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मैं अब मध्य प्रदेश की राजनीति नहीं करूंगा

 

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह अब भोपाल वापस लौटना नहीं चाहते. अतुल चौरसिया को दिए साक्षात्कार में उन्होंने अपनी भविष्य की राजनीतिक योजना के साथ ही राहुल गांधी की बड़ी भूमिका, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हार, देश की अर्थव्यवस्था से लेकर बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसे मसलों पर बेबाकी से अपनी राय रखी.

आपके मुताबिक सितंबर राहुल गांधी को बड़ी भूमिका में आने के लिए आदर्श होगा. क्या आप बताना चाहेंगे कि वह बड़ी भूमिका सरकार में होगी या पार्टी में? 

देखिए, मैंने आम कांग्रेस कार्यकर्ता की भावनाओं को व्यक्त किया है. हर कांग्रेसी चाहता है कि वे आगे आएं. अभी तक वे छात्र संगठन और युवा संगठन का काम देख रहे हैं. कार्यकर्ता चाहते हैं कि वे अब मातृ संगठन के लिए काम करें. 

सलमान खुर्शीद ने भी कहा कि राहुल गांधी अभी तक सजावटी भूमिकाएं ही निभाते रहे हैं, कोई गंभीर काम उन्होंने नहीं किया है.

मेरे ख्याल से उनकी बात को गलत समझा गया. पर अब तो उन्होंने इस पर सफाई दे दी है. 

आपके आक्रामक अभियान और राहुल गांधी के प्रचार के बावजूद यूपी में कांग्रेस बुरी तरह हार गई. कहां चूक हो गई?

हमने यूपी की हार की समीक्षा की है. दो-तीन बातें रहीं. एक तो उत्तर प्रदेश के मतदाता को हम यह विश्वास नहीं दिला पाए कि बसपा के हटने की हालत में हम सरकार बना सकते हैं. सरकार बदलना जरूरी है इस बात के लिए तो हमने मतदाता को तैयार कर लिया था, लेकिन बसपा के मुकाबले कांग्रेस सरकार बना पाएगी यह विश्वास मतदाता को नहीं था. यह हमारी कमजोरी रही. 

सलमान खुर्शीद या बेनी प्रसाद वर्मा द्वारा चुनाव आयोग को दी गई चुनौती ने कांग्रेस को नुकसान नहीं पहुंचाया?  

मैं ऐसा नहीं मानता. मेरा तो यही मानना है कि हमारा संगठन और उत्तर प्रदेश की लीडरशिप जनता के मन में भरोसा पैदा नहीं कर पाई. 

हार के बाद किसी तरह का बदलाव होगा? 

इसकी पूरी संभावना है. जल्द ही बदलाव के बारे में निर्णय किया जाएगा. 

चुनावों के दौरान मीडिया में जो खबरें उड़ीं कि कांग्रेस और सपा के बीच सांठ-गांठ है, उसने कितना नुकसान पहुंचाया? 

मैं नहीं मानता कि इससे कोई नुकसान हुआ है. 

कांग्रेस सेक्युलर विचारधारा वाली पार्टी रही है. लेकिन बटला हाउस से लेकर मुसलिम आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह से आप और बाकी नेता बार-बार बयानबाजी करते रहे वह तुष्टीकरण नहीं तो क्या है? इस तुष्टीकरण के कारण हिंदू मतदाता कांग्रेस से दूर हुआ.

मैं इसे दूसरी तरह से देखता हूं. पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने का वादा हमारे 2009 के घोषणापत्र का हिस्सा था. उसी के आधार पर सरकार ने पूरे देश के ओबीसी मुसलमानों को आरक्षण दिया. यह कोई नई बात नहीं थी जिसे हम लोग पहली बार कह रहे थे. हमने तो सरकार के ही निर्णय को प्रचारित किया. 

बटला हाउस के मामले पर आप पीएम और चिदंबरम के खिलाफ क्यों रहे?

बटला हाउस के मामले पर मेरा शुरू से एक विचार था और आज भी मैं उस बात पर कायम हूं. पर अब बटला हाउस कोई मुद्दा नहीं रहा. 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आपने बहुत गहन अभियान चलाया. राहुल गांधी ने पदयात्रा भी की थी. नया भूमि अधिग्रहण बिल लाने का वादा भी आपने किया था. न तो बिल आया न ही अभियान का कोई फायदा हुआ.

भूमि अधिग्रहण बिल आ गया है. वह संसदीय कमेटी के पास पड़ा है. बिल पास होने की एक प्रक्रिया होती है, उस प्रक्रिया को पूरा करके ही नया बिल कानून बनेगा. राहुल जी के अभियान का हमें फायदा हुआ. हमारा वोट शेयर काफी बढ़ा उस इलाके में.   

आपने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजित सिंह के साथ गठबंधन भी किया. वह भी आपको सीटें नहीं दिलवा पाए. अब खबरंे आ रही हैं कि कांग्रेस अजित सिंह से पीछा छुड़ाना चाहती है. चुनाव से पहले भी ऐसी खबरें थीं कि अजित सिंह ने कांग्रेस का इस्तेमाल किया पर कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ.

ऐसा कुछ नहीं है. अजित सिंह हमारे सहयोगी हैं और आगे भी बने रहेंगे. ये बातें गलत हैं. अजित सिंह जी ने और उनके लोगों ने हमारा पूरा सहयोग किया था. 

दस साल पहले जब आप अपने गृहराज्य मध्य प्रदेश में चुनाव हारे थे तब आप अपनी राजनीति भोपाल से दिल्ली लेकर आ गए थे. अब आप उत्तर प्रदेश में असफल हुए हैं, अगले साल आपका राजनीतिक संन्यास भी खत्म हो रहा है और लगभग उसी समय राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने हैं, तो क्या आप फिर से दिल्ली से भोपाल का रुख करेंगे?  

हम असफल नहीं हुए हैं. मैं एक बात साफ कर दूं आज कि मैं कभी भी भोपाल की राजनीति में नहीं लौटूंगा, मैं यहां केंद्र की राजनीति में ही रहूंगा. वहां राज्य स्तरीय नेता हैं जो अपना काम कर रहे हैं. 

अखिलेश को लेकर आपकी पार्टी का रवैया बेहद नर्म है, जबकि वे कानून व्यवस्था के मामले में असफल सिद्ध हुए हैं. अपराधी नेता (अमरमणि त्रिपाठी, अभय सिंह और विजय मिश्रा) जेल से बाहर घूमने लगे हैं.

बात ये है कि जिन भी लोगों के नाम आपने लिए हैं वे किसी न किसी रूप में सपा के अंग थे. यह बात यूपी की जनता से छिपी नहीं थी उसके बाद भी जनता ने उन्हें चुना है. किसी भी नई सरकार को छह महीने से साल भर का समय देना चाहिए. 

पर चुनाव से पहले सपा इनसे दूरी बनाकर चल रही थी. अखिलेश यादव ने डीपी यादव को पार्टी में नहीं लेकर खुद को गुंडाराज के विरोधी के रूप में स्थापित किया था.

एक बात याद रखिए कि सपा का जो इतिहास रहा है उसमें इस तरह के असामाजिक लोगों का अहम योगदान रहा है. पीछे भी सपा के काल में इस तरह की घटनाओं की अधिकता रही है. अगर अखिलेश जी इस तरह की घटनाओं और अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं पर लगाम लगा सकें तो वे बधाई के पात्र होंगे. 

सरकार की बात करते हैं. एस.ऐंड.पी. ने भारत की क्रेडिट रेटिंग घटा दी है, टाइम पत्रिका प्रधानमंत्री को अंडरअचीवर कह रही है, बराक ओबामा ने तो देश की निवेश नीति पर ही उंगली उठा दी है. नीतियों के स्तर पर इस तरह का हस्तक्षेप हम पहली बार देख रहे हैं. क्या यह बाजारवादी ताकतों को जरूरत से ज्यादा छूट देने का नतीजा है? कोई भी प्रधानमंत्री पर टिप्पणी कर देता है.

मुझे नहीं पता कि एस.ऐंड.पी. या मूडी जो रेटिंग देती हैं उनका मानक क्या होता है. मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि स्पेन जिसकी अर्थव्यवस्था डावांडोल है उसे भी एस ऐंड पी ने ट्रिपल बी रेटिंग दी है और भारत को भी. जबकि आज ही आईएमएफ का बयान आया है कि भारत आज भी निवेश के लिए दुनिया भर में तीसरा सबसे आकर्षक स्थान है. आईएमएफ ने तो यहां तक कहा है कि इस समय दुनिया में सिर्फ तीन ही देश ऐसे हैं जिनकी ग्रोथ रेट संतोषजनक है- ब्राजील, चीन और भारत. जहां तक बराक ओबामा साहब का सवाल है तो शायद उन्हें पता नहीं है कि पिछले छह महीने के दौरान सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत में हुआ है. पॉलिसी के स्तर पर कोई विदेशी हस्तक्षेप नहीं है. सरकार ने ओबामा के बयान का माकूल जवाब दिया है. स्वयं प्रधानमंत्री ने साफ किया है कि हमारी नीतियां हमारे देश का आंतरिक मसला है. भले ही हमारी ग्रोथ रेट अच्छी है पर पिछले डेढ़ दशक की तुलना में तो यह दर घटी है. वो तो पूरी दुनिया में ही मंदी का असर रहा है. चीन, ब्राजील, रूस सबकी दर में गिरावट आई है.  

एक और उदाहरण हाल में काफी चर्चित रहा है. जरूरत से ज्यादा बाजारवादी नीतियों को बढ़ावा देने का नतीजा है कि मुकेश अंबानी आज प्रधानमंत्री के शिष्टमंडल का न्योता ठुकरा देते हैं. 

ऐसा नहीं है. हो सकता है कोई कारण रहा हो पर ये बात आप क्यों भूल जाते हैं कि मुकेश अंबानी जी ने अपने एजीएम में यह बात कही है कि वे इस वर्ष भारत की अर्थव्यवस्था में एक लाख करोड़ का निवेश करेंगे. 

आपने कहीं कहा कि जहां-जहां ताकतवर क्षेत्रीय नेता नहीं हैं वहां कांग्रेस कमजोर हुई. उत्तर प्रदेश तो गांधी परिवार का ही गढ़ है. वहां दुर्गति क्यों हुई?

हमको क्षेत्रीय नेतृत्व मजबूत करना पड़ेगा. 

ममता बनर्जी पर आपने कठोर टिप्पणी कर दी थी. पार्टी ने भी इस पर फटकार लगाई. आप मानते हैं कि ममता बनर्जी पर बयान देते वक्त आप सीमा पार कर गए थे?

बिल्कुल नहीं. मैंने तो सिर्फ वही कहा था जो बातें पार्टी के लोग बार-बार कह रहे थे. मैं उसी के अनुकूल बोल रहा था. 

तो आप अब भी उन्हें अपरिपक्व और अस्थिर नेता मानते हैं.

मैंने उनके बारे में जो कुछ कहा था उसकी एक-एक बात पर कायम हूं, मैं उसे दोहराना नहीं चाहता. 

प्रियंका गांधी की क्या भूमिका हो सकती है? क्या वे अब भी दो सीटों के प्रबंधन तक ही सीमित रहेंगी. क्यों नहीं उन्हें पूरे यूपी की जिम्मेदारी सौंप दी जाए?

देखिए, प्रियंका जी अभी राजनीति में नहीं हैं. यह खुद उन पर निर्भर करता है कि वे राजनीति में आएं या नहीं. 

राहुल जी के बारे में तो आप लोग चाहते हैं कि वे बड़ी जिम्मेदारी निभाएं लेकिन प्रियंका जी के बारे में फैसला उनके ऊपर क्यों? 

क्योंकि राहुल जी संसद सदस्य हैं, महासचिव भी हैं. उनसे अपेक्षा रखना लाजिमी है. प्रियंका जी राजनीति में ही नहीं हैं तो क्या कहा जाए.

आपके राजनीतिक गुरु रहे अर्जुन सिंह ने अपनी किताब में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव को सबसे बड़ा जिम्मेदार ठहराया है.

उनके बीच क्या बात हुई, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन इतना मैं जरूर मानता हूं कि उस समय अगर केंद्र की सरकार सख्त रवैया अपना लेती तो शायद बाबरी मस्जिद नहीं गिरती. 

 

आनंद मरते नहीं

क्या यह सिर्फ नाच-गाने या कुछ अदाओं का कौशल था जिसने राजेश खन्ना को इतना बड़ा बना दिया?

पिछले दिनों सबको आनंद याद आता रहा- वह मस्तमौला किरदार जो मौत के मुहाने पर खड़ा जिंदगी का नाटक देख रहा था और बता रहा था कि हम सब रंगमंच की कठपुतलियां हैं. राजेश खन्ना के निधन के बाद टीवी चैनलों पर करीब 40 साल पुरानी फिल्म का यह दृश्य बार-बार दुहराया गया. लेकिन हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म में जो मौत एक कविता थी वह टीवी चैनलों तक आते-आते तमाशा बन गई. राजेश खन्ना को इतनी फड़कती हुई और भड़कीली श्रद्धांजलियां मिलीं कि मौत भी शरमा जाए. मौत के बाद जो निस्तब्धता, जो कातरता, जो चुप्पी पैदा होती है, उसकी खबर में जो संयम और मितकथन होना चाहिए वह कहीं नहीं था. जैसे शोक नहीं, शोक का प्रलाप चल रहा था जिसमें बीच-बीच में पिरोए राजेश खन्ना के पुराने गीत लोगों को अपने नायक की याद दिला जाते थे. 

कह सकते हैं, जिस मेलोड्रामा ने राजेश खन्ना को बनाया था उसके कुछ सतही और फूहड़ संस्करण के साथ उनकी विदाई हुई. ‘आनंद’ के आखिरी दृश्य में भी भरपूर मेलोड्रामा था. धीरे-धीरे सरकती हुई मौत इतनी खूबसूरत कविता नहीं होती जितनी आनंद में बना दी गई थी. लेकिन जीवन और मृत्यु के बीच की पहेली में सात रंग के सपने खोजने वाले हृषिकेश मुखर्जी जानते थे कि भारतीय दर्शक को यही मेलोड्रामा भाएगा- आनंद से पहले ‘अंदाज’ में ‘हंसते-गाते जहां से गुजर’ गाने वाले राजेश खन्ना को वाकई उसी तरह जाता दिखाकर उन्होंने लोगों को बहुत रुलाया. 

कायदे से देखें तो राजेश खन्ना हिंदी फिल्मों के आखिरी मासूम नायक थे. उसके बाद का हीरो बदल गया

अक्सर कहा जाता है कि राजेश खन्ना हिंदी फिल्मों के पहले सुपर स्टार थे. यह खिताब शायद उन्हें उन दिनों की मशहूर स्तंभकार देवयानी चौबल ने दिया था. लेकिन ऐसे खिताबों से परे अगर राजेश खन्ना की शख्सियत को देखें तो दरअसल उनकी कामयाबी बहुत सारे तत्वों से मिलकर बनी थी. उनमें हिंदी फिल्मों की परंपरा और हिंदी समाज की सामूहिकता दोनों का समावेश था. पचास और साठ के दशकों में राज कपूर, दिलीप कुमार और देवानंद की जो त्रिमूर्ति हिंदी सिनेमा की दिशा तय करती रही, उसने नए बनते भारत का यथार्थ और स्वप्न रचने की कोशिश की. वे आजादी के बाद के उजले दिन थे जब हिंदी फिल्में भी नया दौर बना रही थीं और जिस देश में गंगा बहती है उसे समझने की कोशिश कर रही थीं. इन तीनों में एक राजू गाइड था- यानी देवानंद- गंवई भारत के नए बनते शहरों का वह नायक जिस पर पहली बार लड़कियां उस तरह निसार दिखीं जिस तरह बाद में राजेश खन्ना पर हुईं. 

लेकिन साठ के दशक के मोहभंग के साथ कहानी भी बदलती है, नायक भी. शम्मी कपूर और राजेंद्र कुमार इस दौर के नए रोमानी नायक हैं. इसी के फौरन बाद इन दोनों की साझा छाप लिए आते हैं राजेश खन्ना- उनमें देवानंद जैसी अदाएं भी हैं, शम्मी कपूर जैसी उछल-कूद भी और राजेंद्र कुमार जैसा शांत रोमांस भी. तीन बेहद कामयाब कलाकारों का यह मिक्स राजेश खन्ना को अचानक जैसे उछाल देता है. सिर्फ 2-3 वर्षों के अंतराल में- 1969 से 1972 के बीच- वे आराधना, बंधन, दो रास्ते, खामोशी, सच्चा-झूठा, सफर, कटी पतंग, आनंद, अंदाज, हाथी मेरे साथी, अमर प्रेम, बावर्ची, दुश्मन, नमक हराम जैसी ढेर सारी कामयाब और अच्छी फिल्मों का अंबार लगा देते हैं. 

लेकिन क्या यह सिर्फ रोमांस था, सिर्फ नाच-गाने या कुछ अदाओं का कौशल जिसने राजेश खन्ना को इतना बड़ा बना दिया? ध्यान से देखें तो यह वही दौर है जब भारत अपने-आप को पुनर्व्याख्यायित कर रहा है. राजनीति के मोहभंग नई समाजवादी संभावनाओं का रास्ता टटोल रहे हैं और गांवों से शहर पहुंची आबादी नए बसते मोहल्लों में अपनी नातेदारी खोज रही है. कहीं इंसाफ का सवाल है, कहीं इंसानियत का, कहीं रिश्तों की उलझनें हैं और कहीं जिंदगी और मौत की कशमकश. इत्तिफाक से राजेश खन्ना की फिल्मों में यह समाज बहुत मुखर है. इस समाज में खड़े राजेश खन्ना बहुत बड़े नहीं, बहुत अपने लगते हैं. वे महानायक नहीं हैं जो हर मुश्किल को अपनी चुटकियों, अपने संवादों से हल कर दें. वे एक मासूम-से नायक हैं जिसका इंसाफ और इंसानियत पर भरोसा कायम है. यही चीज है जो राजेंश खन्ना को इस दौर का- या किसी के शब्दों में हिंदी सिनेमा का पहला- सुपर स्टार बनाती है. 

हालांकि यह भी एक मेलोड्रामा था जिसे बिखर जाना था. यह त्रासदी नायक के साथ भी घटित हुई, सिनेमा के साथ भी. सिर्फ चंद वर्षों में हासिल शोहरत ने राजेश खन्ना को शिखर पर ही नहीं पहुंचाया, शायद कुछ बदल भी डाला. आगे जिंदगी ने उनसे कई सख्त इम्तिहान लिए. बाद के दौर में उनकी फिल्में नाकाम होती दिखीं क्योंकि शायद वह मासूमियत जा चुकी थी- जमाने से भी और हमारे नायक के चेहरे से भी. अब उसकी पुरानी अदाएं उसकी ही थकी हुई नकल लगती थीं. बाद के दौर में राजेश खन्ना ने वापसी की कई कोशिशें कीं, लेकिन अंततः नाकाम रहे. 

कायदे से देखें तो राजेश खन्ना हिंदी फिल्मों के आखिरी मासूम नायक थे. उसके बाद का हीरो बदल गया. उसकी आंखों में गुस्सा चला आया,  उस जमाने से नफरत चली आई जिसने उसके साथ नाइंसाफी की. वह अपने दम पर अपनी दुनिया बदलता रहा और सबके दिल जीतता रहा. इस महानायक के आने के बाद राजेश खन्ना जैसे हमेशा-हमेशा के लिए पीछे छूट गए. लेकिन उनकी पुरानी फिल्में बची रहीं. 40 साल बाद, अचानक उनके देहांत ने सबको अपने छूटे हुए नायक की याद दिलाई. हालांकि अभिनेता के तौर पर राजेश खन्ना ने जो जिया, जो किया, जो गाया, वह दूसरों की लिखी कहानी थी, दूसरों का दिया निर्देशन था, दूसरों के रचे गीत थे, लेकिन इन सबको इतनी विश्वसनीयता दिलाने वाला, उसे जमाने की कहानी में बदल डालने वाला चेहरा तो हमारे नायक का ही था. वे उस भारत के प्रतिनिधि और प्रतीक नायक थे जिसका परिवार बचा हुआ था या जिसमें परिवार का एहसास बचा हुआ था.

चुप्पी की चतुर चाल

दो साल, दो महीने और 12 दिन तक उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले का ऊखीमठ कस्बा अत्यंत संवेदनशील विस्फोटक के खतरे में रहा. पहाड़ों में अक्सर कड़कने वाली आसमानी बिजली की एक हल्की-सी कड़क घनी आबादी वाले इस खूबसूरत पहाड़ी कस्बे को बर्बाद करने के लिए काफी थी. सर्दियों में जब केदारनाथ और मद्महेश्वर तीर्थ के कपाट बंद हो जाते हैं तो छह महीने इनकी पूजा ऊखीमठ के प्राचीन और मंदिर परिसर में होती है. यहीं केदारनाथ के रावल का गद्दीस्थल भी है जो दक्षिण भारत के वीर शैव लिंगायतों के पांच पंचाचार्यों में एक है. इस तरह ऊखीमठ सदियों से उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक समागम का प्रतीक भी है. 

ऊखीमठ को यह खतरा 1,000 डेटोनेटरों से था. ये डेटोनेटर छह अप्रैल, 2010 को उपजिलाधिकारी अभिषेक त्रिपाठी ने  राजस्व दल के साथ राऊंलेक गांव की सीमा में पंवार स्टोन क्रशर के स्टोर से पकड़े थे और इन्हें कब्जे में लेकर तहसीलदार ऊखीमठ की सुरक्षा में दे दिया था. ये खतरनाक मानी जाने वाली जेड-जेड श्रेणी के विस्फोटक थे. विस्फोटक नियमावली, 2008 के अनुसार जेड-जेड श्रेणी के विस्फोटक सबसे खतरनाक होते हैं. ऐसे डेटोनेटर न केवल बहुत बड़ा विस्फोट करने की क्षमता रखते हैं, बल्कि धमाकों के साथ मीलों दूर जाकर वहां भी बर्बादी का कहर बरपा सकते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार डेटोनेटर इतने संवेदनशील विस्फोटक होते हैं कि कभी-कभी इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखते हुए भी विस्फोट हो जाता है. 

इन्हीं खतरों के चलते विस्फोटक नियमावली में तय कठोर नियमों के तहत डेटोनेटरों को विशेष रूप से बनी मैगजीनों में रखा जाता है. इन मैगजीनों को आबादी से दूर सुनसान जगहों पर बनाया जाता है ताकि दुर्घटनावश विस्फोट होने पर कम-से-कम हानि पहुंचे. लेकिन राजस्व पुलिस ने जब्त करने के बाद ये डेटोनेटर जिस अलमारी में रखे थे उसके बगल में कंप्यूटर, उसका यूपीएस और बिजली से चलने वाले और उपकरण भी रखे थे. ऐसे में आसमानी बिजली की चमक के अलावा लोहे की अलमारी का कंपन या हल्का-सा तापमान भी तबाही मचा सकता था. विशेषज्ञों के मुताबिक इतनी मात्रा में जब्त डेटोनेटरों से पूरा का पूरा ऊखीमठ उड़ सकता था. पंवार स्टोन क्रशर में भी जनरेटर रूम का कंपन और स्टोर में इनके साथ रखा अवैध 550 लीटर डीजल भी किसी बड़ी दुर्घटना को न्योता दे रहा था.

यह कहानी जिम्मेदार अधिकारियों और राजस्व पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल खोलती है. राजनेता और माफिया का भ्रष्ट गठजोड़ यह दिखाता है कि यदि सत्ता आपके साथ है तो आपका कुछ नहीं होने वाला.

उत्तराखंड में राजस्व विभाग के पटवारी यानी लेखपाल को थानाध्यक्ष और नायब तहसीलदार को पुलिस उपाधीक्षक के बराबर मुकदमा दर्ज करने, अवैध सामान को जब्त करने और मुकदमे की विवेचना करने की शक्तियां प्राप्त हैं. लेकिन इस अवैध विस्फोटक की बरामदगी मामले में  राजस्व दल ने कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया. अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे इलाके में 1,000 डेटोनेटरों की बरामदगी की खबर शायद बड़ी होती पर इलाका दूरदराज का था और प्रशासन भी इस खबर को गोपनीय रखना चाहता था.

उस दिन मौके पर मौजूद रहे राजस्व विभाग के छोटे कर्मचारी बताते हैं कि यदि छापा मारने वाले दल का नेतृत्व करने वाले उपजिलाधिकारी त्रिपाठी लिखित कार्रवाई नहीं करते तो बेहद खतरनाक और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील यह मामला कहीं कोई सुराग छोड़े बिना खुर्द-बुर्द हो सकता था. त्रिपाठी ने तत्कालीन जिलाधिकारी को मोबाइल से ही इस बड़ी बरामदगी की सूचना दी. साथ ही मामले की आख्या भी उसी दिन फैक्स से जिलाधिकारी कार्यालय भेज दी थी.  

आठ अप्रैल, 2010 को जिलाधिकारी के आदेश पर इस मामले को राजस्व पुलिस से रेगुलर पुलिस को हस्तांतरित करने के आदेश का आलेख फाइल पर तैयार हो गया था. फाइल के उसी पेज पर हस्तलिखित आख्या से यह भी पता चलता है कि इन विस्फोटकों को रखने की कोई वैध अनुमति भी नहीं दी गई थी. यानी ये विस्फोटक पूरी तरह से गैरकानूनी थे. कानून के मुताबिक ऐसे मामले में 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा तय है. लेकिन इन सभी कार्रवाइयों के बाद मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, उल्टे उपजिलाधिकारी त्रिपाठी का तबादला हो गया. 

राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी से किसी विस्फोटक की बरामदगी के बाद होने वाली कार्रवाई के विषय में पूछने पर वे बताते हैं कि गिरफ्तारी और एफआईआर दर्ज करने के साथ-साथ सुरक्षा से जुड़े इस तरह के गंभीर मामलों की सूचना जिलाधिकारी को अविलंब शासन के साथ-साथ आगरा स्थित पेट्रोलियम और विस्फोट सुरक्षा संगठन के कार्यालय को भी देनी चाहिए. विस्फोटकों के मामले में बिना वारंट के भी गिरफ्तारी की जा सकती है. ये अधिकारी बताते हैं, ‘शासन भी इस तरह के मामलों की सूचना राज्य और केंद्रीय गुप्तचर एजेंसियों को भेजता है ताकि पता चल सके कि विस्फोटक कहां से आया और किस प्रयोजन से रखा गया था.’

मामले की फाइल के अनुसार इस मामले में जिला प्रशासन ने एक भी पत्र उत्तराखंड शासन या उच्चाधिकारियों को नहीं भेजा. राज्य में गृह सहित कई महत्वपूर्ण विभाग देख चुके ये अधिकारी कहते हैं , ‘उत्तराखंड चीन और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगा है. देश के कई राज्य नक्सली हिंसा की चपेट में हैं, इसलिए विस्फोटकों की बरामदगी के मामलों में गिरफ्तारी के बाद गहन पूछताछ करना जरुरी है. पंवार स्टोन क्रशर को यूं भी केवल चुगान की इजाजत मिली थी, इसलिए विस्फोटक उनके किसी काम के नहीं थे. सचिवालय के अधिकारी बताते हैं कि जिस जगह से डेटोनेटर बरामद होता है वहां निश्चित रूप से जिलेटिन भी बरामद होगा. विशेषज्ञों के अनुसार बरामद 1,000 डेटोनेटरों के अनुपात में बरामद होने वाला संभावित जिलेटिन भी टनों में हो सकता था. 

अपराध अपने निशान छोड़ता है और कागजों में आई बात जिंदा रहती है. इस मामले में भी यही हुआ. 2007 से राऊंलैंक की सीमा से लगे गांव के लगभग 80 वर्षीय पूर्व सैनिक और वैद्य रामदत्त खेड़वाल पंवार स्टोन क्रशर के अवैध खनन का विरोध कर रहे थे. जिलाधिकारी से लेकर प्रमुख सचिव और मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक हर ज्ञापन में वे कहते रहे कि खुशाल सिंह को दी जाने वाली खनन की हर इजाजत खनन नीति विरुद्ध और गैर-कानूनी है. रामदत्त के अनुसार 2007 में शासन ने खुशाल सिंह को उन जमीनों पर खनन पट्टा स्वीकृत किया जो नदी से बहुत ऊपर पहाड़ पर थीं और जिन खेतों में खनन सामग्री नहीं है. इन पट्टों के नाम पर धड़ल्ले से वनभूमि से खनन होता रहा. लेकिन अवैध और गैरकानूनी रूप से दिए पट्टों को रोकने के बजाय 2008 में शासन ने मानकों और खनन नीति में वर्णित प्रावधानों की अवहेलना करते हुए पंवार स्टोन क्रशर लगाने की इजाजत भी दे दी. इसी पंवार स्टोन क्रशर के स्टोर से विस्फोटक बरामद हुआ था. 2010 के बाद अवैध खनन की शिकायत के साथ-साथ रामदत्त के हर ज्ञापन में संभावित विस्फोटक बरामदगी की उड़ती खबर पर जांच की मांग भी होती थी. 

कानूनन ऐसे मामले में 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है, लेकिन यहां तो कोई एफआईआर तक दर्ज करने को तैयार नहीं था

सचिवालय से प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि जिस वन भूमि पर अवैध खनन करते हुए पकड़े जाने पर खुशाल सिंह पर लाखांे रुपये का अर्थ दंड लगा था, उनियाणा गांव में उसी 83 नंबर के प्लाट पर 20 मार्च, 2008 को खुशाल सिंह ने एक खनन पट्टा उत्तराखंड शासन से स्वीकृत करा लिया था. उस समय पट्टा जारी करने वाला औद्योगिक विकास विभाग तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के पास था. वनभूमि पर केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की इजाजत के बिना पट्टे जारी नहीं किए जा सकते थे पर इस मामले में ऐसा कर दिया  गया. रामदत्त के विरोध के बाद नई कांग्रेस सरकार ने वन भूमि पर नियम विरुद्ध दिए गए खनन पट्टे को शसन ने निरस्त तो कर दिया लेकिन निरस्तीकरण के आदेश में वन संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन  का कहीं जिक्र नहीं किया. ऐसे त्रुटिपूर्ण आदेश के विरुद्ध खनन माफिया को आसानी से हाई कोर्ट से स्थगनादेश मिल गया. 

बार-बार संभावित विस्फोटक पकड़े जाने संबंधी ज्ञापनों के चलते रुद्रप्रयाग जिला कार्यालय में इस बेहद संवेदनशील मामले की फाइल की खोज होने लगी. आखिर यह फाइल नवंबर, 2011 में जिलाधिकारी के निवास में मिली. सूचना के अधिकार के तहत रामदत्त और ऊखीमठ व्यापार संघ के अध्यक्ष आनंद सिंह रावत को मिली जानकारी से यह तो पता चल गया था कि छह अप्रैल, 2010 को ऊखीमठ के उपजिलाधिकारी ने डेटोनेटर पकड़े थे. लेकिन आधी-अधूरी सूचना से यह पता नहीं चल रहा था कि वे वास्तव में कितने थे. 

रुद्रप्रयाग जिलाधिकारी कार्यालय के सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन जिलाधिकारी सत्ता के सर्वोच्च शिखर से आ रहे दबावों और खनन माफियाओं के पैसे की खनक के आगे बेबस थे. अवैध खनन के मामले में दो साल बाद फाइल मिलने के बाद भी प्रभारी जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग ने मुकदमा दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू करने के बजाय अभियोजन अधिकारी की सलाह पर विस्फोटकों को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी.  अब इस मामले में रुद्रप्रयाग के एक प्रभारी अधिकारी डॉ ललित नारायण मिश्रा जांच कर रहे हैं. दस्तावेजों के अनुसार फौरी तौर पर यह सिद्ध हो रहा है कि एक बार जिलाधिकारी के आवास पर जाने के बाद वास्तव में फाइल संबंधित छोटे कर्मचारियों के पास नहीं आई. यह भी साफ है कि फाइल को दबाने में उच्चाधिकारियों का हाथ था. राज्य में तैनात रहे भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘यह संभव नहीं कि कोई जिलाधिकारी 1,000 डेटोनेटरों की बरामदगी और उस पर मुकदमा दर्ज करने की बात भूल जाए.’

इस मामले में स्थानीय लोगों ने 18 अक्टूबर, 2011 को जिलाधिकारी को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की. उन्होंने इस पत्र की प्रतिलिपि उत्तराखंड शासन के साथ-साथ सांसद और संसद की रक्षा समिति के अध्यक्ष सतपाल महाराज को भी भेजी. दस्तावेजों के अनुसार यह शिकायती पत्र राज्य के मुख्य सचिव , प्रमुख सचिव संयुक्त सचिव कार्यालय, पुलिस महानिदेशक के बाद रुद्रप्रयाग के पुलिस अधीक्षक के पास भी पहुंचा. इनमें से किसी भी अधिकारी द्वारा मामले का संज्ञान न लेने के से संकेत मिलता है कि उत्तराखंड में या किसी भी स्तर के अधिकारी स्वयं कागजों को पढ़ते नहीं या वे गंभीर मामलों में भी संवेदनहीन हो गए हैं. रुद्रप्रयाग के पुलिस अधीक्षक ने यह मामला राजस्व पुलिस क्षेत्र का होने के कारण जांच के लिए जिलाधिकारी के पास भेज दिया. इसके एक महीने बाद जिलाधिकारी की ओर से प्रभारी अधिकारी ने उपजिलाधिकारी को  प्रकरण में आवश्यक कार्रवाई करने का आदेश दिया. जिलाधिकारी कार्यालय के कर्मचारी बताते हैं कि सत्ता के शीर्ष से आते दबावों के कारण तत्कालीन जिलाधिकारी राज्य में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों के अनुसार कार्रवाई की रणनीति बना रहे थे.  

10 फरवरी, 2012 को तत्कालीन जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग ने इस मामले में मुकदमा दर्ज कराने के बजाय मामला कालातीत मानते हुए विस्फोटक अधिनियम, 1983 के प्रावधानों के तहत डेटोनेटर नष्ट करने के आदेश जारी किए. 18 जून, 2012 को उप विस्फोट नियंत्रक डॉ. विवेक कुमार की देखरेख में इन्हें नष्ट भी कर दिया गया. यहां यह भी गौरतलब है कि 15 जून को ज्येष्ठ अभियोजन अधिकारी ने इस मामले में मुकदमा दर्ज करने की सलाह दे दी थी फिर भी जिला प्रशासन ने केस प्रॉपर्टी नष्ट करवा दी. इस बीच रामदत्त ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कई बिंदुओं पर सूचना मांग ली थी. अब प्रशासन के पास कोई चारा नहीं रह गया था. ऐसे में जिलाधिकारी डॉ नीरज खैरवाल के 19 जुलाई, 2012 के आदेश पर राजस्व पुलिस ने पंवार स्टोन क्रशर के विरुद्ध विस्फोटक अधिनियम में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. फौजदारी मामलों के अधिवक्ता सूरत सिंह नेगी बताते हैं कि यह गंभीर मामला है जिसमें अपराध सिद्ध होने पर निश्चित रूप से सजा हो सकती है. 

खेल नहीं आसान

अतीत को छोड़ दें तो पिछले कई सालों से मध्य प्रदेश से कोई खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट टीम का स्थायी सदस्य नहीं है. इसके बावजूद भारतीय क्रिकेट टीम के प्रदर्शन पर लोगों में भावनाएं उसी तीव्रता के साथ दिखती हैं जैसा देश के दूसरे हिस्से में होता है. लेकिन इसके साथ शायद पहली बार हो रहा है जब मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (एमपीसीए) से जुड़ी घटनाएं यहां क्रिकेट मैचों जितनी ही सरगर्मियां पैदा कर रही हैं. इसकी शुरुआत पिछले दिनों तब हुई जब एसोसिएशन के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया ने प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान को एक चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने राज्य के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय पर मंत्री पद का गलत इस्तेमाल करके खेल संघों में दखलअंदाजी का आरोप लगाया है. उनके मुताबिक एमपीसीए उद्योग विभाग के अधीन रजिस्ट्रार फर्म्स ऐंड सोसायटीज से जुड़ा है और इसीलिए इस संस्था के कंधों का इस्तेमाल कर विजयवर्गीय एसोसिएशन पर नाजायज दबाव डाल  रहे हैं. चिट्ठी में उन्होंने मुख्यमंत्री से यह आग्रह भी किया  है कि वे विजयवर्गीय पर लगाम कसें.

सिंधिया के आग्रह पर भले ही मुख्यमंत्री ने मौन साध लिया हो लेकिन इसने एमपीसीए के अगस्त में हो रहे चुनाव में राज्य की राजनीति और क्रिकेट के मेल से होने वाले घमासान की भूमिका बांध दी. इसमें एक तरफ परंपरागत सत्ता है, जिसकी कमान खुद सिंधिया के हाथों में है.  स्व. माधव राव से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक पिता-पुत्र ने तीस साल से एमपीसीए पर एकछत्र राज किया है और यह घराना किसी भी तरह अपना आधिपत्य छोड़ने को तैयार नहीं. वहीं बीते कुछ सालों से एक नई ताकत सिंधिया के गढ़ में घुसना चाह रही है, जिसकी कमान विजयवर्गीय के हाथों में है और यह इस चुनाव में जीत का मंसूबा पाल रही है. आपको बताते चलें कि इंदौर मध्य प्रदेश क्रिकेट का गढ़ है और एसोसिएशन के सभी 244 मतदाताओं में सर्वाधिक 130 यानी आधे से अधिक मतदाता इसी शहर से हैं. इसलिए सिंधिया के नजरिये से बुरी बात यह है कि विजयवर्गीय राज्य में कैबिनेट मंत्री के अलावा इंदौर के सबसे प्रभावशाली नेता भी हैं. वे लगातार दो बार इंदौर डिवीजन क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी चुने जा चुके हैं.

‘यदि विजयवर्गीय क्रिकेट संघ का चुनाव जीत गए तो वे दिल्ली में अरुण जेटली, गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आदि के समकक्ष वाली छवि बना लेंगे

इस बार  एमपीसीए के चुनाव में केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रदेश के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के टकराने से मुकाबला रोमांचक और पूरी तरह कांग्रेस-भाजपा के बीच बनता नजर आ रहा है. एसोसिएशन के भीतर कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं में प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री महेंद्र सिंह कालूखेड़ा और विधायक निशित पटेल हैं तो भाजपा से भी प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह और विधायक ध्रुव नारायण सिंह हैं. सिंधिया के पक्ष में सांसद सज्जन सिंह वर्मा और विजयवर्गीय के पक्ष में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा का खुलकर सामने आना दर्शाता है कि यह चुनाव क्रिकेट से कहीं अधिक राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए लड़ा जा रहा है. क्रिकेट की राजनीति के प्रेक्षक बताते हैं कि सिंधिया अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे. वहीं भाजपा का हाईकमान अगर निकट भविष्य में शिवराज सिंह चौहान को केंद्रीय राजनीति में लाता है तो कैलाश विजयवर्गीय की भाजपा से मुख्यमंत्री बनने की संभावना है. ऐसे में क्रिकेट का यह चुनाव भविष्य के दो संभावित मुख्यमंत्रियों के बीच का सेमीफाइनल कहा जा रहा है.

एमपीसीए अध्यक्ष पद के लिए सिंधिया और विजयवर्गीय का लगातार दूसरी बार आमना-सामना होना है. अगस्त, 2010 में सिंधिया ने 212 मतों में से 142 लेकर 70 के अंतर से विजयवर्गीय का पटखनी दी थी. उसके पहले तक एसोसिएशन के इतिहास में कभी चुनाव नहीं हुआ था और उसके भीतर सदस्यों की आपसी सहमति से अध्यक्ष और अध्यक्ष की सहमति से पदाधिकारियों को चुनने का रिवाज था. मगर पिछली बार विजयवर्गीय ने ऐन मौके पर चुनाव लड़कर यह रिवाज तोड़ दिया. विजयवर्गीय समर्थकों का दावा है कि बीता चुनाव बहुत जल्दबाजी में लड़ने से उन्हें पटखनी खानी पड़ी थी लेकिन दो साल में काफी कुछ बदल चुका है और उन्होंने मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए बढ़-चढ़कर घेराबंदी की है. दूसरे धड़े को इस घेराबंदी के तौर-तरीके पर सख्त एतराज है. एसोसिएशन में प्रबंध कमेटी के सदस्य मयंक कलमड़ीकर की सुनें तो 56 साल के इतिहास में राज्य के उद्योग विभाग ने कभी कोई आपत्ति नहीं की थी लेकिन अब विजयवर्गीय के इशारे पर यही विभाग इस संख्या तक नोटिस भेज रहा है कि काम करना मुश्किल हो गया है. कई पदाधिकारियों को विजयवर्गीय से एक शिकायत यह भी है कि वे एसोसिएशन के सदस्यों को साधने के लिए पद और पैसे का लालच तो दिखा ही रहे हैं, राज्य सरकार के विभागों में कार्यरत कुछ सदस्यों को स्थानांतरण का डर भी दिखा रहे हैं. वहीं कैलाश विजयवर्गीय ने एसोसिएशन में बेवजह हस्तक्षेप से इंकार किया है. वे कहते हैं, ‘पदाधिकारियों की ओर से गलत बयानबाजी की जा रही है और यह प्रस्तावित चुनाव में दबाव बनाने की रणनीति से अधिक कुछ भी नहीं है.’

देखा जाए तो मध्य प्रदेश क्रिकेट पर सिंधिया और उनके समर्थकों के एकाधिकार को मटियामेट करने की मंशा के पीछे कई सारी वजह हैं लेकिन इनमें बीसीसीआई का एमपीसीए को आवंटित करोड़ों रुपये का वह सालाना बजट प्रमुख है जिस पर कई नेताओं की नजर बराबर बनी रही है. इसके अलावा इंदौर और ग्वालियर के मैदानों में होने वाले अंतरराष्ट्रीय मैचों के जरिए यहां के नेताओं के भीतर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की चाहत बढ़ रही है. कैलाश विजयवर्गीय के हालिया क्रिकेट प्रेम को इन्हीं बातों के संदर्भ में तौला जा रहा है. विजयवर्गीय के एक करीबी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘इस चुनाव में सिंधिया का पलड़ा कहीं भारी है लेकिन यह विजयवर्गीय का ऐसा दांव है कि यदि उन्होंने अप्रत्याशित तौर से सिंधिया को चित कर दिया तो उनका राजनीतिक कद राष्ट्रीय स्तर तक बढ़ जाएगा.’ जाहिर है यह विजयवर्गीय की खुद को बीसीसीआई सहित सभी बड़े क्रिकेट संघों पर काबिज नेताओं जैसे दिल्ली में अरुण जेटली, मुंबई में विलासराव देशमुख, गुजरात में नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश में राजीव शुक्ला और बिहार में लालू प्रसाद यादव की पंक्ति में खड़ा करने की एक महत्वाकांक्षी योजना है.

 खेल के राजनीतिक मैदान में स्थापित करने के लिए विजयवर्गीय के साथ क्रिकेट की पृष्ठभूमि का न होना उनकी एक ऐसी कमजोरी बनी हुई है जिस पर उनके विरोधी निशाना लगा रहे हैं.

सिंधिया विजयवर्गीय के क्रिकेट ज्ञान पर सवाल उठाते हुए कहते भी हैं, ‘उन्होंने खुद कबूल किया है कि वे क्रिकेट की क, ख, ग जाने बिना इंदौर डिवीजन क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बन गए.’ हालांकि विजयवर्गीय ने पिछली रणजी ट्राफी के मैचों में अपनी सक्रियता दिखा-दिखाकर कुछ हद तक अपनी छवि बदली भी है. पर इन सबसे कहीं बड़ी मुश्किल विजयवर्गीय के लिए वह मराठी वोट-बैंक है जो चुनाव में निर्णायक भूमिका तो निभा सकता है लेकिन जिसकी जातीय और राजनीतिक वफादारी हमेशा से सिंधिया घराने के साथ रही है. अपने मराठी संपर्कों के बूते विजयवर्गीय सिंधिया की मराठी मतों से पकड़ ढीली करने की जुगत में हैं लेकिन सिंधिया भी इस मामले में लापरवाह नहीं. यही वजह है कि उन्होंने मराठी मतों को रिझाने के लिए बीती 30 जून को इंदौर में जन्मे और कर्नाटक में रहने वाले महाराष्ट्रियन तथा भारतीय टीम के पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ को सम्मानित तो किया ही, उनके नाम पर होल्कर स्टेडियम में एक ड्रेसिंग रूम का नामकरण भी किया.

विजयवर्गीय को दूसरी बड़ी मुश्किल शाही घरानों के उन सदस्यों से भी मिल रही है जिनका आजादी के पहले से क्रिकेट एसोसिएशन पर कब्जा रहा है और जिन्हें बाहरी ताकत के साथ अपनी सत्ता साझा करनी ही नहीं. सिंधिया ने एक रणनीति के तहत ऐसे सदस्यों को लेकर छह महीने में सौ से अधिक मतदाताओं के साथ लंच या डिनर किया है. इन सबके बावजूद विजयवर्गीय को जीत की संभावना है तो इसलिए कि सिंधिया एमपीसीए में लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गए हैं और एसोसिएशन के संविधान के मुताबिक उन्हें तीसरी बार अध्यक्ष बनने के लिए दो तिहाई से अधिक मत चाहिए. ऐसी स्थिति में विजयवर्गीय की कोशिश बीते चुनाव में अपनी हार के मतों का अंतर कम से कम करने की रहेगी. फिर एसोसिएशन में इंदौर तथा ग्वालियर के सदस्यों के बीच तनातनी बनी रहती है जिसका भी विजयवर्गीय फायदा उठाकर अपने लिए अधिक से अधिक मत खींचना चाहेंगे.

इस खींचतान में विजयवर्गीय को उनकी पार्टी का समर्थन मिलना भी तय ही है. भाजपा में प्रांतीय खेल प्रकोष्ठ के संयोजक अजय शर्मा का कहना है, ‘भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी कार्यकर्ताओं की कई सभाओं में इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सत्ता में वापसी के लिए सभी खेल संघों पर अधिकार जमाया जाए ताकि यहां से 10 प्रतिशत मतों का बंदोबस्त सुनिश्चित हो सके.’ तकरीबन 26 खेलों के लिए गठित मध्य प्रदेश ओलंपिक संघ पर भाजपा विधायक रमेश मेंदोला ने कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे महेश शर्मा को हराकर पार्टी की पताका लहराई भी है. जाहिर है कि क्रिकेट के इस दंगल में दो सियासी खिलाडि़यों की भिड़ंत आगामी राज्य विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा का अंदरूनी समीकरण प्रभावित किए बिना नहीं  रह   सकती.

मध्य प्रदेश क्रिकेट का सुनहरा अतीत

एमपीसीए से अनेक हस्तियां बीसीसीआई में पहुंचती रही हैं. लेकिन इनमें सबसे चमकदार नाम स्व. माधव राव सिंधिया का है जिन्होंने 1980 में उषा राजे होल्कर के पति सतीश मलहोत्रा की मौत के बाद दो दशक तक निर्विवाद समर्थन से एमपीसीए की बागडोर तो संभाली ही, बीसीसीआई के अध्यक्ष पद तक भी पहुंच बनाई. उनकी मौत के बाद एक दशक से उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किसी तरह एमपीसीए की बागडोर बचाए रखी है. मध्य प्रदेश में 1932 में सेंट्रल इंडिया क्रिकेट एसोसिएशन बना और तब से लेकर अब तक होल्कर (1940-55), मध्य भारत (1955-57) और मध्य प्रदेश जैसे अलग-अलग नामों से इस क्षेत्र की टीम रणजी ट्राफी में खेलती रही है. इस टीम ने 15 साल के अपने शुरुआती सफर में चार बार रणजी ट्राफी जीती और छह बार यह उपविजेता रही. इंदौर के होल्कर राजघराने के  स्व. यशवंतराव होल्कर की क्रिकेट को लेकर खासी दीवानगी थी. उन्होंने अपनी टीम में कर्नल सीके नायडू और कैप्टन मुश्ताक अली सरीखी क्रिकेट प्रतिभाओं को जगह दी थी. 

अकाल कभी अकेले नहीं आता…

देश के अनेक हिस्सों में भूजल का स्तर भारतीय राजनीति के स्तर से भी बहुत नीचे गिर चुका है

बादल गरजे पर कई जगह खेतों में बरसे नहीं. हमारे खेती मंत्री भी गरजे लेकिन बिल्कुल नहीं बरसे. उनका गरजना मंत्रिमंडल में अपने घटते असर को लेकर था. केंद्र की सत्ता में उनका दल एक बटाईदार की हैसियत से शामिल है. इस हैसियत में कुछ कमी आते देख वे गरजे थे. उन्हें लगता है कि अनाज की फसल से ज्यादा अपने वोटों की फसल का ध्यान रखना होगा. उसके ठीक होने के संकेत मिलते ही उनके बरसने की गुंजाइश खत्म हो गई. 

लेकिन देश के खेतों में बादलों का गरजना और बरसना दोनों जरूरी हैं. लेकिन इस बार ऐसा हो नहीं सका है. समय तेजी से बीत रहा है. मौसम विभाग ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए गुणा-भाग करके अखबारों और पीएमओ को बता दिया है कि इस बार पूरे देश के स्तर पर कम से कम 20 प्रतिशत और कई जगह 60 प्रतिशत तक की कमी आंकी गई है. कुल मिलाकर चित्र बहुत दर्दनाक है. 

इधर भाखड़ा भी चीं बोल गया है. इस बड़े बांध में जमा पानी अब इतना कम बचा है कि भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड ने बांध से होने वाली सिंचाई में फिलहाल 10 प्रतिशत की कटौती कर दी है. इसका सीधा असर पंजाब और हरियाणा के किसानों पर पड़ेगा. खरीफ की बुवाई और फिर बोई गई फसल की सिंचाई – दोनों पर इसका कैसा प्रभाव पड़ेगा, इसे अभी समझने में मंत्रालयों की फाइलों को और देर लग सकती है. 

भाखड़ा के अलावा देश के कोई 80 बड़े बांधों की हालत भी ऐसी ही है. इनको देखने वाले प्रबंध बोर्डों ने बताया है कि इनमें बरसात के मौसम में जितना पानी आता है उसमें 80 फीसदी तक की कमी दर्ज हो चुकी है. इस तरह पंजाब और हरियाणा के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात भी अकाल की चपेट में कभी भी आ सकते हैं. अकाल की पदचाप सुनाई दे रही है, लेकिन कहीं जातीय हिंसा तो कहीं आंदोलनों की आवाजों में इसकी तरफ भला कैसे ध्यान जाएगा?

अकाल कोई पहली बार नहीं आ रहा है. हमारे यहां एक पुरानी कहावत है – ‘आग लगने पर कुंआ खोदना.’ कई बार आग लगी और कई बार कुएं खोदे गए होंगे तब जाकर अनुभवों की मथानी से मथकर ऐसी कहावतें मक्खन की तरह ऊपर आई होंगी. लेकिन अब जब हम आग लगने पर कुआं खोदते हैं तो उन कुंओं में पानी मिल जाए इसकी कोई गारंटी नहीं है. देश के अनेक हिस्सों में भूजल का स्तर देश की राजनीति के स्तर से भी बहुत नीचे गिर चुका है. हमारे योजनाकारों को इस बात का बहुत भरोसा था कि बड़े बांध अकाल से निपटने का सबसे कारगर तरीका हैं. कई बार हमने इस घमंडी बयान को सुना है कि किसानों को हम मानसून के भरोसे नहीं छोड़ सकते, हमारे बांधों में इतना पानी होगा कि उनसे अकाल से भी निपटा जा सकता है और बाढ़ से भी. लेकिन इतने सालों का अनुभव बताता है कि जब खेतों को पानी चाहिए तब इन बांधों में पानी नहीं रहता  और जब तेज बरसात होती है तब इन बांधों को बचाने के लिए इनके सारे दरवाजे खोल देने पड़ते हैं. आंकड़े बताते हैं कि सब आधुनिक उपायों के बाद भी हमारे कई बड़े शहर और अनगिनत गांव बांधों से अचानक पानी छोड़े जाने के कारण देखते-देखते डूब जाते हैं. 

इससे पहले चलन यह था कि लोग बिना सरकार की तरफ देखे अपने गांव और शहरों में जहां ठीक जगह मिलती थी, वहां छोटे-बड़े तालाब बना लिया करते थे. अच्छी वर्षा हो तो इनमें खूब पानी भर जाता जो उन्हें अगले मानसून तक ले जाता था. इस दौरान भूजल स्तर भी उन छोटे-बड़े तालाबों से इतना ऊंचा उठ जाता था कि जरूरत पड़ने पर यदि वे कहावत का कुआं खोदें तो उसमें पानी भी मिल जाए. 

सिर्फ हमारे यहां ही नहीं, दुनिया भर के कई देशों में विकास की नई योजनाओं ने समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध तरीकों को ताक पर रख कर नई-नई योजनाओं को अपनाया है. नतीजे चारों तरफ एक से दिख रहे हैं. रूस जैसे संपन्न देश में बाढ़ आई और दो सौ लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं. पड़ोसी देश चीन में भी ऐसा ही हो रहा है. असम में, बंगाल में पहले पानी न गिरने की शिकायत थी और  अब पानी गिरते ही ऐसी बाढ़ आई है कि आदमी तो आदमी काजीरंगा के जानवर भी बह गए. वहां परिस्थिति अभी भी उतनी ही खराब है लेकिन पहले छेड़छाड़ और फिर हिंसा की दुखद घटनाओं ने बाढ़ की खबरों को बहा दिया है. 

कई बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं और इन्हीं में से एक बात है कि अकाल कभी भी अकेले नहीं आता. उससे बहुत पहले विचारों का अकाल पड़ने लगता है. अच्छे विचारों का मतलब है– अच्छी योजनाएं और अच्छे काम. ऐसी अच्छी योजनाओं का अकाल पड़ने लगता है और बुरे कामों की भी बाढ़-सी आ जाती है. देश को स्वर्ग बना देने की तमन्ना में तमाम नेताओं ने स्पेशल इकोनॉमिक जोन, सिंगूर, नंदीग्राम और न जाने इतनी बड़ी-बड़ी योजनाओं का पूरा ध्यान रखा.बीच में यह भी सुना गया था कि इतने सारे लोगों को खेती नहीं करनी चाहिए. एक जिम्मेदार नेता ने यह भी कहा था कि भारत को कब तक गांवों का देश कहते रहेंगे.

गांव में रहने वाले लोग शहरों में आकर रहने लगें तो हम उन्हें आसानी से बेहतर चिकित्सा, बेहतर शिक्षा और एक बेहतर जीवन की तमाम सुविधाएं दे सकेंगे. इन्हें लगता होगा कि शहरों में रहने वाले सभी लोगों को ये सभी सुविधाएं मिल ही चुकी हैं. इसका उत्तर तो शहर वाले ही दे सकेंगे.  इसलिए अच्छा तो यह हो कि बादल फिर से गरजें और खूब बरसें. लेकिन यदि दुर्भाग्य से ऐसा न हो पाए, अकाल आने लगे तो हम सब एक बार इस बात को याद रखें कि अकाल अकेले नहीं आता. अगली बार हम इसकी पूरी तैयारी करें. 

कहीं तकरार, कहीं बंटाढार

झारखंड का नगड़ी नाम का एक छोटा-सा कस्बा इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है. वजह है वहां इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, लॉ यूनिवर्सिटी, ट्रिपल आईटी जैसे संस्थान बनाने के लिए सरकार द्वारा अधिगृहीत जमीन पर विवाद.  इसे लेकर पुलिस-प्रशासन और स्थानीय ग्रामीणों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है. किसानों का कहना है कि वे अपनी जमीन पर कब्जा नहीं छोड़ेंगे. सरकार का रुख इसके उलट है. इस टकराव का नतीजा क्या होगा, अभी पक्के तौर पर कहना मुश्किल है. लेकिन यह जरूर पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि जो सक्रियता राज्य सरकार ये संस्थान खोलने के लिए दिखा रही है वह अगर उसने राज्य के दूसरे विश्वविद्यालयों के लिए दिखाई होती तो राज्य में उच्च शिक्षा का काफी भला हो जाता. झारखंड के अधिकांश बच्चों का भविष्य राज्य सरकार द्वारा संचालित पांच विश्वविद्यालयों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है लेकिन सरकारी अनदेखी के चलते इनका बुरा हाल है.  

झारखंड में पांच विश्वविद्यालय हैं-रांची विश्वविद्यालय(रांची), विनोबा भावे विश्वविद्यालय (हजारीबाग), कोल्हान विश्वविद्यालय (चाईबासा), नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय (डालटनगंज) और सिद्धो-कान्हो विश्वविद्यालय (दुमका). इन पांचों विश्वविद्यालयों से कुल 65 कॉलेज जुड़े हुए हैं. करीब तीन लाख से ज्यादा छात्र इनके भरोसे हैं. अब इनमें हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय को छोड़ दें तो बाकी विश्वविद्यालय वर्षों से एक अदद कैंपस तक के लिए तरस रहे हैं. सबसे पहले रांची विश्वविद्यालय की बात करते हैं. 50 साल पहले खुला यह झारखंड का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है. इसके अंतर्गत 15 सरकारी कॉलेज संचालित होते हैं. सरकार ने इस विश्वविद्यालय के लिए 162.5 एकड़ जमीन दी थी. लेकिन आज इसके पास सिर्फ 67 एकड़ जमीन बची है. विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. बीपी शरण कहते हैं, ‘सरकारों के निरंतर उदासीन रवैये के कारण विश्वविद्यालय की जमीन हाथ से निकलती गई. सरकार ने रांची से सटे पिठौरिया में जमीन देने का आश्वासन दिया था, लेकिन उस जमीन का अभी तक अधिग्रहण नहीं हो पाया है. इस कारण विश्वविद्यालय का विस्तार भी नहीं हो पा रहा है.’ 

रामलखन सिंह जैसे कॉलेज सिर्फ चार-चार कमरों में चल रहे हैं जबकि विद्यार्थी आठ-आठ हजार हैं. ऐसे में क्या पढ़ाई होती होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं

रांची विश्वविद्यालय की जमीन को समय-समय पर सरकार ही लेती रही. कभी पार्क (सिद्धो-कान्हो पार्क), कभी हेलीपैड, कभी मंत्री आवास तो कभी स्टेडियम के नाम पर. विश्वविद्यालय के एक अधिकारी कहते हैं, ‘सरकार के साथ अपने संबंध बेहतर रखने के लिए कुलपतियों ने ही कैंपस की जमीन  दिल खोलकर लुटाई. नतीजा यह है कि आज राज्य के एक उपमुख्यमंत्री जिस आवास में रहते हैं वह कायदे से वीसी का आवास होना चाहिए था. राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को जो आवास आवंटित हुआ था वह भी विश्वविद्यालय की ही जमीन पर है.’ इस मुद्दे की पड़ताल करने पर तहलका को पता चला कि दो साल पहले राज्य में हुए राष्ट्रीय खेलों के लिए बना बिरसा मुंडा स्टेडियम भी रांची विश्वविद्यालय की जमीन पर खड़ा है. इस खास स्टेडियम के निर्माण में विश्वविद्यालय ने नौ लाख रुपये का सहयोग भी किया था. उस समय तय हुआ था कि जमीन और पैसे के एवज में विश्वविद्यालय को हर साल 100 दिन के लिए स्टेडियम इस्तेमाल करने की छूट रहेगी.

लेकिन अब विश्वविद्यालय से रोज के हिसाब से 20 हजार रुपये शुल्क मांगा जाता है. बिजली के 15 हजार अलग से. यकीन करना मुश्किल है कि अपनी नाक के नीचे चल रहे विश्वविद्यालय में हो रही गड़बड़ियों की जानकारी सरकार को नहीं होगी. लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी प्राथमिकताओं में नगड़ी में ट्रिपल आईटी, आईआईएम और लॉ यूनिवर्सिटी का मुद्दा इससे ऊपर है. रांची विश्वविद्यालय के एसएस मेमोरियल कॉलेज, रामलखन सिंह जैसे कॉलेज सिर्फ चार-चार कमरों में चल रहे हैं जबकि यहां विद्यार्थियों की संख्या आठ-आठ हजार तक है. विद्यार्थी कहां बैठते होंगे, पढ़ाई क्या होती होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. 

झारखंड का ही एक दूसरा अहम हिस्सा संथाल परगना है. इसी इलाके में पड़ने वाले दुमका में 1992 में सिद्धो-कान्हू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी. उन दिनों यह एकीकृत बिहार का हिस्सा हुआ करता था. झारखंड के सबसे कद्दावर नेता शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी संथाल परगना से ही खाद-पानी लेकर राजनीति करते हैं और इसके बूते मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच चुके हैं. लेकिन यहां के विश्वविद्यालय की हालत जर्जर है. अपनी शुरुआत से ही यह अपने कैंपस के लिए तरस रहा है. सिद्धो-कान्हू विश्वविद्यालय के अंतर्गत 13 सरकारी कॉलेज संचालित होते हैं. कुलपति बशीर अहमद खान कहते हैं कि बजट के अभाव में विश्वविद्यालय का विस्तार नहीं हो पा रहा. इतने साल बाद भी विश्वविद्यालय संथाल परगना कॉलेज में ही चल रहा है. 12-13 कमरों में विश्वविद्यालय की पूरी दुनिया सिमटी हुई है. एक कमरे में एक विभाग का निपटारा हो जाता है. इसी विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने-वाले गोड्डा कॉलेज और साहेबगंज कॉलेज में जनजातीय विषयों की पढ़ाई के लिए विभाग तो खोला गया है मगर इस विभाग में आज तक किसी शिक्षक की नियुक्ति नहीं हुई है. 

झारखंड का एक और महत्वपूर्ण इलाका कोल्हान है. इसके दायरे में स्टील नगरी जमशेदपुर, सारंडा आदि इलाके आते हैं.

इसी इलाके से वर्तमान मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भी आते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा भी इसी इलाके से ताल्लुक रखते हैं. यहां चाईबासा में स्थित कोल्हान विश्वविद्यालय की दशा भी दयनीय है. कुलपति सलिल राय का मानना है कि समय के साथ जरूरतें भी बदलनी होंगी. बकौल सलिल राय, ‘वैसे तो किसी भी विश्वविद्यालय के लिए 100 से 150 एकड़ जमीन की जरूरत होती है. लेकिन आज की तारीख में यह संभव नहीं लग रहा इसलिए विकल्प सोचना होगा. हमने इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 75 एकड़ भूमि की मांग की है.’ फिलहाल यह विश्वविद्यालय टाटा कॉलेज, चाईबासा कैंपस में चल रहा है. अब विश्वविद्यालय इसी कॉलेज के कैंपस में प्रशासनिक भवन खोलने की तैयारी में है. कोल्हान विश्वविद्यालय से 14 कॉलेज जुड़े हुए हैं. करीब 64,000 विद्यार्थी इनमें नामांकित हैं.

वोकेशनल कॉलेजों को जोड़ दें तो इस आंकड़े में लगभग 8,500 छात्रों की बढ़ोतरी हो जाएगी. लेकिन 18 विभागों वाला यह विश्वविद्यालय सिर्फ चार डीनों से काम चला रहा है. स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यहां हर साल 92 परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं और शिक्षकों की संख्या सिर्फ 425 है. 250 पद अब भी खाली हैं. अब जरा इससे हो रहे नुकसान पर नजर डालिए. विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थी टाटा कॉलेज के पुस्तकालय और प्रयोगशाला से काम चलाते हैं. इसी विश्वविद्यालय की प्रति कुलपति लक्ष्मीश्री बनर्जी को कुछ ही दिनों पहले वित्तीय अनियमितताओं सहित कई अन्य आरोपों के चलते पद से हटाया जा चुका है.

और इन सबके बाद यदि भूखे-सूखे को नियति बनाये गये पलामू की ओर रुख करें तो वहां जिस तरह वर्षों से सूखा-अकाल दूर करने के नाम पर थोथी लोकप्रियता की राजनीति साधी जाती रही है, कुछ वैसा ही हाल विश्वविद्यालय को लेकर है. यहां विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे भी लोकप्रिय राजनीति ही थी. करीब तीन साल पहले जनवरी 2009 में शुरू हुए नीलांबर-पितांबर विश्वविद्यालय में छात्र तो भरपूर हैं. पलामू के तीन जिलों पलामू, लातेहार और गढ़वा के चार सरकारी काॅलेज इसी विश्वविद्यालय से संचालित होते हैं और करीब 50 हजार से अधिक विद्यार्थियों का भविष्य इसी विश्वविद्यालय की दशा-दिशा से तय होना है. लेकिन खुद विश्वविद्यालय की हालत यह है कि वह अब तक एक अदद प्रशासनिक भवन के लिए तरस रहा है, कैंपस वगैरह तो बहुत दूर की बात है. इस पिछड़े और नक्सल प्रभावित इलाके के विश्वविद्यालय व कॉलेजों में शिक्षकों, लाइब्रेरी, लेबोरेटरी सबका घोर अभाव है. जाहिरे-सी बात है कि ऐसे में आईआईएम, ट्रिपल आईटी या दूसरे व्यावसायिक संस्थानों के लिए सरकार की इतनी तत्परता लोगों को आसानी से हजम नहीं हो रही.

मेहरबानी की मार

कहानी दिसंबर, 2010 से शुरू होती है. उत्तर प्रदेश में तब भी भारी बिजली संकट था. उन्हीं दिनों तत्कालीन बसपा सरकार ने 24 दिन में ही समस्या को दूर करने का एक उपाय खोज निकाला और निजी क्षेत्र की नौ बिजली कंपनियों के साथ बिजली घर लगाने के सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए. ये करार 10 दिसंबर, 2010 से चार जनवरी, 2011 के बीच हुए. तय हुआ कि 18 महीने में बिजली घरों का काम शुरू हो जाएगा. शर्त यह भी थी कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो बिजली कंपनियों की धरोहर राशि जब्त कर ली जाएगी.  बसपा सरकार ने जो करार किया था उसके हिसाब से 18 महीने की मियाद जून, 2012 में पूरी हो गई, लेकिन एक भी कंपनी का काम शुरू नहीं हुआ. इस दौरान मार्च, 2012 में प्रदेश का निजाम भी बदल गया और बसपा के बदले समाजवादी पार्टी की सरकार आ गई. पर सपा सरकार ने एमओयू के हिसाब से करार निरस्त करके कंपनियों की करोड़ों की धरोहर राशि जब्त नहीं की. इसकी बजाय दरियादिली दिखाते हुए उसने उन्हीं कंपनियों को फिर से 18 महीने की मोहलत और दे दी.

अब सवाल कई हैं. बसपा की सरकार मई, 2007 में बन गई थी. उस समय भी उत्तर प्रदेश में बिजली का भारी संकट था. तो फिर 2007 से लेकर नवंबर, 2010 तक कोई करार क्यों नहीं किया गया? आखिर आनन-फानन में 24 दिन में ही नौ कंपनियों से 10,340 मेगावाट बिजली बनाने का करार क्यों? और जब बिजली कंपनियों ने 18 महीने तक कोई काम नहीं किया तो सपा सरकार ने यह करार रद्द क्यों नहीं किया? सवाल यह भी है कि जब सपा सरकार ने पूर्ववर्ती बसपा सरकार के कई बड़े फैसले निरस्त किए हैं तो निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियों पर इतनी मेहरबानी क्यों. इन सब सवालों के जवाब में आॅल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के सेक्रेटरी जनरल शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ‘सपा हो चाहे बसपा, सभी ने निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियों को फायदा देने के लिए ऐसा किया. कंपनियों पर दरियादिली दिखाने में सपा सरकार पूर्ववर्ती बसपा सरकार से भी दो कदम आगे निकल गई है.’  

अगर पूरे करार पर गौर से नजर डाली जाए तो तथ्य दुबे की बात की पुष्टि करते लगते हैं. पहले बसपा सरकार के करार पर नजर डालते हैं जो आनन-फानन में किया गया. हुआ यह था कि केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने एक अध्ययन के बाद पाया कि एमओयू के माध्यम से बनने वाले बिजली घरों की बिजली प्रतिस्पर्धात्मक रूप से बनने वाले बिजलीघरों की तुलना में काफी महंगी पड़ रही है. लिहाजा केंद्र सरकार ने पांच जनवरी, 2011 को सभी राज्यों के लिए नियम बना दिए कि अब एमओयू के माध्यम से बिजली घर नहीं लगाए जा सकते. दुबे कहते हैं, ‘बसपा सरकार को जब इस बात की भनक लगी कि केंद्र सरकार नए नियम बनाने जा रही है तो आनन-फानन में उसने 24 दिन के भीतर 10,340 मेगावाट बिजली बनाने का करार निजी क्षेत्र के बिजली घरों से कर लिया. करार में कंपनियों से जमानत राशि पांच लाख रुपये प्रति मेगावाट की दर से जमा करवाई गई. इस तरह कंपनियों की ओर से सरकार के पास करीब साढ़े पांच अरब रुपये जमानत राशि के रूप में जमा हुए. बसपा सरकार ने करार के तहत कंपनियों को 18 महीने का समय काम शुरू करने के लिए दिया था. करार में लिखा था कि यदि कंपनियां 18 महीने में काम नहीं शुरू करती हैं तो उनकी जमानत राशि जब्त कर ली जाएगी.’ 

जून, 2012 में 18 महीने की मियाद पूरी हो गई, लेकिन तब तक किसी भी कंपनी ने काम शुरू नहीं किया था. इसके बावजूद सपा सरकार ने लगभग साढ़े पांच अरब की जमानत राशि जब्त करने के बजाय कंपनियों को 18 महीने की मोहलत और दे दी. दुबे कहते हैं, ‘केंद्र सरकार के पांच जनवरी, 2011 के नियम के अनुसार एमओयू के माध्यम से बिजली घर लगाए ही नहीं जा सकते. तो सपा सरकार ने समय से काम शुरू न करने वाली बिजली कंपनियों की अरबों की जमानत राशि जब्त करने के बजाय 18 महीने की मोहलत और कैसे दे दी? उधर इस दौरान मशीनरी और प्लांट की लागत 10-15 प्रतिशत तक बढ़ गई है. सरकार ने 18 महीने का समय और दे दिया है लिहाजा बिजली घर लगने तक यह लागत 2010 के मुकाबले 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी.’ दुबे कहते हैं कि इसका असर बिजली की लागत पर दिखेगा और प्रभाव आम जनता पर पड़ेगा. सपा सरकार की दरियादिली यहीं तक सीमित नहीं है. तीन जुलाई को विधानसभा सत्र के अंतिम दिन सरकार ने एक अध्यादेश पारित करा लिया जिसके तहत कंपनियों को विदेशी कोयला आयात करने की छूट भी दे दी गई. विदेशी कोयले को आयात करने के पीछे सपा सरकार ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार समय पर बिजली घरों को कोयला उपलब्ध नहीं करवा पा रही है. 

  • डेढ़ साल पहले सरकार ने नौ बिजली कंपनियों के साथ समझौता किया
  • तय हुआ कि 18 महीने में नए बिजली घरों का काम शुरू हो जाएगा
  • 18 महीने की मियाद जून, 2012 में पूरी हो गई लेकिन काम शुरू नहीं हुआ
  • इस बीच सरकार बदल गई, उसने मियाद 18 महीने और बढ़ा दी
  • इस दौरान बिजली घर निर्माण लागत में 25-30 फीसदी बढ़ोतरी होने का अनुमान है जिसका बोझ आखिर में आम आदमी पर ही पड़ना है
  • सहमति पत्र वाले तरीके के बजाय प्रतिस्पर्धात्मक तरीका अपनाया जाता तो बिजली सस्ती पड़ती 
  • नौ में से चार बिजली कंपनियों के पास तो बिजली घर लगाने का कोई अनुभव नहीं है

सपा सरकार की बिजली कंपनियों पर इस मेहरबानी का खमियाजा आम जनता को कैसे भुगतना पड़ेगा अब जरा इस पर भी गौर करें. देशी कोयले की कीमत करीब तीन हजार रुपये प्रति टन है. एक यूनिट बिजली बनने में करीब आठ सौ ग्राम कोयला खर्च होता है. इस लिहाज से भारतीय कोयले से एक यूनिट बिजली बनाने में करीब ढाई रुपये का खर्च आता है. आयातित कोयले की कीमत करीब आठ हजार रुपये प्रति टन है. लिहाजा आयातित कोयले से एक यूनिट बिजली बनाने में करीब साढ़े छह रुपये का खर्च आएगा. आयातित कोयले की ढुलाई में भी अच्छा खासा कंपनियों को खर्च करना पड़ेगा क्योंकि चेन्नई हो चाहे मुंबई सभी बंदरगाह उत्तर प्रदेश से 1,500 से 2,000 किलोमीटर की दूरी पर हैं. जबकि भारतीय कोयला पड़ोसी राज्य बिहार या झारखंड से ही मंगाया जाता है जिस पर ढुलाई का खर्च भी कम आता है. इस हिसाब से सरकार को आयातित कोयले से बनने वाली बिजली देशी कोयले से बनने वाली बिजली से करीब तीन गुना अधिक महंगी पड़ेगी. आखिरकार इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर ही पड़ेगा.

निजी क्षेत्र से लगने वाले बिजली घरों की बिजली आखिर और कैसे महंगी होती है जो सीधे आम जनता को प्रभावित करती है? उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ के महासचिव ओम प्रकाश पांडे बताते हैं, ‘एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों के जमीन अधिग्रहण में सिर्फ सरकार को मदद करना होता है. बाकी कोयला, पानी व पर्यावरण का क्लीयरेंस कंपनी को खुद लेना होता है. आम तौर पर बिजली घर लगाने के लिए कंपनियों को अतिरिक्त खर्च नहीं करना चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं पाता.’ पांडे आगे बताते हैं कि कंपनी लगाने के नाम पर नीचे से ऊपर तक रुपये की जो बंदरबांट होती है वह करोड़ों में पहुंच जाती है जिसका कोई लेखा-जोखा नहीं होता.

देशी कोयले के मुकाबले आयातित कोयले से बनने वाली बिजली करीब तीन गुना अधिक महंगी पड़ेगी. इसका बोझ आखिरकार आम जनता को ही उठाना है

लिहाजा कंपनी लगने के बाद मालिकान सब जोड़ कर कंपनी लगाने का खर्च सरकार के पास पेश करते हैं जिसके हिसाब से बिजली का रेट तय होता है. कंपनी लगाने में जो लागत आएगी वह तथा 16 प्रतिशत रिटर्न आॅन कैपिटल इनवेस्टमेंट यानी निवेश पर मिलने वाले फायदे के आधार पर बिजली का रेट निर्धारित होता है. जानकार बताते हैं कि एमओयू के माध्यम से बिजली घर लगाने में सरकार बिजली की दर का निर्धारण नहीं कर सकती, ऐसे में बिजली की दर क्या हो, यह फैसला पूरी तरह से कंपनियों पर ही टिका होता है. उधर, प्रतिस्पर्धात्मक रूप से लगने वाले बिजली घरों में कंपनियों से अगले 25 साल तक की दरें मांगी जाती हैं. जिसकी दरें सबसे कम होती हैं, उसे ही काम करने का मौका दिया जाता है. 25 साल की दर इसलिए मांगी जाती है कि एक बिजली घर की उम्र 25 साल मानी गई है. इतना ही नहीं, प्रतिस्पर्धात्मक रूप से लगने वाले बिजली घरों के लिए पानी, कोयला, पर्यावरण क्लीयरेंस आदि सब कुछ सरकार को करके देना होता है. इस कारण कंपनी लगाने में भी काफी सहूलियत रहती है और बिजली का उत्पादन भी समय से होने लगता है. 

एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों का इतिहास टटोलने पर उम्मीदें कम ही जगती हैं. उदाहरण के लिए दादरी गैस परियोजना को ही लिया जाए. जून, 2005 में सपा सरकार ने ही दिल्ली के निकट दादरी में किसानों की बेशकीमती 2,500 एकड़ जमीन अंबानी समूह को कुल 7,400 मेगावाट का बिजली घर लगाने के लिए दी थी. योजना के प्रथम चरण में दादरी में 3,740 मेगावाट तथा दूसरे चरण में 3,660 मेगावाट का प्लांट लगना था. लेकिन अंबानी बंधुओं की आपसी लड़ाई के कारण प्लांट आज तक नहीं लग पाया. अनिल अंबानी के उक्त प्लांट को शुरू करने के लिए गैस चाहिए. केजी गैस बेसिन की लीज केंद्र सरकार ने मुकेश अंबानी को दी है. दोनों भाइयों की आपसी लड़ाई के कारण प्लांट को गैस ही उपलब्ध नहीं हो पा रही है. इसलिए सात साल बाद भी मौके पर काम शुरू नहीं हो सका है. इसके बावजूद किसानों की 2,500 एकड़ उपजाऊ जमीन आज भी दादरी प्रोजेक्ट के नाम पर अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली कंपनी के पास ही है. शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ‘यदि यही कंपनी प्रतिस्पर्धात्मक रूप से टेंडर आमंत्रित कर लगाई गई होती तो गैस आदि की व्यवस्था करना सरकार के जिम्मे होता और आज तक प्लांट शुरू हो गया होता. गैस का जो विवाद दोनों भाइयों के बीच कायम है सरकार उसका कोई न कोई हल ढूंढ़ कर प्लांट शुरू करने की पहल करती. दादरी प्लांट शुरू होने के बाद बिजली की जो समस्या आज प्रदेश के सामने है वह न होती.’ 

एमओयू के माध्यम से शुरू हो चुके रिलायंस समूह के रोजा बिजली घर का उदाहरण और भी दिलचस्प है. 2005 में इस प्लांट का भी एमओयू हुआ था जो चालू हो गया है. लेकिन समस्या यह है कि इसकी बिजली इतनी महंगी है कि बिजली खरीदने में सरकार की कमर ही टूट जाती है. रोजा बिजली घर से एक यूनिट बिजली की लागत करीब 5.34 रुपये आ रही है. जबकि ओबरा, पनकी, हरदुआगंज और परीक्शा बिजली घरों में एक यूनिट बिजली की लागत दो रुपये प्रति यूनिट ही है. इनमें से अनपरा की बिजली 1.20 रुपये की ही है. रोजा से महंगी बिजली खरीद के कारण उत्तर प्रदेश सरकार पर बिजली का 350 करोड़ रुपये बकाया हो गया है. बकाया भुगतान न होने के कारण चार जुलाई को कंपनी ने रोजा बिजली घर से उत्पादन ही बंद कर दिया. निजी क्षेत्र की कंपनी ने मनमानी करते हुए उस समय अपना उत्पादन बंद किया जिस समय प्रदेश में बिजली के लिए मारामारी थी क्योंकि इस समय गर्मी पूरे चरम पर थी और धान लगाने के लिए किसानों को सिंचाई की भी बहुत जरूरत थी. 

सहमति पत्र वाले रास्ते में सरकार बिजली की दर का निर्धारण नहीं कर सकती. यह फैसला पूरी तरह से बिजली घर लगाने वाली कंपनियों पर ही टिका होता है

बिजली खरीद पर नजर डालें तो केंद्रीय बिजली खरीद का औसत तीन रुपये प्रति यूनिट पड़ रहा है जबकि निजी क्षेत्र से 2011-12 में खरीदी गई बिजली का औसत 4.64 रुपये आया है. जिसमें से रोजा का औसत 5.34 रुपये आ रहा है. रोजा बिजली घर के उदाहरण से यह स्पष्ट है कि जो बात केंद्रीय बिजली नियामक आयोग ने कही है कि ओएमयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों की बिजली महंगी पड़ती है, वह सच है. अब तक बात हुई एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों पर सरकार की मेहरबानी की. अब अगर उन कंपनियों पर नजर डालें जिन्होंने बिजली घर लगाने के लिए सरकार से करार किया है तो और भी चौंकाने वाली बात सामने आती है. आॅल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के सेक्रेटरी जनरल शैलेंद्र दुबे का आरोप है कि इनमें से चार कंपनियों के पास देश के किसी भी राज्य में बिजली घर लगाने का कोई तजुर्बा नहीं है.

यूनीटेक मशींस लिमिटेड, पारिख एल्यूमिनैक्स, वेल्सपन पावर लिमिटेड और क्रिएटिव थर्मोलाइट प्राइवेट लिमिटेड ने बिजली घर लगाने का काम कभी नहीं किया. दो बिजलीघरों का काम बजाज हिंदुस्तान लिमिटेड के पास है. इस कंपनी ने उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में छोटे प्लांट ही लगाए हैं. बड़े प्लांट का अनुभव इसके पास भी नहीं है. इन कंपनियों में टोरेंट पावर लिमिटेड और लैन्को के पास ही बिजली घर लगाने का अनुभव है. दुबे सवाल करते हैं, ‘जब सरकार और बिजली विभाग के भी बड़े अधिकारियों को ये बात अच्छी तरह मालूम है कि कुछ कंपनियों के पास बिजली घर लगाने का अनुभव एकदम नहीं है तो आखिर उन्हें काम किस लिहाज से दिया गया? अनुभवहीन कंपनियों को काम देना ही सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाता है.’ बिजली उत्पादन निगम के पूर्व सीएमडी अभय शरण कपूर भी एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों पर सवालिया निशान लगाते हैं. कपूर कहते हैं, ‘प्रतिस्पर्धात्मक रूप से टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों की बिजली का रेट वाजिब मिल जाता है जबकि एमओयू में रेट को लेकर कंपनियां पूरी तरह ईमानदारी नहीं बरतती हैं.’ 

उधर, उत्तर प्रदेश ऊर्जा निगम के सीएमडी अवनीश अवस्थी किसी गड़बड़ी से इनकार करते हैं.  वे कहते हैं, ‘जिन कंपनियों से एमओयू हुआ, उन्हें 18 महीने का समय कोल लिंकेज की व्यवस्था करने के लिए दिया गया है. इसके अतिरिक्त कोयला आयात करने की जो बात सरकार ने कही है वह केंद्र सरकार के निर्देश पर हुआ है क्योंकि केंद्र ने ही कहा है कि कोयले की कुछ व्यवस्था सुनिश्चित की जाए.’जनता की जेब पर कम भार डालने के लिए एमओयू के बजाय प्रतिस्पर्धात्मक तरीका क्यों नहीं अपनाया गया, यह पूछने पर अवस्थी ने कहा, ‘सारा काम एमओयू से ही नहीं किया जा रहा. 6,000 मेगावाट बिजली बनाने के लिए टेंडर प्रक्रिया भी अपनाई जा रही है ताकि आम जनता पर महंगी बिजली का बोझ न पड़े.’

कश्मीर प्रिंसेज : चाऊ एन लाई

चीन के राष्ट्र प्रमुख को मारने की साजिश जिसका शिकार एक भारतीय विमान बना.

कश्मीर प्रिंसेज एयर इंडिया का एक चार्टेड एयरक्राफ्ट था जो 1955 में एक बम धमाके में क्रैश हो गया था. यह उस दशक की बात है जब पूरी दुनिया साम्यवादी और गैरसाम्यवादी खेमों में बंट रही थी. और भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू एशिया व अफ्रीका के नवस्वतंत्र देशों को दोनों खेमों की खींचतान से बचाने के लिए इंडोनेशिया के बांडुंग में एक सम्मेलन आयोजित करवा रहे थे. यह सम्मेलन अप्रैल, 1955 में आयोजित होना था.

नेहरू चाहते थे कि इस सम्मेलन में चीन के राष्ट्र प्रमुख चाऊ एन लाई भी शामिल हों और उन्होंने इसके लिए चाऊ को सहमत भी कर लिया. लेकिन अप्रैल में इस सम्मेलन के शुरू होने के ठीक तीन दिन पहले  एक ऐसी घटना हुई जिसने यह साबित भी कर दिया कि इस सम्मेलन के खिलाफ कुछ देशों में विरोध पनप रहा है.

चाऊ एन लाई को बांडुंग पहुंचाने के लिए भारत से एक विशेष चार्टेड विमान कश्मीर प्रिंसेज हांगकांग भेजा गया था. लेकिन ऐन मौके पर चीन के राष्ट्र प्रमुख ने अपनी योजना बदल दी. यह विमान उनके बिना ही कुछ विदेशी पत्रकारों और भारतीय क्रू के सदस्यों के साथ बांडुंग रवाना हो गया. लेकिन इससे पहले कि कश्मीर प्रिंसेज वहां पहुंचता बीच हवाई मार्ग में ही उसमें एक बम धमाका हुआ और विमान क्रैश हो गया. इसमें सवार तकरीबन बीस लोग मारे गए. 

इस घटना के पीछे तुरंत साजिश की आशंका जताई जाने लगी. चीन की सरकारी एजेंसियों ने दावा किया कि यह चाऊ एन लाई को मारने की साजिश थी और इसके पीछे पश्चिमी देश हैं. इंडोनेशिया की जांच एजेंसियों ने इस मामले की जांच की और उन्हें विमान के मलबे में एक अमेरिकी बम के अवशेष मिले. हालांकि वे यह साबित नहीं कर पाए कि इस घटना के पीछे अमेरिकी एजेंसियों का हाथ है. यह भारतीय विमान था और यह संभावना भी जताई जा रही थी कि इस साजिश में नई दिल्ली के अमेरिकी एजेंट शामिल हैं. इसलिए भारतीय जांच एजेंसियों ने भी इस मामले की जांच की. हालांकि यह जांच कभी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच पाई. इन घटनाओं के बाद भी आखिरकार बांडुंग सम्मेलन आयोजित हुआ जो आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की बुनियाद बना.

-पवन वर्मा

मुख्यमंत्री राहुल गांधी !

खबर थी कि राहुल गांधी पार्टी या/और सरकार में बड़ी भूमिका निभाना चाहते हैं. बड़ी खबर थी कि राहुल गांधी बोले. एक तो वे बोलते ही कम हैं और उत्तर प्रदेश की हार के बाद प्रेस वालों से शायद यह उनकी पहली बातचीत थी.

पिछले आठ साल की राहुल गांधी की उपलब्धियों के बारे में पूछें तो जवाब मिलता है कि उन्होंने युवा कांग्रेस और एनएसयूआई का जबर्दस्त लोकतंत्रीकरण कर उन्हें सुधार दिया है. मगर मनचाहे पद पर बैठ जाने की इच्छा जाहिर करते ही ऐसा हो जाना किस तरह के लोकतंत्रीकरण की श्रेणी में आता है? कहा जा सकता है कि समूची कांग्रेस पार्टी की इच्छा थी कि राहुल गांधी कांग्रेस में आएं और इतने सारे लोगों की इच्छा का आदर करना सच्चे लोकतांत्रिक होने की ही तो निशानी है. मगर समूची कांग्रेस तो पिछले आठ साल से ही उन्हें न जाने क्या-क्या करने-बनने के लिए कहती रही है.

राहुल ने संगठन में लोकतांत्रिक और दूसरे सुधारों के लिए सबसे ज्यादा काम उत्तर प्रदेश में किया है. वहां के विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीनों पहले हुई पार्टी की फजीहत हम सबके सामने है. उनके किए सांगठनिक सुधारों की हालत यहां यह थी कि पार्टी को ढूंढ़े से भी ढंग के प्रत्याशी तक नहीं मिल रहे थे. उसने तमाम महत्वपूर्ण जगहों पर दूसरी पार्टियों, खासकर सपा से आए नेताओं को खड़ा किया था. पार्टी की हालत कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार के गढ़ सुल्तानपुर-रायबरेली में ही किसी को मुंह दिखाने वाली नहीं थी. हाल ही में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में भी पार्टी का उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो गया. अब इसके बाद क्या उनकी संगठन को बनाने या संगठन की उनके द्वारा बनने की क्षमताओं के बारे में कुछ और जानना बाकी रह जाता है. अब तो केवल उनकी प्रशासनिक क्षमताओं के बारे में जानना बाकी बचा है, जो हो सकता है कि जल्दी ही हो जाए. 

फिलहाल यूपीए सरकार की जिस तरह की हालत है उसमें कैसे भी करिश्माई व्यक्तित्व से आते ही चमत्कार की आशा करना व्यर्थ है. राहुल वैसे भी घोषित तौर पर पहले जानने-सीखने और फिर कुछ करने की बात करते रहे हैं. तो क्या यह अच्छा नहीं होता कि वे केंद्र सरकार में शामिल होकर कुछ अजीबोगरीब मुश्किलें खड़ी करने के बजाय किसी कांग्रेस शासित प्रदेश – जैसे दिल्ली – के मुख्यमंत्री बनते, वहां के हालात में चमत्कारिक बदलाव लाते और फिर केंद्र सरकार में कुछ भी बनने के स्वाभाविक अधिकारी हो जाते.

जैसी हालत आज कांग्रेस पार्टी की है उसमें पार्टी में ऐसे बड़े बदलाव लाना मुश्किल है, जो किसी भी चुनावी परिणाम को सर के बल खड़ा कर दें. मगर किसी भी प्रदेश में बहुमत की हालत में अपनी प्रशासनिक क्षमता – अगर है तो – साबित करना कहीं आसान साबित हो सकता है. वह भी तब जब केंद्र की सरकार आपकी एक-एक इच्छा पर 10-10 बार बारी जाने को तैयार हो. इसके बाद बड़े फलक पर आपको आजमाने की लोगों की इच्छा आपके लिए संभावनाओं के बुलंद दरवाजे खोल सकती है. 

'जनता को आगे बढ़कर व्यवस्था अपने हाथ में लेनी होगी'

टीम अन्ना के अहम सदस्य प्रशांत भूषण प्रखर जैन को बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में अरविंद केजरीवाल की भूमिका हमेशा से बड़ी रही है इसलिए वे अनशन पर बैठे हैं. इसमें टकराव जैसी कोई बात नहीं है

पिछली बार आपकी मांग सिर्फ लोकपाल तक सीमित थी. इस बार आप एसआईटी और मंत्रियों के खिलाफ जांच की मांग भी कर रहे हैं. आपने अपना दायरा और फैला लिया है. 

बिल्कुल, हमने लक्ष्य बदल दिया है. हम जन लोकपाल चाहते हैं. यह आंदोलन लोकपाल की जरूरत को रेखांकित करता है. हालांकि हमें पता है कि वे इतनी आसानी से लोकपाल नहीं लाएंगे.  

क्या आपके पास ऐसी कोई पुख्ता जानकारी है कि सरकार लोकपाल बिल हाल-फिलहाल नहीं लाने वाली?
हम 15 मंत्रियों के खिलाफ जांच चाहते हैं. इस देश के भविष्य के लिए यह जरूरी है. इन मंत्रियों को हटाए बिना लोकपाल नहीं मिलेगा हमें.

क्या ये वही मंत्री हैं जिन्होंने लोकसभा में लोकपाल बिल पेश किया था और इसे कानूनी शक्ल देने की कोशिश की थी?
उन लोगों ने संसद में जो बिल पेश किया था वह भ्रष्ट जनसेवकों को जेल भेजने के बजाय उन्हें सुरक्षा प्रदान करने वाला था.
इस बार अरविंद केजरीवाल बड़ी भूमिका तलाश रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि अन्ना अरविंद के ही इशारे पर काम करते हैं.
केजरीवाल शुरुआत से ही इस पूरे आंदोलन के सूत्रधार रहे हैं. उनकी हमेशा से बड़ी भूमिका रही है. इस बार हमने अन्ना के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उनसे उपवास न रखने का अनुरोध किया था. हालांकि उन्होंने चार दिन बाद से उपवास शुरू करने पर जोर दिया.

क्या एनसीपीआरआई और अरुणा रॉय जैसे दूसरे संगठनों और सिविल सोसाइटी के लोगों को साथ लाने की कोशिश हुई है?
हम एक-एक एनजीओ के पास तो जा नहीं सकते हैं लेकिन हमने अपना संदेश सब तक पहुंचाने की कोशिश जरूर की है. यह एक साथ मिलकर काम करने का मामला नहीं है लेकिन आप देखेंगे कि वे लोग भी हमारा समर्थन कर रहे हैं.

पिछले छह महीने के दौरान, लोकसभा में बिल पास हो जाने के बाद आप लोगों ने सरकार की आलोचना कम कर दी है. क्या यूपीए के प्रति आपके रुख में नरमी आ गई है?
हमने सरकार के 15 मंत्रियों को भ्रष्ट बता कर सरकार के प्रति अपना कठोर रवैया पहले ही जाहिर कर दिया है. हम सरकार में फैले भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रहे हैं.  क्या मीडिया के हद से ज्यादा हस्तक्षेप ने आम लोगों में लोकपाल का आकर्षण कम किया है? क्या इसी वजह से कम लोग आ रहे हैं? ऐसा नहीं है. धीरे-धीरे लोगों की समझ में आने लगा है कि सरकार लोकपाल लाना ही नहीं चाहती. लोगों को समझ आने लगा है कि अगर उन्होंने आगे बढ़कर चीजों को अपने हाथ में नहीं लिया, अगर वे खड़े नहीं हुए तो देश गर्त में चला जाएगा.

पिछले एक साल के अनुभवों से आपने जो सीखा है उससे अलग अब क्या करेंगे ताकि लोकपाल का सपना वास्तविकता में बदल सके?
इस बार हम नई बात कह रहे हैं कि मंत्रिमंडल का बड़ा हिस्सा भ्रष्ट है. इनसे बचने के लिए हमें लोकपाल की जरूरत है. इसी वजह से सरकार लोकपाल लाने में आनाकानी कर रही है.

यही बात टीम अन्ना के बारे में कही जा सकती है. पहले एक विस्तृत कमेटी हुआ करती थी. अब एक कोर कमेटी है. फैसले लेने का अधिकार कुछेक सदस्यों के हाथ में सिमट गया है. इस वजह से कई सदस्य साथ छोड़ चुके हैं.
कई नहीं, कुछेक लोग गए हैं. फैसला तो हमेशा कुछ लोग ही लेते हैं; इसके बाद ही कोर कमेटी इस पर ठप्पा लगाती है. टीम के बीच इसे लेकर कोई मतभेद नहीं है.

आंदोलन से बाबा रामदेव के जुड़ाव का क्या अर्थ है?
हमने हमेशा कहा है कि हम काले धन के खिलाफ चल रहे अभियान का समर्थन करते हैं. बाबा रामदेव भी जन लोकपाल आंदोलन का समर्थन करते हैं.