नई दिल्ली: बिहार की सियासत में नीतीश कुमार का नाम लंबे समय तक केंद्र में रहा है। हाल ही में उनकी राजनीतिक विदाई की तस्वीरों ने कई पुराने किस्सों को फिर से जिंदा कर दिया है। खासतौर पर साल 2000 का वो दौर, जब उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने के बावजूद उसे छोड़ना ज्यादा बेहतर समझा था।
दरअसल, साल 2000 के विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। ऐसे में राजनीतिक जोड़-तोड़ का दौर शुरू हुआ। उस समय नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद की शपथ तो मिल गई, लेकिन बहुमत साबित करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया।
बताया जाता है कि बहुमत हासिल करने के लिए कुछ बाहुबलियों का समर्थन जरूरी हो गया था, जिनकी छवि आपराधिक थी। यही वह मोड़ था जहां नीतीश कुमार के सामने बड़ा नैतिक सवाल खड़ा हो गया। एक तरफ सत्ता थी, तो दूसरी तरफ उनकी साफ-सुथरी छवि और सिद्धांत।
इसी दौरान बेऊर जेल से जुड़े एक कथित समझौते की चर्चाएं भी सामने आईं, जिसमें अपराधियों के समर्थन की बात कही गई। हालांकि, सार्वजनिक रूप से इससे दूरी बनाए रखने की कोशिश की गई, लेकिन हालात ऐसे बने कि यह मामला चर्चा में आ गया।
जब विधानसभा में शक्ति परीक्षण का समय नजदीक आया, तो नीतीश कुमार ने बड़ा फैसला लेते हुए इस्तीफा देने का निर्णय लिया। उन्होंने सत्ता से ज्यादा अपनी राजनीतिक शुचिता को प्राथमिकता दी। यह कदम उस दौर में काफी चर्चा में रहा और उनकी छवि एक सिद्धांतवादी नेता के रूप में मजबूत हुई।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद राबड़ी देवी एक बार फिर मुख्यमंत्री बनीं, जबकि नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय राजनीति की ओर रुख कर लिया। बाद के वर्षों में उन्होंने फिर से बिहार की राजनीति में वापसी की और अपनी अलग पहचान बनाई।
आज जब उनकी विदाई की बात हो रही है, तो यह पुराना किस्सा इसलिए भी याद किया जा रहा है क्योंकि यह दिखाता है कि राजनीति में कभी-कभी सत्ता से ज्यादा अहम सिद्धांत और छवि होती है। यही वजह है कि नीतीश कुमार का यह फैसला आज भी राजनीति के चर्चित उदाहरणों में गिना जाता है।




