह की बिक्री करेंगे, तो उन्हें साथी कश्मीरियों से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है।
बहरहाल, अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर घाटी में ग़ैर-अधिवासित भारतीय नागरिकों द्वारा सम्पत्ति ख़रीद पर प्रतिबंध को हटाने के विवाद के बीच ‘तहलका’ रिपोर्टर ने ज़मीनी स्तर पर इस हक़ीक़त की जाँच करने के लिए कश्मीरी आबादी के अलग-अलग लोगों से बात की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या कश्मीर के लोग अपनी सम्पत्ति बाहरी लोगों को बेचने के लिए तैयार हैं? हमने जिन लोगों से बात की, उन सभी ने ज़ोर देकर कहा कि कश्मीरी अपनी सम्पत्ति बाहरी लोगों को नहीं बेचेंगे। एक ने तो यहाँ तक कह दिया कि जो भी अपनी सम्पत्ति बाहरी लोगों को बेचेगा, उसे स्थानीय स्तर पर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा और बाहरी लोगों को भी कश्मीर में बसने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को न्यूज़क्लिक से जुड़े पत्रकारों के ठिकानों पर छापेमारी की है। ये छापेमारी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की डिजिटल न्यूज वेबसाइट न्यूज़क्लिक के पत्रकारों के यहां जारी है।
रेड के दौरान पुलिस की स्पेशल सेल ने मोबाइल और लैपटॉप, कंप्यूटर समेत कई इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस जब्त किए हैं। साथ ही यूएपीए के तहत केस दर्ज किया गया है।
बता दे, जानकारी के मुताबिक पुलिस ने हार्ड डिस्क डेटा भी लिया है। साथ ही न्यूज़क्लिक की फंडिंग को लेकर ईडी पहले भी रेड मार चुकी है। ईडी ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का भी केस दर्ज किया था।
सूत्रों के अनुसार कुछ पत्रकारों को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। और पुलिस स्टेशनों में ले जाकर उनसे पूछताछ जारी है। पत्रकार अभिसार शर्मा का फोन पुलिस ने किया जब्त।
‘भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति और महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक खिलाड़ी है। और जैसा कि हमने अपनी हिन्द-प्रशांत रणनीति के तहत कहा कि हम भारत के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बनाने के बारे में बहुत गम्भीर हैं।’ खालिस्तान समर्थक आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर के मारे जाने पर मचे कूटनीतिक घमासान के बीच कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने मॉन्ट्रियल में एक संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही। हरदीप सिंह निज्जर हत्याकांड मामले में भारतीय राजदूत के ज़िम्मेदार होने के आरोपों का खंडन करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि दोनों देशों को क्षेत्रीय अखंडता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का सम्मान करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए।
दरअसल कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो द्वारा कनाडा की संसद में निज्जर की हत्या में भारत का हाथ होने का दावा पेश किये जाने के बाद से दोनों देशों के बीच गतिरोध जारी है। इसके बाद भारत और कनाडा ने एक-दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित कर दिया था। इससे भारत द्वारा कनाडा के नागरिकों के लिए वीजा प्रक्रिया सेवाओं को निलंबित करने सहित दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में कड़वाहट बढ़ी।
जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि इस तरह की अंतर-राज्यीय हत्याएँ न्यायिक भारत सरकार की नीति नहीं है। कनाडा और उसके सहयोगियों को दिये गये इस कड़े संदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत के साथ सम्बन्धों को सामान्य बनाने और स्थिति को शान्त करने की ज़िम्मेदारी कनाडा पर है। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 78वें सत्र को संबोधित करने के दौरान जयशंकर ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की पुष्टि करते हुए कहा कि वे दिन बीत चुके हैं, जब कुछ देश एजेंडा तय करते थे और दूसरों से उम्मीद करते थे कि वे भी उसके अनुरूप चलें। उन्होंने ओटावा से कहा कि भारत मामले से सम्बन्धित विशिष्ट और प्रासंगिक जानकारी देखने के लिए तैयार है और अगर कनाडा विशिष्ट जानकारी प्रदान करता है, तो भारत सरकार इस पर $गौर करेगी।
ऐसे मोड़ पर जब कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो ने अपने सुर नरम कर लिये हैं, तब भी अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने आग में घी डालने का काम करते हुए कहा है- ‘हम अपने मूल सिद्धांतों की रक्षा करेंगे और कनाडा जैसे सहयोगियों के साथ निकटता से परामर्श करेंगे; क्योंकि वे अपनी क़ानून प्रवर्तन और राजनयिक प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं।’
इस बात का कोई संकेत नहीं मिला है कि दोनों देश अपने बीच बढ़ती खाई को कम करने के लिए क़दम उठा रहे हैं। दरअसल ट्रूडो ने कथित तौर पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन सहित कनाडा के कुछ क़रीबी सहयोगियों के नेताओं को मामले के बारे में जानकारी दी थी।
अब यह कनाडा पर निर्भर करता है कि वह तनाव को कम करे और भारतीय प्रवासियों और छात्रों की आशंकाओं को दूर करे; क्योंकि कनाडा में पढऩे वाले विदेशी छात्रों में भारतीय छात्रों की संख्या अधिक है। सन् 2022 में 5.5 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्रों में से 2.26 लाख यानी कुल छात्रों का 40 प्रतिशत छात्र भारतीय थे। ऐसे में विदेश मंत्रालय द्वारा जारी भारतीय नागरिकों, विशेष रूप से छात्रों को अत्यधिक सावधानी बरतने और सतर्क रहने का सुझाव और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
पिछले चार दिन पहले गुजरात एसओजी और पीसीबी ने सूरत के हजीरा और रांदेर इलाक़ों से तीन ड्रग्स तस्करों को गिरफ़्तार किया। इन ड्रग्स तस्करों के पास से क़रीब 8.319 किलोग्राम हाई क्वालिटी वाली अफ़ग़ानी चरस बरामद हुई, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के हिसाब से क़रीब 4.15 करोड़ रुपये क़ीमत आँकी गयी। पुलिस के हाथ आने तक तस्कर क़रीब एक किलोग्राम चरस बेच चुके थे। तस्कर समुद्री रास्ते से ड्रग्स तस्करी का धन्धा करते हैं।
इसके अलावा एसओजी ने रांदेर के पालनपुर पाटिया से एक ड्रग्स तस्कर को गिरफ़्ता किया। पुलिस को इस तस्कर के पास से भी क़रीब 2.173 किलोग्राम हाई क्वालिटी की अफ़ग़ानी चरस बरामद मिली। जग्गू से पूछताछ के आधार पर एसओजी ने दो तस्करों को 6.146 किलोग्राम हाई क्वालिटी अफ़ग़ानी चरस के साथ गिरफ़्ता किया।
गुजरात में ड्रग्स तस्करी, शराब तस्करी कोई नयी बात नहीं है। यहाँ की पुलिस हर साल करोड़ों की ड्रग्स और शराब बरामद करती है। मुंद्रा बंदरगाह पर क़रीब 3,000 किलो ड्रग्स बरामद होने के क़िस्से तो अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बनने के बाद दुनिया ने जाना कि गुजरात में ड्रग्स के धंधे में कथित रूप से बड़े-बड़े लोग शामिल हैं। लेकिन इसके अलावा गुजरात एसओजी और पीसीबी की पुलिस टीमें हर साल करोड़ों रुपये के नशीले पदार्थ बरामद करती हैं।
एक पुलिसकर्मी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि मैडम गुजरात में नशे का कारोबार बहुत बड़ा है। गुजरात के रास्ते ड्रग्स की तस्करी महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली तक होती है। इस धंधे में बड़े-बड़े लोग लिप्त हैं। मगर उनके ख़िलाफ़ सुबूत नहीं मिलते। जो ज़्यादातर वही तस्कर पुलिस के हाथ लग पाते हैं, जो लोगों को सप्लाई देते हैं। कभी कोई थोड़ा बड़ा तस्कर पकड़ा जाता है; लेकिन बहुत बड़े तस्करों के भेद वो भी नहीं खोलते। ड्रग्स तस्करी का अगर रिकॉर्ड देखें, तो सूरत प्रिवेंशन ऑफ क्राइम ब्रांच तथा स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने इसी साल 23 जुलाई को सुवाली बीच के पास से क़रीब 9.590 किलोग्राम हाई क्वालिटी अफ़ग़ानी चरस बरामद की थी। यह चरस समुद्री रास्ते से गुजरात लायी गयी थी। इस अफ़ग़ानी चरस की क़ीमत क़रीब 4.79 करोड़ रुपये आँकी गयी थी। पुलिस ने तस्कर के पास से एक तमंचा भी बरामद किया।
इसी 22 सितंबर को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि पुलिस ऑपरेशन ने राजस्थान से कच्चे माल की तस्करी करने और सूरत के बाहरी इलाक़े में नशीली दवाओं के लिए एक विनिर्माण कारख़ाना स्थापित करने की कुछ तस्करों की विस्तृत योजना को विफल कर उन्हें गिरफ़्ता कर लिया है।
इस मामले में गिरफ़्ता आरोपी एमडी के नाम से विख्यात मेथमफेटामाइन और अन्य सिंथेटिक दवाओं का अवैध उत्पादन करते थे। इस कार्रवाई में राजस्थान से एमडी ड्रग्स बनाने वाला क़रीब 10.500 किलोग्राम कच्चा माल पुलिस ने ज़ब्त किया है। अवैध बाज़ार में इस कच्चे माल की अनुमानित क़ीमत क़रीब 8 से 9 करोड़ रुपये आँकी गयी। तस्करों ने यह बात क़ुबूल की कि इससे पहले वे बहुत बड़ी मात्रा में एमडी बनाते रहे हैं और इससे पहले उन्होंने 12 किलोग्राम कच्चा माल ख़रीदा था। इनमें से एक आरोपी को इस गिरफ़्तारी से काफ़ी पहले मुम्बई की क्राइम ब्रांच ने गिरफ़्तार किया था।
पिछले दिनों केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के लोकसभा क्षेत्र सानंद के केरला जीआईडीसी में स्थित एक फार्मास्यूटिकल कम्पनी में क़रीब 500 किलो ड्ग्स एनसीबी टीम ने पकड़ी। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के हिसाब से इस ड्रग्स की क़ीमत क़रीब 10,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा आँकी गयी। इस प्रतिबंधित ड्रग्स की भारत में क़रीब एक करोड़ रुपये प्रति किलोग्राम और विदेशों में क़रीब 15 से 20 करोड़ रुपये प्रति किलोग्राम आँकी गयी।
गुजरात में ड्रग्स तस्करी को लेकर विपक्ष विधानसभा में भी सवाल उठाता रहा है। अमित शाह के संसदीय क्षेत्र में ड्रग्स की इतनी बड़ी खेप पकड़े जाने पर कांग्रेस नेता अमित चावड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि ‘केंद्रीय गृह मंत्री के लोकसभा क्षेत्र में इतनी बड़ी मात्रा में ड्रग्स पकडऩे वाले अधिकारियों का तत्काल प्रभाव से तबादला कर दिया गया। तबादले से शक पैदा होता है कि ड्रग्स के इस बड़े कारोबार का मालिक कोई प्रभावशाली सफेदपोश है, जिसे सरकार बचाना चाहती है।’ कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि ‘सानंद के केरल जीआईडीसी से ड्रग्स ज़ब्त होने के बावजूद सरकार, पुलिस और प्रशासन चुप हैं। ये चुप्पी चिन्ताजनक है। पूरे देश में और ख़ासकर गुजरात में बड़े-बड़े ड्रग कार्टेल चल रहे हैं। गुजरात ड्रग्स के लिए लैंडिंग हब के साथ-साथ प्रोसेसिंग हब भी बनता जा रहा है। साफ़ है कि फार्मास्युटिकल कम्पनियों की आड़ में ड्रग्स का एक पूरा नेटवर्क चल रहा है। हाल ही में सावली में बड़ी मात्रा में ड्रग्स की ज़ब्ती की गयी थी और इसके पहले भी वापी में करोड़ों रुपये की ड्रग्स की ज़ब्ती से यह स्पष्ट है कि गुजरात अब ड्रग लैंडिंग, प्रोसेसिंग और निर्यात का केंद्र बन रहा है।’
देश की संसद में ड्रग्स मुद्दे पर पिछले दिनों पूछे गये एक सवाल के जवाब में केंद्र की मोदी सरकार ने बताया कि सन् 2006 से सन् 2013 तक देश भर में 22,45,000 रुपये की ड्रग्स ज़ब्त की गयी थी। जबकि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सन् 2014 से सन् 2022 तक देश में 62,60,000 रुपये की ड्रग्स पकड़ी गयी। यानी क़रीब एक बराबर समय में कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार के मु$काबले भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार में 180 प्रतिशत ज़्यादा ड्रग्स तस्करी हुई।
13 मार्च, 2023 को गुजरात हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति निखिल केरियल ने राज्य सरकार और डीजीपी को नोटिस जारी किया था। गुजरात हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति केरियल ने पूछा था कि एक अंग्रेजी अख़बार के मुताबिक ड्रग्स पेडलिंग में बच्चों का उपयोग हो रहा है। क्या यह ख़बर सही है? अगर सही है, तो इसमें कितनी सच्चाई है? एफिडेविट के ज़रिये सरकार जवाब दे कि वह इस मामले में क्या कर रही है?
गुजरात हाईकोर्ट के इस नोटिस के अगले ही दिन इस मामले को न्यायमूर्ति निखिल केरियल की बेंच से ट्रांसफर करके कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति ए.जे. देसाई को सौंप दिया गया। कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति ए.जे. देसाई ने सरकार के एफिडेविट के जवाब के बाद इस मामले को ही डिस्पोज कर दिया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, सन् 2016 से मार्च, 2023 तक के सात साल के समय में गुजरात में क़रीब 40,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की ड्रग्स पकड़ी गयी है। इसके अलावा 4 मई 2023 को गुजरात के कच्छ से क़रीब 1.700 किलोग्राम मेथमफेटामाइन ड्रग्स पकड़ी गयी। राष्ट्रीय बाज़ार में इसकी क़ीमत क़रीब 1.7 करोड़ रुपये से दो करोड़ रुपये तक आँकी गयी। इसके बाद 13 मई, 2023 राजकोट के खंडेरी स्टेडियम से 214 करोड़ रुपये की क़ीमत की क़रीब 30 किलोग्राम ड्रग्स पुलिस ने बरामद की। इसके अगले ही दिन यानी 14 मई 2023 को जामनगर नेवी इंटेलिजेंस और एनसीबी ने क़रीब 2,500 किलो ड्रग्स बरामद की, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इस ड्रग्स की क़ीमत 12,000 करोड़ रुपये आँकी गयी थी।
गुजरात में ड्रग्स तस्करी के ये आँकड़े बताते हैं कि गुजरात ड्रग्स तस्करों का हब बन रहा है, जिस पर समय रहते काबू पाया जाना चाहिए। युवाओं और बच्चों का भविष्य बर्बाद करने वाले ड्रग्स तस्करों से आज निपट पाना आसान नहीं रह गया है। इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा। एक अनुमान के मुताबिक, देश में हर साल 5,00,000 से ज़्यादा बच्चे ड्रग्स की लत पकड़ रहे हैं। इन बच्चों को बचाना सरकारों और पुलिस प्रशासन की ज़िम्मेदारी तो है ही, लोगों की ज़िम्मेदारी भी है।
महिला आरक्षण विधेयक संसद में पास होने के बाद भी फ़िलहाल नहीं होगा लागू
नये संसद भवन में कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी ने विपक्ष की तरफ़ से चर्चा की शुरुआत करते हुए लोकसभा में महिलाओं को राजनीति में 33 फ़ीसदी आरक्षण वाले नारी शक्ति वंदन विधेयक पर ओबीसी महिलाओं को आरक्षण से बाहर रखने पर सवाल उठाते हुए इस विधेयक को तत्काल प्रभाव से लागू करने की माँग की, तो भाजपा की तेज़ तर्रार सदस्य उमा भारती ने भी क़ानून में ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की माँग की। निश्चित ही उनके तेवर भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं।
सबसे विचित्र बात यह है कि यह क़ानून आज से छ: साल बाद 2029 में कहीं जाकर लागू हो पाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि भाजपा ने लम्बी प्रक्रिया का बहाना बनाकर क्या महज़ चुनाव में लाभ लेने के लिए इस विधेयक को अभी पास करवा दिया? यदि कांग्रेस व उसके विपक्षी सहयोगियों ने विधेयक पास होने के बावजूद महिला आरक्षण लटकाने को मुद्दा बना दिया, तो भाजपा को लाभ की जगह नुक़सान भी हो सकता है। ऊपर से विधेयक में ओबीसी को बाहर रखने का मुद्दा भी भाजपा के ख़िलाफ़ जाता है।
भाजपा को सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के क़रीब 50 फ़ीसदी वोट मिले थे और पार्टी इन्हें बचाए रखने की क़वायद के लिए ही यह विधेयक चुनाव से पहले लायी, भले आरक्षण छ: साल बाद ही लागू हो। सन् 2019 में जब भाजपा दोबारा सत्ता आयी थी, तब महिलाओं का भाजपा से मोह भंग नहीं हुआ था। लेकिन अब चार साल बाद महँगाई और अन्य मुद्दों के चलते महिलाओं का भाजपा से मोह भंग हुआ है। भाजपा में इससे चिन्ता है। रोज़गार नहीं मिलने से युवा पहले ही भाजपा से दूर हुए हैं। ऐसे में भाजपा के पास महिला आरक्षण ही एक ऐसा हथियार था, जिससे वह महिलाओं को पार्टी से दूर जाने से रोक सकती थी। हालाँकि कुछ जानकार कहते हैं कि राजनीति में आरक्षण बहुत सीमित मात्रा में महिलाओं को आकर्षित करता है, क्योंकि 70 फ़ीसदी से ज़्यादा महिलाओं का राजनीति से सीधा कुछ लेना-देना नहीं होता। हाल के वर्षों में महिलाओं में राजनीति की तरफ़ रुझान बढ़ा है; लेकिन आज भी महिलाओं के लिए सबसे बड़े मुद्दे महँगाई और रोज़गार हैं। आज भी गाँवों / पंचायतों (स्थानीय निकाय) में जहाँ महिला आरक्षण लागू है, वहाँ भी महिलाओं की वास्तव में रोल बहुत सीमित है; क्योंकि परदे के पीछे उनके पति या पुरुष साथी ही फ़ैसले करते हैं।
फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि बड़े स्तर पर 33 फ़ीसदी आरक्षण मिलने से महिलाओं को अपनी आवाज़ बुलंद करने का अवसर मिलेगा। वे अपने मुद्दों को और मज़बूती से सामने ला पाएँगी और उनके हल का दबाव भी सत्ताओं पर बढ़ेगा। हाल के वर्षों में महिला आरक्षण को लेकर स्वर तेज़ हुए हैं। सन् 2004 में जब कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी तो महिला आरक्षण की सम्भावना सबसे मज़बूत दिखी थी। इसका कारण यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी का महिलाओं के प्रति रुझान था। यह सोनिया गाँधी ही थीं, जिन्होंने पहले विदेश सेवा की अधिकारी मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बनवाया। साथ ही राज्यसभा में नज़मा हेपतुल्ला को उप सभापति बनाया। इसके बाद प्रतिभा पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति भी उनके ही कारण बनीं। सोनिया गाँधी ने कहा था कि वह अपने दिवंगत पति राजीव गाँधी के महिलाओं को ज़्यादा अधिकार देने के सपने को पूरा कर रही हैं। हालाँकि यूपीए के अपने ही कुछ साथियों के विरोध के कारण यूपीए सरकार महिला आरक्षण विधेयक को राज्यसभा में पास करवाने के बावजूद लोकसभा में पेश नहीं कर सकी। यदि ऐसा हो पाता, तो 2010-11 में ही महिला आरक्षण लागू हो गया होता।
भाजपा की सफलता
इसमें बिलकुल भी संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा कहीं ज़्यादा योजना के साथ संसद में विधेयक लाती है और उनका पास होना भी सुनिश्चित करती है। पहले जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 ख़त्म करने जैसा विवादित विधेयक पास करवाना इसका उदाहरण है। अब उसने महिला आरक्षण विधेयक भी संसद में पास करवा लिया। निश्चित ही यह विधेयक शुद्ध चुनावी हथियार है। लेकिन यह भी सच है कि दशकों से लटका यह विधेयक पास हो गया है; भले मोदी सरकार इसे अभी लागू नहीं कर रही है। भाजपा और ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह इस विधेयक को ख़ुद की कोशिश बताया, उससे ज़ाहिर है कि वह विपक्ष को इसका बिलकुल भी श्रेय नहीं लेने देना चाहते हैं।
भाजपा महिला विधेयक पास करवाने को उज्ज्वला रसोई गैस योजना, मुफ़्त महिला शौचालय और नल से जल जैसी पिछली महिला सम्बन्धी योजनाओं से भी जोड़ेगी। गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि यह क़ानून 2029 तक ही लागू हो पाएगा। ज़ाहिर है महिलाओं को अभी लम्बा इंतज़ार करना पड़ेगा। चूँकि यह काफ़ी लम्बा होगा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल आने वाले चुनावों में इसके लिए भाजपा को घेर सकते हैं। इस दौरान कौन-सी सरकारें केंद्र में सत्ता में आएँगी, यह भी अभी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि कम-से-कम दो चुनाव तो इस दौरान पड़ेंगे ही। लिहाज़ा कहा जा सकता है कि आरक्षण के नाम पर महिलाओं को फ़िलहाल तो बहुत लम्बा इंतज़ार ही मिला है। लेकिन यह तय है कि इस साल होने वाले विधानसभाओं और 2024 (या जब भी हों) के लोकसभा चुनाव में भाजपा महिला आरक्षण विधेयक पास करवाने की बात को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी।
भाजपा अगले चुनाव को बड़ी चुनौती के रूप में देख रही है। उसे लग रहा है कि कांग्रेस उभर सकती है। कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन से उसे मुश्किल चुनौती मिल सकती है। दूसरे विभिन्न सर्वेक्षण बताते हैं कि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की रेटिंग (जनता में स्वीकार्यता) हाल के महीनों में बढ़ी है। ज़ाहिर है, जिस राहुल गाँधी को भाजपा नेता विपक्ष की सबसे कमज़ोर कड़ी बताते रहते हैं। वहीं राहुल गाँधी वास्तव में भाजपा के लिए सबसे गम्भीर चुनौती हैं।
ऐसे में भाजपा चुनाव के लिए अपने थैले में एक से अधिक तुरुप के पत्ते रखना चाहती है। महिला आरक्षण क़ानून के अलावा राम मंदिर को वह अपना बड़ा हथियार बनाएगी। इसके अलावा उसने एक राष्ट्र, एक चुनाव, कृष्ण जन्म भूमि और समान नागरिक संहिता का राग भी छेड़ रखा है, ताकि अपने मुद्दों का वज़न बढ़ा सके। भले इन दोनों मुद्दों को वह भविष्य के चुनावों में इस्तेमाल के लिए रखे। ऐसे में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन या अन्य विपक्षी दलों के सामने इन मुद्दों की बड़ी चुनौती तो रहेगी ही। देखना यह होगा कि वे मोदी सरकार के ख़िलाफ़ 10 साल की एंटी-इंकम्बैंसी को भुना पाते हैं या नहीं? उन्हें भाजपा के ब्रांड चेहरे नरेंद्र मोदी के अलावा इन मुद्दों से निपटना पड़ेगा।
संसदीय प्रणाली का नया अध्याय
संसद का विशेष सत्र नये संसद भवन में हुआ। सत्र के पहले दिन पुराने भवन में तमाम सदस्यों ने भावुकता से पुराने लम्हों को याद किया, वहीं इस भवन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डाला। बाद में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रस्ताव किया कि पुराने संसद भवन को अब संवैधानिक भवन कहा जाए। सदस्यों का सामूहिक फोटो सेशन भी हुआ। इसके बाद पैदल चलते हुए सभी सदस्य नये भवन पहुँचे, जहाँ आगे की कार्यवाही हुई। नये संसद भवन के साथ भारतीय संसदीय प्रणाली का नया अध्याय शुरू हुआ है।
निश्चित ही नये संसद भवन में आने वाली सरकारों की तरफ़ से नये क़ानूनों, सामाजिक, आर्थिक और वैधानिक विषयों के नये मापदंड स्थापित होंगे। भविष्य में नयी पीढ़ी के जो सदस्य चुनकर आएँगे, उनके लिए पुराने संसद भवन का इतिहास अध्ययन और जिज्ञासा का विषय होगा। नये संसद भवन का नाम इतिहास में इसलिए भी दर्ज हो गया कि इसकी पहली ही बैठकों में महिला आरक्षण विधेयक आया और पास हुआ। इस विधेयक के लागू होने के बाद संसद के स्वरूप में महत्त्वपूर्ण बदलाव दिखेंगे, क्योंकि लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या 82 से बढक़र 181 हो जाएगी।
क्या है महिला आरक्षण विधेयक?
बिल में महिला आरक्षण की अलग से कोई व्यवस्था नहीं की गयी है और दलित और आदिवासियों के लिए जितनी सीटें लोकसभा और विधानसभा के लिए आरक्षित हैं, उनमें से 33 फ़ीसदी इस समुदाय की महिलाओं के लिए निर्धारित हो जाएँगी। ओबीसी के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है, जो यूपीए के विधेयक में थी। हालाँकि ओबीसी आरक्षण की माँग के चलते यह विधेयक इतने समय लटका रहा। इस विधेयक के तहत महिला आरक्षण 15 साल के लिए मिलेगा। उसके बाद इसे जारी रखने के लिए फिर से विधेयक लाना होगा।
वर्तमान में लोकसभा में 82 महिला सदस्य हैं, जो कुल सदस्यों का महज़ 15 फ़ीसदी हैं। उधर राज्यसभा में 31 महिला सदस्य हैं, जो कुल सदस्य संख्या का सिर्फ 13 फ़ीसदी है। राज्यों की बात करें, तो विधानसभाओं में महिलाओं की उपस्थिति 10 फ़ीसदी से भी कम है। भले स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं की बड़ी भागीदारी रही थी, उन्हें राजनीति में बहुत बेहतर प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका है। सन् 1977 में जे.पी. आन्दोलन के बावजूद संसद में महिला प्रतिनिधित्व महज़ 3.5 फ़ीसदी रहा था, जो अब तक का सबसे कम है।
महिला आरक्षण विधेयक का पहला ड्राफ्ट सन् 1996 में तैयार किया गया था। हालाँकि शुरुआत से ही इसे विवादों ने घेर लिया। कारण थी पुरुष मानसिकता, जो महिलाओं को ज़्यादा अधिकार देने के ख़िलाफ़ थी। सन् 1998 में जब केंद्र में इंद्र कुमार गुजराल की सरकार थी, उनकी ही पार्टी के भीतर विधेयक को लेकर विद्रोह हो गया। लिहाज़ा विधेयक ही पेश नहीं हो सका। इसके बाद उसी साल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी विधेयक पेश करने की कोशिश की; लेकिन समाजवादी पार्टी के सांसदों ने विधेयक की प्रतियाँ सदन में ही फाड़ डालीं। सन् 2000 में उस समय के क़ानून मंत्री राम जेठमलानी ने विधेयक पेश तो किया; लेकिन पास नहीं हो पाया। इसके बाद प्रधानमंत्री वाजपेयी ने 3 मार्च, 2002 को महिला आरक्षण पर सहमति के लिए सर्वदलीय बैठक बुलायी; लेकिन इस पर भी सहमति नहीं बन पायी। एक बार फिर समाजवादी पार्टी और राजद ने इसमें पिछड़ों के लिए कोटे की माँग करके इसका विरोध किया। इसके बाद सन् 2010 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार इकलौती सरकार थी, जो महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास करवाने में सफल रही; लेकिन लोकसभा में नहीं करवा पायी। उस समय राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक को एक के मुक़ाबले 186 मतों के भारी बहुमत से पारित किया गया था।
अब जब यह विधेयक संसद में पास हो गया है। कांग्रेस की माँग है कि इसे तत्काल अमल में लाया जाए। साथ ही वह जातीय जनगणना की माँग है, ताकि ओबीसी महिलाओं को भी आरक्षण का प्रावधान करके लाभ दिया जा सके। उधर भाजपा इसे मोदी सरकार की प्राथमिकता से जोड़ रही है। लेकिन यह भी सच है कि नये विधेयक में सबसे बड़ा पेच यह है कि यह परिसीमन के बाद ही लागू होगा। परिसीमन इस विधेयक के पास होने के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर होगा। साल 2024 में होने वाले आम चुनावों से पहले जनगणना और परिसीमन क़रीब-क़रीब असम्भव है। इस फॉर्मूले के मुताबिक, विधानसभा और लोकसभा चुनाव समय पर हुए, तो इस बार महिला आरक्षण लागू नहीं होगा। यह साल 2029 के लोकसभा चुनाव या इससे पहले के कुछ विधानसभा चुनावों से लागू हो सकता है।
महिला आरक्षण का इतिहास
महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण की पहली माँग सन् 1931 में उठी थी, जब बेगम शाह नवाज़ और सरोजिनी नायडू ने इसे लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महिलाओं के लिए राजनीति में समानता की माँग की थी। इस दौरान संविधान सभा की बहसों में भी महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई।
सन् 1971 में नेशनल एक्शन कमेटी ने भारत में महिलाओं के घटते राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर चिन्तन के लिए बैठक की। सदस्यों ने स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण का समर्थन किया। इसके बाद कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का रास्ता खोला। सन् 1988 में महिलाओं के लिए नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण की सि$फारिश की। इसी का नतीजा था कि राजीव गाँधी सरकार के समय पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी गयी। इन सीटों में से एक-तिहाई सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
इसके बाद सन् 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गयीं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फ़ीसदी आरक्षण लागू किया है।
चुनाव की बात करें, तो सन् 2009 में ओबीसी के भाजपा को 22 फ़ीसदी, कांग्रेस को 24 फ़ीसदी, जबकि क्षेत्रीय दलों को 54 फ़ीसदी वोट मिले। इसी तरह सन् 2014 में भाजपा को 34, कांग्रेस को 15 और क्षेत्रीय दलों को 51 फ़ीसदी वोट मिले। उधर सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 44, कांग्रेस को 15 जबकि क्षेत्रीय दलों को 41 फ़ीसदी वोट मिले थे। ऐसे में ओबीसी वोट चुनाव में महत्त्व रखता है। लिहाज़ा महिला आरक्षण में इस समुदाय को नज़रअंदाज़ करने का भाजपा को नुक़सान हो सकता है।
सारे दलों को इस विधेयक का समर्थन करना पड़ा है। यही लोग हैं, जो पहले विधेयक फाड़ा करते थे। आज उनको विधेयक को समर्थन करना क्यों पड़ा? क्योंकि देश भर में पिछले 10 साल में महिलाएँ शक्ति बनकर उभरी हैं। हमने संसद में पहुँचने से पहले देश में सामथ्र्य बना दिया। आपकी शक्ति ने रंग दिखा दिया कि सभी राजनीतिक दलों को इस काम में जुडऩा पड़ा। शायद ईश्वर ने इस और ऐसे कई पवित्र काम के लिए मोदी को ही चुना है।’’
नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री
महिला आरक्षण अच्छा क़दम है; लेकिन इसमें दो शर्तें लगायी गयी हैं। इसे लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन कराना होगा। इन्हें करने में बहुत साल लगेंगे। सच्चाई यह कि महिला आरक्षण को आज से ही लागू किया जा सकता है। भाजपा को इन दोनों शर्तों को हटा देना चाहिए। यह कोई जटिल मामला नहीं है; लेकिन सरकार यह नहीं करना चाहती। सच्चाई ये है कि यह आज से 10 साल बाद लागू होगा। यह भी नहीं मालूम कि होगा या नहीं होगा। महिला आरक्षण एक डायवर्सन टैक्टिक है। इसके ज़रिये ओबीसी जनगणना से लोगों का ध्यान भटकाया जा रहा है। मुझे पता लगाना है कि ओबीसी हिन्दुस्तान में कितने हैं। जितने भी हैं, उन्हें भागीदारी मिलनी चाहिए।’’
राहुल गाँधी
कांग्रेस नेता
कांग्रेस तत्काल लागू कर देती आरक्षण!
कांग्रेस इसे तत्काल लागू करने की माँग कर रही है। इस पत्रकार की जानकारी के मुताबिक, वह लोकसभा चुनाव में इसे सत्ता में आते ही लागू करने की बात अपने चुनाव घोषणा-पत्र में ला सकती है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने इस पत्रकार को नाम न छापने की शर्त पर बताया- ‘पार्टी इसे 2010 में ही लागू कर देती, यदि यह लोकसभा में भी उस समय पास हो गया होता। हमने फ़ैसला कर लिया था। लेकिन दुर्भाग्य से यह नहीं हो पाया था। सोनिया जी का भी इस क़ानून को लागू करने पर बहुत ज़ोर था। अब हम आने वाले चुनाव के लिए अपने घोषणा-पत्र में इसे सत्ता में आते ही लागू करने का वादा कर सकते हैं।’
चूँकि विधेयक पास हो चुका है, इसलिए सत्ता में आने पर कांग्रेस को इसे लागू करने में कोई दिक्क़त नहीं होगी। विधेयक संसद में पास होने के अगले ही दिन कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके महिला आरक्षण अगले लोकसभा चुनाव में ही लागू करने की माँग की। उनसे पहले सोनिया गाँधी पहली विपक्षी सदस्य थीं, जिन्होंने संसद के भीतर महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में आवाज़ बुलंद की। ज़ाहिर है इस विधेयक को पास करवाकर चुनाव में लाभ लेने की भाजपा की कोशिश को कांग्रेस अपने तरी$के से भोथरा करने की तैयारी में है। कांग्रेस पहले ही इसे पार्टी (यूपीए) का विधेयक बताकर श्रेय लेने की कोशिश कर चुकी है।
विदेशों में महिला आरक्षण
वैसे तो भारत में महिलाओं की आबादी 48 फ़ीसदी से भी ज़्यादा है; लेकिन राजनीति में उनकी हिस्सेदारी (वर्तमान विधेयक पास होने से पहले) महज़ 17 फ़ीसदी ही है। महिलाओं के संसंद में प्रतिनिधित्व के लिहाज़ से भारत की 185 देशों में आज 141वीं रैंकिंग है। यह 15 फ़ीसदी है, जो हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी कम है। हाँ, हाल में संसद में पास हुआ क़ानून लागू होने से स्थिति ज़रूर बदलेगी। दुनिया के कई देशों में महिलाओं के लिए संसद में 50 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान है, जिनमें फ्रांस और दक्षिण कोरिया शामिल हैं।
अर्जेंटीना, मैक्सिको और कोस्टा रिका की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 36 फ़ीसदी से ज़्यादा है। पाकिस्तान में सन् 2002 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ सरकार ने इसे 33 फ़ीसदी कर दिया। बांग्लादेश की संसद की 350 सीटों में 50 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। नेपाल में तो सन् 2007 से ही महिलाओं के लिए 33.09 फ़ीसदी आरक्षण है। अमेरिका और ब्रिटेन में महिला आरक्षण नहीं; लेकिन उनका प्रतिनिधित्व बिना आरक्षण के भी क्रमश: 29 और 35 फ़ीसदी है। दुनिया में एक-तिहाई देश ऐसे हैं, जहाँ महिलाओं का प्रतिनिधित्व 33 फ़ीसदी है। महिलाओं के आधे प्रतिनिधित्व के मामले में न्यूजीलैंड और यूएई जैसे देश हैं। इस मामले में सबसे ऊपर रवांडा है, जहाँ 61 फ़ीसदी महिलाओं का प्रतिनिधित्व है।
चंद्रयान, जी20 के चमक-दमक से लेकर नारी शक्ति वंदन बिल के शोर में घोसी उपचुनाव की हार की समीक्षा दब गयी या सत्ताधारी दल द्वारा रणनीतिक रूप से दबा दी गयी। ये एक साधारण-सा तथ्य है कि केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। वरना वर्तमान प्रधानमंत्री गुजरात का अपना गढ़ छोडक़र उत्तर भारत की सांस्कृतिक राजधानी काशी यूँ ही नहीं आये थे।
देश में हर अच्छी चीज़ के लिए प्रधानमंत्री को श्रेय देने वाले भाजपाई घोसी की हार पर मौन हैं। हालाँकि इस समय भाजपा के कार्यकर्ताओं की स्थिति वैचारिक रूप से बड़ी विकट है। उन्हें पता ही नहीं है कि किसका विरोध करना है और किसका समर्थन? कल तक जिस दारा चौहान द्वारा भाजपा-संघ के कटु विरोध के कारण भाजपाइयों के बीच उन पर लानत-मलानत भेजने की होड़ थी, अब उन्हीं चौहान को पालकी पर ढोना पड़ रहा है। भाजपा ने जो दुर्गति अपने कॉडर की कर रखी है, वह किसी भी दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता की नहीं है।
इस समय भाजपा देश भर के अवसरवादियों और भ्रष्ट राजनीतिक तत्त्वों की सबसे बड़ी आश्रयदाता है। चूँकि वह सत्ता के स्वर्णिम काल में है, इसलिए येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहने की नैतिकताविहीन परिकल्पना उसके शुभ-अशुभ के मूल्यांकन की क्षमता को बाधित कर रही है। सत्ता का ज्वार इतना तीव्र है कि पार्टी अपने उन कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को भी अपमानित करने से नहीं चूक रही, जिन्होंने अपना पूरा जीवन, सर्वस्व पार्टी के लिए होम कर दिया। सन् 2014 से पहले जो पार्टी और विचारधारा के संघर्ष के लिए सदन से सडक़ तक संघर्षों में प्राणपण से जुटे रहे, सत्ता मिलते ही उन्हें नये नेतृत्व ने न सिर्फ़ ठोकर मारी, बल्कि निरंतर अपमानित भी किया।
इसके विपरीत पार्टी अपनी विचारधारा से नितांत अपरिचित ही नहीं, बल्कि अपने कटु आलोचकों के लिए रेड कॉर्पोरेट बिछाने को व्यग्र है। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि संघ के स्वयंसेवकों में भी असन्तोष और असहजता की स्थिति पैदा हो गयी है। घोसी उपचुनाव में दारा चौहान को प्रत्याशी घोषित करना और कार्यकर्ताओं की नाराज़गी भी हार का एक प्रमुख कारण था। अत: इन्हीं वजहों को लेकर कॉडर अब नेतृत्व के समक्ष प्रश्नवाचक मुद्रा में है, जिसे टालना न संघ के लिए सम्भव है और न भाजपा के लिए।
अब यहाँ मातृ संगठन के रूप में संघ की भूमिका बढ़ जाती है; लेकिन उसकी वैचारिक स्पष्टता की महिमा अपरंपार है। उत्तर प्रदेश में सांगठनिक कील-काँटे दुरुस्त करने के उद्देश्य से संघ प्रमुख मोहन भागवत भी तीन दिवसीय लखनऊ दौरे पर रहे। लेकिन इन मुद्दों पर उन्होंने वही रटा-रटाया बयान दिया, जो उन समेत संघ का शीर्ष नेतृत्व पिछले कई वर्षों से देता आ रहा है। जैसे कि ‘जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। संघ का काम किसी को हराना या जिताना नहीं है। संघ का कार्य हिन्दू समाज को जागृत और संगठित करना है। भाजपा का अपना एजेंडा है। वह जो करेगी, उसी तरह का उसे प्रतिफल मिलेगा। आगे कैसे करना है। इस पर भी उन्हें गम्भीरता से सोच-विचार करना चाहिए। संघ उसमें दख़ल नहीं देगा।’
अब देखिए, सन् 2015 में भी दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के हाथों अपमानजनक पराजय के बाद भी भागवत ने ऐसा ही बयान दिया था कि ‘भाजपा जैसा करेगी, वैसा ही भरेगी। उसका आकलन उसके कार्यों से किया जाएगा। संघ का इससे कोई लेना-देना नहीं है।’ लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही है? अल्फ्रेड नोबेल कहते हैं- ‘कृषि के बाद पाखण्ड हमारे युग का सबसे बड़ा उद्योग है।’
इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारत में सामाजिकता हो या सांस्कृतिक आन्दोलन अथवा राजनीति सबमें पाखण्ड की अभिव्यक्ति चरम पर है। यदि संघ का भाजपा के कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है, तो फिर प्रश्न यह है कि लोकसभा-विधानसभा या चाहे कोई भी चुनाव हो, संघ पूरे दल-बल के साथ भाजपा के साथ सक्रिय क्यों दिखता है? यदि संघ भाजपा सरकारों के कार्यशैली पर कोई नियंत्रण रखने में सक्षम नहीं है, उसकी जवाबदेही नहीं तय कर सकता, तो फिर उसे भाजपा के पक्ष में मतदान की अपील और राजनीतिक लामबंदी पैदा करने का क्या अधिकार है? पर ऐसे सवालों का संघ के पास वही यांत्रिक बयान होगा, जिस पर चर्चा खीझ पैदा करेगी। ज़िम्मेदारी के बिना अधिकार के विचार को संघ नेतृत्व ही परिभाषित कर सकता है; क्योंकि उसके कार्यों एवं बयानों में जो विरोधाभास है, उसका विश्लेषण आम आदमी के बूते की बात नहीं है।
घोसी उपचुनाव में दलित और पिछड़े तो ख़िलाफ़ थे ही, सवर्ण जातियाँ, जिनका वोट भाजपा अपनी बपौती मानती रही है; उसका एक बड़ा भाग विपक्ष के खाते में गया है। हालाँकि देश में हर छोटी-बड़ी घटना के लिए मोदी-मोदी की जय-जयकार करने वाले भाजपाई उपचुनाव की हार पर चर्चा नहीं करना चाहते। अगले आम चुनाव के लिए यह हार एक बड़ा संदेश है। मोदी के देवत्व के नारों में भाजपाई बिग्रेड चाहे जितना झुठलाए, किन्तु सत्य यही है कि जनता का एक बड़ा वर्ग इस सरकार की कार्यशैली और उसके कई बेतुके फ़ैसलों चिढ़ा हुआ है। इसलिए जितना भाजपाई 2024 की राह आसान बता रहें हैं, वह भ्रमपूर्ण स्थिति है। उन्हें भी पता है कि अगले आम चुनाव की राह में कई मुश्किलें हैं। इसमें भी कोई शक नहीं कि एंटी-इनकम्बेसी के सहारे कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष अब धीरे-धीरे मज़बूत हो रहा है। लेकिन कैसे? इसकी मुख्य वजह सत्तारूढ़ दल का अहंकार है। सत्ता का तामस सँभालना अत्यंत दुष्कर है। भाजपा भी इसका अपवाद नहीं। अटल-आडवाणी के काल में संजोये जद(यू), शिवसेना एवं अकाली दल जैसे पुराने सहयोगी एक-एक करके छिटकते गये। अब नयी सहयोगी बनी अन्नाद्रमुक ने भी अपना हाथ छुड़ा लिया। राजनीतिक समीकरण इसकी एक वजह हो सकती है; लेकिन भाजपा का सत्ताजनित अहंकार इसका एक बड़ा कारण है। यह अहंकार का भाव सिर्फ़ पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके मातृ संगठन संघ तक में प्रविष्ट हो चुका है।
अपने लखनऊ यात्रा के दौरान संघ प्रमुख का अपने कॉडर के लिए संदेश था- ‘स्वयंसेवक का आचरण और व्यवहार ठीक हो। उनके व्यक्तित्व में सादगी हो। समाज में उनकी प्रामाणिकता हो। तभी लोग संघ के प्रति आकर्षित होंगे और उसकी विचारधारा से जुड़ेंगे।’ लेकिन वास्तविकता थोड़ी अशुभ है। पिछले एक दशक में संघ के पदाधिकारियों के व्यवहार परिवर्तन को देखिए, अहंकार से भरे हुए; सत्ता की शक्ति के प्रदर्शन में लिप्त; भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति आकर्षित; लेकिन सार्वजनिक जीवन में सादगी का पाखण्ड प्रदर्शित करते हुए। यह वास्तविकता है। बल्कि बड़े स्तर के पदाधिकारियों की स्थिति यह है कि कार्यालय में उनसे मिलने आये आगंतुकों से बात करने तक को वह अपना अपमान समझते हैं। जबकि एक समय था, जब संघ के प्रचारकों का त्याग, सौम्यता और कायिक-वाचिक निष्ठा उनके वैचारिक विरोधियों के बीच भी सराहनीय एवं आदर के साथ चर्चा का विषय बनी रहती थी। इसकी एक दूसरी वजह भी है। संघ की स्थापना के मूलभूत विचारों में कभी भी सत्ता भागीदारी की संकल्पना नहीं रही है; लेकिन अब तो संघ का शीर्ष नेतृत्व न सिर्फ़ राजनीतिक भाषणबाज़ी में लगा है, बल्कि खुलेआम राजनीतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन भी दे रहा है। यह उस प्रक्रिया का परिणाम है, जो पिछले एक दशक से अधिक समय से प्रभाव में है। गृहस्थ जीवन के विचार का त्याग करते हुए आजीवन राष्ट्र की सेवा के बोध से स्वयं को समर्पित करने वाले स्वयंसेवकों के बजाय संघ की सांगठनिक संरचना में बड़ी संख्या में राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा रखने वाले लोगों का प्रवेश हुआ।
एक समय जनसंघ से लेकर भाजपा तक की राजनीतिक गतिविधियों में सहयोग के लिए ठेलकर भेजे जाने वाले पदाधिकारियों की जगह ऐसे वर्ग का प्रसार हो चुका है, जो संघ को राजनीतिक प्रतिष्ठा, संसद से लेकर विधानमंडलों तक जाने का एक माध्यम समझता है। वह संघ के अपने दायित्व से मुक्त होकर भाजपा के साथ जुडऩे को लालायित है। स्पष्ट शब्दों में कहें, तो संघ अब अघोषित राजनीतिक गतिविधियों के ऐसे केंद्र में परिवर्तित हो चुका है, जिसने अपने मूलभूत सांस्कृतिक सेवा के भाव को कहीं पीछे छोड़ दिया है। यही वजह है कि 2024 का आम चुनाव एक मायने में बहुत $खास होने वाला है। इसने संघ के सांस्कृतिक संगठन होने के मुखौटे को उतार दिया है। संघ बिरादरी न सिर्फ़ खुलकर चुनावी भाषा बोल रही है, बल्कि चुनावी रण में खुले में ताल ठोक रही है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार, किसी भी संगठन की औसत आयु एक शताब्दी यानी सौ साल की होती है। सन् 1925 में स्थापित संघ भी अपने स्थापना की शताब्दी पूर्ण करने के समीप है। क्या सांस्कृतिक निष्ठा और राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित संघ पतनशीलता की ओर अग्रसर है? क्या यह संघ के नैसर्गिक सिद्धांतों एवं कार्यशैली में गिरावट का संकेत है? $खैर, यह एक अलग चर्चा का विषय है। लेकिन इससे संघ-भाजपा के ऊपर एक दशक की एकछत्र सत्ता के दुष्प्रभाव को स्पष्ट देखा-समझा जा सकता है। मातृ संगठन की वैचारिक निष्ठा में गिरावट का प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव भाजपा समेत उसके दूसरे आनुषांगिक संगठनों पर भी पड़ रहा है।
ऐसा नहीं है कि उपरोक्त विश्लेषण से दक्षिणपंथी बौद्धिक जगत परिचित नहीं है। असल में वर्तमान सत्ताधारी दल के नेता और कार्यकर्ता हों या संघ के कॉडर और पदाधिकारी सभी जानते हैं कि वर्तमान सरकार की दशा और दिशा दोनों ख़राब हैं। लेकिन कोई भी सार्वजनिक रूप से यही कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है; और जो यह प्रयास कर रहे हैं, उन्हें पार्टी और संगठन में अपमानित किया जाता है। जॉर्ज ऑरवेल कहते हैं- ‘समाज जितना ही सच्चाई से दूर होता जाएगा, उतना ही सच बोलने वालों से नफ़रत बढ़ती जाएगी।’
यही स्थिति संघ-भाजपा की है। वैसे संघ-भाजपा के काडर को एक बात के लिए दाद देनी होगी कि उनके एक बड़े वर्ग में असन्तोष होते हुए भी दिल पर पत्थर रखकर सरकार की अच्छी या अनर्गल हर बात का पुरज़ोर समर्थन कर रहे हैं। निर्मल वर्मा लिखते हैं- ‘आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किये कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा-सा जी सके।’ लेकिन आत्ममूल्यांकन के लिए भी आत्मसजगता बौद्धिक चेतना की आवश्यकता होती है। अत: सत्ता सुख के सागर में अबाध गोते लगा रहे वैचारिक तिलांजलि दे चुके वर्ग से इसकी उम्मीद मूर्खता होगी। लेकिन यदि सत्ताधारी वर्ग इस दिशा में थोड़ा प्रयत्न कर सके, तो भारतीय राजनीति के लिए शुभ होगा।
जिस संसद को संविधान और देश की गरिमा का प्रतीक और लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है, जिस संसद की गतिविधियों पर पूरे देश और दुनिया की नज़र रहती है; उसी संसद भवन में सत्र सभा सजते ही हर दिन लोकतंत्र का चीर हरण होता है। इस बार जिस प्रकार से नये संसद भवन में लोकतंत्र का यह चीरहरण हुआ, वैसा चीरहरण संसद की गतिविधियों को कवर करने के मैंने अपने तीन दशक से ज़्यादा के पत्रकारिता करियर में नहीं देखा। 18 सितंबर, 2014 को जिस संसद भवन की सीढिय़ाँ चढऩे से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माथा टेका था, लोकतंत्र के उसी नये भवन में पहले ही विशेष सत्र में चौथे दिन गालियों की बोछार सुनायी दी।
यह अभद्रता भाजपा तीन बार के विधायक और दो बार सांसद रमेश बिधूड़ी ने बसपा सांसद दानिश अली से की। हैरानी की बात यह है कि सत्ताधारी दल के सांसद की ओए-तोए की अभद्र भाषा पर न तो अभी तक प्रधानमंत्री ने कुछ कहा है और न ही लोकसभा अध्यक्ष ने बिधूड़ी के ख़िलाफ़ कार्यवाही करते हुए विपक्षी सांसदों की तरह बाहर का रास्ता दिखाया है। बस, बिधूड़ी के अभद्र बयान को रिकॉर्ड से हटा लिया है। लोकसभा अध्यक्ष और भाजपा ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भेज दिया है। लेकिन दूसरी ओर इनाम के रूप में बिधूड़ी को राजस्थान के टोंक की चुनावी ज़िम्मेदारी मिल गयी।
दरअसल दक्षिणी दिल्ली से भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी जब मोदी सरकार की तारीफ़ चंद्रयान-3 की सफलता को लेकर कर रहे थे, तभी बसपा सांसद दानिश अली ने सवाल उठा दिया। बस इसी को लेकर बिधूड़ी ने ग़ुस्से में कहा- ‘ओए-ओए उग्रवादी! ऐ उग्रवादी! बीच में मत बोलना। ये आतंकवादी-उग्रवादी है। ए कटुए। ये मुल्ला आतंकवादी है। इसकी बात नोट करते रहना। अभी बाहर देखूँगा इस मुल्ले को।’
हैरत इस बात की है कि जब रमेश बिधूड़ी संसद की गरिमा तार-तार कर रहे थे, तब उनकी पार्टी के दो सांसद डॉ. हर्षवर्धन सिंह और रविशंकर प्रसाद और कई अन्य सांसद हँस रहे थे। जब हर्षवर्धन से इस बारे में पूछा गया कि वह बिधूड़ी के बयान को सुन नहीं सके। रालोद ने डॉ. हर्षवर्धन की मुस्कुराहट को लेकर सवाल उठाये हैं। बिधूड़ी ने जिस तरह सडक़छाप भाषा का लोकसभा में इस्तेमाल किया, उसके लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खेद जताया। उन्होंने कहा कि अगर बिधूड़ी ने ऐसा कुछ कहा है, जिससे बसपा सांसद की भावनाएँ आहत हुई हैं, तो मैं इस पर खेद व्यक्त करता हूँ। लेकिन वहीं किसी भाजपा नेता या सांसद ने न तो रमेश बिधूड़ी का विरोध किया और न ही उन्हें अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए रोका। जब बिधूड़ी सडक़छाप अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल अपने ही समकक्ष के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहे थे, तब अध्यक्ष की आसंदी पर कोडिकुन्नील सुरेश बैठे थे। उन्होंने दानिश अली से बार-बार बैठने को कहा। बिधूड़ी को भी चुप रहने को कहा; लेकिन वह चुप नहीं हुए और बसपा सांसद से अभद्रता करते रहे।
मैंने संसद की सैकड़ों कार्यवाहियाँ लाइव देखी हैं; लेकिन इस तरह की भाषा पहले कभी नहीं सुनी। जो भाजपा नेता और उनके कार्यकर्ता अपनी पार्टी या अपने किसी नेता के ख़िलाफ़ किसी टिप्पणी पर ज़मीन सिर पर उठा लेते हैं, वे आज चुप हैं। जब रमेश बिधूड़ी लोकतंत्र के मंदिर के अंदर अभद्रता कर रहे थे, तो विपक्षी नेता हैरान थे कि नये संसद के पहले ही सत्र में भाजपा सांसदों की गुंडागर्दी का यह हाल है, तो फिर आगे क्या होगा?
सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी और अन्य भाजपा नेता जिस संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं, उसी लोकतंत्र के मंदिर में जब रमेश बिधूड़ी एक चुने हुए सांसद को उग्रवादी कहते हैं। उसके साथ ओए-तोए की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उस सांसद को उसके धर्म के आधार पर अभद्र बोलते हैं और बाहर देख लेने की धमकी देते हैं; तब प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर कुछ क्यों नहीं कहा? जबकि प्रधानमंत्री मोदी इस संसद के उद्घाटन भाषण में सभी सांसदों से अपील कर रहे थे कि सभी सदस्यगण संसद की गरिमा का ख़्याल रखें। इससे पहले भी प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष के तीखे सवाल पूछने और हंगामा करने को लेकर कई बार संसद में बोल चुके हैं और इसे संसद और चुनी हुई सरकार की तौहीन बताकर दुहाई देते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने एक शब्द भी नहीं बोला।
क्या संसद की गरिमा रखने का उत्तरदायित्व केवल विपक्षी सांसदों का ही है? क्या प्रधानमंत्री को विपक्ष के सवालों और हंगामे से ही परहेज़ है? जबकि उनके सांसद हंगामा भी $खूब करते हैं और अब तो अभद्रता की हदें भी उनके सांसद रमेश बिधूड़ी ने पार कर दीं।
इसी संसद में मोदी सरकार से तीखे सवाल पूछने और उसे कई मुद्दों पर घेरने के लिए कई विपक्षी सांसदों को संसद से लोकसभा अध्यक्ष झट से बर्खास्त कर देते हैं। चाहे वो आम आदमी पार्टी के पूर्व सांसद भगवंत मान रहे हों, चाहे वर्तमान में संजय सिंह, राघव चड्ढा, कांग्रेस के राहुल गाँधी, अधीर रंजन चौधरी हों या किसी अन्य राजनीतिक दल के दूसरे सांसद हों। लेकिन अब लोकसभा अध्यक्ष को सबसे अभद्र और भद्दी भाषा इस्तेमाल करने वाले सत्ता पक्ष के सांसद बिधूड़ी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते नहीं बन रहा है। क्या लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला सत्ताधारी दल के दबाव में हैं? या उनकी कोई और वजह है? या लोकसभा अध्यक्ष के पद पर किसी की कृपा से विराजमान हैं? या उन पर सरकार का दबाव है कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ विपक्षी सांसदों के ख़िलाफ़ ही कार्रवाई करेंगे; सत्ता पक्ष के सांसदों पर नहीं?
क्या उन्हें इस बात का भी ख़याल है कि संसद के अंदर इस तरह की भाषा का देश पर क्या असर होगा? क्या वह वाक़ई संविधान की रक्षा कर रहे हैं? और जिस संविधान की मोदी सरकार हमेशा दुहाई देती है, क्या वह उस संविधान की रक्षा कर रही है? सरकार को क्यों सडक़ों पर अपने ऊपर हुए अत्याचारों के ख़िलाफ़ लड़ाई लडऩे वाले किसान और महिला पहलवान देशद्रोही नज़र आते हैं? और क्यों खुलेआम संविधान की प्रतियाँ फाडऩे और जलाने वाले देशभक्त नज़र आते हैं? सवाल यह भी है कि जब सांसदों के साथ भाजपा नेताओं का खुलेआम दुनिया के सामने में ऐसा व्यवहार है, तो देश के उन लोगों के साथ वह कैसा व्यवहार करते होंगे, जिनसे उन्हें चिढ़ है?
आज अचानक सन् 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद लोगों के साथ अभद्रता, अत्याचार और मारपीट की असंख्यों घटनाएँ नज़रों के सामने तैरने लगी हैं। इनमें गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की सैकड़ों घटनाएँ भी हैं। किसानों पर अत्याचारों की सैकड़ों घटनाएँ भी हैं। बेटियों से बलात्कार और उनकी हत्याओं की दर्ज़नों घटनाएँ अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बनी रही हैं। दलितों पर अत्याचार की सैकड़ों घटनाएँ भी इसी प्रकार से अख़बारों में हम आये दिन पढ़ते रहते हैं। हिंसा और गृहयुद्ध जैसे हालातों का तो कहना ही क्या? मणिपुर आज भी सुलग रहा है। इन सब घटनाओं पर भाजपा नेताओं और ख़ासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी से क्या ज़ाहिर होता है? क्या यह है मान लिया जाए कि इस देश में ओहदेदार सांसद भी सुरक्षित नहीं है, तो आम लोगों की सुरक्षा की क्या उम्मीद की जा सकती है?
बहरहाल अभद्र भाषा को लेकर रमेश बिधूड़ी को संसद और देश के साथ-साथ बसपा सांसद से भी माफ़ी माँगनी चाहिए। राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने बिधूड़ी के संबोधन का एक हिस्सा अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर करते हुए लिखा है- ‘कोई शर्म नहीं बची है।’ असदुद्दीन ओवैसी ने भी वीडियो शेयर करते ट्वीट किया- ‘इस वीडियो में चौंकाने वाला कुछ नहीं है। भाजपा एक अथाह खाई है, इसलिए हर दिन एक नया निचला स्तर मिल जाता है। मुझे भरोसा है कि इसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होगी। सम्भावना है कि आगे इसे भाजपा दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाएगा। आज भारत में मुसलमानों के साथ वैसा ही सुलूक हो रहा है, जैसा हिटलर के जर्मनी में यहूदियों के साथ किया जाता था। मेरा सुझाव है कि नरेंद्र मोदी जल्द इस वीडियो को अरबी में डब करें और अपने हबीबियों को भेजें।’ वहीं कांग्रेस नेता राहुल गाँधी इस घटना के बाद बसपा सांसद से मिलने उनके आवास पर पहुँचे। मायावती ने अपने सांसद पर इस तरह की अभद्रता को लेकर एक्स पर लिखा- ‘दिल्ली से भाजपा सांसद द्वारा बीएसपी सांसद दानिश अली के ख़िलाफ़ सदन में आपत्तिजनक टिप्पणी को हालाँकि स्पीकर ने रिकॉर्ड से हटाकर उन्हें चेतावनी भी दी है। किन्तु पार्टी द्वारा उनके (बिधूड़ी के) विरुद्ध अभी तक समुचित कार्रवाई नहीं करना दु:खद / दुर्भाग्यपूर्ण।’ पिछले कुछ सालों से आरोप लग रहे हैं कि बसपा सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भाजपा के साथ ही खड़ी हैं। इतने पर भी भाजपा सांसद द्वारा बसपा सांसद की इस तरह संसद के अंदर तौहीन करने पर आश्चर्य तो होता ही है; लेकिन सबसे ज़्यादा ताज्जुब मायावती की चुप्पी पर होता है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि मायावती भाजपा से डरी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाक़ई मायावती भाजपा के आगे सरेंडर कर चुकी हैं?
हालाँकि ऐसा नहीं है कि रमेश बिधूड़ी ने पहली बार किसी से अभद्रता की है। उनकी बदज़ुबानी के चर्चे पहले भी संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह मशहूर रहे हैं। मसलन एक बार जब एक बच्चे की स्कूल की समस्या लेकर उसके माँ-बाप सांसद बिधूड़ी के पास पहुँचे, तो उन्होंने उनसे कहा कि बच्चे पैदा क्यों किये फिर? बहरहाल संसद में बिधूड़ी की अभद्रता को लेकर बसपा सांसद दानिश अली लोकसभा अध्यक्ष को पत्र में लिखकर रमेश बिधूड़ी के ख़िलाफ़ कार्यवाही की माँग की है। साथ ही यह भी कहा है कि अगर रमेश बिधूड़ी के ख़िलाफ़ कार्यवाही नहीं होती है, तो वह खुद ही सदस्यता छोड़ देंगे। बसपा सांसद ने कहा कि वह लोकसभा में प्रक्रिया और कामकाज के संचालन के नियमों की धाराओं के तहत यह नोटिस देना चाहते हैं और रमेश बिधूड़ी के ख़िलाफ़ लोकसभा अध्यक्ष से कार्यवाही का अनुरोध करते हैं। लेकिन अगर लोकसभा स्पीकर इस गम्भीर मामले पर संज्ञान न लेते हुए कार्रवाई नहीं करेंगे, तो आगामी लोकसभा चुनावों में सत्ताधारी दल को मुस्लिम वोटरों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ सकता है। खैर, भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी द्वारा लोकसभा में दिये गये बयान से आम जनमानस में बहुत-ही ख़राब संदेश गया है, जिससे देश की गरिमा के साथ-साथ लोगों को पीड़ा पहुँची है। सत्ताधारी दल के सांसद की निचले स्तर की अभद्र भाषा दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह घटना लोकतंत्र के मंदिर की सबसे शर्मनाक घटना है। इस तरह की भाषा का इस्तेमाल संसदीय सदस्य के ख़िलाफ़ किया गया है, फिर आम लोगों की सत्ता के नशे में चूर इन लोगों की नज़र में क्या इज़्ज़त होगी?