गाँधी जयंती पर बिहार द्वारा जारी किये गये जाति सर्वेक्षण में 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक कथानक को नया रूप देने की क्षमता है। 2024 के आम चुनाव से पहले विपक्ष द्वारा भाजपा की वैचारिक राजनीति पर पहचान की राजनीति करने के लिए यह एक ‘मेक या ब्रेक’ का हथकंडा लगता है।
‘तहलका’ के मौज़ूदा अंक की कवर स्टोरी इसी राजनीतिक गुगली पर केंद्रित है, जिसके कारण विभिन्न जातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में कई राज्यों में संशोधन के लिए जाति स्तर पर जनगणना की माँग अब उठने लगी है। राजस्थान पहले ही राज्य में राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने के लिए जाति सर्वेक्षण कराने की घोषणा कर चुका है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। जातिगत जनगणना का मुद्दा इन राज्यों में विमर्श को प्रभावित करने वाला है; क्योंकि यह सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लक्षित वितरण और कोटा के आधार पर शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण में आनुपातिक हिस्सेदारी की माँग को प्रभावित कर सकता है।
यह सब संभवत: तीन दशक से अधिक समय के बाद ‘मंडल-2.0’ राजनीति की शुरुआत का संकेत देने के क़रीब है। इससे पहले 7 अगस्त, 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने सन् 1980 के मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा की थी। जब सन् 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत कोटा के लिए 2019 के संविधान संशोधन को बरक़रार रखा, तो ओबीसी कोटे की सीमा बढ़ाने की माँग उठ रही थी। इस क़दम के निहितार्थ बहुत बड़े हैं; क्योंकि बिहार सर्वेक्षण के आँकड़ों ने राज्य में पिछड़े वर्गों की आबादी 63.13 प्रतिशत बतायी है। सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार, जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें राजस्थान में ओबीसी की आबादी 42 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 48 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 43.5 प्रतिशत है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सभी राजनीतिक दल ओबीसी की आवाज़ उठा रहे हैं।
सरकारी योजनाओं के पिछड़े लाभार्थियों और भगवा पार्टी में ओबीसी को राजनीतिक स्थान देने के आँकड़ों को सामने रखकर सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष के ओबीसी आन्दोलन का जवाब देने की योजना बनायी है और कहा है कि जहाँ तक भाजपा का सवाल है, उसके 29 प्रतिशत सांसद और उसके क़रीब 40 प्रतिशत विधायक और विधान परिषद् सदस्य ओबीसी हैं। इसी तरह 75 केंद्रीय मंत्रिपरिषद् में से 27 ओबीसी हैं।
हाल तक सभी दलों और राज्यों में जनकल्याणवाद एक आम विषय के रूप में उभरा था; लेकिन जातिगत जनगणना लोगों को मुफ़्त उपहार देने वाली पार्टियों से ध्यान हटाकर उन्हें और विभाजित कर सकती है। अब तक जाति सर्वेक्षण की माँग राजनीतिक और सामाजिक रूप से अस्थिर आबादी में एक और असंतोष पैदा करने के समान प्रतीत होती है। विचार यह होना चाहिए कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य की सेवा की जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लाभ क्रीमी लेयर तक सीमित रहने के बजाय समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुँचे। और दरारें पैदा करने के बजाय समावेशी लोक कल्याण सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर ज़ोर हो।
कांग्रेस की जाति जनगणना की माँग भाजपा के लिए बनी चुनौती
भले ही लोकसभा चुनाव होने में अभी कुछ महीने हैं; लेकिन देश में अचानक निर्णायक से दिखने वाले मुद्दे सामने आ गये हैं। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा कांग्रेस और उसके इण्डिया गठबंधन सहयोगियों की तरफ़ से जाति जनगणना करवाकर आबादी के हिसाब से सामाजिक न्याय देने की माँग करना है। इसने नब्बे के दशक के मंडल आन्दोलन और भाजपा की तरफ़ से कमंडल (हिन्दुत्व) की राजनीति सामने लाने की याद ताज़ा कर दी है। तो क्या अगला चुनाव मंडल-2.0 के मुद्दे पर लड़ा जाएगा? बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार राकेश रॉकी :-
अस्सी के दशक के आख़िरी साल थे। तब एक नारा बड़ी तेज़ी से गूँजा था- ‘राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है।’ राजा थे- कांग्रेस से बग़ावत करके आये विश्वनाथ प्रताप सिंह। वी.पी. सिंह बोफोर्स में राजीव गाँधी सरकार पर रिश्वतख़ोरी के आरोपों के बाद मंत्री पद छोड़कर साफ़-सुथरी छवि के साथ सन् 1989 में नये राजनीतिक दल के साथ चुनाव में उतरे और प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पिछड़ों को आरक्षण देने से जुड़ी मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को लागू करने का फ़ैसला किया, जिसने देश की राजनीति में बहुत कुछ बदल दिया। देश के उच्च जाति वर्ग ने उनकी आलोचना की। लेकिन सिंह ने तब कहा था कि सामाजिक परिवर्तन का यह अभी सेमीफाइनल ही है। हो सकता है, फाइनल मेरे बाद हो बाद हो। उनके इन शब्दों के क़रीब 23 साल बाद सामाजिक अधिकार का नारा देश की राजनीतिक फ़िज़ाओं में फिर गूँजा है, जिसकी धार काफ़ी तेज़ लगती है।
तो क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में मंडल नये रूप में चुनाव का मुख्य मुद्दा बनने जा रहा है और इस बार इसका फाइनल होगा? क्या भाजपा इसकी काट के लिए कमंडल को नये रूप में सामने लाएगी? आज़ादी के बाद से भारत ने केवल सन् 2011 में सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) के माध्यम से जाति-गणना की है। भाजपा सरकार ने 2015 में इसकी रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया था।
अगर जाति जनगणना होती है, तो भाजपा पर विकट पड़ेगा और उसे कोई स्टैंड लेना पड़ेगा। अगर वह विरोध करती है, तो ओबीसी के ख़िलाफ़ मानी जाएगी। कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक को पाने के लिए हर सम्भव कोशिश कर रही है। पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक कांग्रेस के पुराने वोटर हैं। कांग्रेस सबसे ज़्यादा इन वर्गों के मुद्दे उठा रही है। याद रहे कांग्रेस ने यह स्टैंड अब अचानक नहीं लिया है, बल्कि पिछले साल ही ले लिया था, जब अभी विपक्ष का इंडिया गठबंधन नहीं बना था।
नीतीश सरकार के जातिगत सर्वे के मुताबिक, बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01 फ़ीसदी और पिछड़ा वर्ग 27.12 फ़ीसदी है, जो सबसे ज़्यादा हैं। अनुसूचित जाति 19.65, अनारक्षित (सवर्ण जातियाँ) क़रीब 15.52 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति 1.68 फ़ीसदी हैं। राज्य में हिन्दू क़रीब 82 फ़ीसदी, जबकि मुस्लिम 17.7 हैं। भाजपा के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सीडब्ल्यूसी की बैठक में प्रस्ताव पास करके जातिगत जनगणना की माँग की है। यही नहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी ने दो दिन बाद ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके घोषणा की कि सभी कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जातिगत जनगणना करेंगी। राहुल ने यह बात कुछ इस तरीक़े से कही कि उच्च जातियाँ भी नाराज़ न हों। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सामाजिक न्याय की माँग कर रही है और वह किसी जाति विशेष के ख़िलाफ़ नहीं है। इससे पहले बिहार सरकार ने जाति जनगणना के आँकड़े जारी करके देश की राजनीति में हंगामा मचा दिया। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा भी इससे भौंचक रह गयी। इससे पहले मोदी सरकार ने जब महिला आरक्षण बिल संसद में पास करवाया था, तो ओबीसी महिलाओं को कोटे में शामिल नहीं किया।
देश की राजनीति में अब दो $खेमे बन गये हैं। एक भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए, जो जातिगत जनगणना के हक़ में अभी तक नहीं बोला है। दूसरा कांग्रेस के अघोषित नेतृत्व वाला इंडिया गठबंधन, जो इसके हक़ में लगातार बोल रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी दो क़दम आगे जाकर सत्ता में आने पर आर्थिक सर्वे करवाने की बात भी कह चुके हैं। अर्थात् ऊँची जातियों में ग़रीबी रेखा वालों को भी आरक्षण की। जातिगत जनगणना को लेकर देश में दो पक्ष हैं। एक पक्ष का दावा है कि ऐसा करने से समाज में जातिगत खटास बढ़ेगी। कांग्रेस और दूसरे पक्ष का कहना है कि सामाजिक न्याय के लिए ऐसा करना ज़रूरी है।
बदल रही है राजनीति
सन् 2014 से 2022 तक देश की राजनीति में भाजपा एकतरफ़ा सर्वोपरि थी। राजनीति से लेकर चुनावों तक का एजेंडा भाजपा तय कर रही थी। लेकिन 2022 में पहली बार चीज़ें तब बदलनी शुरू हुईं, जब कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने क़रीब 4,000 किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा शुरू की। भाजपा ने शुरू में राहुल गाँधी का मज़ाक़ उड़ाया। लेकिन राहुल इस आलोचना से विचलित हुए बिना राज्य-दर-राज्य पैदल यात्रा करते चले गये और जनता से मिलते रहे, जिससे भाजपा ही विचलित हो गयी। पार्टी के नेताओं की भाषा में यह साफ़ दिखने लगा था और यात्रा के लिए राहुल गाँधी की हो रही तारीफ़ को वे सहन नहीं कर पा रहे थे।
यात्रा के दौरान हुए चुनावों में कांग्रेस को हिमाचल में भाजपा को हराने में सफलता मिली। इस साल मई में कर्नाटक में भी कांग्रेस ने भाजपा को मात दी। इससे भाजपा दक्षिण में कमज़ोर दिखने लगी है। मणिपुर की घटनाओं का नुक़सान उसे पूर्वोत्तर में भी हो सकता है। हिन्दी पट्टी में भाजपा ख़ुद को मज़बूत मान रही थी; लेकिन कांग्रेस (इंडिया गठबंधन) ने जातिगत जनगणना और उसके अनुपात मे हिस्सा देने की बात करके उसे संकट में डाल दिया। कांग्रेस जातिगत जनगणना के मुद्दे को आम जनता तक ले जाने में सफल रही, तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को रक्षात्मक होना पड़ सकता है। एनडीए के घटक दल बेचैनी महसूस करते हैं, तो भाजपा का साथ छोड़ सकते हैं। वैसे भी तमिलनाडु में एआईएडीएमके जैसा दल भाजपा से छिटक चुका है। हाल के वर्षों में कांग्रेस से भाजपा में गये कुछ नेताओं को वहाँ सम्मान नहीं मिला है, जो वापसी कर सकते हैं। मध्य प्रदेश में ऐसा बड़े पैमाने पर दिखा है। चूँकि जातिगत जनगणना का मुद्दा इंडिया गठबंधन ने पाँच राज्यों के चुनाव से ऐन पहले उठा दिया है, तो इसका असर आगामी चुनावों में होगा ही।
क्या करेगी भाजपा?
यदि कांग्रेस और विपक्ष ने जातिगत जनगणना को मंडल की तर्ज पर बड़ा मुद्दा बना दिया, तो भाजपा क्या करेगी? यह बड़ा राजनीतिक सवाल है। क्या नब्बे के दशक के शुरू में मंडल की काट के लिए भाजपा ने जिस तरह कमंडल शुरू किया था, वैसा ही कुछ इस बार करेगी? कर सकती है। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि हाल के तीन वर्षों में भाजपा ने राज्यों (पश्चिम बंगाल, हिमाचल और कर्नाटक) के चुनाव में बड़े पैमाने पर हिन्दुत्व को मुद्दा बनाने की कोशिश की; लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हाल में सनातन को लेकर राज्य स्तरीय नेताओं, जो इण्डिया गठबंधन से जुड़े हैं; ने कुछ विवादित टिप्पणियाँ कीं, तो भाजपा ने इसे उठाने की बहुत कोशिश की। लेकिन यह मुद्दा जल्दी ही ठंडा भी पड़ गया। इसके बावजूद भाजपा के पास आज भी हिन्दुत्व ही सबके ताक़तवर मुद्दा है, जिसे वह उग्र राष्ट्रवाद से जोड़कर धारदार बनाने की कोशिश करेगी। विपक्ष के नेता यह बात जानते हैं।
हाल के दिनों में कांग्रेस या विपक्ष के नेताओं ने बार-बार आशंका जतायी है कि हार देखकर भाजपा धर्म से जुड़ा कुछ कांड करवा सकती है। इन नेताओं की आशंका के मुताबिक, भाजपा राम मंदिर के उद्घाटन के समय या उस समय के दौरान कुछ ऐसा कर सकती है, जिससे धार्मिक भावनाएँ भड़क जाएँ और इससे पैदा हुए ध्रुवीकरण का उसे लाभ मिल सके। यह विपक्ष की आशंकाएँ हैं। लिहाज़ा इस पर टिप्पणी नहीं की जा सकती। कुछ लोगों को यह भी लगता है कि मोदी सरकार चुनाव से कुछ महीने पहले पीओके स्थित पाकिस्तान समर्थित आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कुछ ऑपरेशन कर सकती है, जिस पर विपक्ष उस समय मजबूरी में कोई सवाल नहीं उठा पाएगा; भले यह चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया हो। भाजपा अब चुनावों का एजेंडा तय नहीं कर पा रही है। विपक्ष, ख़ासकर कांग्रेस कर रही है। कर्नाटक में उसने भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बना दिया था। भाजपा और उसके सबसे बड़ा चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पूरी कोशिश के बावजूद इसे तोड़ नहीं पाये। भाजपा की दि$क्क़त यह है कि उसे अभी भी मोदी के चेहरे पर ही चुनाव में जाना है। विधानसभा चुनावों में भी और अगले लोकसभा चुनाव में भी। भाजपा ने आधिकारिक रूप से मोदी को चेहरा घोषित किया हो या नहीं, ख़ुद मोदी हरेक जनसभा में अपने नाम (जैसे- यह मोदी की गारंटी है; या मोदी जो कहता है, वह करके दिखाता है।) को स्वघोषित करते हैं। सम्भवत: देश के किसी भी राजनीतिक दल के इतिहास में वह अकेले नेता हैं, जो पार्टी की जगह ख़ुद ही ख़ुद को इस तरह प्रचारित करते हैं।
इम्तिहान का समय
पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव से पहले ही देश में उभर रहे मुद्दों का इम्तिहान हो जाएगा। जनादेश से दो सवालों के जवाब मिलेंगे। एक- देश में मंडल राजनीति (जातिगत जनगणना की माँग) को पंख लग सकते हैं या नहीं। दो- क्या देश में महिला सशक्तिकरण को आधार मानकर (मोदी सरकार का महिला आरक्षण क़ानून) वाक़ई आधी आबादी का कोई वोट बैंक बनाया जा सकता है! इनमें से जो भी मुद्दा चलेगा, तय है वह लोकसभा चुनाव का भी बड़ा मुद्दा होगा। यहाँ यह बात महत्त्वपूर्ण है कि पिछड़ों को सामाजिक न्याय और राजनीति में 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण दोनों ही मामलों में पक्ष-विपक्ष हैं। जैसे महिला आरक्षण सिर्फ़ राजनीति के लिए है, इससे आम महिला का सीधे कोई आर्थिक / सामाजिक कल्याण नहीं होगा। सब जानते हैं कि हमारे देश में राजनीति में आने और टिकट पाने के आम या ग़रीब ग़रीब महिलाओं के पास सीमित ही अवसर हैं; क्योंकि यह पैसे का खेल बना दिया गया है। जहाँ तक पिछड़ों की राजनीति करने की बात है, इससे अगड़ी जातियों की नाराज़गी का नुक़सान सहना पड़ सकता है। भले वोटों की दृष्टि से पिछड़ों की संख्या कहीं ज़्यादा है।
सन् 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भाजपा ने राष्ट्रवाद-हिन्दुत्व का चुनावों में $खूब इस्तेमाल किया है। इसमें भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी अपनी सरकार के विकास का तड़का भी लगाते रहे हैं। याद करें, तो हाल के 10 साल के दौरान कांग्रेस के सर्वमान्य नेता राहुल गाँधी शुद्ध रूप से विकास, किसानों और बेरोज़गारों की बात प्रमुखता से करते रहे हैं। अब उन्होंने इसमें जातिगत जनगणना को भी प्रमुखता से जोड़ दिया है। अभी तक जब वह पिछड़ों और दबे-कुचलों की बात करते थे, तो उसमें राजनीतिक आक्रामकता नहीं आ पाती थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने जातिगत जनगणना की बात की, यह रातोंरात एक बड़ा मुद्दा बन गया। इस मसले पर विपक्षी गठबंधन इंडिया के तमाम सहयोगी उनके साथ खड़े दिखते हैं। कांग्रेस और इण्डिया गठबंधन सत्ता में आते ही माँग करते हुए यह का वादा पूरा करेंगे। महिला आरक्षण में ओबीसी कोटे की माँग कांग्रेस और उसकी नेता सोनिया गाँधी संसद में कर चुकी हैं। नीतीश कुमार, लालू यादव की पार्टियाँ भी इसके समर्थन में हैं। ज़ाहिर है कांग्रेस की यह रणनीति भाजपा के हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का मुक़ाबला करने के लिए है। राज्यों के नतीजे मंडल-2.0 के ज़रिये सामाजिक न्याय देने के विपक्ष के हथियार की धार कितनी है? यह नतीजे बता देंगे।
इसमें कोई दो-राय नहीं कि मंडल-2.0 सामने आने से भाजपा चिन्तित हुई है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के नेता हैं, जहाँ जाति का सवाल हर चुनाव में अहम रहता है। भाजपा मानती है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में उसने 224 सीटों पर 50 फ़ीसदी से अधिक वोट हासिल किये थे और वहाँ चूँकि जाति अहम मुद्दा रहता है। लिहाज़ा कांग्रेस या विपक्ष का मंडल-दो 50 फ़ीसदी के अंतर को पार नहीं कर पाएगा। दूसरे भाजपा को लगता है कि देश की राजनीति में नब्बे के दशक के विपरीत आज ओबीसी वर्ग आरक्षण का लाभ उठा रहा है। लिहाज़ा यह मुद्दा चुनाव का बड़ा मुद्दा नहीं बन पाएगा।
आबादी के हिसाब से अवसर
यहाँ यह बताना महत्त्वपूर्ण है कि कांग्रेस जाति जनगणना की बात कर रही है, तो यह आरक्षण तक सीमित नहीं है; बल्कि यह आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व देने के लिए है। ज़ाहिर है नौकरियों और अन्य जगह आबादी के हिसाब से जगह मिलने की बात छोटी चीज़ नहीं है और यह इन तबक़ों में राजनीतिक समर्थन का कारण बन सकता है। देश में केंद्र से लेकर राज्यों में आज भी कथित उच्च जातियों के अफ़सरों का प्रभुत्व है। केंद्रीय सचिवालय में निचली जातियों से नाम मात्र ही अधिकारी मिलेंगे और यही हाल राज्यों में भी है।
सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए जब मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के आधार पर पिछड़ों को 27 फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला हुआ था, तब तक तस्वीर काफ़ी ख़राब थी। यदि आबादी के हिसाब से अब अवसर मिला, तो भला पिछड़ी जातियों के लोग इसे क्यों छोड़ेंगे? ज़ाहिर है यह मुद्दा देश की राजनीतिक और प्रशासनिक तस्वीर बदलने की क़ुव्वत रखता है। अभी तक भारत सरकार ने पिछड़े समुदायों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक / भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक और निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों और सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की हुई है।
संसद में भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है। उच्च शिक्षा में 27 फ़ीसदी आरक्षण है। यह प्रावधान है कि राज्य आरक्षणों में वृद्धि के लिए क़ानून बना सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के अनुसार, 50 फ़ीसदी से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता; लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने 68 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अगड़ी जातियों के लिए भी 14 फ़ीसदी आरक्षण शामिल है। आम आबादी में संख्यानुपात के आधार पर उनके बहुत ही कम प्रतिनिधित्व को देखते हुए शैक्षणिक परिसरों और कार्यस्थलों में सामाजिक विविधता को बढ़ाने के लिए कुछ समूहों के लिए प्रवेश मानदण्ड को नीचे किया गया है। कम-प्रतिनिधित्व समूहों की पहचान के लिए सबसे पुराना मानदण्ड जाति है। हालाँकि भारत सरकार ने प्रायोजित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, कम-प्रतिनिधित्व के अन्य मानदण्ड भी हैं; जैसे कि लिंग (महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है), अधिवास के राज्य (उत्तर पूर्व राज्य, जैसे कि बिहार और उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कम है), ग्रामीण जनता आदि।
स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान ने पहले के कुछ समूहों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया। संविधान निर्माताओं का मानना था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान और समान अवसर नहीं दिया गया और इसलिए राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी कम रही। संविधान ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की ख़ाली सीटों और सरकारी / सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में इन वर्गों के लिए क्रमश: 15 और 7.5 फ़ीसदी का आरक्षण था। बाद में अन्य वर्गों के लिए भी आरक्षण शुरू किया गया। चूँकि 50 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षण नहीं हो सकता, सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले से (जिसका मानना है कि इससे समान अभिगम की संविधान की गारण्टी का उल्लंघन होगा) आरक्षण की अधिकतम सीमा तय हो गयी। हालाँकि राज्य क़ानूनों ने इस 50 फ़ीसदी की सीमा को पार किया है और इससे जुड़े मामले सर्वोच्च न्यायलय में लंबित हैं। उदाहरण के लिए जाति-आधारित आरक्षण भाग 69 फ़ीसदी है और तमिलनाडु की क़रीब 87 फ़ीसदी जनसंख्या पर यह लागू होता है।
पाँच राज्यों के नतीजे तय करेंगे भविष्य
इस साल के विधानसभा चुनावी दंगल का ऐलान हो गया है। वैसे यह हैरानी की बात है कि एक राष्ट्र-एक चुनाव की जब बात हो रही है, तो पाँच राज्यों का चुनाव ही एक महीने में होंगे। विधानसभा चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं, जब देश में जातिगत सर्वे की माँग ज़ोर पकड़ चुकी है। राजस्थान में कांग्रेस सरकार बिहार की तर्ज पर जातिगत सर्वे का आदेश जारी कर दिया है, जबकि मध्य प्रदेश में इसका वादा कर चुकी है। भाजपा कांग्रेस पर समाज को बाँटने का आरोप लगा रही है। लेकिन तय है कि पाँच राज्यों के चुनाव नतीजे जातिगत सर्वे पर जनमत संग्रह माने जाएँगे। यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की भी परीक्षा होगी।
इण्डिया गठबंधन बनने के बाद कांग्रेस के लिए यह पहली सबसे बड़ी परीक्षा है; क्योंकि इन राज्यों में उसी की तरफ़ से भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती होगी। विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस की हिस्सेदारी और भूमिका भी इन्हीं चुनाव नतीजों से तय होगी। कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया तो विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस ही नहीं राहुल गाँधी के नेतृत्व पर भी अघोषित मुहर लग जाएगी। यदि कांग्रेस हारी, तो सीट शेयरिंग में उसका दावा कमज़ोर होगा। नतीजे कई दिग्गजों के लिए भी निर्णायक होंगे। इनमें अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और कमलनाथ प्रमुख हैं।
इन राज्यों में 2018 में भाजपा को करारी हार मिली थी। हालाँकि बाद में मध्य प्रदेश में भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के दल बदल के बूते कांग्रेस सरकार गिराकर अपनी सरकार बना ली थी। मध्य प्रदेश में भाजपा काफ़ी रक्षात्मक दिख रही है। दबाव में उसने केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को मैदान में उतार दिया है। चुनाव सर्वे भी चिन्ता बढ़ा रहे हैं, जबकि कांग्रेस विश्वास से भरी दिख रही है। इस चुनाव में कांग्रेस से भाजपा में दलबदल करके गये ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति भी दाँव पर लगी दिख रही है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी जान योजनाओं के बूते जीत के प्रति भरोसा जाता रहे हैं; लेकिन कांग्रेस के लिए सम्भवत: सबसे कठिन मुक़ाबला इसी राज्य में होगा। वहाँ सचिन पायलट से गहलोत से खटपट रही है। भाजपा में भी स्थिति बहुत सुखद नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को किनारे किया गया, तो भाजपा के लिए वह विभीषण साबित हो सकती हैं।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के मज़बूत मुख्यमंत्री भूपेश भगेल के सामने भाजपा का कोई मज़बूत चेहरा नहीं। वहाँ भी राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह भाजपा किसी स्थानीय चेहरे नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर ही चुनाव में उतर रही है। राज्य का चुनाव भाजपा के लिए काफ़ी कठिन चुनौती है। तेलंगाना का चुनाव इस बार राष्ट्रीय संदेश देकर जाएगा। कांग्रेस वहाँ उभर रही है, इसके संकेत मिल रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या वह केसीआर को जीत के हैट्रिक लगाने से रोक पाएगी? कांग्रेस $खेमे में जबरदस्त उत्साह दिख रहा है। राहुल गाँधी से लेकर प्रियंका गाँधी तक वहाँ बड़ी जनसभाएँ कर चुके हैं। यहाँ भाजपा के दक्षिण में पैर पसारने के दावों का मुश्किल इम्तिहान है। मिजोरम में चुनाव मणिपुर के बेहद ख़राब हालात के बीच हो रहे हैं, जहाँ भाजपा की सरकार है। कांग्रेस उभार पर दिख रही है और उसका मुक़ाबला मिजो नेशनल फ्रंट से होगा। भाजपा राज्य में कहीं नहीं दिख रही।
कांग्रेस का फ़ैसला
क्या कांग्रेस आने वाले समय में आर्थिक जनगणना करके आर्थिक आधार पर भी आरक्षण देने को अपने चुनाव घोषणा-पत्र में डालने वाली है? इस पत्रकार की जानकारी के मुताबिक, वह ऐसा कर सकती है। पार्टी नेता राहुल गाँधी ने भी हाल की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसका संकेत दिया है। राहुल गाँधी ने यह भी घोषणा की कि सभी कांग्रेस शासित राज्य जाति जनगणना करने जा रहे हैं। गाँधी ने कहा कि पार्टी की कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) ने जाति आधारित जनगणना के विचार के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय किया है। कार्य समिति की बैठक के बाद राहुल ने कहा- ‘विपक्षी गठबंधन इंडिया के ज़्यादातर घटक दल जाति आधारित जनगणना के पक्ष में हैं। कार्य समिति ने एक ऐतिहासिक निर्णय में सबकी सहमति से जाति आधारित जनगणना के विचार का समर्थन करने का फ़ैसला किया। कांग्रेस जाति जनगणना के लिए भाजपा पर पुरज़ोर दबाव बनाएगी।’
राहुल ने साफ़ किया कि यह राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि न्याय का निर्णय है। राहुल गाँधी ने जो बड़ी बात कही थी, वह आर्थिक जनगणना का समर्थन है। इससे पहले सीडब्ल्यूसी की बैठक में पारित प्रस्ताव में जातिगत जनगणना की माँग उठायी गयी और कहा गया कि अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) के लिए आरक्षण की मौज़ूदा अधिकतम सीमा बढ़ायी जाए। बैठक के बाद 14 सूत्री प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें महँगाई, बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था की स्थिति, किसानों की समस्याओं, चीन के साथ सीमा विवाद, अडाणी समूह से जुड़े मामले तथा कई अन्य मुद्दों का उल्लेख किया गया था।
रोहिणी आयोग की रिपोर्ट
याद रहे इसी साल अगस्त में ओबीसी के उप-वर्गीकरण की जाँच के लिए गठित जी. रोहिणी आयोग ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। आयोग पर यह ज़िम्मा था कि ओबीसी के लिए आरक्षण और अन्य लाभ किस हद तक प्रमुख जाति समूहों के बीच केंद्रित हैं। भाजपा का मानना है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में पिछड़े समुदायों के बीच प्रमुख जातियाँ लाभ का एक बड़ा हिस्सा हड़प रही हैं।
आयोग को ओबीसी सूची में 2,600 से अधिक जाति समूहों के विभाजन का सुझाव देने के लिए कहा गया था, ताकि इन लाभों को समान रूप से पुनर्वितरित किया जा सके। रिपोर्ट पर कोई अंतिम फ़ैसला नहीं हुआ है। दिलचस्प यह है कि आयोग में आरएसएस के बुद्धिजीवी जे.के. भी शामिल हैं। उन्होंने नब्बे के दशक और बाद में 21वीं सदी के पहले दशक में राष्ट्रीय जाति जनगणना का विरोध किया था। हालाँकि सन् 2018 में केंद्र सरकार ने जाति-आधारित जनगणना का समर्थन किया। लेकिन जुलाई, 2021 में सरकार ने लोकसभा को सूचित किया कि सन् 2021 की जनगणना में जाति गणना नहीं होगी। महामारी के कारण सन् 2021 में भी जनगणना नहीं हुई; और अब यह 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद ही हो सकती है।
अडानी के पोर्ट पर ड्रग्स पकड़ी गयी, कुछ नहीं हुआ। नये नियम बनाकर कई हवाई अड्डे सौंप दिये गये। दबाव बनाकर कई तरह के लाभकारी ठेके दिलवाये गये। सरकारी संस्थानों को घाटे में दिखाकर बेच दिया गया, कोई जाँच नहीं हुई। लेकिन किसी दूसरी पार्टी की सरकार ने नयी शराब नीति बनाकर चंद ठेके दे दिये, तो जाँच और गिरफ़्तारियाँ होने लगीं। एक बड़ी पार्टी के यहाँ किसी भी तरह से पैसा आये, तो वह ठीक है। लेकिन दूसरी किसी पार्टी को कोई चंदा मिले, तो यह मनी लॉन्ड्रिंग है। मुक़दमा सिर्फ़ लेने वाले पर नहीं, देने वाले पर भी बनेगा। गवाह भी आरोपी को ही बना लिया जाएगा। गवाह के एक बयान पर किसी को भी उठा लिया जाएगा। लेकिन वहीं केंद्र की सत्ता में मंत्रियों पर रेप और पॉक्सो जैसे मामलों में भी कुछ नहीं होगा। पीड़ित भले ही प्रतिष्ठित ही क्यों न हो, पुलिस केस दर्ज नहीं करती। यह कोई आरोप या पक्षपात नहीं, बल्कि आजकल जो चल रहा है, उसी की बात हो रही है।
साफ़ है कि भारत सरकार किसी को भी नया नियम बनाकर लाभ पहुँचा सकती है। लेकिन अन्य कोई सरकार ऐसा करेगी, तो उसके मंत्रियों और उसकी पार्टी के नेताओं को जेल जाना पड़ेगा। क्योंकि अब सरकार की सोच है कि हम ईमानदार हैं और सब बेईमान हैं। विपक्षी सरकारों की सारी योजनाओं में भ्रष्टाचार है और हम वॉशिंग मशीन, जिसके अंदर आते ही सारे दाग़ धुल जाते हैं। क्योंकि हम राष्ट्रवादी हैं, और सब देशद्रोही। शायद इसी को ही राजनीति कहते हैं। अगर हम गिर रहे, तो तुम्हें भी ले डूबेंगे। मौज़ूदा दौर की राजनीतिक उठापटक यही कहती है। जिस तरह से पत्रकारों और विपक्षी नेताओं को जाँच एजेंसियों के ज़रिये निशाना बनाया जा रहा है और सत्ताधारी पार्टी में भ्रष्टाचार को लेकर $खामोशी है, उससे सवाल उठने लाज़िम हैं। सरकार यह नहीं चाहती कि कोई उसके ख़िलाफ़ बोले। क्योंकि वह जो कर रही है, बिलकुल सही कर रही है और देश को ऐसी ही सरकार की दरकार है। उद्योगपतियों का सारा चुनावी चंदा भी सिर्फ़ उसी को मिले और वह अपने धुआंधार प्रचार के ज़रिये सरकार बनाती रहे और सत्ता की मलाई सिर्फ़ मौज़ूदा ताक़तवरों की थाली में ही रहे। देश की जनता को उन्हें ही वोट देने की मजबूरी बना दी जाए, ऐसी तमाम कोशिशें की जा रही हैं। इन कोशिशों के ज़रिये क्या देश निरंकुश शासन की ओर नहीं बढ़ रहा है? जिसमें लोकतंत्र की जगह एक तंत्र हावी हो रहा है।
फरवरी, 2023 में जब मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी हुई थी, तभी प्रधानमंत्री को विपक्ष के आठ बड़े दलों के नौ नेताओं ने पत्र लिखकर ईडी की कार्रवाई पर चिन्ता जतायी थी। लेकिन इस तरह की कार्रवाई रुकने के बजाय और तेज़ी से आगे बढ़ रही है। परिणाम यह निकला कि न्यूज क्लिक के तफ़्तर पर छापे के बाद 4 अक्टूबर को पत्रकारों के 18 संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा कि पत्रकार देश के क़ानून से ऊपर नहीं हैं। किसी मामले में उनके लिए भी वही क़ायदे-क़ानून लागू होते हैं, जो अन्य नागरिकों पर लागू होते हैं। लेकिन हम पत्रकारों की अपील है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दख़ल देकर अकारण प्रताड़ित करने वाली कार्रवाई से पत्रकारों को बचाए, जिससे हम अपना काम बिना डर के ठीक से कर सकें। साथ ही यह भी लिखा कि आप जल्दी क़दम उठाएँ, नहीं तो देरी हो जाएगी और हालात और बिगड़ते चले जाएँगे।
देखा जाए, तो पिछले नौ वर्षों से बेधड़क उन पत्रकारों, नेताओं सहित उद्योगपतियों के पीछे जाँच एजेंसियों को छोड़ा जा रहा है, जो सरकार के पक्ष में नहीं हैं। जैसे ही कोई नेता या उद्योगपति सरकार के ख़ेमे में शामिल होता है, वह पाक-साफ़ हो जाता है। इस बात की प्रतिपुष्टि एक मीडिया रिपोर्ट के ज़रिये भी हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले आठ साल में ईडी के छापों में 27 गुना बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी होना कोई बड़ी बात नहीं है; लेकिन जिस तरह से छापेमारी और गिरफ़्तारियाँ की जा रही हैं, उससे ईडी और सरकार सवालों के घेरे में है। 2004 और 2014 के बीच कांग्रेस की सरकार में ईडी ने 112 जगह दबिश दी और 5,346 करोड़ की सम्पत्ति ज़ब्त की थी। वहीं भाजपा सरकार के नौ वर्षों में ईडी ने 3,010 जगहों पर छापेमारी की और कुल एक लाख करोड़ की सम्पत्ति अटैच की। इनमें यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि सम्पत्ति सिर्फ़ अटैच की गयी है। कितनी ज़ब्त की गयी? इसकी जानकारी नहीं मिल पायी है। डेटा के मुताबिक, नौ वर्षों में ईडी सिर्फ़ नौ मामलों में ही आरोपियों को ही दोषी सिद्ध कर पायी है। ये नौ मामले काफ़ी छोटे प्रोफाइल थे। इससे साफ़ है कि ईडी के छापे महज़ लोगों को डराने-धमकाने और परेशान करने के लिए किये गये। रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि पहले के मुक़ाबले चार गुना ज़्यादा मामले राजनीतिक दलों के ऊपर बढ़े हैं। इन नौ वर्षों में बड़े नेताओं पर 221 मामले ईडी के पास हैं। इनमें 115 मामले विपक्षी दलों के ऊपर हैं। यानी 95 फ़ीसदी मामले विपक्षी दलों के नेताओं के ऊपर हैं। इससे साफ़ पता चलता है कि सरकार ईडी और सीबीआई के ज़रिये देश को एक अच्छा संदेश देने के बजाय नेताओं, पत्रकारों सहित उद्योगपतियों को भी डराने का काम कर ही है।
दिल्ली में नयी शराब नीति में कथित घोटाले को लेकर ईडी तीन बड़े नेताओं को गिरफ़्तार कर चुकी है, जिसमें दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया और राज्यसभा सांसद संजय सिंह हैं। देखा जाए, तो जबसे इंडिया गठबंधन हुआ है, तबसे ईडी और ज़्यादा आक्रामक नज़र आ रही है। ईडी की नज़र अभी और कई बड़े नेताओं पर है। अब तक ईडी की जाँच के दायरे में कई मुख्यमंत्री और नेता शामिल हैं।
जबसे भाजपा सत्ता में आयी है, तबसे एक भी ऐसा नेता नहीं है, जिसके ख़िलाफ़ जाँच के बाद ईडी उस पर आरोप सिद्ध करने में कामयाब हो पायी हो। आरोप इतने सारे; लेकिन सुबूत एक भी नहीं, जिससे सिद्ध हो सके कि आरोप सही हैं। ईडी का चाल-चरित्र नेतागीरी के मॉडल पर आधारित है। यह सरकार के इशारों पर आरोप पत्र तैयार करने वाली महज़ एक एजेंसी बनकर रह गयी है, जिसमें ट्रेजेडी है। ड्रामा है; और इमोशन भी हैं। वह जिसको चाहे, फ़ज़ीर् केस में पकड़ सकती है।
दिल्ली की नयी शराब नीति में गिरफ़्तारी की जो पटकथा लिखी गयी है, उसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक का नाम शामिल है। कल तक जिस मामले में संजय सिंह का नाम तक नहीं था, आरोपी संजय अरोड़ा को सरकारी गवाह बनाकर संजय सिंह का नाम उगलवाकर उनके घर पहुँचकर घंटों तलाशी और पूछताछ के बाद नाटकीय ढंग से ईडी उन्हें गिरफ़्तार कर लेती है। अभी तक कथित नयी शराब नीति घोटाले में ईडी 14 लोगों को गिरफ़्तार कर चुकी है, जिसमें आम आदमी पार्टी के नेताओं सहित कुछ लोग जेल में हैं, बा$की सभी को जमानत मिल चुकी है।
4 अक्टूबर को संजय सिंह की गिरफ़्तारी के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सवाल उठाते हुए इसे ग़ैर-क़ानूनी बताया। संजय सिंह के आवास पर छापेमारी के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि ये छापे एक ऐसी पार्टी (बीजेपी) की बदहवास कोशिश हैं, जो अगला चुनाव हारने जा रही है। वहीं संजय सिंह ने कहा कि मुझे मरना मंज़ूर है; डरना मंज़ूर नहीं है। चाहे जितनी यातनाएँ मुझे दी जाएँ, मैं नरेंद्र मोदी सरकार के भ्रष्टाचार, अडानी के महाघोटाले के ख़िलाफ़ बोलता रहूँगा। सिंह ने कोर्ट में पेशी के दौरान ईडी को अडानी का नौकर बताया और कहा कि हम इनसे डरते नहीं हैं। ये जितना अत्याचार और जुर्म कर लें, हम सह लेंगे।
दिल्ली के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि बिना किसी सुबूत और बिना किसी ठोस कारण के संजय सिंह को गिरफ़्तार किया गया है। यह प्रधानमंत्री की निराशा, हार का डर और बौखलाहट है। यह एक ऐसा फ़ज़ीर् शराब घोटाला है, जिसकी जाँच पिछले 15 महीने से चल रही है। ईडी और सीबीआई ने कम-से-कम 1,000 जगहों पर छापेमारी की है; लेकिन कहीं से एक रुपया भी बरामद नहीं हुआ है। इस मामले में दिल्ली के मंत्री गोपाल राय ने इसे प्रधानमंत्री मोदी की तानाशाही बताया।
बता दें कि तत्कालीन उप मुख्यमंत्री और दिल्ली के आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया को कथित शराब घोटाले के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में जब इसी 5 अक्टूबर को सिसोदिया के जमानत मामले की सुनवाई हुई, तो अदालत ने ईडी पर तल्ख़ टिप्पणी की। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि ईडी पुख़्ता सुबूत रखे, नहीं तो यह केस दो मिनट भी नहीं टिकेगा। कोर्ट ने पूछा कि अगर इस मामले में रुपयों के लेन-देन में सिसोदिया की भूमिका नहीं है, तो धन-शोधन के मामले में उन्हें आरोपी क्यों बनाया? कोर्ट ने कहा कि एजेंसी सुबूत दे कि पैसा आरोपियों तक कैसे पहुँचा? कोर्ट ने कहा कि आपका केस आरोपी से सरकारी गवाह बने दिनेश अरोड़ा के बयानों के इर्द-गिर्द घूमता है और सुबूत के नाम पर कुछ है नहीं आपके पास। कोर्ट ने यह भी कहा कि शराब नीति से अगर सीधे तौर पर राजनीतिक पार्टी को फ़ायदा हुआ, तो उसे आरोपी क्यों नहीं बनाया?
ऐसा नहीं है कि कोर्ट ने पहली बार इस तरह से ईडी को फटकार लगायी हो। इससे पहले 3 अक्टूबर को भी रियल्टी समूह एम3एम के निदेशकों को जमानत देने के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज करते समय ईडी सख्ती ज़रूर बरते; लेकिन उसे बदला लेने की भावना से काम नहीं करना चाहिए।
देखने वाली बात यह है कि देश की जाँच एजेंसियाँ जिन मामलों में गिरफ़्तारी करती हैं, उन मामलों में निचली अदालतों में कम ही फैसले हो सके हैं। वहाँ आरोपियों की जमानत अर्जी पर भी जल्द फैसला नहीं हो पाता। लेकिन यही मामला जैसे ही सुप्रीम कोर्ट में पहुँचता है, तो वह ऐसी तल्ख़ टिप्पणी करता है कि ईडी कुछ जवाब नहीं दे पाती और कोर्ट जमानत का फैसला सुना देता है। सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया के मामले को भी देखने से यही लगता है कि निचली अदालतों में ये मामले नहीं निपट सके। उनमें फैसला देने में देरी भी हुई और उन्होंने जमानत अर्जी को खारिज करते हुए सीधे एजेंसियों के हाथों में अधिकतर मामले सौंप दिये और उनका निपटारा अभी तक नहीं हो सका।
भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता, ख़ासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंदिरा गाँधी के द्वारा सन् 1975 में लगाये गये आपात-काल का गाहे-ब-गाहे ज़िक्र करते रहते हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का यह क़दम देश और केंद्र की इंदिरा सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ बोलने वालों के हित में नहीं था; लेकिन वो एक खुला और घोषित आपात-काल था।
आज सवाल यह है कि अब जब आपात-काल नहीं है, फिर भी हालात इंदिरा गाँधी के घोषित आपात-काल से मिलते-जुलते क्यों हैं? जहाँ विरोधी इसे अघोषित आपात-काल कह रहे हैं। वहीं सरकार इसे अमृत-काल कह रही है और जश्न मना रही है। अमृत-काल भी विरोधियों को जेल में ठूँसकर, मनमानी करके और लोगों की तकलीफ़ों को अनसुना करके मनाया जा रहा है।
हालाँकि राजनीति ने अपनी हबस पूरी करने के चक्कर में आपात-काल के मायने ही बदल दिये हैं। क्योंकि आपात शब्द तो आपदा से बना है, जिसे आपदा-काल कहें, तो भी वही मतलब है। इस शब्द का दूसरा मतलब किसी निरंकुश या सत्ता चलाने में नाकाम सरकार को बर्ख़ास्त करके राष्ट्रपति शासन लागू करने से है। लेकिन जब कोई निरंकुशतापूर्वक सत्ता हथियाने की कोशिश करता है, तो वह आपात-काल की आड़ लेकर विरोधियों को जेल भेजने लगता है। इंदिरा गाँधी ने यही किया था। राजनीति के ज़्यादातर जानकारों का मानना है कि अब भी वही हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सत्ता की उसी चकाचौंध में खो गये हैं, जिसमें इंदिरा खो गयी थीं। इसी के चलते उन्हें विरोधियों पर नकेल कसने की ज़रूरत पड़ रही है।
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की गिरफ़्तारी किसी को समझ नहीं आ रही है कि आख़िर किस आधार पर हुई है? किसी भी आदमी के नाम लेने भर से विपक्षी पार्टियों के नेताओं को जेल में जिस तरह से डाला जा रहा है और 2024 से पहले कितनों को जेल में डाला जाएगा, उस पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। जो बोलेगा, जेल के दरवाज़े उसके लिए खुल सकते हैं। इससे पहले मनीष सिसोदिया को भी आरोपों के आधार पर ही गिरफ़्तार किया गया। आरोप लगा कि उनकी एक नंबर की सम्पत्ति भी अटैच कर ली गयी। मनीष सिसोदिया को जेल में लगभग साढ़े सात महीने से ज़्यादा हो चुके हैं। अब पुख़्ता सुबूत न होने के चलते सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को कड़ी फटकार लगायी है।
बहरहाल, सवाल यह है कि अगर कोई भी किसी का नाम ले ले, तो क्या उसे बिना ठोस सुबूतों के भी गिरफ़्तार किया जा सकता है? अगर गिरफ़्तारी और सज़ा का यही मापदंड है, तो फिर उन नेताओं को गिरफ़्तार क्यों नहीं किया जा रहा है, जिन पर गम्भीर आरोप लगे हुए हैं और जिनके ख़िलाफ़ कई-कई एफआईआर तक दर्ज हैं? ऐसे दाग़ी नेता, मंत्री, सांसद और विधायक ही क्यों? अगर इस तरह गिरफ़्तारी करने पर सरकारी एजेंसियाँ आ जाएँ, तब तो जिस-जिस के ख़िलाफ़ आरोप लगते हैं, उन सबको गिरफ़्तार कर ही लिया जाना चाहिए। फिर राजनीति में बचेगा कौन? आँकड़ों के मुताबिक, संसद में क़रीब 45 फ़ीसदी से ज़्यादा सांसद दाग़ी हैं और 95 फ़ीसदी सांसदों की सम्पत्ति आय से अधिक है। ईडी ने उन्हें किस आधार पर छोड़ा हुआ है? अब तक जो भी गिरफ़्तारियाँ हुईं, वहाँ तक ईडी पर उतने सवाल नहीं उठे, जितने सवाल आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह की गिरफ़्तारी के बाद उठ रहे हैं।
इंडिया गठबंधन के नेताओं का आरोप है कि विपक्षी पार्टियों के बड़े नेताओं को लोकसभा चुनाव से पहले जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है, ताकि चुनाव में इसका फ़ायदा लिया जा सके। लेकिन यहाँ मैं याद दिलाना चाहूँगा कि जब इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए उन सभी विपक्षी नेताओं को जेल में डाला, जो ताक़तवर थे और सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ मुखर थे। ऐसे लगभग 80 फ़ीसदी से ज़्यादा नेताओं ने जेल से ही चुनाव लड़ा और उनमें से ज़्यादातर जीतकर बाहर आये थे।
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अब 2024 के लोकसभा चुनाव में ऐसा ही हुआ, तो केंद्र की मोदी सरकार क्या करेगी? ख़ासतौर पर ईडी और सीबीआई के वे अधिकारी क्या करेंगे, जो बदले की भावना या फिर सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियों में से कम-से-कम आठ पार्टियों के बड़े नेताओं को गिरफ़्तार करने के लिए ईडी उनकी फाइल्स तैयार कर चुकी है। मसलन, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी, उनके बेटे राहुल गाँधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा, शिवसेना नेता संजय राउत, झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, शरद पवार के क़रीबी और एनसीपी (शरद) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटील और कई दूसरे बड़े नेता ईडी के रडार पर हैं।
यह बात कितनी सही है? इस बारे में कुछ कहना तो उचित नहीं; लेकिन इस बीच ईडी की कार्रवाई पर जो सवाल उठे हैं, वो बड़े गम्भीर और ईडी के लिए शर्मनाक हैं। ईडी के पूर्व प्रमुख संजय मिश्रा, जिन्हें रिटायरमेंट के बावजूद कई बार एक्सटेंशन देकर ईडी के पद पर बरक़रार रखा गया, उन्होंने जिस तरह काम किया, सरकार उससे काफ़ी ख़ुश रही और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद न चाहते हुए भी सरकार को उन्हें रिटायरमेंट देना पड़ा। अब राहुल नवीन प्रमुख बने हैं और ऐसा कहा जा रहा है कि शायद वह भी अपनी वफ़ादारी सरकार को संजय मिश्रा से भी आगे बढ़कर दिखाना चाहते हैं।
इसी साल अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में 16 पार्टियों के हवाले से एक याचिका दाख़िल की थी, जिसमें ईडी की भूमिका को लेकर सवाल उठाये गये हैं। याचिका में कहा गया है कि ईडी और सीबीआई के 95 फ़ीसदी मुक़दमे विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ हैं, जो ईडी ने पीएमएलए के तहत विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार करने के लिए बनाये हैं, ताकि उन्हें आसानी से जमानत न मिल पाए। दरअसल सन् 2002 में मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने के लिए पीएमएलए यानी धन शोधन निवारण अधिनियम पारित किया गया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से, ख़ासतौर पर हाल के तीन-चार वर्षों में ईडी ने जितने मामलों में विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार किया है या उन्हें समन जारी करके पूछताछ के लिए बुलाया है; उन मामलों में केवल दो फ़ीसदी से कम मामलों में ही दोषसिद्धि होने का दावा किया जा रहा है। हाल ही में सामने आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी ने मौज़ूदा सांसदों, विधायकों, एमएलसी और पूर्व सांसदों, पूर्व विधायकों, पूर्व एमएलसी के ख़िलाफ़ कुल 176 प्रवर्तन मामलों में ईसीआईआर दर्ज की है, जो 2002 के बाद क़ानून के आने के बाद से दर्ज की गयी कुल 5,906 शिकायतों का 2.98 प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएमएलए के तहत ईडी ने कुल 1,142 शिकायतें दर्ज की हैं, जिनके आधार पर कुल 513 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, जिनमें कई मज़बूत नेता भी हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि क़रीब 96 फ़ीसदी आरोपियों को ईडी ने सज़ा दिलायी है और इन आरोपियों की क़रीब 36.23 करोड़ रुपये की सम्पत्ति ज़ब्त की गयी है, जबकि कोर्ट में जो दोषी तय हुए हैं, उन पर क़रीब 4.62 करोड़ रुपयों का ज़ुर्माना लगा है। ईडी पर सवाल उठ रहे हैं कि वो जिन लोगों को आरोपों के आधार पर गिरफ़्तार कर लेती है, उन लोगों के ख़िलाफ़ पुख़्ता सुबूत भी समय से नहीं जुटा पाती है।
बहरहाल अब ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दुस्तान की राजनीति अब बदले की भावना से काम करने की दिशा में जा रही है, जो कि देश के भविष्य के लिए ही नहीं, बल्कि आम लोगों के भविष्य के लिए भी काफ़ी $खतरनाक साबित होने के संकेत हैं। ज़ाहिर है कि आज की सरकार विपक्षी पार्टियों के नेताओं के ख़िलाफ़ अपनी ताक़त का इस्तेमाल करेगी, तो कल जब दूसरी किसी पार्टी की सरकार बनेगी, वो भी विपक्षी पार्टियों, ख़ासतौर पर दुश्मनी की तरह शिकंजा कसने वाली पार्टी के नेताओं के ख़िलाफ़ अपनी ताक़तों का इस्तेमाल करेगी। इस प्रकार से देश में सभी पार्टियों का प्रमुख काम यही रह जाएगा कि किस तरह से वो विपक्षी पार्टियों के नेताओं से निपटे और इसके चक्कर में देश और देशवासियों की प्राथमिकताएँ कहीं पीछे छूटती चली जाएँगी, जो देश के लिए बहुत घातक साबित होंगी। इसके साथ-साथ सरकार बदलते ही जाँच एजेंसियों के उन अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी, जो बदले की भावना या सरकार के इशारे काम कर रहे हैं।
इसलिए सरकार के अलावा जाँच एजेंसियों के अधिकारियों को भी चाहिए कि जो नेता भ्रष्ट हैं, उन्हीं के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें, चाहे वे विपक्षी पार्टियों के हों या फिर चारे सत्ताधारी पार्टी के ही क्यों न हों। इससे देश के लोगों के मन में भी जाँच एजेंसियों के प्रति भरोसा पैदा होगा और उनकी कार्रवाइयों पर सवाल भी नहीं उठेंगे।
मायानगरी मुम्बई पर ईडी की पैनी नज़र है। इसकी $खास वजह मुम्बई के कुछ व्यवसायियों और फ़िल्मी हस्तियों के पास अथाह पैसा है। तो क्या यह माना जाए कि मनी लांड्रिग के नाम पर लोगों को नोटिस भेजकर हिरासमेंट के लिए बुलाने वाला ईडी दिल्ली में बैठे कुछ लोगों के बैंक एकाउंट फुल करने और मौक़ा मिले, तो अपनी जेबें भी भरने की जुगत में लगा हुआ है? आरोप तो ऐसे ही लग रहे हैं आजकल ईडी अफ़सरों पर। कुछ समय पहले तानाजी मंडल नाम के ईडी के एक अधिकारी को महाराष्ट्र के भूषण पाटील और राजेश शेट्टी नाम के उसके दो सहयोगियों के साथ करोड़ों रुपये रिश्वत लेने के एक मामले में गिरफ़्तार किया गया था। कथित आरोप तो यहाँ तक है कि ईडी के अधिकारियों ने पैसे और नेमफेम वाले मुम्बई के निवासियों की रातों की नींद उड़ा दी है। कुछ समय से शिवसेना के संजय राउत के अलावा कुछ नामी-गिरामी व्यापारियों, नेताओं को इसी तरह ईडी डराती रही है। अब ईडी ने बॉलीवुड प्रोडक्शन हाउस महादेव बेटिंग ऐप के प्रमोशन के लिए काम करने वाले क़रीब 34 फ़िल्मी और टीवी कलाकारों को भी रडार पर ले रखा है। ईडी ने मुम्बई के क़ुरैशी प्रोडक्शन हाउस पर भी छापेमारी की है। ये प्रोडक्शन हाउस भी महादेव ऐप का प्रमोटर है।
ईडी के सूत्रों का दावा है कि महादेव ऐप के प्रमोटर सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल से हवाला की मोटी रक़म मिली थी। अब ईडी के रडार पर संजय दत्त, सुनील शेट्टी, सोनू सूद, सोनाक्षी सिन्हा, सुखविंदर सिंह, कपिल शर्मा, सारा अली $खान, मलाइका अरोड़ा समेत 34 लोगों को ईडी ने नोटिस भेजा है। इनमें से कई अभिनेता-अभिनेत्री ईडी के सामने हाज़िर हो चुके हैं, तो कइयों को ईडी के सवालों का सामना करना है। इन सभी फ़िल्मी कलाकारों पर महादेव बेटिंग ऐप के ज़रिये मनी लॉन्ड्रिंग का मामला बनाया गया है। ईडी प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग के तहत इन फ़िल्मी कलाकारों के बयान दर्ज करके फ़िलहाल तो छोड़ रही है; पर आगे वो किसके साथ क्या करेगी? यह कोई नहीं जानता। लेकिन जो सूत्रों से पता चला है, वो यह है कि ईडी भी कमाने की कोशिश में है। किसी ईडी के क़रीबी सूत्रों ने बड़े विश्वास में लेते हुए छापेमारी के पीछे दिल्ली से किसी का (नाम नहीं लिया) दबाव बताया है। इसके पीछे का मक़सद हम सभी जानते हैं कि पैसे के लिए तो सारा खेल ही होता है। ऐसे में ईडी को कहीं से निर्देश तो मिलता ही होगा।
सवाल यह है कि मनी लांड्रिग के जिस पैसे को एकदम ईमानदारी से सरकारी ख़ज़ाने में जमा होना चाहिए, उस पैसे की चैरिटी चोरी-छिपे कहाँ होती है? सबको मालूम है कि ग़रीबों में तो यह चैरिटी होती नहीं होगी। आज के दौर में पैसे सबको चाहिए। कलाकार भी चार पैसे कमाने के वास्ते मुम्बई में आकर अपना नसीब आजमाते हैं। बहुत मुश्किल से कुछ कलाकार फ़िल्मी दुनिया के फलक पर चमकते हैं। जब वे अच्छा पैसा कमाने लगते हैं, तो वे सरकार के पास टैक्स भी जमा कराते हैं। यह अलग बात है कि कुछ फ़िल्मी कलाकारों पर टैक्स चोरी के भी आरोप लगते रहे हैं; पर ज़्यादातर कलाकार तो मोटा टैक्स सरकार को जमा करते हैं। ईडी का इतनी बड़ी संख्या में कलाकारों नोटिस भेजने से मालूम होता है कि महादेव ऐप से जुड़े कलाकारों को अब आसानी से बख़्शा नहीं जाएगा। जिसकी जो भी नस कमज़ोर होगी, उसी को ईडी दबा देगा। ईडी इन महादेव ऐप के प्रोमोटरों से कलाकारों को दिये जाने वाले पैसे के सोर्स जानने की कोशिश करने में लगा है। ईडी सूत्रों से मिली जानकारी में पता चला है कि हर साल महादेव ऐप के ज़रिये 20,000 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार हुआ।
बता दें कि महादेव एक ट्रेडिंग ऐप है, जिसकी शुरुआत सौरभ चंद्राकर के एक क़रीबी दोस्त रवि उप्पल ने कुछ लोगों के साथ मिलकर की थी। बाद में सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल ने इस ऐप का पूरा कारोबार दुबई में शिफ्ट कर लिया और वहीं से कारोबार करने लगे। यहाँ तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा। पर जब सौरभ चंद्राकर की शादी में (सूत्रों के मुताबिक) कोई 200 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा ख़र्च किये जाने की बात सामने आयी, तो ईडी ने इसे अपने शिकार का ज़रिया बनाते हुए उन सभी कलाकारों को नोटिस जारी कर दिया, जो इस शादी में शामिल हुए। अभी अक्टूबर में ईडी ने मुम्बई के जंबो कोविड सेंटर घोटाले मामले की परते खोलने का दावा करते हुए शिवसेना सांसद संजय राउत के एक क़रीबी सुजीत पाटकर को ईडी ने शिकंजे में लिया है। सुजीत पाटकर ने एक सरकारी गवाह के जैसे इस घोटाले में शिवसेना सांसद संजय राउत का नाम लिया है। ईडी के सूत्रों ने दावा किया है कि 32.44 करोड़ रुपये के इस घोटाले में से 2.81 करोड़ रुपये सुजीत पाटकर के निजी बैंक अकाउंट में जमा हुए थे। इस मामले में ईडी ने अपनी चार्जशीट में लाइफलाइन हॉस्पिटल मैनेजमेंट सर्विसेज, उसके तीनों पार्टनर और दहिसर जंबो कोविड सेंटर के डीन डॉक्टर किशोर बिसूरे हैं। मुम्बई में एक कहावत है कि यह शहर हर किसी को अपनी चकाचौंध में समा लेता है। तो क्या नेता और क्या सरकारी अफ़सर भी इस चकाचौंध से सम्मोहित नहीं होते होंगे? आजकल के ज़्यादातर लोग किसी भी तरह पैसा कमाना चाहते हैं। यह एक इंसानी फ़ितरत भी है।
02 सितंबर, 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद 24 अक्टूबर, 1945 को अंतरराष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाये रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र का गठन किया गया था। इसके बावजूद सन् 1945 से सन् 1989 के बीच अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध चलता रहा। इस शीत युद्ध के बाद अमेरिका एक वैश्विक ताक़त बनकर उभरा। लेकिन युद्ध नहीं थमे। कई देश छोटी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ते रहे। एशिया में भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन के बीच युद्ध हुए, तो यूरोप में भी कई देश छोटे-छोटे युद्धों में उलझे रहे। संयुक्त राष्ट्र ने कहीं युद्ध रोकने की पहल की, तो कहीं नहीं की।
हाल के दिनों में एक साल आठ महीने से रूस-यूक्रेन का युद्ध चल रहा है। 24 फरवरी, 2022 से शुरू हुए रूस-यूक्रेन का युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीच 7 अक्टूबर, 2023 को हमास ने इजरायल पर अचानक रॉकेट दाग़ने शुरू कर दिये। हमास के इस हमले को इस सदी का सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है। इससे इजरायल का बहुत बड़ा नुक़सान हुआ। इजरायल ने भी युद्ध का ऐलान करते हुए कहा कि युद्ध के नियमों को अब नहीं माना जाएगा। दोनों ओर से अब हज़ारों रॉकेट, ग्रेनेड, मिसाइलें, गोले और गोलियाँ दाग़ी जा चुकी हैं।
अब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने क़सम खायी है कि वह हमास को $खत्म करके ही दम लेंगे। युद्ध शुरू होते ही भारत इजरायल के साथ खुलकर सामने आ गया। अमेरिका ने इजरायल को हथियारों की खपत बढ़ा दी। अब फिलिस्तीन के साथ 22 अरब देश खुलकर खड़े हो चुके हैं। इसके अलावा कई यूरोपीय देश, कुछ एशियन देश भी ख़ामोशी से फिलिस्तीन के साथ खड़े दिख रहे हैं। इजरायल के साथ भी डेढ़ दर्ज़न के क़रीब देश खड़े हैं। इनमें कुछ ख़ामोशी से समर्थन कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से खुलकर इजरायल का साथ दिया है, उस तरह से अमेरिका ने भी खुलकर उसका समर्थन नहीं किया है। इससे पहले जितनी भी सरकारें भारत की सत्ता में आयीं, किसी ने इजरायल को इस तरह समर्थन नहीं दिया। महात्मा गाँधी ने तो 26 नवंबर, 1938 के अपने अ$खबार ‘हरिजन के अंक में फलिस्तीन में यहूदियों को बसाने को अन्यायपूर्ण बताया था।
कुछ लोग इजरायल और फिलिस्तीन को मुस्लिमों और यहूदियों के बीच युद्ध मान रहे हैं। लेकिन यह वास्तव में अतिक्रमण और अन्याय का युद्ध है। वास्तव में 13 मई, 1948 तक इजरायल अस्तित्व में ही नहीं था। जिस जगह इजरायल बसा है, वह सब फिलिस्तीन ही था और यहाँ ऑटोमन साम्राज्य स्थापित था।
14 मई, 1948 को यहूदियों ने फिलिस्तीन के एक छोटे हिस्से पर क़ब्ज़ा करके नये देश की घोषणा कर दी। आज 22 अरब देश इजरायल के साथ भले ही खड़े हैं; लेकिन अरब देशों ने उस समय इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार करने से मना कर दिया था। धीरे-धीरे इजरायल ने अपना दायरा बढ़ाया और सन् 1967 में छ: दिन का युद्ध के बाद इजरायल ने इंजिप्ट से युद्ध लड़कर गाज़ा पट्टी, पूर्वी यरूशलम, पश्चिमी तट और गोलान पहाड़ी पर क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद दोनों देशों की सीमाएँ तय हो गयीं।
सन् 2004 में इजरायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री एरियल शेरोन ने गाज़ा छोड़ने का ऐलान कर दिया। उधर फिलिस्तीन में इजरायल से बदला लेने के लिए सन् 1987 में एक आतंकी संगठन हमास का गठन हुआ। हालाँकि फिलिस्तीन में हमास सन् 1970 से अस्तित्व में था; लेकिन सन् 1987 से पहले ये संगठन घोषित नहीं था। फिलिस्तीनी हमास को अपने देश का सबसे बड़ा क्रान्तिकारी दल मानते हैं। हमास में शामिल लोगों को $फौजियों की तरह ट्रेनिंग और सुविधाएँ आदि दी जाती हैं। अब गाज़ा पट्टी पर हमास का शासन चलता है। यही गाज़ा पट्टी इजरायल के लिए मुसीबत बन गयी है। रूस-यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध को लेकर दुनिया के जितने देश खुलकर सामने नहीं आये, उतने खुलकर फिलिस्तीन और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध को लेकर सामने आ गये हैं। इस युद्ध को लेकर दुनिया दो धड़ों में बँटती नर्ज़र आ रही है। दुनिया के कई देशों में शीत युद्ध, अतिक्रमण और खुले युद्धों के चलते तृतीय विश्व युद्ध के हालात बनने के आसार बढ़ते जा रहे हैं। क्या आने वाले समय में तृतीय विश्व युद्ध होगा?
अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने मुंबई में आयोजित अपने सत्र में 2028 लॉस एंजिल्स खेलों में क्रिकेट को शामिल कर लिया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर कहा गया कि, आईओसी ने 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में नए खेलों के रूप में क्रिकेट (टी20), बेसबॉल/सॉफ्टबॉल, फ्लैग फुटबॉल, लैक्रोस और स्क्वैश को शामिल करने के लिए अपनी औपचारिक मंजूरी दे दी है। आईओसी के कार्यकारी बोर्ड ने पिछले सप्ताह खेल को कार्यक्रम में शामिल करने के लॉस एंजिल्स खेल आयोजकों के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी।
मुंबई में हुए आईओसी सेशन में वोटिंग हुई जिसके बाद इसका आधिकारिक ऐलान किया गया। थॉमस बाक ने वोटिंग के बाद बताया कि, आईओसी के दो सदस्यों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था जबकि एक ने वोट नहीं किया।
बता दें, लॉस एंजिलिस ओलंपिक आयोजन समिति ने पुरुष और महिला वर्ग में छह टीमों के टूर्नामेंट का प्रस्ताव रखा। हालांकि टीमों और क्वालिफिकेशन प्रक्रिया के बारे में अंतिम फैसला बाद में लिया जाएगा।
आईओसी के खेल निदेशक किट मैकोनेल ने कहा कि, “प्रस्ताव टीम खेलों में प्रतिस्पर्धा छह छह टीम रखने का है। टीमों की संख्या और क्वालिफिकेशन के बारे में विस्तार से अभी बात नहीं हुई है यह 2025 के आसपास तय होगा। क्रिकेट समेत नए खेलों के शामिल होने पर लॉस एंजिलिस ओलंपिक में खिलाड़ियों की संख्या 10500 से बढ़ जाएगी, लेकिन कितनी बढ़ेगी इस पर बात करनी अभी बाकी है।”
किसी भी राष्ट्र के जीवन में कठिन दौर तब आता है, जब उसकी राजनीति दिशाहीन होकर राष्ट्रीय हितों के ऊपर सत्ता स्वार्थ को तरजीह देने लगे। भारत में जातिगत जनगणना ने राजनीति की इसी कुत्सित अवस्था का नग्न यथार्थ प्रदर्शित किया। बिहार में हुई जातिगत जनगणना ने विकृतियों के एक ऐसे पिटारे को खोल दिया है, जिसमें एक राष्ट्र के रूप में भारत के लिए समस्या का अंबार है या यूँ कहें कि इसने राष्ट्रीय एकता को एक अनजाने और डरावने भविष्य की ओर धकेल दिया है। इसकी बानगी तब दिखी, जब एक तरफ़ राष्ट्रीय स्तर का विमर्श जाति आधारित जनगणना के परिणाम एवं प्रभाव की विवेचना में व्यस्त था और इस जातिवाद के परोक्ष प्रभाव के रूप उत्तर प्रदेश को विभाजित करने की माँग उठने लगी। विदित हो केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश और एनडीए गठबंधन के सहयोगी सुभासपा प्रमुख ने पूर्वांचल के रूप में पृथक राज्यों की माँग की है।
प्रतीत होता है कि स्वयं को विकास का सशक्त अग्रदूत मानने वाली सत्ताधारी एनडीए गठबंधन वाली सरकार के पास या तो जिताऊ मुद्दों की कमी है या फिर उसकी सुविचारित रणनीति का परिणाम। इन माँगों में सत्ता या सरकार की स्वीकृति कितनी है? यह अलग बहस का विषय है; परन्तु राजनीति की यह दिशा नकारात्मकता की प्रसारक है। पहले से ही विघटनवादी शक्तियों के उपद्रव से जूझ रहे राष्ट्र में जातीय संकीर्णता को बढ़ावा देने का प्रयास समझ से परे है।
वैसे ये छोटे राज्यों की माँग अनायास नहीं है। यह उस सुविचारित लोकतंत्र विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा है, जहाँ जातियों की गोलबंदी से सत्ता का साम्राज्य खड़ा करने का स्वप्न देखा जा रहा है। कैसे? समझिए- पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो या पूर्वांचल, यहाँ कुछ जाति विशेष की सघनता है, तो कुछ जातियों का प्रभाव इन माँगों का केंद्र बिन्दु है। बात सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर की ही कर लेते हैं, जो स्वयं को राजभर जाति का एकमात्र स्वयंभू नेता मानते हैं। पूर्वांचल में राजभर जाति की आबादी लगभग 12 से 22 प्रतिशत होने का अनुमान है। आकलन बताते हैं कि पूर्वांचल की घोसी, बलिया, चंदौली, ग़ाज़ीपुर, मिर्ज़ापुर, वाराणसी जैसी दो दर्ज़न लोकसभा सीटों पर राजभर वोट क़रीब 2.5 लाख तक हैं, जो चुनावी हार-जीत के निर्णय के लिए अत्यावश्यक हैं। इस संख्या बल की अगुवाई करने के मुग़ालते के कारण ही दो दशकों से भी अधिक समय से जातिवाद में सने ओमप्रकाश राजभर पूर्वांचल की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए हैं।
कुछ ऐसा ही मामला पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य की माँग के उद्घोषक संजीव बालियान का भी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट आबादी क़रीब 17 प्रतिशत है। बालियान जैसे नेता जानते हैं कि इस जातीय आबादी के सहारे अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को तुष्ट किया जा सकता है। ऐसी ही महत्त्वाकांक्षाएँ साधने के लिए उन्होंने चौधरी चरण सिंह और सर छोटूराम के लिए भारत रत्न की माँग नहीं की थी। ये सारी बयानबाज़ी जातिगत गोलबंदी और साथ ही अपना अस्तित्व बनाये रखने का प्रयास ही थी। असल में सन् 2019 के आम चुनाव में न्यूनतम मतों के अंतर से सीट बचाने में सफल हुए बालियान अपने जातिगत आधार जाट समाज में अपने प्रभाव के विस्तार में लगे हैं, ताकि कुर्सी बची रहे। कुछ ऐसी ही स्थिति ओमप्रकाश राजभर की भी है। घोसी उपचुनाव में भाजपा के दूत बनकर उसका क़िला बचाने गये राजभर अपमानजनक चुनावी पराजय को पचाने की जुगत में हैं। अपने बिदकते जातिगत आधार को जोड़े रखने के लिए वह निरंतर जुगत में लगे हैं। अत: इन नेताओं के अलग राज्यों की माँग को इसी राजनीतिक प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
जातिगत राजनीति करने वालों का भारतीय राजनीति में आधार ही उनका स्वजाति के संख्या बल के आधार पर स्थापित दबाव है। देश के विभिन्न राज्यों में प्रभावी क्षेत्रीय दलों का तो आधार ही जातिवाद है। इस आधार पर भाजपा या कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों का समर्थन तलाशना भी कोई ढका-छुपा मामला नहीं है। लेकिन समस्या यह है कि जातीय एवं धार्मिक गोलबंदी के सहारे सत्ता की राजनीति अब दिनोंदिन विध्वंसक रूप लेती जा रही है। कुमार विश्वास ने कुछ समय पूर्व अरविन्द केजरीवाल पर खालिस्तानियों के समर्थन एवं पंजाब के विघटन के पश्चात् एक अलग देश के प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देखने का आरोप लगाया था। अब इसमें कितनी सत्यता थी, यह या तो कुमार विश्वास या केजरीवाल ही जानें; किन्तु इस तरह की राजनीतिक दुरभि संधियों के कई वास्तविक विकृत उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं, जहाँ ऐसे समझौतों ने देश को तोड़ा है।
दूसरी ओर आंतरिक भेदभाव फैलाकर देश को तोड़ने वालों की कमी नहीं है। जाति और धर्म इस बँटवारे के सबसे मर्ज़बूत हथियार हैं। वैसे भी आजकल देश में लोगों की जातिगत भावनाएँ इतनी विध्वंसक हो चुकी हैं कि राष्ट्रीय नायकों तक की जाति तलाश की जा रही है। उदाहरणस्वरूप अब यह पता करने की कोशिश चल रही है कि महाराज सुहेलदेव राजभर जाति के थे, या खटीक या पासी? ऐसे में भावनात्मक मुद्दों के आधार पर जातिगत गोलबंदी कोई कठिन कार्य नहीं है। लेकिन जनता को समझना होगा कि राजनीति में घुसे सत्ता के ये पिस्सू छोटे राज्यों की माँग इसलिए नहीं कर रहे हैं कि इन्हें समान विकास और सहभागी लोकतंत्र की चिन्ता है, बल्कि इनकी माँग का आधार सत्ता सुख की चाह है। भले की इसके लिए संकीर्ण मुद्दों के सहारे समाज को भड़काकर सब कुछ जलाना पड़े। यह इतिहास का यथार्थ है कि आर्ज़ादी के शैशवकाल में जब भारत $खुद को जोड़ने में लगा था, तब भाषाई आधार पर प्रांतीय विभाजन की माँग ने विद्रूप विघटनकारी हालात पैदा कर दिये थे। तब इस समस्या के निराकरण हेतु गठित जेवीपी समिति का तर्क था कि भाषा महर्ज़ जोड़ने वाली ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे से अलग करने वाली ताक़त भी है। यह भविष्य के लिए एक संदेश था। अत: जब राष्ट्रीय स्तर का विमर्श भाषा को अलग राज्य के गठन का आधार मानने को स्वीकृत नहीं कर रहा था, तो फिर आज जाति जैसी संकीर्ण संस्था को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र में संकीर्ण माँगों की स्वीकृति के पश्चात् उस पर आधारिक इच्छाओं का शमन हो जाता है, बल्कि यह एक नकारात्मक भावनाओं पर आधारित शृंखला का रूप धारण करती है, जो अगली हर बार अधिक विकृत रूप में उपस्थित होता है। जैसा कि हीगल का द्वंद्ववाद, वाद-प्रतिवाद और संवाद एक ऐसी ही निरंतर गतिशील प्रक्रिया की व्याख्या करता है। हालाँकि भारत में इसकी एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। राष्ट्र के रूप में भारत एक ठोस ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज है और यही वजह है कि यह अब भी एक रचना प्रक्रिया से गुर्ज़र रहा है, जिसमें भारतीय होने की भावना एवं प्रबल आधार है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था- ‘भारत की एकता भावनाओं की एकता है। किन्तु इस भावना के नीचे एक आतंरिक संघर्ष सदैव चलता रहा है। ऐसा नहीं है कि आर्थिक संसाधनों में अधिक संख्याबल की हिस्सेदारी, शिक्षा व रोर्ज़गार के अवसर, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद एवं जातिवाद जैसे मुद्दे राष्ट्रीय-सामाजिक जीवन में संघर्षों का आधार ही नहीं बनते हैं; लेकिन कुछ लोग उन्हें भड़काते भी हैं। यह एक सामान्य-सा विमर्श है और भारत के पिछले एक सदी के इतिहास के सत्तावलोकन से इस तर्क की सहज पुष्टि हो सकती है।
अभी प्राथमिक ध्यान देश की सुरक्षा, एकता और आर्थिक विकास पर होना चाहिए। इसलिए सभी अलगाववादी और विघटनकारी प्रवृत्तियों को मर्ज़बूती से हतोत्साहित किया जाना चाहिए। स्वतंत्र भारत में विविधता वाले इन सभी मसलों पर आधारित भिन्नता के बीच भेदभाव के निराकरण का जिस तरह प्रयास होना चाहिए था, वैसा हुआ नहीं। या यूँ कहें कि कुछ वर्गों का विकासात्मक विस्तार उस गति से नहीं हुआ और जो हुआ, उसकी सर्वसुलभता लोकतांत्रिक उम्मीदों के अनुकूल नहीं रही। इसकी सबसे बड़ी वजह राजनीतिक काहिलियत और ठोस निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है। इसके परिणामस्वरूप भाषा, क्षेत्र और जाति जैसे कारणों के आधार पर समुदायों के अंदर यह भावना प्रस्फुटित होती रही कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है और उनके मन में क्रोध पलता रहा। इसकी परिणति उग्र झगड़े के रूप में ही नहीं, बल्कि कई दफ़ा विध्वंसक रूप में भी सामने आयी है। इसमें भी जाति, जो सबसे कठोर है और अपने में विकट संकीर्णता समेटे हुए है; के आधार पर भेदभाव झेलने वालों ने ब्राह्मणवाद को अपना सबसे प्रमुख सैद्धांतिक शत्रु मान लिया और यही उनके विरोध का केंद्र बन गया। इसके परिणामस्वरूप तथाकथित सवर्ण जातियों के प्रति तथाकथित पिछड़ी और दलित जातियों में कटुता स्थायी रूप लेती गयी, जिसमें तर्कहीनता घटती रही और अंधविरोध बढ़ता रहा। यही कटुता आज देश को एक ख़तरनाक मोड़ तक घसीट लायी है, जहाँ वह राष्ट्रीय जीवन के ध्वंस पर आमादा है।
असल में ब्राह्मणवाद-मनुवाद के विरोध के नाम पर जातिवाद के जिस जिन्न को बोतल से निकाला गया है, उसकी अभिशप्त छाया लोकतंत्र को ग्रसने लगी है। अगर सब इसी तरह चलता रहा, तो इसके व्यापक दुष्परिणामों के लिए भारत को तैयार रहना चाहिए। लेकिन उससे अधिक आवश्यक है- जातिवाद के सहारे सामाजिक विघटन को उद्यत इन अवसरवादियों के घातक मनोभावों को समझना। इन्हें अपनी जाति या अपनी समर्थक जातियों के विकास से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि इनका ध्येय सत्ता सुख-भोग है। इसके लिए चाहे इन्हें सामाजिक एकता या राष्ट्रीय हितों को भी दाँव पर लगाना पड़े। जैसा कि प्रसिद्ध अमेरिकी सामाजिक आलोचक, अभिनेता और लेखक जॉर्ज कार्लिन कहते हैं- ‘एक बात हमेशा याद रखें, मक्खन लगाने वाले के हाथ में हमेशा चाकू होता है।
इसलिए जनता ऐसे तथाकथित नेताओं एवं तथाकथित समाजसेवियों को समझे, परखे और इनके कारनामों को देखे, ताकि इनके स्वार्थ के प्रतिकार के साथ ही राष्ट्रीय भविष्य को विध्वंस की राह पर जाने से रोक सके।
हाल में पंजाब के जालंधर ज़िले के कहनपुर नामक गाँव में मज़दूरी करने वाले एक दम्पति ने अपनी तीन बेटियों को दूध में ज़हर मिलाकर दिया। तीनों बच्चियों ने तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया। जिनकी हत्या कर दी गयी, उन बच्चियों के नाम अमृता कुमारी (9), साक्षी (7) और कंचन (4)थे। सुशील मंडल व उसकी पत्नी मंजू देवी बिहार से पंजाब मज़दूरी करके अपने परिवार का पेट पालने आये; लेकिन ग़रीबी ने उनका पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा। आरोपी पिता सुशील मंडल के पाँच बच्चे थे, जिसमें एक लड़की व एक लड़का अभी जीवित हैं।
ख़बरों के मुताबिक, माता-पिता ने अपनी बच्चियों की हत्या करने की मुख्य वजह ग़रीबी बताया पर इसके अलावा पिता को शराब की भी लत है। ऐसे समय में जब ख़ासतौर पर संसद व विधायकों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण नारी वंदन शक्ति पारित होने के बाद भाजपा के द्वारा इसे एक राजनीतिक पर्व में तब्दील करने की पुरज़ोर कोशिशों के दरमियान इन बच्चियों की हत्या समाज व बालिका संरक्षण, उत्थान सम्बन्धी नीतियों के बाबत सोचने को विवश करती है।
भारत विश्व की पाँचवीं अर्थव्यवस्था है। प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि आने वाले वर्षों में देश तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। लेकिन देश में अमीरी व ग़रीबी के बीच फ़ासला गहराता जा रहा है। इस गम्भीर संकट पर सरकार अक्सर चुप रहती है या आँकड़ों को अपने हिसाब से पेश करती है। अमेरिकी मार्केटिंग एनालिसिस फर्म मर्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2003-2023 यानी 20 वर्षों में अमीरों की दौलत 16 गुना और ग़रीबों की महज़ 1.4 प्रतिशत बढ़ी है। तरक़्क़ी के मामले में ग़रीब वहीं-के-वहीं हैं। देश की 80 प्रतिशत दौलत सिर्फ़ दो लाख परिवारों के पास है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक विकास से आया 80 प्रतिशत धन सिर्फ़ 20 कम्पनियों के खाते में जा रहा है। अमीरी व ग़रीबी के बीच असमानता साफ़ दिखायी देती है और सरकार के पास इसे पाटने के लिए कोई ठोस आर्थिक कार्यक्रम नज़र नहीं आते। इन आँकड़ों का ज़िक्र करना यहाँ इसलिए प्रासगिंक लगा, क्योंकि अपने देश में ग़रीबी, पैसों की क़िल्लत लिंग भेदभाव का एक मुख्य कारण है। ग़रीबी एक कड़वी सच्चाई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि माता-पिता बच्चों, विशेषकर बेटियों की हत्या कर दें या उनके प्रति कठोर रुख़ अख़्तियार कर लें। सरकार भी बच्च्यिों के पालन-पोशण व पढ़ाई के लिए कई योजनाएँ व कार्यक्रम चलाती है।
इस दुर्भाग्यपूर्ण हादसे के बाद पंजाब राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष कंवरदीप सिंह ने इस हादसे पर दु:ख प्रकट किया और कहा कि मासूम छोटी बच्चियों की हत्या एक क्रूर अपराध है और अपराधियों को कठोरतम सज़ा मिलनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई ऐसा अपराध करने की जुर्रत न करे। उन्होंने यह भी बताया कि जो अभिभावक आर्थिक क़िल्लत के चलते अपने बच्चों का पालन-पोषण करने में ख़ुद को असमर्थ पाते हैं, वे अपने बच्चों को बाल कल्याण समितियों को सौंप सकते हैं। इसके अलावा बाल हेल्पलाइन नंबर 1098 पर फोन करके अपनी समस्या बता सकते हैं। बाल कल्याण समितियाँ अभिभावकों को दो माह का वक़्त देती हैं। अगर अभिभावक उसके बाद भी अपना $फैसला नहीं बदलते, तो छ: साल से कम आयु के बच्चों को उन अभिभावकों को सौंप दिया जाता है, जो बच्चों को गोद लेने के इच्छुक होते हैं। इसके लिए गोद लेने के बनी सरकारी गोद प्रक्रिया का अनुपालन किया जाता है। बाल कल्याण समितियों के अलावा हर ज़िले में बाल संरक्षण इकाई का भी गठन किया गया है। पंजाब बाल अधिकार संरक्षण के अध्यक्ष ही दावा कर रहे हैं कि राज्य के हर ज़िले में बाल संरक्षण इकाई है, तो कानपुर वाला हादसा क्यों हुआ? क्या ऐसी इकाइयाँ ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान नहीं चलातीं? क्या वो यह नहीं बतातीं कि अगर कोई अपनी संतान को आर्थिक कमी के चलते पालने में असमर्थ है, तो उसे मदद के लिए कहाँ जाना चाहिए?
छत्तीसगढ़ के पुत्रीखेरा गाँव में भी एक मज़दूर की 12 साल की बेटी ने समय पर खाना नहीं बनाया, तो उसकी माँ ने बेटी को कुल्हाड़ी से काट डाला। दरअसल हमारे समाज का नज़रिया लड़कियों के प्रति संकीर्ण है। बेशक महिला वैज्ञानिक, महिला खिलाड़ी अपनी उपलब्धियों से देश का सम्मान बढ़ा रही हैं; लेकिन क्या वजह है कि आज भी देश में बाल लिंगानुपात सिकुड़ा हुआ है।
वहीं कभी दहेज़ के नाम पर, तो कभी जाति से बाहर प्रेम विवाह करने पर लड़कियों की हत्या कर दी जाती है।
द्वितीय विश्व युद्ध में हुए भयंकर त्रासदी को देखते हुए वैश्विक शान्ति की स्थापना के उद्देश्य से कई महत्त्वपूर्ण देशों ने एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना का विचार रखा। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र तैयार किया गया, जिस पर कई देशों ने हस्ताक्षर किये और इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र आधिकारिक तौर पर 24 अक्टूबर, 1945 को अस्तित्व में आया। प्रत्येक वर्ष 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष यह अंतरराष्ट्रीय संस्था अपनी 78वीं वर्षगाँठ मना रहा है। वर्तमान में दुनिया के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से 193 देश इसके सदस्य हैं।
तय करनी होगी भूमिका
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय से ही लगातार इसकी भूमिका पर प्रश्न उठते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के महत्त्वपूर्ण कार्यों में शान्ति एवं सुरक्षा को बनाए रखना, सतत विकास को बढ़ावा देना तथा संकटग्रस्त क्षेत्रों में मानवीय सहायता पहुँचाना है। इस लिहाज़ से अगर हम देखें तो पाते हैं कि राष्ट्रों के निजी स्वार्थों के बावजूद पिछले कुछ दशकों में दुनिया के अलग-अलग संकटग्रस्त क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र संघ ने शान्ति स्थापित करने में महती भूमिका निभायी है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनिया के कई देशों में शान्ति सेना भेजकर शान्ति बहाली में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, खाद्य और कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, इत्यादि ने मानव जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की है। भुखमरी को समाप्त करने, ग़रीबी को कम करने तथा पर्यावरण को बेहतर बनाने की दिशा में संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियाँ लगातार कार्य कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों को बेहतर कार्य करने के लिए शान्ति के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।
इसमें कोई दो-राय नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने नाभिकीय हथियारों के प्रसार को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है तथा इसने कुछ विशेष भौगोलिक क्षेत्रों में नरसंहार तथा मानवाधिकार हनन को रोका है। संयुक्त राष्ट्र संघ कई देशों में स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव कराने में सम्बन्धित देशों के लोगों की मदद करता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देता है। लेकिन हमें यह भी सच स्वीकार करना होगा कि दुनिया के कई हिस्सों में विभिन्न राष्ट्रों तथा संगठनों के बीच चल रहे युद्ध, तथा ख़ूनी संघर्ष को संयुक्त राष्ट्र संघ रोकने में नाकामयाब रहा। वर्तमान समय में इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष तथा रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है; लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ इसे रोकने के लिए कुछ ख़ास नहीं कर पा रहा है।
भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन के आपसी मतभेद कभी-कभी बेहद तनावपूर्ण हो जाते हैं, जिससे क्षेत्र विशेष में युद्ध की आशंका बनी रहती है। कई बार यह पूर्व में देखा गया है कि बेहद तनावपूर्ण क्षणों में संयुक्त राष्ट्र संघ सिर्फ़ बयानबाज़ी करता है; शान्ति स्थापित करने के लिए ठोस प्रयास नहीं करता। कई देशों तथा संगठनों का ऐसा आरोप है कि संयुक्त राष्ट्र संघ तथा इसकी एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना महामारी के दौरान अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीक़े से नहीं किया।
बदलाव की माँग
संयुक्त राष्ट्र संघ की संरचना में बदलाव वर्तमान समय की माँग है। सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ का एक बेहद महत्त्वपूर्ण अंग है। पूरे विश्व में शान्ति व्यवस्था बनाए रखने में इस परिषद् की बड़ी भूमिका है। चीन, इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका और रूस इसके स्थायी सदस्य हैं, जबकि 10 देश अस्थायी सदस्य होते हैं। सुरक्षा परिषद् को लोकतांत्रिक बनाते हुए हमें स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ानी चाहिए।
एशिया से भारत और जापान, यूरोप से जर्मनी, अफ्रीका से दक्षिण अफ्रीका तथा दक्षिण अमेरिका से ब्राजील को शामिल करना न्यायसंगत होगा। सुरक्षा परिषद् में यूँ तो भारत कई बार अस्थायी सदस्य देश के तौर पर शामिल रहा है।
बदलते वैश्विक परिदृश्य में समय की माँग यह है कि सुरक्षा परिषद् में भारत समेत कुछ नये स्थायी सदस्यों को जोड़ा जाए, ताकि यह परिषद् ज़्यादा लोकतांत्रिक हो सके तथा दुनिया में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायित्व केवल पाँच देशों के भरोसे न रहे।
(लेखक मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)