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डिजिटल मार्केटिंग से दूर ज़्यादातर किसान

योगेश

भारतीय किसान अपनी फ़सलों को बेचने के लिए छोटे बाज़ारों और सरकारी मंडियों तक ही पहुँच रखते हैं। लेकिन फ़सल और खाने-पीने की चीज़ें की बिक्री के लिए आजकल डिजिटल मार्केटिंग को बहुत बढ़ावा दिया जा रहा है। ज़्यादातर छोटी और बड़ी कम्पनियाँ डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ रही हैं। हमारे देश में भी डिजिटल मार्केटिंग का विस्तार हो रहा है। डिजिटल मार्केटिंग पर लाभ ज़्यादा और सीधे मिलता है। लेकिन हमारे ज़्यादातर किसान डिजिटल मार्केटिंग नहीं जानते हैं और बड़ी संख्या में सीधे इससे नहीं जुड़ पा रहे हैं। किसानों को इस प्लेटफार्म से जोड़ने के लिए केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने 14 जुलाई, 2022 को 12 भाषाओं में एक मोबाइल एप्लिकेशन के रूप में इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाज़ार ई-नाम पीओपी (द्गहृ्ररू-क्कशक्क) लॉन्च किया था। लेकिन इस प्लेटफार्म पर किसानों के जुड़ने की गति बहुत कम है।

ई-नाम पीओपी प्लेटफार्म पर व्यापार, अनाज की परख, भण्डारण, वित्तीय सेवाएँ, कृषि-सलाह, कृषि विस्तार सेवाएँ, फ़सलों का बाज़ार भाव, ख़रीद और बिक्री और अन्य कृषि आगत सेवाएँ उपलब्ध हैं। सरकार ने अप्रैल, 2016 में ये ऑनलाइन बाज़ार शुरू किया था। इससे इलेक्ट्रॉनिक बाज़ार पोर्टल ई-नाम से 2016 में ही देश की कुल 585 मंडियों को जोड़ दिया गया था। इस पोर्टल के माध्यम से देश की लगभग 1,260 कृषि उपज मंडियाँ ख़रीद और बिक्री का काम करती है। ये सरकारी पोर्टल कृषि उपज की ई-नीलामी के लिए काफ़ी उपयुक्त है। लेकिन बहुत बड़ी संख्या में किसान इस पोर्टल से आज तक नहीं जुड़ सके हैं।

इन दोनों सरकारी पोर्टल से बड़ी संख्या में किसानों के न जुड़ने का कारण यह है कि काफ़ी किसानों को इस पोर्टल की जानकारी नहीं है और किसान इनके ज़रिये सीधा सौदा करने में असमर्थ हैं। ई-नाम पोर्टल पर आवश्यक बुनियादी ढाँचा स्थापित करने, बाज़ार बढ़ाने और उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए कृषि प्रौद्योगिकी इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड के माध्यम से 200 करोड़ का निवेश किया था। 01 अगस्त, 2023 तक 23 प्रदेशों और चार केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 1,361 मंडियाँ ई-एनएएम) से एकीकृत हो चुकी थी। सरकारी आँकड़े दर्शाते हैं कि पिछले सात वर्षों में लगभग 1.73 करोड़ किसान और 2.25 लाख व्यापारी ई-नाम पोर्टल से जुड़कर लाभ कमा रहे हैं। लेकिन हमने एक दज़र्न से ज़्यादा किसानों से ई-पोर्टल ई-नाम और डिजिटल मार्केटिंग के बारे में पूछा, तो सभी किसानों ने इसकी जानकारी होने से मना कर दिया।

सरकारी आँकड़े दर्शाते है कि देश के करोड़ों किसानों को इससे लाभ मिला है। लेकिन सच यह है कि कई राज्यों तक तो इस पोर्टल की पहुँच नहीं है। एक किसान राजेंद्र ने कहा कि डिजिटल मार्केटिंग के बारे में सब किसान नहीं जानते। कुछ बड़े और पढ़े-लिखे किसानों को ही इस ई-पोर्टल की जानकारी है। इसी का फ़ायदा व्यापारी उठाते हैं। किसानों के बीच तो इस पोर्टल की पहुँच बहुत सीमित है। उन्होंने कहा कि किसानों के नाम इस ई-पोर्टल के सर्वे में ऐसे ही दर्ज कर लिये गये हैं, ताकि सरकारी कर्मचारी ख़ानापूर्ति कर सकें। लगभग 80 प्रतिशत से ज़्यादा किसानों को तो इसके बारे में यह जानकारी तक नहीं है कि डिजिटल मार्केटिंग होती क्या है? इन 80 प्रतिशत किसानों को ई-पोर्टल ई-नाम चलाना तक नहीं आता। ये एकीकृत व्यापार मंच मुक्त रूप से किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, ख़रीदारों और व्यापारियों को लाभ पहुँचाने के लिए बनाया गया होता है, जिससे किसानों और व्यापारियों को महत्त्वपूर्ण जानकारी मिल सके और वे इस प्लेटफार्म के माध्यम से बीज, फ़सल, कृषि सम्बन्धी अन्य चीज़ें ख़रीद और बेच सकें। लेकिन जब तक पूरे देश के किसान इससे जुड़ ही नहीं पाएँगे, तब तक सभी किसानों को लाभ कैसे मिल सकेगा?

हाल ही में दिल्ली में ई-नाम 2.0 में सुधार कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान ई-नाम 2.0 से और 28 मंडियाँ जोड़ी गयीं, जिसके बाद इनकी संख्या 1,389 हो गयी। पारिस्थितिकी तंत्र मज़बूत करने के लिए मंडियों के एकीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया यह ई-पोर्टल भविष्य में डिजिटल मार्केटिंग को बढ़ाएगा।

हाल ही में एक राष्ट्रीय कार्यशाला में निजी संगठनों, कमोडिटी एक्सचेंजों, राज्य कृषि विपणन बोर्डों, बैंकों, विपणन और निरीक्षण विभाग के अधिकारियों ने कृषि सुधारों के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। पिछले कुछ वर्षों में कृषि बाज़ारों में एक चरणबद्ध विकास हुआ है। इसमें एपीएलएम अधिनियम-2017 के माध्यम से गोदाम-रसीद (ईएनडब्ल्यूआर) व्यापार और किसान उपज के प्रत्यक्ष विपणन को बढ़ावा देने के लिए ईएनएएम 2.0 के पोर्टल के रूप में ईएनएएम 1.0 और पीओपी ऐप का अनावरण करके ईएनएएम 3.0- आधारित मॉड्यूल बनाया।

हालाँकि एपीएमसी की शेष संख्या को एकीकृत करके इसे कृषि व्यापार में अभी भी काफ़ी बढ़त हासिल करनी है। केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कृषि-मूल्य शृंखला के सभी भागीदार एक छत के नीचे आएँ और ई-नाम पीओपी के माध्यम से उत्पादों और सेवाओं के पैकेज का लाभ उठाएँ। हालाँकि कृषि की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, खाद्य प्रणालियों के व्यापारीकरण आदि के कारण कुछ मुद्दे उभरे हैं, जिन बहस और चर्चा होनी चाहिए। अहम् सवाल है कि क्या ई-नाम किसानों और कृषि-खाद्य मूल्य शृंखला के विविध हितधारकों को लाभकारी है?

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आधी से ज़्यादा आबादी कृषि उद्योग पर निर्भर है। कृषि का देश की जीडीपी में बड़ा योगदान है, जिसे बढ़ाया जा सकता है। आज के आधुनिक दौर में भी कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इस क्षेत्र से जुड़े ज़्यादातर लोग मुश्किल से जीवनयापन कर पा रहे हैं। इन चुनौतियों के परिणामस्वरूप किसानों और कृषि मज़दूरों को काफ़ी समस्याएँ रहती हैं।

ई-पोर्टल ई-नाम से इन्हीं समस्याओं को कम करने की कोशिश केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने की है। अगर किसानों को इस प्लेटफार्म से सही रूप से जोड़ा जाए और उन्हें इस डिजिटल मार्केटिंग सिखायी जाए, तो उन्हें इसका अच्छा लाभ मिल सकता है और वे छोटे और खुले बाज़ार में अपनी फ़सल उत्पादन को सस्ते में बेचने से बच सकेंगे। इसके लिए छोटे किसानों के समूह बनाकर किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

हालाँकि इस राह में एक रोड़ा यह है कि अभी भी देश के ज़्यादातर किसान पढ़े लिखे नहीं है। ऐसे किसानों के लिए समूह बनाकर जो किसान पढ़े-लिखे हों, उनको ई-पोर्टल की ट्रेनिंग दी जाए। कोशिश की जानी चाहिए कि किसानों को क्षेत्रीय स्तर पर बैठक बुलाकर इसकी जानकारी दी जाए और बाज़ार भाव भी बताया जाए। इससे अनपढ़ किसान ठगी का शिकार होने से बचे रह सकेंगे। ई-पोर्टल को विस्तृत बनाने की भी कोशिश करनी चाहिए। इस पोर्टल पर कृषि सम्बन्धित ओरिजनल बीज, खाद, कीटनाशक और अच्छी गुणवत्ता के कृषि यंत्र ही बेचे जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त जैविक कृषि को बढ़ावा देना चाहिए।

अब जैविक फ़सलों का भाव भी अच्छा मिलता है और हमारे स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होता है। इसके साथ ही किसानों की पहुँच सीधे ग्राहकों तक होनी चाहिए। सरकार उनकी फ़सलों का भाव निश्चित करके उससे सस्ते ख़रीद पर रोक लगाये। किसानों के लिए देश और विदेश में फ़सलों के भाव को बताया जाना चाहिए। फ़सल चक्र के अतिरिक्त अनेक फ़सलें उगाने की जानकारी किसानों को दी जानी चहिए। सरकारी पोर्टल ई-नाम के अतिरिक्त प्राइवेट ऑनलाइन पोर्टल पर फ़सल उत्पादों को बेचने का हुनर भी किसानों को सिखाया जाना चाहिए।

परेशानी यह है कि किसानों की ऑनलाइन फ़सलें बेचने में रुचि नहीं जाग पा रही है। ई-नाम पर फ़सलें बेचने में भी किसानों की कोई ख़ास रुचि नहीं है। जागरूक किसान ई-नाम ई-पोर्टल पर फ़सलें बेच रहे हैं। ई-नाम पर फ़सलें बेचने वाले किसान मानते हैं कि यह पोर्टल पारदर्शी और फ़सल बेचते ही पैसा उपलब्ध कराने वाला है। मंडी में किसानों को फ़सल ले जाने का ख़र्च भी बच सकता है। इसके अतिरिक्त मंडी में किसानों को अपनी फ़सल लेकर जाना पड़ता है, जिसके लिए कई प्रक्रियाएँ हैं और समय बहुत ख़राब होता है। जबकि ई-पोर्टल पर ये झंझट नहीं है।

कृषि बाज़ार और किसानों की पहुँच देश और विदेशों तक पहुँचाने में ये पोर्टल मदद करने वाला है। यह कृषि फ़सलें ज़्यादा उगाने और इलेक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल है, जिसे मंत्रालय भारत सरकार द्वारा विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों में स्थापित कृषि मंडियों को इंटरनेट से जोड़कर एकीकृत राष्ट्रीय कृषि उपज बाज़ार बनाना है। यह आभासी इंटरनेट आधारित कृषि विपणन व्यवस्था है; लेकिन एनएएम के पीछे स्थानीय कृषि उपज मंडी रहेगी।

नोएडा निठारी कांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी सुरेंद्र कोली और मनिंदर पंढेर की फांसी की सजा की रद्द

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा के निठारी कांड में आरोपी सुरेंद्र कोली और मनिंदर सिंह पंढेर की फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने दोनो आरोपियों को बरी कर दिया है।

सीबीआई अदालत ने लड़कियों के साथ दुष्कर्म और हत्या का आरोप तय करते हुए दोनों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी।

बता दें, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निठारी कांड में सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद द्वारा सुरेंद्र कोली और मनिंदर सिंह पंढेर को मिली फांसी की सजा के खिलाफ अपील को मंजूर कर लिया है। अदालत ने आरोप संदेह से परे साबित न हो पाने के कारण निर्दोष करार देते हुए बरी किया है।

आपको बता दें, वर्ष 2005 से 2006 में नोएडा में हुए निठारी कांड में सीबीआई ने कुल 16 मामले दर्ज किये थे। और सुरेंद्र कोली को हत्या, अपहरण, बलात्कार और सबूत मिटाने के केस में आरोपी बनाया था। इन दोनों ने फांसी की सजा को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। आरोपियों का कहना है कि इन मामलों में कोई भी चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं है।

इस मामले में लंबी बहस के बाद न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र और न्यायमूर्ति एस एच ए रिजवी की खंडपीठ ने अपीलों का फैसला सुरक्षित रख लिया था और आज इसका फैसला सुनाया है।

जनजातीय विश्वविद्यालय में घटाया जा रहा आदिवासियों का प्रतिनिधित्व

सन् 2008 में संसद के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अधिनियम-2007 के तहत मध्य प्रदेश के अनूपपुर ज़िले के अमरकंटक में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी थी। इस विश्वविद्यालय की स्थापना का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों के बौद्धिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ उनकी आर्थिक दशा में सुधार करना था।

लेकिन विगत कुछ वर्षों में इस विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल उद्देश्यों से परे जाकर आदिवासी छात्र-छात्राओं के प्रतिनिधित्व को काफ़ी कम कर दिया गया है। जिस तरह से विश्वविद्यालय के टीचिंग और नॉन-टीचिंग पदों को भरने में विवाद की स्थिति पैदा की गयी है, उससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह सच में आदिवासी विश्वविद्यालय है? क्या आदिवासी विश्वविद्यालय के नाम की आड़ में यहाँ उच्च वर्गों का प्रतिनिधित्व और वर्चस्व बढ़ाने की कोशिश की जा रही है? विगत चार-पाँच वर्षों से विश्वविद्यालय के टीचिंग और नॉन-टीचिंग पदों पर होने वाली नियुक्तियाँ विवादों में रही हैं। और लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि बिना रोस्टर रजिस्टर तैयार किये आरक्षण नियमों का उल्लंघन कर मनमाने ढंग से नियुक्तियाँ की गयी हैं। 15 जुलाई, 2023 को विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षकों की भर्ती के लिए प्रकाशित एक विज्ञापन पर सवाल उठने लगे।

21 अगस्त, 2023 को एससी प्रकोष्ठ के लाइजन अधिकारी प्रोफेसर तन्मय घोराई ने कुलसचिव को पत्र लिखा कि विश्वविद्यालय द्वारा बिना रोस्टर रजिस्टर बनाये मनमाने तरी$के से नियुक्ति की जा रही है, जो भारत सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा समय-समय पर जारी आदेशों का स्पष्ट उल्लंघन है। कई विभागों में पूर्व से सहायक प्राध्यापक के जिन पदों पर एससी और एसटी के लोग नियुक्त थे, उन पदों के रिक्त होने पर उसे जानबूझकर अनारक्षित और ईडब्ल्यूएस श्रेणी में बदल दिया गया। ऐसे पाँच एससी के लिए और दो एसटी के लिए आरक्षित पदों में बैकलाग के तीन एससी और एक ओबीसी आरक्षित पद पर दिव्यांग की अतिरिक्त शर्त जोड़कर उसकी पूर्ति को दुरूह कर दिया गया।

जनजातीय अध्ययन विभाग में एक भी पद जनजातीय वर्ग के लिए विज्ञापित नहीं किया गया है और न ही पूर्व में किया गया है। इस प्रकार जनजातीय विभाग में एक भी शिक्षक जनजातीय वर्ग का नहीं है। इस पर एसटी प्रकोष्ठ और ओबीसी प्रकोष्ठ ने आपत्ति दर्ज करायी। 23 अगस्त, 2023 को भी शिक्षक संघ ने एससी प्रकोष्ठ के पत्र के हवाले से रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर भर्ती विज्ञापन में विसंगति होने का आरोप लगाते हुए आरक्षित पदों सहित विज्ञापन में अन्य तरह की विसंगतियों को दूर करके 200 प्वाइंट रोस्टर के तहत भर्ती विज्ञापन निकालने का अनुरोध किया था। इसके बाद रोस्टर समिति की पुन: बैठक बुलायी; लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। यह भी सूचना मिली कि बैकलाग पदों में दिव्यांग की शर्त जोड़ने मामले पर भी विरोध होने के बाद आनन-फ़ानन में दो सदस्यीय रोस्टर री-विजिट कमेटी बनायी गयी, जिसमें बाहर से दो एक्सपर्ट आये थे। 01 सितंबर, 2023 को कमेटी की बैठक में दोनों ने स्पष्ट कहा कि बैकलाग आरक्षित पदों में दिव्यांग की शर्त जोड़ना त्रुटि है। इसे सुधार कर दोबारा विज्ञापन निकाला जाए। यह बात बैठक की रिपोर्ट में भी लिखी हुई है। फिर भी उनकी बातों को इनकार कर नियमों का उल्लंघन किया गया।

वहीं दूसरी ओर विश्व दलित परिषद् नामक संस्था ने इस हेर-फेर के विरुद्ध राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत कर ज़िम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने और जब तक निराकरण न हो जाए, भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। अनुसूचित जाति आयोग ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति, यूजीसी के सचिव और शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार के सचिव को नोटिस जारी कर सात दिन के भीतर जवाब माँगा था। जवाब देने की तिथि बीत चुकी है; लेकिन आयोग ने रिपोर्ट प्रकाशित होने तक कोई कार्यवाही नहीं की थी।

विश्वविद्यालय में ही पूर्व मुख्य छात्रावास अधीक्षक प्रोफेसर नवीन शर्मा आदिवासी छात्र संगठन मध्य प्रदेश के प्रदेश उपाध्यक्ष रोहित सिंह मरावी, जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष इंद्रपाल मरकाम और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह इस पर आपत्ति कर चुके हैं।

बदल रहे राजस्थान के राजनीतिक समीकरण

भारतीय जनता पार्टी ने दिया कुमारी को बनाया प्रत्याशी, वसुंधरा राजे गुट दंग

राजस्थान के विधानसभा चुनावों को इस बार किसी भी हाल में अनदेखा नहीं किया जा सकेगा। भारतीय जनता पार्टी द्वारा 41 विधानसभा प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करने के बाद राजस्थान में चुनावी सरगर्मी बढ़ गयी है। आश्चर्यजनक यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान की पसंदीदा बड़ी नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को पहली सूची से बाहर रखते हुए दिया कुमारी को जगह दी है।

दिया को लायी थीं वसुंधरा

दिया कुमारी को पूर्व उप राष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी का पत्ता काटकर प्रत्याशियों की सूची में शामिल किया है। नरपत सिंह इस समय विधायक हैं। राजघराने से सम्बन्ध रखने वाली दिया कुमारी को एक समय में वसुंधरा राजे ही राजनीति में लेकर आयी थीं। मगर अब दिया कुमारी के लिए वसुंधरा से कोई सरोकार नहीं रखती हैं। दिया कुमारी जयपुर की ही हैं। सबसे पहले उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने भरतपुर के सवाई माधोपुर से विधायक प्रत्याशी के रूप में टिकट दिया था। उसके बाद उन्हें 2019 में राजसमन से सांसदी का टिकट दिया, जहाँ से वह वर्तमान में सांसद हैं। अब उन्हें जयपुर के विद्याधर नगर से विधानसभा प्रत्याशी के रूप में चुना गया है।

इस नये कार्यभार को लेकर दिया कुमारी भाजपा का भरपूर आभार व्यक्त कर रही हैं। वह कह रही हैं कि उनके लिए पार्टी का जो भी निर्देश रहेगा, वह उसका पालन करेंगी। हालाँकि वसुंधरा राजे के बदल पर वह कह रही हैं कि ये मीडिया की बनायी बातें हैं। अभी ऐसा कुछ भी नहीं है।

दाँव अपने-अपने

राजस्थान में कांग्रेस अपनी वापसी के प्रयास कर रही है; मगर भाजपा किसी भी हाल में कांग्रेस की यह मनोकामना पूर्ण नहीं होने देना चाहती। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने राजस्थान में सनातन धर्म को समाप्त करने, संतों को पीटने, सांप्रदायिक दंगे भड़काने एवं मंदिरों को तुड़वाने का प्रयास किया है। भ्रष्टाचार किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जितनी बार राजस्थान दौरे पर बीते एक साल में गये हैं, उन्होंने लाल डायरी एवं हिन्दुत्व को लेकर ही अधिक बोला है। भाजपा नेता वादे कर रहे हैं कि राज्य में उसकी सरकार बनते ही हिन्दुओं की रक्षा के लिए काम करने के अतिरिक्त भ्रष्टाचार मुक्त विकास करने वाला शासन दिया जाएगा।

मगर अशोक गहलोत कोई छोटे राजनेता नहीं हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के हर दाँव का काट जानते हैं। अशोक गहलोत कर्नाटक की तरह राजस्थान की जनता को गारंटी तो दे ही रहे हैं, इसके अतिरिक्त अपने कार्य भी गिना रहे हैं। उन्होंने अपनी पार्टी को विखंडन से बचाने का प्रयास यह कहते हुए कर दिया है कि अब उन्हें मुख्यमंत्री बनने में कोई रुचि नहीं है। इससे उनसे रूठे बैठे सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनने के सपनों को पंख लग हैं एवं सचिन पायलट एवं उनके समर्थक प्रसन्न हैं। सचिन जो चाहते हैं, उसकी उम्मीद उन्हें बँधी है।

वसुंधरा की चुप्पी का अर्थ

सन् 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद से राजस्थान की इकलौती बड़ी महिला नेता के लिए उलटी गिनती आरंभ हो गयी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनका मनमुटाव किसी से छिपा नहीं है। मगर प्रधानमत्री के सबसे निकट माने जाने वाले अमित शाह जैसे ही 2019 में गृहमंत्री बने, वसुंधरा को बाहर करने का खेल खुलकर सामने आने लगा। भाजपा का वर्तमान नेतृत्व उन्हें घर का भेदी एवं अशोक गहलोत का निकटतम मानता है। कहा तो यह जाता है कि वसुंधरा राजे ने अशोक गहलोत का सम्मान करते हुए भी कभी अपनी पार्टी एवं प्रतिष्ठा को कभी ठेस नहीं पहुँचने दी।

कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे वसुंधरा की अपनी धमक मानते हैं, जो कि वर्तमान नेतृत्व को रास नहीं आ रही थी। कहा जाता है कि वर्तमान नेतृत्व को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह के अतिरिक्त मनमानी किसी भी नेता की पसंद नहीं, चाहे वह कितना भी पुराना हो।

बहरहाल, वसुंधरा अब चुप हैं। उनकी चुप्पी तूफ़ान का संकेत देती है। कहा जा रहा है कि भाजपा राजस्थान में उनके बिना आसानी से जीत नहीं सकेगी।

बहस में उलझे झारखण्ड के ज़मीनी मुद्दे

झारखण्ड में इन दिनों ओबीसी आरक्षण, स्थानीयता, सरना धर्म कोड, सीएए, एनआरसी, बांग्लादेशी घुसपैठ, लव जिहाद जैसे मामले छाये हुए हैं। इन सब के बीच अब नया मामला जातीय जनगणना का आ गया है। राजनीतिक दलों की राज्य में जातीय जनगणना कराने की माँग शुरू हो गयी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दो वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र को सार्वजनिक कर भाजपा को घेर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस समेत तमाम दल जातीय जनगणना के पक्षधर हैं। यहाँ तक कि एनडीए की सहयोगी आजसू ने भी खुलकर जातीय जनगणना कराने की वकालत की है।

विपक्षी दल भाजपा जातीय जनगणना पर बोलने से बचती हुई अन्य मुद्दों को लेकर राज्य सरकार पर हमलावर है। सवाल यह है कि क्या जातीय जनगणना समेत ये तमाम मुद्दे वाक़ई जनहित के हैं, या फिर राजनीतिक? जब इन मुद्दों का हल निकलेगा और लोगों को कितना लाभ मिला? इस आकलन के बाद ही यह जवाब मिल सकेगा। फ़िलहाल जो आसार दिख रहे हैं, उसमें तो जातीय जनगणना भी तमाम मुद्दों में राजनीति करने के लिए एक मुद्दा ही दिख रहा।

बिहार में नीतीश सरकार ने जातीय जनगणना का आँकड़ा जारी कर देश को एक नया राजनीतिक मुद्दा दे दिया है। पूरे देश में इसकी चर्चा है। $खासकर कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बना लिया है। भाजपा इस मुद्दे पर थोड़ी बैकफुट पर है। झारखण्ड भी इससे अछूता नहीं है। यहाँ सत्तासीन झामुमो और कांग्रेस जातीय जनगणना कराने के पक्ष में है। एनडीए यानी भाजपा में सहयोगी आजसू भी हिमायती बना दिख रहा। वहीं भाजपा, विहिप और बजरंग दल के नेता जातीय जनगणना पर बोलने से बच रहे हैं। वे इसकी जगह स्थानीयता, लव जिहाद और बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठा रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद् के केंद्रीय मंत्री सह केंद्रीय धर्माचार्य सम्पर्क प्रमुख अशोक तिवारी 8 अक्टूबर को रांची आये हुए थे। एक कार्यक्रम के दौरान तिवारी ने कहा कि झारखण्ड सहित पूरे देश में लव जिहाद और धर्मांतरण बड़ी समस्या है। उनका यह बयान उस समय आया है, जब राज्य में लव जिहाद मामले में पहली बार कोई $फैसला आया है। दरअसल राष्ट्रीय शूटर तारा शाहदेव धर्म परिवर्तन मामले में सीबीआई कोर्ट ने 5 अक्टूबर को सज़ा सुनायी।

इसे राज्य का पहला लव जिहाद का मामला कहा जा सकता है। इस मामले के बाद ही लव जिहाद शब्द राज्य में चर्चा में आया था। उधर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी समय-समय पर बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ने की बात करने के अलावा कांग्रेस और झामुमो पर तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे हैं। भाजपा विधायक अनंत ओझा पाकुड़ और साहिबगंज क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठ से क्षेत्र के डेमोग्राफी बदलने का मामला विधानसभा में उठाते रहते हैं।

इन सब को लेकर भाजपा राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) और संशोधित नागरिकता क़ानून (सीएए) की बात कर रही। बाबूलाल मरांडी इन दिनों पूरे राज्य में संकल्प यात्रा निकाल रहे हैं। उन्होंने जमशेदपुर में 10 अक्टूबर को एक सभा में कहा कि भाजपा राज्य में सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देगी। इधर झारखण्ड में भी बिहार की राह पकड़ने का दबाव बन रहा है। राज्य में कांग्रेस और राजद के सहयोग से झामुमो के नेतृत्व में सरकार चल रही है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने कहा है कि हमारे नेता राहुल गाँधी ने सा$फ कह दिया है, जातियों को उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए। सूत्रों की मानें, तो आगामी विधानसभा सत्र में जातीय जनगणना कराने का प्रस्ताव पारित करने का दाँव गठबंधन सरकार चल सकती है। सरकार इसे कैसे और कब कराएगी? यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा।

स्थानीयता हो या ओबीसी आरक्षण या फिर जातीय जनगणना, हर मामले की गेंद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन केंद्र सरकार के पाले में डाल रहे हैं। बिहार में जातीय जनगणना का आँकड़ा जारी होने के बाद हेमंत सोरेन ने कहा कि मैं तो बीते दो साल से जातीय जनगणना की बात कर रहा हूँ। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो साल पहले लिखे पत्र की बात को सार्वजनिक किया। हेमंत सोरेन ने कहा कि जातीय जनगणना को लेकर 2021 से ही प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण की सुविधा उपलब्ध कराने में ये आँकड़े सहायक सिद्ध होंगे। हालाँकि झारखण्ड में अभी जातीय जनगणना तत्काल होने के आसार कम हैं। क्योंकि आधा अक्टूबर बीत चुका है। अब दशहरा, दीपावली, छठ जैसे त्योहार शुरू हो जाएँगे, जो दिसंबर में क्रिसमस तक जारी रहेंगे। इसके बाद फरवरी-मार्च, 2024 से लोकसभा चुनाव के लिए मतदाता सूची का पुनरीक्षण, चुनाव कर्मियों का प्रशिक्षण जैसे कार्यों शुरू हो जाएँगे। अप्रैल-मई तक लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद झारखण्ड में अक्टूबर-नवंबर, 2024 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो जाएगी। इन परिस्थितियों में 2024 में बनने वाली नयी केंद्र सरकार पर ही निर्भर करेगा कि वो जातीय जनगणना कराती है या नहीं।

हरियाणा को पानी नहीं देगा पंजाब!

सतलुज-यमुना सम्पर्क नहर (एसवाईएल) पर सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख़ टिप्पणी से पंजाब में राजनीतिक हलचल शुरू हो गयी है। हरियाणा और पंजाब के बीच पानी बँटवारे का यह मामला क़रीब 28 साल से सर्वोच्च न्यायालय में है। कई बार न्यायालय की तल्ख़ टिप्पणियाँ पहले भी आयीं; लेकिन मामला जस-का-तस ही रहा है।

अब तो यह मुद्दा राजनीतिक हो चला है। लिहाज़ा लगता नहीं कि एसवाईएल का काम आसानी से सिरे चढ़ सकेगा। हाल में मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से पंजाब क्षेत्र में एसवाईएल का सर्वे करने और इसकी रिपोर्ट तीन माह में देने और साथ में दोनों राज्यों में नहर पर सहमति बनाने का सुझाव दिया। एसवाईएल पर पंजाब के रुख़ पर सर्वोच्च न्यायालय ने तल्ख़ टिप्पणी कर बहुत कुछ संकेत दे दिया है। केंद्र को दिसंबर तक सर्वे रिपोर्ट देनी है; लेकिन पंजाब में इसे लेकर आक्रामक रुख़ है।

किसान संगठनों ने केंद्रीय टीम को पंजाब में न घुसने की चेतावनी दे दी है। मुख्यमंत्री भगवंत मान के दो-टूक कह चुके हैं कि पंजाब दूसरे राज्य को एक बूँद भी पानी नहीं देगा; बावजूद इसके राज्य में उनकी आलोचना हो रही है। एसवाईएल पर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल पानी हरियाणा को न देने के मुद्दे पर एक हैं। भाजपा का रुख़ स्पष्ट नहीं; लेकिन वह भी पंजाब के लोगों की राय के ख़िलाफ़ नहीं जाएगी। हरियाणा में भाजपा की सरकार है। तो क्या पंजाब की भाजपा इकाई इसका विरोध करेगी? केंद्र में उसकी सरकार है।

शिअद अध्यक्ष और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने कहा कि पंजाब में एसवाईएल का निर्माण किसानों की लाशों से गुज़रकर करना होगा। वह कहते हैं कि चाहे सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला हो या प्रधानमंत्री इसके लिए फ़ौज भेज दें, हम पंजाब का पानी नहीं जाने देंगे। एसवाईएल के भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी हुई, नहर का काम शुरू हुआ और तेज़ी से भी चला। पंजाब में एसवाईएल 122 किलोमीटर लम्बी है और क़रीब 90 प्रतिशत तक पूरी कर ली गयी। उधर हरियाणा ने अपने हिस्से की 90 किलोमीटर की नहर समय से पूरी कर ली। हरियाणा में एसवाईएल आज बिना सतलुज के पानी के दूसरे विकल्प के तौर पर काम कर रही है, जबकि पंजाब क्षेत्र में यह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। सन् 1966 में पंजाब से अलग हो अलग राज्य बनने के बाद से ही वह अधिकारपूर्वक पानी की माँग करता रहा है; लेकिन इसके लिए परियोजना की ज़रूरत थी। क़रीब एक दशक बाद ऐसी परियोजना का प्रस्ताव बना।

इस प्रस्ताव में न केवल सतलुज, बल्कि यमुना के पानी को जोड़ा जाए; जिससे हरियाणा को हिस्से का पानी मिल सके। सन् 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने पंजाब के ज़िला पटियाला के गाँव कपूरी में एसवाईएल का भूमि पूजन किया। दिसंबर, 1983 में पंजाब क्षेत्र में नहर पूरी करने का लक्ष्य रखा गया था। जिस अकाली दल ने परियोजना शुरू करायी, उसी ने सन् 1982 में इसका विरोध शुरू कर दिया। लिहाज़ा निर्माण काम रुक गया। क़रीब तीन साल बाद सन् 1985 में राजीव-लोंगोवाल समझौते के बाद काम शुरू हुआ। किस राज्य को कितना पानी मिलेगा? इस पर सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज वी. बालकृष्ण इराडी ट्रिब्यूनल गठित हुआ।

इराडी रिपोर्ट में पंजाब में बहती रावी और व्यास के अतिरिक्त पानी को भी जोड़ने की सिफ़ारिश हुई। इसके अनुसार, अब कुल 18.28 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) में से पंजाब को 5 एमएएफ, हरियाणा को 3.83 एमएएफ, राजस्थान को 8.6 एमएएफ, जम्मू-कश्मीर (तब) 0.65 एमएएफ और दिल्ली को 0.2 एमएएफ पानी देना तय हुआ। वर्ष 1988 में पटियाला ज़िले के गाँव चुन्नी कलां में आतंकवादियों ने एसवाईएल के लिए काम कर रहे 35 श्रमिकों की हत्या कर दी। सन् 1990 में एसवाईएल के चीफ इंजीनियर और उनके सहायक की हत्या हो गयी। उसके बाद से पूरे पंजाब में एसवाईएल का विरोध शुरू हो गया और यह स्थिति साल दर साल बढ़ती रही। वर्ष 1995-96 में पहली बार हरियाणा ने अपने हक़ के पानी के लिए सर्वोच्च न्यायालय गया; लेकिन पंजाब ने समीक्षा याचिका लगायी। लम्बी सुनवाई के बाद जनवरी, 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब की समीक्षा याचिका को रद्द करते हुए एक वर्ष में अपने हिस्से की नहर पूरी करने का आदेश दिया; लेकिन इसका पालन नहीं हुआ।

2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से किसी केंद्रीय एजेंसी से काम पूरा करने और पंजाब को ज़मीन हवाले करने को कहा। इसी साल पंजाब सरकार ने पानी समझौते के सभी अनुबंध रद्द कर दिये। सन् 2017 में पंजाब सरकार ने एसवाईएल के लिए अधिग्रहीत भूमि वापस करने की अधिसूचना जारी कर दी, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। इसके बाद जगह-जगह नहर पाटने का काम शुरू हो गया।

“पंजाब को सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख़ टिप्पणी के बाद एसवाईएल निर्माण का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। यह नहर हरियाणा के लिए जीवनरेखा है और राज्य का पानी पर अपने हिस्सा का अधिकार भी है।”

मनोहर लाल

मुख्यमंत्री, हरियाणा

“पंजाब के पास अतिरिक्त पानी नहीं है। लिहाज़ा वह एक बूँद पानी दूसरे राज्यों को देने की स्थिति में नहीं है। पहले केंद्रीय ट्रिब्यूनल गठित करके पंजाब में पानी की स्थिति का पता लगाया जाए।”

भगवंत मान

मुख्यमंत्री, पंजाब

स्टेडियम की सुरक्षा पर करोड़ों ख़र्च!

आईसीसी वनडे वर्ल्ड कप-2023 के मद्देनज़र नरेंद्र मोदी स्टेडियम छावनी में तब्दील कर दिया गया है। स्टेडियम के अलावा अहमदाबाद शहर में सुरक्षा व्यवस्था मज़बूत की गयी है।

दरअसल नरेंद्र मोदी स्टेडियम में क्रिकेट मैच शुरू होने से पहले एक ईमेल से किसी अज्ञात व्यक्ति ने कथित तौर पर प्रधानमंत्री को बम से उड़ाने की धमकी दी थी। जानकारी के अनुसार, धमकी देने वाले ने ईमेल के ज़रिये कहा था कि भारत और पाकिस्तान के मैच के दौरान स्टेडियम को बम से उड़ा दिया जाएगा। ईमेल भेजने वाले अज्ञात शख़्स ने ऐसा न करने के एवज़ में सरकार से 500 करोड़ रुपये की माँग के अलावा जेल में बन्द गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई की रिहाई की माँग की है। हालाँकि पुलिस अभी यह पता नहीं लगा सकी है कि स्टेडियम को नुकसान पहुँचाने वाला कौन है? मामले की जाँच चल रही है। क़रीब 11 वर्षों बाद भारत और पाकिस्तान के बीच वनडे मुक़ाबला भारत में होगा, जिसके चलते इस महामुक़ाबले को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है।

इसके चलते स्टेडियम की सुरक्षा में करोड़ों रुपये का ख़र्च आना तय है; क्योंकि स्टेडियम की सुरक्षा के लिए क़रीब 3,000 पुलिसकर्मी, 500 होमगार्ड, तीन अतिरिक्त आयुक्त, 18 एसीपी, 13 डीसीपी समेत गुजरात पुलिस के कई आला अधिकारी तैनात किये गये हैं। कहा जा रहा है कि स्टेडियम की सुरक्षा के लिए पुलिस ने 70 डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर, 150 हैंड मेटल डिटेक्टर और तीन ड्रोन की तैनाती मैच देखने आने वालों की सुरक्षा जाँच के लिए की है। इसके साथ ही गुजरात पुलिस को सोशल मीडिया पर नज़र रखने के आदेश भी दिये गये हैं।

हालाँकि इस बात की साफ़ जानकारी सामने नहीं आ पा रही है कि कितनी बड़ी संख्या में नरेंद्र मोदी स्टेडियम की सुरक्षा के लिए जवान तैनात हैं? जब स्टेडियम को बम से उड़ाने की धमकी मिली थी, तब सुरक्षा की बात चली थी। उस समय अहमदाबाद पुलिस के कमिश्नर आईपीएस जी.एस. मलिक ने कहा था कि स्टेडियम की सुरक्षा के लिए अहमदाबाद पुलिस की तरफ़ से 7,000 पुलिस के जवान तैनात किये जाएँगे। इसके अलावा 4,000 होमगार्ड के जवान और दज़र्नों पुलिस अधिकारी मौज़ूद रहेंगे।

आईसीसी वनडे वर्ल्ड कप-2023 का पूरा मैच सुरक्षित तरीक़े से हो, इसके लिए एनएसजी की तीन टीमें और एंटी ड्रोन की एक टीम, बम डिस्पोजेबल स्क्वाड, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें भी तैनात हैं।

भारत में ये पहली बार है कि किसी खेल स्टेडियम की सुरक्षा में इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल और अधिकारियों की तैनाती की गयी है। इससे पहले मोदी स्टेडियम में पहला वनडे विश्वकप क्रिकेट मैच शुरू होने के चलते महीनों से चलने वाली तैयारियों में भी करोड़ों रुपये ख़र्च हुए हैं।

सामने आ रही ख़बरों के मुताबिक, मैच देखने के शौक़ीनों को स्टेडियम में गहन जाँच के बाद ही प्रवेश दिया जाएगा। इतना ही नहीं दर्शक अपने साथ पानी के बोतल, खाने-पीने की चीज़ें, बीड़ी, सिगरेट, माचिस, लाइटर, किसी भी तरह की गोपनीय और घातक चीज़ नहीं ले जा सकेंगे। इसके अलावा स्टेडियम में कोई दर्शक विवादास्पद बैनर नहीं ले जा सकेगा। पुरुष दर्शक अंदर सिर्फ़ मोबाइल और पर्स लेकर ही जा पा रहे हैं। वहीं महिला दर्शक मोबाइल, एक छोटा पर्स ही ले जा पा रही हैं। स्टेडियम के अंदर लोगों पर इस तरह की चीज़ें न ले जाने और उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी क्राइम ब्रांच को सौंपी गयी है।

नरेंद्र मोदी स्टेडियम का उद्घाटन मैच इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के बीच 5 अक्टूबर को हुआ था, जिसमें न्यूजीलैंड ने जीत हासिल की थी। 14 अक्टूबर को भारत और पाकिस्तान की क्रिकेट टीमों के बीच कड़ा मुक़ाबला हुआ, जिसके चलते इस स्टेडियम में भारी भीड़ जुटी। इसकी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अहमदाबाद पुलिस प्रशासन, राज्य सरकार और ट्रैफिक पुलिसकर्मी दिन-रात चौकसी बरती अहमदाबाद के संवेदनशील इलाक़ों में सुरक्षा व्यवस्था सबसे ज़्यादा कड़ी की गयी है। मैच सुचारू रूप से खेला जाए, इसके लिए स्टेडियम की सुरक्षा व्यवस्था पर पुलिस ड्रोन से नज़र रख रही है।

मैच देखने के लिए आने वालों में वीआईपी, वीवीआईपी तक शामिल रहेंगे, जिसके चलते उनके आसानी से प्रवेश की ख़ासतौर पर व्यवस्था की गयी है। इतना ही नहीं, क्रिकेट खिलाड़ी जिन होटलों में ठहरे हुए हैं, उन होटलों की सुरक्षा भी का$फी कड़ी है। खिलाड़ियों की सुरक्षा भी बढ़ा दी गयी है।

बता दें कि नरेंद्र मोदी स्टेडियम की दर्शक क्षमता क़रीब 1,32,000 लोगों के बैठने की है। आईसीसी वनडे वर्ल्ड कप 2023 मैच देखने वाले बड़ी संख्या में हर रोज़ स्टेडियम में आ रहे हैं। स्टेडियम में 15 पार्किंग हैं, जिन पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। पाकिस्तान और भारत के मैच वाले दिन दर्शकों के क्षमता से उम्मीद से का$फी ज़्यादा रही।

भारत-पाकिस्तान मैच की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी की मौज़ूदगी में उच्चस्तरीय बैठक करने के अलावा पुलिस के द्वारा की जा रही तैयारियों का जायज़ा ले चुके हैं। नरेंद्र मोदी स्टेडियम की सुरक्षा को लेकर लोग अब सवाल भी उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि एक स्टेडियम की सुरक्षा पर इतना ख़र्च किया जा रहा है। इसके लिए बड़ी संख्या में पुलिस तैनात की गयी है। लेकिन नागरिकों की सुरक्षा, बेटियों की सुरक्षा, ड्रग्स और शराब की तस्करी और अपराध रोकने के लिए सरकार पुलिस को इस तरह मुस्तैद नहीं करती है।

बदल गयी टीम इंडिया की ड्रेस

इसके साथ ही अब टीम इंडिया की ड्रेस भी बदल दी गयी है। अब तक किसी भी क्रिकेट मैच के लिए टीम इंडिया की ड्रेस नीली होती थी, जिस पर इंडिया लिखा रहता था। लेकिन अब सभी भारतीय खिलाड़ी और भारत की ओर से खेलने वाले विदेशी खिलाड़ियों को क्रिकेट और अन्य खेलों के लिए ऑनलाइन सट्टा खिलाने वाली एक कम्पनी ड्रीम-11 लिखी हुई भगवा ड्रेस भारत की ओर से मैच खेलने वाले खिलाड़ियों को पहननी पड़ रही है। सूत्रों के अनुसार ड्रीम-11 को भारतीय क्रिकेट टीम का अगले तीन वर्षों के लिए लीड स्पॉन्सर सौंपा गया है। यह वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप 2023-25 के चक्र में टीम इंडिया का पहला मैच है, जिसमें अचानक टीम इंडिया की ड्रेस को रिप्लेस करके उसे ड्रीम-11 की ड्रेस पहनायी जा रही है। ड्रीम-11 के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है।

बीसीसीआई अध्यक्ष रोजर बिन्नी ने ड्रीम-11 को बधाई दी है। उन्होंने कहा- ‘मैं ड्रीम-11 को बधाई देता हूँ और फिर से बोर्ड पर उसका स्वागत करता हूँ। बीसीसीआई के ऑफिशियल स्पॉन्सर से लेकर अब लीड स्पॉन्सर बनने तक, बीसीसीआई-ड्रीम-11 साझेदारी लगातार मज़बूत होती जा रही है। यह भारतीय क्रिकेट के विश्वास, मूल्य, क्षमता और विकास का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हम इस साल के अन्त में आईसीसी वर्ल्ड कप की मेज़बानी करने की तैयारी कर रहे हैं। दर्शकों के अनुभव को बढ़ाना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है और मुझे यक़ीन है कि यह साझेदारी हमें प्रशंसकों के जुड़ाव के अनुभव को बढ़ाने में मदद करेगी।

इस पार्टनरशिप पर ड्रीम स्पोर्ट्स के सह-संस्थापक और सीईओ हर्ष जैन ने कहा है- ‘बीसीसीआई और टीम इंडिया के लम्बे समय से साझेदार के रूप में ड्रीम-11 हमारी साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाने के लिए रोमांचित है। ड्रीम-11 में एक अरब भारतीय क्रिकेट प्रशंसक क्रिकेट के लिए अपना प्यार साझा करते हैं। नेशनल टीम के लिए लीड स्पॉन्सर बनना ड्रीम-11 के लिए गर्व की और हमारे लिए सौभाग्य की बात है। हम इंडियन स्पोर्ट्स इकोसिस्टम का समर्थन जारी रखने के लिए तत्पर हैं।

सवाल ये हैं कि क्या क्रिकेटर हमारे रोल मॉडल हैं? क्या क्रिकेटरों युवाओं के भविष्य की चिन्ता है? युवाओं को वे शिक्षा देते हैं? क्या क्रिकेट को इतनी प्राथमिकता सिर्फ़ पैसों के लिए दी जा रही है? मैचों में सट्टेबाज़ी से क्या युवा पीढ़ी बर्बाद नहीं हो रही है?

धार्मिक कौन है?

उपासना के तरीक़े,  आडम्बर, प्रथाएँ,   और रीतियाँ, ये सब धर्म नहीं हैं। ये पद्धतियाँ और उत्सवों के तरीक़े हैं। अज्ञानता यह है कि जिसने जिन पद्धतियों और उत्सवों को धारण कर लिया है, वह उन्हें धर्म समझने की भूल करने लगा है। और दुनिया में किताबी धर्मों के बन्धन में बँधे हुए अधिकतर लोग इसी भ्रम में पड़े हैं कि यही सब धर्म है। जबकि सच यह है कि असल धर्म को बिरले ही समझते हैं। असल धर्म का पालन करना आसान भी तो नहीं है। असल धर्म के कई रूप भी नहीं होते। वह तो एक ही है, जिसे मानवता अर्थात् इंसानियत कहते हैं। यही सही मायने में धर्म है, जो सबके लिए एक जैसे नियम बनाता है। और यह बहुत इसका पालन करना बहुत कठिन है। इस धर्म में स्वयं को दु:ख और दूसरों को सुख देना पड़ता है। दूसरों का स्पप्न में भी बुरा नहीं सोचा जा सकता। और अगर भूल से किसी का अहित हो जाए, तो उसके लिए क्षमा माँगते हुए प्रायश्चित करना पड़ता है। यह सब तथाकथित धर्मों के तथाकथित ठेकेदार ही नहीं करते, फिर साधारण लोग क्या करेंगे? इसलिए सब किताबों में बताये गये सरल धर्मों को मानते हैं। और उसमें भी जो बहुत आसानी से अमल में लाया जा सके, उसका पालन करते हैं। यही कारण है कि सभी धर्मों के अधिकतर लोग आडम्बरों में ही उलझे हुए दिखते हैं।

किसी शब्द, कर्म और प्रक्रिया का अर्थ और महत्त्व का पता न होने पर यही होता है। धर्म के मामले में भी यही हुआ है। दुनिया भर के लोगों की मान्यताओं वाले धर्मों में बढ़ते आडम्बरों, रीतियों, प्रथाओं और पाखण्ड के चलते लोग धर्म का अर्थ भी भूल चुके हैं। धर्म के निर्वहन का तरीक़ा भी भूल चुके हैं। इसीलिए किसी को अब धर्म का मर्म समझ में नहीं आता। आज दुनिया में बिरले ही लोग धर्म का सही मर्म पहचानते हैं। यही लोग धर्म के सही मार्ग पर हैं। ये लोग किसी की हत्या नहीं करते। किसी का बुरा नहीं सोचते। किसी का हिस्सा नहीं मारते। किसी के साथ अन्याय नहीं करते। किसी से जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते। सभी पर दया करते हैं। जीव-जन्तुओं पर भी इंसानों की तरह ही दयाभाव रखते हैं। अपनी मेहनत का फल दूसरों को देने में संकोच नहीं करते। ईमानदारी और सत्य के रास्ते पर चलते हैं। किसी की बुराई नहीं करते। सत्य में यदि आलोचना आवश्यक हो, तो डरते नहीं। चाहे सामने वाला राजा हो या गुण्डा। ताक़तवर हो या निर्बल।

आज ऐसे बिरले लोगों से पृथ्वी ख़ाली होती जा रही है। ऐसे असली धर्म के वाहकों की कमी होती जा रही है। इसलिए धरती पर अत्याचार, पाप, व्यभिचार, असम्मान बढ़ते जा रहे हैं और दया, प्यार, करुणा घटते जा रहे हैं। निर्बलों, असहायों के प्रति मदद की भावना समाप्त होती जा रही है। और यह तब तक नहीं हो सकता, जब तक लोग असली मानव धर्म को धारण नहीं करेंगे। असली धर्म के ये वाहक किसी भी कथित धर्म के हो सकते हैं। उन्हें जितना प्यार अपनों से होगा, उतना ही परायों से होगा।

ऐसे लोगों को उनकी वेशभूषा से नहीं, उनके व्यवहार से पहचाना जाता है। लोग क्यों नहीं समझते कि वेशभूषा, शरीर में ऊपरी बदलाव और उपासना पद्धतियाँ धर्म नहीं हैं। यह ठीक वैसे ही हैं, जैसे अपने-अपने ढंग से सभी जीवन जीते हैं; लेकिन जीते सभी जीवन ही हैं। खाना खाने का तरीक़ा सबका अलग-अलग है; लेकिन करते सभी भोजन ही हैं। कोई कैसी भी वेशभूषा धारण कर ले; लेकिन रहेगा इंसान ही। दुनिया में प्रचलन में जितने भी किताबी धर्म हैं, किसी ने धार्मिक दिखने के लिए कोई वेशभूषा या शारीरिक बनावट तय नहीं की है। पूजा पद्धतियाँ ज़रूर बतायी हैं। लेकिन हैं सब उस एक ईश्वर को पाने की कोशिशें ही। धीरे-धीरे इनमें विकृतियाँ आने लगीं। सब एक-दूसरे को जीवन जीने के तरीक़ों, वेशभूषा, शरीर की सजावट, संस्कृति, भाषा और खानपान के तौर-तरीक़ों से अलग-अलग मानने लगे और बँटने लगे।

लोगों के इस बँटने को मूर्खता नहीं कहेंगे, तो और क्या कहेंगे? क्या एक सभी को आपस में एक मानने के लिए एक धरती, एक सूरज, एक हवा, एक पानी, एक आकाश, एक ईश्वर काफ़ी नहीं है। फिर भी दुनिया में लोग क्षेत्रों, देशों, धर्मों, भाषाओं, विचारों और शिक्षाओं के आधार पर बँटे हुए हैं। इन बँटवारों के चलते जो भेदभाव लोगों के बीच बढ़ा है, वह ईर्ष्यापूर्ण है और सबसे ख़तरनाक होता जा रहा है। कहने को सभी धर्मों में दूसरों की मदद करने, किसी से घृर्णा न करने और परोपकार करने की बात कही गयी है। लेकिन सभी धर्मों के लोग इन शिक्षाओं से भटके हुए हैं और लड़ने-मरने पर आमादा हैं। फिर धर्म पर कौन है? इस सवाल का जवाब मानवता से भरे लोगों के बीच रहकर ही मिल सकता है। कथित धर्मों के नाम पर आडम्बर और पाखण्ड करने वालों के बीच तो कभी नहीं मिलेगा। मशहूर शायर अहमद फ़राज़ का एक शेर है-

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें।

मोदी सरकार का बड़ा ऐलान अब 23 अगस्त जाना जाएगा राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में

इसरो ने 23 अगस्त के मून मिशन चंद्रयान-3 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करवाकर इतिहास रचा था इसको लेकर मोदी सरकार ने बड़ा ऐलान किया है अब से 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

भारत सरकार ने नोटिफिकेशन जारी करते हुए कहा कि, “चंद्रयान-3 की 23 अगस्त को मिली सफलता और विक्रम लैंडर व प्रज्ञान रोवर के चांद पर उतरने के साथ ही भारत चांद पर पहुंचने वाला चौथा देश और साउथ पोल पर पहुंचने वाला पहला देश बन गया। इसलिए भारत सरकार हर साल की 23 अगस्त को बतौर राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में मनाने का ऐलान करती है।”

आपको बता दें, पिछले महीने की शुरुआत में ही विक्रम और प्रज्ञान को स्लीप मोड में डाल दिया था ताकि जब चांद पर रात खत्म हो तो 14 दिनों बाद फिर से उनके जगने की उम्मीद की जा सके। लेकिन ऐसा नहीं हुआ जब चंद्रमा पर सूर्य की रोशनी पहुंची और दिन हुआ तब भी प्रज्ञान और रोवर नहीं जागे। हालांकि इसको लेकर इसरो वैज्ञानिक निराश है।

अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत वर्सेस पाकिस्तान मैच जारी, बाबर पचास रन बनाकर आउट

आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप 2023 में शनिवार को इंडिया वर्सेस पाकिस्तान का बीच मुकाबला जारी है। आज का मैच अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में हो रहा है।

भारत ने टॉस जीतकर पाकिस्तान को पहले बल्लेबाजी का न्योता दिया है। भारत ने अपनी प्लेइंग इलेवन में सिर्फ एक बदलाव किया है। वही स्टार ओपनर शुभमन गिल की वापसी हो गई है। गिल का यह वनडे वर्ल्ड कप डेब्यू मैच है।

यदि बात पाकिस्तान की करे तो पाकिस्तान ने अपनी प्लेइंग इलेवन में कोई भी बदलाव नहीं किया है। पहले बल्लेबाजी करते हुए पाकिस्तान ने अच्छी शुरुआत की है। इमाम उल हक और अब्दुल्लाह शफीक के बीच पहले विकेट के लिए 41 रन की साझेदारी हुई।

मोहम्मद सिराज ने 8वें ओवर में शफीक को आउट करके इस साझेदारी को तोड़ा और अब्दुल्लाह ने 24 गेंद में 20 रन बनाकर आउट हो गए। पाकिस्तान का दूसरा विकेट 13वें ओवर में गिरा।