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इंडिया गठबंधन की चुनौतियाँ

सत्ताधारी गठबंधन एनडीए के ख़िलाफ़ बने विपक्षी महागठबंधन इंडिया में दरार की चर्चा के बाद अखिलेश यादव ने खुलकर साफ़ कर दिया है कि कांग्रेस की विधानसभा में सीटों को न बाँटने की स्थितियाँ  लोकसभा में भी बनी रहेंगी। अखिलेश ने कहा है कि अगर अभी विधानसभा चुनाव में गठबंधन नहीं होगा, तो भविष्य में भी प्रदेश स्तर का गठबंधन नहीं होगा। इंडिया से पहले पीडीए बन गया था। पीडीए ही एनडीए को हराएगा।

मुझे लगता है कि यह अपने-अपने वर्चस्व को बचाये रखने की लड़ाई है; जो हर राज्य में सामने आनी ही है। और यह लड़ाई यूपीए से लेकर इंडिया गठबंधन तक ही नहीं, बल्कि एनडीए में भी शुरू से ही रही है। इसलिए मध्य प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच सीटों के बँटवारे के लेकर बात नहीं बनना कोई नयी बात नहीं है और न ही इस पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं को बहुत ख़ुश होने की ज़रूरत है।

हालाँकि जिस प्रकार से मध्य प्रदेश में कांग्रेस और सपा के बीच सीटों को लेकर नोकझोंक हुई, दोनों तरफ़ से बयानबाज़ी सामने आयी और जिस प्रकार से दोनों पार्टियों ने अपने-अपने उम्मीदवारों को अपनी मर्ज़ी से मैदान में उतारते हुए चुनाव लडऩे का निर्णय लिया, उससे आगामी चुनावों में इंडिया गठबंधन की फूट के संकेत मिलते हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि गठबंधन में मध्य प्रदेश के अंदर कांग्रेस और सपा में पड़ी दरार यह साबित करती है कि गठबंधन में शामिल सभी 26 पार्टियों के बीच इस तरह की चुनौतियाँ आगे भी आड़े आएँगी-ही-आएँगी। इसकी वजह यह है कि जहाँ जिस पार्टी का वर्चस्व होगा, वो वहाँ की सीटों पर समझौता करने को राज़ी नहीं होगी और जहाँ जिस पार्टी का कोई वर्चस्व नहीं होगा, वो वहाँ पर सीटों की माँग करेगी। इस प्रकार से सभी पार्टियों का हर चुनाव में अपनी अलग राह होगी और इससे नुक़सान भी इंडिया गठबंधन को ही होगा, जो कि भाजपा के नेता भी चाहते हैं। इसलिए कांग्रेस को अभी से यह मान लेने की बजाय कि उसकी जीत के रास्ते खुल चुके हैं और उसे अब किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है, यह समझना चाहिए कि उसे अपने साथ इंडिया गठबंधन में आयी सभी पार्टियों को एकजुटता के धागे में बाँधे रखना है और किसी भी तरह से केंद्र की सत्ता में वापसी करना है।

दरअसल कांग्रेस देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में उसे लगता है कि उसके पीछे कोई भी पार्टी मजबूरन लगी रहेगी, चाहे वो जिस प्रकार भी सीटों का बँटवारा करे। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कहीं-न-कहीं मिजोरम में भी सर्वे के आँकड़े सामने आने के बाद कांग्रेस में इस प्रकार का विश्वास, जिसे मैं ख़ुशफ़हमी कहना ज़्यादा बेहतर समझूँगा; बढ़ा है। लेकिन उसे समझना होगा कि क्षेत्रीय पार्टियाँ, जहाँ उनका वर्चस्व होगा, वो भी फिर कांग्रेस के साथ अपने-अपने राज्यों में यही बर्ताव करेंगी। और अगर इसी प्रकार से मध्य प्रदेश की तरह सब कुछ चलता रहा, तो हर राज्य के चुनावों में तो यह दिक़्क़त आने ही वाली है, 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सीटों के बँटवारे को लेकर यह दिक़्क़त इंडिया गठबंधन के सामने आएगी। क्योंकि जिस राज्य में कोई राज्य स्तरीय पार्टी मज़बूत होगी, वो वहाँ विधानसभा सीटों को लेकर तो कांग्रेस पर अपनी मर्ज़ी थोपेगी ही, साथ ही लोकसभा की सीटें भी अपनी मर्ज़ी से ही देने पर राज़ी होगी। अखिलेश इसका इशारा कर चुके हैं। ज़ाहिर है कि कांग्रेस को इससे अपना क़द घटने का एहसास होगा और वो फिर वहाँ अपनी मर्ज़ी चलाने के लिए मैदान में अपनी मनचाही सीटों पर अलग से टिकट देने की कोशिश करेगी। क्योंकि उसे हर जगह अपने बड़े होने का रुतबा भी क़ायम रखना है।

कांग्रेस की दावेदारी मध्य प्रदेश से भी ज़्यादा राजस्थान में है। राजस्थान में कांग्रेस को वापसी की पूरी उम्मीद है, क्योंकि वहाँ मौज़ूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मज़बूती और वसुंधरा राजे की भाजपा शीर्ष नेतृत्व से नाराज़गी, पार्टी में स्थानीय उम्मीदवारों के टिकट काटकर नये चेहरों और सांसदों को मैदान में उतारना भाजपा को भारी पड़ सकता है। मध्य प्रदेश में भी भाजपा की यही स्थिति बनी हुई है। रही बात छत्तीसगढ़ की, तो वहाँ भी कांग्रेस को जीत का पक्का भरोसा है। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक मज़बूत नेता हैं और सरकार को वहाँ भी वापसी का विश्वास है, जिसकी पुष्टि सर्वे ने भी कर दी है। ज़ाहिर है कि कांग्रेस वहाँ भी अपने किसी सहयोगी दल को ज़्यादा सीटें देने से बचेगी।

इसी प्रकार से मिजोरम में भी कांग्रेस को जीत का भरोसा है। क्योंकि उसके पड़ोसी राज्य मणिपुर में जिस प्रकार से हिंसा का माहौल है, उससे पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी हुई है और लोगों में उसके प्रति जिस प्रकार से ग़ुस्सा देखने को मिल रहा है, उससे लगता है कि मिजोरम में कांग्रेस मज़बूत हो सकती है। सर्वे के आँकड़े भी कुछ इसी प्रकार का इशारा कर रहे हैं।

रही तेलंगाना की बात, तो वहाँ की सबसे मज़बूत पार्टी भारत राष्ट्र समिति है, जिसके मुखिया के. चंद्रशेखर राव वर्तमान में तेलंगाना के मुख्यमंत्री भी हैं। के. चंद्रशेखर राव की ग्रामीण क्षेत्रों में तो इतनी पकड़ है कि उन्हें कोई भी पार्टी वहाँ आसानी मात नहीं दे सकती। क्योंकि तेलंगाना को बनाने में के. चंद्रशेखर राव का जो योगदान है, वो किसी का नहीं है। शहरों में कांग्रेस को थोड़ा समर्थन मिल सकता है, जिसके बूते वो कुछ सीटें वहाँ जीत सकती है; लेकिन अगली सरकार भी के. चंद्रशेखर राव की ही बनने की उम्मीद ज़्यादा है। हालाँकि के. चंद्रशेखर राव की पार्टी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है; लेकिन तेलंगाना में कांग्रेस पहले से मज़बूत बतायी जा रही है, जिससे उसे लगता है कि वो वहाँ भी बहुमत से अगर नहीं भी जीती, तो भी मज़बूत विपक्ष के रूप में उभरेगी। लेकिन वहाँ दिक़्क़त यह हो सकती है कि अगर कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही, जिसकी संभावनाएँ काफी हैं, तो उसके विधायक टूटकर के. चंद्रशेखर की पार्टी में जाने का डर रहेगा, जैसा कि पहले भी हो चुका है। ऐसे में वहाँ इंडिया गठबंधन में सीटों का बँटवारे को लेकर शायद ही किसी दूसरी सहयोगी पार्टी को वह सीटें दे।

बहरहाल ये तो रही उन राज्यों की बात, जिनके चुनाव इसी नवंबर के महीने में ही होने हैं। इसके अलावा अगर हम 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद होने वाले विधानसभा चुनावों की बात करें, तो देखेंगे कि कई राज्य ऐसे हैं, जहाँ क्षेत्रीय पार्टियाँ बहुत मज़बूत हैं। मसलन उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद है। ऐसे में अगर गठबंधन की बात करें, तो वहाँ कांग्रेस को सीटें देने में अखिलेश और जयंत मुसीबत खड़ी करेंगे, क्योंकि वे फिर उसी राह पर चलेंगे, जिस राह पर मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस चल रही है। इसी प्रकार से दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी किसी भी हाल में किसी भी पार्टी को सीटें देने से बचना चाहेगी। पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस सबसे मज़बूत पार्टी है। ज़ाहिर है कि वहाँ तृणमूल की मुखिया और प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो एक राष्ट्रीय छवि की मज़बूत नेता हैं; अपनी वर्चस्व वाली सीटें छोडऩे पर शायद ही राज़ी हों।

इसी प्रकार से बिहार में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सबसे मज़बूत पार्टी है और उसके बाद नीतीश की जनता दल (यूनाइटेड) यानी जद(यू) दूसरी सबसे मज़बूत पार्टी बिहार की है। इसके अलावा वहाँ क्षेत्रीय पार्टियाँ बड़ी संख्या में हैं, जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में भरपूर वर्चस्व है। कांग्रेस को वहाँ भी थोड़े में सब्र करना पड़ेगा। झारखण्ड में भी शिबू सोरेन की पार्टी झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के आगे कांग्रेस वहाँ उतनी मज़बूत नहीं है। इसी प्रकार से महाराष्ट्र में शिवसेना और नेशनल कांग्रेस पार्टी ज़्यादा मज़बूत हैं, और वो वहाँ कांग्रेस को अपनी मर्ज़ी से ही सीटें देंगी। लेकिन पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद अगर तीन से चार राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो कांग्रेस का हौसला बढ़ेगा और कांग्रेस इन प्रदेशों में बहुत ज़्यादा समझौता न करते हुए, अकेले चुनाव के मैदान में जाने का फैसला भी ले सकती है। जैसे कि उत्तर प्रदेश की बात करें, तो उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित समाज कहीं-न-कहीं कांग्रेस की तरफ़ आकर्षित होता नज़र आ रहा है।

दरअसल, पिछले दिनों आज़म खान की गिरफ्तारी पर अखिलेश यादव का घर से न निकलना कहीं-न-कहीं मुस्लिम समाज में नाराज़गी का एक कारण है। मुस्लिम समाज को लगता है कि कांग्रेस ही उसके लिए बेहतर विकल्प है। दूसरी ओर दलितों के लिए मायावती का कोई निर्णय न लेना भी कांग्रेस की राह खोलता नज़र आ रहा है। तो इससे लगता है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार तेज़ी से बढ़ सकता है। सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन के दिन ही राहुल गाँधी की पैदल यात्रा भी अयोध्या पहुँचेगी; क्योंकि अब कांग्रेस भी अयोध्या मंदिर की बात कर रही है। उसका कहना है कि इसकी शुरुआत राजीव गाँधी ने राम जन्मभूमि मंदिर का ताला खोलकर की थी, जिसका लाभ उसको भी मिलना चाहिए। अब कांग्रेस को इसका कितना लाभ मिलता है? यह तो समय ही तय करेगा।

बहरहाल, अगर कांग्रेस अपने मज़बूती वाले राज्यों में अपने सहयोगी दलों को सीटें देने से कतरा रही है, जिससे राज्यों में मज़बूत अन्य पार्टियाँ भी कांग्रेस को सीटें देने से कतराएँगी। वर्तमान में इंडिया गठबंधन में कांग्रेस के अलावा सपा, राजद, जद(यू), आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव गुट), एनसीपी (शरद पवार गुट), सीपीआई, सीपीआईएम और डीएमके के अलावा छोटे क्षेत्रीय दल शामिल हैं। ज़ाहिर है जो पार्टियाँ क्षेत्रों में सिमटी हैं, वो अपने वर्चस्व वाले राज्यों में सीटें देने के बदले राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की कोशिश करेंगी, जिससे उन्हें राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पहचान मिले। कांग्रेस इसमें रोड़ा बनेगी। क्योंकि उसे पता है कि राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज़्यादा उसी का वर्चस्व है, जिसे वो किसी भी हाल में कम नहीं करना चाहेगी। इससे इंडिया गठबंधन में दरार पड़ सकती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

चाहिए, एक और गाँधी!

गाज़ा में मातम है। दज़र्नों जीवन पत्थरों और मिट्टी के मलवे के नीचे सिसक रहे हैं। उस मलवे के नीचे, जिसके भीतर से बारूद का धुआँ उठ रहा है। और जो निर्जीव हो चुके हैं, उनके परिजनों को पता भी नहीं है कि वे उन्हें खो चुके हैं। युद्ध में मौतों का आँकड़ा 10,000 पहुँचने को है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय धर्मों के आधार पर बँट चुका है। इंसान की किसी को परवाह नहीं। जो इजरायल के समर्थक हैं, वे उसे गोला-बारूद दे रहे हैं। जो हमास के समर्थक हैं, वे उसे गोला-बारूद दे रहे हैं। तबाही का सामान हर किसी के पास है। लेकिन किसी को यह चिन्ता करने का समय नहीं है कि हमने इजरायल-हमास-फिलिस्तीन की इस जंग में कितने ही निर्दोष इंसानों को खो दिया है। गोली और बारूद की आँखें नहीं होतीं, जो यह पहचान कर सकें कि सामने वाला निर्दोष है। इजरायल की बमबारी में गाज़ा में यह तबाही साफ़ दिख रही है।

अमेरिका के राष्ट्रपति इजरायल जाते हैं, तो उसके साथ खड़े दिखते हैं। उसे और बारूद देने का वादा करते हैं। वापस लौटकर दोमुहाँपन दिखाते हुए एक साँस से इजरायल के बमों से तबाह हुए गाज़ा और वेस्ट बैंक के नागरिकों के लिए पानी, बिजली, दवाओं और विस्थापितों के लिए 100 मिलियन डॉलर की मदद की बात करते हैं, तो दूसरी साँस में इजरायल की मदद के लिए अमेरिकी कांग्रेस से 14.3 अरब डॉलर की अतिरिक्त सैन्य सहायता की सिफ़ारिश भी करते हैं। अमेरिका का कौन-सा चेहरा वास्तविक है, यह कोई नहीं जानता!

दिलचस्प है कि जिस संयुक्त राष्ट्र को इजरायल को वर्तमान जगह बसाने का दोषी माना जाता है, उसी संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद् की बैठक में कहा कि हमास ने इजरायल पर हमला बेवजह नहीं किया है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने कहा कि फिलस्तीन के लोग 56 साल से घुटन भरे क़ब्ज़े का सामना कर रहे हैं। भले इजरायल ने उनके बयान की तत्काल निंदा करते हुए उनके इस्तीफ़े की माँग कर दी; लेकिन गुटेरेस का यह बयान बहुत-ही अहम है। वर्तमान युद्ध से पहले भी इजरायल ने गाज़ा को तीन तरफ़ से घेरा हुआ है और बँटबारे के समय मिली ज़मीन से कहीं ज़्यादा गाज़ा हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया है।

शान्ति की बात करने वालों को ताक़तवर कैसे चुप करवाने की कोशिश करते हैं, यह मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के उदाहरण से ज़ाहिर हो जाता है। थनवर्ग ने इजरायल-हमास के बीच जारी युद्ध के बीच गाज़ा के लोगों का समर्थन करते हुए वहाँ इजरायल के हमलों में हो रही मौतों पर दु:ख जताया था और एक्स (पहले ट्वीटर) पर एक पोस्ट में लोगों से इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की अपील की थी। इजरायल ने इसके जवाब में अपनी प्रतिक्रिया में थनबर्ग को अपने स्कूल सिलेबस से हटाने का फ़ैसला किया और ग्रेटा थनबर्ग को संबोधित करते हुए लिखा- ‘हमास ने अपने रॉकेट्स के लिए पर्यावरण के लिहाज़ से बेहतर चीज़ों का इस्तेमाल नहीं किया था, जिनसे मासूम इजरायली नागरिकों की बर्बर हत्याएँ की गयीं। हमास के हमले में मारे गये लोग आपके दोस्त हो सकते हैं।

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि इजरायल पर गाज़ा और लेबनान में हमलों के दौरान वाइट फॉस्फोरस बम इस्तेमाल करने का आरोप लगता रहा है। यह इतना ख़तरनाक बम है कि हवा से ऑक्सीजन सोख लेता है और प्रभावित व्यक्ति की हड्डियों तक को गला देता है। अमेरिका पर दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी के ख़िलाफ़ और बाद में भी ऐसे बम इस्तेमाल करने का आरोप लगा है। बता दें कि सन् 1980 में जिनेवा कन्वेंशन में इन बमों के रिहायशी इलाक़ों में इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

कन्वेंशन ऑन सर्टेन कन्वेंशनल वेपन (सीसीडब्ल्यू) ने इसके लिए जो प्रोटोकॉल बनाया, उस पर 115 देशों ने हस्ताक्षर किये; लेकिन इनमें इजरायल शामिल नहीं था। गाज़ा में आबादी, अस्पतालों और धार्मिक स्थलों पर इजरायल के हमले बताते हैं कि उसने इंसानी ज़िन्दगियों की परवाह नहीं की। वैसे ही, जैसे हमास के आतंकियों ने इजरायल में हमला करते हुए नहीं की थी और निर्दोष नागरिकों को या तो मौत के घाट उतार दिया था या बंधक बनाकर उन्हें अपने साथ ले गये थे, जिनमें महिलाएँ भी थीं। इन लोगों की रिहाई की बात अभी भी पूरी तरह सिरे नहीं चढ़ी है। न ही युद्ध विराम की कोई गम्भीर पहल हुई है। उलटे इजरायल ज़मीनी हमले की तैयारी कर रहा है, जिसके लिए उसे उसके सहयोगी अमेरिका ने फ़िलहाल रोका हुआ है। यह माना जाता है कि गाज़ा की ज़मीन भीतर से हमास की बनायी बारूदी सुरंगों से अटी पड़ी है और वहाँ घुसना इजरायल के सैनिकों के लिए तबाही का सबब भी बन सकता है।

हरकत अल-मुकावामा अल-इस्लामिया (हमास) की स्थापना एक इस्लामिक प्रतिरोध आन्जोसन के रूप में फिलिस्तीनी मौलवी शेख़ अहमद यासीन ने की थी। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 11 जुलाई, 2000 को कैंप डेविड शिखर सम्मेलन में तब के इजरायली प्रधानमंत्री एहुद बराक और फिलिस्तीनी अथॉरिटी के चेयरमैन यासिर अराफ़ात को साथ लाने में सफलता हासिल की थी; लेकिन इस शिखर सम्मेलन में कोई नतीजा नहीं निकल पाया। उलटे दोनों देशों की दुश्मनी और बढ़ गयी। यह आरोप लगते रहे हैं कि फिलिस्तीन की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे और शान्ति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित यासिर अराफ़ात की मौत के पीछे भी कथित रूप से इजरायल का हाथ था।

इजरायल दावा कर रहा है कि उसने गाज़ा में बम गिराकर हमास के कमांडरों को मार दिया। यदि हमास के ठिकानों को लेकर उसकी जानकारी इतनी ही पुख़्ता थी, तो फिर उसने गाज़ा के आबादी वाले इलाक़ों में हज़ारों निर्दोष नागरिकों को क्यों अपने बमों से मरने दिया? क्यों उसने फिलिस्तीनियों से गाज़ा छोड़ने को कहा? इजरायल में प्रधानमंत्री नेतन्याहू की कई नीतियों का विरोध है। वहाँ की राजनीति ने नेतन्याहू को मजबूर किया है कि वह हमास के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख़ दिखाएँ। लेकिन गाज़ा की आबादी वाली बस्तियों पर हमले के बाद दुनिया में उनके समर्थकों की संख्या घटी है। ऐसे ही हमास को लेकर भी फिलिस्तीन के लोग बँटे हुए हैं। हमास की चर्चा जब होती है, तो उसे फिलिस्तीन के साथ जोड़ा जाता है। लेकिन फिलिस्तीन में ऐसे बहुत लोग हैं, जो मानते हैं कि फिलिस्तानी समुदाय स्वतंत्रता की लड़ाई और बेहतर तरीक़े से लड़ सकता था।

भारत की बात करें, तो इजरायल के साथ खड़े होने वाली प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया बहुत जल्दी में की गयी। उनके बयान का यह असर हुआ कि भारत की आबादी भी धार्मिक आधार पर बँट गयी। हमारे ज़्यादातर टीवी चैनल निष्पक्षता छोड़ खुले रूप से इजरायल के समर्थक बन गये और भाजपा का सोशल मीडिया भी हमास / फिलिस्तीन के ख़िलाफ़ आग उगलने लगा। सवाल अमेरिका को इजरायल को सैन्य सहायता देने पर भी हैं। नहीं भूलना चाहिए कि साल 1946 से साल 2023 तक अमेरिका इजरायल को 264 अरब डॉलर की सहायता दे चुका है, जो अमेरिका की तरफ़ दी जाने वाली सबसे बड़ी सहायता है। निश्चित ही इजरायल के गाज़ा के लिए सभी ज़रूरी सप्लाई काट देने से वहाँ रोटी, पानी, दवाई और आम ज़रूरतों के लिए लड़ रहे लोगों को मदद की ज़रूरत है। इसके लिए युद्ध विराम होना ज़रूरी है। दुनिया हमास के कृत्य का समर्थन किये बगैर इजरायल की कार्रवाई की निंदा कर सकती है और उस पर मानवीय बस्तियों पर हमला न करने का दबाव डाल सकती है।

ईरान सहित कई मुस्लिम देशों के फिलिस्तीन या हमास के साथ खड़ा होने से तनाव विकट होता जा रहा है, जो मध्य-पूर्व में बड़े युद्ध का रास्ता खोल सकता है। इजरायल को उसके मित्र देशों- अमेरिका-फ्रांस आदि से समर्थन और हथियार मिल रहे हैं। दुनिया पहले ही यूक्रेन-रूस युद्ध से भय में है और उसे लगता है कि ये युद्ध विश्व युद्ध की शक्ल भी अख़्तियार कर सकते हैं।

संसार में युद्धों के विशेषज्ञ बहुत हो गये हैं। हथियार बनाने वाले बहुत हो गये हैं। शान्ति की बात करने वाले गिनती में ही रह गये हैं। कहावत है कि दुनिया में हर कोई वही बेचता है, जो उसके पास होता है। इसलिए युद्धों और हथियारों के विशेषज्ञ युद्ध बेच रहे हैं। दुनिया को आज युद्धों के विशेषज्ञों की नहीं, एक और महात्मा गाँधी की ज़रूरत है!

कालाबाज़ारी के खिलाड़ी

के. रवि (दादा)

मुंबई को मायानगरी यूँ ही नहीं कहा जाता है। यहाँ असल में माया बरसती भी है। लेकिन कुछ लोग, जिनमें व्यापारी भी हैं, स्मगलर भी हैं और उनसे मिले सरकारी कारिंदे भी; मिलकर इस माया के लिए सरकार की आँखों में धूल झोंककर कालाबाज़ारी करने में दिन-रात लगे हैं। ऐसे ही लोगों ने सोने के धंधे में भी बड़े-बड़े दाँव लगा रखे हैं, जिससे कालाबाज़ारी का गोरखधंधा ख़ूब फलफूल रहा है।

बीते इसी अक्टूबर के तीसरे हफ़्ते राजस्व ख़ुफ़िया निदेशालय (डीआरआई) ने महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय सोना-तस्करों का पर्दाफ़ाश किया। डीआरआई ने एक अखिल भारतीय ऑपरेशन में 31.7 किलोग्राम सोना पकड़ा, जिसकी क़ीमत क़रीब 19 करोड़ रुपये है। डीआरआई ने इस मामले में मुंबई से पाँच तस्करों को, नागपुर से चार तस्करों को और वाराणसी से दो तस्करों को गिरफ़्तार किया था।

डीआरआई के सूत्रों की मानें, तो ये सोना तस्कर अलग-अलग सिंडिकेट के माध्यम से कथित तौर पर बांग्लादेश के साथ-साथ देश की दूसरी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के ज़रिये भारत में सोना लाकर उसकी तस्करी करते थे। ये तस्कर इस सोने को मुंबई, नागपुर और देश के कई बड़े शहरों में जाकर बेचते थे। कथित तौर पर ये तस्कर भूमि-ट्रेन मार्गों के संयोजन के माध्यम से विदेशी मूल के सोने की तस्करी में माहिर हैं। सूत्रों की मानें, तो इस सोने की कालाबाज़ारी व्यापारी कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की शह पर करते हैं, जिसमें बड़े-बड़े सोना व्यापारियों के नाम शामिल होने की सूचना है।

ऐसे ही कुछ तस्करों और व्यापारियों की ख़ुफ़िया जानकारी डीआरआई के अधिकारियों को मिलने पर उन्होंने तस्करों के इस सिंडिकेट के ख़िलाफ़ तीन अंतरराज्यीय जगहों पर छापेमारी की कार्रवाई करते हुए बड़े पैमाने पर सोने के बिस्कुट बरामद किये। जब ये तस्कर पकड़े गये थे, तब मुंबई जोनल यूनिट से जुड़े डीआरआई के एक अधिकारी ने इन तीन शहरों से 11 तस्करों के पास से 31.7 किलोग्राम सोना पकड़े जाने की पुष्टि की थी। अधिकारी ने बताया कि डीआरआई टीम ने मुंबई से अरुण पुजारी, नितेश गोराड, किरण मांडले, तुषार जाधव और रोहित वाघमारे नाम के पाँच सोना तस्करों का पता लगाया। इस छापेमारी में तस्करों के पास से कथित तौर पर 4.9 किलोग्राम सोना बरामद करते हुए उन्हें गिरफ़्तार किया गया।

ख़ुफ़िया जानकारी के ज़रिये डीआरआई के अधिकारियों को पता चला था कि थी कि मुंबई में तस्करी का सोना लाने वाले ये लोग जुहू में एक एटीएम के पास किसी अन्य व्यक्ति को यह सोना सौंपने वाले थे। डीआरआई के एक अधिकारी ने कहा था कि डीआरआई की टीम ने इन लोगों को पकड़ने के लिए कड़ी निगरानी के बीच धरपकड़ अभियान चलाया और एटीएम के पास से पाँच लोगों को रोककर उनकी तलाशी ली, जिसमें एक के पास से 4.9 किलोग्राम सोना बरामद हुआ। इसके बाद इन सभी तस्करों को गिरफ़्तार कर लिया गया।

सूत्रों की मानें, तो मुंबई में सोने की कालाबाज़ारी बहुत बड़े पैमाने पर होती है, जिसे पकड़ने के लिए कुछ ईमानदार अधिकारी अपनी जान जोखिम में डालकर रात-दिन देखे बिना छापेमारी करने कहीं भी पहुँच जाते हैं। ये अधिकारी बड़ी चतुराई और ईमानदारी से ऐसे लोगों तक पहुँचते हैं, जो पैसे की अधिक भूख के चलते सोने की कालाबाज़ारी में उतर जाते हैं।

ऐसे ही कुछ लोगों की जानकारी हम तक भी पहुँची है, जिसके बारे में और जानकारी जुटाकर उसका ख़ुलासा किया जा सकता है। इससे सरकार को उस राजस्व की प्राप्ति हो सकती है, जिसे इन सोना तस्करों और सोने की कालाबाज़ारी करने वाले ऊपर से साहूकार दिखने वाले धन्नासेठों ने सरकार की नज़रों से छिपाकर रखा हुआ है। सोने की कालाबाज़ारी करने वाले कुछ व्यापारियों ने तो इस काले कारोबार में इतनी तेज़ी से अपने धन को बढ़ाया है कि उनके पास अरबों रुपये होने की बात सुनने में आ रही है।

सूत्रों की मानें, तो इन व्यापारियों को ख़ुश करने के बदले भ्रष्ट अधिकारी थोड़ा-बहुत सोना बरामदगी दिखाकर, बाक़ी सोने का और सोने से की गयी काली कमायी का राज़ छिपाने के लिए सौदा कर लेते हैं। ऐसे लोगों को गिरफ़्तार किये जाने और सोने का तस्करी पर्दाफ़ाश करने में हम आरोपियों की कालाबाज़ारी की गोपनीय जानकारी जुटा रहे हैं, ताकि सरकार, सरकार की जाँच एजेंसियों और आयकर विभाग को इसकी पुख्ता जानकारी दे सकें।

महिला न्यायाधीशों की दरकार

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने महाराष्ट्र से नवनियुक्त 75 न्यायिक अधिकारियों के सम्मान समारोह में उम्मीद जतायी कि आने वाले 20 वर्षों में देश की उच्च अदालतों व सर्वोच्च अदालत में 50 प्रतिशत महिला न्यायाधीश होंगी। दरअसल इसकी प्रमुख वजह इन 75 न्यायिक अधिकारियों में से 45 महिला अधिकारियों का होना भी है। उन्होंने इसे बदलते हुए वक़्त का इशारा बताया। प्रथम दृष्टया यह पारंपरिक तौर पर पुरुष प्रधान न्यायपालिका के ढाँचे में लैंगिक बराबरी की ओर एक ठोस बदलाव लगता है। लेकिन फ़िलहाल उच्च अदालतों और सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीशों / न्यायमूर्तियों की संख्या के मुक़ाबले महिला न्यायाधीशों / न्यायमूर्तियों की संख्या बहुत कम नज़र आती है।

इंडियन जस्टिस रिपोर्ट-2022 के अनुसार, 25 उच्च अदालतों में महिला न्यायाधीशों की संख्या 13 प्रतिशत है। (उस समय तक) इन उच्च अदालतों में एक भी प्रमुख न्यायाधीश महिला नहीं है। यह रिपोर्ट इस तथ्य पर भी रोशनी डालती है कि सन् 2020 से सन् 2022 के दरमियान उच्च अदालतों में महिला न्यायाधीशों के प्रतिनिधित्व में दो प्रतिशत से भी कम की वृद्धि दर्ज की गयी। सिक्किम उच्च अदालत में महिला न्यायाधीश का प्रतिशत 33.3 है और उसके बाद तेलंगाना में यह प्रतिशत 27.3 है। इस अवधि में आंध्र प्रदेश में महिला न्यायाधीश के प्रतिनिधित्व में गिरावट पायी गयी, उनकी संख्या 19 प्रतिशत से 6.7 प्रतिशत रह गयी है। छत्तीसगढ़ में 14.3 प्रतिशत से गिरकर 7.1 प्रतिशत तक रह गयी है। यह गिरावट चिन्ता पैदा करती है। यही नहीं, इंडियन जस्टिस रिपोर्ट यह भी ख़ुलासा करती है कि बिहार, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय और उत्तराखण्ड की उच्च अदालतों में एक भी महिला न्यायाधीश नहीं है। सर्वोच्च अदालत में मौज़ूदा 32 न्यायाधीशों में से तीन महिला न्यायाधीश हैं।

ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत की स्थापना 1950 में हुई और स्थापना के 39 साल बाद यानी 1989 में फ़ातिमा बीबी इस अदालत की पहली महिला न्यायमूर्ति बनीं। फ़ातिमा बीबी ने एक बार कहा था कि उन्होंने एक बंद दरवाज़ा खोला है। उल्लेखनीय है कि अभी तक इस शीर्ष अदालत के प्रमुख न्यायाधीश पुरुष ही रहे हैं। मौज़ूदा मुख्य न्यायाधीश भी पुरुष हैं। इस समय शीर्ष अदालत में तीन महिला न्यायाधीश हैं और इनमें से एक न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना 2027 में पहली प्रमुख न्यायाधीश बन सकती हैं। लेकिन अगर ऐसा हुआ, तो उनका यह कार्यकाल महज़ 36 दिन का होगा। संवैधानिक अदालतों यानी उच्च अदालतों व सर्वोच्च अदालत में महिला न्यायाधीशों का कम प्रतिनिधित्व एक अहम मुद्दा है।

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश की निचली अदालतों में महिला न्यायिक अधिकारियों का प्रतिनिधित्व 35 प्रतिशत है। गोवा देश में पहले नंबर पर है, यहाँ यह संख्या 70 प्रतिशत है। इसके बाद मेघालय में 62.7 प्रतिशत और तेलंगाना में 52.8 प्रतिशत महिला न्यायिक अधिकारी हैं। न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के पीछे कई कारण भी हैं। जैसे क़ानूनी पेशे में पुरुषों का आधिपत्य, समाज द्वारा इस पेशे को महिलाओं के अनुकूल नहीं मानने वाला नज़रिया। इस संकीर्ण सामाजिक नज़रिये की क़ीमत महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे न होने पर भी चुका रही हैं। न्याय व्यवस्था के बुनियादी ढाँचे को भी महिलाओं को मौक़ा देने पर विशेष ध्यान देना होगा। न्याय देते वक़्त न्यायाधीश क़ानून की व्याख्या व अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखते हैं; लेकिन फिर भी महिला न्यायधीशों की संख्या बढ़ाने की दरकार है।

उच्च अदालतों व शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों के पदों पर लैंगिक समानता से अलग ही सामाजिक संदेश ध्वनित होगा। इससे समाज को फ़ायदा होगा। क़ानून के जानकार लोगों का यह भी मानना है कि यौन हिंसा से जुड़े मामलों में संतुलित और सहानुभूतिपूर्ण नज़रिया अपनाने के लिए न्यायपालिका में महिलाओं का बेहतर प्रतिनिधित्व होना चाहिए। देश में महिलाओं की तादाद क़रीब 68.5 करोड़ है व क़ानून के पेशे में महिलाओं की संख्या बहुत कम है। इस पेशे में महिलाओं को आगे बढ़ाने देने के लिए उनके अनुकूल सुविधाएँ मुहैया कराने के साथ-साथ प्रगतिशील नज़रिया भी बनाकर रखना होगा।

ग्रामीण विकास एक धोखा

शिवेन्द्र राणा

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले दिनों एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गाँवों की समृद्धि के लिए आदिवासी, ग्रामीण और कृषि केंद्रित अनुसंधान को आवश्यक बताया। हालाँकि वे इस बुनियादी विमर्श को पहले भी आवाज़ देते रहे हैं। इस वर्ष जून माह में भी उन्होंने कहा था कि देश में सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को ख़त्म किये बिना आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य सम्भव नहीं है और इस लक्ष्य के लिए कृषि, आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों का विकास ज़रूरी है। लेकिन सवाल यह है कि स्वतंत्रता के सात दशकों से अधिक की लम्बी यात्रा के बावजूद भारतीय लोकतंत्र के समक्ष ये मुद्दा अब भी इतनी गम्भीर प्रश्नवाचक स्थिति में क्यों खड़ा है? प्रख्यात दार्शनिक दिदरो कहते हैं- ‘निरंतर प्रश्नों के माध्यम से ही यथार्थता का ज्ञान सम्भव है।

ग्रामीण सभ्यता मूलत: कृषि आधारित होती है और कृषि अधिशेष पर शहरीकरण की नींव पड़ी है। लेकिन आधुनिक युग में प्राथमिक आधार और सभ्यता यानी कृषि और ग्राम द्वितीयक स्थिति में आ चुके हैं। कृषि तो अब आधुनिक ढंग की सभ्यता में ‘एग्रीकल्चर इज द बिजनेस ऑफ लॉस गर्वोक्ति बन चुकी है। आज मानव जीवन एवं सभ्यता-संस्कृति का आधार कृषि घाटे का धंधा बन गयी है। इस अशुभ स्थिति के मूल में एमएसपी, कृषि क़ानून, कृषि क़ज़र्, खाद और बीज का संकट, वैश्विक कम्पनियों का आर्थिक साम्राज्य, कृषि के व्यावसायीकरण का दबाव जैसे कारणों की लम्बी सूची है, जिनमें गहन विमर्श और सुधार होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में जब कृषि के ऊपर औद्योगीकरण को वरीयता देने की शुरुआत हुई, तबसे आज तक जितनी भी सरकारें आयीं, उनके लिए कृषि क्षेत्र कभी प्राथमिकता में नहीं रहा। इसलिए जब मूलाधार पिछड़ता गया, तो उस पर आधारित समाज भी विकास के पैमाने पर पिछड़ता और टूटता-बिखरता रहा। अत: यह कहना उचित है कि ग्रामीण समाज के लिए विकास की योजनाओं और प्रयासों से अधिक लफ़्फ़ाज़ी ही हुई है, और यही अनाचार मध्यकालीन युग से कृषक प्रभावी ग्रामीण समाज को विद्रोही बनाता है। सत्ता के विरुद्ध इसकी अभिव्यक्ति कबीर जैसे संतों द्वारा यूँ व्यक्त की गयी है :-

 ‘बाबू ऐसा है संसार तिहारो, ईहै कलि ब्यौहारो।

को अब अनरव सहत प्रतिदिन को, नाहिन रहनि हमारो।

मोटे तौर पर भारत अपनी कृषि-जीडीपी का मात्र 0.7 फ़ीसदी कृषि अनुसंधान और विकास पर ख़र्च करता है। वित्त वर्ष 2023-24 में देश की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) 6.0 से 6.3 फ़ीसदी रहने का अनुमान है। देश की आर्थिक विकास दर कमज़ोर रहने का मुख्य कारण कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में कमी ही तो है। वित्त वर्ष 2019-20 के लिए कृषि विकास दर घटकर मात्र 2.8 फ़ीसदी पर आ गयी थी। दूसरी ओर नीति आयोग का मानना था कि 2017-18 में किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी लगभग शून्य हुई है। वहीं समग्रता में 1993-94 से 2015-16 के बीच देश में किसानों की आय में केवल 3.31 फ़ीसदी की वार्षिक वृद्धि हुई है। यही कारण है कि नयी पीढ़ी के लिए खेती के प्रति आकर्षण कम होने का। भारत की क़रीब 54.6 से 58 फ़ीसदी आबादी खेती और उससे जुड़े हुए क्षेत्रों से संबद्ध है; लेकिन देश के बड़े कृषि शिक्षा संस्थानों में केवल 1.65 लाख छात्र ही स्नातक, परास्नातक और शोध कर रहे हैं। कृषि की दुर्गति ने ग्रामीण विकास को नकारात्मक दिशा में धकेला है, जिसकी परिणति है- बेहिसाब प्रवासन। ग्रामीण क्षेत्र से शहरों में पलायन को जनगणना के आँकड़ों से समझिए- सन् 1971 से 1981 के बीच 9.3 मिलियन प्रवासी थे, तो सन् 1980 से 1991 के बीच कुल 10.6 मिलियन शहरों की ओर प्रवासन हुआ। सन् 1991 से 2001 के बीच कुल 14.2 मिलियन प्रवासी और शहरों की ओर गये। आबादी के हिसाब से देखें, तो सन् 1971 से 2001 के बीच तीन दशकों में ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय इलाक़ों में पलायन ने शहरी आबादी के लिए औसतन 19.36 फ़ीसदी का योगदान दिया। सन् 2011 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार, भारत की लगभग 31 फ़ीसदी आबादी शहरों में निवास कर रही थी। वहीं अगले 35 वर्षों में 400 मिलियन से अधिक लोगों के शहरों का रुख़ करने की संभावना है, जो कि कमज़ोर शहरी बुनियादी ढाँचे वाले एवं विश्व की सर्वाधिक आबादी वाले देश के लिए विकट चुनौती है। इसी के अनुरूप 25 जून, 2015 को विकसित शहरीकरण हेतु दो चरणों में स्मार्ट सिटी मिशन प्रारम्भ हुई। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगले 15 वर्षों में प्रति वर्ष अमेरिकी डॉलर 55 बिलियन डॉलर की दर से अपने शहरी विकास के क्षेत्र में भारत को कुल यूएस 840 बिलियन डॉलर की दरकार होगी। सितंबर, 2023 में इंदौर में आयोजित नेशनल स्मार्ट सिटी कॉन्क्लेव में उपस्थित अधिकारियों के अनुसार उक्त योजना के लिए अब तक 1.70 लाख करोड़ की राशि आवंटित हुई है।

एक तरफ़ आबादी के बोझ से कराहते शहरों को बचाने के लिए सरकारें अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि पर हज़ारों करोड़ फूँकने को तत्पर हैं, किन्तु उसका एक हिस्सा भी ग्रामीण विकास पर ख़र्च कर प्रवासन रोकने को तैयार नहीं हैं। इस बुनियादी मुद्दों के अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्र से पुरुष प्रवासन की अधिकता के कारण लैंगिक असंतुलन, महिलाओं के प्रति अपराध, कच्ची बस्तियों की समस्या, रोज़गार की कमी से उपजा संगठित अपराध, सुरक्षा व्यवस्था के ख़र्च, सामाजिक असुरक्षा जैसे मसले भी उत्पन्न होंगे, जिन्हें वातानुकूलित कमरों में बैठे नहीं समझा जा सकेगा। और ग्रामीण समाज पलायन न करे, तो क्या करे? बढ़ती महँगाई, घटते रोज़गार और न्यूनतम आमदनी के मकड़जाल में वह घुट रहा है। ग्रामीण महँगाई दर जुलाई में 7.63 फ़ीसदी, तो अगस्त में 7.02 फ़ीसदी थी। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महँगाई दर 5.33 फ़ीसदी, तो खाद्य महँगाई दर 6.65 फ़ीसदी पर बनी हुई है। निजी शोध संस्थान सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आँकड़ों से पता चलता है कि कुल ग्रामीण बेरोज़गारी अगस्त माह में 6.20 फ़ीसदी थी। इतना ही नहीं, चिकित्सीय असुविधाएँ और बच्चों की शिक्षा जैसे दूसरे पहलू भी उन्हें शहरों की ओर प्रवासन को उकसाते हैं। नौकरशाही एवं प्रशासन का रवैया भी इसके प्रति उपेक्षापूर्ण है। स्मार्ट शहरों के लिए चिन्तित सरकार ने स्मार्ट गाँवों के उन्नयन पर ध्यान दिया होता, तो गाँव भी जी उठते और पलायन पर रोक लगती।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि इसकी कोशिश नहीं हुई; पर जो हुई, उनमें न लोकतांत्रिक निष्ठा थी और न वैचारिक ईमानदारी। जैसे ग्रामीण विकास के प्रति प्रतिबद्धता का एक उदाहरण देखिए- अक्टूबर, 2014 में तीन चरणों में संकल्पित सांसद आदर्श ग्राम योजना प्रारम्भ हुई। आँकड़ों के मुताबिक, पहले चरण में सांसद आदर्श ग्राम योजना के पहले चरण में लोकसभा के 543 सांसदों में से 500 सांसदों तथा राज्यसभा के कुल 254 सदस्यों में से 203 सदस्यों ने एक-एक गाँव को गोद लिया। वहीं लगभग ढाई साल बाद भी 93 सांसदों ने अपने लिए किसी गाँव का चयन नहीं किया। दूसरे चरण में योजना की हालत और भी ख़राब थी। शुरुआत में लोकसभा के 545 सांसदों में महज़ 286 सांसदों ने, वहीं राज्यसभा के 243 सांसदों में से महज़ 94 सांसदों ने गोद लेने वाले गाँवों का चयन किया।

आदर्श ग्राम योजना का तीसरा चरण इसकी सार्थकता पर गम्भीर सवाल खड़े करता है। प्राप्त सूचना के मुताबिक, लोकसभा के 545 सांसदों में महज़ 34 सांसदों ने तथा राज्यसभा के 243 सांसदों में से महज़ 11 सांसदों ने एक-एक गाँव को गोद लेने का निर्णय किया। जहाँ राजस्थान के 35 में से केवल 14 सांसद और 2020 तक झारखण्ड के 14 सांसदों में से केवल तीन सांसद इसके तहत गाँवों को गोद लेते हैं। इन आँकड़ों से ग्रामीण विकास के प्रति सरकार और जनप्रतिनिधियों की गम्भीरता का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऊपर से जिन गाँवों को गोद लिया गया, उनके विकास एक अलग तरह की बहस हो सकती है। कोरोना संकट ने गाँवों की महत्ता का सबसे बेहतरीन संदेश दिया। जब महामारी के दौर में आधुनिक सभ्यता के प्रतिमान शहरों ने लोगों को अस्वीकृत कर दिया, तब वर्षों से भूले-बिसरे गाँवों ने उन्हें शरण दी। लेकिन सत्ता-समाज फिर भी दीवार पर लिखी इबारत को नहीं पढ़ पाया। असल समस्या यह है कि 200 वर्षों की मानसिक ग़ुलामी एवं यूरोपीय सभ्यता की श्रेष्ठता की कुंठा से उपजे वैचारिक रोग ने स्वतंत्र भारत की सभी सरकारों की प्राथमिकता से ग्रामीण विकास को बाहर रखा। ऐसा न होता, तो पंचायतों को संवैधानिक स्वीकृति मिलने में चार दशक से अधिक का समय न लगता। सन् 1947 में आज़ाद देश में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से सन् 1992 में ही पंचायतों को संवैधानिक सम्मान मिला।

हालाँकि भारतीय लोकतंत्र की यह विडंबना है कि चुनावों में सबसे अधिक मतदान करने वाले ग्रामीण क्षेत्र विकास की दौड़ में शहरी क्षेत्रों से पिछड़े ही रहते हैं। सरकारों का व्यवहार ग्रामीण क्षेत्रों के साथ दोयम दर्जे का तथा नीतियाँ उनके हितों के प्रतिकूल होती हैं; चाहे वह अवसंरचना विकास के नाम पर कृषि भूमि का अधिग्रहण हो या सैन्य बजट सुधार के नाम पर अग्निवीर जैसी योजनाएँ। उदाहरणस्वरूप ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा आधार सशस्त्र बलों की सेवाएँ हैं। किन्तु सैन्य सेवा के व्यवसायीकरण ने ग्रामीण युवाओं का मनोबल तोड़ा है, जिससे सैन्य सेवा के प्रति उनका आकर्षण कम हुआ है। आर्थिक पहलू से देखें, तो अग्निवीर योजना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर कुठाराघात किया है। अत: जब ग्रामीण क्षेत्र की आय का स्तर गिरेगा, तो उसकी क्रय शक्ति भी न्यूनतम ही रहेगी और तब विकास के आधारभूत मानक भी सिकुड़ेंगे। इतनी सामान्य-सी बात अगर सरकार में बैठे लोग नहीं समझ पा रहे हैं, तो यह स्थिति बहुत विद्रूप है।

महात्मा गाँधी भारत की आत्मा को गाँवों में तलाशते रहे और उनके चेले सत्ता मिलने के बाद उसी आत्मा को दफ़नाने में लगे रहे। यह प्रक्रिया आज भी बदस्तूर जारी है; चाहे सत्ता शीर्ष पर किसी भी विचारधारा के लोग हों। यही लोकतंत्र का कटु यथार्थ है। पर हमें इस निष्कर्ष को समझना है कि यदि गाँव मर जाएँगे, तो राष्ट्र की आत्मा एवं संस्कृति का अवसान सुनिश्चित है। साथ ही यह समझना होगा कि ग्रामीण सभ्यता एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा और संवर्धन ही इस लोकतंत्र की सार्थकता सिद्ध करेगी। यह ज़िम्मेदारी समाज से अधिक सरकार की है, जिसे शाब्दिक द्वंद्व से अधिक व्यावहारिक होकर स्वीकार करना होगा।

अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत के प्रयास में लगी पार्टियाँ अपना रहीं हर पैंतरा

देश में अठारहवीं लोकसभा चुनाव से पूर्व पाँच राज्यों के चुनावों को लेकर सभी पार्टियों के नेता मुफ़्त घोषणाओं एवं वादों की झड़ी लगा रहे हैं। मुफ़्त घोषणाओं एवं वादों की झड़ी लगाने के अतिरिक्त धर्म, जातिवाद एवं धमकियों का भी प्रयोग किया जा रहा है। अब चुनाव केवल आरोप एवं प्रत्यारोप के आधार पर नहीं हो रहे हैं। धीरे-धीरे चुनावों में मुफ़्त घोषणाओं एवं वादों के अतिरिक्त जातिवाद, धर्म एवं अपनी-अपनी प्रशंसा दूसरी पार्टी की बुराई करने का चलन बढ़ रहा है।

विदित हो कि नवंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम एवं तेलंगाना राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। 03 दिसंबर को इन सभी पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आएँगे। ऐसे में सभी पार्टियों के नेता चुनाव प्रचार में पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं। सभी पार्टियों के नेता दूसरी पार्टियों एवं उनके नेताओं की कमियाँ गिनाने के अतिरिक्त अपने अपने कार्यों को जनता के बीच गिना-गिनाकर अपनी-अपनी प्रशंसा कर रहे हैं। मुफ़्त घोषणाओं की सूची इतनी लम्बी है कि अगर जीतने वाली पार्टी सरकार में आने पर उन घोषणाओं को पूरा कर दे, तो जनता का भला भी होगा एवं विकास भी होगा। मगर चुनावी घोषणा-पत्रों में की जाने वाली मुफ़्त घोषणाएँ एवं वादों को चुनावों में हर मंच से दोहराने वाले नेता चुनाव जीतते ही अपने ही वादों एवं घोषणाओं को भूलकर स्वयं की तिजोरियाँ भरने में लग जाते हैं।

भाजपा की नीति

यह कोई उलाहना नहीं है, वरन् सच्चाई है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सदैव दूसरी पार्टियों की सरकारों की मुफ़्त की सुविधाओं का विरोध करते हैं; मगर स्वयं पाँच किलो राशन की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं। मुफ़्त उज्ज्वला योजना के तहत घर-घर रसोई गैस सिलेंडर देने का दावा, घर-घर पानी पहुँचाने का दावा, हर भारतीय को घर देने का दावा, समस्त किसानों को हर माह 500 रुपये देने का दावा, सभी सरकारों से अधिक रोज़गार देने का दावा, करोड़ों लोगों को मुफ़्त बिजली देने का दावा एवं किसानों की आय दोगुनी करने का दावा भी भाजपा ही करती है।

मगर याद रखना होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व मुरादाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही आम लोगों को मुफ़्त सुविधाएँ देने के रेवड़ी कल्चर कहते हुए जनता से अपील की थी कि वो इसमें न फँसे इससे देश को हानि होगी, जिससे विकास कार्यों में बाधा पड़ेगी। मगर आज भाजपा ही मुफ़्त घोषणाओं एवं वादों की झड़ी लगाने लगी है।

भाजपा ने विधानसभा चुनाव वाले पाँचों राज्यों में मुफ़्त घोषणाएँ एवं वादे करने आरंभ कर दिये हैं। दूसरी पार्टियाँ भी मुफ़्त घोषणाएँ एवं वादे करने में पीछे नहीं हैं। यह अलग बात है कि भाजपा के अतिरिक्त कांग्रेस एवं आम आदमी पार्टी इस मामले में आगे हैं, तो दूसरी क्षेत्रीय छोटी पार्टियाँ इसमें थोड़ी-सी पीछे; मगर सबके चुनावी घोषणा-पत्र जनता को आकर्षित करने में कम नहीं हैं।

भाजपा तो इतने विश्वास से दसियों मुफ़्त घोषणाओं एवं बीसियों वादों का घोषणा-पत्र जनता के सामने लेकर आ रही है, मानो जनता की भलाई करने वाली सबसे बड़ी जनहित वाली पार्टी ही देश में एक यही है। पाँच किलो प्रति माह राशन देने एवं तमाम पूरे एवं अधूरे कार्यों की प्रशंसा अपने मुँह से जिस प्रकार भाजपा के नेता चुनावी राज्यों में कर रहे हैं, उससे हैरानी होती है कि इस सबसे बड़ी पार्टी के नेताओं को तनिक संकोच एवं गिलानी भी नहीं होती कि वो अपनी बुराइयों को छिपाते हुए जनता के बीच झूठ भी बोल ही देते हैं। दूसरी पार्टियों की निंदा करने के लिए दुष्प्रचार करने से भी पीछे नहीं रहते। पार्टी नेताओं की कौन कहे, स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे अछूते नहीं हैं।  

कांग्रेस का बढ़ता विश्वास

यह सत्य है कि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी अत्यधिक सक्रिय हो चुके हैं एवं वह जनता के बीच जा-जाकर लोगों की समस्याएँ सुनने लगे हैं। राहुल गाँधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अतिरिक्त भाजपा के बड़े बड़े नेताओं की बुराई करने की जगह उनसे प्रश्न पूछते हैं। इससे जनता उनसे प्रसन्न होती है; क्योंकि ये प्रश्न जनता के भी हैं। कांग्रेस को विश्वास है कि इन पाँचों विधानसभाओं में उसकी जीत सुनिश्चित है। कुछ दिन पूर्व विश्लेषकों की अनुमानित सर्वे रिपोर्ट में भी कांग्रेस के कम-से-कम चार राज्यों में जीतने के दावे किये जा रहे हैं।

राजनीति विश्लेषक एवं सेवानिवृत्त अध्यापक यशवंत सिंह कहते हैं कि कांग्रेस को इस बार अच्छी बढ़त मिलने के आसार हैं। मगर कांग्रेस नेताओं को इससे अधिक प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है, वरन् अभी कड़े परिश्रम एवं मतदान से लेकर मतों की गिनती तक चौकन्ना रहने की भी आवश्यकता है। अगर कांग्रेस नेताओं ने इसमें चूक की, तो जीती हुई बाज़ी भी हार में बदल सकती है। कांग्रेस को ईवीएम परीक्षण से इसे समझ लेना चाहिए। मध्य प्रदेश में हुए ईवीएम परीक्षण में यह बात सामने आ चुकी है, जिसमें हर पार्टी के चुनाव चिह्न वाला बटन दबाया गया; मगर पर्ची भाजपा की ही निकली। कांग्रेस के अतिरिक्त दूसरी पार्टियों के नेताओं को भी इसे गंभीरता से लेना चाहिए एवं मतदान के दौरान चौकसी बरतनी चाहिए।

जनता का रुझान

देखने में आ रहा है कि 2014 से 2022 के बीच जिस जनता का विकट रुझान भाजपा की ओर था, उसी जनता का मोह अब इस बड़ी एवं समृद्ध पार्टी से भंग होता जा रहा है। पहले अधिकतर लोग हर जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं भाजपा की सरकारों की प्रशंसा के पुल बाँधा करते थे; मगर अब बुराई करते दिखते हैं। भाजपा एवं स्वयं प्रधानमंत्री के प्रशंसक जितनी तीव्रता से घटे हैं, उससे पार्टी नेताओं के बीच इतनी उथल-पुथल है कि कई नेता तो कांग्रेस में कूद चुके हैं एवं कई कूदने को तैयार बैठे हैं।

मध्य प्रदेश के एक परिचित पत्रकार ने बताया कि मध्य प्रदेश में तो भाजपा का इतना बुरा हाल है कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जनता के नाम नाम चिट्ठी लिखकर यह कहना पड़ा कि मध्य प्रदेश के दिल में मोदी हैं एवं मोदी के दिल में मध्य प्रदेश है। शिवराज सिंह चौहान को जिस प्रकार किनारे लगाया गया है, उससे स्पष्ट है कि अब अगर किसी तरह भाजपा की सरकार यहाँ आ भी गयी, तो उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाएगा।

छत्तीसगढ़ से आ रही सूचनाओं की मानें, तो भाजपा के पास वहाँ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को हराने वाला प्रत्याशी ही नहीं है। मिजोरम में एनडीए में फूट पड़ चुकी है। वहाँ के मुख्यमंत्री स्पष्ट कह चुके हैं कि वह प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। राजस्थान में भी भाजपा के पास मुख्यमंत्री के नाम पर कोई चेहरा नहीं है। वसुंधरा को छिटककर पार्टी ने जनता का बचा हुआ विश्वास भी बहुत हद तक खोया है। तेलंगाना में केसीआर के आगे दाल गलना आसान नहीं है।

लोकसभा चुनावों की तैयारी भी

जनता के बीच नवंबर में होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों से अधिक चर्चा अगले साल लोकसभा चुनाव को लेकर है। अधिकतर लोग मानकर चल रहे हैं कि इस चुनाव में केंद्र की सत्ता से भाजपा की विदाई तय है। मगर यह इतना आसान नहीं है। लोकसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा बड़े स्तर पर तैयारी कर चुकी है। इसके अतिरिक्त विपक्षी पार्टियों के गठबंधन इंडिया में सीटों के बँटवारे को लेकर फूट पड़ने की संभावनाएँ हवा में तैर रही हैं।

उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी से रूठे हुए एक नेता ने नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए कहा कि भाजपा देश की सेवा में जिस उद्देश्य से पिछले 50 वर्षों से कार्य कर रही है उससे पार्टी के कुछ लालची नेता भटक चुके हैं। ये नेता सत्ता के नशे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अवधारणाओं वाली देशभक्त भाजपा के उसूलों से भटक चुके हैं। इनको घमंड हो गया है कि पार्टी इन्हीं के दम पर चल रही है, जिसके चलते ये लोग अपनी ही पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं का निरादर करने में लगे हैं। जब सम्मान ही नहीं मिलेगा, तो इनके लिए जनता से भीख कौन माँगेगा? हम संघ की विचारधारा पर चलने वाले देशभक्त लोग हैं, हमें लालच नहीं है; मगर निरादर भी नहीं सहेंगे। यह किसी एक नेता अथवा कार्यकर्ता का दु:ख नहीं है, बल्कि कइयों का है। आगामी चुनावों में इसका असर आपको दिख जाएगा।

लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस भी अपनी ज़मीन तैयार कर रही है; मगर उसके हालिया गठबंधन इंडिया में सीटों के बँटवारे को लेकर फूट की संभावनाएँ प्रबल मानी जा रही हैं। मध्य प्रदेश में इसका नमूना देखने को मिल चुका है। मगर लोग कांग्रेस की ओर अब आशा भरी दृष्टि से देख रहे हैं। जो भी हो मगर यह तय है कि आगामी लोकसभा चुनाव जातिवाद, धर्म के अतिरिक्त वादों, मुफ़्त घोषणाओं पर लड़ा जाएगा। कांग्रेस इसमें जनता के मुद्दों को तड़का लगाने में सफल रही, तो सम्भव है कि देश की सत्ता उसकी झोली में आ जाए।

कटते पेड़, बढ़ता प्रदूषण

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिल्ली में प्रदूषण पर अध्ययन करके इससे निपटने के उपाय बताने के लिए बनी समिति पर रोक लग गयी है। इस रोक का आरोप प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के अध्यक्ष अश्विनी कुमार पर है। दिल्ली मंत्रिमंडल ने जुलाई, 2021 में प्रदूषण अध्ययन के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी थी। इसकी अनुमानित लागत 12 करोड़ रुपये से अधिक थी। अक्टूबर, 2022 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), कानपुर के साथ एक समझौता हुआ था। दिल्ली सरकार ने आवश्यक उपकरण ख़रीदने, डेटा संग्रह करने और एक केंद्रीकृत कार्यालय स्थापित करने के लिए आईआईटी, कानपुर को 10 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान कर दिया था।

बहरहाल दुनिया भर में आज प्रदूषण एक भीषण समस्या बनी हुई है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, विश्व में वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष अनुमानित 35,00,000 लोगों की मौतें हो जाती हैं, जिसमें पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 2,37,000 से अधिक मौतें शामिल हैं। भारत में वायु प्रदूषण के कारण हुई कुल 16.7 लाख लोगों की मौत हुई, जिसमें 9.8 लाख लोगों की मौतें पीएम-2.5 प्रदूषण की वजह से हुई हैं। दुनिया भर में 15 साल से कम उम्र के 93 फ़ीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में साँस ले रहे हैं, जिसकी वजह से उन्हें कई गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ घेर रही हैं।

वायु प्रदूषण से हर साल क़रीब 3.5 लाख बच्चे अस्थमा का शिकार बन रहे हैं। जिस तरह से विकास के नाम पर पेड़ काटे जा रहे उससे धरती पर रहने वाले जीवों के लिए ख़तरे की घंटी बज चुकी है। एक तरफ़ अंधाधुंध पेड़ों की कटाई से घटते वन क्षेत्र, तो वहीं दूसरी तरफ़ विश्व में चल रही सत्ता की लड़ाई में इस्तेमाल किये जा रहे गोले, बारूद सहित ख़तरनाक हथियारों से न सिर्फ़ मानवीय त्रासदी, अपितु इससे पर्यावरण को भी बहुत आघात पहुँच रहा है। दुनिया भर में किये गये मिसाइल, परमाणु परीक्षणों और सेटेलाइट अभियानों से पर्यावरण को भारी नुक़सान पहुँचा है और यह क्रम लगातार जारी है। जल, जंगल, ज़मीन पर जिस तरह से तबाही का आलम उससे आने वाले समय में विनाश तय माना जा रहा है। विकास की होड़ हो या परंपरा के नाम पर चली आ रही कुप्रवृत्तियाँ अगर ऐसे ही चलती रहीं, तो देश और समाज को एक-न-एक दिन नष्ट कर ही डालेंगी।

भारत जैसे देश में धार्मिक कर्मकांड से अतिरिक्त कचरे से भी पर्यावरण को काफ़ी नुक़सान पहुँच रहा है। लोग भारी मात्रा में नदियों, तालाबों, झीलों और समुद्र में कूड़ा-करकट और उपयोग किया गया ख़राब सामान डालते हैं। केमिकल बहाते हैं, जिससे और प्रदूषण बढ़ रहा है। दिल्ली जैसे शहर में पढ़े-लिखे लोग भी सरकार की चेतावनी को दरकिनार करते हुए पूजा सामग्रियों को यमुना में फेंकते हैं। इस प्रकार देखा जाए, तो पूरे भारत में सैकड़ों टन इस्तेमाल कचरा हर रोज़ निकलता है, जिसे ज़मीन पर डाल दिया जाता है और पानी में बहा दिया जाता है। दुनिया में, विशेषतौर पर भारत में कई त्योहार भी प्रदूषण बढ़ाने का ज़रिया बन रहे हैं। नया साल, क्रिसमिस-डे, दीपावली, क्रिकेट में जीत के जश्न और ख़ुशियों के दौरान लोग अनाप-शनाप पटाखे फोड़ते हैं; आतिशबाज़ी करते हैं। यह सब प्रदूषणजनित इन चीज़ों पर रोक के बावजूद होता है। जब लोग पटाखे फोड़ते हैं; आतिशबाज़ी करते हैं; तब हवा में साँस लेना भी मुश्किल हो जाता है। यानी सिर्फ़ वाहनों, कल-कारख़ानों और पराली जलाने से ही प्रदूषण नहीं बढ़ रहा, बल्कि ख़ुशियों के अवसर भी प्रदूषण की समस्या को और भी ज़्यादा गम्भीर बना रहे हैं। किसने सोचा था कि एक दिन धार्मिक स्थलों में ताला लगाना पड़ेगा? लेकिन हमने कोरोना-काल में यह सब देख लिया। प्रदूषण से हो रही मौतों से पता चलता है कि यह कोरोना से भी ज़्यादा ख़तरनाक है।

पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक हलफ़नामे के मुताबिक, विकास कार्यों के लिए 2019, 2020 और 2021 में 77,420 पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी गयी। राजधानी में क़रीब 77,420 पेड़ काटे गये यानी तीन साल में हर घंटे तीन पेड़ काटे गये। इन पेड़ों को काटने के लिए बाक़ायदा वन विभाग की मंज़ूरी ली गयी थी। चोरी छिपे कितने पेड़ काटे गये? इसकी कोई पुख़्ता जानकारी नहीं है। 22 अक्टूबर, 2023 को दिल्ली एक प्रतिष्ठित अख़बार में पुराने क़िले में अवैध रूप से दज़र्नों पेड़ों के काटे जाने की ख़बर को प्रमुखता से छापा था। शिकायतकर्ता सेंट्रल जियोलॉजिकल अथॉरिटी (सीजेडए) के मेंबर सेक्रेटरी रहे चिड़ियाघर के पूर्व डायरेक्टर डी.एन. सिंह ने दिल्ली सरकार के फॉरेस्ट एंड वाइल्ड लाइफ विभाग से इस सम्बन्ध में 18 सितंबर को शिकायत की थी। शिकायत में उन्होंने दो दज़र्न काटे गये पेड़ों की तस्वीरें भी भेजी थी।

डी.एन. सिंह के मुताबिक, क़िले के अंदर नहर के किनारे मथुरा रोड की तरफ़ काफ़ी घना जंगल था, जो अब ख़ाली मैदान में तब्दील हो गया है। उन्होंने सन् 2018 की एक तस्वीर भी दिखायी, जिसमें काफ़ी बड़ी संख्या में पेड़ दिखायी दे रहे। इसी तरह भैरो मार्ग की तरफ़ भी पेड़ और टहनियाँ काटी गयी। इस तरह पुराने क़िले जैसे भीड़भाड़ वाले जगह से पेड़ काट दिये गये; लेकिन किसी को कोई ख़बर तक नहीं लगी।

ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किस तरह कुछ लोग पेड़ काट रहे हैं और बा$की लोग चुप्पी साधे हुए हैं। वन विभाग के अधिकारी दफ़्तरों में क्या काम करते हैं? यह समझ से परे है। जबकि दिल्ली में बढ़ते गम्भीर प्रदूषण के बावजूद भारी संख्या में पेड़ काटे गये। गली-मोहल्लों में लोग पेड़ों को लगाने के बजाय पेड़ों को काटने में सबसे आगे रहते हैं। लोग गाड़ियाँ को पार्क करने के लिए के लिए पेड़ों को ही कटवा डालते हैं। हरि नगर आश्रम में रेलवे ट्रैक के किनारे लगे कई पेड़ों को लोगों ने इसलिए कटवा दिया, जिससे आँधी में पेड़ों की डालियाँ उनकी गाड़ी पर न गिरें। दिल्ली में इस तरह चोरी छिपे हर साल केयर टेकर को पैसे देकर कटाई-छँटाई के नाम पर हज़ारों पेड़ काट दिये जाते हैं, जिसकी कोई सुध लेने वाला नहीं है।

विकास की अंधी दौड़ में हर साल जिस तरह से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है, उससे काफ़ी कम अनुपात में पेड़ लगाये जा रहे हैं। जो पेड़ लगाये भी जा रहे, वो देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं। मेट्रो विस्तार के लिए हज़ारों पेड़ काटे गये और हज़ारों पेड़ों को प्रत्यारोपित किया गया; लेकिन उचित देखभाल न होने की वजह से मात्र एक-तिहाई पेड़ ही बचे हैं। सरकार ने लाल क़िले के सामने ग्रीन कॉरिडोर बनाने के लिए पौधे लगाये; लेकिन पानी के अभाव में पौधे सूख गये। इसके बाद दोबारा पौधे लगाये गये। ऐसे में पौधों को ज़मीन या गमलों में लगा देना ही काफ़ी नहीं, बल्कि उनकी देखभाल भी बहुत ज़रूरी है।

एक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2021-22 के अनुसार, दिल्ली का वनक्षेत्र सात प्रमुख बड़े शहरों में सबसे ज़्यादा 194.02 वर्ग क़िलोमीटर है, जबकि प्रदूषण के मामले में यह नंबर वन है। वहीं 110.77 वर्ग क़िलोमीटर के साथ मुंबई दूसरे स्थान पर है और 89.02 वर्ग क़िलोमीटर के साथ साथ बेंगलूरु तीसरे स्थान पर है। हालाँकि सन् 1997 के बाद राजधानी दिल्ली के वन क्षेत्र में निरंतर वृद्धि दर्ज की गयी है। सन् 2021 में वन क्षेत्र बढ़कर 342 वर्ग क़िलोमीटर हो गया। इससे कुल भौगोलिक क्षेत्र में वनों का हिस्सा भले ही बढ़कर 23.07 फ़ीसदी हो गया। लेकिन जिस तरह से दिल्ली में प्रदूषण छाया रहता है, उससे तो यह ऊँट के मुँह में जीरा के समान है।

पेड़ों की संख्या बढ़ाने को लेकर सरकारें उतनी चिन्तित नहीं हैं, जितना होना चाहिए, और न ही आम जनता चिन्तित है। यही कारण है कि प्रदूषण की अति गम्भीरता को देखते हुए अदालत को आगे आना पड़ा। उच्च न्यायालय ने दिल्ली में वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए दिल्ली सरकार के अधिकारियों से 750 एकड़ ज़मीन आवंटित करने के लिए कहा था। 10 अक्टूबर, 2023 को इस मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को फटकार लगायी, जिसमें जंगल विकसित करने के लिए महज़ 0.23 एकड़ भूमि आवंटित करने के प्रस्ताव के बारे में कोर्ट को जानकारी दी गयी थी। अदालत ने इसे एक मज़ाक़ बताया और अधिकारियों को इसके लिए खरी-खोटी सुनायी। दिल्ली हाईकोर्ट ने वैकल्पिक वन क्षेत्र विकसित करने के लिए दिल्ली प्रशासन से 750 हेक्टेयर ज़मीन आवंटित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि भावी पीढ़ियों और राष्ट्रीय राजधानी में योजनाबद्ध तरीक़े से विकसित करने के लिए यह बेहद ज़रूरी है। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ियों को अच्छी और गुणवत्ता वाली हवा दें।

इसी तरह न्यायालय द्वारा दिये एक अन्य फ़ैसले में चिपको आन्दोलन जैसे पेड़ों को सुरक्षा मिली, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय ने बेहद  सख़्त क़दम उठाया। हाईकोर्ट ने 15 जून, 2023 को दिल्ली में पेड़ों की कटाई और छँटाई पर पूरी तरह से रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला प्रोफेसर संजय बगई के द्वारा दायर याचिका पर सुनाया। प्रोफेसर बगई ने याचिका के ज़रिये हाईकोर्ट को बताया था कि वसंत विहार में 800 पेड़ों को बिना उचित प्रक्रिया और दिशा-निर्देश के छँटाई की गयी थी। अदालत ने कहा कि डीपीटी अधिनियम के तहत एक पेड़ की शाखा को 15.7 सेमी परिधि तक काटने की मंज़ूरी नहीं दी गयी है। कोर्ट ने इसे अनिवार्य वैधानिक आवश्यकताओं के ख़िलाफ़ बताया। इससे पहले कटाई-छँटाई पर कोई रोक नहीं थी, जिसकी आड़ में हर साल हज़ारों पेड़ों को कहीं से भी काटकर उन्हे पंगु बना दिया जाता था।

दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन अश्विनी कुमार ने प्रदूषण को नियंत्रित करने की मुहिम पर एकतरफ़ा मनमाने तरीक़े से रोक लगा दी है। उन्होंने अपने फ़ैसले के बारे में मंत्रिमंडल को सूचित भी नहीं किया। उनका यह रुख़ कार्य आवंटन नियमावली का उल्लंघन है। अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया, जब दिल्ली को प्रदूषण सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिक आँकड़ों की तत्काल आवश्यकता है। इस मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र भेजा है। हमने माँग की है कि अश्विनी कुमार को तत्काल निलंबित किया जाए और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।’’

गोपाल राय

पर्यावरण मंत्री, दिल्ली

महामारी बन रहा डेंगू

छोटे शहरों, क़स्बों और गाँवों में फैला डेंगू, आयुष्मान भारत योजना से नहीं चल रहा काम

सुशील मानव

एक दशक पहले तक डेंगू, चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियाँ दिल्ली जैसे महानगरों में ही पायी जाती थीं और देश के अन्य क्षेत्रों के लोग टीवी, अख़बार के मार्फ़त ही जानते थे कि राजधानी में डेंगू, चिकनगुनिया जैसी भी बीमारियाँ होती हैं। वहीं छोटे शहरों में मलेरिया, डायरिया, टाइफाइड, जापानी बुख़ार (इंसेफेलाइटिस), चमकी बुख़ार आदि बीमारियाँ होती थीं। अब छोटे शहरों के साथ-साथ क़स्बों और गाँवों तक डेंगू भी तेज़ी से फैल रहा है। चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली जैसे महानगरों में इस साल भी डेंगू का प्रकोप दिखा है, पर इनसे ज़्यादा भयावह स्थिति उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश और बिहार की है, जहाँ डेंगू महामारी बन चुका है। उत्तर प्रदेश के कई शहरों में डेंगू का प्रकोप है।

पिछले साल प्रयागराज में डेंगू का केंद्र बना हुआ था, जहाँ दज़र्नों लोगों की डेंगू से मौत हुई थी। तब एक कारण यह बताया गया था कि डेंगू गंगा-जमुना के किनारे वाले उन क्षेत्रों में फैला, जहाँ बाढ़ का पानी घुसा था। लेकिन इस साल तो सूखा पड़ा हुआ है। महानगरों की अपेक्षा छोटे-पिछड़े शहरों में डेंगू का संक्रमण दर भी बहुत ज़्यादा है। डेंगू से हुए मौत की चपेट में भी आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए लोग ज़्यादा आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश की अगर बात करें, तो 18 अक्टूबर तक क़रीब दो दज़र्न मौतें हो चुकी थीं। ज़्यादातर गाँव के लोगों का आरोप है कि एएनएम और आशा वर्कर्स द्वारा किसी भी तरह का जन जागरूकता कार्यक्रम या जानकारी, ज़रूरी दवाएँ और ब्लीचिंग पाउडर आदि का वितरण नहीं किया गया है। न समय रहते कहीं छिड़काव करवाया गया।

बता दें कि डेंगू संक्रमित एडीज एजिप्टी नामक मादा मच्छर के काटने से होता है। आमतौर पर इसमें मरीज़ को कम-से-कम तीन दिन बुख़ार ज़रूर रहता है। डेंगू बुख़ार तीन तरीक़े का होता है- साधारण डेंगू, डेंगू हैमरेजिक बुख़ार (डीएचएफ) और शॉक सिंड्रोम डेंगू (डीएसएस)। अलग अलग निजी पैथोलॉजी में डेंगू का टेस्ट आमतौर पर 1000-1600 रुपये में होता है। पैसे की कमी के चलते अधिकांश ग़रीब लोग बुख़ार आने पर इलाज के लिए झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाते हैं। दरअसल क्षेत्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के दो प्रमुख बुनियादें- प्राथमिक स्वास्थ्य (पीएचसी) केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) ख़स्ताहाल हैं। यहाँ पर कभी जाँच किट नहीं होती, तो कभी दवाइयाँ। घंटों लाइन में लगने के बाद नंबर लगाकर डॉक्टर तक पहुँचने पर वह मरीज़ को देखकर जाँचें और दवाइयाँ लिख देते हैं।

सवाल है जब दवाइयाँ और जाँच दोनों के लिए पैसा ही ख़र्च करना है, तो फिर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र क्यों जाना? दिहाड़ी पेशा लोगों के पास इतना पैसा नहीं होता, ऊपर से उनके तीमारदार के काम का नुक़सान होता है। ज़्यादातर मरीज़ों का इलाज उधार के पैसों से होता है। नीम-हक़ीम यानी झोलाछाप छोटी-मोटी मौसमी बीमारियों का इलाज तो कर देते हैं; लेकिन डेंगू जैसी बड़ी बीमारियों में जब मरीज़ की हालत जब गम्भीर हो जाती है, तब ये लोग पल्ला झाड़कर ज़िला अस्पताल रेफर कर देते हैं। लेकिन कई बार देर होने के चलते रास्ते में ही मरीज़ की मौत हो जाती है। यह एक भयावह आँकड़ा है कि हर साल पाँच करोड़ लोग महँगे इलाज के चलते ग़रीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। मौज़ूदा सरकार ग़रीबों के लिए आयुष्मान भारत भारत योजना का ढोल पीट रही है। पर 8 अगस्त 2023 को भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा लोकसभा में पेश की गयी रिपोर्ट ने आयुष्मान योजना के आँकड़ों में फ़ज़ीर्वाड़े की पोल खोलकर रख दी कि कैसे एक फ़ज़ीर् मोबाइल नंबर- 9999999999 से 7.50 लाख आयुष्मान कार्ड जुड़े हुए हैं। 1.39 लाख आयुष्मान कार्ड एक अन्य फ़ज़ीर् मोबाइल नंबर- 8888888888 से और लगभग एक लाख आयुष्मान कार्ड एक अन्य फ़ज़ीर् मोबाइल नंबर- 9000000000 से जुड़े मिले। यानी आयुष्मान भारत योजना एक जीता जागता फ़ज़ीर्वाड़ा है। आयुष्मान कार्ड बनाने का ज़िम्मा ग्रामीण स्तर पर आशाकर्मियों के ज़िम्मे है।

स्वास्थ्य कार्यकर्ता डॉ. आशीष मित्तल कहते हैं, डेंगू एक सामान्य संचारी बीमारी है और सामान्य चिकित्सा सुविधाओं से इसका पूरी तरह से इलाज किया जा सकता है। लेकिन सरकार ने इसे लगातार नज़रअंदाज़ किया है, जिससे स्थितियाँ दिन-ब-दिन विकट रूप लेती चली गयी हैं। इस पर समुचित मीडिया रिपोर्टिंग नहीं हो रही है। कोरोना महामारी के बाद सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया जाना चाहिए था; लेकिन सरकार ने स्वास्थ्य व्यवस्था को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ दिया है। जो ग़लत इलाज करके मरीज़ से मोटा पैसा बनाते हैं। निजी क्षेत्र के अस्पतालों की प्राथमिकता में निजी स्वास्थ्य बीमा वाले ग्राहक मरीज़ होते हैं। वो इलाज करते नहीं, बेचते हैं; जिसे ग़रीब व्यक्ति नहीं ख़रीद सकता। उसके लिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को ही पुनर्जीवन देना होगा। साथ ही बारिश के मौसम में साफ़-सफ़ाई, पानी की निकासी और डेंगू से जुड़े जन जागरूकता के कार्यक्रमों को चलाने वाले निकायों को चुस्त-दुरुस्त करना होगा।

किसानों को नहीं मिला न्याय

योगेश

बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी वाली कहावत सदियों पहले हमारे देश से उसी तरह से व्यर्थ हो गयी, जिस तरह से भारत को अब सोने की चिड़िया कहने वाली बात व्यर्थ हो गयी। अब तो उत्तम बान, मध्यम चाकरी और अधम खेती की कहावत सटीक लगती है। हमारे किसान अपनी फ़सलों के उत्पादों की बिक्री के उचित मूल्य के लिये सरकार से गुहार लगा रहे हैं। लेकिन उनकी माँग पर सरकार ध्यान नहीं देती है। हमने कुछ किसानों से फ़सलों के उचित मूल्य के बारे में पूछा, तो उनका जवाब था कि कई दशकों से किसानों की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की माँगों को देश में बनने वाली हर सरकार ने नज़रअंदाज़ किया है। मौज़ूदा सरकार भी नज़रअंदाज़ कर रही है। गाँव-गाँव में किसान दोबारा आन्दोलन को मजबूर हो रहे हैं। कुछ दिन पहले किसानों ने इमलोटा से दादरी तक ट्रैक्टरों से किसान जन जागरण यात्रा निकाली और किसान महापंचायत में राष्ट्रीय किसान नेताओं ने एमएसपी गारंटी सहित कई माँगों को सरकार के सामने रखा।

किसान संगठनों ने एकजुट होकर एमएसपी गारंटी क़ानून लागू करवाने के लिए आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया था। राष्ट्रीय नेता सरदार वी.एम. सिंह की अगुवाई में यह ट्रैक्टर रैली निकली थी। उन्होंने कहा कि अब गाँव-गाँव और घर-घर से एकजुट होकर देश भर के 272 किसान संगठन आन्दोलन करने के लिए फील्ड में उतरेंगे और पूरे देश में ‘एमएसपी का गारंटी क़ानून नहीं, तो वोट नहीं अभियान चलाएँगे। एक-दूसरे किसान नेता ने कहा कि फ़सलों के उत्पादों पर एमएसपी के अलावा बर्बाद होने वाली फ़सलों के उचित मुआवज़े और किसानों की दूसरी माँगों को सरकार पूरा करे, नहीं तो किसान संगठनों के विरोध को सहने के लिए तैयार रहे। किसान फिर से एक आन्दोलन करेंगे।

इस बीच दावा किया जा रहा है कि किसानों की एमएसपी की माँग कुछ हद तक सफल हो चुकी है। 19 अक्टूबर, 2023 को ख़बर मिली की सरकार ने गेहूँ, सरसों, मसूर, कुसुम, जौ ओर चने की कुल छ: रबी की फ़सलों पर एमएसपी बढ़ा दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की रिपोर्ट के अनुसार अब रबी विपणन सत्र 2024-25 के लिए 150 रुपये प्रति कुंतल की बढ़त के साथ गेहूँ की नयी एमएसपी मूल्य 2,275 रुपये प्रति कुंतल, 200 रुपये प्रति कुंतल की बढ़त के साथ सरसों का नयी एमएसपी मूल्य 5,650 रुपये प्रति कुंतल, 425 रुपये प्रति कुंतल की बढ़त के साथ मसूर की नयी एमएसपी मूल्य 6,425 रुपये प्रति कुंतल, 115 रुपये की बढ़त के साथ जौ की नयी एमएसपी मूल्य 1,850 रुपये प्रति कुंतल, 105 रुपये प्रति कुंतल की बढ़त के साथ चना की नयी एमएसपी मूल्य 5,440 रुपये प्रति कुंतल और 150 रुपये प्रति कुंतल की बढ़त के साथ कुसुम की नयी एमएसपी मूल्य 5,800 रुपये प्रति कुंतल होगी। ये सभी मूल्य 01 अप्रैल, 2024 से लागू होंगे।

विपणन सीजन 2024-25 के लिए अनिवार्य रबी फ़सलों के लिए एमएसपी में ये बढ़त केंद्रीय बजट 2018-19 की घोषणा के अनुसार है। इसमें एमएसपी को अखिल भारतीय औसत उत्पादन लागत (एआईवीएसी) के कम-से-कम डेढ़ गुना के स्तर पर एमएसपी तय करने की घोषणा की गयी थी। सरकार का दावा है की एआईवीएसी पर गेहूँ के लिए 102 प्रतिशत, रेपसीड और सरसों के लिए 98 प्रतिशत, मसूर दाल के लिए 89 प्रतिशत, चने के लिए 60 प्रतिशत, जौ के लिए 60 प्रतिशत ओर कुसुम के लिए 52 प्रतिशत लाभ है।

अभी तक वर्तमान में गेहूँ का एमएसपी मूल्य 2,125 रुपये प्रति कुंतल, जौ का एमएसपी मूल्य 1,735 रुपये प्रति कुंतल, चने का एमएसपी मूल्य 5,335 रुपये प्रति कुंतल, मसूर का एमएसपी मूल्य 6,000 रुपये प्रति कुंतल, सरसों का एमएसपी मूल्य 5,450 रुपये प्रति कुंतल ओर कुसुम का एमएसपी मूल्य 5,650 रुपये प्रति कुंतल है। छ: फ़सलों की नयी एमएसपी मूल्य पर हमने कई किसानों से बात की, तो उन्होंने कहा कि पहली बात तो यह सरकार की बैठक में मौखिक घोषणा है, वो भी सिर्फ छ: फ़सलों पर; और यह भी मामूली बढ़त है, जो अगले साल अप्रैल से लागू होगी। दूसरी बात सरकार एमएसपी गारंटी क़ानून बनाने से बच रही है, जो कि देश में पैदा होने वाली सभी फ़सलों पर लागू होगा ओर किसानों को उचित मूल्य मिल सकेगा। जब तक सरकार सभी फ़सलों पर एमएसपी गारंटी क़ानून नहीं बनाती है, तब तक ये 100-200 रुपये बढ़ाकर सरकार किसानों का विश्वास नहीं जीत सकती।

साँप के काटने पर मृतकों के परिवार को मिले मुआवज़ा

गुजरात में साँपों के काटने के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। अभी पिछले कुछ महीनों में ही अहमदाबाद ज़िले में साँपों के काटने के कई मामले सामने आये हैं। इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (आईएचआईपी) पोर्टल की इस साल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल 01 जनवरी से 30 अप्रैल तक गुजरात में मानव-पशु संघर्ष के 91,000 से ज़्यादा मामले सामने आये थे, जिनमें साँपों के काटने के मामले 18 प्रतिशत से ज़्यादा थे। इसे देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग ने राज्य के मेडिकल कॉलेजों, सामान्य अस्पतालों और ज़िला और नागरिक निकायों के स्वास्थ्य के चिकित्सा अधिकारियों को एक नोटिस जारी कर दैनिक आधार पर जानवरों के काटने के मामलों से सम्बन्धित जानकारी राष्ट्रीय पोर्टल पर अपडेट करने को कहा था। नोटिस में कहा गया है कि अस्पताल और स्वास्थ्य निकाय जानवरों के काटने के दैनिक आँकड़े देने के सम्बन्ध में नियमों का पालन करने में सफल नहीं रहे हैं। भारत के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निगरानी, पर्यवेक्षण और लॉजिस्टिक कार्यक्रमों के तहत अस्पतालों से जानवरों के काटने के दैनिक मामलों को ऑनलाइन अपडेट करने के लिए आईएचआईपी पोर्टल पर एस और पी फॉर्म भरने की उम्मीद की जाती है। हालाँकि देखा गया है कि (रिपोर्ट जारी होने तक) कोई भी अस्पताल इस कार्य को पूरा नहीं कर रहा है। नोटिस में कहा गया है कि राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (एनआरसीपी) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के साँप काटने के ज़हर की रोकथाम और नियंत्रण कार्यक्रम (पीपीसीएसबीई) के तहत, सरकार के लिए रोगियों का विवरण प्रदान करना महत्त्वपूर्ण है।

हालाँकि भारत में पाये जाने वाले 343 प्रकार के साँपों में से अधिकांश साँपों के ज़हर से लोग नहीं मरते; लेकिन इनमें से 20 प्रतिशत साँप ज़हरीले हैं। इनमें भी सिर्फ़ कोबरा (गेहुअन), पद्म नाग,  रसेल वाइपर, करैत और सॉ स्केल वाइपर जैसे पाँच साँप ही ऐसे हैं, जिनके डसने से 90 प्रतिशत से ज़्यादा मामलों में मौत होती है। हालाँकि कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि भारत में 276 प्रकार के साँप पाये जाते हैं। लेकिन सिर्फ़ पाँच प्रकार के साँपों के काटने पर 90 प्रतिशत से ज़्यादा मौतें होने के बाद भी भारत में साँपों के काटने से हर साल 40,000 से ज़्यादा मौतें हो जाती हैं, जिनमें 36,000 से 37,000 मौतें इन सबसे ज़हरीले पाँच साँपों के काटने से होती हैं। ये इतने ज़हरीले साँप हैं कि कुछ के काटने पर तो मौत आने में एक-दो मिनट या ज़्यादा-से-ज़्यादा पाँच मिनट भी नहीं लगते। वहीं अजगर के निगलने से एक से दो प्रतिशत मौतें इंसानों की होती हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले 20 साल में भारत में 12,00,000 से ज़्यादा मौतें सिर्फ़ साँप के काटने से हुईं, जिनमें सबसे ज़्यादा 97 प्रतिशत मौतें गाँवों के इलाक़ों में हुईं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, साँपों के काटने से महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की मौतों की दर ज़्यादा है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों घोषणा की थी कि उत्तर प्रदेश में साँप के काटने से मौत होने पर मृतक के परिवार को 4,00,000 रुपये की आर्थिक मदद मिलेगी। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने ये घोषणा राज्य में साँपों के काटने से हर साल होने वाली हज़ारों मौतों को देखते हुए की है। लेकिन इसके लिए मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ज़रूरी है, जिस पर लेखपाल क़ानूनगो, तहसीलदार और उपज़िलाधिकारी अपनी रिपोर्ट ज़िलाधिकारी को देंगे। उसके बाद ही मृतक के परिवार को मुआवज़ा मिलेगा। यह मुआवज़ा एडीएम फाइनेंस के ज़रिये आपदा राहत कोष से तत्काल मिलने के निर्देश हैं।

वहीं राजस्थान में जून, 2014 में साँप काटने से हुए एक व्यक्ति की मौत मामले में राज्य उपभोक्ता आयोग की ओर से साँप काटने से मौत होने पर मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये नौ प्रतिशत ब्याज के साथ देने का आदेश दिया गया। हालाँकि यहाँ मरने वाले व्यक्ति ने एक निजी कम्पनी से बीमा कराया हुआ था, जिसे देने से कम्पनी मना कर रही थी। कम्पनी का कहना था कि ये प्राकृतिक मौत नहीं है। इस पर राज्य उपभोक्ता आयोग ने यह फ़ैसला सुनाया। वहीं बिहार सरकार ने मार्च, 2020 में साँप काटने से मौत पर 5,00,000 मुआवज़े की घोषणा की थी। इससे पहले बिहार में आपदा प्रबंधन विभाग ही बाढ़ के दौरान साँप के डसने के शिकार होने वाले लोगों को मुआवज़ा देता था। हालाँकि मुआवज़ा उसी को मिलेगा, जिसके नाम ज़मीन नहीं है और उसकी सालाना आमदनी 75,000 रुपये से कम हो, जिसका आय प्रमाण-पत्र भी होना चाहिए। इसके साथ ही मृतक की आयु 18 से 60 साल के बीच ही होनी चाहिए। वहीं झारखण्ड में जंगली जानवरों के हमले से जान-माल का नुक़सान होने पर मुआवज़े की राशि वन विभाग अधिसूचना निकालता है। अंतिम अधिसूचना 25 अगस्त, 2014 को निकाली गयी। इसके मुताबिक, किसी बालिग़ की मौत होने पर 2,50,000 रुपये, नाबालिग़ की मौत होने पर 1,50,000 रुपये, गम्भीर घायल व्यक्ति को 50,000 रुपये और साधारण रूप से घायल व्यक्ति को 10,000 रुपये देने का प्रावधान है। वहीं उत्तराखण्ड में कांग्रेस सरकार में हरीश रावत ने अपने मुख्यमंत्रित्व-काल में अब वन्य जीवों के हमले में मृत्यु पर मुआवज़ा 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 6,00,000 रुपये कर दिया था। इसी प्रकार गम्भीर घायल व अपंग होने की दशा में भी अनुमान्य मुआवज़ा भी दोगुना हो चुका है।

स्नेक मैन के नाम से मशहूर सर्प वैज्ञानिक रोमुलस व्हिटेकर की पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस नाम के द जर्नल में सन 2011 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल जून से सितंबर के बीच 45,900 से 50,900 लोगों की मौत साँपों के काटने से ही हो जाती है। वहीं जर्नल ऑफ द एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में साँपों के काटने से सबसे ज़्यादा मौतें भारत में होती हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर आता है। साँपों के काटने से दूसरा सबसे ज़्यादा मौतों वाला राज्य आंध्र प्रदेश और तीसरा सबसे ज़्यादा मौतों वाला राज्य बिहार है।

डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में हर साल क़रीब 54,00,000 लोगों को साँप काटते हैं, जिनमें क़रीब 18,00,000 से 27,00,000 मामले ज़हरीले साँपों के काटने के होते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में हर साल क़रीब 81,410 से 1,37,8 80 लोगों की मौत साँपों के काटने से होती है। डब्ल्यूएचओ की इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सन् 2009 से सन् 2019 तक क़रीब 12,00,000 लोगों की मौत साँपों के काटने से हुई थी। हालाँकि केंद्र सरकार ने इस दौरान साँपों के काटने से होने वाली मौतों के आँकड़े डब्ल्यूएचओ से 30 गुना कम बताये थे। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, सन् 2005 में भारत में 45,900 लोगों की मौत साँपों के काटने से हुई थी।

जानकार बताते हैं कि साँपों के काटने को राष्ट्रीय आपदा के तहत माना गया है। वन्य प्राणी सुरक्षा अधिनियम-1972 की धारा-2(36) के मुताबिक, इस अधिनियम की अनुसूची-1 से 4 में जंगली जानवर शामिल हैं। इसमें साँप भी शामिल हैं। इस अधिनियम के मुताबिक, जंगली जानवरों के आघात से होने वाली मौत पर सरकार द्वारा तय मुआवज़ा मृतक के परिवार को मिलना चाहिए। इस अधिनियम के मुताबिक, घातक साँपों की अनुसूची में कोबरा, नाग, नाग प्रजाति की सभी उप प्रजातियाँ, रसल्स वाइपर, धामन, चेकर्ड कीलबैक, ओसिबेसियस कीलबैक और अजगर आदि शामिल हैं।

इस आधार पर भारत में साँपों के काटने पर मुआवज़ा मिलना चाहिए। क्योंकि इसे क़ानूनी तौर पर आपदा माना गया है और यह ठीक वैसे ही है, जैसे दूसरे जंगली जानवरों के हमले से हुई मौत। गुजरात में कई लोग और संगठन गुजरात सरकार से साँपों के काटने पर मौत होने पर मुआवज़े की माँग करते रहे हैं। लेकिन गुजरात सरकार की तरफ़ से साँपों के काटने पर मौत मामले में मुआवज़े को लेकर कोई ख़ास पहल नज़र नहीं आती। पिछले एक साल में गुजरात में जितने लोगों की मौत हुई है, उनमें से कईयों के परिवारों ने मुआवज़े की इच्छा जतायी है। गुजरात सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।