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हम नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर निकलने ही नहीं देंगे’

नरेंद्र मोदी को भाजपा और मीडिया का एक वर्ग भले ही भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर रहा हो, लेकिन कभी उनके साथ रहे नेता ही उन्हें गुजरात की सत्ता से भी बेदखल करने के अभियान में लगे हुए हैं. इस अभियान की अगुवाई कर रहे महागुजरात जनता पार्टी  के अध्यक्ष और मोदी सरकार में गृह मंत्री रहे गोर्धन जडाफिया हिमांशु शेखर को बता रहे हैं कि मोदी के साथ तो संघ की गुजरात इकाई भी नहीं है.

क्या आपको लगता है कि गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनावों को आपकी पार्टी त्रिकोणीय बनाने में कामयाब होगी?

हम तो इसी भरोसे के साथ काम कर रहे हैं. पिछले चुनाव में हमारी पार्टी सिर्फ चार महीने पुरानी थी. इस बार तो पांच साल पुरानी है. इस बार हमारा साथ गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल भी दे रहे हैं. अन्य कई ऐसे नेता हमारे साथ हैं जिनकी राज्य की राजनीति में अपनी एक पहचान है. मैं तीसरे कोण के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, चुनाव के नतीजे खुद इसे साबित करेंगे.

केशुभाई पटेल तो अब भी भाजपा के साथ बने हुए हैं.

आप सही कह रहे हैं. वे अभी तक तो भाजपा में हैं लेकिन वे महागुजरात जनता पार्टी के कार्यक्रमों में लगातार शामिल हो रहे हैं. वे हर कदम पर हमारे साथ हैं. उन्होंने शीर्ष नेतृत्व को भी पूरी बात बता रखी है. आने वाले दिनों में स्थिति और साफ होगी.

भाजपा आरोप लगा रही है कि आप मोदी का खेल खराब करने के लिए कांग्रेस के समर्थन से गुजरात में काम कर रहे हैं. 

यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद है. भाजपा से कहीं अधिक हमारी दूरी कांग्रेस से है. कांग्रेस के समर्थन से काम करने का सवाल ही नहीं उठता.

चुनाव से पहले या चुनाव के बाद अगर कांग्रेस आपको गठबंधन करने का प्रस्ताव देती है तो आप क्या करेंगे?

कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का सवाल ही नहीं पैदा होता. कांग्रेस की सरकार को भी राज्य की जनता ने मौका दिया, लेकिन उसने भी यहां के लोगों को ठगने का ही काम किया. इससे भी बड़ी बात यह है कि पिछले दस साल से मोदी ने जिस तरह से विकास का हौवा खड़ा किया उसका पर्दाफाश कांग्रेस ने एक जिम्मेदार विपक्ष की तरह नहीं किया. विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई, इससे जनता निराश है.

मोदी तो विकास के लंबे-चौड़े दावे कर रहे हैं. ऐसे में राज्य की जनता आप जैसे किसी नए विकल्प पर भरोसा क्यों करेगी?

मोदी जिस विकास की बात कर रहे हैं वह सिर्फ मीडिया में है. जमीनी स्तर पर जाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि कितना विकास हुआ है. जिस विकास की बात नरेंद्र मोदी कर रहे हैं उसकी भारी कीमत राज्य की जनता को चुकानी पड़ी है. गुजरात की जनता मोदी के इन दावों की हकीकत समझ गई है, इसलिए आज लोग खुद नया विकल्प तलाश रहे हैं.

गुजरात भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि मोदी को जिताओगे तो उनके दिल्ली जाने का रास्ता साफ होगा और गुजरात को पहला प्रधानमंत्री मिलेगा. इससे आप कैसे निपटेंगे?

राज्य की जनता ने देख लिया है कि मुख्यमंत्री के तौर पर उनके दावे और जमीनी सच्चाइयों में कितना फर्क है. हम राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लगातार जा रहे हैं और लोगों से जिस तरह का समर्थन मिल रहा है उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि हम मोदी को गुजरात से बाहर निकलने ही नहीं देंगे.

भाजपा के पास मोदी के तौर पर मुख्यमंत्री का एक मजबूत उम्मीदवार है. क्या आपके पास कोई मजबूत और विश्वसनीय चेहरा है जिस पर जनता भरोसा कर सके?

अगर हम चुनाव जीतने में सफल रहते हैं और हमारे पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या आती है तो कोई न कोई नया और मजबूत नेतृत्व खुद ही लोगों के सामने आ जाएगा. लोग महागुजरात जनता पार्टी पर इसलिए भरोसा करेंगे क्योंकि नरेंद्र मोदी ने पिछले दस साल में लोगों को भरोसा बार-बार तोड़ा है.

आप अब भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाते हैं. तो क्या आपके इस मोदी विरोधी अभियान को संघ का समर्थन हासिल है? 

मैं संघ का स्वयंसेवक हूं और जो भी कर रहा हूं उससे संघ के अधिकारियों को मैंने वाकिफ कराया है. यहां गुजरात में तो संघ की इकाई भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ हमारा समर्थन करती है.

लेकिन संघ नेतृत्व तो मोदी का हिमायती  है.

पहले भी ऐसा मौका आया है जब संघ नेतृत्व और राज्य इकाई ने अलग रवैया अपनाया है. इस बार मैंने और केशुभाई पटेल ने संघ के सभी बड़े अधिकारियों को मोदी की कार्यशैली और अपनी योजना के बारे में बता रखा है.

अंग्रेजी हटाओ आंदोलनः लोहिया

ऐसा आंदोलन जो दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी आंदोलन के लिए एक उत्प्रेरक बन गया.

भारत में साठ के दशक में शुरू हुआ अंग्रेजी हटाओ एक ऐसा आंदोलन था जिसने भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव किया. प्रख्यात समाजवादी डॉ राममनोहर लोहिया (दाएं) इस आंदोलन के प्रणेता थे. वे चाहते थे कि राजकाज के लिए अंग्रेजी की जगह पूर्ण रूप से भारतीय भाषाओं को अपनाया जाए. वैसे भारतीय संविधान जब लागू हुआ तब उसमें भी यह व्यवस्था दी गई थी कि 1965 तक सुविधा के हिसाब से अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन उसके बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया जाएगा.

इससे पहले कि संवैधानिक समयसीमा पूरी होती, लोहिया ने 1957 में अंग्रेजी हटाओ मुहिम को सक्रिय आंदोलन में बदल दिया. वे पूरे भारत में इस आंदोलन का प्रचार करने लगे. लेकिन इस दौरान दक्षिण भारत के राज्यों खासकर तमिलनाडु में आंदोलन का विरोध होने लगा. यहां लोगों को लग रहा था कि अंग्रेजी हटाने की आड़ में उनके ऊपर हिंदी थोपे जाने की कोशिश हो रही है. इसका असर यह हुआ कि राज्य में अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके पार्टी ने हिंदी विरोधी आंदोलन को और तेज कर दिया. 1962-63 में जनसंघ भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गया.

इसके बाद कुछ शहरों में आंदोलन का हिंसक रूप भी देखने को मिला. कई जगह दुकानों के ऊपर लिखे अंग्रेजी के साइनबोर्ड तोड़े जाने लगे. 1965 की समयसीमा नजदीक होने की वजह से तमिलनाडु में भी हिंदी विरोधी आंदोलन काफी आक्रामक हो गया. यहां दर्जनों छात्रों ने आत्मदाह कर लिया. इस आंदोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने 1963 में संसद में राजभाषा कानून पारित करवाया. इसमें प्रावधान किया गया कि 1965 के बाद भी हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का इस्तेमाल राजकाज में किया जा सकता है.

सरकार के एक सर्कुलर के कारण फिर भी हिंदी की वरीयता संबंधी कुछ नियम बने रहे फलस्वरूप डीएमके का आंदोलन चलता रहा. इसका एक बड़ा असर यह हुआ कि आजादी के बाद से तमिलनाडु में शासन कर रही कांग्रेस 1967 में विधानसभा चुनाव हार गई और फिर कभी पार्टी को राज्य में उबरने का मौका नहीं मिला. इसी साल राजभाषा कानून में एक और संशोधन हुआ जिसके तहत अंग्रेजी को हिंदी के साथ अनिश्चित काल के लिए इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई. कुछ जगहों पर हिंदी की अनिवार्यता खत्म कर दी गई.

-पवन वर्मा

 

 

मर्ज कुछ, दवा कुछ

उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले में एक गांव है, राजपुरा. गांव में कुछ बड़े किसान हैं और बाकी बंगाली शरणार्थी या उत्तर प्रदेश से आए खेतिहर मजदूर. गदरपुर नाम के एक कस्बे के पास बसे इस गांव के कुल 800 वोटरों में से आधे भूमिहीन हैं. इसी गांव के नीलूबल्लभ को 28 सितंबर, 2005 को राज्य पुलिस ने माओवादी बताते हुए गिरफ्तार किया था. उनके साथ दो अन्य व्यक्तियों की भी गिरफ्तारी हुई थी. पुलिस  के अनुसार उस दिन सात माओवादी पास के राधाकांतपुर गांव के सूदखोर कोकन गोलदार की हत्या करने आए थे जिनमें चार गोलीबारी और मुठभेड़ के बाद भाग गए थे. 

नीलू अकेले नहीं थे जिन पर उस दौर में माओवादी होने का आरोप लगा था. तब इस आरोप में बहुत-से लोगों की गिरफ्तारियां हुई थीं. दरअसल उत्तराखंड का उधमसिंह नगर जिला नेपाल की सीमा से लगा है. उन दिनों नेपाल में माओवादी संघर्ष सत्ता हासिल करने के करीब था. इन गिरफ्तारियों को तब पुलिस और राज्य सरकार ने माओवाद को काबू में करने की दिशा में एक बड़ी सफलता बताया था. 

लेकिन ऐसे एक मामले में बीती 14 जून को उधमसिंह नगर की एक त्वरित अदालत का जो फैसला आया है उससे पुलिस द्वारा तब किए गए बड़े दावों की पोल खुलती दिख रही है. इससे यह भी लगता है कि जिन मामलों को पुलिस राष्ट्र के खिलाफ युद्ध बता रही थी वे वास्तव में उसने अपनी पीठ थपथपाने के लिए खुद तैयार किए थे. बाकी मामलों पर भी गौर करें तो  साफ लगता है कि पिछड़े इलाकों का विकास करने के बजाय सरकार सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई करके माओवाद से लड़ना चाहती है.  

50 साल के नीलूबल्लभ बंगाली भूमिहीन शरणार्थी हैं और एक अधबने घर में अपनी पत्नी, तीन बेटों और विधवा मां के साथ रहते हैं. परिवार की रोजी-रोटी बड़े किसानों के खेतों या पास की फैक्टरियों में मजदूरी से चलती है. वे बताते हैं कि पुलिस ने उन्हें 25 सितंबर को ही गदरपुर बाजार जाते हुए उठा लिया था. तीन दिन तक अलग-अलग थानों में अमानवीय यातना और पूछताछ के बाद 28 सितंबर को दिनेशपुर थाने की पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी दिखाई. पुलिस ने इस मुठभेड़ में वांछित बताए गए माओवादियों के जोनल कमांडर, अनिल चौड़कोटी और पत्रकार जीवन चंद्र को भी पकड़ा. 

पर सवाल यह है कि राज्य की कितनी सीटों पर खुद मुख्यमंत्री चुनाव लड़ेंगे और और कितनी विधानसभा सीटें सितारगंज हो पाएंगी.

नीलू बताते हैं कि गिरफ्तारी से पहले उन्हें माओवादी आंदोलन के बारे में कुछ भी पता नहीं था. वे तब तक चौड़कोटी को भी नहीं जानते थे. जीवन चंद्र बताते हैं कि वे नैनीताल जिले के रामनगर कस्बे में होने वाले एक सम्मेलन के लिए जनसमर्थन जुटाने गदरपुर गए थे जहां से उन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. जीवन ने उधमसिंह नगर पुलिस द्वारा की जा रही अवैध उगाही पर अपने अखबार का विशेष अंक निकाला था. उनके अनुसार पुलिस इसीलिए उन्हें सबक देना चाहती थी.

तराई कहे जाने वाले उत्तराखंड के इस हिस्से में हजारों बीघा सीलिंग की भूमि ताकतवर किसानों और भूमाफियाओं के कब्जे में है. यहीं नीलू जैसे एक लाख से अधिक बंगाली शरणार्थी और अन्य भूमिहीन भी हैं. भूमिहीन मजदूर नीलू का दोष इतना था कि वे ‘मजदूर किसान संघर्ष समिति’ (एमकेएसएस) के बैनर तले 1998 से होने वाले गरीबों के हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे. इस संगठन के अध्यक्ष उनके गांव के पास के कस्बे दिनेशपुर के मास्टर प्रताप सिंह थे. 28 सितंबर की मुठभेड़ से एक दिन पहले पुलिस ने सिंह के घर पर छापा मारा था. उनके न मिलने पर उनके बेटे और पत्रकार रूपेश कुमार को हिरासत में लिया गया था. पत्रकारों के तीखे विरोध के कारण पुलिस ने रूपेश को तो छोड़ दिया था, लेकिन अन्य तीन को माओवादी बताते हुए इनकी गिरफ्तारी को बड़ी उपलब्धि बताया था.  

इससे करीब एक साल पहले 29 अगस्त, 2004 को उधमसिंह नगर में थाना नानकमत्ता पुलिस ने भी रंसाली नाम के एक जंगल से पांच कथित माओवादियों को गिरफ्तार किया था. इनमें हयात राम, उनका बेटा प्रकाश और रमेश राम शामिल थे जो नैनीताल जिले में पड़ने वाले हंसपुर खत्ते के निवासी थे. खत्ता तराई के बीहड़ जंगलों में बसे छोटे-छोटे गांवों को कहते हैं. इनमें पशुपालक समुदाय रहते हैं. चौथा उनका एक रिश्तेदार कैलाश था. गिरफ्तार लोगों में पांचवां शख्स कल्याण सिंह, हंसपुर से लगे उधमसिंह नगर के सितारगंज क्षेत्र का रहने वाला था. कल्याण सिंह  तराई में तब तक हुए हर भूआंदोलन में सक्रिय रहे थे. बाद में इसी मामले में नैनीताल जिले के दो युवकों हरीश राम और संतोष राम को भी गिरफ्तार किया गया. इसके बाद ईश्वर चंद्र उर्फ जूनियर और गोपाल भट्ट नाम के दो व्यक्तियों की भी गिरफ्तारी हुई. 2005 में दिनेशपुर मुठभेड़ में गिरफ्तार अनिल चौड़कोटी भी इस मामले में आरोपित बने. सुनवाई के दौरान 22 साल के कैलाश राम और 70 साल के कल्याण सिंह की मृत्यु हो गई. हंसपुर मामले में गिरफ्तार सात अभियुक्त अनुसूचित जाति के भूमिहीन और गरीब कृषि मजदूर थे. 

लेकिन हंसपुर खत्ता मामले की सुनवाई के दौरान उठे बहुत-से सवालों ने पुलिस की किरकिरी करवाई. जैसे घटना स्थल तक वाहन नहीं जा सकते थे. लेकिन एफआईआर के अनुसार रंसाली के जंगल में ट्रैक्टरों की आवाज और पुलिस फोर्स को देखकर मीटिंग कर रहे पांच संदिग्ध लोग जंगल की ओर भागने लगे. इस हाईप्रोफाइल मामले में पुलिस के ‘गुड वर्क’ की पोल तब खुल गई जब जूनियर की गिरफ्तारी के समय उनके पास पकड़े गए ओर उसी दिन सील किए गए सामान को अदालत के सामने खोला गया. 20 सितंबर को गिरफ्तारी के दिन सील किए गए इस ’अपत्तिजनक और राष्ट्रद्रोही‘ साहित्य को अदालत के सामने खोलने पर पता चला कि यह सामान सील किए जाने के दो महीने बाद के यानी 23 नवंबर, 2004 के अखबारों पर लपेटा गया था. इस मामले में 23 नवंबर, 2004 को ही पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की थी. साफ है कि इस हाईप्रोफाइल मामले में सारी सावधानी बरतने का दावा करने वाली पुलिस ने  चार्जशीट दाखिल करने के दिन ही यह सामग्री कहीं और से लाकर सील की. अदालत ने 20 सितंबर को हुई प्रतिबंधित और राष्ट्रद्रोही साहित्य की बरामदगी को बिल्कुल फर्जी माना. पुलिसकर्मियों ने जिरह में माना कि उन्हें पता नहीं था कि जो साहित्य जूनियर के पास मिला वह केंद्र या राज्य सरकार द्वारा प्रतिबंधित है या नहीं. नतीजा यह हुआ कि हंसपुर खत्ता मामले में अदालत ने सभी आरोपितों को बरी कर दिया.  

साफ लगता है कि जिन मामलों को पुलिस राष्ट्र के खिलाफ युद्ध बता रही थी वे वास्तव में उसने अपनी पीठ थपथपाने के लिए खुद तैयार किए थे

उधर, राधाकांतपुर मुठभेड़ का मामला अदालत में गवाही के स्तर पर है. कानून के जानकार इसे भी कमजोर और पुलिस द्वारा बनाया गया मामला बता रहे हैं. इस मामले में जिस स्थान पर मुठभेड़ और गोलाबारी वाली घटना बताई गई है वह भीड़-भाड़  वाला इलाका है. लेकिन आस-पास किसी को उस मुठभेड़ का पता नहीं चला. दिन दहाड़े गोलियां चलने, आतंकियों के भागने और पुलिस के कांबिंग करने के बाद आस-पास के लोगों को घटना का पता न चले, यह बात हजम नहीं होती. 

उधर, हंसपुर खत्ता मामले में शामिल भूमिहीन मजदूर-किसानों और युवकों के इन मामले में जमानत होने की संभावना बनते ही पुलिस ने इनमें से अधिकांश पर उत्तराखंड में अलग-अलग जिलों में और मुकदमे दर्ज कर दिए. आठवीं पास हरीश और उसके गांव के अनपढ़ संतोष राम दोनों गरीब भूमिहीन कृषि श्रमिक हैं. इन दोनों पर हंसपुर के अलावा अल्मोड़ा, चम्पावत और हल्द्वानी में मुकदमे दर्ज किए गए. ये दोनों गरीब लगभग साढ़े छह साल जेल में रहे. हरीश के घर में एक बूढ़े पिता और एक छोटा नाबालिग भाई है. वह बताता है, ‘हम दोनों का कोई पूछने वाला नहीं था, इसलिए हमें फंसाया गया.’ हरीश फिलहाल हल्द्वानी में एक होटल में काम करता है. उसे अब भी पता नहीं कि जिस माओवाद के कारण वह साढ़े छह साल जेल में रहा वह वास्तव में है क्या बला.

हंसपुर खत्ते मामले में 28 वर्षीय जूनियर उर्फ ईश्वर चंद्र को सबसे पहले जमानत मिली थी. वे बताते हैं कि जमानत पर छूटने के बाद पुलिस के दबाव के चलते उन्हें कई बार मकान बदलना पड़ा. उनके मुताबिक पुलिस के दबाव में उन्हें 5,000 रुपये महीने पगार वाली नौकरी से भी निकाल दिया गया. वे अब किसी तरह जिंदगी को फिर से सही ढर्रे पर लाने की कोशिश में हैं.  प्रकाश राम और उसके पिता हयात राम दो साल जेल में रहे. प्रकाश अब सितारगंज में फैक्टरी मजदूर हैं. 

माओवाद के नाम पर तीसरे और महत्वपूर्ण मामले में 22 दिसंबर, 2007 को पत्रकार प्रशांत राही को गिरफ्तार किया गया था. उनकी गिरफ्तारी हंसपुर खत्ते के पास से दिखाई गई थी. पुलिस का आरोप था कि उन्होंने अपने माओवादी साथियों के साथ मिलकर गिरफ्तारी के तीन महीने पहले हंसपुर खत्ता क्षेत्र में प्रशिक्षण शिविर चलाया था. लेकिन जमानत पर छूटने के बाद राही ने बताया था कि उन्हें 17 दिसंबर को राजधानी देहरादून के भीड़-भाड़ वाले इलाके धर्मपुर से गिरफ्तार किया गया था. देहरादून से पकड़ने के पांच दिन बाद पुलिस ने राही को हंसपुर खत्ते के पास से गिरफ्तार दिखाया. राही ने पुलिस पर आरोप लगाए कि उन्हें हिरासत में लेने के बाद पुलिस उन्हें गाड़ी में नकाब डाल कर अज्ञात स्थानों पर ले गई और उन्हें यातनाएं दी गईं. पत्रकार राही की उत्तराखंड में हुए कई जन आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी रही थी. बाद में उनकी पत्नी चंद्रकला को भी इसी मामले में गिरफ्तार किया गया. दोनों फिलहाल जमानत पर हैं. 

इसी मामले में फरवरी, 2008 में गोपाल भट्ट और दिनेश पांडे की भी गिरफ्तारी की गई. छात्र आंदोलनों में काफी सक्रिय रहे भट्ट को हंसपुर खत्ता, दिनेशपुर और प्रशांत राही मामले के अलावा बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में भी एक मामले में आरोपित बनाया गया है. वे भी साढ़े तीन साल जेल में रहे. दिनेश पांडे के मुताबिक उन्हें उनके एडवोकेट चाचा और भाई के चैंबर से पूछताछ के बहाने ले जाया गया और अगले दिन ध्यानपुर के जंगलों से गिरफ्तार दिखाया गया.  

छात्र संगठनों में सक्रिय रहे अनिल चौड़कोटी अलग-अलग मामलों में साढ़े छह साल जेल में रहने के बाद जमानत पर छूट पाए हैं.  हंसपुर खत्ता अल्मोड़ा और चंपावत मामले में बरी होने के बाद अब उन्हें पूर्वी चंपारण जिले की माओवादी घटनाओं में शामिल दिखाते हुए अभियुक्त बनाया गया है. अल्मोड़ा से साप्ताहिक अखबार निकालने वाले और चौड़कोटी के साथ गिरफ्तार किए गए जीवन चंद्र भी साढ़े तीन साल जेल में रहे. जमानत के बाद फिर अखबार निकालने पर पुलिस ने जीवन के माओवादी गतिविधियों में फिर सक्रिय होने की दलील के साथ उच्च न्यायालय  से उनकी जमानत निरस्त कराने का निवेदन किया था, लेकिन अदालत ने यह तर्क नकार दिया. 

आज तक उत्तराखंड में माओवादी या नक्सली हिंसा का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है. लेकिन माओवाद के नाम पर छह मुकदमे दर्ज किए गए हैं. इन मुकदमों में आठ भूमिहीन कृषि मजदूरों के अलावा अन्य छह को घुमा-फिरा कर अभियुक्त बनाया गया है. इनमें से हंसपुर खत्ता, अल्मोड़ा व चंपावत मामलों में सभी अभियुक्त बरी हो गए हैं. इन सभी मामलों को न्यायालय में लड़ने वाली राजनैतिक बंदी रिहाई समिति के सदस्य पान सिंह बोरा कहते हैं, ‘किसी विचारधारा से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन उससे सहमति रखने के नाम पर और  उसका साहित्य पढ़ने के नाम पर किसी को गिरफ्तार करना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं.’  

देश के कई राज्य नक्सली हिंसा की चपेट में हैं. जानकार मानते हैं कि माओवाद के पनपने का कारण इन दूरस्थ क्षेत्रों का विकास न होना और वनों और प्राकृतिक संसाधनों पर उनके परंपरागत अधिकार को समाप्त होना है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने माओवाद से लड़ने के उपायों के तहत पुलिस बलों को सुविधासंपन्न बनाने के साथ-साथ इन क्षेत्रों के विकास के लिए समन्वित योजना बनाने की बात कही है. यह भी तय हुआ है कि इन क्षेत्रों में केंद्रीय योजनाओं की विशेष निगरानी करके इनके विकास पर ध्यान दिया जाएगा. 

हंसपुर खत्ते में माओवादी प्रशिक्षण शिविर चलने की दो बहुप्रचारित घटनाओं के आठ साल बाद भी वहां विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ है

जानकार मानते हैं कि उत्तराखंड में भी माओवाद से निपटने के नाम पर केंद्र सरकार ने पुलिस बलों को करोड़ों रुपये दिए हैं. जिस साल प्रशांत राही की गिरफ्तारी हुई, उसी साल उत्तराखंड सरकार ने केंद्र से माओवाद से निपटने के नाम पर 208 करोड़ रुपये की मांग की थी. इस तथ्य के बावजूद कि तब तक राज्य में नक्सली हिंसा से जुड़ी कोई वारदात नहीं हुई थी. उसे इतनी रकम तो नहीं मिली पर सीमांत क्षेत्रों के आधुनिकीकरण के मद में 8.71 करोड़ रुपये मिल गए. अगले साल यह रकम बढ़कर करीब 19 करोड़ रु हो गई. लेकिन हंसपुर खत्ता में माओवादी प्रशिक्षण शिविर चलने की दो बहुप्रचारित घटनाओं के आठ साल बाद भी वहां विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ. होता भी कैसे? अब भी न तो यह राजस्व ग्राम है और न ही ग्राम सभा. फिर कैसे यहां राज्य और केंद्र की किसी योजना का पैसा आता? वन विभाग की कच्ची सड़क से साल के छह महीने हंसपुर नहीं पहुंचा जा सकता. खत्ते में न तो बिजली है न ही पानी. देश भर में भले ही पंचायत राज की धूम मची हो लेकिन इस खत्ते के लोगों की न कोई पंचायत है न ही प्रतिनिधि. उत्तराखंड में तराई के अन्य सैकड़ों खत्तों का हाल भी हंसपुर जैसा ही है. राज्य सरकार भले ही माओवाद के नाम पर मिले करोड़ों रुपये से अपनी पुलिस को सुविधासंपन्न कर चुकी हो लेकिन उसके अधिकारियों और नेताओं ने कभी कथित रूप से माओवादी विचारधारा के संक्रमण में आ रहे इन खत्तों की समस्या के लिए राजनीतिक हल की पहल नहीं की. 

वनवासियों के बीच माओवाद का प्रसार कम करने के लिए संसद में 2007 में अनुसूचित जनजाति और वनवासी अधिकार कानून पारित हुआ. इस कानून के अनुसार तीन पीढ़ियों से अधिक वन विभाग की जमीन पर रहने वालों को वहां भूमिधरी अधिकार मिलने थे. कानून के लागू होने के पांच साल बाद भी उधमसिंहनगर, नैनीताल और हरिद्वार जिलों के तराई के खत्तों में पीढ़ियों से रह रहे हजारों परिवारों में से अभी तक किसी को भूमिधरी का अधिकार नहीं मिल पाया है. 

नेपाल के माओवादी नेता प्रचंड ने हाल ही में ‘तहलका’ को दिए एक साक्षात्कार में भारत के माओवादियों से अपील की थी कि वे भी नेपाली माओवादियों की तरह हिंसा का रास्ता छोड़ कर राजनीतिक प्रक्रिया में भरोसा करें. बात एक तरह से सच भी है. भले ही बंगाली शरणार्थी नीलू को भूमिधरी के आंदोलनों में शामिल होने के चलते माओवादी होने के आरोप में जेल जाना पड़ा हो, लेकिन इन्हीं भूमिहीन बंगालियों की भूमिधरी पाने की आकांक्षा मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के विधानसभा पहुंचने में सबसे बड़ा कारक बनी. उधमसिंह नगर जिले में ही सितारगंज के विधायक किरन मंडल ने बंगालियों को भूमिधरी अधिकार दिलाने की मांग के साथ अपनी सीट विजय बहुगुणा के लिए खाली की और मुख्यमंत्री 40,000 मतों से उपचुनाव जीत गए. इसके एवज में मुख्यमंत्री ने उपचुनाव से पहले कृषि पट्टों को भूमिधरी में बदलने वाला शासनादेश जारी किया. यानी यह सब राजनीतिक प्रक्रिया से ही हुआ. 

लेकिन सवाल यह है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा कितनी सीटों से चुनाव लड़ेंगे और कितनी विधानसभा सीटें सितारगंज हो पाएंगी. 

तारणहार तकनीक

महिलाओं की बात पर हरियाणा एक विरोधाभास-सा लगता है. अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला कल्पना चावला इसी राज्य की थी, लेकिन बेटी के जन्म से पीछा छुड़ाने वाले भी सबसे ज्यादा इसी राज्य में हैं. महिला और पुरुष की संख्या का अंतर हरियाणा में खतरे की सीमा को पार कर गया है. 

दिल्ली से सटा हुआ जिला है हरियाणा का झज्जर. गृह मंत्रालय के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय से जारी साल 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि शून्य से छह वर्ष आयु वर्ग के लड़के-लड़कियों के अनुपात के मामले में यह जिला अंतिम पायदान पर था. समाज की इस बिगड़ती तस्वीर के पीछे लड़कियों के प्रति सदियों से चले आ रहे पूर्वाग्रह को एक वजह माना जा सकता है. दुर्भाग्य यह कि सदियों पुराने पूर्वाग्रह को बल दिया आधुनिक विज्ञान की खोज सोनोग्राफी मशीन ने. लेकिन तकनीक की इस मार से बचने का रास्ता भी तकनीक ने ही खोज निकाला है.  

अरसे से हरियाणा अपने बिगड़ते स्त्री-पुरुष अनुपात के लिए  लोगों का ध्यान खींच रहा था. 2011 की जनगणना के आंकड़ों ने सबके होश उड़ा दिए. शून्य से छह वर्ष के बीच झज्जर में प्रति हजार लड़कों पर सिर्फ 774 लड़कियां थीं. यह आंकड़ा इस मामले में देश के अब तक के सबसे खराब माने जाने वाले हरियाणा के ही एक अन्य जिले महेंद्रगढ़ से भी चार कम था. सवाल उठने लगे कि तमाम जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद लड़कियों के प्रति इतना पूर्वाग्रह क्यों है और क्या सिर्फ जागरूकता के भरोसे ही इस गंभीर समस्या से निपटा जा सकता है. 

पानी सिर से गुजर चुका था,  इसलिए उपाय जरूरी था. तकनीक की काट तकनीक के जरिए ही खोजी गई. झज्जर जिले में पहली बार एडवांस एक्टिव ट्रैकर सिस्टम का इस्तेमाल किया गया. देश में पहली बार इस्तेमाल किए जा रहे इस सिस्टम को झज्जर जिले के सभी 29 अल्ट्रासाउंड सेंटरों में सोनोग्राफी मशीन पर लगाया गया. 2001 के जनगणना के आंकड़ों में झज्जर का स्त्री-पुरुष अनुपात 1000-847 था जो 2011 में थोड़ा सुधर कर 1000-861 हो गया. पर यह कहीं से भी सुखद स्थिति नहीं थी. सिर्फ राज्य के आंकड़ों से तुलना करें तो यह औसत से 16 कम थी. इसके बाद सरकार और जिला प्रशासन के माथे पर भी चिंता की लकीरें खिंच गईं. ये आंकड़े पूरे देश और मीडिया में झज्जर और हरियाणा के लिए बदनामी की वजह बन गए थे.   

पुणे की मैग्नम ऑपस कंपनी द्वारा ईजाद किए गए इस यंत्र से मिले नतीजे बेहद उत्साहवर्धक रहे हैं.  इसकी सफलता से उत्साहित जिला प्रशासन ने राज्य सरकार से अब इसे पूरे राज्य में लागू करने की सिफारिश कर दी है. एक्टिव ट्रैकर के इस्तेमाल के बाद से लिंगानुपात में आया सुधार इसकी सफलता की कहानी बयान करता है. साल 2011 में जनवरी से दिसंबर महीने के बीच पैदा हुए बच्चों का लिंगानुपात जहां 1000-815 था वहीं साल 2012 की शुरुआत में सोनोग्राफी मशीनों पर एक्टिव ट्रैकर के इस्तेमाल के बाद दो महीने के भीतर ही लड़कों और लड़कियों का अनुपात 1000-837 पर पहुंच गया. दो महीने के भीतर आए नतीजों ने सिर्फ बड़े अंतर को जाहिर नहीं किया बल्कि यह बात भी साबित की कि किस तरह से यहां के सोनोग्राफी सेंटर अवैध रूप से बालिका भ्रूण हत्या का काम कर रहे थे. 

­­आगे के महीनों यानी मार्च-अप्रैल में स्वास्थ्य विभाग ने जो आंकड़े जारी किए वे और भी उत्साहजनक रहे हैं. इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में लिंगानुपात प्रति हजार 876 रहा, जबकि झज्जर नगर पालिका क्षेत्र में यह अनुपात प्रति हजार 959 तक पाया गया. ठीक एक साल पहले इसी अवधि के दौरान के आंकड़ों पर आप नजर डालेंगे तब आपको हालात की भयावहता का अंदाजा लगेगा. 2011 में पूरे साल झज्जर नगर पालिका क्षेत्र में लिंगानुपात प्रति हजार 788 था. 

झज्जर में एडवांस एक्टिव ट्रैकर का प्रयोग करने वाले जिले के उपायुक्त अजित बालाजी जोशी कहते हैं, ‘संतुलन के प्रयास अगर अभी से नहीं हुए तो भविष्य में समाज की तस्वीर बेहद भयावह हो सकती है. जागरूकता के प्रयास तो जारी रहने ही चाहिए, लेकिन तकनीक के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए तकनीक का सहारा लेना भी बेहद जरूरी है. अब हमारे यहां इसकी कामयाबी के बाद राज्य के दूसरे हिस्सों में भी इसका इस्तेमाल होने लगा है.’ उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तकनीक का दायरा और भी ज्यादा फैले.  

योजना एक नजर में

एडवांस ऐक्टिव ट्रैकर यंत्र को सोनोग्राफी मशीनों से जोड़ दिया जाता है. यह ऐसी मशीन है जो एक बार सोनोग्राफी मशीन से जुड़ने के बाद उसकी हर एक गतिविधि को रिकॉर्ड करती है. गर्भवती महिला जब पहली बार सोनोग्राफी जांच करवाती है उसी समय उसका सारा डेटा मशीन में कैद हो जाता है. इसके आधार पर प्रशासन हर महिला की जचगी तक निगरानी रख सकता है. बच्चे की पैदाइश नियत समय पर हुई या नहीं, अगर कोई गड़बड़ी हुई तो क्या उसके लिए कोई पुख्ता कारण थे आदि बातों पर नजर रखी जाती है. एक्टिव ट्रैकर एक सर्वर से जुड़ा रहता है और अपने यहां दर्ज सारी जानकारी एक मुख्य सर्वर में भेज देता है. मुख्य सर्वर तक जिले के आला चिकित्सा और प्रशासनिक अधिकारियों की पहुंच होती है. वे इन आंकड़ों का विश्लेषण करते रहते हैं. एक्टिव ट्रैकर के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ संभव नहीं है. इसका डिजाइन ऐसा है कि पहले ट्रैकर ऑन होता है फिर यहां से पावर आगे बढ़ती है और सोनोग्राफी मशीन चालू होती है. बिना ट्रैकर के ऑन हुए सोनोग्राफी मशीन ऑन ही नहीं हो सकती है. इसमें जीपीआरएस सिस्टम भी लगा है. ट्रैकर के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ होने पर यह तुरंत एक एसएमएस संबंधित अधिकारी को भेजकर चेतावनी जारी कर देता है.

नन्हे हाथों में हथियार

इंफाल के सिंगजामी में रहने वाले वाई राकेश मीति इन दिनों बेहद डरे हुए हैं. वे कहते हैं, ‘मणिपुर के लोग टकराव के बीच रहने के आदी हो चुके हैं. लेकिन पिछले तीन महीने की कहानी अलग है. आज मेरे जैसे तमाम मां-बाप भय के साये में जी रहे हैं.’उनका डर अकारण नहीं. दरअसल सिर्फ इंफाल घाटी में ही पिछले तीन महीनों में नाबालिग बच्चों के अपहरण के दस मामले सामने आए हैं. इन बच्चों के माता-पिता का आरोप है कि विद्रोही संगठन जबरन या फिर बहला-फुसला कर उन्हें अगवा कर रहे हैं ताकि उन्हें हथियार थमा कर बाल सैनिक बना सकें. 

लोगों की भारी नाराजगी और विरोध के बाद विद्रोही गुटों ने हाल ही में तीन बच्चों को आजाद तो कर दिया है लेकिन मसला खत्म नहीं हुआ है. बाल अधिकार कार्यकर्ता मोंटू ऐन्थेम के मुताबिक इस तरह की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. वे कहते हैं, ‘राज्य सरकार को इसे कानून व्यवस्था का मामला न मानकर इसके प्रति एक सामाजिक दृष्टिकोण अपनाना होगा.’ 

राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग की अध्यक्ष शान्ता सिन्हा ने अपने हालिया मणिपुर दौरे के बाद इबोबी सिंह सरकार की आलोचना की थी. उनका कहना था कि राज्य सरकार विद्रोही गुटों द्वारा की जा रही बच्चों की तस्करी पर लगाम नहीं लगा पा रही. दूसरी जगहों की बात करें तो गारो नेशनल लिबरेशन आर्मी ऑफ मेघालय और नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा सैकड़ों की संख्या में  बच्चों की भर्ती करते हैं. आयोग के सदस्य योगेश दुबे बताते हैं, ‘मणिपुर और त्रिपुरा में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बाल आयोग ने इस मसले का स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय के सामने यह मुद्दा उठाने का फैसला लिया है.’ 

इस बीच मणिपुर सरकार ने राज्य के हर जिले के एसपी को विशेष टीम बनाकर बाल सैनिकों के मसले पर नजर बनाए रखने का आदेश दिया है. गौरतलब है कि इस राज्य में पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने वाले छात्रों का औसत बहुत ज्यादा है है. प्राइमरी स्तर पर 64 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं जबकि जूनियर स्कूल के स्तर पर यह आंकड़ा 70 फीसदी है. राज्य के गृहमंत्री जी गाइखांगम कहते हैं, ‘विद्रोही स्थानीय लोगों का समर्थन खोते जा रहे हैं. मणिपुर में उग्रवाद ढलान पर है. बच्चों को वे आसान शिकार समझते हैं.’ 

सेंटर फॉर ऑर्गेनाइजेशन रिसर्च ऐंड एजुकेशन (मणिपुर) के डॉ. लाइफंगबाम देबब्रत रॉय के मुताबिक मणिपुर के बच्चे कच्ची उम्र में ही बंदूक संस्कृति से जुड़ जाते हैं. वे कहते हैं, ‘बच्चे सोचते हैं कि बंदूक से ताकत मिलती है. वे देखते हैं कि किस तरह से सुरक्षा बल अमानवीय सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम का इस्तेमाल करते हैं. साथ ही वहां गरीबी भी है जिसकी वजह से विद्रोही गुटों के लिए बच्चों को फुसलाना आसान हो जाता है’. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्युमेंट्री फिल्म निर्माता और पत्रकार बाचस्पतीमयूम सान्जू  कहते हैं, ‘मैं तमाम विद्रोही गुटों में मौजूद बाल सैनिकों पर डॉक्युमेंट्री बना चुका हूं लेकिन यह काम खतरनाक है.’   

नाम गुप्त रखने की शर्त पर एक प्रतिबंधित संगठन के कमांडर कहते हैं, ‘नाबालिगों को प्रशिक्षित करना बेहद आसान होता है. शुरुआत में वे रोते-चिल्लाते हैं लेकिन बाद में लाइन पर आ जाते हैं. प्रशिक्षण पूरा होने के बाद वे पार्टी की लंबे समय तक सेवा भी कर सकते हैं. हम लड़कियों को भी भर्ती करते हैं लेकिन उन्हें हथियारों का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता. कुछ बिचौलिए हैं जो हमारे लिए यह काम करते हैं. बदले में उन्हें कमीशन मिलता है.’  मणिपुर में 35 विद्रोही गुट सक्रिय हैं. अलग-अलग आंकड़ों के मुताबिक 2009 से 2012 के बीच मणिपुर के 338 नाबालिग बच्चों को दूसरे राज्यों से छुड़ाया गया है. लेकिन राज्य के अंदर से एक भी बच्चा बरामद नहीं हो सका है. तहलका ने उन चार परिवारों से बात करने की कोशिश की जिनके बच्चे 2008 में अगवा कर लिए गए थे. सबने बात करने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके बच्चे अब ‘बागी’ बन गए हैं.

 

 

सपन सुरंजय, 14 वर्ष

साइरेमखुल, मणिपुर

छठी कक्षा की पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुके सपन का परिवार सात लोगों का है. महीने की कमाई है सिर्फ 2,500 रु. एक स्थानीय व्यक्ति ने उसे प्रतिबंधित संगठन में शामिल होने का लालच दिया था. जनता के भारी विरोध के बाद सपन को उसके दो साथियों संजय और शांतिकुमार के साथ छोड़ दिया गया. 

 

 

 

 

 

सोराइसम संजय, 14 वर्ष

साइरेमखुल, मणिपुर

संजय का बड़ा भाई पहले से ही एक प्रतिबंधित विद्रोही संगठन का हिस्सा है. इसके बावजूद वह एक भूमिगत संगठन का सदस्य बनने के लिए तैयार हो गया. संजय कहता है, ‘गरीबी में दिन काटने से अच्छा है विद्रोही बन जाना’.

 

 

 

 

 

यामबेम निंगथेम, 16 वर्ष

साइरेमखुल, मणिपुर

निंगथेम अपनी शादी के एक महीने बाद ही गायब हो गया. हालांकि उसके परिवारवाले इससे इनकार करते रहे. स्थानीय लोगों का कहना है कि उसने अपनी इच््छा से हथियार उठाए हैं. उसकी मां कहती है, ‘मेरा बेटा ऐसा नहीं है. वह काम के चक्कर में दूसरे गांवों में घूमता रहता है.’  

 

 

 

 

 

 

आइबाम जॉनसन, 12 वर्ष

ताकयेल कोलम लिकाई, मणिपुर

जॉनसन को आखिरी बार एक आत्मसमर्पण कर चुके विद्रोही कन्हाई के साथ देखा गया था. इसके पिता का 2009 में देहांत हो चुका है. मां भी घर छोड़कर जा चुकी है. दादी पूरनमासी ने उसे पाला-पोसा था जो आज भी उसकी वापसी का इंतजार कर रही हैं.

 

 

 

 

 

 

चानम शांतिकुमार, 14 वर्ष

साइरेमखुल, मणिपुर

चानम और उसके दोस्तों को एक स्थानीय व्यक्ति ने भर्ती करने का लालच दिया था. पैसा, मोबाइल और कुछ कोरे वादों के लालच में चान अपने साथियों के साथ बिना सोचे-समझे विद्रोहियों के कैंप में चला गया. लोगों के विरोध के बाद उसे एक हफ्ते बाद रिहा कर दिया गया.  

 

त्रासदी की नींव पर घटती त्रासदी

सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और लंदन ओलंपिक में भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपित डाउ केमिकल्स कॉरपोरेशन को शीर्ष प्रायोजक बनाने से उठे विरोध के बीच आखिरकार केंद्र सरकार ने यूनियन कार्बाइड कारखाने की चारदीवारी में रखे 340 मीट्रिक टन जहरीले कचरे को जलाने के लिए जर्मनी भेजने पर हरी झंडी दिखा दी. लेकिन यह कुल कचरे का इतना मामूली हिस्सा है कि इसे जलाने भर से पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं से निजात नहीं मिल पाएगी. सरकार भी यह  मान चुकी है कि कारखाने में और उसके चारों तरफ तकरीबन 10 हजार मीट्रिक टन से अधिक कचरा जमीन में दबा हुआ है.

अभी तक सरकारी स्तर पर इसे हटाने को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है. खुले आसमान के नीचे जमा यह कचरा बीते कई सालों से बरसात के पानी के साथ घुलकर अब तक 14 बस्तियों की 40 हजार आबादी के भूजल को जहरीला बना चुका है.

बीते दिनों इस मामले में भोपाल गैस पीड़ित संगठनों ने भोपाल गैस त्रासदी को लेकर गठित मंत्री समूह के अध्यक्ष और गृहमंत्री पी चिदंबरम से मुलाकात भी की थी. संगठनों का आरोप है कि सरकार सिर्फ कारखाने के बंद गोदाम में रखे कचरे का निपटान करके अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ना चाह रही है, जबकि यूनियन कार्बाइड प्रबंधन ने कारखाने परिसर में मौजूद जहरीले कचरे को कारखाने के भीतर व बाहर और खुले तौर पर 14 से अधिक स्थानों में दबाया था. कारखाने के बाहर बने तीन तालाबों में तकरीबन 10 हजार मीट्रिक टन जहरीला कचरा दबा हुआ है. फिलहाल तालाबों की जमीन खेल के मैदानों और बस्तियों में तब्दील हो गई हैं और यहां दबा कचरा अब सफेद परतों के रूप में जमीन से बाहर दिखाई देने लगा है. भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के अब्दुल जब्बार का कहना है, ‘ कचरा हटाने के नाम पर सरकार गैस पीडि़तों की पीड़ा को बढ़ा रही है. खुले में पड़ा हजारों मीट्रिक टन कचरा समस्या की असली जड़ है और इसे निपटाए बिना गैस पीड़ित बस्तियों के भूजल प्रदूषण को कम नहीं किया जा सकता.’ 

यूनियन कार्बाइड कारखाने में कारबारील, एल्डिकार्ब और सेबिडॉल जैसे खतरनाक कीटनाशकों का उत्पादन होता था. संयंत्र में पारे और क्रोमियम जैसी दीर्घस्थायी और जहरीली धातुएं भी इस्तेमाल होती थीं. कई सरकारी और गैरसरकारी एजेंसियों के मुताबिक कारखाने के अंदर और बाहर पड़े कचरे के लगातार जमीन में रिसने से एक बड़े भूभाग का जल प्रदूषित हो चुका है. 1991 और 1996 में मध्य प्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने पाया था कि इलाके के 11 नलकूपों से लिए गए भूजल के नमूनों में जहरीले रसायन हैं. 1998 से 2006 के बीच मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हर तीन महीने में पड़ताल करके यहां जहरीले रसायनों की पुष्टि की है. अंतरर्राष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस ने भी अपने अध्ययन में पाया कि यहां पारे की मात्रा सुरक्षित स्तर से 60 लाख गुना तक अधिक है. सबसे ताजा 2009 में दिल्ली के सीएसई यानी सेंटर फॉर साइंस एंेड एनवायरनमेंट का

अध्ययन है जिसमें कारखाना परिसर से तीन किलोमीटर दूर और 30 मीटर गहराई तक जहरीले रसायन पाए गए. सीएसई के मुताबिक कारखाने के आस-पास सतही पानी के नमूनों में कीटनाशकों का सम्मिश्रण 0.2805 पीपीएम पाया गया जो भारतीय मानक से 561 गुना अधिक है. सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण बताती हैं, ‘ भोपाल में कारखाना क्षेत्र भीषण विषाक्तता को जन्म दे रहा है जिसका स्वास्थ्य पर भयंकर असर पड़ेगा. क्लोरिनेटिड बेंजीन मिश्रण जिगर और रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर सकता है. वहीं ऑर्गेनोक्लोरीन कीटनाशक कैंसर और हड्डियों की विकृतियों के जनक हो सकते हैं. यूसीआईएल के दो प्रमुख उत्पाद कारबारील और एल्डिकार्ब दिमाग और तंत्रिका प्रणाली को नुकसान पहुंचाने के अलावा गुणसूत्रों में गड़बड़ी ला सकते हैं.’ 

फिलहाल जर्मनी की कंपनी जर्मन एजेंसी फॉर टेक्टिकल को-ऑपरेशन को भोपाल गैस त्रासदी पर गठित मंत्री समूह ने जर्मनी के हामबुर्ग स्थित संयंत्र में भोपाल के 340 मीट्रिक टन कचरे को भेजने का फैसला कर लिया है. लेकिन वित्तीय, कानूनी, पर्यावरणीय और विदेशी मामलों की अड़चनों को दूर करने से लेकर इस कचरे को जर्मनी में जलाने के लिए दोनों देशों की सरकारों की सहमति बनाना भी जरूरी होगा. जाहिर है कारखाने के बंद गोदाम के कचरे को अपने आखिरी मुकाम तक पहुंचाकर नष्ट कराने से पहले एक लंबी दूरी तय करनी है, लेकिन इसी के साथ यह सवाल अब तक बना हुआ है कि स्थानीय क्षेत्र के जन-जीवन और पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचाने वाले उस भूमिगत कचरे से मुक्ति कब मिलेगी जो 27 साल से गैस पीडि़तों की छाती पर पड़ा हुआ है.

मुठभेड़ ‘चाल’!

छत्तीसगढ़ के सारकेगुड़ा गांव और उससे जुड़े हुए दो टोलों कोत्तागुड़ा और राजपेटा की पहचान पिछले महीने के आखिरी हफ्ते तक इतनी ही थी कि वर्ष 2005 में जुडूम समर्थकों ने यहां ग्रामीणों के घरों को आग के हवाले कर दिया था. उस दौरान बासागुड़ा में बालैय्या नाम का एक व्यक्ति पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था. 29 जून, 2012 को यह फिर अचानक चर्चा में आया. इसके एक दिन पहले रात में सीआरपीएफ की अगुवाई में एक कथित मुठभेड़ हुई थी और सीआरपीएफ ने दावा किया था कि उसने 17 नक्सलवादियों को मार गिराया है. एक साथ इतने ‘नक्सलवादियों’ के मारे जाने की यह हाल के दिनों की सबसे बड़ी घटना थी. मीडिया में यह मसला तुरंत छा गया. 

लेकिन इस घटना के बाद पूरे चौबीस घंटे भी नहीं बीत पाए और नक्सलवादी मारने के सीआरपीएफ के दावे से कई सवाल खड़े हो गए. अर्धसैन्य बल ने पहले मारे गए सभी लोगों को नक्सली बताया. बाद में कहा गया कि सिर्फ तीन-चार लोग कट्टर नक्सलवादी थे. इस तरह दिन बीतने के साथ-साथ कई बार सीआरपीएफ ने अपने बयान बदले. आखिर में खुद छत्तीसगढ़ सरकार ने एक सूची जारी की. इसमें मारे गए लोगों में से सात को नक्सली बताया गया था जिनके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज थे. पिछले तेरह साल के दौरान यह सीआरपीएफ का सबसे बड़ा अभियान था. लेकिन मुठभेड़ के तुरंत बाद जिस तरह सुरक्षा बल सवालों से घिरता दिख रहा है उससे यह साफ हो गया है कि नक्सलवादियों के खिलाफ यह मुठभेड़ एक योजना के तहत भले ही अंजाम दी गई हो लेकिन यह अपने लक्ष्य से पूरी तरह चूक गई.

बासागुड़ा में तैनात पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ‘ हमें 28 जून, 2012 की सुबह एक मुखबिर से सूचना मिली थी कि माओवादी जगरगुड़ा सिलगेर या फिर सारकेगुड़ा गांव में बैठक ले सकते हैं. इसके बाद नक्सलवादियों को ढेर करने की रणनीति बनाई गई.’ बासागुड़ा कस्बा राज्य की राजधानी रायपुर से 462 किमी दूर बीजापुर जिले में है. बीजापुर से बासागुड़ा कस्बे की दूरी 52 किलोमीटर है. और इस कस्बे से सरकेगुड़ा तकरीबन दो किमी दूरी पर है. खुफिया सूचना मिलते ही पुलिस और सीआरपीएफ ने तय किया कि 400 जवानों के दो दस्ते बासागुड़ा से सिलगेर भेजे जाएं. यह भी तय हुआ कि जगरगुड़ा और चिंतलनार से सुरक्षा बलों का एक-एक दस्ता उन्हें आगे मिलेगा. उसी दिन लगभग नौ बजे रात को सीआरपीएफ के दो दस्ते बासागुड़ा से सिलगेर की ओर रवाना हो गए. इस अभियान में शामिल रहे सीआरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी तहलका को बताते हैं, ‘रात में लगभग 11 बजे जब हम सरकेगुड़ा से लगभग 300 मीटर दूर थे सीआरपीएफ की 85वीं बटालियन और कोबरा यूनिट को कुछ हलचल दिखाई दी. हम और आगे बढ़े तो पता चला कि गांव में कोई मीटिंग हो रही है. हम आगे बढ़ ही रहे थे कि उन लोगों में से किसी ने पुलिस-पुलिस की आवाज लगाई.

पुलिस ने मारे गए नक्सलवादियों की जो सूची  बनाई है उसमें ऐसे लोगों के नाम शामिल हैं जिन्हें ग्रामीण जानते ही नहीं

इसके बाद अचानक हम पर फायरिंग होने लगी. हमारे तीन-चार जवान घायल हो गए. इसके बाद हमारे पास जवाबी फायरिंग के अलावा कोई विकल्प नहीं था.’ इस अधिकारी का दावा है कि उनके दस्ते पर भारी फायरिंग हो रही थी और तकरीबन तीस मिनट तक जारी रही. वे इस बात का भी अंदेशा जताते हैं कि सरकेगुड़ा में 15-20  नक्सलवादी थे जो गोलीबारी के बाद भाग गए. दो बजे के लगभग सीआरपीएफ का दूसरा दस्ता जो जगरगुड़ा से चला था उस पर भी फायरिंग हुई. लगभग साढ़े तीन बजे चिंतलनार से आ रहे अर्धसैन्य बल के दस्ते का भी सामना छिटपुट फायरिंग से हुआ. यह अधिकारी बताते हैं, ‘जब सिलगेर में उस जगह पहुंचे तब तक वहां कुछ नहीं बचा था. ‘

फायरिंग में गांव के 17 लोग मारे गए. इनमें आठ नाबालिग थे. अगले दिन से घटनास्थल पर आम लोगों की आवाजाही शुरू हुई. और इसी के साथ उन ग्रामीणों का पक्ष भी सामने आने लगा जिनके परिचित और रिश्तेदार इस कथित मुठभेड़ में मारे गए थे. तहलका टीम ने सारकेगुड़ा, कोत्तागुड़ा और राजपेटा के कई ग्रामीणों से बातचीत की. गांववालों से बातचीत का जो लब्बोलुआब निकलता है वह यह है कि सारकेगुड़ा और कोत्तागुड़ा के बीच ग्रामीण बीज त्योहार को मनाने की तैयारियों के संबंध में बैठक कर रहे थे. गांव की महिलाओं और पुरुषों के साथ यहां बच्चे भी थे. बैठक रात में आठ बजे प्रारंभ हुई तो यह तय किया गया कि यदि मानसून ने दगा दिया तो गांव के एक युवक चीनू, जिसने लोन लेकर ट्रैक्टर खरीदा था, से कहा जाएगा कि वह सबसे थोड़े-थोड़े पैसे या डीजल लेकर खेत जोत दे. इसके अलावा गांव की विधवा महिलाओं को दी जाने वाली सहायता तथा दोरला जनजाति के पारंपरिक उत्सव की तैयारियों के संबंध में भी ग्रामीणों ने बातचीत की थी. रात दस बजे तक तो बैठक में सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन जब ग्रामीणों में से कुछ लोगों ने नागेश नाम के एक युवक से मांदर (ढोल) बजाने का आग्रह करते हुए कुछ नाच गाने की तैयारी की तभी अचानक कुछ बंदूकधारियों ने उन्हें घेर लिया. ये अर्धसैन्य बलों के थे. ग्रामीण बताते हैं कि ये लोग गंदी-गंदी गालियां देते हुए पूछ रहे थे कि इतनी रात को क्या किया जा रहा है. कौन-कौन नक्सली है. इससे पहले कि ग्रामीण अपनी सफाई में कुछ कह पाते, फायरिंग होने लगी. नागेश भी इस फायरिंग में मारा गया.

कोत्तागुड़ा गांव की 14 वर्षीया इरपा तुलसी कहती है, ‘मैं अपने पिता (इरपा नारायण) के साथ बैठक में शामिल थी. पुलिस ने पहले मेरे पिता को गोली मारी. मैं घबराकर अपनी झोपड़ी की तरफ भागी तो मुझे पकड़ लिया. मेरे कपड़े फाड़ दिए गए. जब मैंने अपनी जान को बख्श देने के लिए हाथ-पैर जोड़े तब मेरे चेहरे पर बंदूक के कुंदे से वार किया गया. मैं बेहोश होकर गिर पड़ी. ‘इसी गांव की एक लड़की सारिका जो आवापल्ली में पढ़ती है और जो अपने चाचा सम्मैया के साथ बैठक में मौजूद थी, कहती है, ‘पुलिस ने मुझे खूब मारा और फिर जमीन पर लिटा दिया. मेरे दोनों टांगों के बीचो-बीच गोली चलाई गई. मैं पुलिसवालों से कहती रही कि स्कूल में पढ़ती हूं लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी. एक पुलिस-वाला गाली-गलौज करते हुए इज्जत लूट लेने की धमकी देता रहा.’

नागेश की पत्नी मड़काम समी अपने जो फिलहाल गर्भवती हैं, पति की मौत के बाद बुरी तरह टूट चुकी हैं. हर सवाल के जवाब पर अटकते हुए वे यही दोहराती हैं,   ‘मेरा पति नक्सली नहीं था… हम तो अपने दो बच्चों के साथ यहां आराम से रह रहे थे… ‘  मड़काम समी की तरह इरपा जानकी भी गर्भवती है. जानकी कहती है, ‘पुलिस ने मेरे पति की न लाश दी और न ही उसे देखने दिया., कुछ इसी तरह का कथन गांव की अन्य महिलाओं का भी है. गांव की महिला नरसी इरपा बताती है कि उसका पति नारायण पुलिसवालों से गोली न चलाने की बात कह रहा था लेकिन उसे ‘नक्सलियों का साथ देते हो’ कहकर मार दिया गया. गोलीबारी में गांव के एक सोलह वर्षीय किशोर हेमला देवा के बाएं हाथ में गोली लगी थी इस वजह से वह बच गया, लेकिन देवा को इस बात का अफसोस है कि उसके हमउम्र साथी उससे बिछड़ गए हैं. ज्ञात हो कि गोलीबारी के चलते गांव के नौ नाबालिगों मडकाम दिलीप(17) मडकाम रामविलास (15) अपका मिठू (16) काका सरस्वती (12) कुंजाम मल्ला (16), कोरसा बिचम (16), इरपा सुरेश (14) एवं काका राहुल को अपनी जान गंवानी पड़ी है.

इस मुठभेड़ के असली होने पर कई लोग संदेह जता रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि घटना के बाद पुलिस ने कई बार अपने बयान बदले हैं. सबसे पहले यह दावा किया गया था कि जितने लोग मारे गए वे सभी नक्सलवादी हैं. बाद में यह संख्या तीन-चार कट्टर नक्सलवादियों तक सिमट गई. बीजापुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) प्रशांत अग्रवाल ने सबसे आखिर में एक सूची जारी की जिसमें सात नक्सलवादियों के बारे में पूरी जानकारी थी. इस सूची में शामिल सुरेश मड़काम पुलिस रिकॉर्ड के हिसाब से इस घटना के समय जेल में था. हमने जब एसपी से इसके बारे में जानना चाहा तो उनका जवाब था, ‘हो सकता है कुछ गलती हो गई हो, मैं इसे दोबारा चेक करवाता हूं.’ लगभग तीस मिनट के बाद हमें एक नई सूची दी गई. यह और हैरान करने वाली थी. सूची में अब सात की जगह छह नक्सलवादियों के नाम थे और जो नाम हटाया गया वह मड़काम सुरेश का नहीं था, काका नागेश का था. ग्रामीण भी पुलिस की इस सूची को देखकर हैरान हैं. गांव के सरपंच मड़कम नारायण कहते हैं, ‘पुलिस ने मड़वी अयातु और कोरसा विज्जे का नाम लिखा ह,ै लेकिन हम इनमें से किसी को नहीं जानते.’ गांव के रामा नाम के एक शख्स का कहना है कि उसकी बेटी सरस्वती (12 साल) मारी गई है जबकि पुलिस ने सरस्वती को अनीता माना है. गांव की महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता कमला काका के भतीजे राहुल काका का भी जिक्र पुलिस रिकॉर्ड में नहीं है. गांववाले अपका मिठू की उम्र 16 साल बताते हैं जबकि पुलिस ने उसे 25 साल का दर्शाया है. इसी तरह 14 वर्षीय इरपा सुरेश की आयु भी 20 वर्ष दर्शाई गई है.

सवाल और भी हैं. यदि गांववालों की यह शांतिपूर्ण बैठक थी तो सीआरपीएफ के छह जवान जख्मी कैसे हुए. ये जवान रायपुर के नारायण हृदयालय एमएमआई अस्पताल में भर्ती हैं. तहलका की टीम ने जब यहां का दौरा किया तो पता चला कि छह में से सिर्फ दो जवान गंभीर रूप से जख्मी हैं. बाकी दो के पैरों में चोटें आई हैं तो भागने-दौड़ने के दौरान शेष दो जवानों के घुटनों में चोट आई है. इनमें से गंभीर रूप से जख्मी वहीदुल्लाह हमें बताते हैं, ‘ जब हम सरकेगुड़ा पहुंचे तो मुझे बस यही याद है किसी ने पुलिस-पुलिस की आवाज लगाई थी. उसके बाद भारी गोलीबारी होने लगी. मुझे पेट में गोली लगी और मैं गिर गया.’ ज्ञानेंद्र प्रकाश को जांघ में गोली लगी है. वे बताते हैं, ‘डॉक्टरों ने गोली निकाल दी है. वह भरमार बंदूक से चली थी. नक्सली यही बंदूक इस्तेमाल करते हैं. ‘लेकिन जब अंधाधुंध फायरिंग हो रही थी तो हो सकता है वे सीआरपीएफ की गोलियों का ही शिकार बने हों? इस सवाल पर प्रकाश कहते हैं, ‘ सीआरपीएफ के जवान एके सीरीज की बंदूकें इस्तेमाल करते हैं जैसे इंसास, एमपी5 इत्यादि. यदि हमारी गोली किसी को लगती है तो शरीर के उस हिस्से से आर-पार निकल जाती है. लेकिन गांववाले इससे असहमति जताते हैं. ‘हम बंदूकों का क्या करेंगे, मड़कम शांता कहते हैं, ‘ यदि उस बैठक में नक्सलवादी होते तो क्या सीआरपीएफ के जवानों को इतनी हल्की चोटें आतीं? सीआरपीएफ वाले अपनी ही गोलियों से घायल हुए हैं.

हालांकि अर्धसैन्य बल के एक वरिष्ठ अधिकारी ग्रामीणों के इस आरोप को झुंझलाते हुए नकारते हैं. वे कहते हैं,  ’यह बकवास है. आपको क्या लगता है कि सीआरपीएफ में बिना ट्रेनिंग लिए हुए लोग आते हैं? क्या हम अपने पेट में गोली सिर्फ इसलिए मार लेंगे ताकि कोई कहानी बन जाए?’ इस बीच पुलिस अब भी इस गुत्थी में उलझी हुई लग रही है कि ग्रामीणों और नक्सलवादियों को अलग-अलग कैसे पहचाना जाए. बीजापुर के एसपी कहते हैं, ‘गांववाले जब-तब नक्सलवादियों की मदद करते रहते हैं. उन सभी के पास वोटर कार्ड और राशनकार्ड होते हैं. आम दिनों में ये लोग खेती-किसानी करते हैं, बाकी समय में नक्सलवादियों के मददगार बन जाते हैं. इस लिहाज से ये भी नक्सलवादी हैं.’ बीजापुर में तैनात एक वरिष्ठ सीआरपीएफ अधिकारी इस बात पर सहमत दिखते हैं, ’नक्सलवादियों के साथ जनमिलिशिया होता है. सबसे ऊपर जनसंघम होता है. वे बारूदी सुरंग बिछाने में माहिर होते हैं. लेकिन यदि उनके पास हथियार नहीं हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वे नक्सलवादी नहीं हैं. अब बताएं, क्या हमारी तरफ से जब-तक कोई मौत न हो, हम खुद को सही साबित नहीं कर सकते?’ 

इन सभी तर्कों से इतर ग्रामीणों का गुस्सा इस समय उबाल पर है. जिला प्रशासन आई राहत सामग्री उन्होंने वापस लौटा दी है. गांववालों का कहना है कि वे उन लोगों से क्या मदद लें जो खुद ही पहले हमारे ऊपर मुसीबत बनकर टूटते हैं. फिलहाल विपक्षी पार्टियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के दबाव में इस कथित मुठभेड़ की कई जांचें शुरू हो चुकी हैं. राज्य सरकार घटना की न्यायिक जांच करवा रही है. सीआरपीएफ भी अपने स्तर पर एक जांच करवाने वाली है. अभी तक हर एक पक्ष के अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन जांच के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इनके निष्कर्ष किन बिंदुओं पर मिलते हैं और कहां अलग होते हैं.

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‘हम जंगलों में पिकनिक नहीं मना रहे’

कुछ सामाजिक कार्यकर्ता कह रहे हैं कि बीजापुर मुठभेड़ आजादी के बाद से अब तक का सबसे वीभत्स नरसंहार है.

मेरे मन में सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए बहुत सम्मान है. मगर आवेश में आकर इस तरह के अपमानजनक आरोप लगाना गलत है. वे अपने स्तर पर जांच कर लें कि यह घटना कैसे और क्यों हुई. और यह भी कि इससे कैसे बचा जा सकता है. उन्हें ऐसा करने से किसने रोका है?

ऑपरेशन के दौरान क्या हुआ था?

सीआरपीएफ की टुकड़ियों को सिलगेर में इकट्ठा होना था. आप उस जगह जाकर देखें. भारत की सुरक्षा एजेंसियों के हिसाब से देखा जाए तो यह जगह नक्शे पर कहीं है ही नहीं. टुकड़ियां तीन दिशाओं से उस इलाके की तरफ बढ़ रही थीं. ये सभी सावधानी से चुनी गई टीमें थीं जिनका नेतृत्व बहुत अच्छे कमांडर कर रहे थे. इस संयुक्त अभियान में राज्य प्रशासन की भी हिस्सेदारी थी. इस इलाके की तरफ बढ़ते हुए एक टीम को सारकेगुड़ा में कुछ शोर सुनाई दिया. यह शोर एक भीड़ का था. सीआरपीएफ की टुकड़ी रुक गई. मगर इससे पहले कि वह किसी चीज की पुष्टि कर पाती भीड़ में से कोई फायरिंग करने लगा जिसमें कुछ जवान घायल हो गए. ऐसे में टीम के लिए यह जानना मुश्किल था कि वे नक्सली हैं या निर्दोष गांववाले. गोलियां किसने चलाईं,  इसके लिए विस्तृत जांच की जरूरत है, लेकिन यह कहना गलत है कि यह लापरवाह तरीके से जान-बूझकर किया गया हमला था. 

क्या इस बात की पुष्टि हो गई है कि मारे गए लोगों में से कितने नक्सली थे?

चार या पांच ऐसे हैं जो नक्सली थे. इनमें मड़काम सुरेश नाम का एक व्यक्ति भी है जो 2007 में दंतेवाड़ा जेल पर हुए हमले में शामिल था. जिसे मीडिया में एक स्कूली छात्र बताया गया, वह एक अलग सुरेश था. यह जानकारी मीडिया में स्पष्ट रूप से नहीं आई. मेरा सवाल यह है कि इस तरह की रिपोर्टिंग क्यों की गई जिसमें पूरी जानकारी नहीं थी. जब आप इसे एक हाई प्रोफाइल मामले की तरह पेश करते हैं तो सब लोगों का ध्यान उस स्कूली छात्र पर केंद्रित रहता है. वे भूल चुके हैं कि एक दूसरा सुरेश भी है. अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम साबित करें कि एक दूसरा सुरेश भी है. विद्रोही गतिविधियों के खिलाफ अभियान चलाने वाले देश के प्रमुख बल की है? मीडिया ने हमारी ऐसी छवि बना दी है जैसे हम ही गुनहगार हों. हम तो बस अपना काम कर रहे हैं. मैं इससे इनकार नहीं कर रहा हूं कि मारे गए लोगों में एक लड़की भी थी. हमें इसका खेद भी है. हमें सभी मौतों का खेद है. यहां तक कि माओवादी नेता किशनजी के मुठभेड़ में मरने के बाद भी मैंने जो पहला इंटरव्यू दिया था उसकी शुरुआत मैंने किशनजी के परिवार के प्रति अपनी संवेदना जताई थी. इसलिए क्योंकि परिवार इस सबसे बाहर की चीज है.

 दूसरी अहम बात यह है कि सिलगेर जैसे इलाके में यह पता करना मुश्किल है कि कौन नक्सली है और कौन नहीं. आपको पता नहीं चलेगा. सीआरपीएफ को तो पक्के तौर पर पता नहीं चलेगा. स्थानीय पुलिस के लिए तो यह जानना असंभव ही है क्योंकि उनके पास उन कुछ लोगों की ही जानकारी होती है जिनका रिकॉर्ड रखा गया हो. यह दिल्ली या रायपुर का कोई पुलिस स्टेशन नहीं है. हम उस इलाके की बात कर रहे हैं जो देश में सबसे पिछड़ा है. इसे ‘मुक्त क्षेत्र’ कहा जाता है. सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक इस इलाके में एक लाख से भी ज्यादा जनमिलिशिया (नागरिक सेना) हैं. तो किसे पता कि कौन इस एक लाख का हिस्सा है? यह धुंध में लिपटी दुनिया है. ऐसा लगता है जैसे यह साबित करने की जिम्मेदारी हमारी है कि व्यक्ति निर्दोष है या नहीं. यह हमारा काम नहीं है. यह इलाका नक्सलियों के नियंत्रण में है. अगर आप गांववालों द्वारा मीडिया को दिए गए बयान देखें तो उनका कहना है कि उन्हें बैठक में भाग लेने के लिए मजबूर किया गया था. हमें गांववालों से सहानुभूति है क्योंकि उन पर दूसरे पक्ष का दबाव होता है. पुलिस का उन पर कोई दबाव नहीं होता क्योंकि पुलिस तो उस इलाके में पहली बार ही गई थी. 

विद्रोही गतिविधियों से निपटने में लगे देश के मुख्य सुरक्षा बल पर इस तरह की कालिख मढ़ना ठीक बात नहीं है. इससे किसे फायदा होगा ?

सीआरपीएफ पर कुछ शवों को विकृत करने का आरोप भी लगा है. 

इस तरह की गंदगी हम पर उछाली जाती रही है और सीआरपीएफ इसका अभ्यस्त हो चुका है. लेकिन विद्रोही गतिविधियों से निपटने में लगे देश के मुख्य सुरक्षा बल पर इस तरह की कालिख मढ़ना ठीक बात नहीं है. इससे किसको फायदा होगा? हमारे जो लोग अबूझमाड़ में गए वे जानते हैं कि वहां स्थितियां किसी भी दूसरी जगह से ज्यादा खराब हैं. वहां किसी का नियंत्रण नहीं था. न छत्तीसगढ़ सरकार का, न केंद्र का, न सेना का और न ही सीआरपीएफ का. कुछ साल पहले कभी-कभी वहां थोड़ी सफलताएं मिली थीं. मार्च में हमारे लोगों ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की. लेकिन हम वहां रुक नहीं सके और वापस आ गए. वहां के लोगों के पास न तन ढकने को कपड़े हैं, न खाने के लिए पर्याप्त भोजन और न ही शिक्षा. यह देश का सबसे पिछड़ा इलाका है जिस पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है. यहां कायदे से एक प्रशासन की जरूरत है. यहां वैसे ही काम होना चाहिए जैसे सारंडा में हो रहा है.

सीआरपीएफ के सामने छवि का एक गंभीर संकट रहा है. क्या आपके कमान संभालने के बाद रणनीति में कोई बदलाव हुआ है?

कमान संभालते ही मैंने सभी कंपनी कमांडरों को 22 बिंदुओं का एक एजेंडा भेजा. यह पहली बार हुआ था कि कंपनी कमांडरों को डीजी से कोई सीधा पत्र मिला हो. मुझे उनमें से हर एक से इसका जवाब मिला. मैंने जो निर्देश दिए थे उनमें एक अहम निर्देश यह भी था कि हर एक से दुश्मन की तरह बर्ताव नहीं करना है. बल्कि मैं तो दुश्मन शब्द का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहूंगा और उन्हें ऐसे विरोधी कहूंगा जो आपके दृष्टिकोण का विरोध कर रहे हैं. मेरा कहना है कि प्रतिक्रिया फौरी न हो. स्थिर बुद्धि के साथ काम किया जाए. हमने दैनिक प्रशिक्षण पर काफी ध्यान केंद्रित किया है. हमारी कोशिश है कि हम पहले से ज्यादा सचेत और सतर्क रहते हुए अपना नुकसान कम से कम होने दें. लेकिन साथ ही जब भी फायरिंग हो, हम पहले से ज्यादा संवेदनशीलता और संयम से काम करें. 

इस घटना का राजनीतिकरण भी हो गया है.

इस बारे में मैं क्या कह सकता हूं? मैं अपने बल का बचाव करूंगा मगर मैं राजनीतिकरण के बारे में बात नहीं कर सकता. मुझसे अगर आप विद्रोही गतिविधियों के खिलाफ चल रहे अभियानों के बारे में ही पूछें तो ज्यादा अच्छा होगा.

जब से सलवा जुडम की शुरुआत हुई है तब से सीआरपीएफ को नक्सल प्रभावित इलाकों में ही ज्यादा भेजा जा रहा है.

हम और भी मुश्किल इलाकों में गए हैं. मैंने सीआरपीएफ को आंतरिक बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) के रूप में पुनर्परिभाषित किया है. हम यहां इसलिए हैं ताकि राज्य प्रशासन की अपने पांवों पर खड़े होने में मदद कर सकें. और राज्य में तैनात कुछ विशेष सुरक्षा बल तो केंद्रीय बलों से भी बेहतर हैं. जब हमें तैनात किया जाता है तो मैं हमेशा अपने लड़कों से कहता हूं कि हमें सबसे मुश्किल इलाकों में लड़ाई लड़नी है. लेकिन हम स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर काम करते हैं. हम अकेले काम करने वाले बल नहीं हैं. जब भी सीआरपीएफ की तैनाती किसी दुर्गम क्षेत्र में होती है तो राज्य का कोई एक घटक खूंटी की तरह आपके साथ होना चाहिए.

खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के मामले में भी समस्या की बात कही जा रही है.

इस मोर्चे पर स्थिति पहले से ठीक हुई है, फिर भी इसमें बेहतरी की गुंजाइश है. मेरा मानना है कि सारंडा और अबूझमाड़ जैसे इलाके हमारी सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक धब्बा हैं. हम इसी धब्बे को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं. हम यहां इसलिए नहीं हैं कि हमें किसी के साथ सैद्धांतिक लड़ाई करनी है. बल्कि इसलिए हैं कि कानून का राज सुनिश्चित हो. हम मानते हैं कि अगर समग्र विकास के साथ कानून-व्यवस्था भी ठीक से चले तो चीजें बेहतर होंगी. सामाजिक कार्यकर्ता कुछ चुनिंदा घटनाओं की बात कर रहे हैं. मैं उनसे एक सवाल पूछना चाहूंगा. क्या हम कोई पिकनिक मना रहे हैं? क्या हम कोई अराजक सेना हैं या फिर गैरजिम्मेदार मिलिशिया? हम एक जिम्मेदार बल हैं जो विद्रोही गतिविधियों से निपटने का काम करता है. हम वहां एक जिम्मेदारी पूरी करने के लिए स्थानीय पुलिस के साथ गए. अगर दुर्भाग्य से कुछ निर्दोष लोगों को भी नुकसान पहुंचा हो तो यह खेद की बात है. हमने कम से कम ताकत के साथ प्रतिक्रिया दी थी. यह दिखाता है कि हम ज्यादा से ज्यादा संयम बरतते हैं. मैं टीम के कप्तान पर सबसे ज्यादा भरोसा करता हूं. उस आदमी पर जो आगे बढ़कर नेतृत्व करता है. एक डीआईजी कैंप में बैठा भी रह सकता था. वह नेतृत्व करने क्यों गया? क्योंकि वह टीम को प्रोत्साहित करना चाहता था ताकि इस खतरनाक इलाके में उसका मनोबल बढ़े. नहीं तो उसे जाने की क्या जरूरत है? वह बैठा रहता और अपने कमांडेंटों को जाने के लिए कहता. 

क्या इस घटना की कोई जांच हो रही है?

एक मजिस्ट्रेटी जांच जारी है. जांच के हमारे अपने तरीके भी हैं. दोनों ही चीजें चल रही हैं.

लापरवाही से उपजी लाचारगी

बात दो साल पहले की है. 2010 के एशिया कप क्वालीफाइंग टूर्नामेंट की. भारतीय फुटबॉल टीम अंडर -19 का मैच चल रहा था. ढाका में हो रहे उस मैच में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व कर रही 16 साल की एक लड़की जब मैदान में उतरी तो उसकी बिजली -सी गति और तकनीक का तालमेल देखकर लोगों के मुंह से बरबस ही निकल पड़ा था, ‘ये तो लेडी बेकहम है.’ वह लड़की झारखंड की नूपुर टोपनो थी. टीम के कोच ने भी तब नूपुर को भारतीय टीम का भविष्य बताया था.

लेकिन ये बातें अब पुरानी हो चुकी हैं. आज करीब दो साल बाद नूपुर अपने चोटिल दाहिने पांव के इलाज की बाट जोह रही हैं. उनके इलाज के लिए जिम्मेदार स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) इलाज करवाने के बजाय रोज नए-नए बहाने गढ़ रहा है. साई के ही मैदान में 10 जनवरी, 2011 को एक अभ्यास मैच के दौरान नूपुर अपनी साथी खिलाड़ी श्वेता से टकरा गई थीं. इससे उनके दाहिने पैर का लिगामेंट डिसप्लेस हो गया. लेकिन किसी ने उसकी इस चोट को गंभीरता से नहीं लिया. नतीजा यह हुआ कि अब 18 साल की हो चुकी नूपुर साई के खेल मैदान में अपना हुनर दिखाने के बजाय दर्शक दीर्घा में बैठकर अपने साथी खिलाड़ियों को खेलते हुए देखती रहती हैं. 

नूपुर आज भी साई के होस्टल में रहती हैं. उनका इलाज क्यों नहीं हो सका, जब यह सवाल हम साई के रांची केंद्र के प्रभारी सुशील वर्मा से पूछते हैं तो उनका जवाब आता है, ‘हम नूपुर के इलाज के लिए हायर अथॉरिटी से बात कर रहे हैं.’ लेकिन डेढ़ साल से इस दिशा में कोई पहल क्यों नहीं हुई, यह पूछने पर वे नूपुर को ही दोषी ठहराने लगते हैं. कुछ इसी तरह की बात फुटबॉल टीम के कोच सुनील कुमार भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘हमने इलाज करवाया था. लेकिन वह बार-बार चोटिल हो जाती है.’

लेकिन हकीकत यह है कि डॉक्टरों ने नूपुर के ऑपरेशन की सलाह दी थी जो कभी हुआ ही नहीं. जब ऑपरेशन के बारे में कोच सुनील और प्रभारी सुशील से पूछा जाता है तो वे बगलें झांकने लगते हैं. फिर एक चुप्पी के बाद जवाब आता है, ‘उच्च पदाधिकारियों से बात कर रहे हैं.’ लेकिन सच्चाई यह है कि सरकारी अस्पताल में नूपुर को एक बार दिखाने के बाद साई प्रभारी तथा कोच ने उनके इलाज में कभी कोई खास दिलचस्पी ही नहीं दिखाई. खिलाड़ियों के इंश्योरेंस का लाभ भी नूपुर को नहीं मिला. ऐसा क्यों? अधिकारियों के पास इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं था. 

साई के हॉस्टल में नुपूर हमें अपने बारे में बताती हैं. कहती हैं, ‘मुझे बचपन से ही खेलों से प्यार रहा है. मैं हॉकी भी अच्छा खेलती हूं लेकिन फुटबॉल मेरा पहला प्रेम है. यही वजह है कि मैं फुटबॉल में रम गई.’ नूपुर झारखंड के गुमला जिले के पुगु करिंगा गांव की निवासी हैं. अपने गांव के लोगों को खेलते हुए देख कर उन्होंने हॉकी और फुटबॉल खेलना सीखा. प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गुमला में ही हुई, लेकिन खेलों के प्रशिक्षण के साथ पढ़ाई करने के लिए वे रांची आ गईं. यहां उन्होंने इंटर की पढ़ाई पूरी की और विश्व स्तर की खिलाड़ी बनने के सपने के साथ साई के हॉस्टल की ओर रुख किया. 

बातचीत के दौरान नूपुर पूछती हैं कि क्या सर (साई के अधिकारियों) को पता है कि आप मीडिया से हैं और हमसे बात करने आई हैं. क्या सर भी कमरे में आने वाले हैं? हम नूपुर को आश्वस्त करते हैं तब वे आगे की बात बताती हंै. नूपुर कहती हैं, ‘मैंने अब तक तीन-चार डॉक्टरों को दिखाया है पर अथॉरिटी ने इस बाबत कोई सहयोग नहीं दिया.’ इस दौरान कमरे में सात-आठ दूसरी खिलाड़ी भी मौजूद हैं. वे बीच-बीच में बोल पड़ती हैं, ‘सर ने आपको झूठी सूचनाएं दी हैं. नूपुर ने खुद से ही पहल कर अब तक अपना इलाज करवाया है लेकिन ऑपरेशन का पैसा नहीं होने की वजह से वह आगे का इलाज नहीं करवा पा रही है.’ 

नूपुर से अभी बात हो ही रही है कि कमरे में सुशील कुमार और हॉस्टल वार्डन सुब्बो टोप्पो भी आ पहुंचते हैं. सुशील कुमार कहते हैं, ‘यह लड़की है और इलाज के दौरान अटेंडेंट के रूप में इसके माता-पिता का होना जरूरी है. इसके माता-पिता आते ही नहीं हैं.’ लेकिन नूपुर बीच में बोल पड़ती हंै, ‘सर ने मुझसे कभी मां-पिता को बुलाने के लिए कहा ही नहीं.’ नूपुर की सहेलियां इस पर सहमति जताती हैं. नूपुर आगे बताती हैं, ‘मेरी मां बचपन में ही गुजर गईं. पिता फौज में हैं और हम चार बहनों को उन्होंने ही पाला-पोसा है. अगर बाबा को कहा जाएगा तो वे तो उल्टे पैर दौड़े चले आएंगे.’ बीच में ही टोकते हुए नूपुर की सहेली शकुंतला कहती हैं, ‘इसे देखकर आपको विश्वास नहीं हो रहा होगा कि यह उम्दा खिलाड़ी है. आप इससे बाएं पैर से किक लगवा कर देखिए तब आपको पता चलेगा.’ 

हम नूपुर की फोटो लेना चाहते हैं लेकिन पहले ही उसे ऐसा न करने का इशारा कर दिया गया है इसलिए वह मना कर देती है. चलते-चलते हम वार्डन से कहते हैं कि नूपुर बेहतरीन खिलाड़ी हैं. लगनशील और ईमानदार भी. इलाज हुआ होता तो वे आपकी शिकायत आपके ही सामने करने का साहस कैसे जुटा पातीं? जवाब में वे सिर झुकाए चुपचाप खड़े रहते हैं. 

हालांकि इन सबके बावजूद नूपुर को लेकर अभी उम्मीदें बची हुई हैं. खिलाड़ियों की चोट के विशेषज्ञ डॉ अमित दुबे का मानना है कि अगर नूपुर का ऑपरेशन अब भी हो जाए तो वे मैदान में वापस लौट सकती हैं. डॉ दुबे कहते हैं, ‘फरवरी-मार्च (2012) में ही नूपुर को मेरे पास लाया गया था तब मैंने एमआरआई टेस्ट करवाने की सलाह दी. लेकिन अथॉरिटी के पदाधिकारी उसे लेकर दोबारा मेरे पास आए ही नहीं.’

विजय की चाह, भटकाव की राह

पटना की एक चौपाल में कुछ दिन पहले बिहार की हालिया राजनीतिक हलचल की चर्चा चल रही थी. वरिष्ठ कम्युनिस्ट उपेंद्रनाथ मिश्रा ने कुछ दिन पहले का एक प्रसंग सुनाते हुए कहा, ‘पटना से सटे नौबतपुर के निकट तरेतपाली मठ में एक यज्ञ चल रहा है. यह यज्ञ चार माह तक चलने वाला है. उस यज्ञ में एक दिन लालू प्रसाद यादव अपने भरोसेमंद साथी के साथ पहुंचे. लालू ने सहयोग राशि के तौर पर यज्ञ में मोटी रकम दान में दी, अपने साथी को भी देने को कहा. बाद में वहां उपस्थित लोगों को समझाया कि ‘आप लोगों के बीच हमें लेकर गलतफहमी पैदा हुई थी कि हम दुश्मन हैं. गलतफहमी दूर कीजिए और खुद आंककर देखिए कि हमने क्या कभी आप लोगों का बुरा चाहा!’ लालू के शब्दों में पश्चात्ताप की झलक थी.’ बतकही चल रही थी, चटखारे ले-लेकर नेताओं से जुड़े प्रसंग सुने-सुनाए जा रहे थे. लिहाजा पहले तो लगा कि मिश्रा जी सिर्फ मजे लेने के लिए कहानी सुना रहे हैं. लेकिन तस्दीक करने पर मालूम हुआ कि लालू प्रसाद चार जुलाई को सच में वहां पहुंचे थे और मठाधीश धरनीधर से मिले थे. सार्वजनिक भाषण तो नहीं दिया लेकिन दान देने की बात जरूर सामने आई.

 असल में तरेतपाली मठ के जरिए जिस सवर्ण समूह के बीच लालू प्रसाद पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं उसमें कुछ भी नया नहीं है. उनका इस मठ से पुराना रिश्ता रहा है. वैसे भी मंदिरों-मठों में लालू की की आवाजाही सामान्य बात है. कभी सोनपुर, कभी देवघर-बासुकीनाथ मंदिर, फौजदारी बाबा के दरबार में तो कभी तरेतपाली मठ में वे आते-जाते रहते हैं. धर्म के जरिए भावनाओं के दोहन की कोशिश भी करते रहे हैं. अभी कुछ ही दिन पहले उन्होंने कहा कि सरकार के पाप से राज्य अकाल के गाल में सामने वाला था लेकिन उन्होंने राबड़ी देवी के साथ जाकर भगवान की आराधना की तो बारिश हुई. इसके पहले भी लालू नीतीश द्वारा सूर्यग्रहण के दौरान बिस्कुट खा लेने का बयान दे चुके हैं. धार्मिक भावनाओं को उभारकर राजनीतिक पैंतरेबाजी करना उनकी प्रवृत्ति बनती जा रही है. जानकार मानते हैं कि सब कुछ गंवाने के बाद होश में आए लालू एक वोट बैंक की तलाश में ऐसे रास्ते पर निकल गए हैं जो उन्हें दोबारा खड़ा भी कर सकता है और उतनी ही संभावना है कि वे इतिहास का हिस्सा बन कर रह जाएं.

जदयू-भाजपा के रिश्ते में आई हालिया खटास से भी लालू उत्साहित हैं. उन्हें लगता है कि दोनों दलों का अलगाव उनकी वापसी को संभव बना सकता है.

केंद्र में संभावनाओं के सभी दरवाजे बंद होने, कांग्रेस द्वारा कतई घास नहीं डाले जाने के बाद लालू प्रसाद ने बिहार में अपनी आवाजाही बढ़ा दी है. वरना बिहार और पटना से उनका नाता सुबह-शाम का ही रह गया था . लालू की इस कमजोरी को भांपकर ही नीतीश कुमार ने उन्हें ‘नान रेसिडेंट बिहारी’ का नाम दिया था. हालांकि दिल्ली में मगन लालू ने इस बीच अपने हिसाब से कुछ जरूरी घरेलू काम भी निपटाए. मसलन बेटे के लिए औरंगाबाद में लारा (लालू-राबड़ी) नाम से मोटरसाइकिल शो रूम खुलवाया, बेटियों की शादी की, विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर हार कर घर में बैठी पत्नी राबड़ी देवी को विधान परिषद सदस्य बनवाया और दिल्ली में अपने पार्टी कार्यालय का नामकरण राबड़ी भवन कर दिया.

जरूरी घरेलू कामकाज से निपट कर अब वे इधर कुछ दिनों से कमर कसकर बिहार की राजनीति में हाथ-पांव मारते हुए दिख रहे हैं. लेकिन उसकी दिशा अब भी तय नहीं कर पा रहे हैं. राजद के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जमीन पर रहने और जमीनी सच्चाई से अवगत होने की हमारे नेता की आदत सालों पहले ही छूट गई है. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के उत्थान के बाद वे आंखों में चमक लिए घूम रहे हैं कि क्या पता कब करिश्मा हो जाए, लेकिन मुलायम-अखिलेश की तरह सरकार के खिलाफ जमीनी संघर्ष का माद्दा नहीं जुटा पा रहे हैं. उनके पास ठोस रणनीति का भी अभाव है.’

मुसलिम-यादव समीकरण साधकर डेढ़ दशक तक बिहार में राज करने वाले लालू की कार्यशैली देखकर यह बात सही भी लगती है. इन दिनों दो-चार दिन के अंतराल पर वे नीतीश सरकार को निशाने पर लेते हैं और कभी-कभी आंकड़ों की भाषा में भी बात करते हैं. इससे लगता है कि वे गंभीर हैं. लेकिन इसी बीच वे कुछ ऐसा भी कर देते हैं या बोल देते हैं जिससे उनका पुराना खिलंदड़ रूप सामने आ जाता है. पिछले दिनों जब कुख्यात ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया की आरा में हत्या हुई तो उन्होंने मुखिया को बड़ा आदमी बता दिया. पिछले सप्ताह जब वे अपनी पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में पहुंचे तो उन्होंने नया शिगूफा छोड़ दिया कि राज्य का मुख्यमंत्री कोई सवर्ण भी हो सकता है. इसके बाद उन्होंने 50 प्रतिशत युवाओं को टिकट देने की घोषणा की.

स्थापना दिवस समारोह निपटाने के बाद लालू प्रसाद सात से दस जुलाई तक समस्तीपुर, दरभंगा, सीतामढ़ी इलाके में चार दिवसीय यात्रा पर निकले तो पारंपरिक तौर पर नीतीश को फरेबी, ठग और विश्वासघाती नेता बताते रहे. इसी दौरान उन्होंने राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी द्वारा डेढ़ महीने पहले दिए गए एक बयान का जवाब भी दिया. डेढ़ माह पहले सुशील मोदी ने लालू को बूढ़ा कहा था. इतने दिनों बाद लालू को पता नहीं कैसे उस बयान की याद आ गई. उन्होंने मोदी को ललकारा- ’हमरा सचिव था मोदी अब हमको बूढ़ा कहता है. हिम्मत है तो पटना के गांधी मैदान में आके कुश्ती में फरिया ले.’

बड़ी संभावना है कि जिस दिन नरेंद्र मोदी के नाम पर नीतीश भाजपा से अलग होंगे, उस दिन लालू के पास से मुसलमानों का भी एक बड़ा वोट बैंक नीतीश के पाले में चला जाएगा.

जानकार मानते हैं कि लालू का यह सब कहना, सवर्ण मोह में फंसते जाना उनके भटकाव और द्वंद्व को ही दिखाता है. नीतीश शासन से एक वर्ग में बढ़ती नाराजगी के बावजूद लालू उस खाली जगह को भरते हुए नहीं दिख रहे. वे सवर्णों को ललचाने में लगे हैं जबकि पिछले माह उनकी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में तीन प्रमुख सवर्ण नेता (रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह, उमांशकर सिंह) गायब थे.

तब खुसुर-फुसुर शुरू हो गई थी कि शायद राजपूत नेता नाराज हो गए हैं, इस बार राजद के स्थापना दिवस में शामिल होकर उन तीन नेताओं में से एक जगतानंद सिंह ने सफाई दी कि वे शक-शुबहा दूर करने के लिए आए हैं. राजपूत नेता तो फिर भी लालू के खेमे में शुरू से रहे हैं लेकिन भूमिहारों ने उनसे हमेशा दूरी बनाए रखी. अब लालू प्रसाद की नजर इस वर्ग पर है जिसके बारे में यह कहा जा रहा है कि यह समूह धीरे-धीरे नीतीश से नाराज होता जा रहा है.

बिहार में दलितों पर बढ़ते अत्याचार के दौर में भी अगर लालू सवर्ण राग गाते फिर रहे हैं तो उसके पीछे यही बड़ी वजह बताई जा रही है कि वे भूमिहारों को अपने पाले में करके समीकरण बदलना चाहते हैं. ऐसा करते समय वे यह भूल जाते हैं कि अगर सवर्णों के बीच उनकी खलनायक जैसी छवि बनी थी तो उसकी सबसे बड़ी वजह भूमिहार ही थे. जानकारों के मुताबिक भूमिहारों की लालू से रार बहुत गहरी है और नीतीश से छोटी-मोटी नाराजगी उन्हें लालू के पाले में नहीं ला सकती. इसके अलावा नीतीश के साथ भाजपा की बैसाखी है जिससे भूमिहार सबसे ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं.

लालू वाम दलों से भी समर्थन की उम्मीद लगाए बैठे हैं. वरिष्ठ वाम नेता उपेंद्र नाथ मिश्र कहते हैं, ‘फिलहाल यह स्वप्न जैसा है. वामपंथी यहां अपनी जमीन तलाशने में लगे हुए हैं, वे लालू प्रसाद के साथ जाने की भूल दोबारा नहीं करेंगे.’ लालू की बढ़ी हुई सक्रियता के पीछे मिश्रा जदयू-भाजपा के रिश्तों में आई तल्खी की भूमिका देखते हैं. लालू इससे करिश्मे की उम्मीद लगाए बैठे हैं. उन्हें लगता है कि जिस दिन दोनों दल अलग हो जाएंगे, उस दिन जातीय समूह के आधार पर वे नीतीश से बड़े नेता बन जाएंगे, क्योंकि यादव और मुसलिम का उनका समीकरण राज्य में एक बड़ा वोट बैंक बनाता है. हालांकि इसको लेकर भी लालू कल्पनालोक में खोए हुए हैं. यादवों के सबसे बड़े गढ़ मधेपुरा में शरद यादव उन्हें आउट कर चुके हैं, सोनपुर में राबड़ी हार चुकी हैं और मुसलमानों में पसमांदा समूह का राजनीतिक बंटवारा करके नीतीश ने उनके एमवाई समीकरण में सेंध लगा दी है.

इन सियासी हालात के विपरीत लालू प्रसाद के रणनीतिकार भाजपा-जदयू के बीच पैदा हुई खटास के आधार पर समीकरण बिठाने में लगे हैं. 2010 के विधानसभा चुनाव में एक सिरे से सफाये के बावजूद उनका विश्वास उस आंकड़े पर टिका है कि जदयू का वोट प्रतिशत राजद से सिर्फ चार प्रतिशत आगे है और भाजपा तमाम उफानी जीत के बावजूद वोट प्रतिशत में राजद से करीब दो प्रतिशत पीछे है. लालू के रणनीतिकारों को लगता है कि दोनों अलग हुए तो लालू ही सबसे बड़े नेता होंगे. नीतीश का कुरमी जातीय आधार लालू के यादव से काफी कम है और भाजपा इधर-उधर के जुगाड़ से लालू से पार नहीं पा सकेगी. लेकिन लालू के रणनीतिकार शायद अब भी लालू को भुलावे में रखना चाहते हैं. नीतीश को हटाकर भी देखें तो 1990 के बाद देश-समाज तेजी से बदला है. मध्यवर्ग का तेजी से उभार हुआ है और जाति के साथ दूसरे किस्म के विकास-अस्मिता आदि का घोल मिलाकर ही राजनीति का रसायन तैयार किया जा सकता है. यह लालू के एजेंडे से गायब है और यही नीतीश का प्रमुख हथियार है.