Home Blog Page 252

सत्ता के लिए द्वेशपूर्ण राजनीति

क्या चुनाव जीतने और विपक्षियों को कमज़ोर करने की कोशिश में लगी है मोदी सरकार?

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

सन् 2014 से अब तक ईडी 3,010 से ज़्यादा जगहों पर छापेमारी कर चुकी है। वहीं इस दौरान सीबीआई ने 118 विपक्षी नेताओं को शिकंजे में लिया है। ताबड़तोड़ छापेमारी के बाद भी एक डेटा के मुताबिक, नौ वर्षों में ईडी सिर्फ़ नौ मामलों में ही आरोपियों को दोषी सिद्ध कर पायी है। ये नौ मामले काफ़ी छोटे प्रोफाइल थे। इन नौ वर्षों में बड़े नेताओं पर 221 मामले ईडी के पास हैं। इनमें 115 मामले विपक्षी दलों के ऊपर हैं। यानी 95 फ़ीसदी मामले विपक्षी दलों के नेताओं के ऊपर हैं, जिसमें कई मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के नाम शामिल हैं। इससे साफ़ पता चलता है कि सरकार ईडी के ज़रिये देश को एक अच्छा संदेश देने के बजाय नेताओं, पत्रकारों और उद्योगपतियों सहित व्यापारियों को भी डराने-धमकाने का काम कर रही है, जिससे सारे लोग सरकार के पक्ष में रहें और उसके ख़िलाफ़ कुछ भी न बोलें। अगर वे भाजपा सरकार यानी मोदी सरकार का विरोध करेंगे, तो उनके ऊपर ईडी, सीबीआई और आईटी के छापे पड़ेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी विभिन्न याचिकाओं के मद्देनज़र ईडी की कार्रवाई को देखते हुए अब उसकी शक्तियों की न्यायिक समीक्षा सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़ रहा है। इसे लेकर सरकार की तरफ़ से बार-बार यही दुहाई दी जा रही कि सुप्रीम कोर्ट को ईडी के शक्तियों की न्यायिक समीक्षा नहीं करनी चाहिए। इससे पहले भी ईडी के पूर्व डायरेक्टर संजय मिश्रा के तीन बार कार्यकाल बढ़ाने के ख़िलाफ़ दायर याचिका पर भी इसी प्रकार की दलीलें दी गयी थीं और बार-बार अनुरोध किया था कि उनको इस पद पर बने रहने दिया जाए। अब फिर दलीलें दी जा रही कि सुप्रीम कोर्ट ईडी की शक्तियों की न्यायिक समीक्षा एक महीने के लिए स्थगित कर दे। इस तरह के अनुरोध से साफ़ पता चलता है कि ईडी महज़ विरोधियों को परेशान करने की मशीनरी बन गयी है, जिसे मनमानी करने का पूरा ह$क केंद्र सरकार ने दे रखी है। राजनीतिक जानकारों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए ईडी का इस्तेमाल कर रही है, जो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए किसी ख़तरे से कम नहीं है।

कथित शराब घोटाला मामले में दिनेश अरोड़ा को सरकारी गवाह बनाकर संजय सिंह की गिरफ़्तारी तो हो गयी; लेकिन अब संजय सिंह की जमानत मामले में राउज एवेन्यु कोर्ट ने ईडी से जवाब माँगा है। 4 अक्टूबर से गिरफ़्तार संजय सिंह ने हाई कोर्ट में अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती दी थी; लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहकर जमानत अर्जी खारिज कर दी कि उनकी गिरफ़्तारी सही है। संजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाज़ा खटखटाया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में केंद्र और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को नोटिस जारी किया है और उनसे गिरफ़्तारी के संबंध में 11 दिसंबर से पहले जवाब दाख़िल करने को कहा है।

इसी मामले में फरवरी माह में पहले सीबीआई ने मनीष सिसोदिया पर शिकंजा कसा, फिर उसके अगले महीने ईडी ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। गिरफ़्तारी के आठ महीने बाद भी सुबूत नहीं होने पर कई सवाल खड़े हुए। पहले उन्होंने हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दाख़िल की, तो हाईकोर्ट ने यह कहकर जमानत देने से इनकार कर दिया कि उनके ऊपर गम्भीर आरोप हैं। इसके बाद सिसोदिया सुप्रीम कोर्ट पहुँचे; लेकिन वहाँ से भी उन्हें जमानत नहीं मिली। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से आरोपी के ख़िलाफ़ सुबूत दिखाने को कहा। 

इससे पहले 30 मई को ईडी ने सत्येंद्र जैन को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ़्तार किया था। उस समय दिल्ली के उप मुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया ने सत्येंद्र जैन पर लगे आरोपों को फ़र्ज़ी बताया था। उन्होंने कहा था कि सत्येंद्र जैन के ख़िलाफ़ 8 साल से फ़र्ज़ी मामला चलाया जा रहा है। फ़िलहाल सत्येंद्र जैन अभी ख़राब स्वास्थ्य के चलते सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये बेल पर हैं और अपना इलाज करा रहे हैं। ईडी जिस तरह कारवाई कर रही है, उससे यही कयास लगाया जा रहा है कि अब अगला नंबर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का है। ईडी ने जिस दिन सांसद संजय सिंह को गिरफ़्तार किया था, उसी दिन केजरीवाल से पूछताछ के लिए समन जारी कर दिया था। आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ईडी को पत्र लिखकर जवाब माँग चुके हैं कि वह उन्हें क्यों बुलाना चाहती है? अपनी गिरफ़्तारी की आशंका के बीच वह विधायकों के साथ मीटिंग कर पूछ चुके हैं कि उनके जाने के बाद सरकार कैसे चलेगी? इसको लेकर वह दिल्ली की जनता से भी पूछ रहे हैं कि अगर उन्हें गिरफ़्तार किया जाता है, तो क्या उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए या जेल से ही सरकार चलानी चाहिए? इसके लिए वह जनता के बीच रायशुमारी में लगे हुए हैं कि उन्हें आगे क्या करना चाहिए?

देखा जाए, तो आम आदमी पार्टी के गठन के 11 साल में 17 से ज़्यादा बड़े नेता गिरफ़्तार हो चुके हैं। ये वो गिरफ़्तारियाँ हैं, जिसमें मंत्री से लेकर सांसद, विधायक शामिल हैं। आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव, 2020 में जीतने वाले आप विधायकों में से 50 फ़ीसदी से ज़्यादा के ख़िलाफ़ गम्भीर आपराधिक मामले दर्ज कराये गये हैं और ये सारे मामले लंबित हैं।

आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार की अगर बात करें, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर कुल 27 मामले लंबित हैं। इनमें 13 गम्भीर आईपीसी धाराओं के तहत दर्ज हैं। वहीं मनीष सिसोदिया पर कुल 12 मामले लंबित हैं। इनमें से तीन गम्भीर आईपीसी धारा के तहत दर्ज हैं। दिल्ली की मौज़ूदा शिक्षा मंत्री आतिशी मार्लेना के ख़िलाफ़ कुल एक मामला गम्भीर आईपीसी के तहत दर्ज है। सत्येन्द्र जैन के ख़िलाफ़ कुल दो मामले गम्भीर आईपीसी के तहत दर्ज हैं। सोमनाथ भारती के ख़िलाफ़ कुल 27 मामले दर्ज हैं, जिनमें से छ: गम्भीर आईपीसी धाराओं के तहत दर्ज हैं। अमानतुल्ला $खान के ख़िलाफ़ कुल 32 मामले दर्ज हैं, जिनमें 12 गम्भीर आईपीसी धाराओं के तहत दर्ज हैं। गोपाल राय के ख़िलाफ़ कुल तीन मामले दर्ज हैं, जिनमें से एक गम्भीर आईपीसी धारा के तहत दर्ज है। राज कुमार आनंद के ख़िलाफ़ कुल तीन मामले दर्ज हैं, जिनमें से एक गम्भीर आईपीसी धारा के तहत दर्ज है। राम निवास गोयल एक मामला दर्ज है। दिलीप पांडे के ख़िलाफ़ भी कई मामले दर्ज हैं। इस प्रकार देखा जाए, तो कुल 38 विधायकों पर एक या उससे ज़्यादा मामले दर्ज कराये गये हैं और लगभग सभी मामले लंबित हैं।

26 नवंबर को आम आदमी पार्टी के 12वें स्थापना दिवस के मौ$के पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाजपा पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कथित भ्रष्टाचार के मामले जेल में बंद अपने साथी मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सत्येंद्र जैन और विजय नायर को याद करते हुए कहा कि पिछले 11 वर्षों में आप को जितना टारगेट किया गया है, उतना किसी अन्य राजनीतिक दल को नहीं किया गया है। केजरीवाल ने कहा कि ‘पिछले 11 वर्ष में आप के ख़िलाफ़ 250 मामले दर्ज किये गये। लेकिन कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं मिला। यही हमारी ईमानदारी का सुबूत है। ईडी, सीबीआई, आईटी, दिल्ली पुलिस कोई एजेंसी नहीं छोड़ी। मोदी ने देश के सभी एजेंसियों को आम आदमी पार्टी के पीछे छोड़ दिया। लेकिन आज तक इन्हें एक भी सुबूत या एक भी पैसे की हेराफेरी नहीं मिली और एक भी पैसे की रिकवरी नहीं हुई है। आज मेरा मन थोड़ा भारी है। जब मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन, संजय सिंह और विजय नायर हमारे साथ नहीं हैं। उन लोगों को फ़र्ज़ी केस बनाकर जेल में डाल दिया गया है। भाजपा वालों को दूसरी पार्टियों के नेताओं को झुकाना आता है। लेकिन उन्हें आम आदमी पार्टी को झुकाना नहीं आता। यह हम सबके लिए गर्व की बात है कि आज तक हमारा एक भी विधायक न बिका, न टूटा। उनके परिवार भी मज़बूती के हमारे साथ खड़े हैं।’

आम आदमी पार्टी के अलावा कांग्रेस के भी कई नेताओं के ख़िलाफ़ मामले दर्ज हैं। चाहे वो सोनिया गाँधी हों, चाहे राहुल गाँधी हों या दूसरे कुछ नेता। अभी हाल में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के ख़िलाफ़ भी ईडी ने महादेव सट्टेबाज़ी एप से 508 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का मामला दर्ज किया; लेकिन कोर्ट में जाकर महादेव एप का प्रमोटर रिश्वत मामले से मुकर गया। हैरानी की बात यह है कि बिना कोई ठोस सुबूत सामने आये भाजपा नेता और मंत्री भूपेश बघेल को बदनाम करते रहे। अब जब आरोप साबित नहीं हो पाया, तो सब $खामोश हैं। 

इसी तरह शिवसेना (यूबीटी), झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद), राष्ट्रीय जनता दल और भारत राष्ट्र समिति के अलावा कई विपक्षी पार्टियों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज हैं। हाल ही में हुए इंडिया गठबंधन के करीब आठ पार्टियों के कई बड़े नेता अभी ईडी के रडार पर हैं, जिनमें पाँच राष्ट्रीय पार्टियों के और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के नेता हैं। आरोप लग रहे हैं कि केंद्र सरकार चुनावी फ़ायदे और विपक्षी नेताओं को कमज़ोर करने के लिे ईडी, सीबीआई, आईटी और पुलिस का इस्तेमाल कर रही है। यदि ऐसा है, तो इसे द्वेशपूर्ण राजनीति ही कहा जाएगा। हालाँकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ ही मामले दर्ज हो रहे हैं, सत्ता पक्ष के नेताओं के ख़िलाफ़ भी मामले दर्ज हुए हैं; लेकिन ये मामले विपक्षी नेताओं ने दर्ज कराये हैं।

किसानों की आवाज़ सुने केंद्र सरकार

भारत में केंद्र सरकार ने विभिन्न कम्पनियों को अपने हर उत्पाद की एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस वसूलने की छूट दे रखी है; लेकिन किसानों को अपने फ़सल उत्पादों का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं है। सरकार किसानों को एमएसपी यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस भी ख़ुद तय करती है और उस पर भी सभी फ़सल उत्पादों को नहीं ख़रीदती। फ़सल उत्पादों की यह एमएसपी इतनी कम है कि किसानों की लागत भी वापस नहीं मिल पाती।

सही एमएसपी देना तो दूर की बात, किसानों से उनका यह हक़ भी छीनने के लिए केंद्र सरकार ने 2020 में लॉकडाउन का फ़ायदा उठाते हुए तीन नये काले कृषि क़ानून संसद में पास कर दिये थे। इन काले कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ 25 नवंबर, 2020 को किसानों ने धरना शुरू कर दिया। हालाँकि यह धरना पंजाब में इससे पहले ही शुरू हो चुका था। बाद में यह आन्दोलन किसानों का सबसे बड़ा आन्दोलन बन गया और केंद्र सरकार ने इस आन्दोलन के रोकने के लिए किसानों पर हर तरह से अत्याचार किया। इस बीच सरकार और किसानों के बीच कई दौर की बातचीत हुई; लेकिन कोई हल नहीं निकला। सरकार की चालबाज़ियों से तंग आकर किसानों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया। जनवरी, 2021 में इन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सुनने पर सहमति जताते हुए 11 जनवरी, 2021 को एक जाँच कमेटी गठित करने का केंद्र सरकार को आदेश दिया। वहीं 12 जनवरी, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों काले कृषि क़ानूनों को स्थगित कर दिया।

इसके बाद 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने का न केवल ऐलान, बल्कि किसानों की माँगें मानने का वादा भी किया। इसके बाद 9 दिसंबर, 2021 को किसान संगठनों ने आन्दोलन स्थगित करने का फ़ैसला लिया और 11 दिसंबर को किसान अपने-अपने घर लौट गये। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों से किये वादे अभी तक नहीं निभाये हैं। केंद्र सरकार के द्वारा किसानों के साथ किया गया यह धोखा इस बार पाँच राज्यों के चुनावों के अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में भारी पड़ सकता है। अपनी माँगों को लेकर बार-बार सडक़ों पर उतरने को मजबूर किसानों को अपने ही देश में सरकार ने दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया है और पूँजीपतियों की पैरों में एक दासी की तरह बैठी है।

आन्दोलन की चेतावनी

देश भर के किसान केंद्र सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके किसानों से किये गये वादों को याद दिलाने दिल्ली कूच करने के विचार से नवंबर में इकट्ठे होने लगे थे। इसके लिए देश भर से हज़ारों किसान चंडीगढ़, मोहाली और पंचकुला पहुँचने लगे थे। इसके अलावा राज्य सरकारों के घेराव की भी तैयारी थी। तय हुआ था कि जो किसान दिल्ली नहीं आ सकेंगे, वे अपने-अपने राज्यों में विधानसभाओं, राजभवनों का घेराव करेंगे। लेकिन किसान संगठनों की कई बैठकों के बाद नवंबर में दिल्ली कूच करने की योजना टालकर आन्दोलन स्थगन की तारीख़ 11 दिसंबर तक का केंद्र सरकार को किसानों ने अल्टीमेटम दिया है। अगर सरकार ने इस समय तक किसानों की माँगें पूरी नहीं कीं, तो फिर देश में एक बड़ा आन्दोलन फिर शुरू होगा, जो माँगें पूरी होने तक ख़त्म नहीं होगा।

विदित हो कि किसान आन्दोलन को स्थगित हुए पूरे दो साल हो चुके हैं; लेकिन केंद्र सरकार ने किसानों से किये गये वादों को पूरा नहीं किया है, जिसमें एमएसपी की माँग सर्वोपरि है। नवंबर में किसानों के जुटान को देखते हुए चंडीगढ़ सीमा पर भारी पुलिस बल, रैपिड एक्शन फोर्स और अर्धसैनिक बल की तैनाती कर दी गयी थी। इस धरने में 33 किसान संगठन शामिल हुए। किसानों ने बड़े पैमाने पर ट्रैक्टर-ट्राली, ट्रेलर और अपने दूसरे वाहन निकाल लिये थे।

किसानों के साथ देश भर मज़दूर भी इस धरने में शामिल होने लगे थे। इस धरने का नाम महापड़ाव रखा गया था। अभी तो किसानों ने दिल्ली कूच का विचार टाल दिया; लेकिन अगर किसानों की माँगें केंद्र सरकार ने पूरी नहीं कीं, तो 11 दिसंबर से देश में बड़ा आन्दोलन शुरू हो सकता है। इस बार ये आन्दोलन केंद्र सरकार की मज़दूर विरोधी, किसान विरोधी, जन विरोधी व राष्ट्र विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ होगा, जिसमें किसानों और मज़दूरों की माँगों को लेकर किसान यूनियनों के अलावा मज़दूर संगठनों के संयुक्त रूप से हिस्सा लेंगे।

पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी उप राज्यपाल के निवास का सैकड़ों किसानों-मज़दूरों ने घेराव किया था। राज्य और केंद्र सरकार की मज़दूर-किसान विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की। इस बार किसानों के समर्थन में पिछले आन्दोलन की तरह ही वकील, बुद्धिजीवी, छात्र और कलाकार भी जुटेंगे। संयुक्त ट्रेड यूनियन का कहना है कि यह सरकार किसानों-मज़दूरों के ह$कों पर हमला कर रही है। जो किसानों-मज़दूरों के पक्ष में बोलता है, उसे केंद्र सरकार ईडी, सीबीआई और अन्य जाँच एजेंसियों के ज़रिये परेशान कराती है। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) का कहना है कि सरकार किसानों से वादाख़िलाफ़ी कर रही है। पुराने मुक़दमों में किसानों को बुलाया जा रहा है और उन्हें चुप कराने का प्रयास हो रहा है। अगर सरकार हमारी माँग नहीं माँगती हैं, तो हम इस सरकार को ही बदल देंगे।

किसानों की माँगें

विदित हो कि इस बार किसानों ने कुछ माँगें उठायी हैं, जिनमें सभी को सामाजिक सुरक्षा (इलाज, बुढ़ापा पेंशन, दुर्घटना बीमा, मृत्यु बीमा आदि) देना। बिजली (संशोधन) विधेयक 2022 वापस लेना। ठेकाकरण बंद करके स्थायी और सम्मानजनक जीवन जीने लायक रोज़गार देना। सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों का निजीकरण बंद करना। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मौलिक सेवाओं का निजीकरण बंद करना। फ़सल की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) तय करना और एमएसपी गारंटी क़ानून बनाना। सभी फ़सलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी ख़रीद सुनिश्चित करना।

इसके अलावा घोषित न्यूनतम वेतन बढ़ाकर तय करना, जिसमें  अकुशल मज़दूरों के लिए 17,494 रुपये, अर्धकुशल मज़दूरों के लिए 19,279 रुपये और कुशल मज़दूरों के लिए 21,215 रुपये की माँग पूरी करना। ईएसआई, पीएफ और बोनस क़ानून में संशोधन कर वेतन की सीमा को बढ़ाकर 31,000 रुपये करना। सामान्य न्यूनतम वेतन 26,000 रुपये मासिक लागू करना। कम-से-कम 10,000 रुपये मासिक पेंशन लागू करना। ई-श्रम कार्ड में पंजीकृत सभी 32 लाख असंगठित क्षेत्र के मेहनतकशों को सामाजिक सुरक्षा योजना बना कर लागू करना।

इसके अलावा असंगठित क्षेत्र के पुरुषों और महिलाओं को कामगार के रूप में मान्यता प्रदान करना। घरेलू कामगार, रेहड़ी-पटरी कामगार, घर खाता कामगार, कचरा प्रबंधक कामगार, निर्माण श्रमिक, आशा, आँगनबाड़ी और मिड-डे मील वर्कर, ई-रिक्शा, ऑटो चालक तथा परिवहन क्षेत्र के अन्य चालक-परिचालक, पल्लेदार आदि तमाम कामगारों के वेतन तथा सामाजिक सुरक्षा के लिए क़ानून बनाना। कार$खानों / संस्थानों में सुरक्षा सुनिश्चित करना। महिला श्रमिक के लिए समान वेतन की नीति लागू करना। उनका उत्पीडऩ रोकना और उनके साथ काम में भेदभाव बंद करना। 13 महीने चले किसान आन्दोलन को दबाने के लिए बनाये गये फ़र्ज़ी मुक़दमे वापस लेना। सरकारी विभागों को बेचने वाली नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन योजना रद्द करना। सन् 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून को लागू करते हुए अधिग्रहित ज़मीन के बदले चार गुना मुआवज़ा देना। मृतक के परिवार के एक सदस्य को रोज़गार देना। भूमिहीनों को ज़मीन देना और 10 फ़ीसदी अधिग्रहित विकसित भूमि को वापस करना। लखीमपुर खीरी में किसानों व पत्रकार की हत्या के मुख्य साजिशकर्ता अजय मिश्रा टेनी को केंद्रीय गृह राज्य मंत्रिमंडल से हटाना, उन पर मुक़दमा दर्ज करना। उनके बेटे को सज़ा देना आदि शामिल हैं।

पंजाब में बढ़ेगा गन्ने का भाव

हाल ही में पंजाब के किसानों को पहले सडक़ पर और बाद में रेलवे लाइन पर उतरकर प्रदर्शन करना पड़ा। धरने की वजह थी- पंजाब में गन्ने का सही ख़रीदी मूल्य देना। इसके लिए किसान कुछ दिन जालंधर-फगवाड़ा क्षेत्र में दिल्ली-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे ट्रैक पर धरने पर बैठे और बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आश्वासन देकर शान्त किया। पंजाब की आम आदमी पार्टी इकाई और किसान नेताओं ने बैठक के बाद संयुक्त बयान में कहा कि बैठक सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई।

किसान नेताओं ने कहा कि जहाँ तक गन्ने की दर बढ़ाने की बात है, पंजाब हमेशा आगे रहा है। आने वाले दिनों में गन्ना किसानों को रेट और इस साल की शुरुआत में बाढ़ के कारण हुए नुक़सान के मुआवज़े के सम्बन्ध में अच्छी ख़बर मिलेगी। हालाँकि पंजाब सरकार और किसानों ने यह नहीं बताया कि गन्ने का नया ख़रीदी मूल्य पंजाब में क्या मिलेगा? 30 नवंबर तक पंजाब की चीनी मिलें चालू होनी हैं। किसान नेताओं का कहना है कि गन्ने का नया मूल्य 400 रुपये प्रति कुंतल के लगभग हो सकता है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इसके संकेत दिये हैं। किसानों की माँग है कि गन्ने का मूल्य 400 रुपये प्रति कुंतल से अधिक होना चाहिए।

अगर पड़ोसी राज्यों की बात करें, तो हरियाणा में गन्ने का मूल्य 386 रुपये है। वहीं उत्तर प्रदेश में अभी तक 325 रुपये प्रति कुंतल ही किसानों का गन्ना ख़रीदा जा रहा है।

राजनीतिक बवंडर

इन दिनों देश की राजनीतिक हवा एक बवंडर का रुख़ अख़्तियार कर चुकी है। यह बवंडर राजनीतिक दुश्मनी के साथ-साथ गृह युद्ध को बढ़ावा देने वाला है। ऐसा लगता है कि इस राजनीतिक बवंडर में कई नेता उड़ जाएँगे और कई नेता सत्ता के पटल पर और चमकेंगे। हालाँकि कौन हमेशा के लिए उड़ जाएगा और कौन स्थापित होकर चमकेगा? यह अभी शतरंज के खेल की तरह उत्साह और उलझाव की गर्त में है, जिसके लिए इंतज़ार के सिवाय हमारे पास कुछ नहीं है। अभी पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों का कोलाहल थमा है और परिणाम का इंतज़ार है। इसके साथ ही आगामी लोकसभा चुनाव का कोलाहल शुरू हो चुका है। विधानसभाओं के बाद लोकसभा चुनाव में जीत की तिकड़में भिडऩे लगी हैं। सभी को इन दोनों चुनावों में बड़े परिवर्तन की उम्मीद है।

परिणामों की बेसब्री जनता को भी है और नेताओं को भी। क्योंकि ये चुनाव परिणाम तय करेंगे कि देश की राजनीति में किसकी क्या गति होने वाली है। हक़ीक़त में चुनाव जीतकर सत्ता में पहुँचने का यह राजनीतिक बवंडर एक-दूसरे का राजनीतिक करियर समाप्त करके आगे बढऩे की होड़ के चलते उठा है। लेकिन आश्चर्य यह है कि इस बवंडर के उठने से राजनीतिक रूप से ताक़तवर चेहरों पर घबराहट साफ़ दिखायी दे रही है। यह घबराहट राजनीतिक पलटवार से ज़्यादा जनाक्रोश के चलते पैदा हुई है। इस जनाक्रोश के चलते पासे पलटते हुए नज़र आ रहे हैं। राजनीतिक दाँव भी उलटे पडऩे लगे हैं। प से पप्पू की जगह प से पनौती अर्थ बन गया है। अति भत्र्सना और भाषायी छिछोरेपन के सारे हमले उलट पड़ चुके हैं। जनता की चौतरफ़ा नाराज़गी ने कुछ लोगों को अति-आत्मविश्वास की तंद्रा से जगाकर उनका आत्ममुग्धता का भ्रम तोडक़र रख दिया है। ऊपर से चुनावी परिणामों के पूर्व के अनुमानित आँकड़ों (एग्जिट पोल) ने एक बड़ा झटका दिया है।

चुनाव परिणामों को लेकर सामने आये अनुमानित आँकड़े बता रहे हैं कि हाल ही में हुए पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम सबसे ज़्यादा कांग्रेस के पक्ष में आने वाले हैं। हालाँकि अधिकतर एजेंसियों ने ज़्यादातर राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच काँटे की टक्कर का अनुमान जताया है। अगर नतीजे एग्जिट पोल के हिसाब से आये, तो एक बड़ा झटका देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को लगेगा और अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों पर इसका बहुत गहरा असर पड़ेगा।

यह तो तय है कि आने वाले दिनों में देश के राजनीतिक समीकरण बदलेंगे। इन समीकरणों को बदलने के पीछे सबसे बड़ा काम ज़मीनी मुद्दे करेंगे। पिछले कुछ वर्षों से देश के ज़्यादातर लोगों का ध्यान धर्म और वादों से हटा है और अब वे सत्ता से अपने हित में काम करने की इच्छा लेकर राजनीति में आने वालों के पक्ष में मतदान करने का मन बना चुके हैं।

यह पहली बार हुआ है कि देश का एक बड़ा तबका वादों और जुमलों के चंगुल से बाहर निकलकर ज़मीनी स्तर पर काम की माँग कर रहा है और उसका तुरन्त फ़ायदा भी चाहता है। उसे दिखायी गयी तरक्क़ी को वह ज़मीन पर उतरते देखना चाहता है। उसे अपने घर की ज़रूरतें पूरी करने के लिए काम चाहिए। उसे ख़ाली पेट भाषणों की खुराक नहीं चाहिए; भरपेट भोजन चाहिए।

यह जनता की सोच कोई नयी नहीं है; लेकिन उसमें यह जागृति देश में कुछ राज्य सरकारों के ज़मीनी स्तर पर काम करने के बाद का$फी प्रबल होकर उभरी है। यादों के पन्ने पलटें, तो देखेंगे कि सन् 2012 से सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को समाप्त करने की कोशिशों के बीच दिल्ली में एक ऐसी पार्टी ने जन्म लिया, जिसने काम करने की इच्छा से आगे बढक़र देश की जनता को दो बड़े मुद्दे दिये। एक- मूलभूत सुविधाएँ मुफ़्त देना और दूसरा- काम के लिए वोट माँगना। हालाँकि ईमानदारी से भ्रष्टाचारमुक्त सरकार चलाना इस पार्टी का एक और मुद्दा भी रहा, जिस पर कुछ विवादों के चलते विवाद जारी है। लेकिन इन मुद्दों का जनता पर इतना असर हुआ है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अब इन मुद्दों से बच नहीं पा रही है। न चाहते हुए भी सभी पार्टियों को जनता के लिए मूलभूत सुविधाएँ मुफ़्त देने का वादा करना पड़ रहा है। काम करने की बात करने पड़ रही है। यह राजनीतिक बदलाव बदला लेने और एक-दूसरे को समाप्त करने की राजनीति पर भारी पड़ रहा है।

इस तरह कई मुद्दों और राजनीतिक दाँवपेच का जो बवंडर अब देश में उठा है, उसका नतीजा देश देखना चाहता है। हो सकता है कि ये राजनीतिक बवंडर एक भ्रष्टाचारमुक्त ईमानदार राजनीति को जन्म दे। लेकिन इससे भ्रष्टाचार की दलदल में गले तक धँसे हुए नेता फँस गये हैं। भ्रष्टाचार करने वाले समझते हैं कि जनता को राजनीतिक समझ उस स्तर की नहीं है, जिस स्तर की वे राजनीति खेल करते हैं। लेकिन ये नेता भूल गये कि जनता इतनी भी अंधी नहीं है कि कुछ भी न देख सके।

तेलंगाना में 119 विधानसभा सीटों पर मतदान जारी, 1 बजे तक 36.68 प्रतिशत मतदान

तेलंगाना की 119 विधानसभा सीटों के लिए गुरुवार (यानी आज) मतदान जारी है। वोटिंग सुबह 7 बजे से शुरू हुई और 106 निर्वाचन क्षेत्रों में शाम 5 बजे तक वोट डाले जा सकेंगे जबकि 13 उग्रवाद प्रभावित निर्वाचन क्षेत्रों पर सुबह सात बजे से शाम चार बजे तक ही मतदान होगा।

राज्य में कांग्रेस, भाजपा और वर्तमान में सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के बीच मुकाबला है। बीआरएस नेता व मुख्यमंत्री केसीआर इस बार दो सीटों गजवेल और कामारेड्डी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।

119 सीटों वाली विधानसभा के लिए 3.26 करोड़ से अधिक लोक मतदाता 2290 उम्मीदवारों के लिए मतदान कर रहे है। साथ ही चुनाव आयोग ने मतदान केंद्रों पर 1.85 लाख से अधिक मतदान कर्मी तैनात किए है।

वहीं दूसरी तरफ जारी मतदान के बीच ही भाजपा ने चुनाव आयोग से बीआरएस की शिकायत की है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद किशन रेड्डी न चुनाव आयोग से शिकायत में बीआरएस प्रत्याशियों और उनके कार्यकर्ताओं पर चुनाव में गलत हथकंडे अपनाने का आरोप लगाया है।

सोनिया गांधी ने किया खरगे के जीवन पर लिखी पुस्तक का विमोचन

सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पर लिखी गई पुस्तक, मल्लिकार्जुन खरगे: ‘पॉलिटिकल एंगेजमेंट विद कम्पैशन, जस्टिस एंड इनक्लूसिव डेवलपमेंट’ का बुधवार को विमोचन किया। नई दिल्ली के जवाहर भवन में आयोजित समारोह में सोनिया गांधी के अलावा विपक्ष के कई नेताओं ने खरगे की नेतृत्व क्षमता पर पूरा भरोसा जताया है।

सोनिया गांधी की मौजूदगी में विपक्षी नेताओं ने माना कि खरगे ही ‘सोलिल्लादा सरदारा’ (हार न मानन वाला लीडर) हैं।

 कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष ने कहा, राजनीतिक जीवन एवं राष्ट्र की लोकतांत्रिक यात्रा में खरगे का पचास साल का सफर शानदार रहा है। वे अपनी विचारधारा पर चलते रहे। उन्होंने एक बार भी समझौता नहीं किया। वे सदैव मूल्यों की राजनीति करते रहे हैं। इस लंबी यात्रा में उन्होंने अमिट छाप छोड़ी है। राष्ट्र की सेवा में खरगे ने बड़ा मुकाम हासिल किया है। जन सेवा में खरगे का इतना लंबा सफर, प्रेरणादायक है। सामान्य परिवार से आने वाले खरगे, सांप्रदायिकता से लड़े, धर्मनिरपेक्षता की राह पर चले और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उनका विश्वास सभी के लिए अनुकरणीय है।

आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा, खरगे एक ऐसे शख्स हैं, जो एक एक व्यक्ति की सुनते हैं। संसद में विपक्षी रणनीति पर चर्चा के दौरान उनकी खरगे से पहली मुलाकात हुई थी। तब देखा, वे सभी की सुनते हैं। आज गणतंत्र और खरगे की यात्रा, लगभग समानांतर सी हैं। सीताराम येचुरी ने कहा, खरगे की सबसे बड़ी खासियत है कि उनके पास ‘नफरत’ नहीं है। ‘इंडिया’ गठबंधन में उनकी पूरी विश्वसनीयता है। उनके नेतृत्व में ‘जुड़ेगा भारत, जीतेगा इंडिया’, यह मुहिम पूरी होगी। खरगे, सभी लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ेंगे। समारोह को पूर्व केंद्रीय मंत्री टीआर बालू ने भी संबोधित किया। मल्लिकार्जुन खरगे पर लिखी गई इस किताब में विपक्षी दलों के नेताओं ने भी अपनी बात कही है।

समारोह में प्रियंका गांधी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल और हिमाचल प्रदेश के सीएम सुखविंद्र सुक्खू सहित कांग्रेस पार्टी के अनेक नेता मौजूद रहे।

16वें वित्त आयोग के गठन को मिली मंजूरी, टर्म्स ऑफ रेफरेंस को दी मंजूरी और अक्टूबर 2025 तक सौपनी होगी रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने बुधवार को कहा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सरकार ने 16वें वित्त आयोग जो कि केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के बंटवारे पर निर्णय के लिए जरूरी शर्तों को मंजूरी दे दी है।

अनुराग ठाकुर ने कहा कि, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने 16वें वित्त आयोग के लिए जरूरी शर्तों को मंजूरी दे दी है। 16वां वित्त आयोग अक्टूबर 2025 तक अपनी रिपोर्ट सौंप देगा। सिफारिशें अप्रैल 2026 से पांच साल तक के लिए वैध रहेंगी।”

बता दें, 15वें वित्त आयोग का गठन 27 नवंबर 2017 को हुआ था और उनकी सिफारिशें 2025-26 तक वैध हैं। संविधान के आर्टिकल 280 के क्लॉज 1 के अनुसार वित्त आयोग का गठन हर पांचवें साल या पहले होना चाहिए। 16वें फाइनेंस कमीशन के एडवांस सेल को 21 नवंबर 2022 में वित्त मंत्रालय में गठित किया गया था।  

कश्मीर: पैगंबर के अपमान पर कॉलेजों में तनाव व आंदोलन, एनआईटी को किया बंद

पैगंबर मोहम्मद पर एक सोशल मीडिया पोस्टर से जम्मू-कश्मीर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए और अब दूसरे संस्थानों में भी इसका असर देखने को मिल रहा है।

एनआईटी में माहौल बिगड़ने से बचाने के लिए सभी अकादमिक गतिविधियां रोक दी गई है साथ ही पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गयी है।

एक अधिकारी ने बताया कि परिसर में किसी बाहरी शख्स, छात्र और यहां तक की कर्मचारियों तक क एंट्री पर फिलहाल के लिए रोक लगा दी गई है। पैगंबर पर टिप्पणी करने वाले छात्र को एक साल के लिए कैंपस से बाहर कर दिया गया है। लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि उसके खिलाफ और भी सख्त ऐक्शन लेने की जरूरत है। इसी मांग को लेकर छात्र आंदोलनरत हैं।

वहीं दूसरे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भी इसका असर दिख रहा है। इसे लेकर विरोध प्रदर्शन बुधवार को भी हुआ।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सांप्रदायिक तनाव और वैमनस्यता बढ़ाने के आरोप में सेक्शन 153 के तहत केस दर्ज किया गया है। इसके अलावा किसी धर्म का अपमान के आरोप में सेक्शन 295 के तहत केस दर्ज हुआ है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के रजिस्ट्रार ने पुलिस को इस मामले में केस दर्ज करने के लिए लिखा था। जिसके बाद पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज की।

उत्तरकाशी टनल से  17 दिन बाद सभी 41 श्रमिकों का रेस्क्यू

देहरादून : उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में निर्माणाधीन सिलक्यारा सुरंग में 12 नवंबर सुबह से फंसे 41 मजदूरों को लगभग 17 दिनों बाद मंगलवार को सकुशल बाहर निकाला जाना संभव हो गया। सुरंग में पत्थरों का सीना चीरकर जिंदगी आखिरकार जब बाहर निकली तो सुरंग के बाहर खड़े परिजन व अन्य लोग खुशी से झूम उठे। सभी 41 मजदूरों को सकुशल बाहर निकाल लिया गया है। 

अभी सीएम धामी और केंद्रीय मंत्री वीके सिंह मजदूरों से मुलाकात कर उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ले रहे हैं। दोनों ने श्रमिको और रेस्क्यू अभियान में जुटे हुए कर्मियों के मनोबल और साहस की जमकर सराहना की। भाजपाइयों ने मोदी हैं तो मुमकिन है, पुष्कर धामी जिंदाबाद के नारे लगाए। सुरंग के बाहर मौजूद लोग इस सफलता की खुशी में एक दूसरे को मिठाई बांट रहे हैं। इस समय बाहर निकाले जा रहे श्रमिको के परिजन भी सुरंग में मौजूद हैं। टनल से बाहर निकाले गए श्रमिकों की प्रारंभिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण टनल में बने अस्थाई शिविर में एक एक कर, बाहर निकल रहे मज़दूरों का स्वास्थ्य परीक्षण हो रहा है।

हमास के साथ क्यों खड़े हैं भारत के मुस्लिम !

खालिद सलीम

यह एक दिलचस्प, लेकिन बहुत अहम सवाल है कि भारत के मुलमान हमास के साथ क्यों खड़े हैं ! यही नहीं दुनिया भर के मुस्लिमों का बड़ा वर्ग भी हमास के साथ खड़ा दिखता है। उसने 7 अक्टूबर को इजराइल पर जो हमला किया उसे दुनिया के काफी लोग और नेता एक आतंकवादी हमला करार दे रहे हैं। कारण यह है कि हमास के इस हमले में बेकसूर बच्चों सहित कई इजरायली नागरिक मौत का शिकार हो गए थे। दुनिया भर में मुसलमानों ने बहु संख्या में हमास के हमले की कड़ी निंदा की थी क्योंकि मुसलिम हमेशा आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ रहे हैं। कई उदाहरण हैं कि उन्होंने आतंकवादी घटनाओं की मुखालफत की है।

हमास के इस हमले के बाद से इजरायल की तरफ से बड़ी कार्रवाई की संभावना थी ही। हमास के लोग भी जानते थे कि इसराइल उसके इस हमले के जवाब में ग़ाज़ा पर बमबारी करेगा। यही हुआ भी और इजराइल ने ग़ाज़ा पर जो बमबारी की उसमें 4 दिन के युद्धविराम, जिसे और दो दिन के लिए 29 नवंबर तक बढ़ाया गया है, में 14854 फिलिस्तीनियों की जान जा चुकी है जिनमें बच्चे-औरतें शामिल हैं। इस अमानुषिक हमले ने मुस्लिमों को इजरायल के खिलाफ एकजुट किया है। मुस्लिम मानते हैं कि इजरायल के इन हमलों में हमास पर कार्रवाई से ज्यादा ग़ाज़ा के बेकसूर लोगों पर कार्रवाई हो रही है।

इजरायल की इस कार्रवाई में हज़ारों-हज़ार बेक़सूर लोगों के मरने पार दुनिया भर में उसके खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। पश्चिमी लीडरशिप के खिलाफ उन देशो के अलावा  इजरायल के आवाम भी सड़कों पर हैं। लंदन, अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, स्पेन जैसे पश्चिमी देशों में इजरायल के इन बहशियाना हमलों के खिलाफ माहौल है। यहाँ तक कि दुनिया भर के पत्रकार, जिन्होंने इजरायल पर हमले के लिए हमास के खिलाफ आवाज़ उठायी थी, वे भी अब इजरायल के गाज़ा पर हमलों को मानवता पर हमला बता रहे हैं।

उधर इजरायल के भीतर भी पीएम नेतन्याहू के खिलाफ वहां की जनता में नाराजगी है। भारत की जानी मानी पत्रकार बरखा दत्त ने इजरायल के दौरे के दौरान वहां जो कुछ देखा उसे आशुतोष के प्रोग्राम में गाज़ा के लोगों की पीड़ा और जज्बात के बारे में बताया। इजरायल में तो अब पीएम नेतन्याहू के इस्तीफे की मांग तक होने लगी है। युद्धविराम के दौरान काफी बंधकों को छोड़ा गया है लेकिन अभी भी बहुत लोग हमास के पास बंधक हैं। वहां काफी लोग चाहते हैं कि फलस्तीनियों के साथ बातचीत की जाए। दुनिया भर के इंसाफ पसंद लोग, जिनमें यहूदी भी शामिल हैं, चाहते हैं कि इजरायल और फलस्तीनियों के दरमियान बातचीत का सिलसिला शुरू हो ताकि मसले का कोई स्थायी हल निकाला जा सके।

यह देखा गया है कि भारत के मुस्लिम भी दुनिया के अन्य हिस्सों के मुस्लिमों की तरह
हमास के प्रति सहानुभूति रख रहे हैं। किसी हिंदुस्तानी मुसलमान ने कभी आतंकवादी संगठन या उसकी गतिविधियों की हिमायत नहीं की है बल्कि दारुल उलूम देवबंद और दूसरे जो बड़े मुस्लिम संगठन हैं उनके फतवों को भी कभी अहमियत नहीं दी है। याद रहे जब भी आईएस आईस या अल कायदा का गठन हुआ तो भारत के मुसलमानों ने कभी उनके या उनके द्वारा किये जा रहे आतंकवाद का समर्थन नहीं किया। एनडीए सरकार में राजनाथ सिंह जब गृह मंत्री थे, उन्होंने एक बयान में बताया था कि हिंदुस्तान से 5 या 6 लोग ही सिर्फ अल कायदा में शामिल होने के लिए गए। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 25 करोड़ मुस्लिमों की आबादी में महज चार-पांच लोग आतंकी संगठनों के साथ गए।

यहां तक कि भारत के मुस्लिम कश्मीर के मसले पर भी अपनी हुकूमतों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं। लेकिन जहां तक हमास का ताल्लुक है आज वह उसकी हिमायत में क्यों खड़े हुए हैं ? गहराई से देखा जाए तो इसके कई कारण और वजहें  रही हैं। दरअसल फिलिस्तीन का जो मसला है उसमें मुसलमानों की एक धार्मिक आस्था है। वह आस्था जो आखिरी प्रोफेट मोहम्मद सल्लल्लाहो वाले वसल्लम से जुड़ी हुई है। मुसलमान का इनाम है कि प्रॉफिट अल्लाह से मुलाकात करने के लिए मक्का से मस्जिद अक्सा से होकर आसमान पर गए। मुसलमानों का यकीन है कि फलस्तीन में  अल्लाह के प्रॉफिट आए हैं लिहाजा उनके लिए भी फलस्तीन पवित्र जमीन है।

उनकी इसी आस्था की वजह से फिलिस्तीन में पहले ईसाइयों के साथ जंग होती रही हैं। इसी मस्जिद-ए-अक्सा की वजह से 70 साल से यहुदियों  के साथ मुसलमान जंग है। देखा जाए तो मुस्लिमों ने इतनी कुर्बानियां दी हैं कि उसकी दुनिया में कोई मिसाल नहीं मिलती। उस ज़मीन की इसी पवित्रता और उससे मोहब्बत की वजह से पिछले 70 साल से फिलिस्तीनी मुसलमान कुर्बानियां दे रहे हैं। लाखों की तादाद में फिलिस्तीनी मुस्लिमों का कत्ल हो चुका है, लेकिन उनकी इन कुर्बानियों का किसी पर कोई असर नहीं हुआ है। अमेरिका और पश्चिमी देश लगातार इजरायल के साथ खड़े दिख रहे हैं। यही ताकतें हैं जिन्होंने फिलिस्तीन की ज़मीन पर इजरायल बसाया था। इसके बाद  इजरायल ने कंई बार हमले करके फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा कर लिया।

इन तथ्यों के कारण ही दुनिया के मुसलमान, जिनमें भारत के मुस्लिम भी शामिल हैं, हमास के साथ खड़े दिख रहे हैं। फिलिस्तीन की अथॉरिटी के संचालक महमूद अब्बास साहब, जो देश के पीएम भी हैं, यदि इजरायल के साथ इसी तरह जंग करते और अपनी ज़मीन के इजरायल के खिलाफ कब्जों के खिलाफ खड़े होते, तो दुनिया भर के मुसलमान उनके साथ होते। भारत में इजरायल के समर्थन और विरोध में दो धड़े बन गाये हैं। उसके उनके अपनी कारण हैं। इनमें एक का कहना है कि 70 साल से देश की सभी हुकूमतों ने फिलिस्तीन की आज़ादी का समर्थन किया है। यहाँ तक कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था कि वह फिलिस्तीन की हिमायत में खड़े हैं। उन्होंने कहा था कि उनकी यही सॉझ है कि इजरायल भी कायम रहे और फिलिस्तीन  एक आजाद रियासत के रूप में दुनिया के नक्शे पर वजूद में आए और हमेशा के लिए यह झगड़ा खत्म हो जाए।

फिल्म स्टार कंगना रनौत जैसे लोग हैं जो चीजों को बिना समझे विवादित ब्यान दे रहे हैं। रनौत ने कहा था कि मुसलमानों के पास 57 मुल्क हैं। उन्हें एक इजराइल से इतनी परेशानी क्यों है, समझ में नहीं आता ? दुर्भाग्य से कंगना जैसे लोगों को फलस्तीनियों के संघर्ष और कुर्बानियों की जानकारी नहीं है और एक विचारधारा विशेष के प्रति अपनी आस्था जताने के लिए उन्होंने ऐसा ब्यान दिया। भारत में जन्म लेने वाले और अब अमेरिकी नागरिक मशहूर पत्रकार रफीक जकारिया ने अपने एक बयान में कहा है कि पिछले 70 साल से फलस्तीनियों की शांतिपूर्वक चलायी गयी मुहीम का कोई नतीजा नहीं निकला है, इसीलिए हमास ने इजरायल पर घातक हमला करके दुनिया भर के लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा।

संयुक्त राष्ट के महासचिव तक ने हमास के हमले को परिस्थितियों के मद्देनजर देखने का समर्थन किया है। उनके मुताबिक हमास के हमले के पीछे बहुत सारे कारक हैं। उनके बयान से इजरायल बुरी तरह बौखला गया और उसनेउनके इस्तीफे की मांग तक कर दी। भले अब 4 दिन के बाद दो और दिन का युद्धविराम घोषित हुआ है, आशंका है कि इजरायल के हमले युद्धविराम ख़त्म होने के बाद फिर शुरू हो जायेंगे। उसने पहले ही जमीन से हमले शुरू कर रखे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि इसराइल जमीन के हमले में कितना कामयाब होता है क्योंकि हमास के पास जमीन पर लड़ने की जो क्षमता है वह इजरायल के पास नहीं।

अब सवाल यह भी है कि इस पुराने झगड़े को सुलझाने और जंग से बचने में कैसे मदद मिलेगी। सवाल यह भी पैदा होता है कि यह जंग क्या इजरायल जीत पाएगा ? दुनिया भर के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इजरायल जंग नहीं जीत सकता और अगर अमेरिका भी जंग में उसके साथ शामिल हो गया तो तब भी उसको इस जंग में कामयाबी नहीं मिल पाएगी। कारण हमास के अलावा लेबनान के लड़ाके संगठन हिज्बुल्लाह और सीरिया के मिलीशिया के अलावा ईरान की ताकत को कमजोर करके नहीं आंका जा सकता। ऐसा होने पर युद्ध बड़ा स्वरुप ले सकता है। इसी आशंका के चलते दुनिया भर में इजराय-फिलिस्तीन के बीच अमन के लिए प्रदर्शन किये जा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र में दो बार इस मसले पर लाये गयी प्रस्ताव पर वोटिंग हो चुकी है। अमेरिका ने जग बंदी पर होने वाली वोटिंग को अपने वेट ऑफ पावर से निष्फल कर दिया। दरअसल अमेरिका और इसराइल चाहते हैं कि इस बार हमास के साथ आर-पार का मामला किया जाए और हमास को जड़ से उखाड़ फेंका जाए। लेकिन ज्यादातर जानकार मानते हैं हैं कि यह बिलकुल आसान नहीं है। हाँ, यदि फिलिस्तीन की स्वतंत्रता पर कोई ठोस निर्णय आ जाये तो बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।

शादियों के सीजन में झटका, सोना 10 ग्राम का दाम 67 हजार तक जा सकता

नई दिल्ली  : शादियों का सीजन शुरू है और सोने के दाम ऊंचाई पर है। आज 10 ग्राम सोने के दाम 61,895 रुपए पर पहुंच गए। इस बात की आशंका व्यक्त की जा रही है कि सोने के दाम 67 हजार तक जा सकते हैं। इससे पहले इसी साल 4 मई को सोना अपने ऑल टाइम हाई पर था। तब इसकी कीमत 61,646 रुपए प्रति 10 ग्राम थी। अगर सोने के दाम कम न हुए तो शादियों के इस सीजन में उन लोगों को जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी जिन्होंने जेवरात खरीदने हैं।

सोने के वायदा भाव की आज शुरुआत तेजी के साथ हुई। पहले 100 रुपए कीमत बढ़ी लेकिन धीरे-धीरे कीमत पांच साै तक पहुंच गई। शाम तक कीमत का नया अपडेट सामने आएगा। वैसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने चांदी की वायदा कीमतों की शुरुआत तेजी के साथ हुई, लेकिन बाद में चांदी के वायदा भाव नरम पड गए। Comex पर सोना 2,014.30 डॉलर प्रति औंस के भाव पर खुला। पिछला क्लोजिंग प्राइस 2,012.40 डॉलर था।