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कर्ज़ की दलदल में किसान

किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दे रही सरकार, देनी चाहिए फ़सलों पर एमएसपी

योगेश

स्वतंत्रता के 75 साल बाद भी हमारे कृषि प्रधान देश के किसान क़र्ज़ में डूबे हूए हैं। अब केंद्र सरकार 01 अक्टूबर से घर-घर केसीसी अभियान चलाकर देश के डेढ़ करोड़ किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड देगी। बड़े बुजुर्ग कहा करते हैं कि क़र्ज़ में डूबा व्यक्ति अपना क़र्ज़ उतारने के लिए और क़र्ज़ ले लेता है। किसानों पर भी क़र्ज़ बहुत है, जिससे ज़्यादातर किसान क्रेडिट कार्ड लेने से मना नहीं करेंगे। क्रेडिट कार्ड देने की जगह सरकार को फ़सलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदना चाहिए।

इसके अलावा सरकार को सस्ती खाद, सस्ते बीज, सस्ता डीजल और सस्ती कीटनाशक दवाएँ उपलब्ध कराना चाहिए। क्या किसानों को इस राहत से क़र्ज़े में राहत मिलेगी? क्रेडिट कार्ड देने से तो उन पर क़र्ज़ और बढ़ेगा। क़र्ज़ का दबाव बढ़ेगा, तो किसानों की आत्महत्या दर में बढ़ोतरी होगी। सरकार किसानों को क्रेडिट कार्ड देकर किसानों की आय दोगुनी करने की अपनी नाकामी को छुपा रही है। किसान क्रेडिट कार्ड पाकर उसका इस्तेमाल करेंगे और उन पर क़र्ज़ बढ़ेगा। इससे भाजपा को वोट तो मिल सकते हैं; लेकिन किसानों पर क़र्ज़ बढ़ जाएगा।

दरअसल 19 सितम्बर, 2023 को गणेश चतुर्थी के अवसर पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने केसीसी घर-घर अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान के तहत पूरे देश में किसानों के घरों में जाकर सरकारी लोग हर किसान को किसान क्रेडिट कार्ड, जिसे संक्षेप में केसीसी नाम दिया गया है; देंगे। सरकार ने पूरे देश के लगभग डेढ़ करोड़ किसानों को ये क्रेडिट कार्ड देने का मन बनाया है। माना जा रहा है कि पहले भी केसीसी क्रेडिट कार्ड का लाभ प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के लाभार्थी किसानों को मिल चुका है, जिसमें सरकार ने अभी तक दो करोड़ किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दे रखे हैं। अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन डेढ़ करोड़ किसानों को क्रेडिट कार्ड दिये जाएँगे, जो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से नहीं जुड़े हैं। इस बारे में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया था कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत लगभग नौ करोड़ लाभार्थी हैं और केसीसी घर-घर अभियान का उद्देश्य लगभग डेढ़ करोड़ किसानों को जोडऩा है, जो अभी तक केसीसी योजना से नहीं जुड़े हैं।

कृषि मंत्री ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान भी किसानों को लगभग दो करोड़ केसीसी क्रेडिट कार्ड दिये गये थे। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बारे में कहा है कि सरकार ने किसानों को कम समय के लिए आसान क़र्ज़ सुनिश्चित करने और केसीसी अभियान के तहत पर्याप्त धन आवंटित किया है। इस क्रेडिट कार्ड के होने से किसान इसका इस्तेमाल करेंगे, जिससे वे और क़र्ज़ में डूबेंगे। सन् 2022 के आँकड़ों के अनुसार, देश के लगभग 16 करोड़ किसानों पर 21 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ है। इस आधार पर 16 करोड़ किसानों में हर किसान पर औसत 1.35 लाख रुपये का क़र्ज़ है। ये आँकड़े वित्त मंत्रालय की 2022 की एक रिपोर्ट के है। किसानों को क़र्ज़ मुक्त करने और उनको आय दोगुनी करने का वादा करके सरकार में आने वाली पार्टी ने न किसानों का क़र्ज़ माफ़ किया और न उनकी आय दोगुनी कर पायी। बस कुछ किसानों को 500 रुपये महीने के हिसाब से मदद दी है, जिससे किसानों का कुछ $खास भला नहीं हुआ है।

इसके उलट देश की सरकार ने पूँजीपतियों का अरबों रुपये का क़र्ज़ माफ़ कर दिया है। वित्त मंत्रालय के अनुसार कमर्शियल कैटेगिरी के बैंकों के क़र्ज़ में देश के लगभग 10.80 करोड़ किसान लगभग 16.40 लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़े में डूबे हैं। दूसरी तरफ़ को-ऑपरेटिव बैंकों के लगभग दो लाख करोड़ के क़र्ज़ में देश के लगभग 2.67 करोड़ किसान डूबे हैं। इन बैंको से क़र्ज़ लेने वाले सिर्फ़ 28 राज्य के किसान हैं। इस क़र्ज़ को बाँट भी दें, तो देश के हर क़र्ज़दार किसान पर लगभग 75,241 रुपये का क़र्ज़ होता है।

दूसरी तरफ़ आंचलिक बैंकों से सन् 2022 तक देश के 27 राज्यों के लगभग 2.76 करोड़ किसानों पर लगभग 2.58 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ था। इन लगभग 2.76 करोड़ किसानों में हर किसान औसत लगभग 93,657 रुपये का रीजनल बैंकों का क़र्ज़दार है। क़र्ज़ के मामले में अगस्त 2023 में सरकार ने लोकसभा में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट यानी नाबार्ड का आँकड़ा पेश किया। इन आँकड़ों के अनुसार, 21.42 लाख किसानों ने 64,694 करोड़ रुपये का क़र्ज़ कमर्शियल बैंकों से, 50,635 किसानों ने 1,130 करोड़ का क़र्ज़ सहकारी बैंकों से और 2.99 लाख किसानों ने 7,849.46 करोड़ रुपये का क़र्ज़ ग्रामीण बैंकों से लिया हुआ है। राज्यों में सर्वाधिक क़र्ज़ राजस्थान के किसानों पर है। राजस्थान के लगभग 99.97 लाख किसानों पर बैंकों का 1.47 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का क़र्ज़ है। क़र्ज़ लेने में दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश के किसान हैं। उत्तर प्रदेश के लगभग 1.51 करोड़ किसानों ने बैंकों से लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का क़र्ज़ है। तीसरे स्थान पर गुजरात में लगभग 47.51 लाख किसानों ने पर एक लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का क़र्ज़ है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के 77वें दौर के सर्वेक्षण में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि सन् 2019 में देश के लगभग 50 प्रतिशत से अधिक कृषि परिवार क़र्ज़ में डूबे थे और हर कृषि परिवार पर औसत बक़ाया क़र्ज़ लगभग 74,121 रुपये था।

एनएसओ ने 77वें दौर का यह सर्वेक्षण 01 जनवरी, 2019 से 31 दिसंबर, 2019 के बीच 45,000 कृषि परिवारों का किया गया। इसकी रिपोर्ट 10 सितंबर को एनएसओ की और ग्रामीण भारत में परिवारों की स्थिति का परिवारों की भूमि जोत, 2019 के नाम से जारी की गयी। इस निष्कर्ष रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में पेश किये गये सर्वेक्षण की तुलना में क़र्ज़ में डूबे कृषि परिवारों का प्रतिशत 51.9 प्रतिशत से थोड़ा कम हुआ है। वहीं हर कृषि परिवार के औसत क़र्ज़ में 57 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, असम, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, कर्नाटक, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और केरल के किसानों पर भी काफ़ी क़र्ज़ है।

सरकार का दावा है कि किसानों की आय सन् 2014 के बाद 2023 आने तक बढक़र दोगुनी हो गयी है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर ऐसा नहीं है। क्योंकि किसानों की आत्महत्या के मामले कम होने की जगह बढ़े हैं और लगातार बढ़ रहे हैं। अगर किसानों की आय बढ़ी होती, तो वे बड़ी संख्या में आत्महत्या क्यों करते? सन् 2017 में देश में 10,655 किसानों और खेतीहर मज़दूरों ने आत्महत्या की थी।

सन् 2018 में देश में 10,349 किसानों और खेतीहर मज़दूरों ने आत्महत्या की थी। सन् 2019 में देश में 10,281 किसानों और खेतीहर मज़दूरों ने आत्महत्या की थी। सन् 2020 के दौरान देश में 10,677 किसानों और खेतीहर मज़दूरों ने आत्महत्या की थी। सन् 2021 में देश में 10,881 किसानों ने आत्महत्या की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, कृषि क्षेत्र से जुड़े सबसे ज़्यादा 37.3 प्रतिशत किसानों और खेतीहर मज़दूरों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की। महाराष्ट्र में एक ही क्षेत्र में 01 जनवरी, 2023 से 31 अगस्त, 2023 के बीच 685 किसानों ने आत्महत्या की थी। इनमें से 294 किसानों ने जून से अगस्त के बीच आत्महत्या की थी। कर्नाटक में मई और जून, 2023 में 42 किसानों ने आत्महत्या की। देश में किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर सरकार को चिन्ता करनी चाहिए। क्योंकि देश के किसान 48.9 प्रतिशत लोगों को रोज़गार देते हैं। आँकड़ों के अनुसार, कुछ राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में किसी किसान या खेतीहर मज़दूर ने आत्महत्या नहीं की। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा था कि सन् 2017 से सन् 2021 के बीच देश में कुल 28,572 किसानों ने आत्महत्या की है।

वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, सन् 1995 और सन् 2014 के बीच 2,96,438 किसानों और खेतीहर मज़दूरों ने आत्महत्या की थी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार, सन् 2021 में आत्महत्या करने वाले 1,64,033 लोगों में से निजी क्षेत्र के 11,431 लोग थे और 1,898 सरकारी कर्मचारी थे। वहीं स्वरोज़गार से जुड़े 20,231 लोग थे। इस आधार पर देखें, तो कह सकते हैं कि आत्महत्या करने वाले किसान और मज़दूर 1,30,473 लोग रहे होंगे।

रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में आत्महत्या करने वालों में से 1,05,242 लोगों की वार्षिक औसत आय एक लाख रुपये से कम थी। वहीं 51,812 लोगों की औसत आय एक लाख रुपये से पाँच लाख रुपये तक वार्षिक थी। एक लाख रुपये से कम आय वाले ज़्यादातर किसान और मज़दूर थे। अब क्रेडिट कार्ड के देने से किसानों पर क़र्ज़ और बढ़ेगा, जिससे आत्महत्या के मामले भी देश में बढ़ेंगे। इससे किसानों की दशा सुधरने की जगह और बिगड़ जाएगी। इसलिए सरकार को किसानों को तेलंगाना सरकार की तरह क़र्ज़े से मुक्ति देनी चाहिए और उन्हें क्रेडिट कार्ड न देकर उनकी फ़सलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदना चाहिए।

झारखण्ड के राजनीतिक संकेत

देश में नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण लागू करने के लिए आने वाले वर्षों में देश की जनगणना और परिसीमन का काम होगा। ज़ाहिर है झारखण्ड में भी जनगणना के साथ परिसीमन होगा। लेकिन परिसीमन से झारखण्ड की राजनीतिक जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) बदल जाएगी। झारखण्ड के तमाम दलों और नेताओं के राजनीतिक भविष्य की दिशा भी इन्हीं बदलावों से तय होगी।

झारखण्ड में विधानसभा की सीटों को बढ़ाने की माँग लम्बे समय से लंबित है। लेकिन झारखण्ड में परिसीमन और विधानसभा सीटों को बढ़ाना आसान नहीं है। परिसीमन आयोग को पहले राज्य से विरोध का सामना करना पड़ चुका है। उधर राज्य की तमाम कोशिशों के बावजूद 23 साल में झारखण्ड विधानसभा की सीटें नहीं बढ़ीं। राज्य से विधानसभा में सीटों को बढ़ाने और विधान परिषद् के गठन की पूर्व की माँग एक बार फिर उठेगी।

कबसे नहीं हुआ परिसीमन?

झारखण्ड देश में ऐसा अकेला राज्य है, जहाँ सन् 1972 के बाद लोकसभा और राज्य की विधानसभा के चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन नहीं हुआ है। 2002 में गठित परिसीमन आयोग के बाद 2007 में देश भर में झारखण्ड को छोडक़र शेष सभी राज्यों में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन का काम पूरा हो चुका है। झारखण्ड में जब परिसीमन आयोग की टीम का दौरा हुआ, तो जनजातीय समुदाय के नेताओं ने इसका विरोध कर दिया। इस कारण बिरसा मुंडा हवाई अड्डे से ही आयोग की टीम लौट गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि केंद्र की तत्कालीन सरकार ने झारखण्ड में परिसीमन कार्य को रोक दिया। यह मामला झारखण्ड हाईकोर्ट में भी पहुँचा। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से इसका कारण पूछा था। यह भी कहा कि विरोध के कारण क़ानून लागू कराने से नहीं रोका जा सकता है। इसके बावजूद फलाफल कुछ नहीं निकला।

वर्तमान में सीटों का गणित

15 नवंबर, 2000 में 81 विधानसभा और 14 लोकसभा की सीटों के साथ झारखण्ड का गठन हुआ। इनमें से अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं। जबकि अनुसूचित जाति (एससी) के लिए नौ सीटें आरक्षित हैं। इसी तरह लोकसभा की 14 सीटों में पाँच सीटें एसटी और एक सीट एससी के लिए आरक्षित है।

दरअसल परिसीमन के बाद राज्य में ब$गैर सीट बढ़े डेमोग्राफी बदल रही थी। झारखण्ड की तत्काल जिस समुदाय की जितनी आबादी थी, उसके अनुपात में एससी की सीटें बढ़ रही थीं, तो एसटी की कम हो रही थीं। परिसीमन आयोग के प्रस्ताव के अनुसार, एसटी के लिए आरिक्षत 28 सीटों में छ: सीटें घटकर 22 और एससी के लिए दो सीटें बढक़र नौ की जगह 11 हो जातीं। इसी तरह लोकसभा में भी एसटी के लिए आरक्षित पाँच में से एक सीट घट जाती और एससी के लिए एक आरक्षित सीट बढ़ रही थी। नतीजतन इसका विरोध हुआ और परिसीमन का काम झारखण्ड में नहीं हो सका।

परिसीमन से बढ़ेंगे क्षेत्र

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर परिसीमन होता है, तो झारखण्ड में परिसीमन के बाद कई लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में कई बड़े बदलाव होंगे। कई नये क्षेत्र जुड़ेगे और कई पुराने क्षेत्र कट जाएँगे। जानकारों का कहना है कि 2024 के लोकसभा या विधानसभा चुनाव में भले ही इसका असर न हो; लेकिन इसके बाद ज़रू पड़ेगा। लिहाज़ा राजनीतिक दलों और राजनेताओं को अपने-अपने क्षेत्र के लिए इसी के मुताबिक सियासी गोटियाँ सेट करनी होंगी।

सीटें बढ़वाने का मौक़ा

झारखण्ड में सभी राजनीतिक दल विधानसभा की सीटों को बढ़ाने की लम्बे समय से माँग कर रहे हैं। विधानसभा की सीटें बढ़ाने के लिए वर्ष 2002, 2004, 2005, 2007 और वर्ष 2009 में प्रस्ताव सदन द्वारा केंद्र को भेजा गया। यहाँ तक कि 15 जून 2005 में इसके लिए विधानसभा की एक कमेटी बनायी गयी। तत्कालीन भाजपा विधायक कडिय़ा मुंडा इस कमेटी के संयोजक थे। 4 जुलाई 2005 को कमेटी ने रिपोर्ट सौंपी। इसमें विधानसभा की सीटें 81 से बढ़ाकर 150 करने का प्रस्ताव दिया गया।

झारखण्ड विधानसभा सदन से इस रिपोर्ट को पारित कर प्रस्ताव केंद्र को भेज दिया गया। केंद्र द्वारा इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। झारखण्ड के सांसदों ने भी लोकसभा में इस मुद्दे को कई बार उठाया। कोडरमा के तत्कालीन सांसद रवींद्र कुमार राय ने 2018 में लोकसभा में झारखण्ड विधानसभा की सीटों की संख्या 81 से बढ़ाकर 150 करने की माँग की थी। जमशेदपुर के सांसद विद्युत वरण महतो, पलामू सांसद वीडी राम और तत्कालीन रांची सांसद रामटहल चौधरी ने भी इसका समर्थन किया था। इसके अलावा राज्य से विधान परिषद् के गठन की माँग भी होती रही है। जानकारों का कहना है कि इस बार राज्य के पास सीटों को बढ़ाने का अच्छा मौक़ा है।

विधि विशेषज्ञों और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि परिसीमन और सीटों की बढ़ोतरी दोनों में रोक है। दरअसल वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने संविधान में 84वाँ संशोधन करके साल 2026 से पहले तक सीटों की बढ़ोतरी पर रोक लगा दी थी। इसी तरह परिसीमन के लिए होने वाली जनगणना को मानने के लिए भी संविधान में संशोधन करना होगा। यानी पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा। साथ ही लोकसभा या विधानसभा की सीटों को बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन लाना होगा। झारखण्ड या किसी अन्य राज्य के मामले में भी अगर केंद्र सरकार अलग से निर्णय लेने की सोचती है, तो भी संविधान में संशोधन कर संसद से पारित करना होगा।

आबादी बढ़ी, संशोधन ज़रूरी

बिहार से बँटवारे के समय झारखण्ड की आबादी 1.67 करोड़ थी। इसी के आधार पर विधानसभा की सीटों का भी बँटवारा हुआ था। बिहार विधानसभा की कुल सीटें 324 थीं और इसकी एक-तिहाई सीटें झारखण्ड के हिस्से आयीं। वर्ष 2000 से लेकर 2023 तक झारखण्ड की आबादी बढक़र 3.50 करोड़ से ज़्यादा हो चुकी है। उधर विभिन्न रिपोट्र्स में राज्य में एसटी की आबादी घटने और एससी की आबादी बढऩे की बात सामने आ रही है। यानी बीते 23 वर्ष में राज्य की मौज़ूदा जनसांख्यिकी पहले ही बदल चुकी है। लिहाज़ा राज्य में आबादी के अनुसार परिसीमन और आरक्षण में संशोधन ज़रूरी है।

एकमत होकर उठाना होगा क़दम

देश में सामान्य परिस्थिति में लोकसभा का चुनाव अगले वर्ष अप्रैल-मई में और झारखण्ड में विधानसभा का चुनाव नवंबर-दिसंबर में होना है। इससे पहले जनगणना और परिसीमन क़तई सम्भव नहीं है। लिहाज़ा ये दोनों चीज़ें चुनाव के बाद होंगी। इसलिए आगामी चुनाव में ख़ास अंतर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को अभी से इस दिशा में क़दम उठाने की ज़रूरत है। केंद्र सरकार की जो मंशा दिख रही, उसमें चुनाव के तत्काल बाद जनगणना और परिसीमन पर काम शुरू होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि झारखण्ड में परिसीमन से विधानसभा सीटों का भौगोलिक क्षेत्र बदलना तय है।

अगर विधानसभा की सीटें नहीं बढेंगी, तो भी कई नये क्षेत्र जुड़ेंगे और कटेंगे। साथ ही आरक्षित सीटें भी बदलेंगी। ऐसे में राजनीतिक दलों और राजनेताओं के सामने वही पुरानी स्थिति रहेगी। इसलिए परिसीमन के विरोध की जगह विधानसभा की सीटों को बढ़ाने के लिए अभी से सभी को मिलकर पूरा प्रयास करना होगा। सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को एकमत होकर एक मंच पर आना होगा। अगर सीटों के बढ़ोतरी का मामला इस बार अटक गया, तो फिर झारखण्ड के नेताओं के पास हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। नये विधानसभा में पहले से 160 सदस्यों के लिए बनायी गयी सीटें ऐसे ही ख़ाली पड़ी रह जाएँगी। विधान परिषद् के गठन का सपना तो अधूरा रह ही जाएगा।

जनवरी में खुलेंगे राम मंदिर के कपाट

अयोध्या में प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में होगी रामलला की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा

अयोध्या में बन रहे भगवान राम के मंदिर का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। मंदिर निर्माण समिति ने इसकी कुछ तस्वीरें एवं वीडियो झलकियां भी सार्वजनिक की हैं। 22 जनवरी को मंदिर में स्थापित मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूजापाठ में भागीदारी करेंगे। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं कई केंद्रीय मंत्रियों समेत उत्तर प्रदेश के मंत्री इस पूजापाठ में उपस्थित रहेंगे।

मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने बताते हैं कि तीन तल्ला भव्य राम मंदिर के भूतल का निर्माण इस वर्ष दिसंबर मे पूरा हो जाएगा। कहा जा रहा है कि राम मंदिर निर्माण का कार्य अति शीघ्रता से हो रहा है। अयोध्या में बन रहा ये राम मंदिर विश्व के भव्य आधुनिक मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में अत्याधुनिक उपकरण लगाये जा रहे हैं। भगवान राम की समुचित जीवन लीलाओं को इस मंदिर में दर्शाया जाएगा, जिसमें उनके अवरण दिवस से लेकर वनवास एवं अयोध्या लौटने तक की स्मृतियाँ जीवंत होंगी।

10 दिन चलेगा अनुष्ठान

राम मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दासजी महाराज बताते हैं कि भगवान राम के भव्य मंदिर में पूजा अनुष्ठान मकर संक्रांति अर्थात् 14 जनवरी के बाद से आरम्भ हो जाएगा। इस आधार पर 15 जनवरी से 24 जनवरी तक पूरे 10 दिनों तक चलेगा। 22 जनवरी को भगवान राम की प्रतिमा के अतिरिक्त अन्य प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा होगी।

मंदिर प्रबंधन की ओर से प्रधानमंत्री कार्यालय को इस विधान के लिए पत्र भेजा गया था, जिसका उत्तर आ गया है। इसी पत्राचार में यह तय हुआ है कि मंदिर में पूजा अनुष्ठान का कार्यक्रम 15 से 24 जनवरी, 2024 तक होगा एवं 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। अभी राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभिषेक समारोह के लिए आमंत्रित करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में रामलला की प्रतिमा भी मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की जाएगी।

मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा बताते हैं कि इन दिनों एक उपकरण बन रहा है जिसे मंदिर के शिखर पर स्थापित किया जाना है। इस उपकरण के माध्यम से हर वर्ष राम नवमी के दिन गर्भगृह में क्षण भर के लिए भगवान के माथे पर सूर्य की किरणें पड़ा करेंगी। इस उपकरण को बेंगलूरु में वैज्ञानिकों के एक दल के दिशा-निर्देशन में निर्मित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुडक़ी एवं पुणे के एक भवन निर्माण संस्थान के एक संयुक्त दल द्वारा एक कम्प्यूटरीकृत कार्यक्रम बनाया गया है जो मंदिर की भव्यता में चार चांद लगा देगा।

किस तिथि को खुलेंगे कपाट?

मंदिर निर्माण समिति ने तीन माह पहले ही 24 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोलने की बात कही थी। अब तय हो चुका है कि अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर के कपाट 24 से 25 जनवरी तक आम श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएँगे। इससे पूर्व होने वाले पूजा अनुष्ठान नियोजित समारोह के लिए मंदिर निर्माण समिति के महासचिव चंपत राय के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया है।

मंदिर निर्माण समिति की ओर से कहा गया है कि पूजा अनुष्ठान के समय लोगों का अयोध्या नगरी में भारी संख्या में आना तय है, जिसे सँभालने के लिए पुलिस प्रशासन के अतिरिक्त अर्धसैन्य बलों के जवान भी तैनात किये जाने की सम्भावना है। इसके अतिरिक्त श्रद्धालुओं की अत्यधिक संख्या मंदिर एवं पूजा अनुष्ठान से दूर करने के लिए अयोध्या में जगह-जगह बड़े पर्दे के टीवी लगाये जाने की सम्भावना है। इसके अतिरिक्त इस पूजा अनुष्ठान का सीधा प्रसारण टेलीविजन पर किया जाएगा। मंदिर प्रबंधन समिति ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे 10 दिनों का पूजा अनुष्ठान अपने घरों में रहकर ही देखें। जब मंदिर के कपाट सभी के लिए खोल दिये जाएँ तब श्रद्धालु मंदिर में आएँ।

मंदिर प्रबंधन समिति के एक पुजारी ने बताया कि पूजा अनुष्ठान का समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गणतंत्र दिवस के अनुरूप तय किया गया है। 26 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल क़िले की प्राचीर पर तिरंगा फहराकर देश की जनता को संबोधित करेंगे। इसके पूर्व ही मंदिर में पूजा अनुष्ठान एवं प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा का कार्य पूरा किया जाएगा। मंदिर प्रबंधन समिति की ओर से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पूजा अनुष्ठान में 10,000 लोगों की आरंभिक सूची तैयार की गयी है। इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, कई केंद्रीय मंत्री, उत्तर प्रदेश के मंत्री, कुछ बड़े नेता, प्रतिष्ठित लोग एवं साधु-संतों के अतिरिक्त राम मंदिर आन्दोलन से जुड़े लोगों के नाम हैं।

मंदिर के कपाट खुलने पर अयोध्या में अत्यधिक श्रद्धालुओं के आने की सम्भावना है। इसे ध्यान में रखते हुए मंदिर प्रबंधन समिति ने तय किया है कि रामलला के दर्शन के लिए प्रत्येक श्रद्धालु को 15 से 20 सेकेंड का समय दिया जाएगा। मंदिर के अन्य स्थलों एवं परिसर में स्थिति प्रदर्शनी को श्रद्धालु अधिक समय देख सकेंगे। इसके अतिरिक्त श्रद्धालुओं को मंदिर परिसर में स्वच्छता का ध्यान रखना होगा। अपने बटुए, मोबाइल फोन एवं अन्य सामान की सुरक्षा करना भी श्रद्धालुओं का उत्तरदायित्व होगा। वैसे तो मंदिर में एवं परिसर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस एवं अर्ध सैन्य बलों के जवानों के अतिरिक्त सीसीटीवी कैमरों की पैनी दृष्टि होगी मगर श्रद्धालुओं को अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए सचेत रहने का सुझाव दिया गया है। 

श्रद्धालुओं की आस

बीते वर्ष से उड़ती-उड़ती यह बात लोगों के मुँह से सुनी जा रही है कि जब अयोध्या में राम मंदिर बन जाएगा, तो पूरे देश से श्रद्धालुओं को मंदिर तक लाने के लिए नि:शुल्क बस सेवा आरम्भ हो सकती है। हालाँकि यह सूचना पूर्णतया पुष्ट नहीं है। मगर यदि ऐसा हुआ, तो इन बसों का प्रबंध उत्तर प्रदेश सरकार कर सकती है। भाजपा शासन वाली अन्य राज्यों की सरकारें भी बसों का प्रबंध कर सकती हैं।

भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता मंदिर निर्माण पूरा होने एवं शीघ्र ही मंदिर के कपाट खुलने को लेकर अत्यधिक प्रसन्न हैं। भारतीय जनता पार्टी की सदस्या आरती कहती हैं कि राम मंदिर का निर्माण पूरे देश के लिए गर्व की बात है। हमारी संस्कृति एवं धरोहरों को पुनर्जीवित करने का जो कार्य भारतीय जनता पार्टी ने किया है, उसका सबसे अधिक श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जाता है। भारतीय जनता पार्टी एवं हिन्दू संगठनों ने जब राम मंदिर निर्माण के लिए एकजुट होकर अयोध्या को कूच किया था, तब न जाने कितने ही श्रद्धालु एक ईष्र्यालु सरकार के द्वारा पुलिस से मरवा दिये गये। मगर कहते हैं कि बलिदान व्यर्थ नहीं जाता। आज मंदिर के लिए बलिदान देने वाले उन श्रद्धालुओं का त्याग व्यर्थ नहीं गया।

भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता देवेंद्र कहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण देश की उस संस्कृति का प्रतीक है, जो भारत को विश्वगुरु बनाती है। पूरे विश्व में भगवान राम की उपासना करने वाले हैं; मगर भगवान के जीवन दर्शन से कम ही श्रद्धालु परिचित हैं। अतएव राम जन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण होना हमारी सनातन संस्कृति को पुनर्जीवित करने जैसा पुण्य का कार्य है, जिसके लिए देश के प्रत्येक श्रद्धालु ने दान दिया है।

कब सुलझा विवाद?

वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या का विवाद सदैव के लिए समाप्त कर दिया। न्यायालय की ओर से फ़ैसले में कहा गया कि अयोध्या राम जन्म भूमि पर मंदिर समिति का ही आधिपत्य रहेगा; मगर सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के लिए राम मंदिर प्रबंधन पाँच एकड़ भूमि का मस्जिद निर्माण के लिए देगा। केंद्र सरकार को इस व्यवस्था को लागू करने, मंदिर प्रबंधन समिति बनाने का आदेश भी सर्वोच्च न्यायालय ने दिया। 

वर्तमान स्थिति

इधर, उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बन रहे रामलला के भव्य मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को भव्य बनाने की तैयारी शुरू हो गयी है। मंदिर की भव्यता के अनुरूप इसमें समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किये जाने की तैयारी की गयी है। मंदिर ट्रस्ट की बैठक के दौरान प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम तक मंदिर के साथ-साथ अन्य आवश्यक निर्माण कार्यों को भी पूरा कराये जाने की तैयारी की गयी है। तय किया गया है कि कार्यक्रम में आने वाले सभी अतिथियों को प्राण प्रतिष्ठा का प्रसाद दिया जाएगा।

राम मंदिर निर्माण समिति की ओर से दावा किया गया है कि साल के अन्त तक प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर आवश्यक निर्माण कार्यों को पूरा करा लिया जाएगा। राम मंदिर निर्माण समिति की दो दिवसीय बैठक में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम तक के लिए आवश्यक निर्माण समय से पूरा करने पर बल दिया गया। साथ ही यह बताया गया कि गर्भ गृह में जहाँ भगवान राम लला की प्राण प्रतिष्ठा होनी है, उसके फ़र्श से छत तक का निर्माण कार्य पूरा हो गया है।

मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बताया कि दूसरे दिन की बैठक में अयोध्या के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष ने बैठक की। इसमें प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम की तैयारी और व्यवस्था को लेकर गहन चर्चा की गयी। चंपत राय ने कहा कि जैसे-जैसे प्राण प्रतिष्ठा का समय निकट आ रहा है। इसके कार्यक्रम और व्यवस्था को लेकर नियमित बैठकें की जा रही हैं। सभी तैयारियों की पड़ताल तीव्र हो गयी है। मंदिर के सभी तलों का कार्य शीघ्र पूरा होगा।

02 अक्टूबर पर विशेष: गाँधी आज कितने प्रासंगिक?

आज देश में जब ‘इंडिया’ और ‘भारत’ शब्दों के बीच एक रेखा खींचने की कोशिश की जा रही है, और साम्प्रदायिक उन्मादी विचारों को हवा देकर हिन्दू राष्ट्र बनाने का शिगूफ़ा छोड़ा जा रहा है, ऐसे में आज महात्मा गाँधी के आन्दोलनों और विचारों पर मंथन करना काफ़ी प्रासंगिक हो जाता है।

आज देश में मुसलमान, ईसाई, दलित, आदिवासी समेत कई वर्ग हिन्दू राष्ट्र के नाम पर प्रताडऩा के शिकार हो रहे हैं। खालिस्तान के नाम पर सिखों को भी प्रताडऩा और बदनामी का शिकार होना पड़ रहा है। हाल ही की मणिपुर की घटना हो, या हरियाणा की नूंह की घटना- इसमें सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाये गये। दंगा और हिंसा को रोकने में केंद्र सरकार के साथ-साथ वहाँ की राज्य सरकारों को भी कटघरे में खड़ा किया गया। कई बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक जनप्रतिनिधियों द्वारा देश को साम्प्रदायिक तनाव में झोंकने का आरोप भी सरकार पर लगाया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर गाँधी की समझ का देश होता, तो भारत में हालात होते? क्या इस तरह के साम्प्रदायिक तनाव के हालात बनते?

ऑल इंडिया पीस मिशन के संस्थापक एवं अल्पसंख्यक नेता दया सिंह कहते हैं- ‘गाँधी के कारण ही सिख और मुसलमान भारत का हिस्सा बनना पसन्द किये। आज़ादी मिली; परन्तु देश के विभाजन ने काफ़ी दर्द दिये। हिन्दू-मुसलमान के नाम पर अनेक क़त्लेआम किये गये। लेकिन गाँधी के आश्वासन पर सिखों और मुसलमानों को भरोसा था, इसलिए विभाजन का दर्द भुलाकर भी सिख और मुस्लिम भारत का हिस्सा बन गये। लेकिन आज़ादी छ: महीने में ही गाँधी की हत्या कर सिखों और मुसलमानों के उम्मीदों पर पानी फेर दिया गया।’

दया सिंह आगे कहते हैं- ‘विगत 40 वर्षों से सिख और मुस्लिम को राजनीतिक व्यवस्था से अलग-थलग कर दिया गया है। इसीलिए वह आज उसका दंश झेल रहा हैं, चाहे वह ब्लू स्टार ऑपरेशन हो, या बाबरी मस्जिद के विध्वंस का मामला हो; या 2002 के गुजरात दंगे, जिसमें अनेक मुस्लिमों के क़त्ल को अंजाम दिया गया। इस गहरे ज़ख़्म को सन् 2014 के बाद से और गहरा किया गया और अहिंसावादी गाँधी के विचारों को सिर्फ़ स्वच्छता दिवस तक सीमित कर दिया गया।’

दया सिंह कहते हैं- ‘गाँधी ही ऐसे व्यक्ति थे, जिनके मानस में सबको साथ लेकर चलने का अहसास था और उन्हें यह भी पता था कि अंग्रेजों ने हुकूमत या तो मुस्लिम शासकों से अथवा सिखों से राजसत्ता को हथियाया, जिसके कारण अंग्रेज हुकूमत ने सिख और मुस्लिमों को ही निशाने पर लिया। सिख और मुस्लिम देश के बँटवारे के पक्ष में कभी नहीं थे। बल्कि हिन्दू संगठन भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर तुले थे, जिसके कारण षड्यंत्रकारियों ने 7 मार्च से 13 मार्च, 1947 के बीच आपसी विवाद में मारकाट करवाकर आनन-फ़ानन में विभाजन पर मोहर लगवा दी। हालाँकि ब्रिटिश हुकूमत चाहती थी कि सिख राज बनाया जाए, जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच बफर राज्य होगा। परन्तु गाँधी के आश्वासन ने सिख और मुस्लिम को हिन्दुस्तान में ही समाहित होने के लिए प्रेरित किया। गाँधी की हत्या से सबसे बड़ा यदि किसी को नुक़सान हुआ, तो वह सिख और मुस्लिमों को हुआ; जबकि हिन्दुओं पर कोई नियंत्रण नहीं रहा और वे पूरे मुस्लिम समाज को पाकिस्तान धकेलने में लगे थे। भारत के विगत 70 वर्षों का इतिहास तो यही बताता है कि सिख को खालिस्तानी, अतिवादी आदि और मुस्लिम को आतंकवादी और पकिस्तानी बता उनको निर्णयकारी राजनीतिक प्रक्रिया से ही बाहर कर दिया गया है।’

दया सिंह सवाल करते हैं- ‘गाँधी को क्यों मारा गया? क्योंकि गाँधी ने यह आश्वासन दिया था कि आज़ाद भारत में सबके हक़-हुक़ूक़ सुरक्षित और बराबर होंगे। चाहे वह मुस्लिम हो या हिन्दू। विगत नौ वर्षों से एक तबक़ा गाँधी के विचारों को ही स्वाहा करने पर तुला है। जबकि बँटवारे के समय गाँधी और जिन्ना के बीच जो बातचीत हुई, उसका लब्बोलुआब यह था कि चाहे दो देश होंगे; परन्तु दोनों सेकुलर होंगे। जो जहाँ है, वहीं रहे। लेकिन जो देश हिन्दू बाहुल्य है, वहाँ मुस्लिम की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए और जो मुस्लिम बाहुल्य है, वहाँ हिन्दू की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। दोनों देश आपसी संवाद स्थापित रखेगा। जिन्ना ने 11 अगस्त, 1947 में ही अपने सम्बोधन में साफ़ कहा था कि चाहे पाकिस्तान इस्लामिक देश होगा; परन्तु यह सेकुलर होगा और राज्य का कोई धर्म नहीं होगा। यह बात गाँधी और जिन्ना के बीच आपसी समझ का ही परिणाम था।’

दया कहते हैं- ‘आज जब मैं वर्तमान दशा और दिशा का आंकलन करता हूँ, तो देखता हूँ कि गाँधी और जिन्ना की मौत ने आपसी सम्बन्धों को विवादों में बदल दिया और कश्मीर उसका केंद्र बिन्दु बन गया। उस समय दोनों देशों के रुपये की क़ीमत डॉलर के बराबर थी, परन्तु अब दोनों देशों का रुपया काफ़ी कमज़ोर हो चुका है; क्योंकि दोनों देश शस्त्रों की दौड़ में हैं। अमेरिका ने पाकिस्तान को उभरने नहीं दिया और भारत को भी काफ़ी फ़ौज पाकिस्तान सीमा पर लगानी पड़ी। अमेरिका ने दोनों देशों का दोहन करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। अमेरिका का चिन्तन रहता हैं, जिन देशों में नायकवाद हो, उन्हीं से डील की जाए। नतीजा ईराक, अफ़ग़ानिस्तान और अब यूक्रेन के हालात तो यहीं दर्शाते हैं। हो सकता हैं जैसे पाकिस्तान का इस्तेमाल हुआ, कहीं चीन के ख़िलाफ़ भारत को भी इसी तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।’

वहीं प्रसिद्ध गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं- ‘यदि आज गाँधी होते, तो लोगों की राय को इज़्ज़त देते हुए हिंसा को बन्द करवाकर शान्तिपूर्वक हर समस्या का हल करवाते। गाँधी के हत्या के बाद से चीज़ें काफ़ी बिगड़ गयीं। हालाँकि नेहरू ने उन्हें काफ़ी हद तक ठीक करने की कोशिश की। लेकिन फिर भी आज देश में साम्प्रदायिक तनाव का माहौल है।’

हिमांशु कहते हैं- ‘गाँधी जी का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कथन है, वो 18 जनवरी, 2048 का है। अपनी मौत से क़रीब 12 दिन पहले प्रार्थना सभा दिल्ली में उन्होंने कहा था कि मुझे पता चला है कि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को 25,000 पोस्ट कार्ड मिले हैं, जिसमें गौहत्या बन्दी का क़ानून बनाने का माँग की गयी है और कानपुर में किसी संन्यासी ने आमरण अनशन शुरू किया है। तो मेरा भारत सरकार को सुझाव है कि इन सबसे किसी प्रकार के दबाव में न आये। अगर हिन्दू गाय को माता मानते हैं, तो वे न खाएँ। लेकिन वे मुसलमानों के ऊपर कैसे दबाव डाल सकते हैं कि वे भी उसको माता मानें? हम छत पर चढक़र यह चिल्लाते रहे हैं कि स्वतंत्र भारत में सभी धर्मों को बराबर आज़ादी होगी। अगर पाकिस्तान में मुसलमान यह कहें कि हम मूर्ति पूजा को हराम मानते हैं, इसलिए हिन्दुओं को हम मूर्तिपूजा नहीं करने देंगे, तो हमें कैसा लगेगा? इसी तरह हम अपनी आस्था दूसरों पर कैसे लाद सकते हैं? उन्होंने हिन्द स्वराज में सन् 1909 में लिखा है कि यदि कोई मुस्लिम गाय काट रहा है, तो मैं उसका पाँव पकडक़र कह सकता हूँ कि ऐसा मत करो; लेकिन उसके साथ झगड़ा नहीं करूँगा। क्योंकि मुझे गाय से ज़्यादा अपना भाई पसन्द है।’

वहीं प्यारेलाल द्वारा लिखी पूर्णाहुति नामक पुस्तक में भी गाँधी का कथन है- ‘भारत सभी धर्मों का होगा। अगर कोई मुझसे कहे कि इसमें सिर्फ़ हिन्दू ही रह सकते हैं; मुसलमान नहीं रह सकते, तो मुझे ऐसा भारत नहीं चाहिए।’

हिमांशु कुमार आगे कहते हैं- ‘नोआखली में गाँधी जी गये थे बँटवारा के समय। जो बाद में बंग्लादेश बन गया था, जिसे उस समय पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था; तो वहाँ भी गाँधी जी ने पैदल यात्रा की। और शान्ति स्थापना की थी; कोलकाता में भी की थी। बिहार में की थी। फिर दिल्ली में की थी। गाँधी जी की आख़िरी घोषणा यह थी कि मैं पाकिस्तान से आये हिन्दुओं का जत्था लेकर पैदल पाकिस्तान जाऊँगा और उन्हें उनके घरों में वापस बसाऊँगा। और जो मुसलमान भारत छोडक़र पाकिस्तान चले गये हैं, उनको भी वापस लेकर आऊँगा। क्योंकि बँटवारे में आबादी का बँटवारा और इस तरह से एक-दूसरे को डराकर उनके घरों से भगाना यह बहुत शर्मनाक है।’

हिमांशु कहते हैं- ‘बँटवारे में यह सब तय नहीं हुआ था, तो गाँधी की जो ये आख़िरी घोषणा थी, इससे पाकिस्तान का बँटवारा चाहने वाले $खासतौर से ब्रिटेन वग़ैरह पश्चिमी ताक़तें घबरा गयी थीं। क्योंकि वे चाहती थीं कि उनका साउथ एशिया में एक फ़ौजी अड्डा हो; जिसके लिए पाकिस्तान बनाया गया था। तो उनको लगा कि यह गाँधी भारत पाकिस्तान बँटवारे के मुद्दे को बेमतलब कर देगा। अगर हिन्दू और मुसलमान इधर-से-उधर नहीं जाएँगे, तो दोनों देश बाद में एक हो सकते हैं। माऊंटबेटन के सेक्रेटरी नरेंद्र सिंह सरीला ने अपने किताब में यह बातें लिखी हैं कि ब्रिटिश इंटेलिजेंस का एक पैड एजेंट था- नाना आपटे। नाना आपटे, गोडसे और सावरकर वग़ैरह ने अंग्रेजों के कहने से गाँधी की हत्या करवा दी। क्योंकि उन्हें डर था कि गाँधी भारत पाकिस्तान के बँटवारे के मुद्दे को बेकार कर देगा।’ 

इसी साल फरवरी महीने में जननेता कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिन्दू राष्ट्र के सवाल पर तीखा हमला बोलते हुए कहा था- ‘भारत गाँधी का देश है। जो लोग हिन्दू राष्ट्र का सपना देख रहे हैं, वे देश को तबाह करना चाहते हैं। लेकिन हम उन्हें कभी भी कामयाब नहीं होने देंगे। क्योंकि हम गाँधी के बताये रास्ते पर चलते हैं।’ अब आगामी लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ही यह तय होगा कि आज के भारत में मुसलमानों, सिखों, दलितों, आदिवासियों समेत तमाम वंचित और अल्पसंख्यक वर्गों की क्या स्थिति होगी? भारत और इंडिया शब्द में किसको महत्ता मिलेगी? और भारत हिन्दू राष्ट्र बनेगा या भारतीय संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक रूप से चलेगा?

होत न आज्ञा बिन पैसा रे!

अबदुनिया के हर धर्म में धार्मिकता खुलेआम बिक रही है। जो नहीं ख़रीद सकते, उन्हें धर्मों के तथाकथित ठेकेदार धार्मिक अड्डों और अनुष्ठानों से दूर रखते हैं। उनका सम्मान नहीं करते। उनको हेय दृष्टि से देखते हैं। उन्हें धर्म से अवगत तक नहीं कराना चाहते। उन पर अपना प्रभावहीन आशीर्वाद नहीं देते। अगर कोई धार्मिक कार्यों में उनके आगे आ भी जाए, तो उसे सबसे अन्तिम पंक्ति में खड़े होने का भी अधिकार बमुश्किल मिलता है। धर्म के तथाकथित ठेकेदारों की इन्हीं हरकतों के चलते कट्टरपंथी और धार्मिकता की अग्रिम पंक्ति में खड़े लोग भी धनहीनों से घृणा करते हैं।

ये वही लोग हैं, जो धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के सबसे अधिक प्रिय और पूज्यनीय हैं। इन लोगों में पूँजीपति, जातिगत आधार पर तथाकथित स्वयंभू, राजनीतिक पहुँच रखने वाले और बड़े पदों पर बैठे हुए लोग हैं। धर्मों के ठेकेदार इनके चरणों में बिछ जाते हैं। धन के लालच में इनकी उलटी चरण वंदना करते हैं। धार्मिकता का यही ढोंग लोगों को वास्तविक धर्म पालन से दूर कर रहा है और हर धर्म में ज़्यादातर लोग रूढ़ीवाद, पाखण्डवाद, दिखावा आदि के शिकार हो रहे हैं। पूँजीपति, जातिगत आधार पर तथाकथित स्वयंभू, राजनीतिक पहुँच रखने वाले और बड़े पदों पर बैठे हुए लोग अपनी-अपनी हैसियत से क़ब्ज़ाये हुए हक़ों और संसाधनों की तरह ही धर्म और ईश्वर को भी अपनी बपौती समझ रहे हैं। यह सब धर्मों के तथाकथित ठेकेदारों द्वारा इन लोगों की चरण वंदना के चलते हो रहा है।

हाल यह है कि आज हर धर्म की नींव धन की धरती पर दानदाता रूपी खम्भों के सहारे खड़ी हो चुकी है। इन दानदाताओं के आवश्यकता से अधिक दान करने के चलते धर्मों के तथाकथित ठेकेदारों ने अमीरों और ग़रीबों के बीच भेदभाव की एक खाई खोद रखी हैं। इसी के चलते ग़रीब वर्ग अपने-अपने धर्म से कट चुका है। इस वर्ग के लिए अपने धर्म की चंद परम्पराओं को मनाने के अलावा धर्म का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। बहुत प्रताडि़त ग़रीब वर्ग सम्मान पाने के लिए अपने से इतर धर्म की तरफ़ लालसा से देख रहा है।

एक और वर्ग धर्मों की पंक्तियों में खड़ा है। इस वर्ग के पास धन तो है; लेकिन धर्मों के तथाकथित ठेकेदारों की लालसा से कम है। यह सर्वहारा अर्थात् मध्यम वर्ग है। यह सबसे ज़्यादा धार्मिक वर्ग है। रूढिय़ों और पाखण्डवाद में यही वर्ग सबसे ज़्यादा फँसा हुआ है। धर्मों के तथाकथित ठेकेदारों के पाँव सबसे ज़्यादा यही वर्ग पूजता है। लेकिन दुर्भाग्य से इस वर्ग से भी धर्मों के तथाकथित ठेकेदार दूरी बनाकर रखते हैं। उन्हें इस वर्ग से भी घृणा है; लेकिन उसके समक्ष वे इस घृणा को ग़रीब वर्ग की तरह अति घृणा करके ज़ाहिर नहीं होने देते, ताकि इस वर्ग को बुरा न लग जाए। इस वर्ग के साथ धर्मों में दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। लेकिन जब दूसरे धर्मों के लोगों पर हमला करने की नौबत आती है, तो धर्मों के तथाकथित ठेकेदार इसी वर्ग के लोगों को आगे करते हैं।

यह उग्र वर्ग हर धर्म में है। इसे ईश्वर और धर्म की रक्षा करने का ठेका दिया गया है। ठीक वैसे ही, जैसे किसी अन्धे के हाथ में जलती हुई मशाल दे दी गयी हो। या किसी आज्ञाकारी सनकी के हाथ में हथियार दे दिया गया हो। अन्धा मशाल लेकर जहाँ भी जाएगा, आग लगने की सम्भावना बनी रहेगी। सनकी को जैसे ही उसका मालिक इशारा करेगा, वह किसी को भी मार देगा। धर्म और ईश्वर की रक्षा की मूर्खतापूर्ण भूल करने वाले इस वर्ग का भी यही हाल है। इस वर्ग को ऐसा करने के लिए मनगढ़ंत स्वर्ग / जन्नत के सपने दिखाये जाते हैं। दूसरे धर्म के लोगों के प्रति हिंसा करने के लिए उकसाया जाता है। ये लोग एक धार्मिक नारा लगते ही उग्र और उन्मादी हो जाते हैं।

अब लोगों में अपने धर्म की किताबें पढक़र कुछ सीखने की इच्छा नहीं है। वे अपने तथाकथित धर्म गुरुओं की सीखों को ही धर्म समझने की भूल कर रहे हैं। चाहे ये तथाकथित धर्म गुरु धर्म के बारे में कुछ भी न जानते हों। उनके गुरु होने की इतनी ही शर्त का$फी है कि वे पाखण्डी, धूर्त हों, और आडम्बर करने वाले हों। इसी के चलते अब हर धर्म में उग्र और उन्मादी लोग पैदा हो रहे हैं। दु:खद यह है कि उन्हें इसी में आनन्द आ रहा है।

धर्मों के तथाकथित धनपिपासु ठेकेदारों की दुकानें ऐसे ही चल रही हैं। उन्होंने धार्मिक स्थलों के दरवाज़े दानदाताओं की जेब की हैसियत के हिसाब से खोले हुए हैं। ऐसे लोगों के लिए यह पंक्ति सटीक ही है-‘होत न आज्ञा बिन पैसा रे।’ अर्थात् धर्मों के ये तथाकथित ठेकेदार धार्मिक स्थलों में प्रवेश की आज्ञा बिना पैसे के नहीं देते। हालाँकि यह पंक्ति हनुमान चालीसा की एक पंक्ति ‘ होत न आज्ञा बिनु पैसारे’ में थोड़ा-सा बदलाव करके मैंने आजकल की धार्मिकता के अर्थ में उपयोग की है। यह अर्थ इस दौर में बिलकुल सटीक लगता है। हनुमान चालीसा की पंक्ति का अर्थ- ‘राम के दरबार में कोई भी आपकी (हनुमान की) आज्ञा के बिना प्रवेश नहीं कर सकता’ है।

ईडी ने चार्जशीट में कहा- मुंबई कोविड सेंटर घोटाला मामले में संजय राउत के करीबी ने निभाई मुख्य भूमिका

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत के करीबी सुजीत पाटकर के खिलाफ कोविड सेंटर घोटाला मामले में चार्जशीट दाखिल की है।

चार्जशीट में कहा गया है कि बिजनेसमैन सुजीत पाटकर ने मुंबई में जंबो कोविड-19 सेंटर चलाने के लिए उनकी साझेदारी फर्म को सिविक कॉन्ट्रैक्ट के अलॉटमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं।

ईडी के अनुसार सुजीत पाटकर राजनीतिक रूप से सक्रिय लोगों के साथ अपनी निकटता के कारण इन सेंटर के लिए टेंडर प्रोसेस के बारे में पूर्ण जानकारी इकट्ठा करने में कामयाब रहे है। इसमें हुए घोटाले की कुल रकम 32.44 करोड़ रुपये की राशि में से 2.81 करोड़ रुपये की राशि उनके व्यक्तिगत बैंक खाते में भेज दी गई।

प्रवर्तन निदेशालय ने चार्जशीट में बताया है कि सुजीत पाटकर 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ लाइफलाइन हॉस्पिटल मैनेजमेंट सर्विसेज के प्रमुख भागीदारों में से एक हैं। फर्म के गठन के समय केवल 12,500 रुपये का निवेश किया था। पाटकर ने खुद को आपराधिक गतिविधियों में शामिल किया है।

चार्जशीट में आगे कहा गया है कि पाटकर बीएमसी अधिकारियों के साथ संपर्क करते थे और दहिसर और वर्ली में जंबो कोविड फैसिलिटी के लिए लाइफ लाइन मैनेजमेंट सर्विसेज को मैन पावर सप्लाई के कॉन्ट्रैक्ट के अलॉटमेंट की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

बता दें, ईडी ने सुजीत पाटकर और किशोर बिसुरे को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया था और वर्तमान में दोनों न्यायिक हिरासत में हैं।

दिल्ली: 25 करोड़ रुपये के गहनों की चोरी के मामले में पुलिस को मिली पहली कामयाबी, छत्तीसगढ़ से एक आरोपी को किया गिरफ्तार

दिल्ली के जंगपुरा इलाके में कुछ दिनों पहले हुई 25 करोड़ रुपये के गहनों की हाई प्रोफाइल चोरी में दिल्ली पुलिस ने छत्तीसगढ़ से एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी की पहचान लोकेश श्रीनिवास के रूप में हुई है।

छत्तीसगढ़ की पुलिस ने लोकेश श्रीनिवास कोहका से 25 किलो सोने के साथ गिरफ्तार करने में बड़ी सफलता हासिल की है। सोने के अलावा नकदी और अन्य जेवरात भी बरामद किए गए हैं।

बता दें, बिलासपुर एवं राजनांदगांव पुलिस को काफी समय से लोकेश की तलाश थी और इससे पहले भी लोकेश श्रीनिवास को दुर्ग पुलिस ने आकाशगंगा से पारख ज्वैलर्स के यहां हुई चोरी के मामले में 100 प्रतिशत मामलों के साथ गिरफ्तार किया था। दुर्ग पुलिस लोकेश से पूछताछ कर रही है।

आपको बता दें, दिल्ली के भोगल स्थित उमराव सिंह ज्वैलर्स नाम के एक बड़े ज्वैलरी शोरूम में तीन लोगों ने करीब 25 करोड़ रुपये के गहनों की चोरी की थी। यह चोर शोरूम की छत काटकर अंदर दाखिल हुए थे। शोरूम के मालिक को मंगलवार सुबह चोरी की वारदात का पता चला था और उसने पुलिस को जानकारी दी थी।

एशियन गेम्स: छठे दिन पुरुष टीम ने तोड़ा वर्ल्ड रिकॉर्ड, भारत को शूटिंग में मिले दो गोल्ड

एशियन गेम्स 2023 का शुक्रवार को छठा दिन है। भारत ने शूटिंग और टेनिस में 2 गोल्ड समेत 5 मेडल अपने नाम कर लिए हैं।

वीमेंस की शूटिंग 10 मीटर एयर पिस्टल टीम स्पर्धा में र्इशा सिंह, दिव्या टीएस और पलक ने सिल्वर मेडल जीता है।

पलक ने व्यक्तिगत रूप से 10 मीटर एयर पिस्टल इवेंट में गोल्ड मेडल भी जीता है। और र्इशा सिंह ने वीमेंस एयर पिस्टल में सिल्वर मेडल जीता है। इसी के साथ शूटिंग में भारत के पास कुल 15 मेडल जीते हैं।

वहीं बात करे मेन्स टीम की तो शूटिंग में मेन्स टीम ने सिल्वर मेडल जीता है। पुरूषों की 50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन टीम में ऐश्वर्य प्रताप सिंह तोमर, स्वप्निल कुसाले और अखिल श्योराणा ने वर्ल्ड रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 1769 के स्कोर के साथ गोल्ड मेडल जीता है।

टेनिस मेन्स डबल्स में एक सिल्वर मेडल भारत को मिला है। किंतु भारतीय जोड़ी माइनेनी और रामकुमार रामनाथन को फाइनल में हार का सामना करना पड़ा।

मिक्स्ड डबल्स कैटेगरी में रोहन बोपन्ना और रुतुजा भोसले की जोड़ी सेमीफाइनल में चाइनीज ताइपे के खिलाड़ियों से आमना सामना करेगी।

पंजाब विजिलेंस टीम ने मनप्रीत बादल की तलाश में एक्शन लेते हुए 6 राज्यों में की छापेमारी

पंजाब  विजिलेंस टीम ने भ्रष्टाचार मामले में भाजपा नेता मनप्रीत सिंह बादल के खिलाफ एक्शन लिया है और उनकी तलाश में एक्शन लेते हुए 6 राज्यों में छापेमारी की है। इनमें पंजाब के अलावा हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान में पहुंची है।

कुछ दिनों पहले ही मनप्रीत सिंह बादल के खिलाफ बठिंडा में एक संपत्ति की खरीद में अनियमितताओं के मामले में एक अदालत ने गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया था।

सोमवार को मनप्रीत बादल के लुक आउट नोटिस जारी किया गया था और उनके खिलाफ 409, 420, 467,468,471, 120, 66 सी धाराओं के अंतर्गत एफआईआर दर्ज की गयी है।

मनप्रीत बादल के साथ-साथ बठिंडा विकास प्राधिकरण (बीडीए) के पूर्व मुख्य प्रशासक बिक्रमजीत शरगिल, अमनदीप सिंह, राजीव कुमार, विकास अरोड़ा और पंकज पर भी मामला दर्ज किया गया है।

बता दें, मनप्रीत बादल पर मॉडल टाउन फेज 1 में कमर्शियल प्लॉट खरीदने में अनियमितताओं के आरोप लगे थे। यह शिकायत पूर्व विधायक सरूप चंद सिंगला ने वर्ष 2021 में दर्ज कराई थी।

राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023: बिना सीएम चेहरे के चुनाव में उतरेगी भाजपा

इस वर्ष होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा ने किसी नेता को सीएम फेस घोषित किए बिना ही उतरने का फैसला किया है। बुधवार को राजस्थान कांग्रेस की बैठक शाम 7 बजे से देर रात 3 बजे तक चली।

बुधवार को हुई राजस्थान भाजपा की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी मौजूद रहें।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी से नाराज चल रही पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पार्टी ने अब मना लिया है और उन्हें आश्वासन दिया गया है कि टिकट बंटवारे में उनकी राय को महत्व दिया जाएगा।

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने मीटिंग की जानकारी देते हुए कहा कि कोर कमेटी की मीटिंग में फैसला हुआ है कि इलेक्शन के लिए कोई सीएम फेस नहीं होगा। इस मीटिंग के दौरान राजस्थान के नेताओं के साथ भी अलग-अलग 45 मिनट की मीटिंग हुई है।

सूत्रों के अनुसार जब देर रात 3.30 बजे वसुंधरा राजे भाजपा दफ्तर से बाहर निकली तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान थी। उन्होंने कहा कि सब कुछ सही रहता है और पॉजिटिव है।  

बता दें, भाजपा राजस्थान विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की रणनीति ही राजस्थान में अपना रही है। चुनाव में लोकसभा सांसदों को उतारने की तैयारी कर रही है। इसके तहत सुखबीर सिंह जौनपुरिया, किरोड़ी लाल मीणा और दीया कुमारी को उतारने का प्लान है।