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जम्मू संभाग में नहीं थम रहीं आतंकी घटनाएँ

राजौरी-पुंछ इलाक़े बन चुके हैं आतंकियों के नये ठिकाने

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों का दबाव बढऩे के बाद आतंकियों ने जम्मू संभाग के सीमावर्ती राजौरी और पुंछ ज़िलों को अपना नया ठिकाना बना लिया है। वहाँ उन्होंने कितने पैर जमा लिये हैं, यह वहाँ बढ़ रही आतंकी घटनाओं से ज़हिर हो जाता है। आतंकी हमलों और उनसे निपटने की रणनीति पर बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार राकेश रॉकी :-

जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले में नियंत्रण रेखा पर ज़ीरो लाइन और सीमा की बाड़ के बीच में स्थित अजोट गाँव 24 नवंबर को उदासी की चादर में लिपटा था। पैरा कमांडो अब्दुल माजिद की आख़िरी रसूमात के दौरान उनकी शहादत को लेकर अमर रहें के नारे लग रहे थे। हाल के महीनों में राज्य के जम्मू संभाग के राजौरी-पुंछ क्षेत्र के गाँवों में ऐसे दु:खद दृश्य कई बार देखने को मिले हैं। कारण है आतंकी घटनाओं का हिन्दू बहुल जम्मू संभाग की तरफ़ शिफ्ट होना। आतंकवादियों ने हाल के महीनों में दो चीज़ें की हैं। एक- जम्मू के सीमा क्षेत्र में गतिविधियाँ बढ़ाना और दो- सेना और सुरक्षा बलों में काम कर रहे मुस्लिम कर्मियों को निशाना बनाना।

‘तहलका’ का अध्ययन बताता है कि अक्टूबर 2021 से मध्य नवंबर, 2023 के इन दो वर्षों में हिन्दू बहुल जम्मू संभाग के सीमावर्ती ज़िलों, जिनमें मुस्लिम आबादी भी काफ़ी है; में 13 बड़ी घटनाएँ हुई हैं। इन घटनाओं में सेना-सुरक्षाबलों के 31 अधिकारियों / जवानों ने शहादत दी है।

पाकिस्तान में आसिम मुनीर के नया सेनाध्यक्ष बनने के बाद आतंकियों ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। यह आरोप हैं कि मुनीर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीति रखने वाले सेनाध्यक्ष हैं। यह सही है कि कश्मीर घाटी में पत्थरबाज़ी की घटनाओं में कमी आयी है; लेकिन इसके बावजूद वहाँ भी कश्मीरी पंडितों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया गया है। कई रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चूँकि पत्थरबाज़ी में बहुत कम लोगों की भागीदारी थी, उसके रुकने को बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं माना जा सकता। हाँ, वहाँ आतंकी वारदात में ज़रूर कमी आयी है।

जम्मू-कश्मीर में दो तरह के आतंकवादी सक्रिय रहते हैं। एक तो स्थानीय भर्ती से हाथों में हथियार उठाने वाले कश्मीरी युवा। दूसरे विदेशी आतंकी, जिनमें अधिकतर पाकिस्तान के होते हैं। दोनों ही तरह के आतंकी कश्मीर और जम्मू संभागों में सक्रिय दिखते हैं। हालाँकि जम्मू संभाग में ज़्यादा संख्या पाकिस्तान से आये आतंकियों की होती है। सुरक्षा बलों ने इन दो वर्षों में बड़ी संख्या में आतंकियों का भी संहार किया है, जिनमें कुछ कमांडर स्तर के आतंकी भी शामिल हैं। लेकिन आज की तारीख़ में यह नहीं कहा जा सकता कि राज्य से आतंकवाद का सफ़ाया हो चुके हैं। हाल में हुर्ई आतंकी घटनाएँ इसका प्रमाण हैं। पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) हाल के महीनों में काफ़ी सक्रिय दिखा है।

जम्मू संभाग के सीमावर्ती ज़िलों राजौरी और पुंछ में हाल के महीनों में आतंकी वारदात में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। आतंकियों की बादली रणनीति से ज़हिर होता है कि उन्होंने अपना ध्यान हिन्दू बहुल जम्मू संभाग की तरफ़ शिफ्ट किया है। जम्मू-कश्मीर पुलिस का दावा है कि इस साल सिर्फ़ 10 स्थानीय रंगरूट आतंकवादी रैंक में शामिल हुए, जिनमें से छ: मारे जा चुके हैं। जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक (डीजी) दिलबाग़ सिंह ने इस पत्रकार से बातचीत में कहा- ‘मैं कह सकता हूँ कि कश्मीर के युवा दुश्मन की चाल और साज़िशों को समझ गये हैं। पिछले साल 110 युवाओं ने हथियार उठाये, जबकि इस साल यह संख्या सिर्फ़ 10 रही। बा$की बचे चार युवाओं से भी हमारी अपील है कि वे हथियार त्याग दें।’

पुलिस का दावा अपनी जगह है; लेकिन विशेषज्ञ इसे अलग तरीक़े से देखते हैं। उनका कहना है कि युवाओं की भर्ती जारी रहना इस बात का संकेत है कि पड़ोसी देश से आये आतंकी कमांडर राज्य में सक्रिय हैं। वही यह भर्तियाँ करते हैं और युवाओं को ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान ले जाते हैं। इससे ज़हिर होता है कि घुसपैठ अभी जारी है। कुछ विशेषज्ञों से इस पत्रकार की बातचीत से ज़हिर होता है कि आतंकियों ने जम्मू के पहाड़ी क्षेत्रों में अपने अड्डे बना लिए हैं। सुरक्षा बलों को ऐसे सघन जंगली क्षेत्रों में आतंकरोधी अभियान चलाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। सेना अधिकारियों के मुताबिक, आमतौर पर जब ऑपरेशन पहाड़ी पर शुरू होता है, तो ऊपर की ओर चढऩे के बजाय सुरक्षा बलों को नीचे की ओर से पहुँच बन्द करनी होती है और फिर पहाड़ी के पीछे के छोर से आतंकवादी दल के पास पहुँचना होता है।

उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (जीओसी) लेफ्टिनेंट जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने हाल में कहा था कि जम्मू-कश्मीर में मारे गये अधिकतर आतंकियों से अकेले दक्षिणी पीर पंजाल इलाक़े में ही 65 फ़ीसदी आतंकी मारे गये हैं। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में धारा-370 ख़त्म होने के बाद भी आतंकी भर्ती जारी रही है। जहाँ सन् 2019 में 119 आतंकी भर्तियाँ हुईं, वहीं सन् 2020 में यह संख्या 167, सन् 2021 में 128 और सन् 2022 में 100 रही। जारी सन् 2023 में सिर्फ़ 10 आतंकी भर्तियाँ होने का दावा किया गया है। हालाँकि इसके बावजूद आतंकी वारदातें हुई हैं, जो ज़हिर करती हैं कि विदेशी आतंकी भी राज्य में सक्रिय हैं।

आतंकियों ने हाल के महीनों में उन मुस्लिमों को भी निशाना बनाया है, जो सेना, सुरक्षा बलों और पुलिस में काम कर रहे हैं। कश्मीर घाटी में ऐसी घटनाएँ ज़्यादा हुई हैं। हाल के महीनों में सेना / सुरक्षा बलों के जो लोग शहीद हुए हैं, उनमें उच्च अधिकारियों की संख्या भी काफ़ी रही है। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक आतंक की नवीनतम वारदात राजौरी में हुई, जिसमें सेना-सुरक्षा बलों के पाँच जवान शहीद हुए। यह एक मुठभेड़ थी 34 घंटे तक चली। सुरक्षाबलों ने दो आतंकियों को भी मार गिराया। शहीद जवानों में कैप्टन शुभम, कैप्टन एमवी प्रांजिल, हवलदार माजिद, पैराट्रूपर सचिन लॉर और नायक संजय बिष्ट शामिल हैं।

इस मुठभेड़ में जो आतंकी मारा गया उसका नाम डिफेंस पीआरओ ने कारी बताया है। कारी पाकिस्तानी नागरिक था और माना जाता है कि उसे पाक और अफ़गान मोर्चे पर ट्रेंड किया गया था। कारी लश्कर-ए-तैयबा का टॉप कमांडर था और पिछले एक साल से अपने ग्रुप के साथ राजौरी-पुंछ में सक्रिय था। उसे ही इस संभाग के डांगरी और कंडी हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता रहा है। कारी को जम्मू में आतंकवाद को दोबारा फैलाने के लिए भेजा गया था, जिससे ज़हिर होता है कि सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ पूरी तरह रुकी नहीं है। कारी को आईईडी स्पेशलिस्ट माना जाता था और वह गुफ़ाओं से छिपकर काम करने वाला ट्रेंड स्नाइपर था।

जम्मू के राजौरी-पुंछ में आतंकियों के पैर जमाने की पुष्टि इस बात से भी होती है कि पिछले साल की दो बड़ी घटनाओं के मुक़ाबले इस साल आतंकवाद की पाँच घटनाएँ अब तक इस क्षेत्र में हो चुकी हैं। इनमें सात आम नागरिक और 15 जवानों सहित 22 लोग शहीद हुए हैं। आतंकी भी मारे गये हैं। पहले पुंछ का भाटाधुलियाँ, बीजी सेक्टर आतंकियों का गढ़ होता था। इसके बाद उन्होंने राजौरी के कोटरंका और अब बाजीमल में पैर जमा लिये हैं। वैसे भी जम्मू संभाग में राजौरी-पुंछ ज़िलों को आतंक की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। हाल के दो वर्षों में सेना और आम नागरिकों पर आतंकियों के हमले ज़हिर करते हैं कि आतंकियों ने इन इलाक़ों में अपना स्थानीय नेटवर्क मज़बूत कर लिया है।

हाल की घटनाओं में यह भी देखने को मिला है कि वारदात करने के बाद आतंकी ज़्यादातर मौक़ों पर बच निकलने में सफल हो जाते हैं। आतंकियों के जम्मू संभाग में शिफ्ट का एक बड़ा कारण विशेषज्ञ कश्मीर में सुरक्षाबलों के बढ़ते दबाव को बताते हैं। कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों की संख्या आज जितनी है, उतनी कभी नहीं रही। इसका नतीजा यह निकला है कि आतंक के मूल ढाँचे का बड़ा हिस्सा वहाँ तबाह कर दिया गया है। यदि पिछले एक दशक पर नज़र दौड़ाएँ, तो ज़हिर होता है कि एलओसी के साथ सटे दोनों संवेदनशील ज़िले राजौरी और पुंछ सीमा पार से घुसपैठ का गेटवे रहे हैं। राजौरी और पुंछ ज़िले पीर पंजाल पहाडिय़ों के दक्षिण में हैं और यही इलाक़ा है, जहाँ पूरे राज्य में मरने वाले आतंकियों में ज़्यादातर ढेर किये गये हैं।

इसमें कोई दो-राय नहीं कि हाल के वर्षों में सुरक्षाबलों ने आतंकवादियों पर दबाव बनाने में सफलता हासिल की है। लेकिन यह भी सच है कि घुसपैठ बंद करने के लिए अभी उसके नेटवर्क को ध्वस्त करने में व$क्त लगेगा। हाल में यह भी देखा गया है कि जब सेना और सुरक्षाबल आतंकियों के ख़िलाफ़ अभियान शुरू करते हैं, तो आतंकी भूमिगत हो जाते हैं। जैसे ही अभियान ख़त्म होता है, वह फिर वारदात करने लगते हैं। सीमा इलाक़ों में आतंकियों को पनाह देने वाले और उनके मददगारों की उपस्थिति अभी भी है।

सुरक्षा एजेंसियों के इंटरसेप्ट ज़हिर करते हैं कि सीमा क्षेत्रों में मददगारों और सीमा पार आतंकी आकाओं के बीच समन्वय बना हुआ है। एजेंसियों में बड़े अधिकारी इस बात से इनकार नहीं करते कि राजौरी-पुंछ में आतंकियों ने अपने पैर पसार लिये हैं। सुरक्षाबलों की दृष्टि से यह भी चिन्ता की बात है कि हाल के दो वर्षों में इतनी आतंकी वारदातें होने के बावजूद उनका कोई मज़बूत नेटवर्क या ठिकाना ध्वस्त नहीं हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सेना को वहाँ अपनी रणनीति बदलने और अभियान को और सघन करने की सख़्त ज़रूरत है।

नहीं भूलना चाहिए कि राज्य में आतंक की शुरुआत के बाद से ही राजौरी-पुंछ-डोडा इलाक़े आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के मज़बूत गढ़ रहे हैं। हाल में इन इलाक़ों में हमलों की  ज़िम्मेदारी जिस पीपुल्स एंटी फासिस्ट फ्रंट (पीएएफएफ) ने ली है, उसे जेईएम की ही शाखा माना जाता है। हाल में जो इनपुट सुरक्षा एजेंसियों को मिले हैं, उनसे ज़हिर होता है कि क्षेत्र में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) भी गतिविधियाँ बढ़ा रहा है। पाकिस्तान की एजेंसी आईएसआई, जो सेना का ही एक अंग है, दोनों ही संगठनों की सरपरस्त रही है।

जानकारों का यह भी कहना है कि धारा-370 ख़त्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर में $गैर-क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया गया है। इससे ख़ासकर कश्मीर घाटी में यूएपीए और पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत आम लोगों की गिरफ़्तारियाँ बढ़ी हैं। इससे लोगों के भीतर नाराज़गी है। जहाँ साल 2014 में यूएपीए के तहत कश्मीर में सिर्फ़ 45 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2019 तक इनकी तादाद 255 पहुँच गयी थी। इसके बाद के दो वर्षों में (2021 तक) 2319 लोगों के ख़िलाफ़ यूएपीए लगा और 1200 मामले इन धाराओं के साथ दर्ज हुए। पीएसए लगाने के मामले घाटे हैं; लेकिन एक सच यह भी है कि पीएसए एक्ट के तहत सज़ काट रहे लोगों के मामले जब हाई कोर्ट रद्द कर देता है, तो उन्हें यूएपीए की धाराओं के तहत अन्दर कर दिया जाता है।

हिल काका था आतंकी गढ़

जम्मू-कश्मीर में सन् 1989 में आतंक की शुरुआत होने के बाद यह ज़हिर हुआ था कि पुंछ के सुरनकोट के पास पीर पंजाल की पहाडिय़ों में स्थित हिल काका का इलाक़ा सन् 2000 के आसपास आतंकियों का गढ़ बन गया था। हिल काका के जंगल में आतंकियों ने अपने पक्के बंकर बना लिये हैं। जंगलों में आतंकी स्थानीय युवाओं को जबरदस्ती बंदूक की नोक पर प्रशिक्षण देते थे। आतंकियों ने हिल काका में अस्पताल तक बना लिया था, जिसे वह ट्राजिट कैंप की तरह इस्तेमाल करते थे। हिल काका पाकिस्तान, कश्मीर और किश्तवाड़, डोडा जाने का केंद्र बिंदु था। लेकिन सन् 2003 में जब सेना ने वहाँ की पहाडिय़ों पर ऑपरेशन सर्प विनाश किया, तो सामने आया कि आतंकियों ने कितनी मज़बूत पैठ वहाँ बना ली थी। ऑपरेशन के दौरान 57 आतंकी ढेर किये गये थे और जब बंकर नष्ट किये गये, तो वहाँ बड़ी मात्रा में हथियारों और खाने-पीने की चीज़ों के अलावा गोला-बारूद बरामद हुआ था। जो आतंकी मारे गये उनमें देसी ही नहीं काफ़ी विदेशी भी थे। दरअसल यह जंगलों से भरा कठिन इलाक़ा है। आम नागरिकों के नाम पर यहाँ गुज्जर-बकरवाल ज़्यादा रहते हैं, जो भैंस और भेड़-बकरियों का व्यवसाय करते हैं। यह एक घुमन्तू जाति है और उन्हें इलाक़े की ख़ूब जानकारी रहती है। यह लोग गर्मियों में श्रीनगर चले जाते हैं। आतंकी उनसे इलाक़े के रास्ते तो पूछते ही हैं, खाने का भी कहते हैं। हालाँकि हाल के वर्षों में पीर पंजाल की पहाडिय़ों में फिर से आतंकी ठिकाने दिखने लगे हैं। आतंकी एक तरह से वहाँ से ऑपरेट करते हैं और वारदातें करने के बाद वहाँ छिप जाते हैं।

दो साल में राजौरी-पुंछ में हुई बड़ी घटनाएँ

11 अक्टूबर, 2021 : पूंछ ज़िले में सुरनकोट तहसील के चामरेर इलाक़े में आतंकी मुठभेड़ में एक जेसीओ सहित पाँच जवान शहीद।

16 अक्टूबर, 2021 : पुंछ के मेंढर में भट्‌टा दुरियाँ इलाक़े में मुठभेड़। एक जेसीओ सहित चार जवान शहीद।

30 अक्टूबर, 2021 : राजौरी के नौशेरा सेक्टर में माइन ब्लास्ट में लेफ्टिनेंट और जवान शहीद।

11 अगस्त, 2022 : राजौरी के दरहाल क्षेत्र में परगाल सेना शिविर पर आतंकी हमला। पाँच जवान शहीद। दो आतंकी ढेर।

18 दिसंबर, 2022 : राजौरी के अल्फा गेट के बाहर आतंकी हमला। दो नागरिकों की मौत।

01 जनवरी, 2023 : राजौरी के डांगरी में विदेशी आतंकियों की गोलीबारी और आईईडी ब्लास्ट। दो नाबालिगों समेत अल्पसंख्यक समुदाय के सात लोगों की मौत।

20 अप्रैल, 2023 : पूंछ ज़िले के मेंढर इलाक़े के भट्‌टा दुरियाँ में सुरक्षाबलों पर हमला। सेना के पाँच जवान शहीद, एक घायल।

05 मई, 2023 : राजौरी के कांडी में आईईडी ब्लास्ट। इसमें पाँच आर्मी पैरा कमांडो शहीद और एक मेजर घायल।

18 जुलाई, 2023 : पुंछ ज़िले के सुरनकोट इलाक़े के सिंधारा टॉप में चार पाकिस्तानी आतंकी ढेर।

22 नवंबर, 2023 : राजौरी ज़िले में मुठभेड़। दो कैप्टन सहित पाँच जवान शहीद। दो आतंकी ढेर।

साक्षात्कार

हाल में जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर चर्चा के लिए राज्य के दलों ने बैठक की थी। आपके ख़याल से प्रदेश की स्थिति कैसी है?

जो हालात राज्य के इस व$क्त हैं, उन्हें मैं चिन्ताजनक मानता हूँ। जम्मू-कश्मीर में संविधान को निलंबित कर दिया गया है। हमारे उप राज्यपाल, गृहमंत्री, प्रधानमंत्री मोदी साहब बार-बार यह कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में सब कुछ सामान्य है। ऐसा है, तो हमारा सवाल है कि सब कुछ ठीक है, तो चुनाव क्यों नहीं कराये जा रहे? आप कहते हैं कि परिसीमन हो चुका है और वोटर लिस्ट भी तैयार हैं। तो फिर चुनाव क्यों नहीं करा रहे हैं?

केंद्र का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में शान्ति आयी है। आतंकवाद पर नकेल कसी गयी है?

ऐसा है, तो फिर आतंकी घटनाएँ क्यों हो रही हैं। कुछ दिन पहले राजौरी में हमारी सेना के पाँच अफ़सरों और जवानों की शहादत हुई है। और जगह भी लोग मरे हैं। बाहर से यहाँ आकर काम करने वाले मज़दूरों को भी मौत के घाट उतारा गया है। तो शान्ति कहाँ हुई है?

आपके ख़याल से इसके लिए क्या होना चाहिए?

हम मानते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत की जानी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता है, कश्मीर का मसला नहीं सुलझाया जा सकता है। जब तक मसला नहीं सुलझेगा, तब तक राज्य में अमन नहीं हो सकता। लोगों को सुकून नहीं मिल सकता। जब तक अमन नहीं होता, तब तक हत्याओं पर रोक भी नहीं लगायी जा सकती है।

तो आपको लगता है केंद्र सरकार के दावे ग़लत हैं?

उनके दिल साफ़ होने ज़रूरी हैं। घाटी के मसलों पर आप दिखावा नहीं कर सकते। यह बहुत हो चुका है। मसलों को सुलझाना पड़ेगा। मैं फिर कहता हूँ कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान की सरकारें जब तक कश्मीर के मामले में ईमानदारी से बातचीत नहीं करती हैं, तब तक कुछ नहीं होगा। जो बातें वे (केंद्र) कर रहे हैं, सब तमाशा है। जब तक राजनीति की जाती रहेगी, यह तमाशे होते रहेंगे। असली मसला वहीं रह जाएगा और लोगों को सुकून नहीं मिलेगा। कश्मीर में अभी भी मिलिटेंसी है। आप देख रहे हैं, गोलियाँ चल रही हैं। लोग मर रहे हैं। $फौजी शहीद हो रहे हैं। अगर सही में अमन हुआ होता, तो यह सब नहीं होता। आप देख लें, यूक्रेन में क्या हो रहा है। जो हुआ सबके सामने है। यूरोप बर्बाद हो रहा है। पूरा देश (यूक्रेन) ख़त्म हो रहा है। इन चीज़ों से सबक लेना चाहिए। कृपा करके कश्मीर को अपने पॉलिटिकल एक्सपेरिमेंट्स की प्रयोगशाला न बनाएँ!

क्रिकेट और चुनाव

जैसे क्रिकेट विश्व कप की हार-जीत को लेकर कयासगोइयाँ थीं, वैसी ही अब पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव को लेकर हैं- कौन जीतेगा? हिन्दोस्तान में क्रिकेट और चुनाव दोनों ही बुख़ार लेकर आते हैं, जो हर किसी के सिर चढक़र बोलता है। विश्व कप तीसरी बार जीतने का भारत का सपना टूट गया। चुनाव में भी कई सपने पल रहे हैं। सपने जीतने के ही हैं। जब 3 दिसंबर को चुनाव के नतीजे आएँगे मौसम में और ठण्ड घुल चुकी होगी। लेकिन राजनीति की फ़िज़ाएँ गर्म होगी। काफ़ी गर्म। नतीजे के दिन कुछ के सपने टूटेंगे और कुछ के लिए यह पठाखे फोडऩे और मिठाई बाँटने का दिन होगा। हो भी क्यों नहीं। आख़िर यह नतीजे 2024 के बड़े चुनाव का गेटवे जो हैं।

पाँच राज्यों के चुनाव की एक ख़ास बात भी है। यह राज्य एक तरह से मिनी भारत का स्वरूप हैं। कैसे? राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ हिन्दी भाषी तो हैं ही, इनमें से दो राज्यों में आदिवासी समुदाय की संख्या भी काफ़ी है। तेलंगाना एक तरह से दक्षिण का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् वहाँ के नतीजे से पता चल सकेगा कि दक्षिण में लोगों का मूड क्या है। और मणिपुर में हाल की भयावह घटनाओं में बाद मिजोरम के चुनाव नतीजे पूर्वोत्तर की जनता की सोच का संकेत देंगे। इस बार के चुनाव में जाति जनगणना और पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस) भी काफ़ी ज़्यादा चर्चा में हैं।

जाति देश के हर समाज में महत्त्व रखती ही है, भले हम जो कहें। इस बार जाति का यह मुद्दा सामाजिक समानता से जुड़ता प्रतीत हो रहा है। और सेवानिवृत्ति के बाद घर का ख़र्चा कैसे चले, यह भी हमारे समाज की एक बड़ी चिन्ता रहती है। ऐसे में ओपीएस की चर्चा तो स्वाभाविक ही है।

क्रिकेट में देश को बड़ी उम्मीदें थीं। आख़िर भारत की टीम लगातार 10 मैच जीतकर फाइनल में पहुँची थी। लेकिन ट्रॉफी जब सामने दिख रही थी, तब जीत का दरवाज़ा बंद हो गया। क्रिकेट का यह नतीजा बताता है कि हार-जीत खेल का हिस्सा है। हार-जीत चुनाव का भी हिस्सा है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आपने पिछले महीनों में कितने चुनाव जीते। यदि जीते, तो हार भी सकते हैं। हारे हैं, तो जीत भी सकते हैं। जैसे विश्व कप ख़त्म होने के बाद अगले बड़े टूर्नामेंट की तैयारी खिलाड़ी शुरू कर देते हैं, वैसे ही इन पाँच राज्यों के नतीजों के बाद राजनीतिक दल भी 2024 की तैयारी शुरू कर देंगे। लेकिन हार-जीत हमारे मनोविज्ञान पर असर डालती है। जीत हमारे भीतर ऊर्जा पैदा करती है। लेकिन हमें सिर्फ़ ऊर्जा नहीं जिता सकती। जैसा कि लगातार जीतने के बावजूद भारत के साथ फाइनल में हुआ। हमारी रणनीतियाँ भी हार-जीत तय करने में बड़ा रोल अदा करती हैं।

पाँच राज्यों के इन चुनावों में भी गहरी रणनीतियाँ बुनी गयी हैं। मसलन भाजपा ने सभी पाँच राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रप के चेहरे पर दाँव नहीं खेला। ख़ुद के दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने का दावा करने वाली भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही राज्यों के चुनाव में अपना चेहरा बनाया है।

एक तरह से मोदी भाजपा की राजनीति के भगवान हैं। वैसे ही जैसे क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर रहे और अब विराट कोहली हैं। लेकिन क्रिकेट का भगवान होकर भी सचिन और विराट मैदान में हमेशा शतक नहीं बना पाते। वैसे ही राजनीति में कोई नेता हमेशा नहीं जीतता। हम भगवान होने या अपराजेय होने का भ्रम पाल लेते हैं। या हमारे शुभचिंतक हमें ऐसा बना देते हैं। फिर हम भी उसी भ्रम में जीने लगते हैं। राजनीति में भी बहुत-से लोग इस भ्रम में जी रहे हैं।

भाजपा की मोदी पर भरोसे या कह लीजिये अतिविश्वास की यह रणनीति उसकी अपनी सोच है। हो सकता है कि उसे लगता हो कि वह राज्यों के नेताओं के चेहरे पर चुनाव नहीं जीत पाएगी। या फिर किसी एक को आगे करके उसे यह ख़तरा दिखता है कि ऐसा करने से बग़ावत हो सकती है। लिहाज़ा नतीजों के बाद देखा जाएगा, क्या करना है। मोदी आख़िर देश की चुनावी राजनीति में एक बड़ा ब्रांड हैं। भाजपा उनके चेहरे को भला क्यों न भुनाए? लेकिन इन राज्यों में भाजपा के सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की रणनीति इसके विपरीत है। कांग्रेस ने अपने अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और सबसे बड़े चेहरे राहुल गाँधी को प्रचार में जमकर झोंका; लेकिन चुनाव में चेहरे के रूप में क्षेत्रीय क्षत्रपों को ही रखा। मसलन राजस्थान में अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और मध्य प्रदेश में कमलनाथ।

चुनाव नतीजों से पहले कहा जा सकता है कि पाँच राज्यों में मोदी की लोकप्रियता और ब्रांड नाम का मुक़ाबला कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रपों से हैं। न कि सीधे राहुल गाँधी और खडग़े से, जिन्होंने कांग्रेस की तमाम रणनीतियाँ बुनीं, जिनमें स्थानीय चेहरों को आगे रखने की रणनीति भी शामिल है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस जीती, तो उसका श्रेय राहुल गाँधी या खडग़े को नहीं जाएगा। संघवाद में केंद्रीय सत्ता के साथ-साथ स्थानीय सत्ता का भी महत्त्व है। कांग्रेस भी लम्बे समय तक केंद्रीय सत्ता में एकाधिकार की शिकार रही। लेकिन वह अब सत्ता और नेतृत्व का विकेंद्रीकरण कर रही है। दुर्भाग्य से अब भाजपा इस केंद्रीकृत सत्ता का शिकार हो गयी है, जो राज्यों में उसके सांगठनिक ढाँचे को धीरे-धीरे कमज़ोर कर देगा, क्योंकि क्षेत्रीय नेतृत्व में इतना आत्मविश्वास नहीं रह जाएगा कि वह चुनाव में अपने बूते जीतने का साहस कर सके।

क्रिकेट और चुनाव में एक और समानता है। चुनावों में नेता एक-दूसरे पर ख़ूब छींटाकशी करने लगे हैं। क्रिकेट विश्व कप में भी ख़ूब स्लेजिंग हुई। अर्थात् दोनों के स्वभाव एक जैसे हैं। यह मानवीय स्वभाव है। और इसमें जब कॉर्पोरेट जुड़ जाता है, तो मामला ज़रा गम्भीर हो जाता है। अब तो चुनाव और क्रिकेट दोनों में अपशब्दों का चलन आम हो गया है। राजनीति समाज के लिए थी, जेबें भरने के लिए बन गयी। क्रिकेट भद्रजनों का खेल था, स्लेजिंग तक आ पहुँचा। मार-काट है, चुनाव में भी, क्रिकेट में भी। क्योंकि जीतना है। जीत के लिए साम-दाम-दंड-भेद सब होता है। चुनाव और क्रिकेट दोनों में नियम हैं, फिर भी टूटते हैं।

भाजपा अब तक मोदी के नाम पर आत्मविश्वास से भरी रही है। पार्टी के समर्थक तो यह भी दावा करते हैं कि मोदी ही 2029 तक देश के प्रधानमंत्री रहेंगे और शायद उससे आगे जाकर भी भाजपा की ही सत्ता रहेगी। प्रधानमंत्री मोदी तो स्वतंत्रता दिवस पर ख़ुद ही अपनी विजय का पूर्व ऐलान कर चुके हैं, जब उन्होंने कहा कि आगे जो काम हैं, शायद ईश्वर ने उनके ही नाम करने के लिए लिखे हैं।

आत्मविश्वास होना बुरी चीज़ नहीं; लेकिन अति-आत्मविश्वास नुक़सान कर देता है। जनता को तय करने दें, उसे कौन चाहिए? 10 मैच जीतकर भी भारतीय टीम क्रिकेट विश्व कप के फाइनल में उस ऑस्ट्रेलिया टीम से परास्त हो गयी, जो अपने पहले दोनों मैच हार गयी थी। बहुत-से लोग मानते हैं कि यह अति-आत्मविश्वास का नतीजा था। पाँच राज्यों के चुनाव बहुत दिलचस्प हैं। गुपचुप लहर (अंडर करंट) भी हो सकती है, किसी के पक्ष में, किसी के विरोध में!

क्रिकेट का विश्व कप हो गया, चुनाव का अभी बाक़ी है। कह सकते हैं कि 50 में से 25 ओवर अभी हो जाएँगे और 25 फाइनल के लिए बच जाएँगे। पहले के इन 25 ओवर में बनाया गया स्कोर ही फाइनल के 25 ओवर में जीत की नींव खड़ी करेगा। चुनाव नतीजों से ही प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट का चेहरा भी सामने आएगा, जैसे क्रिकेट में विराट कोहली का आया था। ज़्यादा ओवर निकल जाने पर जब रन नहीं बनते, तो बल्लेबाज़ को शॉट खेलने के लिए रिस्क लेना पड़ता है, जिसमें उसके आउट होने का ख़तरा बन जाता है। वैसा ही रिस्क चुनाव में भी है।

पाँच राज्यों में हार-जीत 2024 के फाइनल में नेताओं की बॉडी लैंग्वेज तय करेगी। इस चुनाव में जनता बॉलर की भूमिका है। वह किसको बाउंसर मारेगी और किसे गुगली, कहना कठिन है। कौन अच्छा डिफेंस करेगा या हुक करके चौका मारेगा, यह 3 दिसंबर को पता चलेगा। क्रिकेट और चुनाव दोनों आख़िरी ओवर तक देखे जाने की चीज़ हैं।

आतंकवाद का नासूर

हाल के दिनों में जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधियों में वृद्धि देखी गयी है। जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले में एक मुठभेड़ में विशेष बलों के दो कैप्टन सहित सेना के पाँच जवान शहीद हो गये। गोलीबारी के दौरान लश्कर-ए-तैयबा के एक कमांडर सहित दो आतंकवादी भी मारे गये। आधिकारिक आँकड़ों से पुष्टि होती है कि हाल के दिनों में जम्मू क्षेत्र में आठ ग्रेनेड और 13 सुधारे हुए विस्फोटक उपकरण हमले के दौरान दर्ज किये गये थे। इस साल अप्रैल-मई में पुंछ और राजौरी सीमावर्ती ज़िलों में घात लगाकर किये गये दो आतंकी हमलों में 10 जवान शहीद हो गये थे। अकेले 2023 में अब तक जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से सम्बन्धित हिंसा में 80 से अधिक आतंकवादियों के मारे जाने और 25 से अधिक सुरक्षाकर्मियों के शहीद होने सहित कम-से-कम 120 लोगों की मौत हुई है।

वरिष्ठ पत्रकार राकेश रॉकी द्वारा लिखित आवरण कथा ‘आतंकी हमलों से मुक्त नहीं हुई घाटी’ में बताया गया है कि कैसे केंद्र शासित प्रदेश का जम्मू क्षेत्र आतंकवाद के नये केंद्र में बदल गया है। क्योंकि आतंकवादी घने जंगलों के पीछे छिप गये हैं। हाल के वर्षों में कई मुठभेड़ों के कारण जम्मू-कश्मीर के पीर पंजाल का पहाड़ी-जंगली इलाक़ा सुरक्षा बलों के लिए एक नया सिरदर्द बन गया है। हालाँकि कुल मिलाकर हाल के वर्षों में घाटी में हिंसा में कमी आयी है। फिर भी आतंकवादियों से निपटने और चुनावी प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के लिए अनुकूल परिस्थितियों को बनाने के लिए आतंकवाद के ख़िलाफ़ अभी और सख़्त कार्रवाई की आवश्यकता है।

यह बात स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के आतंकी मंसूबे मज़बूती से क़ायम हैं। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों की टुकडिय़ों में उच्च प्रशिक्षित विदेशी आतंकवादियों की घुसपैठ गम्भीर चिन्ता का विषय है। यह सच है कि अब स्थानीय आतंकी भर्ती नहीं हो रही है। लेकिन कई विदेशी प्रशिक्षित आतंकवादी कथित तौर पर राजौरी और पुंछ के सीमावर्ती ज़िलों में प्रवेश कर चुके हैं। पाकिस्तानी सेना द्वारा कथित तौर पर सेवानिवृत्त कर्मियों को सीमा पार भेजने के बीच भारत के लिए सतर्कता की स्थिति में किसी भी कमी की कोई गुंजाइश नहीं है। राजौरी में हाल ही में 31 घंटे चली मुठभेड़ में लश्कर-ए-तैयबा का एक शीर्ष कमांडर और उसका सहयोगी मारा गया था, जबकि सेना के दो कैप्टन सहित पांच लोग शहीद हुए थे। यह आतंकी हमला जम्मू-कश्मीर में जटिल स्थिति की ओर इशारा करता है।

आधिकारिक आँकड़ों में कहा गया है कि इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आतंकवादी हमलों में पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच हताहतों की संख्या में वास्तव में 13 प्रतिशत की कमी देखी गयी है। लेकिन यह भी सच है कि अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के बाद भी विभिन्न आतंकी हमलों में देश के 29 सुरक्षाकर्मियों ने अपनी शहादत दे दी और 32 अन्य घायल हो चुके हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुच्छेद-370 के निरस्त होने से पहले लगभग चार साल की अवधि की तुलना में केवल एक हथियार छीनने के अलावा 19 पथराव की, 16 हड़ताल की घटनाएँ और कई बंद के आह्वान हुए हैं; जिनमें क्रमश: 80 प्रतिशत, 62 प्रतिशत और 42 प्रतिशत की गिरावट आयी है। फिर भी आतंकवादियों की समर्थन प्रणाली को ख़त्म करने के लिए जम्मू संभाग में ‘360 डिग्री सुरक्षा तंत्र’ को मज़बूत करने की सख़्त ज़रूरत है। 

मुंबई में नेतागीरी के दम पर कालाबाज़ारी

के. रवि (दादा)

एक युवक उत्तर प्रदेश से वर्ष 2004 में मुंबई आता है और ठीक 19 साल में न सिर्फ़ करोड़पति बन जाता है, बल्कि सोने और डायमंड के मुंबई के व्यापार में उसका पूरा दबदबा हो जाता है। दबदबा इतना कि उसकी बिना मर्ज़ी के कोई सोने और डायमंड का बड़ा व्यापारी अपना धंधा नहीं कर पाता है। यह युवक कोई और नहीं, बल्कि मोहित कंबोज नाम का भाजपा नेता है। अभी कुछ महीने पहले ही एक ख़बर सामने आयी थी कि सोने और डायमंड के कुछ व्यापारियों में से एक व्यापारी ने सरकार की राजस्व न चुकाकर भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से क़रीब 3,00,000 करोड़ रुपये की सम्पत्ति बना है और आज़ाद घूम रहा है। कालाबाज़ारी करने में ऐसे जितने लोग सफल हो रहे हैं, उनको मोहित कंबोज जैसे नेताओं की शह मिली है, जो अपना हिस्सा लेकर कालाबाज़ारी करने वाले सोने और डायमंड के व्यापारियों की भ्रष्ट अधिकारियों और भ्रष्ट नेताओं से पैठ कराते हैं।

अभी हाल ही में मुंबई की एक अदालत ने भाजपा नेता मोहित कंबोज और कई अन्य के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी के मामले को बंद करने की सीबीआई की रिपोर्ट ख़ारिज की थी। मोहित कंबोज और इन दूसरे आरोपियों पर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के 103 करोड़ रुपये की गड़बड़ी करने का मामला चल रहा था, जिसे सीबीआई ने आरोपियों को जेल न भेजकर फाइल ही बंद कर दी। जैसे ही मामला मुंबई की एक अदालत में पहुँचा, तो अदालत की इंसाफ़ की परंपरा को निभाते हुए अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जयवंत यादव ने इसे ख़ारिज कर दिया। मजिस्ट्रेट जयवंत यादव ने न्यायपूर्ण ढंग से 23 अक्टूबर के अपने फ़ैसले में कहा कि पहली नज़र में सभी आरोपियों के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश, धोखाधड़ी और जालसाज़ी का मामला पूरी तरह से स्थापित होता है। मैं मानता हूँ कि भारतीय दंड संहिता की धारा-120(बी), 417, 420, 467, 468 और 471 के तहत दंडनीय अपराध किये गये प्रतीत होते हैं। इस मामले में की गयी जाँच भी पर्याप्त नहीं है। जाँच अधूरी है। आरोपियों के आपराधिक कृत्य से निपटने की ज़रूरत है। क्योंकि उन्होंने फ़र्ज़ी दस्तावेज़ तैयार करके एक राष्ट्रीयकृत बैंक को करोड़ों रुपये का चूना लगाकर सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया है। मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को ख़ारिज करके उचित जाँच करके उसकी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

इस मामले में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की शाखा की ओर से बैंक के उप महाप्रबंधक पी.के. जगन ने टेनेट एक्जिम प्राइवेट लिमिटेड के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करायी थी। इस एफआईआर में कम्पनी के सीएमडी मोहित कंबोज के अलावा संचालक जितेंद्र कपूर, नरेश एम. कपूर, सिद्धांत आर. बागला, हितेश मिश्रा, रुद्राक्ष मोटर्स प्राइवेट लिमिटेड (कॉर्पोरेट गारंटर), ललित व सुरेंद्र (चार्टर्ड अकाउंटेंट) और एक अन्य अज्ञात लोकसेवक का नाम दर्ज कराया गया। सूत्रों के अनुसार, आरोपियों ने दस्तावेज़ों के साथ छेड़छाड़ की, बैंक से क़र्ज़ लेने के लिए हेराफेरी के अलावा क़र्ज़ वापसी करने की नीयत न दिखाते हुए हेराफेरी की।

क़र्ज़ न लौटाने पर सीबीआई के पास मामला पहुँचा; लेकिन कुछ ही समय में इस मामले के आरोपियों को क्लीन चिट मिल गयी। इसके बाद बैंक ने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और अब यह मामला दोबारा खुलने की चर्चा है। रिपोर्टर के अनुसार, यह मामला तो क़र्ज़ का है, जिसमें धोखाधड़ी साफ़ दिख रही है। पर इसके अलावा मुंबई में डायमंड और सोने की कालाबाज़ारी के अलावा दूसरी विपक्षी पार्टियों के साफ़ छवि के नेताओं को आरोपित करने के कई मामले देखने को मिल रहे हैं। कुछ शिकायती सूत्रों के अनुसार, मोहित कंबोज के निशाने पर दो ही प्रकार के लोग इन दिनों मुंबई में रहते हैं- मुंबई के सोना और डायमंड व्यापारी, जिन्हें बिना ऐसे लोगों के सोने और डायमंड का व्यापार करना सम्भव ही नहीं लगता है और दूसरे वे नेता, जो मोहित कंबोज के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और विपक्षी पार्टियों के हैं। मोहित कंबोज के बारे में कहा जाता है कि वह एक बार में कई-कई शिकार करते हैं। एक तो वह सोने और डायमंड के व्यापारियों के हर लेन-देन पर नज़र रखते हैं और उनके नंबर दो की कालाबाज़ारी में शरीक़ होते हैं, जिसके बदले मोहित कंबोज की जेब गर्म होती है। दूसरी ओर वह विपक्षी नेताओं और खुद के रहस्य जानने वालों का शिकार करते हैं।

रिपोर्टर के अनुसार, हालाँकि हमारा मक़सद किसी को दोषी ठहराना या बदनाम करना नहीं है। पर जो ख़बरें सामने आ रही हैं, पत्रकारिता से जुड़े होने के चलते हम वो बातें पाठकों के सामने रखकर इतना ही कहना चाहते हैं कि मुंबई में सोने और डायमंड की कालाबाज़ारी बहुत बड़े पैमाने पर हो रही है, जिसमें कई लोगों के काले चिट्ठे सरकार के सामने खुलने चाहिए और कालाबाज़ारी करने वालों के ख़िलाफ़ एक ईमानदारी वाली गहन जाँच होनी चाहिए; जिससे सोने और डायमंड की कालाबाज़ारी करने वाले व्यापारियों, उन्हें इस तरह के काम कराने वाले भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों के चेहरे से भी शराफ़त का मुखौटा उतर सके। इससे विश्व प्रसिद्ध मुंबई में सोने और डायमंड की बड़े पैमाने पर हो रही कालाबाज़ारी कुछ हद तो रुकेगी ही, साथ ही कई शरीफ़ दिखने वाले चेहरे बे-नक़ाब होंगे। इससे सोने और डायमंड के ईमानदार व्यापारी भी चैन की साँस ले सकेंगे, जिससे साथ ही समय-समय पर सरकार के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी।

बढ़ते जा रहे नाबालिग़ अपराधी

हाल में देश की दिल्ली के वेलकम में 16 साल के नाबालिग़ ने 50 से ज़्यादा बार चाक़ू से ताबड़तोड़ हमले करके बेहद निर्मम तरीक़े से 17 साल के एक नाबालिग़ को मार डाला। मृतक के पास 350 रुपये थे, जिन्हें आरोपी ने लूटने के लिए यह हत्या कर दी। आरोपी ने इस दौरान शव को घसीटा, शव के पास डांस किया। यह सब वहाँ लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गया। कुछ मीडिया रिपोट्र्स के अनुसार, आरोपी के रिश्ते कुछ शातिर अपराधियों से हैं और वह कुछ दिन पहले ही बाल सुधार गृह से अपने घर लौटा था। लेकिन उसने इस दिल दहला देने वाली घटना को अंजाम दे डाला।

सवाल यह है कि हाल ही की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि नाबालिग़ों के द्वारा किये जाने वाले ऐसे अपराधों की वारदात अब समाज में सामान्य प्रवृत्ति का रूप ले चुकी हैं। यह किसी भी परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व के हित में नहीं है। इससे समाज में एक दहशत फैलती है। नाबालिग़ पीढ़ी, जो कि किसी भी परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए अमूल्य है; उसका अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने की अपेक्षा अपराध में संलग्न होना हम सबके लिए अति चिन्ता की बात है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट-2021 के अनुसार, देश में हर दिन नाबालिग़ों के ख़िलाफ़ 85 आपराधिक मामले दर्ज किये गये, जबकि 100 से अधिक नाबालिग़ आरोपियों / अपराधियों को गिर$फ्तार किया गया। यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि दिल्ली में अन्य शहरों की तुलना में अधिक नाबालिग़ अपराध और क़ानून के उल्लंघन में लिप्त हैं। इसी रिपोर्ट में यह भी पता चलता है कि देश भर में सन् 2021 में नाबालिग़ों के ख़िलाफ़ कुल 31,170 आपराधिक मामले दर्ज किये गये, जबकि सन् 2020 में 29,768 नाबालिग़ों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हुए। यानी एक साल में ऐसे अपराधों में 4.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। अब अहम सवाल यह है कि आख़िर बच्चे और किशोरवय के नाबालिग़ अपराधी क्यों बन रहे हैं? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं; लेकिन मुख्य कारणों में ग़रीबी, सामाजिक-आर्थिक विषमता तो है ही, पर इसके अलावा इस पीढ़ी में नशे की बढ़ती लत, ऑनलाइन हिंसक गेम देखना व हिंसक बेवसीरीज और ऐसी ही फ़िल्मों को मोबाइल पर देखकर ज़िन्दगी में ऐसा कुछ करने की तमन्ना पालना, जिससे समाज उन्हें जाने। अब तो सोशल मीडिया पर अपनी हिंसक करतूतों के वीडियो अपलोड करने की मनोवृत्ति भी कई अपराधियों में पनप रही है। शातिर अपराधी भी नाबालिग़ों का इस्तेमाल करते हैं। देश में किये गये एक अध्ययन से सामने आया था कि हत्या और बलात्कार जैसे गम्भीर अपराध करने वाले नाबालिग़ों में से ज़्यादातर साइकोट्रोपिक दवाइयों का सेवन करते मिले।

सन् 2019 में अमेरिका के मेडिकल जर्नल जामा नेटवर्क ओपन ने 220 बच्चों पर एक अध्ययन किया था, जिससे यह सामने आया था कि जो बच्चे गन हिंसा वाले वीडियो गेम खेलते हैं, उनमें गन को पकडऩे व उसका ट्रिगर दबाने की इच्छा अधिक होती है।

बच्चे, किशोर अपराध की राह क्यों पकड़ते है? यह एक ऐसा सवाल है, जिसके कई पहलू हैं और उन सब पर गम्भीरता से काम करने की ज़रूरत है। देश में बाल सुधार गृहों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव आम बात है। वहाँ का माहौल भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं होता।

बाल संरक्षण अधिकारियों में संवेदनशीलता का स्तर भी कम पाया जाता है। बाल मनोचिकित्सकों की कमी भी ऐसे अपराधियों को सुधारने की राह में एक बाधा है। देश में नाबालिग़ न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम-2015 जघन्य अपराध करने वाले 16 से 18 साल के नाबालिग़ों पर वयस्कों की तरह मुक़दमा चलाने और सज़ा देने की अनुमति देता है; लेकिन संशोधन के इस बिन्दु पर सभी सहमत नहीं हैं।

गौरतलब है कि यह संशोधन-2012 में निर्भया मामले में सामने आये गुस्से के मद्देनज़र किया गया था, क्योंकि इस मामले में छ: आरोपियों में से एक नाबालिग़ था और इसलिए फाँसी से बच गया था। विशेषज्ञों की एक लॉबी का मानना है कि नाबालिग़ों के मस्तिष्क में महत्त्वपूर्ण बदलाव होते हैं; $खासतौर से उन क्षेत्रों में जो आवेग नियंत्रण, प्रतिक्रिया, अवरोध और निर्णय लेने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। यहाँ पर सरकारी मशीनरी, क़ानून व समाज और परिवार की अपनी-अपनी भूमिका है। इस भूमिका को दिल से पूरा करने के साथ-साथ सरकारों को बच्चों, नाबालिग़ों को अपराधों से दूर रखने वाले माहौल को बनाने व बाल सुधार गृहों आदि में निवेश करने की दिशा में ठोस क़दम उठाने की दरकार है।

भाजपा में तकरार के आसार!

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में इन दिनों अंदरख़ाने बड़ी खलबली मची हुई है। दरअसल यह खलबली अपने ही नेताओं को किनारे लगाने की कोशिश को लेकर मची हुई है। आमतौर पर इन दिनों यह चर्चा हर जगह छिड़ी हुई है कि भाजपा की सबसे जोड़ी और केंद्र की सत्ता की भी सबसे मज़बूत जोड़ी यानी प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह विपक्षी नेताओं को जेल में डालना चाहते हैं। लेकिन एक और बड़ी जानकारी कथित तौर पर भाजपा और संघ के ही लोगों के बीच से छनकर बाहर आ रही है और वो यह है कि भाजपा और देश की सत्ता में सबसे ऊपर बैठी यह सबसे ताक़तवर जोड़ी अपनी ही पार्टी के उन नेताओं को नहीं पनपने देना चाहती, जिनका रुतबा बढ़ रहा है। यह बात भले ही चौंकाने वाली लग रही होगी; लेकिन इसकी सच्चाई भाजपा के अंदर पड़ी दरारों को ध्यान से देखने और भाजपा नेताओं के बीच की कड़वाहट का गहनता से अध्ययन करने करने बाद साफ़-साफ़ नज़र आने लगती है।

दरअसल यहाँ मेरा इशारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर है, जिनका क़द और रुतबा रात-दिन बढ़ता जा रहा है। भाजपा और संघ के कथित सूत्रों की मानें, तो 3 दिसंबर को पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पर कतरे जा सकते हैं। हैरत की बात यह है कि गुजरात के बाद भाजपा का सबसे मज़बूत गढ़ उत्तर प्रदेश है, जिसके दम पर केंद्र की सत्ता किसी भी पार्टी को हासिल होती है। भाजपा भी उत्तर प्रदेश के दम पर केंद्र है। ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जब लोकसभा चुनाव लडक़र केंद्र की सत्ता में आना चाहते थे, तब उन्होंने उत्तर प्रदेश के पौराणिक शहर वाराणसी को अपना चुनाव क्षेत्र चुना, जिससे केंद्र की सत्ता तक पहुँच सकें; और वह पहुँचे भी। लेकिन ऐसी चर्चा कहीं-न-कहीं अंदरख़ाने कानाफूसी के तौर पर चल रही है कि आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी पहले से लोकसभा के सदस्य हैं; गुजरात की जोड़ी को किसी काँटे की तरह खटकने लगे हैं। यह तब हो रहा है, जब योगी आदित्यनाथ के कंधे पर उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव जिताने का दारोमदार रखा गया है और वह इसके लिए भरपूर मेहनत भी कर रहे हैं।

सूत्र बता रहे हैं कि मोदी-शाह को योगी आदित्यनाथ न सिर्फ़ एक ख़तरे के तौर पर दिख रहे हैं, बल्कि उनका यक़ीन योगी आदित्यनाथ पर से ख़त्म हो गया है और नियंत्रण भी कम होता जा रहा है। आपको याद दिला दें कि गुजरात की इस बड़ी जोड़ी, जिसकी वजह से कहीं-न-कहीं भाजपा केंद्र की सत्ता में आ सकी है; उसके और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच पहले भी अंदरख़ाने टकराव होता रहा है और इसके बाद कई बार सुलह-समझौते भी हुए हैं। लेकिन मुझे लगता है कि मोदी-शाह को योगी आदित्यनाथ से वैसे कोई दिक्क़त नहीं है; लेकिन उनके बढ़ते क़द को लेकर कहीं-न-कहीं दिक्क़त है। क्योंकि यह बात पिछले कई साल से हो रही है कि योगी आदित्यनाथ भविष्य में प्रधानमंत्री बनेंगे। शायद यही बात मोदी-शाह को परेशान कर रही हो? हालाँकि यह बात योगी के समर्थकों की ओर से आगे बढ़ी है; क्योंकि अभी तक उन्होंने इस बारे में न तो कुछ कहा है और न ही ऐसी कोई इच्छा अभी तक ज़ाहिर की है। लेकिन इसके बावजूद अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के निशाने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, तो इसका मतलब यह भी है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए आने वाले समय में मुश्किलें खड़ी होंगी।

बिहार में नीतीश कुमार की मास्टर स्ट्रोक कही जाने वाली जातीय जनगणना के आधार पर माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में भी पिछड़ों और दलितों की संख्या तक़रीबन 60 से 65 फ़ीसदी ही है। ऐसे में आलाकमान ने पिछड़ी जाति से आने वाले केशव मौर्य को इशारा कर दिया है कि वह प्रदेश में ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ के आधार पर माहौल बनाकर माँग उठाएँ कि मुख्यमंत्री भी पिछड़ा होना चाहिए। जानकारों का मानना है कि इसी रणनीति के तहत पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी द्वारा अयोध्या में बुलायी गयी मंत्रिमंडल की बैठक से केशव प्रसाद मौर्य नदारद रहे। इसके अलावा कई कार्यक्रमों और बैठकों से भी केशव मौर्य का नदारद रहना जताता है कि उन्हें कहीं-न-कहीं दिल्ली से इशारा कर दिया गया है।

सवाल यह है कि क्या मोदी-शाह की जोड़ी योगी आदित्यनाथ को किनारे लगाकर 2024 में वो लक्ष्य हासिल कर सकेगी, जो ख़ुद भाजपा के दिग्गज नेता ऐलान कर चुके हैं? यानी क्या भाजपा 2024 में 400 से ज़्यादा लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य हासिल कर सकेगी? क्या योगी को किनारे करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश फ़तह कर पाएँगे? क्या वह ख़ुद भी 2024 में अपनी वाराणसी सीट से जीत हासिल कर सकेंगे? क्या योगी आदित्यनाथ से भी क़द्दावर और चर्चित कोई दूसरा चेहरा ऐसा है उत्तर प्रदेश में, जो योगी आदित्यनाथ की जगह ले सके? ऐसे ही कई सवाल अब उठने लगे हैं।

दरअसल कहा यह जा रहा है कि 3 दिसंबर के बाद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाने की तैयारी दिल्ली दरबार यानी मोदी-शाह के द्वारा की जा रही है। अगर यह बात सच है, तो सवाल उठता है कि योगी आदित्यनाथ की भूमिका क्या रहेगी? दरअसल ऐसी चर्चा है कि अगर पाँच राज्यों यानी राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना के नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं आये या जैसा कि आमतौर पर कहा जाने लगा है कि भाजपा के हाथ राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना तो आने वाले ही नहीं हैं, बल्कि भाजपा के हाथ से मध्य प्रदेश, मिजोरम भी खिसक रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर भाजपा की इन पाँचों राज्यों में हार होती है, तो फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी अपनी ताक़त बढ़ाने की कोशिश उत्तर प्रदेश में और उत्तर प्रदेश के बाहर करेंगे, और वह प्रदेश में अपने मनपसंद अधिकारियों को बड़े पदों पर नियुक्त करेंगे और अपने मनपसंद विधायकों को प्रदेश मंत्रिमंडल में जगह देंगे। और यही मोदी-शाह यानी केंद्रीय सत्ता की ताक़तवर जोड़ी नहीं चाहती। हो सकता है कि मुख्यमंत्री योगी के अपनी ताक़त का इस्तेमाल करने पर उन्हें कमज़ोर करने की कोशिश होने लगे, जिसके लिए सबसे पहला लक्ष्य उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर कमज़ोर करना हो सकता है।

राजनीति के कुछ जानकार मानते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिन्दुओं के सबसे पसंदीदा यानी ब्रांड नेता बन चुके हैं, और उनके समर्थक उन्हें हिन्दू सम्राट कहने लगे हैं और उनकी यही छवि उनके लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन रही है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी के बाद योगी के नाम के नारे दूसरे प्रदेशों में भी लोग लगाने लगे हैं और यह बात भी कहीं-न-कहीं केंद्रीय जोड़ी को खटकने लगी है। कहा जा रहा है कि भले ही पिछले छ: वर्षों से योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हुए हैं; लेकिन वहाँ नियुक्तियाँ और तबादले अमूमन मोदी-शाह की जोड़ी के मन मुताबिक ही होते रहे हैं। चाहे वो अधिकारियों की नियुक्ति का मामला हो या फिर उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में मंत्रियों के गठन का मामला हो।

ग़ौरतलब है कि कई अधिकारियों की तैनाती में योगी और केंद्रीय जोड़ी में तनातनी भी बनी रही, क्योंकि जिस अधिकारी को योगी पसंद करते थे, उसे केंद्र की तरफ़ रिजेक्ट कर दिया जाता था और जिसे केंद्र सरकार नियुक्त करना चाहती थी, उसे योगी आदित्यनाथ पसंद नहीं करते थे, जिसके चलते काफ़ी समय तक अंदरख़ाने तनातनी का दौर चला है। और ये वाक़िया कोई एक बार नहीं, कई-कई बार सामने आया है; लेकिन इसकी चर्चा मीडिया में नहीं हुई। ज़ाहिर है मामला यहीं नहीं थमा, बात इतनी बढ़ी कि केंद्रीय जोड़ी ने उन लोगों को भी एनडीए का हिस्सा बनाया, जिन्हें योगी आदित्यनाथ पसंद नहीं करते थे, और शायद आज भी नहीं करते हैं।

बहरहाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से केंद्रीय नेताओं यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की नाराज़गी उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा के उपचुनाव में मिली करारी हार के बाद और बढ़ गयी है। क्योंकि इस सीट को जीतने के लिए भाजपा ने साम, दाम, दंड और भेद के सारे हथकंडे अपनाये। इस एक सीट को जीतने के लिए केंद्र और उत्तर प्रदेश के दर्ज़नों मंत्री डेरा डाले पड़े रहे। हज़ार से ज़्यादा कार्यकर्ता चुनाव की जीत के लिए लगाये गये और हैरत की बात है कि कथित तौर पर इस एक सीट के लिए 25 से 30 करोड़ रुपये ख़र्च किये गये। सपा नेता को तोडक़र टिकट दिया गया। लेकिन बावजूद इसके भाजपा को इस सीट से हार का मुँह देखना पड़ा और इस बड़ी हार से भाजपा की केंद्रीय जोड़ी को दोहरा झटका लगा है। वहीं योगी आदित्यनाथ अब अपने मंत्रिमंडल के विस्तार को रोके हुए हैं और इस विस्तार में केंद्रीय जोड़ी के हिसाब से जिन लोगों को शामिल किये जाने का लक्ष्य था, उन्हें यह कहकर मुख्यमंत्री योगी ने रोक दिया है कि वे दा$गी चेहरों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करेंगे। इसका असर केंद्रीय जोड़ी पर जितना पड़ा, उतना ही उन विधायकों पर पड़ा, जो मंत्री बनने का सपना लिये बैठे हैं; ख़ासतौर पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर पर पड़ा और उन्होंने एनडीए को छोडऩे की इशारे-इशारे में धमकी दे डाली। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को इशारे-इशारे में निशाना बना डाला।

बहरहाल देखना यह है कि क्या इंडिया गठबंधन में फूट की बात करके मज़ाक़ उड़ाने वाली भाजपा अपने नेताओं की आपसी फूट पर परदा डाल पाएगी? क्या भाजपा के सबसे मज़बूत नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह एनडीए के गठबंधन में आ रही दरारों को समय रहते भर पाएँगे? क्या वह अपने मज़बूत नेताओं, ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भरोसा दिखाते हुए 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्हें पूरी छूट देकर चुनाव प्रचार करने का मौ$का देंगे? क्या योगी आदित्यनाथ के बढ़ते क़द का यह केंद्रीय जोड़ी 2024 के लोकसभा चुनावों में लाभ लेने का प्रयास करेगी? या फिर उनके पर कतरकर अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने का काम करेगी? साथ ही भाजपा में अंदरख़ाने पड़ी इस फूट का 2024 के लोकसभा चुनावों पर क्या कुछ असर होगा? इन सब सवालों का जवाब आने वाले 3 दिसंबर के बाद ही मिल सकेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

मज़दूर-सुरक्षा को मिले प्राथमिकता

भारत में रेड कारपेट से नीचे पाँव न रखने वाले आम लोगों की ज़िन्दगी कितनी सस्ती समझते हैं, यह बात किसी से भी छिपी नहीं है। उत्तराखण्ड की सिल्क्यारा सुरंग में फँसे 41 मज़दूरों को 400 घंटों की मेहनत के बाद निकाल लिया गया; यह एक बड़ी उपलब्धि रही कि सभी मज़दूर सुरक्षित बाहर आ गये। लेकिन उनके जीवन में जो ज़िन्दगी और मौत का ये समय था, उस दुर्दशा का एहसास कारपेट पर चलने वाले कभी नहीं कर सकेंगे।

दीपावली के दिन 12 नवंबर के दिन जब पूरा देश त्योहार मनाने के लिए जागा था, तब सुबह 5.30 बजे सिल्क्यारा सुरंग ढहने से इसमें 41 मज़दूर इसमें फँस गये थे। अब सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिए काम करने वाले सभी टीवी चैनल और अख़बार मज़दूरों के सुरक्षित आने को लेकर सबसे आगे बढ़-बढक़र इस ख़बर को भुना रहे हैं। लेकिन जब मज़दूर सुरंग में फँसे हुए थे, तब प्रधानमंत्री मोदी के फाइटर प्लेन में घूमने को पूरे दिन दिखाने और दिन-रात नकारात्मक ख़बरें चलाने वाले टीवी चैनल, छोटी-छोटी बेकार की खबरों पर दिन-रात चीखने वाले एंकर भी इस मामले को गम्भीरता से दिखाने से परहेज़ करते रहे। विपक्षी पार्टियों ने भी मोदी सरकार से इस पर सवाल नहीं पूछे। मज़दूरों के घर वाले परेशान रहे; लेकिन किसी ने उन्हें सांत्वना नहीं दी और न ही यह पूछा कि उनकी माली हालत क्या है?

हालाँकि ऐसा नहीं है कि मज़दूरों को बाहर निकालने की कोशिश नहीं हुई; लेकिन ये कोशिश तब शुरू की गयी थी, जब मज़दूरों के परिवार वालों और स्थानीय लोगों ने सुरंग में फँसे मज़दूरों को बाहर निकालने में प्रशासनिक लापरवाही देख हंगामा शुरू किया था। सुरंग की काफ़ी खुदाई के बाद सुरंग का आख़िरी 10-12 मीटर का हिस्सा काटना मुश्किल हो गया था, जिसे लेकर यह तय नहीं हो पा रहा था कि मज़दूरों को कब निकाला जा सकेगा। मज़दूरों को निकालने के लिए पाइप बिछाया गया, जिसे आख़िरी 10-12 मीटर में बिछाना बहुत मुश्किल हो गया था।

हालाँकि शुरू में इससे मज़दूरों को बाहर निकालना आसान नहीं लग रहा था; लेकिन सुरंग तक एक और सुरंग बनाने वाले मज़दूरों और इंजीनियर्स ने हार नहीं मानी। सुरंग में फँसे मज़दूर ज़िन्दा रहें, इसके लिए उन तक खाना-पानी पहुँचाया जाता रहा। सुरंग में मज़दूरों की हालत पर लगातार निगरानी भी होती रही। सुरंग में से मलबे को हटाने के लिए अमेरिकी निर्मित ऑगर ड्रिल मशीन का इस्तेमाल किया गया; लेकिन वही बीच में ख़राब हुई। आख़िर में मज़दूरों को हाथ वाली मशीनों से सुरंग का स्टील वाला हिस्सा काटना पड़ा। मैन्युअल ड्रिलिंग के काम में भारतीय सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स के मद्रास सैपर्स के जवान और प्रशिक्षित मज़दूर लगाये गये थे। बचाव कार्य में स्थानीय पुलिस, प्रशासन, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, आरडीसीएल, ओएनजीसी, बीआरओ, एनएचएआई, भारतीय वायु सेना, भारतीय सेना, टेहरी जल विद्युत विकास निगम और सुरंग निर्माण के कई एक्सपर्ट जुटे रहे। मज़दूरों को बाहर निकालने आगे के हिस्से को काटकर मलबे में हाथ से ड्रिलिंग करनी मुश्किल हुई और हाथ से ही पाइप डालने पड़े, तो सुरंग के ऊपर से भी वर्टिकल ड्रिलिंग के लिए पहाड़ की चोटी में एक ड्रिल मशीन लगायी गयी। प्रशासनिक रिपोट्र्स के मुताबिक, ऊपर से क़रीब 86 मीटर पहाड़ काटना था। नीचे से हो रही कटाई पूरी होने तक ऊपर से भी क़रीब आधे से ज़्यादा कटाई की जा चुकी थी। नीचे से जो सुरंग काटी गयी है, उसमें आख़िरी 10-11 मीटर मज़बूत हिस्से की कटाई करना क़रीब 100 मीटर पहाड़ काटने के बराबर मुश्किल था। क्योंकि एक तो पहाड़ी क्षेत्र ऊपर से मौसम की मार ने मज़दूरों को सही-सलामत बाहर निकालने के काम को मुश्किल बना दिया था। इसके अलावा सुरंग के भीतर मिट्टी काफ़ी गीली और पथरीली थी। इसमें कटाई के दौरान पत्थर भी खिसकते रहे। ऊपर से मौसम बिगडऩे लगा था। सुरंग के निर्माण के दौरान लगाये गये मोटे-मोटे सरियों को भी काटना आसान नहीं था। सिल्क्यारा, बडक़ोट उत्तरकाशी के इलाक़ों में वैसे ही भारी बारिश और ज़्यादातर समय बर्फ़बारी होती है। बारिश होने से वहाँ की पहाड़ी मिट्टी धँसने लगती है। ऊपर से इस पहाड़ में सुरंग बना दी गयी है, जिसमें मज़दूर फँसे थे।

इस सुरंग से भी मज़दूरों को निकालने के लिए एक और सुरंग बनाने का काम काफ़ी जोखिम भरा और तनावपूर्ण था। उत्तराखण्ड सरकार और केंद्र सरकार ने इस बड़े अभियान की निगरानी रखी। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मौक़े का जायज़ा लेते रहे और उत्तरकाशी में एक अस्थायी कैम्प में मुख्यमंत्री दफ़्तर के लोग कार्यवाही सफल होने तक जुटे रहे। प्रधानमंत्री कार्यालय से भी बचाव कार्य की निगरानी होती रही।

एक बार तो सुरंग में फँसे मज़दूरों के परिवार वालों के सब्र का बाँध टूटने लगा था। क्योंकि बचाव दल द्वारा हर दिन मज़दूरों को सुरक्षित बाहर ले आने की नयी-नयी तारीख़ें दी जा रही थीं। मज़दूरों के बाहर आने का इंतज़ार लगातार बढऩे से मज़दूरों के परिजनों की साँसें अटकी थीं। हालाँकि दूर से मज़दूरों के परिवार के लोग और स्थानीय लोग मज़दूरों को निकालने की कोशिशों को देख रहे थे। सभी लोग भगवान से प्रार्थना करते रहे और सरकार से विनती कि वो अपने काम को सुरक्षित तरीक़े से जल्द-से-जल्द करे। ऐसे कई ख़तरों, दहशत और आशंकाओं के बीच 27 नवंबर को देर रात तक सभी 41 मज़दूरों को बाहर निकाल लिया गया। इस ख़बर के आते ही लोगों में ख़ुशी की एक लहर दौड़ गयी। टनल में आठ राज्यों के मज़दूर फँसे थे इनमें से झारखण्ड के 15, उत्तर प्रदेश के आठ, बिहार के पाँच, ओडिशा के पाँच, पश्चिम बंगाल के तीन, उत्तराखण्ड के दो, असम के दो मज़दूर हैं और हिमाचल प्रदेश का एक मज़दूर है।

इस दौरान सरकार पर लापरवाही के आरोप भी लगे। सुरंग काटने में लगे बचाव दलों पर भी आरोप लगे कि जिसके दिमाग़ में जहाँ से आ रहा है, वहाँ से गड्ढे खोद रहा है। क्योंकि दो मीटर की कटाई रहने तक सुरंग के अंदर की स्थिति किसी को नहीं मालूम थी कि स्थिति असल में क्या है? मज़दूरों के परिवार के लोग आश्वासनों पर विश्वास किये बैठे रहे।

जब तक मज़दूरों के बाहर सुरक्षित निकलने की सही और पक्की ख़बर नहीं मिली, तब तक कई सवाल उठे। जैसे कि वर्टिकल ड्रिलिंग देरी से क्यों शुरू की गयी? बचाव कार्य के लिए सही प्लानिंग क्यों नहीं हो सकी? क्या बचाव कार्य बिना सोचे-समझे शुरू किया गया? बचाव कार्य की रणनीति में बार-बार बदलाव क्यों किये जा रहे हैं? ड्रिल मशीनों के ख़राब हुए पाट्र्स को बदलने के लिए बचाव दलों को घंटों का इंतज़ार क्यों करना पड़ रहा है? विश्व गुरु छवि वाली सरकार बचाव कार्य के लिए विदेशी विशेषज्ञों और विदेशी मशीनों पर निर्भर क्यों है? बचाव कार्य में लगी टीमें हर दिन अलग-अलग डेडलाइन क्यों दे रहे हैं? मज़दूरों के परिवार को स्थिति के बारे में ठीक से जानकारी क्यों नहीं दी जा रही है? आदि-आदि।

भारत में पहले भी ऐसे कई सुरंग हादसे हो चुके हैं, जिनमें मज़दूरों की जान जा चुकी है। लेकिन सिल्क्यारा सुरंग मामले में अच्छी ख़बर यह रही कि सभी 41 मज़दूर सुरक्षित बाहर निकाल लिये गये। यह अब तक का सबसे लंबा और कठिन बचाव कार्य था, जिसमें लम्बे समय की कड़ी मेहनत के बाद सफलता मिली। लेकिन सवाल ये हैं कि सरकार की पहाड़ों पर इस प्रकार की गतिविधियों से क्या पहाड़ों की बनावट और प्राकृतिक सुंदरता में परिवर्तन नहीं आ रहा है? आज पहाड़ों पर सुरंगें और बाँध बनाने से पहाड़ों पर न सिर्फ़ मानव और वन्य जीवन ख़तरे में पड़ चुका बल्कि पहाड़ों के खिसकने, दरकने का ख़तरा भी बढ़ चुका है। जोशीमठ की घटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पहाड़ों पर किये जा रहे अध्ययनों से पता चलता है कि पहाड़ों पर भूस्खलन और अन्य आपदाएँ लगातार बढ़ रही हैँ। इसलिए पहाड़ों को नुक़सान पहुँचाने वाली परियोजनाओं से सरकारों को बचना चाहिए। साथ ही मज़दूर विकास की कड़ी का वो वर्ग हैं, जिनके कन्धों पर विकास की नींव पड़ती है। सरकारों को उनके जीवन का मोल समझते हुए उनकी सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।

साहित्य में कचरा

शिवेन्द्र राणा

द्वितीय विश्वयुद्ध की घोषणा होने पर यूनाइटेड किंगडम के मंत्रिमंडल की बैठक हुई। प्रधानमंत्री चर्चिल ने सभी मंत्रियों से अपने-अपने मंत्रालय का बजट अभ्यर्पण (सरेंडर) करने का निवेदन किया, क्योंकि देश अब युद्ध में उतरने वाला था। एक-एक करके सारे मंत्रियों ने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किये। अंत में संस्कृति मंत्री हस्ताक्षर के लिए उठे। चर्चिल ने तेज़ आवाज़ में कहा- ‘आप नहीं श्रीमान! क्योंकि ये संघर्ष ही अपनी राष्ट्रीय संस्कृति की सुरक्षा के लिए है। अपनी संस्कृति को खोकर हम अपनी राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय अस्तित्व को गँवा देंगे। इसलिए आप अपने मंत्रालय का बजट अभ्यर्पित न करें। आपको पूर्ववत् कार्य करना है।’

यह संस्कृति एवं साहित्य की महत्ता है। साहित्य संस्कृति के निर्माण के आधार तत्त्वों में शामिल है। साहित्य हर दौर की सभ्यता की आत्मा का चित्र उकेरता है। बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा सृजित साहित्य समाज को उचित दिशा दिखाता है। साहित्य एवं साहित्यकारों का पोषण एवं सम्मान देश की अस्मिता के लिए निहायत ज़रूरी है; क्योंकि इसके बिना संस्कृति का प्रसार और समृद्धि दोनों कठिन हैं। लेकिन आधुनिक भारतीय समाज की स्थिति थोड़ी अलग या संभवत: थोड़ी विद्रूप है। एक राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनल ने हाल ही में अपनी वार्षिक परंपरा के अंतर्गत साहित्य समर्पित कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम में आमंत्रित जिन तथाकथित विद्वतजनों को साहित्यकारों के रूप प्रचारित करते हुए अतिथि वक्ता के तौर पर बुलाया गया, उनमें विक्की कौशल, दिव्येंदु शर्मा, अनुभव बस्सी, विकास दिव्यकृति आदि शामिल हुए। तथाकथित साहित्यकारों की यह सूची हैरानी भरी थी। साहित्य सम्मेलन में अभिनेताओं, कॉमेडियन, कोचिंग संचालक बुलाने का मंतव्य समझना मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि यह संस्थान विशेष या क्षेत्र विशेष की समस्या है, बल्कि यह गिरावट सम्पूर्ण व्यापकता से प्रकट हुई। भारत के राष्ट्रीय परिदृश्य में साहित्य का जो आभासी आभामण्डल निर्मित हुआ है, वो नितांत खोखला है। क्योंकि वह साहित्य नहीं, बल्कि बाज़ारोन्मुख है। अभी पिछले दिनों नई दिल्ली में वल्र्ड इकोनॉमी फोरम का आयोजन हुआ, जिसमें फ़िल्म निर्माता करण जौहर और अभिनेत्री आलिया भट्ट आमंत्रित किये गये थे। अब क्या देश इनसे आर्थिकी की दिशा पर निर्देशन लेगा?

तो क्या विश्वगुरु बनने की तक़रीरों एवं नव उत्थान के नारों से पैदा हुए शोर बाज़ारवादी भटकाव का शिकार है? क्या ये अजीब नहीं कि अब राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य की अभिव्यंजना का मुज़ाहिरा अब ऐसे हो रहा है। और यदि यह सब राष्ट्रीय व्यवहार का हिस्सा बनता जा रहा है, तो यक़ीन मानिए यह स्थिति किसी भी राष्ट्र के नैतिक-वैचारिक दिवालियापन की सूचक है। यह इस देश की राजनीतिक-सामाजिक या साहित्यिक ही नहीं, बल्कि हर व्यवस्था का दोष है कि अमूमन सही कुर्सी पर आपको ग़लत लोग मिल जाएँगे। वास्तविक सम्मान के अधिकारी तो अँधेरे कोनों में पड़े हैं। अब जनसत्ता के सहयोगी संपादक सूर्यनाथ का उदाहरण लीजिए। साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर सूर्यनाथ एक साहित्यकार के रूप आज भी राष्ट्रीय पटल पर गुमनाम चेहरा हैं, जिनकी श्रेष्ठ रचनाधर्मिता आज भी प्रचारात्मक मंचों पर अपने क़द के अनुरूप सम्मान नहीं पा पायी। आज तक किसी भी बड़े तथाकथित साहित्य मंच पर उनकी उपस्थिति दर्ज हुई हो, ऐसा याद नहीं आता। जबकि उन्हें प्रेमचंद पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का यशपाल पुरस्कार, प्रसारण विभाग का भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के बाल एवं किशोर पुरस्कार, निकट ही उन्हें बाल उपन्यास कौतुक ऐप के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इन घोर पूँजीवाद के मुरीदों को ऐसे साहित्यकारों का सम्मान करना सीखना है। हालाँकि यह कठिन है। क्योंकि पूँजीवाद की सबसे बड़ी समस्या मानव जीवन के हर पहलू में अर्थ यानी लाभ तलाशना होता है; चाहे उसके लिए सभ्यता, संस्कृति या साहित्य को ही बाज़ार में बैठाना पड़े। उसके बदले आपको गाली गलौज में माहिर यूट्यूबर, भड़ैती करने वाले सिनेमाई लोग थोक के भाव से ऐसे मंचों पर राष्ट्रीय स्तर का ज्ञान देते दिख जाएँगे। ऐसे आयोजकों को क्या लगता है कि साहित्यिक मंचों पर ढपोरशंखों को आमंत्रित करके वो साहित्य की नयी धारा स्थापित कर रहे हैं? हो सकता है कि ऐसा हो भी; लेकिन यह धारा भड़ैंती की ही मानी जाएगी, साहित्य की नहीं।

तो क्या वाग्देवी के उपासकों को कह देना चाहिए कि वे किसी और सभ्य समाज के साथ जाएँ? क्योंकि नैतिक पतनशीलता की ओर अग्रसर यह समाज उनकी रचनाधर्मिता को सम्मान देने की योग्यता धारण नहीं करता। वैसे भी जिस समाज में साहित्य के मंच द्वि-अर्थी संवादों, फूहड़ यौनिकता, ओछे हास्य का स्रोत बन गये हों, ऐसा ओछा साहित्य रचने वालों से बेहतर रचनाधार्मिता की उम्मीद रखना स्वयं में मूर्खता है; भले ही वे बड़े-बड़े सम्मान ही क्यों न पा लें।

हालाँकि साहित्य की बाज़ारोन्मुख संस्थाएँ यह कह सकती हैं कि वे अपने मंच का मनचाहे प्रयोगों के लिए स्वतंत्र हैं। यह एक पक्ष हो सकता है। किन्तु एक दूसरा पक्ष यह भी है कि समाज के लिए जब आप कुछ कहते या करते हैं, तो वह आम लोगों को प्रभावित करता है। इसलिए उसमें फूहड़ता और बकवास नहीं परोसी जानी चाहिए। अत: जब आप राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता, साहित्य या राजनीति के क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता की भूमिका में हैं, तब तो आपको अधिक सचेत रहने की ज़रूरत है। हालाँकि प्रश्न तो राष्ट्रीय समाज को स्वयं से करना है कि उसे किसी स्तर के बुद्धिजीवियों या यूँ कहें कि भांड और साहित्यकारों में से किसका नेतृत्व ग्रहण करना है? हो सकता है कि कोई प्रो. अमत्र्य सेन या सुब्रमण्यम स्वामी का वैचारिक विरोधी हो या उनके राजनीतिक पूर्वाग्रह से असहमति रखता हो, किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि इनके विकल्प के रूप में आप राखी सावंत एवं एलविश यादव से अर्थशास्त्र का ज्ञान लेना शुरू कर दें।

राष्ट्रीय जीवन का यथार्थ यह है कि नयी पीढ़ी अपनी ज़बान बोलने में शर्माती है। जो बोलते हैं, उनके तलफ़्फ़ुज़ ठीक नहीं है; बल्कि दिनोंदिन भाषाई मर्यादा अपने निम्नतम स्तर की ओर अग्रसर है। देशीय भाषाओं के प्रति अनभिज्ञता और आंग्ल भाषा का प्रयोग सामाजिक रूप से गौरवान्वित होने का बाइस बन चुका है। लिखने में रोमन तरीक़ों का इस्तेमाल होता है। क्यों? क्योंकि हमने साहित्य का स्तर गिराया है। सही रचनाकारों की अवहेलना करते जा रहे हैं और फिर उम्मीद करते हैं हमारा समाज सुसभ्य और सुसंस्कृत हो।

इसलिए वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्तर पर चिन्तन एवं विमर्श के निम्नतम स्तर पर बहुत आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो अशोभनीय बयान बिहार विधानसभा में दिया, वह उनके उसी अवचेतन मन में पल रहा विचार होगा, जो वर्तमान वैचारिक स्तर का हिस्सा है। इस भाषाई असंवेदनशीलता का प्रसार इतना व्यापक है कि राष्ट्रीय राजनीति में कोई किसी को पप्पू बुला रहा है, तो कोई पनौती। परोक्षत: इसे साहित्य जगत में पैठी अव्यवस्था का प्रसार माना जाना चाहिए। आज यदि राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर भाषाई मर्यादा ढही है; समाज का नैतिक पतन हुआ, तो उसके मूल में यही साहित्य गिरावट और साहित्यकारों के प्रति समाज का असंतुलित रवैया है। जब वेद-वेदांग एवं नैतिक शास्त्र के स्थान पर कामुकता को साहित्य श्रेष्ठता मिलने लगे, तब आप कैसे राष्ट्रीय चरित्र के नैतिक उन्नयन की उम्मीद करेंगे? बल्कि आपको चारित्रिक पतनशीलता के लिए तैयार रहना चाहिए।

इसका परोक्ष नकारात्मक प्रभाव यह पड़ता है समाज में रचनाकारों की रचनाधर्मिता मरने लगती है। रचनाशीलता एक नैसर्गिक गुण है। अभ्यास द्वारा लेखन का प्रयास तो किया जाता है; लेकिन उत्कृष्ट क़िस्मत की रचनाएँ नैसर्गिक प्रकृति प्रदत्त गान वाले रचनाकारों के क़लम से ही उपजती हैं। किन्तु यदि ऐसे रचनाकारों का समाज यथेष्ट सम्मान नहीं करता, तो कहीं-न-कहीं अपनी मौलिक और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु रचनाकारों का झुकाव अर्थोपार्जन की ओर होता है। हालाँकि अपनी रचनाओं का सम्मान न मिलने से उनके मन में कहीं-न-कहीं एक क्षोभ पैदा होता है। नतीजतन उनके क़लम की धार कमज़ोर होने लगती है। जब भी किसी समाज में क़लम अपमानित हो, मर्दित हो, उपेक्षा व प्रताडऩा का शिकार हो, तो यह केवल उस क़लमकार का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का अपमान है। एक राष्ट्रीय समाज के रूप साहित्य के नाम पर भौंडेपन का प्रदर्शन और वास्तविक रचनाशील वर्ग की उपेक्षा करके हम यही तो कर रहे हैं। सच कहें, तो अपमान एवं उपेक्षा से अभ्यांतर देश का वास्तविक साहित्यकार वर्ग रचनाधर्मिता से विरक्त हो रहा है। यदि भविष्य श्रेष्ठ साहित्य की रचना से अकालग्रस्त होता है, तो इसकी ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय समाज को उठानी ही पड़ेगी; क्योंकि इस दुरावस्था का निमित्त भी तो वही है। और बात सिर्फ़ इतनी-सी ही नहीं है। मात्र मंचीय तालियों एवं खोखले तमग़ों से पेट की क्षुधा शान्त नहीं होती। उसके लिए अर्थ का होना भी ज़रूरी है। सरस्वती एवं लक्ष्मी की समन्वित आराधना ही मानव जीवन को संतुलित रखती है। हर लोकतान्त्रिक राष्ट्र की तरह भारत सरकार भी साहित्य संरक्षण के मद में धन ख़र्च कर रहीं है; लेकिन वो वास्तविक लाभार्थियों तक कितना पहुँच रहा है या पहुँच भी रहा है कि नहीं? यह जानना ज़रूरी है। ऊपर से नौकरशाही के असाधारण प्रसार ने साहित्यिक संस्थाओं के लिए और मुसीबत पैदा कर दी है। इनकी हर जगह पैर पसारने एवं घुसपैठ की षड्यंत्री कुत्सित मानसिकता ने साहित्यिक संस्थाओं को अकर्मन्यता एवं लालफीताशाही का गढ़ बना दिया है। ख़ैर इस विषय पर अलग से बहस आयोजित हो सकती है।  हालाँकि क्या इन सबके चलते साहित्यकार वर्ग को नकारात्मकता दर्शाते हुए अपने कर्तव्य से पीछे हट जाना चाहिए? नहीं। हज़रते इक़बाल कहते हैं :-

‘‘रम्ज़-ए-हयात जोई जुज़दर तपिश नयाबी

दर क़ुलजुम आरमीदन नगस्त आबे जूरा।’’

अर्थात् ‘अगर तुझे जीवन के रहस्य की खोज है, तो वह तुझे संघर्ष के सिवा और कहीं नहीं मिलने का। सागर में जाकर विश्राम करना नदी के लिए लज्जा की बात है।’

यही वह संदेश है, जो साहित्य के वास्तविक साधक ग्रहण करते हैं और साहित्य के नाम पर लफ़फाज़ी करने वालों को भी इसे ग्रहण करना चाहिए। अपने वजूद की लड़ाई यह साहित्यकारों खुद ही लडऩी और जीतनी है, ताकि वे समाज को सकारात्मक दिशा में दे सकें। साहित्य की आवाज़ संस्थाओं द्वारा पैसा कमाने की चकाचौंध और नाटकीय चीख-चिल्लाहट में धीमी ज़रूर पड़ी है; लेकिन गर्त में नहीं दबी है। इस धीमी आवाज़ को भावी पीढिय़ाँ अवश्य सुनेंगी और वाग्देवी की इन वरद संतानों के पक्ष में खड़ी होंगी।

उत्तर प्रदेश में हलाल पर बवाल

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हलाल प्रमाण पत्र वाले खाद्य उत्पादों के भंडारण, उत्पादन, वितरण एवं बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते ही प्रदेश में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। उत्तर प्रदेश सरकार के नये आदेश में कहा गया है कि अब प्रदेश में हलाल प्रमाण पत्र वाले उत्पाद प्रतिबंधित कर दिये गये हैं। अगर कोई हलाल उत्पादों की बिक्री करेगा, तो उसके विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई की जाएगी। सरकार को कुछ कम्पनियों द्वारा नियमित उपयोगी उत्पादों को हलाल प्रमाणन करके बेचने की शिकायत मिली थी।

यह शिकायत शैलेंद्र शर्मा नाम के व्यापारी ने पहले लखनऊ के हज़रतगंज थाने में एफआईआर दर्ज कराकर दी। उसके बाद सरकार तक इसकी शिकायत पहुँची। शिकायत में कहा गया है कि ये कम्पनियाँ डेयरी उत्पाद, साबुन, मसाले एवं कुछ अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुओं को हलाल प्रमाण पत्र के साथ लोगों को बेच रही हैं, जो कि हलाल प्रमाण पत्र का अनुचित दुरुपयोग है। जन-भावना एवं जनता की आस्था से खिलवाड़ है। शिकायत में यह भी कहा गया कि ऐसा करने के पीछे कम्पनियों की मंशा विशेष प्रकार के उत्पादों की बिक्री बढ़ाने एवं अधिक लाभ कमाने की है।

एफआईआर के आधार पर हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड चेन्नई, जमीयत उलेमा-ए-हिन्द हलाल ट्रस्ट दिल्ली, हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया मुंबई एवं जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र मुंबई समेत कुछ अन्य कम्पनियों के विरुद्ध मुक़दमा दर्ज किया गया। इसके उपरांत हिन्दू सेना ने इन कम्पनियों के विरुद्ध दिल्ली में रिपोर्ट दर्ज करायी है। उत्तर प्रदेश में हलाल प्रमाणन वाले उत्पाद ज़ब्त किये जा रहे हैं। विदित हो कि भारत में पहली बार सन् 1974 में हलाल प्रमाणन का आरम्भ हुआ था।

आरोप-प्रत्यारोप

हलाल प्रमाण पत्र के दुरुपयोग से प्रदेश में राजनीतिक भूचाल आ गया है। राजनीतिक पार्टियों की ओर से प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगी हैं। स्वयं भारतीय जनता पार्टी ने हलाल प्रमाण पत्र को धोखा बताया है। भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं ग्राम पंचायत सदस्य संतोष कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किसी भी तरह के धोखे, अपराध एवं अत्याचार के विरुद्ध क़ानून व्यवस्था दुरुस्त रखने वाले मुख्यमंत्री हैं। कुछ कम्पनियों द्वारा हलाल प्रमाण पत्र के दुरुपयोग का पता जैसे ही प्रदेश सरकार को चला, तत्काल हलाल प्रमाण पत्र पर रोक लगा दी गयी। इससे अधिक त्वरित कार्रवाई कहीं पर नहीं होती है। मगर फिर भी विपक्षी पार्टियाँ इसे लेकर राजनीति कर रही हैं, जो उनकी ओछी मानसिकता का प्रमाण है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में किसी भी नागरिक की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की अनुमति किसी भी कम्पनी अथवा व्यक्ति को नहीं है। धार्मिक भावनाओं की रक्षा करना भारतीय जनता पार्टी का मूल मंत्र है।

विपक्षी समाजवादी पार्टी ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर मिलावट करवाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि योगी सरकार की नाक के नीचे हो रहे इस घपले पर क्या कार्रवाई हुई है? समाजवादी पार्टी के टिकट पर पिछले विधानसभा में चुनाव लड़ चुके ओम प्रकाश कहते हैं कि जिन कम्पनियों ने हलाल प्रमाण पत्र का दुरुपयोग किया है, उनके विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। इन कम्पनियों के कार्य प्रणाली की जाँच की जानी चाहिए। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता विकास कहते हैं कि यह सब कुछ न्यायिक शासन चलाने का दावा करने वाली उस सरकार के नाक के नीचे से हो रहा था, जिसने अपने ऊपर स्वयं ही ईमानदारी की ठप्पा लगा रखा है। योगी सरकार की इस ईमानदारी की चादर में भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े छेद हैं, जो दूर से ही दिखायी देते हैं; मगर योगी सरकार को वे दिखायी नहीं देते। क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के इन्हीं बड़े-बड़े छेदों से छनकर कालाधन आता है। मुख्यमंत्री योगी को सरकार चलानी नहीं आती। उन्हें एक ही काम आता है कि जब भी कोई आवाज़ उनके विरुद्ध उठे अथवा कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति कहीं कुछ अनुचित मार्ग पर चलता मिले, तो उसके घर पर, व्यवसाय पर बुलडोजर चलवा दो। योगी सरकार को आम जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। किसानों को न्याय नहीं मिलता है। छोटे एवं मध्यम दर्जे के व्यापारियों के धंधे चौपट पड़े हैं। प्रदेश के युवा रोज़गार को तरस रहे हैं। मनरेगा के तहत भी काम मिलना कम हो गया है। सडक़ों में गड्ढे-ही-गड्ढे हैं। औद्योगिक क्षेत्रों पर ताले लगते जा रहे हैं। गोवंश की कमी होती जा रही है। प्रदेश में दरिद्रता बढ़ रही है। सरकार के द्वारा केवल चंद पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाया जा रहा है आमजन के हित में कोई कार्य नहीं हो रहा है।

अवहेलना पर होगी जेल

उत्तर प्रदेश में अब हलाल प्रमाण पत्र व्यर्थ हो चुका है। अगर अब कोई व्यापारी अपने किसी उत्पाद को हलाल प्रमाणन के साथ बेचता है, तो उसे जेल होने के अतिरिक्त आर्थिक दण्ड भी भरना पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राज्य की सीमा के भीतर हलाल प्रमाणन वाले उत्पादों पर हर प्रकार से संपूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।

उत्तर प्रदेश सरकार के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रसाधन विभाग की आयुक्त अनीता सिंह द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि हलाल प्रमाण पत्र किसी उत्पाद की गुणवत्ता से सम्बन्धित नहीं है। ये उत्पाद की गुणवत्ता को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति ही पैदा करता है। आदेश में कहा गया है कि डेयरी उत्पादों, बेकरी उत्पादों, चीनी, खाद्य तेलों, पिपरमिंट तेल, तैयार खाद्य पदार्थों आदि की बिक्री के लिए हलाल प्रमाणन का उल्लेख किया जाना ग़लत है एवं इसे अवैध माना जाएगा। आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा में हलाल प्रमाणन युक्त खाद्य उत्पादों के निर्माण, भण्डारण, वितरण एवं विक्रय पर (दूसरे देशों में निर्यात हेतु उत्पादित खाद्य पदार्थ को छोडक़र) तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया है।

बिहार में गरमायी राजनीति

उत्तर प्रदेश में हलाल प्रमाणन वाले उत्पादों पर प्रतिबंध लगने के उपरांत पड़ोसी राज्य बिहार में हलाल प्रमाण पत्र वाले उत्पादों को लेकर राजनीति गरमा गयी है। आमजनों का एक वर्ग एवं भारतीय जनता पार्टी के लोग हलाल प्रमाणन वाले उत्पादों को प्रतिबंधित करने की माँग कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर इसकी माँग की है।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि जिन उत्पादों का इस्लाम से कोई सम्बन्ध नहीं है, हलाल प्रमाणन के माध्यम से उन वस्तुओं का इस्लामीकरण हो रहा है। इसलिए इसे प्रदेश में शीघ्रता से रोका जाना चाहिए। हलाल एक अरबी शब्द है, जिसे मुस्लिम वैध मानते हैं एवं हराम शब्द को मुस्लिम अवैध मानते हैं। हलाल शब्द मांस के संदर्भ में अधिक प्रचलित हुआ है; मगर मुस्लिम समाज चाय, पनीर, चीनी, नमकीन, टीवी तक को हलाल प्रमाणन के साथ बेच रहा है, जो बाज़ार का इस्लामीकरण करने का प्रयास है। मीडिया सर्वेक्षण बताते हैं कि मुस्लिम लोग हलाल प्रमाणन में केवल एक उत्पाद पर 50,000 से 1,00,000 रुपये तक लेते हैं। इस प्रकार ये लोग हलाल प्रमाणन के माध्यम से 2.5 मिलियन रुपये का आर्थिक लाभ अनैतिक रूप से ले रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के बयान पर जद(यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा है कि गिरिराज सिंह को कोई काम नहीं है। गिरिराज सिंह ने जो लिखा है, वही जानें। बिहार में सभी धर्मों का सम्मान होता है और सभी धर्मों का सम्मान होगा। बिहार में सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव बना रहेगा। बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इस बारे में कहते हैं कि कुछ लोग केवल हिन्दू-मुसलमान करते हैं। उनका हलाल प्रमाण पत्र वाले उत्पादों पर टीका-टिप्पणी करना ठीक है। यही तो फ़र्क़ है उन (भाजपा के) लोगों में एवं हम लोगों में। हम लोग ग़रीबी मिटाने, रोज़गार देने और विकास करने की बात करते हैं। लोगों का पेट नौकरी देने एवं विकास करने से भरेगा, राजनीति से नहीं।

न्यायालय जाएगा हलाल ट्रस्ट

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हलाल प्रमाणन वाले उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने से जमीयत उलेमा-ए-हिन्द हलाल ट्रस्ट एवं कई मुस्लिम संगठन सरकार से नाराज़ हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द हलाल ट्रस्ट ने इस मामले को लेकर न्यायालय में जाने का मन बनाया है। हलाल ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियाज़ अहमद फ़ारूक़ी ने कहा है कि वह योगी सरकार के इस आदेश के विरुद्ध न्यायालय जाएँगे। उनका कहना है कि हलाल प्रमाण पत्र वाले उत्पादों पर प्रतिबंध लगाना ठीक नहीं है। यह व्यक्तिगत व उत्पाद बनाने वालों की इच्छा है कि वे जो उत्पाद बना रहे हैं, वो ग्राहकों के अनुरूप, किस तरह से सही हैं।

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द हलाल ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियाज़ अहमद फ़ारूक़ी ने कहा कि हलाल ट्रस्ट में प्रमाणन प्रक्रिया भारत में निर्यात के उद्देश्यों और घरेलू वितरण दोनों के लिए निर्माताओं की आवश्यकताओं के अनुरूप है। हलाल प्रमाणित उत्पादों की वैश्विक माँग मज़बूत है एवं भारतीय कम्पनियों के लिए ऐसा प्रमाणन प्राप्त करना अनिवार्य है। यह तथ्य हमारे वाणिज्य मंत्रालय द्वारा भी निर्दिष्ट है। हलाल प्रमाणन से उपभोक्ता अपनी इच्छा से निस्संकोच अपने मनपसंद उत्पादों का उपयोग कर पाते हैं। इससे देश को आर्थिक रूप से लाभ भी पहुँचता है। योगी सरकार द्वारा हलाल प्रमाणन वाले उत्पादों पर प्रदेश में प्रतिबंध से कई मुस्लिम संगठन भी सरकार से नाराज़ हैं। मुस्लिम संगठनों ने सरकार से प्रदेश में हलाल प्रमाणन वाले उत्पादों की बिक्री पर लगे प्रतिबंध को हटाने की माँग की है। समाजवादी पार्टी के सांसद डॉ. शफ़ीक़ुर्रहमान बर्क़ ने सरकार के इस आदेश को ईष्र्यापूर्ण बताया है। उन्होंने कहा है कि इनके (योगी के) फैसले हमेशा नफ़रत से भरे होते हैं। इनकी सरकार की योजना नफ़रत भरी है। ये मुसलमानों के ख़िलाफ़ हैं। मुसलमान इनसे डरेंगे नहीं। मुसलमान इनसे संतुष्ट नहीं हैं। यह देश सबका है; हमारा भी है।

घातक साबित हो रही रासायनिक खेती

30-35 वर्षों में ही ख़त्म हो गयी जैविक खेती, किसानों के साथ लगातार किया जा रहा धोखा

योगेश

अब हमारे किसानों को सस्ती और सुलभ खाद देने के नाम पर आत्मनिर्भर लिखे खाद के बोरों में चीन द्वारा निर्मित की उर्वरक खाद मिल रही है। चीन में बन रही खाद के बोरों पर फोटो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगी है। यह सब देश और किसानों से धोखा है, और जैविक खेती पर एक बहुत बड़ा कुठाराघात है। यह हम सब जानते हैं कि उर्वरक खादों और कीटनाशक दवाओं के उपयोग से खाद्य पदार्थ ज़हरीले हो रहे हैं, जो की कई बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन अब उसपे यह भी साज़िश हो रही है कि अब उर्वरक खाद चीन से मँगायी जा रही है, जो कि किसानों के साथ एक बड़ा धोखा है। कई किसान और कीटनाशक व खाद विक्रेता बताते हैं कि अब चीन के कई कीटनाशक भी बाज़ार में उपलब्ध हैं। पहले किसान नक़ली / घटिया खाद और नक़ली कीटनाशकों के शिकार थे, अब वो उससे भी ख़राब खाद और कीटनाशकों के शिकार होने लगे हैं।

चीन से आ रही खाद और कीटनाशक से फ़सलों को नुक़सान तो हो ही रहा है, इसके अलावा किसानों और हर किसी को नुक़सान हो रहा है। हमारी सरकार ने जिस बेशर्मी से चीन की खाद पर आत्मनिर्भर भारत लिखकर उस पर प्रधानमंत्री को फोटो छापी है, वो सरकार की लापरवाही और किसानों से की जा रही धोखेबाज़ी को दर्शाती है। एक ख़बर में लिखा था कि अगर इफको के एमडी यू.एस. अवस्थी कोई मामूली आदमी होते, तो जेल में होते; क्योंकि खाद आयात पर करोड़ों रुपये का घपला हुआ है। इस घपले को लेकर सीबीआई और ईडी ने यू.एस. अवस्थी पर मुक़दमे दर्ज किये हैं; लेकिन जाँच के नाम पर कुछ खास नहीं हो रहा है और यू.एस. अवस्थी केंद्रीय मंत्रियों के साथ नज़र आ रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के कॉमट्रेड के आँकड़ों के अनुसार, हमारे देश में पिछले साल चीन से 2.34 अरब डॉलर की खाद निर्याक की गयी थी। हमारे देश में चीन और दूसरे देशों से लगभग 30 प्रतिशत यूरिया आती है, जिसमें चीन की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। दुनिया की सबसे बड़ी सहकारी कम्पनी इफको अपने बोरों में चीन की खाद बेच रही है और सबको मूर्ख बनाने के लिए इन बोरों पर प्रधानमंत्री की फोटो छापकर सशक्त किसान-आत्मनिर्भर भारत लिखवा दिया है; जबकि इन पर उद्गम स्थल चाइना लिखा है।

इस धोखेबाज़ी को जब कुछ लोगों ने उजागर किया, तो इफको के एमडी यू.एस. अवस्थी ने इसे भ्रामक बताते हुए कहा है कि ऐसा करने वालों के पास समझ का अभाव है। इफको के एमडी को बताना चाहिए कि घपलों को उजागर करना समझ का अभाव कैसे है? देश में लोगों और जैविक खेती को जो नुक़सान चीन के उत्पादन पहुँचा रहे हैं, पैसे कमाने के लालच में उसको बढ़ावा देना कौन-सी समझदारी है? जिससे आज देश की एक बड़ी आबादी ज़हरीला भोजन करने को मजबूर है। हमारे देश में लगभग 30-35 वर्षों में जैविक खेती को साज़िश से ख़त्म किया गया है। अब जैविक खेती की ज़रूरत किसानों को महसूस होने लगी है। लेकिन फ़सलों के ज़्यादा पैदावार के लालच और सरकार की लापरवाही ने जैविक खेती को बड़ा नुक़सान पहुँचाता है। उर्वरक से पैदा की जा रही फ़सलों से पैदा खाद्य पदार्थ खाने से बीमारियाँ बढ़ रही हैं। गाँव के लोग और किसान कभी बीमार नहीं पड़ते थे, वे भी अब कई-कई बीमारियों के शिकार हैं। ऐसे में किसानों को जैविक खेती की ओर लौटना चाहिए।

देश में रासायनिक उर्वरकों की माँग बढऩे के नाम पर सरकार रासायनिक उर्वरकों का उत्पादन बढ़ा रही है। इसमें किसानों की भी $गलती कम नहीं है। किसानों ने ज़्यादा फ़सल उत्पादन के लालच में जैविक खाद बनाना लगभग 88 प्रतिशत कम कर दिया है। पशुपालन भी कम कर दिया है। देसी खाद के अभाव में उन्हें मजबूरन उर्वरक खाद फ़सलों में लगानी पड़ती है। इस खाद में नक़ली, कृत्रिम और चीन की घटिया खाद भी शामिल है। इस लाचारी के चलते बीते 20 वर्षों में हमारे देश में रासायनिक उर्वरकों की लगभग 73 लाख मीट्रिक टन माँग बढ़ी है। उर्वरक खाद की इस आपूर्ति के लिए सरकार रासायनिक उर्वरक खादों को बाहर से मँगाती है। लेकिन यह भी तो पूछने वाली बात है कि चीन की खाद बोरों में भरकर उस पर आत्मनिर्भर भारत किस बूते लिखा गया है? क्या किसानों को जैविक खेती से अवगत कराना और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने पर ज़ोर देना सरकार की एक नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं है?

2001 में मध्य प्रदेश में जैविक खेती करने के लिए आन्दोलन चलाया गया था। इस आन्दोलन के तहत मध्य प्रदेश के सभी विकासखण्डों के कम-से-कम एक गाँव में जैविक खेती की शुरुआत की गयी थी। लेकिन मध्य प्रदेश में भी जैविक खेती कोई ऐसा क्रान्तिकारी काम नहीं कर सकी कि बाक़ी किसान भी इससे प्रभावित होकर जैविक खेती करना शुरू कर देते। हालाँकि एक परिवर्तन पिछले कुछ वर्षों में देखने को देश भर में मिला है कि कई किसान फिर से जैविक खेती करने लगे हैं। इसमें उर्वरक खादों की तरह बोरों में जैविक खाद बनाकर भरने वाले कुछ उद्यमी किसान बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। अब जैविक खाद भी रासायनिक उर्वरक खादों की तरह फ़सलों को अधिक उपजाऊ बनाने वाली तैयार की जाने लगी है। इसके अलावा जैविक फ़सलों के दाम उर्वरक फ़सलों के दामों से तीन से चार गुने ज़्यादा किसानों को मिलते हैं। इससे जो घाटा फ़सल उत्पादन में किसानों को होता है, वो खाद्य पदार्थ महँगे बिकने से पूरा हो जाता है।

हमारी सरकार को चाहिए कि वो जैविक खेती को बढ़ावा दे और जैविक खेती प्रणाली को टिकाऊ बनाए। जैविक खेती केवल हमारे लिए ही लाभकारी नहीं है, हमारे पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है। जैविक खेती का चक्र फ़सलों, पशुओं, फ़सल मित्र कीटों और हम इंसानों की बीच घूमता है। जैविक खेती करने पर इनमें परस्पर मित्रता और एक-दूसरे पर निर्भरता रहती है, जो कि वातावरण के लिए बहुत ज़रूरी है। इसके अलावा जैविक खेती में कृषि उद्योग पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देता है। मिट्टी उपजाऊ और ज़हरमुक्त बनती है, जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए सबसे ज़रूरी है। मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढऩे लगती है, जिससे खरपतवार बढ़ती है, जो कि निराई-गुड़ाई से मिट्टी में खाद का काम करती है और मिट्टी को उपजाऊ बनाती है। इससे मिट्टी में मौज़ूद पोषक तत्त्वों में संतुलन बनता है। जैविक खाद्य पदार्थों को खाने से हम लोग और हमारे पशु बीमारियों से बचेंगे और लम्बी उम्र तक स्वस्थ रहेंगे।

किसानों को समझना होगा कि आज विश्व में जैविक खाद्य पदार्थों की माँग बढ़ रही है और जैविक खाद्य पदार्थों की क़ीमत बहुत ज़्यादा है। इससे बाज़ार में जैविक फ़सलों के भाव भी का$फी अच्छे मिलते हैं। आज पूरे विश्व में लगभग 130 देश जैविक खेती कर रहे हैं। जैविक खाद्य पदार्थों की माँग भी विश्व के ज़्यादातर देश कर रहे हैं, जिनकी माँग के हिसाब से जैविक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इस आपूर्ति में हमारा देश बड़ी भूमिका निभा सकता है। हमारे किसानों में जैविक खेती करने का हुनर भी है और हमारी जलवायु भी जैविक खेती के बहुत अनुकूल है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वो जैविक खेती को बढ़ावा दे, न कि चीन से घटिया रासायनिक खाद मँगवाकर उसे किसानों को बेचकर खाद्य उत्पादों को और ज़हरीला बनाने में सहयोग करे। अभी समय है कि हम अपनी धरती माता को ज़हर मुक्त करें, क्योंकि अगर लम्बे समय तक रासायनिक उर्वरकों और ज़हरीले कीटनाशकों का उपयोग होता रहा, तो फिर हमारी उपयोगी कृषि की भूमि को ज़हरमुक्त करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। विश्व के कई देश जैविक खेती की ओर रुख़ कर चुके हैं, हमारे देश में तो सदियों से जैविक खेती ही होती रही है। हमारे यहाँ लोगों के स्वस्थ रहकर जीने की उम्र भी इसलिए ही लम्बी रही है। लेकिन पिछले 30-35 वर्षों से हमने अपनी कृषि भूमि में उर्वरक और कीटनाशक के रूप में ज़हर बोना शुरू कर दिया है और हर दिन भोजन में थोड़ा-थोड़ा ज़हर भी खा रहे हैं। हमें इसे समझना होगा और समझकर जितनी जल्दी हो सके अपनी थाली से ज़हरीले भोजन को दूर करके शुद्ध जैविक भोजन परोसे जाने के लिए काम करना होगा। इसके लिए किसानों को सबसे पहले क़दम बढ़ाना होगा।