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हरियाणा में अधिकारियों पर गाज

हरियाणा के गृहमंत्री अनिल विज के पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत कपूर को 372 जाँच अधिकारियों को तुरन्त प्रभाव से निलंबत करने के निर्देश से विभाग में हड़कंप मचा है। निर्देश के बाद कपूर ने गृहमंत्री को अधूरी जाँच पर तर्क देकर संतुष्ट करने का प्रयास किया; लेकिन बात नहीं बनी। गृहमंत्री ने तुरन्त प्रभाव से कार्रवाई करने को कहा। महानिदेशक ने सम्बन्धित ज़िला पुलिस आयुक्तों और पुलिस अधीक्षकों पर निलंबन की कार्रवाई की संस्तुति कर दी है।

राज्य में एक साथ सामूहिक तौर पर निलंबन का यह सबसे बड़ा मामला है। जाँच अधिकारियों में हवलदार, सहायक पुलिस निरीक्षक और पुलिस निरीक्षक हैं। अब इन 372 में 14 अधिकारी निलंबित हो चुके और 358 पर तलवार लटकी है। मामले की जाँच चल रही है, जो एक माह में सामने आएगी। ऐसा न होने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई का स्पष्ट निर्देश है। विज अपने आवास पर खुले दरबार में शिकायतें सुनते हैं, जिनमें काफ़ी तादाद में लोग पहुँचते हैं। इनमें से काफ़ी मामले प्राथमिकी पर महीनों से कार्रवाई न होने से जुड़े मिले। जाँच अधूरी होने से दो दोनों पक्ष प्रभावित होते हैं; लेकिन सवाल यह कि आख़िर दर्ज प्राथमिकी की जाँच में देरी क्यों की जाती है?

कुछ तकनीकी कारणों के अलावा ज़्यादातर मामलों में जाँच अधिकारी उसे जानबूझकर लम्बा खींचते हैं। किसी एक के पक्ष में कार्रवाई करने या न करने की बात होती है। राजनीतिक दबाव के चलते भी जाँच में देरी होती है। जाँच पूरी कर अदालत में चालान पेश करने की समय-सीमा होती है। पुलिस अक्षीधक ज़िले के ऐसे मामलों की रिपोर्ट लेते हैं और अपने तौर पर कार्रवाई भी करते हैं। इसके बावजूद एक साल या इससे ज़्यादा लंबित मामलों की संख्या राज्य में 3,329 तक पहुँच गयी। यह संख्या भी गृहमंत्री विज के जल्द निपटान के निर्देश के बाद की है।

राज्य के हर ज़िले में ऐसे मामले गृहमंत्री के सामने आ रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर उनके ही विभाग में ऐसी लेट-लतीफ़ी कैसे और क्यों चल रही है? इसी वर्ष मई में उन्होंने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को पत्र लिखकर लंबित मामलों की जानकारी और उन्हें जल्द पूरी कराने को कहा था। उन्हें ऐसे 3,329 मामलों की जानकारी दी गयी, जिनकी जाँच एक वर्ष से पूरी नहीं हुई थी। सभी जाँच अधिकारियों से स्पष्टीकरण माँगा गया था। इनमें से 372 के स्पष्टीकरण को विज ने संतोषजनक नहीं माना। वह उनके तर्कों से संतुष्ट नहीं हुए और कार्रवाई की सि$फारिश की।

पुलिस से लोगों की शिकायत प्राथमिकी दर्ज न करने की होती है; लेकिन विज के स्पष्ट निर्देश हैं कि पीड़ित पक्ष की प्राथमिकी दर्ज करने में हीला-हवाली हुई, तो कार्रवाई होगी। अब मामला प्राथमिकी दर्ज न करने का नहीं, बल्कि जाँच पूरी न करने का है। इसे विज ने बहुत गम्भीरता से लिया है। भुक्तभोगी लोग ही जानते हैं कि जाँच के नाम पर पुलिस क्या कुछ करती है। बिना रिपोर्ट के केवल तहरीर पर ही पुलिस बहुत कुछ कर सकती है।

राज्य में सबसे ज़्यादा 66 लंबित मामले सिरसा ज़िले के हैं। ज़िले में नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों की संख्या काफ़ी होती है, जिनकी जाँच में अक्सर ज़्यादा समय लगता है। लेकिन इतना भी नहीं, जितना ज़िले के जाँच अधिकारी लगा रहे हैं। जितनी ज़्यादा जाँच लम्बी चलेगी, उसमें पक्षपात और भ्रष्टाचार की गुंजाइश ज़्यादा रहती है। जाँच अधिकारी को विभिन्न प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ता है, ऐसे में उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

जाँच रिपोर्ट के आधार पर ही अदालत में चालान पेश होता है। अगर अदालत में रिपोर्ट पर ही अदालत तल्ख़ टिप्पणी कर दे, तो पूरे पुलिस विभाग की छीछालेदर भी होती है। ऐसे ही निष्पक्ष और तथ्यपरक सुबूतों के आधार पर दोषियों को कड़ा दण्ड भी मिलता है। विज औचक दौरों में तुरन्त प्रभाव से निलंबन की कार्रवाई करते रहे हैं। यह पहला मौक़ा है कि उन्होंने सामूहिक तौर पर इतने जाँच अधिकारियों पर कार्रवाई का निर्देश दिया है।

ज़िलों में लंबित मामले

प्रदेश के सिरसा में 66, गुरुग्राम में 60, यमुनानगर में 57, फ़रीदाबाद में 32, रोहतक में 31, करनाल में 31, अंबाला में 30, जींद में 24, हिसार में 14, पंचकुला में 10, सोनीपत में नौ, रेवाड़ी में पाँच और पानीपत में तीन मामले लंबित हैं।

लंबित मामलों से लोगों को बेवजह भटकना पड़़ता है। यह गम्भीर मामला है। जल्द जाँच पूरी करने के निर्देश के बावजूद मामलों की संख्या इतनी होना विभाग के लिए ठीक नहीं।

अनिल विज

गृहमंत्री, हरियाणा

गृहमंत्री के निर्देशों के पालन हेतु सम्बन्धित ज़िला पुलिस आयुक्तों और पुलिस अधीक्षकों पर कार्रवाई के लिए कह दिया गया है।

शत्रुजीत कपूर

पुलिस महानिदेशक, हरियाणा

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव

किस तरफ़ जाएँगे आदिवासी?

देश अभी सर्द मौसम के आग़ोश में आने लगा है; लेकिन देश के पाँच राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनावी सरगर्मी ज़ोरों पर है। बीते 9 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ने इन पाँचों राज्यों में चुनाव के तारीख़ों की घोषणा कर दी। छत्तीसगढ़ में  07 नवंबर और 17 नवंबर को दो चरणों में मतदान होगा, जबकि अन्य चार राज्यों में एक-एक चरण में ही मतदान होगा। मध्य प्रदेश में 17 नवंबर को, राजस्थान में 25 नवंबर को, तेलंगाना में 30 नवंबर को और मिजोरम में 07 नवंबर को मतदान होगा। जबकि पाँचों राज्यों में मतगणना 03 दिसंबर को होगी।

यह पाँचों राज्य आदिवासी बाहुल्य हैं और संविधान के विशेष क़ानून पाँचवीं और छठवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। यही कारण है कि पाँचों राज्यों में आदिवासियों को लुभाने के लिए सभी पार्टियाँ, चाहे वह केंद्र में सत्तासीन भाजपा हो या फिर विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन; सभी तरह-तरह की घोषणाएँ कर रही हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं और यह लगभग तय माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में जिसका पलड़ा भारी होगा, देश का अगला शासक वही होगा।

इन सभी राज्यों में मध्य प्रदेश का चुनाव का$फी महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि जनसंख्या के लिहाज़ से इन पाँचों राज्यों में मध्य प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है और क्षेत्रफल के लिहाज़ से दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। मध्य प्रदेश में देश की सबसे अधिक आदिवासी आबादी निवास करती है, जो राज्य की कुल आबादी की 22 प्रतिशत है। मध्य प्रदेश में अब तक का यह चलन रहा है कि आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों को जो पार्टी सबसे ज़्यादा जीतने में कामयाब होती है, उसकी सरकार बनती है। राज्य के पिछले पाँच विधानसभा चुनावों के आँकड़े देखें, तो यही बात सामने आती है। सन् 1998 और सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी आरक्षित अधिक सीटों को कांग्रेस पार्टी जीतने में कामयाब हुई थी, तो उसकी सरकार बनी; जबकि सन् 2003, सन् 2008 और सन् 2013 में भाजपा ने अधिक सीटें जीतीं, तो उसकी सरकार बनी। 47 विधानसभा सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं। आदिवासी मतदाता आरक्षित 47 सीटों के अलावा 35 अन्य विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं; क्योंकि इन 35 सीटों पर आदिवासी मतदाताओं की संख्या 50,000 से 1,00,000 तक है। इसके अलावा अन्य सभी सीटों पर भी लगभग 5,000 से 35,000 तक आदिवासी मतदाता हैं। इसलिए मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस नेता आदिवासियों को लुभाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी से लेकर राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी, अमित शाह जैसे नेताओं ने भी आदिवासी क्षेत्रों में सभाएँ कर आदिवासियों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा पेसा एक्ट और चरण पादुका योजना के तहत साड़ी-सैंडल-चप्पल बाँटकर आदिवासियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। वहीं कांग्रेस पार्टी ने मध्य प्रदेश के आदिवासी जनता को लुभाने के लिए कई प्रकार की घोषणाएँ की हैं, जिसमें मुख्य रूप से 50 प्रतिशत से अधिक आदिवासी आबादी वाले क्षेत्रों में संविधान की छठवीं अनुसूची लागू करना, पेसा क़ानून का मूल नियम लागू करना, आदिवासियों को वन अधिकार पत्र देना, भगोरिया उत्सव को राजकीय मान्यता, एससी-एसटी श्रमिकों को सुनिश्चित रोज़गार, एक करोड़ के ठेके में एससी-एसटी को 25 प्रतिशत आरक्षण, सरकारी ख़रीदी में एससी-एसटी को 25 प्रतिशत आरक्षण, जातिगत जनगणना कराना, 4,000 रुपये में प्रति बोरा तेंदूपत्ता ख़रीदना, चयन समिति में एससी-एसटी सदस्य, बैकलॉग भर्ती अभियान इत्यादि शामिल है।

हालाँकि मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) हैं। गोंगपा का विंध्य और महाकौशल क्षेत्र में 21 आरक्षित विधानसभा सीटों पर प्रभाव है। वहीं जयस संगठन का प्रभाव मालवा-निमाड़ के साथ-साथ मध्य, विंध्य और महाकौशल क्षेत्र में भी है। इसके अलावा कुछ अन्य राजनीतिक दल जैसे- भारतीय आदिवासी पार्टी, भारतीय ट्राइबल पार्टी, बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और आम आदमी पार्टी भी हैं, जो कुछ चुनौती देंगी। इसमें गोंगपा का बसपा से गठबंधन हो चुका है। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के समीकरणों का प्रभावित होना लाज़िमी है।

हालाँकि कांग्रेस पार्टी ने जयस संगठन के साथ गठबंधन करके आदिवासी वोटरों के बीच पैठ बनाने की कोशिश की है; लेकिन भाजपा के लिए मध्य प्रदेश की राह आसान नहीं होगी। क्योंकि विगत तीन वर्षों में मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर जिस तरह की घोर अत्याचार की घटनाएँ हुईं और साथ ही आदिवासियों के लिए आरक्षित पदों को भी जिस तरह से अनारक्षित में बदलकर उसमें भ्रष्टाचार किया गया, उससे पूरा आदिवासी समाज नाराज़ है। जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हिरालाल अलावा ने भाजपा के पेसा एक्ट और चरण पादुका योजना पर सवाल उठाये हैं। उनका कहना है कि आदिवासियों को बाँटी जाने वाली वनोपज की राशि 1,040 करोड़ रुपये का बंदरबाँट कर भाजपा सरकार ने चरण पादुका योजना के तहत आदिवासियों को 261 करोड़ रुपये के साड़ी, सैंडल और चप्पल बाँट दिये। उन्होंने पेसा एक्ट के शिथिल प्रावधानों पर भी सवाल उठाये।

(लेखक पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

बेक़ाबू नफ़रत

नफ़रत से कुछ हल नहीं होने वाला। दिमाग़ों में उगने वाली यह ज़हरीली फ़सल सिवाय तबाही और दु:ख के कुछ और नहीं दे सकती। नफ़रत में जो पड़ा, समझिए उसने अपनी और अपनी नस्लों की जीते-जी हत्या कर दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दशहरा वाले दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक कार्यक्रम में देश में पनप रही नफ़रत को लेकर जो कहा, उसके सभी लोग अपने-अपने हिसाब से मतलब निकाल रहे हैं।

देश में पनप रही नफ़रत और अपनों को ही पराया समझने की धारणा के बारे में भागवत का बयान इतना दो-अर्थी है कि हर पक्ष के लोग उसका अर्थ अपने-अपने हिबास से निकालने लगे। उन्होंने कहा कि अपना दिमाग़ ठंडा रखकर सबको अपना मानकर चलना पड़ेगा। यह अपनेपन की पुकार है; जिसे सुनायी देगी, उसी का भला होगा। जो फिर भी नहीं सुनेंगे, उनका क्या होगा? यह पता भी नहीं लगेगा। आख़िर एक ही देश में रहने वाले इतने पराये कैसे हो गये?

हालाँकि मोहन भागवत ने यह नहीं बताया कि इस लोकतांत्रिक देश में अपनों को ही पराया करने वाले आख़िर कौन लोग हैं? उन्होंने इन नफ़रती लोगों की कपड़ों से पहचान भी नहीं बतायी। उन्होंने उन लोगों का नाम भी नहीं लिया, जिनकी ज़ुबान से हरदम नफ़रतों के शोले बरसते हैं। उन्होंने भाईचारे की बात करने वालों की तारीफ़ भी नहीं की। उन्होंने तिरंगे का अपमान करने वालों को, संविधान की प्रतियाँ जलाने वालों को और भीड़ के रूप में इकट्ठे होकर आम लोगों को पीटने वालों को भी कोई संदेश नहीं दिया। फिर आख़िर सरसंघचालक ने किसको धमकाया? उन्होंने जी-20 के सफल आयोजन से लेकर राम मंदिर जैसे कुछ कामों को लेकर सरकार की तारीफ़ की। जनता से चुनावों में सतर्क रहने को कहा। किसी के बहकावे में आकर मतदान नहीं करने को कहा। लोगों से यह भी अपील की, कि जो बेहतर हो, उसे ही वोट देना। मणिपुर में हिन्दू-मुस्लिम एकता का ज़िक्र भी किया। लेकिन यह नहीं बताया कि देश की लोकतांत्रिक छवि पर नफ़रत की कालिख कौन पोत रहा है?

ऐसा लगता है कि सरसंघचालक ने ‘एकै साधे सब सधै’ वाले अंदाज़ में सब कुछ गोलमोल करके सभी को ख़ुश करने की कोशिश की। सच कहने की कोशिश तो उन्होंने की; लेकिन सच को सही तरी$के से कहने से बचते रहे। नफ़रत फैलाने वालों को सीधे-सीधे निशाना नहीं बना सके। बुराई के रावण की ओर तीर तो चलाये; लेकिन निशाने पर एक भी नहीं लगा। अगर लगता, तो छत्तीसगढ़ में विरोधी पार्टी के मुख्यमंत्री को उलटा लटकाने की बात अमित शाह ने नहीं कही होती। मध्य प्रदेश में एक भाजपा नेता विरोधी दल के नेता के बेटे को पिल्ला नहीं बोला होता। लेकिन मोहन भागवत ने नफ़रत फैलाने वालों पर जिस तरह से तंज कसते हुए धमकाया, उससे सब अपनी-अपनी बग़लें झाँकने लगे। इसी का नाम राजनीति है। जो अपने गिरेबान में झाँकने के बजाय अपनी ग़लतियों पर तंज कसते हुए इशारों-इशारों में दूसरों को धमका दे, वही आज का कुशल राजनेता है। उसे लोग अपना मानने में देरी नहीं लगाते। इससे नाराज़ लोग भी राज़ी हो जाते हैं। अपनों के द्वारा लगायी आग में बाल्टी से पानी डालकर वाहवाही लूटने का हुनर यही है।

हालाँकि इस देश में कोई दल, कोई धर्म और कोई जाति ऐसी नहीं, जिसमें नफ़रत बाँटने वाले न हों। अवसर और ताक़त मिलने पर कुछ ही लोग ज़मीन पर रहते हैं। अधिकतर आसमान में उड़ने लगते हैं और उनके दिमाग़ ख़राब हो जाते हैं। ताक़तवरों का क़ानून भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता। पुलिस ऐसे लोगों को मसीहा मान लेती है। इसलिए उनका डर भी ख़त्म हो जाता है। ताक़त का नशा ही कुछ ऐसा होता है। इसी नशे में अपने से कमज़ोर विरोधियों को प्रताड़ित करने की परम्परा आज देश की राजनीति का प्रमुख हिस्सा हो चुकी है।

बचपन में सुनते थे कि पुलिस रस्सी का साँप बना देती है। अब लगता है कि पुलिस भले ही निर्बलों को डराने और दबाने के लिए रस्सी का साँप बनाती हो; लेकिन सत्ता में बैठे लोग एक जादूगर की तरह कुछ भी बना और बिगाड़ सकते हैं। लेकिन उनके इस खेल से देश और जनता का नुक़सान होता है। हालाँकि इसमें कोई जादू-आदू नहीं होता। सिर्फ़ ताक़त का खेल होता है, जिस पर सवाल नहीं उठते। क़ानून का डण्डा नहीं उठता। पुलिस रस्सी का साँप नहीं, साँप की रस्सी बना देती है। यह खेल जिस-जिसके ख़िलाफ़ खेला जाता है, वह सच्चा और ईमानदार होकर भी गुनाहगार साबित हो जाता है। यह भी नफ़रत का ही एक रूप है, जिसे सत्ता बचाये रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। काश! मोहन भागवत इस बेक़ाबू नफ़रत को भी धमका पाते।

एप्पल अलर्ट मामला: राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर साधा निशाना कहा- पीएम मोदी जी की आत्मा अडानी के अंदर बसती है

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि, नरेंद्र मोदी की आत्मा अडानी में है। राजा-राजा नहीं है, पावर किसी और के हाथ (अडानी) के हाथ में है। पहले मैं सोचता था कि नम्बर 1- मोदी जी, नम्बर 2- अडानी जी और नंबर 3- अमित शाह है। लेकिन यह बिल्कुल उल्टा है- नम्बर 1 अडानी जी है।

दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने ऐप्पल से प्राप्त एक कथित टेक्स्ट संदेश का हवाला देते एक कहानी सुनाते हुए कहा कि, “पुराने समय मे एक राजा था, जिसकी आत्मा एक तोते में बसती थी। उसी तरह नरेंद्र मोदी जी की आत्मा अडानी के अंदर बसती है। यह बात विपक्ष को पता चल चुकी है। इसलिए अडानी को हमने ऐसा घेरा है कि वो बचकर नहीं निकल सकते।”

कांग्रेस सांसद ने आगे कहा कि, “देश में विपक्ष के नेताओं को एप्पल का नोटिस आया है। जिसमें लिखा है कि- सरकार द्वारा आपके फोन को हैक करने की कोशिश की जा रही है। ये मैसेज मेरे ऑफिस के लोगों के साथ ही विपक्ष के कई नेताओं को आया है हमारे पास इसकी पूरी लिस्ट है। वे (भाजपा) युवाओं का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। क्योंकि नुकसान हिंदुस्तान के युवाओं का हो रहा है। ये युवाओं को सपने दिखाते है इंजीनियर, डॉक्टर और आईएएस बनने के झूठे सपने दिखाते है। लेकिन हम युवाओं का नुकसान नहीं होने देंगे। इसके लिए हम लड़ाई लड़ रहे है और लड़ते रहेंगे, पीछे नहीं हटेंगे।”

एक सवाल का जवाब देते हुए राहुल गांधी ने कहा कि, “पिछली पेगासस पूछताछ में मेरा नाम था। वह गायब हो गया। ये आपको देश के हालात बताता है। यह स्पष्ट रूप से घबराहट का मामला है, यह स्पष्ट रूप से किसी ईमानदार व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया है। जासूसी पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि यह चोरों और अपराधियों द्वारा किया जा रहा है।”

आपको बता दें, मंगलवार को कई विपक्षी नेताओं- कांग्रेस के शशि थरूर, पवन खेड़ा, सुप्रिया श्रीनेत, सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी, एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी से लेकर आप के राघव चड्ढा, टीएमसी की महुआ मोइत्रा तक सभी राजनीतिक दलों के विपक्षी नेताओं ने मंगलवार को दावा किया है कि उन्हें एप्पल से एक ‘खतरे की सूचना’ मिली है, जिसमें उनके आईफोन पर संभावित राज्य-प्रायोजित स्पाइवेयर हमले की चेतावनी दी गई है।

सरदार पटेल की जयंती पर गुजरात में बोले पीएम मोदी- स्टैच्यू ऑफ यूनिटी एक भारत, श्रेष्ठ भारत का प्रतीक है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती पर मंगलवार को गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर पुष्पांजलि अर्पित कर कहा कि, राष्ट्रीय एकता के लिए लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिबद्धता आज भी सभी का मार्गदर्शन करती है और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी एक भारत, श्रेष्ठ भारत का प्रतीक है।

अपने संबोधन में पीएम ने आगे कहा कि, “15 अगस्त को दिल्ली के लाल किले पर होने वाला आयोजन 26 जनवरी को दिल्ली के कर्तव्य पथ पर परेड और 31 अक्टूबर को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के सानिध्य में मां नर्मदा के तट पर राष्ट्रीय एकता दिवस का ये मुख्य कार्यक्रम, राष्ट्र उत्थान की त्रिशक्ति बन गए हैं। सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है।”

सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा का जिक्र करते हुए उन्होंने आगे कहा कि, “एकता नगर में आने वालों को सिर्फ इस भव्य प्रतिमा के ही दर्शन नहीं होते बल्कि उसे सरदार साहब के जीवन, त्याग और एक भारत के निर्माण में उनके योगदान की झलक भी मिलती है। इस प्रतिमा की निर्माण गाथा में ही एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना का प्रतिबिंब है।”

केरल सीरियल ब्लास्ट: आरोपी ने खाड़ी में किया था बिजली का काम, दो रिमोट का उपयोग कर किया था ब्लास्ट

केरल सीरियल ब्लास्ट की प्रारंभिक जांच से पता चला है कि कोच्चि विस्फोटों का मुख्य मार्टिन दो महीने पहले तक मध्य पूर्व में इलेक्ट्रिकल फोरमैन के रूप में काम कर रहा था। मार्टिन ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग करके आईईडी के साथ प्रयोग करने का कौशल हासिल कर लिया था।

पुलिस की जांच में यह भी सामने निकलकर आया है कि डोमिनिट मार्टिन ने विस्फोटक बनाने के तरीके के बारे में जानने के लिए इंटरनेट पर बड़े पैमाने पर खोज की और कोच्चि के थम्मानम में अपने घर पर एक से अधिक आईईडी बनाए थे। और इन्हीं आईईडी को लेकर मार्टिन रविवार की सुबह कलामासरी के कन्वेंशन सेंटर पहुंचा था।

मार्टिन ने दो रिमोट का उपयोग करके विस्फोट कर घटना को अंजाम दिया और इसके बाद वह अपने दोपहिया वाहन से एक होटल में पहुंचा जहां उसने अपना वीडियो अपलोड किया। साथ ही करीब आधा घंटा होटल में बिताने के बाद विस्फोट की जिम्मेदारी लेते हुए कोडकारा के पुलिस स्टेशन पहुंचा।

आपको बता दें, पुलिस ने सोमवार को औपचारिक रूप से मार्टिन को गिरफ्तार किया। पुलिस ने मार्टिन पर यूएपीए, विस्फोटक अधिनियम और आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

वहीं एडीजीपी (कानून एवं व्यवस्था) एम आर अजित कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम ने सोमवार को उनसे पूछताछ भी की है। कोच्चि शहर के पुलिस आयुक्त ए अकबर ने कहा कि, “विस्फोट में उसकी भूमिका का पता लगाने के लिए पर्याप्त आधार थे।”

दिल्ली शराब नीति मामला: सीएम अरविंद केजरीवाल को ईडी ने 2 नवंबर को पूछताछ के लिए बुलाया

दिल्ली शराब नीति मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को नोटिस भेज 2 नवंबर को पूछताछ के लिए बुलाया है। इससे पहले केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) केजरीवाल को अप्रैल महीने में पूछताछ के लिए बुला चुकी है।

आम आदमी पार्टी (आप) के आधिकारिक एक्स हैंडल पर कहा गया है कि, “आम आदमी पार्टी को खत्म करना ही केंद्र सरकार का मकसद है। केंद्र सरकार फर्जी केस बनाकर अरविंद केजरीवाल को जेल में बंद करना चाहती है।”

वहीं आप नेता सौरभ भारद्वाज ने सीएम केजरीवाल को मिले समन पर कहा कि, “केंद्र सरकार की ईडी की अरविंद केजरीवाल को 2 नवंबर को तलब किया है साफ है कि बीजेपी किसी भी कीमत पर आप को कुचलना चाहती है। वे अरविंद केजरीवाल को फर्जी मामले में गिरफ्तार करना और आप को कुचलना चाहती है।”

आपको बता दें, दिल्ली शराब नीति मामले में दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह पहले से ही जेल में बंद है। आप सरकार में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेल में बंद है। वहीं सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सिसोदिया की जमानत याचिका भी खाली कर दी है साथ ही कोर्ट ने 8 महीने के अंदर मामले की जांच पूरी करने का आदेश दिया है। 

केरल सीरियल ब्लास्ट: केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर के खिलाफ नफरत फैलाने वाला प्रचार करने के आरोप में मामला दर्ज

केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर के खिलाफ केरल पुलिस ने नफरत फैलाने वाला प्रचार करने के आरोप में मामला दर्ज किया है। एफआईआर में कहा गया है कि मंत्री ने एक्स पर नफरत फैलाने का काम किया है।

बता दें, कोच्चि में हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद राजीव चंद्रशेखर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तुष्टिकरण की राजनीति करने के लिए सीएम की आलोचना करते हुए कहा था कि, “दिल्ली में बैठकर इजराइल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि केरल में आतंकवादी के जरिए जिहाद करने को कहे जाने की वजह से निर्दोष ईसाइयों पर हमले और बम धमाके हो रहे हैं।”

वहीं चंद्रशेखर के बयान पर राज्य के सीएम पिनराई विजयन ने उनका नाम लिए बिना पलटवार करते हुए कहा था कि, “जो लोग जहरीले हैं, वो जहर उगलते रहेंगे। एक केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि मैं तुष्टिकरण की राजनीति कर रहा हूं और इजरायल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा हूं।”

आपको बता दें, केरल के कोच्चि शहर में रविवार को एक कन्वेंशन सेंटर में करीब 2 हजार लोगों के एक साथ प्रार्थना सभा के दौरान तीन सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इसमें तीन लोगों की मौत और कर्इ घायल है। धमाके के बाद ईसाइयों के यहोवा के साक्षी संप्रदाय का सदस्य होने का दावा करते हुए एक शख्स ने त्रिशूर जिला पुलिस के सामने सरेंडर भी कर दिया था।

महाराष्ट्र में हिंसक मराठा आरक्षण कार्यकर्ताओं ने जलाया एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंके के घर को आग के हवाले किया

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर आंदोलनकारियों ने सोमवार को राज्य के बीड जिले में एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंके के आवास पर हमला कर आग लगा दी। संयोग से विधायक और उनका परिवार व स्टाफ के लोग सुरक्षित बच गए है।

राज्य के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने घटना को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने मराठा आरक्षण कार्यकर्ताओं से हिंसा से दूर रहने और अपने आंदोलन को शांतिपूर्वक करने को कहा और मनोज जरांगे पाटिल को इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि यह विरोध क्या मोड़ ले रहा है। यह गलत दिशा में जा रहा है।

वहीं एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंके ने एक्स पर बताया कि, “जब हमला हुआ तब मैं अपने घर के अंदर था। सौभाग्य से मेरे परिवार का कोई भी सदस्य या कर्मचारी घायल नहीं हुआ। हम सभी सुरक्षित हैं लेकिन एक आग के कारण संपत्ति का भारी नुकसान हुआ है।”

एनसीपी नेता और सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि, “महाराष्ट्र में जो ट्रिपल इंजन की सरकार है, ये उनकी विफलता है। आज एक विधायक का घर जलाया जाता है, गृह मंत्रालय क्या कर रहा है और गृह मंत्री क्या कर रहे हैं? ये उनकी जिम्मेदारी है।”

आपको बता दें, महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की मांग कोई नई नहीं है बल्कि काफी पुरानी है। इसे लेकर लोग कई बार सड़कों पर उतर चुके हैं। पिछले सितंबर में जालना में आंदोलनकारियों पर हुए लाठीचार्ज के बाद कार्यकर्ताओं ने हिंसक रूप अपनाया था। और इस हिंसा में 42 पुलिसकर्मियों सहित कई अन्य लोग भी घायल हुए थे।

केरल ब्लास्ट: मरने वालों की संख्या बढ़कर हुई 3, सीएम पिनराई विजयन ने बुलाई बैठक

केरल में रविवार को एर्नाकुलम जिले में तीन बार हुए सीरियल ब्लास्ट में मरने वालों की संख्या बढ़कर तीन और घायलों की संख्या 32 हो गई है इनमें से 5 की हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है।

इस मामले में पुलिस ने यूएपीए के तहत एफआईआर दर्ज किया है। वहीं राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने आज इस मामले में ऑल पार्टी मीटिंग बुलाई है। इससे पहले विजयन ने गृह मंत्री अमित शाह से इस घटना को लेकर बातचीत की थी।

बता दें, यह धमाके यहोवा के साक्षी सम्मेलन के दौरान हुए थे। जिस समय यह धमाके हुए मौके पर करीब 2 हजार से ज्यादा लोग मौजूद थे।

केरल सीरियल ब्लास्ट मामले में पुलिस ने आईपीसी की धारा 302 और 307 के तहत एफआईआर दर्ज की गयी थी। अब इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ यूएपीए लगाया गया है। साथ ही खुफिया एजेंसियां केरल विस्फोट की जांच में आईएसआईएस मॉड्यूल पर नजर रख रही है।

इस सीरियल ब्लास्ट की जांच 20 सदस्यीय टीम करेगी। केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने रविवार को कहा था कि 52 लोगों को विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया था। इनमें से 18 आईसीयू में थे और 12 वर्षीय लड़की सहित छह गंभीर रूप से घायल थे।

आपको बता दें, इस हमले के बाद एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर हमले की जिम्मेदारी ली है और खुद की पहचान मार्टिन के रूप में की है।

इस व्यक्ति ने वीडियो में कहा कि उसने विस्फोट इसलिए किए क्योंकि संगठन की शिक्षाएं देश के लिए सही नहीं है। सभी को बम धमाकों और इसके बाद हुए गंभीर नतीजों के बारे में पता चल गया होगा। वहां क्या हुआ मुझे ठीक-ठीक पता नहीं है, लेकिन मैं जानता हूं कि यह हुआ और मैं इसकी पूरी जिम्मेदारी लेता हूं।