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'मुझे नकल मर्डर बनानी पड़ी ताकि ओरिजिनल गैंगस्टर बना सकूं'

हम मलाड की एक बहुमंजिला इमारत की छत पर अनुराग बसु से मिले. भिलाई में पला-बढ़ा एक मध्यवर्गीय बंगाली लड़का, जो बीस से थोड़ा ही ऊपर होगा, जब उसने टीवी का मशहूर सीरियल तारा बनाया. बाद में और भी बहुत-से मशहूर धारावाहिक और फिल्में. लेकिन इतना ईमानदार कि यह कहने से पहले एक पल को भी नहीं झिझकता कि उसे ‘नकल’ मर्डर बनानी पड़ी ताकि अपनी असल गैंगस्टर बनाने को मिले. बाद में हमने समोसे खाए और बरफी  की बातें कीं. नि:स्वार्थ प्यार की, राम जैसे किरदारों के बोरिंग होने की, एक्यूट ल्यूकीमिया से उबरने के बाद उनके जीवन के बदलने की, राजकुमार हीरानी की फिल्मों के पहले दिन के शो के लिए उतावला रहने की, काइट्स  की, राकेश रोशन के लोकतंत्र की और महेश भट्ट की बातें, जो चाहते हैं कि उनके सब निर्देशक एक ही तरह की फिल्में बनाते रहें. अनुराग की फिल्मों की तरह ही उनकी बातों में भी दुर्लभ बेबाकी है, बेचैनी है, लेकिन एक व्यावहारिक संतुलन भी है. उनकी फिल्मों का अपना कोई एक अलग और स्पष्ट रंग भले ही न हो (और वे ऐसा चाहते भी हैं), लेकिन उनकी फिल्में हिंदी सिनेमा को उम्मीद का एक पक्का रंग देती हैं. हम उस प्यारे रंग को सीधे आपसे बात करने देते हैं.

फिल्म बनाते हुए यह मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगता है कि आप फिल्म की खूबसूरती, उसकी ऐस्थेटिक्स भी बरकरार रखें और वह लोगों को भी अच्छी लग रही हो. फिल्म मनोरंजक हो, समांतर फिल्म न हो. हमारे यहां राजकुमार हीरानी ने ही इस फॉर्मूले को क्रैक किया है. वे ऐसी फिल्में बना रहे हैं, जिनकी आलोचक भी तारीफ करेगा, फिल्मकार भी, दर्शक भी. अपनी फिल्मों से मैं भी वही जगह ढूंढ़ रहा हूं. लेकिन पता नहीं कि मिलेगा क्या! जिस दौर में मैं इंडस्ट्री में आया, यहां लोग किसी विदेशी फिल्म की डीवीडी ही देते थे बनाने को. अगर आपको बनानी है तो कोई और विकल्प ही नहीं है. मेरे पास गैंगस्टर की स्क्रिप्ट थी पहले से और बनाना भी चाहता था, लेकिन गैंगस्टर को कोई निर्माता बना नहीं रहा था क्योंकि वो ओरिजिनल थी. उसे बनाने के लिए मुझे पहले एक नकल बनानी पड़ी, मर्डर. खुद को साबित किया मर्डर में, उसका ठप्पा लग गया, तब मैं अपनी ओरिजिनल फिल्में बना पाया. वह अजीब दौर था. लोग डंके की चोट पर नकल बना रहे थे. मैंने स्क्रीनप्ले लिखकर ‘मर्डर’ को मूल फिल्म से थोड़ा-बहुत अलग किया लेकिन बीज तो प्रेरित ही था.

‘मर्डर’, ‘गैंगस्टर’ के बाद ‘लाइफ इन अ मैट्रो’ लेकर भी मैं भट्ट साहब के पास ही गया था लेकिन वे एक ही तरह की फिल्में बनाना चाहते थे, उनसे हटना नहीं चाहते थे. उन्होंने खुद अलग अलग तरह की फिल्में बनाई हैं, लेकिन वे नहीं चाहते कि उनके निर्देशक अलग अलग तरह की फिल्में बनाएं. इसीलिए मैं ‘मैट्रो’ बाहर ले के गया. मैं उनके ढांचे में नहीं ढला. लेकिन उनसे सीखा बहुत कुछ. कोई भी फिल्म पूरी देखने के बाद जो वो समझते हैं ना फिल्म को, वो उनका एरियल व्यू कमाल का है. अब भी फिल्में बनाने के बाद मैं कई बार उनकी नजर से ही देखना चाहता हूं अपनी फिल्म को, उससे डीटैच होके. ‘काइट्स’ के बाद मीडिया ने जितना कहा, मैं उतना दुखी या असंतुष्ट नहीं था. ऐसी बातें बाहर आईं कि मैंने जैसे अपनी ही फिल्म को डिसऑन कर दिया है. ऐसी बात नहीं है. फिल्म मैंने ही बनाई है. किसी का कोई हस्तक्षेप हुआ है तो इसीलिए ना कि मैंने होने दिया है. जैसी भी बनी, जैसी भी प्रतिक्रियाएं आईं, लेकिन फिल्म तो वह मेरी ही है. मैं बहुत गरमदिमाग और जिद्दी इंसान हूं. मैं इससे नाखुश था कि जिस तरह से शुरू की थी, फिल्म वैसी नहीं रही और प्रमोशन में इतनी बड़ी बन गई.

बहरे-गूंगे की कहानी सुनते ही लगता है कि कोई डार्क फिल्म होगी लेकिन बरफी के साथ ऐसा नहीं है, यह जिंदगी का जश्न मनाने की कहानी है
फिल्म बरफी का एक दृश्यलेकिन ऐसा भी नहीं हुआ कि मेरे दो साल पूरे पानी में चले गए. मैंने बहुत कुछ पाया है उस फिल्म से. दुनिया में पहचान मिली. उससे पहले मुझे बाहर कोई नहीं जानता था. मैट्रो और गैंगस्टर की यहां आलोचकों ने बहुत तारीफ की लेकिन बाहर के अखबारों ने एक लाइन तक नहीं लिखी उनके बारे में. फिल्म रेटिंग की वेबसाइट ‘रोटन टॉमेटो’ में देखिए, अभी भी उसके 82 प्रतिशत वोट हैं. बड़े बड़े आलोचक, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट वगैरा, जिनके आलोचकों के मैं रीव्यू पढ़ता हूं, उन्होंने अच्छा रीव्यू किया. मुझे उम्मीद नहीं थी इसकी, क्योंकि बीच की फिल्म थी वो. ना बॉलीवुड थी, न हॉलीवुड, बीच की खिचड़ी थी वो. ‘काइट्स’ के बाद जानबूझकर चुनिंदा रीव्यू पढ़े मैंने. स्टार कितने दिए हैं, यह पूछकर पढ़ता था. मैंने फिल्म के बारे में खराब चीजें पढ़ी ही नहीं, इसलिए डिप्रेशन नहीं हुआ. नकारात्मकता नहीं आने दी अपने अन्दर. क्योंकि जिस चीज पर आप इतनी मेहनत करते हैं, लोग उसे उड़ा देते हैं तो आप पर, आपके अगले काम पर उसका बहुत बुरा असर पड़ता है. मैं इसलिए नाराज था कि ‘काइट्स’ के बारे में हमने ठीक तरह से लोगों को पहले बताया नहीं. लोग कुछ और सोच कर आए और उन्हें कुछ और मिला. हमें तो पता था कि हम क्या बना रहे हैं. राकेश रोशन से बड़ा ‘मासी’ प्रोड्यूसर इस देश में नहीं है. इसलिए ऐसा नहीं है कि हमें पता नहीं था. लेकिन करते करते, जिस तरह से शुरू हुई थी, वो नहीं रही, पैन इंडिया बड़ी फिल्म बन गई और लोगों को भी वही बताया जाने लगा.

आपने जैसी फिल्म बनाई है, उसे उस तरह से लाने की हिम्मत होनी चाहिए. जो बनाई है, उसी तरह से उसी फिल्म को प्रमोट करने की, लेकिन प्रमोशन के टाइम पे लोग डर जाते हैं – ‘नहीं यार, इसे और तरीके से पेश करते हैं ताकि लोग और देखने आएं.’ और जब आपकी फिल्म महंगी खरीदी बेची जाती है तब आपका मुख्य लक्ष्य पहले 3 दिन के दर्शक होते हैं. तब आप ऐसे प्रोमो बनाते हैं ताकि कुछ भी करके कमाल की ओपनिंग लग जाए. लेकिन मेरा हमेशा यही मानना है कि आप फिल्म के लिए सच्चे रहो. जैसी फिल्म है, वैसा ही ट्रेलर और प्रमोशन होना चाहिए. ‘काइट्स’ का विषय राकेश जी ने मुझे दिया था. कहानी से ही फिल्म तय हो जाती है. निर्देशक का काम है उसे निखारना. मैंने और राकेश जी ने, सबने मिलके स्क्रीनप्ले लिखा. उस कहानी को जितना रोचक बनाया जा सकता था, बनाया. और डायरेक्शन में कोई हस्तक्षेप नहीं था. शूटिंग में ऐसा नहीं था कि राकेश जी पूरे समय पीछे बैठे रहते थे. वह फिल्म बहुत लोकतांत्रिक ढंग से बनी है. इस तरह के लोकतांत्रिक वातावरण में मैंने इससे पहले काम नहीं किया था जहां 3-4 लोग बैठ के फैसले लेते हों. लेकिन यह सब स्क्रिप्ट के लेवल तक ही था.

हां, जिस तरह की आजादी मैंने भट्ट साहब के यहां इंजॉय की थी, कि आप ही लिखें, डायरेक्ट करें, कैसे भी बनाएं, यहां ऐसा नहीं था. यह भी नहीं था कि राकेश जी के यहां काम के ढंग का मुझे पता नहीं था और बनते-बनते पता चला. मुझे पता था कि वहां इस तरीके से ही फिल्म बनेगी, इसलिए मैंने भी उसी तरीके से बनाई. लेकिन उसके बाद मैंने यह भी तय किया कि अगली बार से हमेशा अपने मन से ही काम करूंगा, ऐसे सिस्टम में नहीं करूंगा. फिल्म डेमोक्रेटिक ढंग से नहीं बन सकती, उसमें तानाशाही ही चलती है. एक के दिमाग से ही काम हो पाता है. यह लोकतांत्रिक सेटअप खराब नहीं है. यशराज में, विधु के यहां भी ऐसे ही बनती हैं फिल्में, लेकिन मैं इसमें फिट नहीं बैठता. मुझे लगता है कि मेरे किरदार अपने रिश्तों में, प्रोफेशन में, या जीवन में ठीक से परिभाषित नहीं रहते क्योंकि मैं खुद ही ठीक से परिभाषित नहीं हूं. मेरे आसपास के लोग भी नहीं हैं, हम सब कनफ्यूज्ड हैं. मैं जब बारहवीं में पढ़ रहा था, मुझे पता नहीं था कि बम्बई आऊंगा, ग्रेजुएशन किया तो मुझे पता नहीं था कि डायरेक्टर बनना है. मैं रिलेशनशिप में भी यहां से वहां बहुत पहले से गुलाटी मारता था. वह मेरा व्यक्तित्व दिखता है शायद. सबमें कमियां या ऐब होते हैं, मैं उन्हें छिपाना नहीं चाहता. मैं अपनी फिल्मों में राम की कहानी नहीं दिखाना चाहता. ऐसे किरदार मुझे बोरिंग लगते हैं.

मर्डर से पहले मैं एक एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर से गुजरा था. उसी ने मुझे जोड़ा उस कहानी से. जैसा जीवन आप जी रहे होते हैं, आप वैसी ही कहानियां चुनते हैं अपने आसपास से. इसीलिए अब बरफी बन रही है. उस वक्त मैं कभी बरफी न बनाता. बीमारी के बाद मेरा फोकस बदल गया, पहले प्राथमिकताओं का क्रम था – पैसा, काम, घर, परिवार, प्यार. अब काम अंत में आ गया, पैसा भी. पहले परिवार और घर. हालांकि अब पैसा ज्यादा कमा रहा हूं. पैसे के पीछे भागो तो कभी हाथ में नहीं आता. नहीं भागो तो अपने आप आता है. लेकिन सिर्फ ये प्राथमिकताएं ही बदली हैं. बाकी कुछ नहीं बदला. बाकी तो आज भी कभी कभार सिगरेट पी लेता हूं. नहीं पीनी चाहिए मुझे.

इन दिनों बरफी की कहानी के बारे में इस डर से नहीं बताना चाह रहा कि कहीं मैं सारी कहानी, या अन्दरूनी परतें न बता दूं कहते कहते. उसमें आपस में जुड़े हुए हुक हैं. उस कहानी का आपको पता न हो, तभी देखने का मज़ा आएगा. बहरे गूंगे से डार्क फिल्म लगती है, क्योंकि आमतौर पर ऐसे किरदारों की ऐसी ही फिल्में बनती हैं, लेकिन यह फिल्म जिन्दगी का जश्न मनाने की कहानी है. हमें वे बेचारे लगते हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि वे बेचारे हैं. पहले कुछ छोटी कहानियां लिखी थीं. उनसे इश्क हो गया मुझे. काइट्स के बाद उन्होंने फिल्म का शेप लिया. कहानी से मिलते जुलते किरदारों से मैं मिला हूं. बीमार पड़ने से पहले तक मैं बहुत स्वार्थी था, पैसे के पीछे भागता था. लेकिन बीमारी के बाद कुछ बदलाव आया, कुछ एनजीओज़ से जुड़ा. नज़रिया बदला. मैं न बदलता तो शायद यह कहानी मेरे दिमाग में नहीं आती. मुस्कान नाम का डिसएबिलिटी स्कूल है भिलाई में. वहां गया था. वहीं से मेरा मुख्य किरदार निकला.

मरफी रेडियो का एक विज्ञापन था ना, उसमें जो बच्चा था. फिल्म में मेरे मुख्य किरदार की मां वैसा ही बच्चा चाहती है – मरफी बेबी. जो बच्चा होता है, उसका नाम मरफी रखा जाता है. त्रासदी यह कि उसकी मां रेडियो से शॉक लगने से ही मरती है. मरफी ठीक से बोल नहीं पाता और अपने अस्पष्ट उच्चारण में जब अपना नाम बोलता है तो वह बरफी जैसा सुनता है. धीरे-धीरे सारा शहर उसे बरफी ही कहने लगता है. हम सबमें इतना कपट भर गया है, निस्वार्थ प्यार तो चला ही गया है. भिलाई के उस स्कूल में मैंने देखा कि उनके बीच में वह निस्वार्थ प्यार है. मुट्ठी भर धूप और आसमान के साथ वे जी लेते हैं. इतनी शुद्ध प्रेमकहानी हम करते नहीं. इससे पहले मैंने भी कहां की है? बरफी मेरी पिछली फिल्मों से इतनी अलग है कि काइट्स से बरफी के सैट पर आने के बाद चार पांच दिन मुझे बहुत दिक्कत हुई. समझ ही नहीं आ रहा था कि कैमरा एंगल कैसे लगाऊं मैं.

जिस दिन रणबीर का आखिरी शॉट था और मैंने शॉट से पहले घोषणा की कि यह आखिरी शॉट है तो सारी यूनिट भावुक हो गई थी. ऐसा मैंने इससे पहले कभी किसी फिल्म में नहीं देखा. लोगों की आंखों में आंसू आ गए थे. पता न अहीं ये रणबीर ने किया है या किरदार ने, लेकिन वो पूरी यूनिट का लाड़ला बन गया था. जहां तक प्रियंका की बात है, बरफी की शुरुआत में ही आप भूल जाएंगे कि यह लड़की प्रियंका चोपड़ा है. यह करना बहुत बड़ी बात है. इलियाना शुरू में डर रही थी कि दो बड़े सितारों के साथ लान्च होके वो छिप न जाए. लेकिन धीरे-धीरे उसका डर चला गया. मेरे सेट पर थियेटर जैसा माहौल होता है. कोई बड़े छोटे का क्रम नहीं है. हम तो मेकअप वैन्स पर भी अभिनेताओं का नाम नहीं लिखते. रणबीर कपूर का नाम नहीं, किरदार का नाम लिखते हैं. बाहर आप कोई भी हों लेकिन जब आप सेट पर आएंगे तो सबके बराबर ही होंगे.

 

‘फासीवादी विचारों से टकरा कर ही अच्छा लेखन संभव हो पाता है’

आलोचना के शिखर पुरुष कहे जाने वाले नामवर सिंह सात दशक से भी ज्यादा समय से साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं. ‘कविता के नए प्रतिमान’ ,‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘कहानी- नई कहानी’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘छायावाद’ ‘इतिहास और आलोचना’ और ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ उनकी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं. ‘कविता के नए प्रतिमान’ और ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का पाठ हिंदी साहित्य के छात्र अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ की तरह करते हैं. ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए उन्हें 1971 में साहित्य अकादेमी सम्मान मिला था. वे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में भारतीय भाषा विभाग के संस्थापक अध्यक्ष हुए और वहां कई दशकों तक अध्यापन का कार्य भी किया. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त है. वे राजकमल प्रकाशन समूह से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘आलोचना’ का लंबे समय से संपादन कर रहे हैं. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से उन्होंने कलम नहीं चलाई है. लेकिन उनके कहे का भी वजन इतना है कि मौखिक साहित्य की परंपरा को भी उन्होंने समृद्ध करने में कोई कोर कसर नहीं रखी है. हालांकि वे मौखिक साहित्य को साहित्य नहीं मानते. 28 जुलाई को नामवर सिंह ने 86 साल पूरे किए. उनसे स्वतंत्र मिश्र की बातचीत.

आप आलोचना के शिखर पुरुष हैं. क्या उम्र के इस पड़ाव में आपको लगता है कि कुछ करना रह गया? 

देखिए, आकांक्षाओं पर कोई लगाम नहीं लगा सकता, लेकिन उम्र के इस पड़ाव में आकर पढ़ने-लिखने की क्षमता में कमी आ जाती है. एक अरसे से लिखना छूट गया है. अब बोलना ज्यादा होता है जिसे हम मौखिक साहित्य कहते हैं. लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर इसे साहित्य नहीं मानता. मेरे श्रद्धेय रामविलास शर्मा ने प्रतिज्ञा की थी कि वे सभा, गोष्ठियों में नहीं जाएंगे. उन्होंने इसे जीवन के अंतिम दिनों तक निभाया भी. वे आसन मार कर लिखते रहे. बाद के दिनों में वे लिख नहीं पाते थे. वे तैयारी करके रखते और कोई जाता और उनके कहे को कागज पर उतार लेता. मैं उन दिनों जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में था. मैंने उनके लिए यह व्यवस्था की थी. बाद की बहुत सारी किताबें उन्होंने बोलकर ही लिखवाई है. मैं ऐसा नहीं कर पाया. मुझे इसका अभ्यास भी नहीं है. मैं दिनभर पढ़ने-पढ़ाने, मिलने-मिलाने और सभा-गोष्ठियों में व्यस्त रहता और फिर रात को खाना खाकर दस बजे रात से लेकर सुबह के चार-पांच बजे तक रोज लिखने का काम करता. मैंने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ सात या आठ दिन में लिखी थी. ‘कविता के नए प्रतिमान’ मैंने एक महीने में पूरी की थी. पिछले 11-12 साल से दिन भर की व्यस्तताओं के बाद अब रात को सिर्फ पढ़ने का काम हो पाता है. 

पिछले दिनों आप पर  ‘जेएनयू में नामवर’ किताब आई. हाल ही में राजकमल से भी चार किताबें प्रकाशित हुई हैं. सामयिक प्रकाशन से भी प्रेम भारद्वाज के संपादन में आप पर एक किताब आई है. आप इसे कैसे देखते हैं?

सच पूछिए तो मुझे आशीष त्रिपाठी की किताबों के प्रकाशन से खुशी मिली है. आशीष बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं. अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में मेरे छपे लेखों को वे संकलित करने का काम कर रहे हैं. मेरी आठ पुस्तकें राजकमल से छप चुकी हैं जबकि चार पुस्तकें अभी प्रकाशित होनी हैं. आशीष की इस योजना के अंतगर्त दो साल के भीतर कुल बारह खंडों में इसे समेटने की योजना है. इससे लोगों को यह पता चलेगा कि मैंने बोलने से ज्यादा लिखने का काम किया है. ये साहित्य से संबंधित मेरे अलग-अलग विषयों पर लिखे गए लेख हैं. बहुत सारे लोग अपने भाषण तक का रिकॉर्ड भी रखते हैं. यह कला मुझे नहीं आती और मुझे यह थोड़ा अहंवादी भी लगता है. अज्ञेय जी शुरू से ही अपने साथ एक छोटा-सा टेप रिकॉर्डर लेकर चलते थे. इसलिए अज्ञेय जी का बोला हुआ कुछ भी लुप्त नहीं हुआ है. मैंने ऐसा कभी नहीं किया. मुझे लगता है कि ऐसा करने से आदमी आत्मचेतस हो जाता है. मुक्त होकर बोलने का अपना मजा है. 

राजेंद्र यादव ने बहुत लंबे अरसे से कहानी लिखनी बंद कर दी है. वे कहते हैं कि मुझे बड़े दायरे तक अपनी बात पहुंचानी है इसलिए मैंने वैचारिक लेखन का सहारा लेना शुरू कर दिया है. आप क्या सोचते हैं?

वे ठीक कर रहे हैं. यह समझदारी का सूचक है. उन्हें लगा कि मैं अब कहानी या उपन्यास नहीं लिख सकता हूं तब उन्होंने छोड़ दिया. वे जिस स्तर का लेखन चाह रहे होंगे नहीं लिख पा रहे होंगे. और ‘हंस’ के संपादक के तौर पर लिखना तो हो ही रहा था. सच है कि उन्होंने ‘हंस’ में अपनी लेखनी के बूते कई जरूरी बहसों को भी जन्म दिया है. उनका लेखन महत्वपूर्ण है. उन्होंने इन लेखों का संकलन भी तैयार करवाया है. 

लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या कहानी या उपन्यास की तुलना में वैचारिक लेखन की पहुंच ज्यादा लोगों तक होती है? 

वैचारिक लेखन अपने विचार के प्रचार के लिए होता है, जबकि रचनात्मक साहित्यिक लेखन आस्वाद के लिए. दोनों के कार्य अलग-अलग होते हैं. इस समय राजेंद्र यादव का वैचारिक लेखन ज्यादा लोगों तक पहुंच रहा है लेकिन एक समय था जब उनकी कहानियां बड़े दायरे तक पहुंच रही थीं. तात्कालिक समस्याओं पर उन्होंने खुलकर बहुत जोरदार ढंग से लिखा है. उनके वैचारिक लेखन को लोग नहीं भूल पाएंगे. 

पिछले दिनों आपने  ‘तद्भव’  पत्रिका के कार्यक्रम में साहित्य को सत्ता की कांता यानी जोरू कहा था. क्या आपको लगता है कि साहित्य सत्ता की जकड़ से बाहर हो पाया है? 

मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा है कि मैंने ऐसा कुछ कहा है. साहित्य सत्ता को चुनौती देने का काम करता है. लेकिन सत्ता लोकतांत्रिक है और यदि वह कोई काम लोक हित में करती हो तब उसकी आलोचना करने का कोई मतलब नहीं. लेकिन यदि कोई फासीवादी सरकार सत्ता में आती है तो वह मुक्त विचारों पर प्रतिबंध लगाती है. ऐसी स्थिति में सत्ता से टकरा कर ही अच्छा लेखन हो सकता है.

पिछले दिनों आपके भाई काशीनाथ सिंह को ‘रेहन पर रघ्घू’  के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया. उन्होंने  ‘तहलका’ को दिए इंटरव्यू में कहा था कि अगर उन्हें ‘काशी का अस्सी’  किताब के लिए पुरस्कृत किया गया होता तो ज्यादा खुशी मिलती. उन्होंने यह भी कहा था कि साहित्य अकादेमी ने ज्यादातर मौकों पर लेखकों को उनकी श्रेष्ठ रचना को पुरस्कृत करने के बजाय उनकी दूसरी कृति को सम्मानित किया है.

काशी की ‘काशी का अस्सी’ मुझे भी प्रिय है. काशी ने बिल्कुल ठीक कहा है. साहित्य अकादेमी की पुरस्कार देने की प्रक्रिया में ही खामियां हैं. पंत जी को उनकी बड़ी कमजोर किताब के लिए पुरस्कृत किया गया. उन्हें बहुत देर से पुरस्कार दिया गया. यशपाल और रेणु के साथ भी अकादेमी ने यही किया. रेणु को सर्वश्रेष्ठ कृति ‘मैला आंचल’ के लिए पुरस्कार नहीं दिया गया. जैनेंद्र जी को उनकी सबसे कमजोर किताब के लिए पुरस्कृत किया गया. उन्हें बहुत देर से पुरस्कृत किया गया. उदय प्रकाश के साथ भी ऐसा ही हुआ है. साहित्य अकादेमी ही नहीं बल्कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भी लोगों को अच्छी किताबों के लिए नहीं दिया गया है. कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ बहुत देर से मिला. निर्मल वर्मा को ज्ञानपीठ उनकी बहुत कमजोर किताब के लिए मिला है. पुरस्कार देने की प्रक्रिया में ही समस्या है जिसकी वजह से ऐसा होता आया है.उसकी राजनीति ही अलग है. इसलिए पुरस्कार किसी कृति या कृतिकार के श्रेष्ठ होने का मानदंड नहीं है. कई लेखकों के साथ ऐसा हुआ है. इसलिए काशी के साथ भी ऐसा हुआ है तो उससे काशी का लेखन छोटा नहीं होगा बल्कि पुरस्कार देने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठेगा. 

पत्रिका  ‘फॉरवर्ड प्रेस’  में प्रेम कुमार मणि ने लिखा है कि गोदान में प्रेमचंद का गांव दूर से दिखता है जबकि रेणु का गांव भोगा हुआ गांव है. वे रेणु को बड़ा करने के लिए प्रेमचंद को छोटा बता रहे हैं. आपकी टिप्पणी चाहूंगा.

पहली बात यह कि रेणु और प्रेमचंद की तुलना नहीं होनी चाहिए. तुलना समसामयिक लेखकों की ही होनी चाहिए. रेणु की तुलना उनके युग के लेखकों से की जानी चाहिए. प्रेमचंद से रेणु की तुलना कैसे हो सकती है. प्रेमचंद का ऐतिहासिक महत्व है. प्रेमचंद की तुलना में रेणु ने बहुत कम लिखा है. प्रेमचंद ने तीन सौ से ज्यादा कहानियां लिखी हैं. उनसे कई गुना बड़े उपन्यास लिखे हैं. प्रेमचंद के कथा-साहित्य की दुनिया बहुत बड़ी है. महत्वपूर्ण बात तो यह है कि उन्होंने स्वाधीनता संघर्ष के दौर में अपना लेखन किया. इसलिए उनकी जगह कोई नहीं ले सकता है. अलग-अलग दौर में बहुत बड़े साहित्यकार हो सकते हैं लेकिन वे प्रेमचंद नहीं हो सकते. 

दलित साहित्य और स्त्री लेखन के बारे में आप क्या सोचते हैं? 

दलित लेखन बड़ी मात्रा में हो रहा है, यह बहुत अच्छी बात है. लेकिन स्त्रियों के मुकाबले दलित लेखन कम हो रहा है. गुणवत्ता के दृष्टिकोण से अगर देखें तो दलित लेखन के मुकाबले स्त्रियों का लेखन ज्यादा मजबूत भी है. दलित लेखन में कुछ ही लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं. दलित विमर्श की तुलना में स्त्री विमर्श पर केंद्रित पत्रिकाएं कम हैं. लेकिन स्त्री विमर्श पर पुस्तकों की संख्या ज्यादा है. संख्या की दृष्टि से नहीं गुणवत्ता के आधार पर साहित्य को देखने की दरकार है. पश्चिमी देशों में वुमेन स्टडीज (स्त्रियों द्वारा रचे गए साहित्य का अध्ययन) और ब्लैक स्टडीज (अश्वेत समुदाय द्वारा रचे गए साहित्य का अध्ययन) के नतीजों को अनुपात और गुणवत्ता के आधार पर देखा जाए तो बहुत अच्छा ब्लैक लिटरेचर लिखा गया है. ब्लैक लिटरेचर अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप सभी जगह लिखा जा रहा है. उस लिहाज से हमारे यहां दलित साहित्य कम है. ब्लैक लिटरेचर 19वीं शताब्दी से ही मिलना शुरू हो जाता है. हमारे यहां बाबा साहब आंबेडकर के बाद दलित लेखन की शुरुआत हुई. शायद देर से शुरू होने की वजह से दलित लेखन का स्तर गुणवत्ता के लिहाज से कमजोर है. 

साहित्य में नई पौध के बारे में क्या सोचते हैं?

देखिए, नए लोग हम लोगों से बेहतर स्थिति में हैं और बहुत ही अच्छा लिख रहे हैं. कविता और कहानियां अच्छी आ रही हैं. आम तौर पर उपन्यास उतने अच्छे नहीं आ रहे हैं. आलोचनात्मक लेखन का स्तर बहुत बढ़िया है. अब बहुत सारी पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगी हैं और हर पत्रिका में युवा कहानीकार और युवा कवि छप रहे हैं. कुछ समय पहले ‘कथादेश’ का कहानी विशेषांक आया था. उसमें युवाओं की बहुत अच्छी कहानियां पढ़ने को मिलीं. दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आता है जिसमें मुझे नई किताबों पर बात करनी होती है. पिछले चार साल से यह कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है. इस कार्यक्रम को करने के दौरान मुझे अंदाजा हुआ कि अच्छी कविता, कहानियां और आलोचना की गंभीर पुस्तकें लिखी जा रही हैं.

पूरी रात यही कशमकश थी कि जाऊं या फिर इस नई पहचान से हार मान लूं’

 

मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे से ताल्लुक रखती हूं. वहां जिंदगी के गुजारे कई सालों में मैंने हमेशा यह अनुभव किया कि इंसानियत सभी धर्मों से बड़ी होती है. हमारे यहां आपसी रिश्तों की जगह भगवान या अल्लाह से पहले थी. लेकिन मेरी इंसानियत से परे एक दूसरी पहचान भी है यह मुझे दिल्ली में हुए बटला हाउस एनकाउंटर के बाद महसूस हुआ. वह थी मेरी धार्मिक पहचान. तब तक मैं भी दिल्ली आ चुकी थी और इस जगह के पास ही रहती थी. अब हर रोज घर से  बाहर जाते हुए यह पहचान भी मेरे साथ चलती थी जिसे ढोने की अब आदत-सी पड़ती जा रही थी. मैं अपने गैरमुस्लिम दोस्तो के बीच रोज अपनी पहचान को खड़ा करने की जद्दोजहद करती. उनसे किसी भी ऐसी बहस करने से खुद को रोज बचाने की नाकाम कोशिश करती जो मेरी नई पहचान से जुड़ी थी.

 उन दिनों कहीं न कहीं मेरे मन में यह बात घर करने लगी थी कि अगर इसी तरह का माहौल रहा तो फिजा बद से बदतर होती जाएगी ओर अन्य धर्मों के लोग मुसलमानों से सच में नफरत करने लगेंगे. शायद इसके कुछ बीज पड़ने भी लगे थे जब मेरी एक सहपाठी ने मुंह बनाकर कहा था कि मुसलमान तो लड़ने ओर खाने में ही आगे होते हैं बस. लेकिन कहते हैं न कि हालात आपकी सोच पर कितना भी असर क्यों न डालें, कभी-कभी आपके साथ कुछ ऐसा भी हो जाता है जो फिर से आपकी सकारात्मक सोच को और पुख्ता बना देता है. मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. इसके बाद मैं दोबारा यह सोचने लगी कि इंसानी रिश्तों की बुनियाद धर्म से कहीं ज्यादा मजबूत होती है. शायद मेरे लिए इस बात को अब कभी भी भुला पाना संभव नहीं होगा.

बात दो साल पहले की है. मुझे अपने कुछ साथियों के साथ एक विश्वास बहाली संवाद प्रकिया (इंटर फेथ डायलॉग) में हिस्सा लेने के लिए मथुरा जाने का निमंत्रण मिला. हमें दिल्ली से मथुरा के लिए अगली सुबह निकलना था, अगले ही दिन बाबरी मस्जिद पर भी फैसला आना था इसलिए वह रात मेरे लिए अहम थी. देश के बहुत सारे राजनेताओं, मौलवियों और धर्म गुरुओं के लिए भी वह रात अहम थी जो कई सालों से लोगों की भावनाओं से सियासी रोटियां सेंक रहे थे. हर आम इंसान की तरह मेरे परिवार वाले भी चिन्तित थे. उन के मन में एक अजीब-सा डर भी था. उन्हें लग रहा था कि मथुरा तो हिंदू बहुल इलाका है और इसलिए मेरा वहां जाना ठीक नहीं है. उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि मैं इस सेमिनार में ना जाऊं क्योंकि अपने ग्रुप में मैं अकेली मुसलिम छात्रा थी. मैंने उन्हें काफी समझाया मगर परिवार वालों की मुखालफत पुरजोर तरीके से जारी रही. 

‘मुझे लग रहा था कि अगर मैं इस आयोजन में न आती तो मेरे मन की गलतफहमियां शायद ही कभी दूर हो पातीं’

उस दिन मुझे रह-रह कर यही अफसोस हुआ कि आखिर कब तक धर्म की यह राजनीति चलेगी. पहली बार उन टेलीविजन चैनलों पर भी बहुत गुस्सा आया जो मेरी मां की परेशानी को अपने नाटकीय अन्दाज में और बढ़ाने पर तुले हुऐ थे. इस अंदाज में कि दंगा न भी होता तो पक्का करवा देते. पूरी रात मैं इसी कशमकश में रही कि जाऊं या फिर इस नई पहचान से हार मान लूं. सुबह होते-होते मैं अपनी नई पहचान से जीत चुकी थी. मैं अपने मन के फैसले पर अडिग रही और घरवालों को बिना इत्तिला दिए कृष्ण की नगरी मथुरा पहुंच गई.

मथुरा पहुंचने पर हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया. हमारे ठहरने का इंतजाम एक स्थानीय आश्रम में किया गया था. यह जगह मेरी कल्पनाओं से बिल्कुल अलग थी. यहां बहुत सारे मंदिरों की घंटियां समवेत होकर मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही थीं जो बहुत सुकून दे रही थी. हम लोग मथुरा में पांच दिन रहे. आश्रम के गुरु से लेकर आम सेवक तक ने हमें बहुत आदर व सम्मान दिया. मैं भी और साथियों के साथ बैठकर प्रवचन सुनती थी. मैंने एक दिन भी यह महसूस नहीं किया कि मेरी पहचान वहां मौजूद लोगों से अलग है.

फिर एक दिन मैंने हिम्मत जुटा कर आश्रम के गुरू जी, जिनका नाम मुझे याद नहीं आ रहा, से अयोध्या फैसले पर बात की. मैंने उनसे पूछा कि क्या वजह है जो साथ-साथ रहने वाले हिंदू-मुसलमान इतने दूर होते जा रहे हैं. उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रख कर सिर्फ इतना कहा कि मंदिर-मस्जिद को लेकर होने वाली सियासत से वह अब ऊब चुके हैं. उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि मंदिर-मस्जिद से ज्यादा उनके लिए मानवता अहमियत रखती है.  

मथुरा से वापस दिल्ली लौटते समय इंटर फेथफुल डायलॉग में जाने के फैसले को लेकर मेरे मन में एक आत्मसंतुष्टि का भाव था. मुझे लग रहा था कि अगर मैं वहां नहीं जाती तो मेरे मन में जो गलतफहमियां घर करने लगी थीं वह शायद ही कभी दूर हो पातीं. मानवीयता के इस रूप के दर्शन से भी मैं वंचित रह जाती. थोड़े-से भटकाव के शिकार लोगों की सोच को मैं आम लोगों की सोच मानती रहती और मानवता पर शर्मसार होती रहती.  आखिर धर्म के नाम पर आम आदमी को लड़वाकर उससे सियासी फायदा लेने का यह खेल कब रुकेगा?

 

सरकार को गरियाने वाले अपना काम तो ठीक से करें

दुनिया में कोई भी ऐसा लोकतंत्र नहीं है जहां की सरकार को लेकर वहां के मीडिया और विपक्ष टिप्पणी नहीं करते. यह लोकतंत्र का एक स्वाभाविक लक्षण है. लेकिन यह भी सच है कि किसी पर टिप्पणी करना बहुत आसान होता है और हकीकत को सही संदर्भों में देखना बहुत मुश्किल. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यह दूसरी सरकार बेहद नाकाम है. अगर सचमुच ऐसा है तो विपक्ष की कामयाबी क्यों नहीं दिख रही है. उन्हें कई बार सरकार को घेरने के मौके मिले लेकिन किसी भी मौके पर वे कामयाब नहीं हुए. इसलिए उनके पास यह नैतिक अधिकार नहीं है कि वे मनमोहन सिंह की सरकार पर तरह-तरह के आरोप लगाएं.

2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) बनवाने को लेकर विपक्ष ने संसद को तकरीबन एक साल तक ठप किए रखा. अब जेपीसी की जांच के बारे में जो खबरें आ रही हैं उनके आधार पर क्या यह कहा जा सकता है कि कसूरवार की पहचान की जा सकेगी? हमने पहले भी कहा था कि इस मामले पर भारत के महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक (सीएजी) की रिपोर्ट को पीएसी में भेजना ही पड़ेगा. इस समिति की अध्यक्षता भाजपा के ही वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी कर रहे हैं. लेकिन वे नहीं माने. अब तक सबूत के साथ कोई आरोप ठोस तौर पर किसी के खिलाफ तय नहीं हो पा रहा है. अन्य कई मामले हैं जिनमें विपक्ष जमकर हो-हल्ला करता है लेकिन जब उनसे यह पूछा जाता है कि रास्ता बताइए तो वे इधर-उधर झांकने लगते हैं. राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर भी विपक्ष ने बड़े आरोप लगाए थे. लेकिन अब जब जांच चल रही है तो सरकार के अलावा कोई भी उसमें दिलचस्पी लेकर दूध का दूध और पानी का पानी करवाने की कोशिश नहीं कर रहा. ऐसे में विपक्ष से मुझे निराशा होती है. वे एक घोटाले का मुद्दा उठाते हैं और उसमें जांच का आदेश होते ही अगले घोटाले के इंतजार में पुराने को भूल जाते हैं. कायदे से होना यह चाहिए कि जब किसी घोटाले की जांच चल रही हो तो विपक्ष के पास जितने सबूत हैं वे पेश करें. अगर जांच सही ढंग से आगे नहीं बढ़ती तो इसके लिए सरकार जितनी कसूरवार है उससे कम विपक्ष भी नहीं है.

अभी जिन घोटालों की बात हो रही है अगर वे सही में घोटाले हैं तो उनकी जड़ तो संप्रग-1 में है. जहां तक मेरी जानकारी है उसके मुताबिक संप्रग-2 के कार्यकाल में कुछ ऐसा नहीं हुआ है जिसे घोटाला कहा जा सके. अब लोग कहते हैं कि संप्रग-1 के कार्यकाल में सब अच्छा था और संप्रग-2 में सब खराब है. जबकि सच्चाई यह है कि संप्रग-2 की सारी दिक्कतें संप्रग-1 से होकर ही आई हैं. जो भी लोग आरोप लगाते हैं, उन्हें बेसिरपैर की बात करने के बजाय वे ठोस मुद्दे उठाने चाहिए जिनमें दम हो. विपक्ष इस बात को बड़ा भारी मुद्दा बना देती है कि टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री को ‘अंडरअचीवर’ बता दिया इसलिए वे ऐसे ही हैं. वे इस बात पर दिमाग ही नहीं लगाते कि किसी पत्रिका के कह देने से कोई कामयाब या नाकामयाब नहीं होता. अगर टाइम की बात अंतिम सच्चाई है तो फिर उसने 2002 में तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में काफी बुरा-भला लिखा था. इस पर भाजपा की बोलती बंद हो जाती है. विपक्ष सिर्फ हंगामा करना चाहता है. उसे लगता है कि हंगामा करने से कांग्रेस की यह दीवार गिर जाएगी. लेकिन ऐसा होने वाला नहीं है. भाजपा एक धक्का लगाकर मस्जिद तो तोड़ सकती है लेकिन कांग्रेस को नहीं तोड़ सकती.

विपक्ष एक घोटाले का मुद्दा उठाता है और उसमें जांच का आदेश होते ही अगले घोटाले के इंतजार में पुराने को भूल जाता है

अगर देश में एक मजबूत विपक्ष होता तो उनके पास अपनी ताकत दिखाने का सबसे अच्छा मौका राष्ट्रपति चुनाव था. इस चुनाव के बारे में सबको बहुत पहले से पता था. अगर विपक्ष एकजुट होकर हमारे उम्मीदवार को हरा देता तो हम बहुत ही दिक्कत में पड़ते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं करके अपनी कमजोरी को खुद ही सार्वजनिक कर दिया. विपक्ष की ओर से जिन अब्दुल कलाम का नाम आगे किया जा रहा था उनसे पूछा भी नहीं गया था कि आप चुनाव में खड़ा होना चाहते हैं या नहीं. सरकार को गाली देने वाला राजनीतिक वर्ग खुद तो सही प्रतिपक्ष बनना नहीं चाहता लेकिन सरकार पर दिन-रात नए-नए आरोप लगाता रहता है. विपक्ष की नाकामी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे खुद को देश की जनता के सामने विकल्प के तौर पर पेश करने में कामयाब नहीं हो रहे. भाजपा में तो इस बात पर आपसी सहमति नहीं है कि कौन उनका नेतृत्व करेगा. ऐसे में मुझे यह नहीं लगता कि प्रतिपक्ष से इस सरकार को किसी तरह का कोई खतरा है. 

सरकार पर जो भी लोग आरोप लगा रहे हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता होती है तो उस वक्त किसी भी सरकार के लिए काम करना मुश्किल होता है. जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल नहीं था तो इन्हीं मनमोहन सिंह की सरकार ने बढ़िया विकास दर बनाए रखी थी. मनमोहन सिंह ने हमेशा यह साबित किया है कि वे बतौर वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री देश को अच्छे ढंग से चला सकते हैं. मैं ऐसा इसलिए भी मानता हूं कि भाजपा के बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी ने  2009 के आम चुनाव में कोशिश की थी कि झगड़ा मनमोहन सिंह बनाम आडवाणी बन जाए. लेकिन नतीजा क्या हुआ? मनमोहन सिंह को जनादेश मिला और आडवाणी को देश की जनता ने नकार दिया. मुझे लगता है कि इस सरकार के कार्यकाल में जो दो साल का वक्त बचा हुआ है उसमें मनमोहन सिंह वैसे कदम उठाएंगे जिससे इस सरकार की छवि और अच्छी हो. मैं ऐसा इसलिए भी मानता हूं कि दो साल पहले कोई यह नहीं कह सकता था कि इस सरकार को लेकर इतने तरह के सवाल उठाए जाएंगे. राजनीति में दो साल बहुत लंबा वक्त होता है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैरल्ड विल्सन कहते थे कि राजनीति में एक हफ्ता भी बहुत लंबा समय है. मुझे भरोसा है कि जो कमियां अभी दिख रही हैं उन्हें अगले दो साल में दूर कर लिया जाएगा.

आज अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर सरकार पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं. लेकिन अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को दूर करने के लिए दो साल का वक्त बहुत होता है. मनमोहन सिंह के बारे में ही यह कहा जाता है कि यह उन्हीं का बनाया हुआ आर्थिक कार्यक्रम है जिस पर चलते हुए देश ने नौ फीसदी तक की विकास दर हासिल की. इसलिए भरोसे के साथ यह कहा जा सकता है कि अभी जो स्थिति थोड़ी गड़बड़ हुई है उसे वे वापस अच्छे स्तर पर ले जा सकते हैं. माइकल औशियन नाम के एक अमेरिकी पत्रकार हैं. उन्होंने अपने एक हालिया लेख में जानकारी दी है कि औपचारिक तौर पर चीन ने यह स्वीकार किया है कि इस साल उसके आर्थिक विकास की दर मात्र 7.5 फीसदी होगी. इसका मतलब यह हुआ कि चीन और भारत की विकास दर में अब कोई फर्क नहीं रहा. इस बात को कोई नकार नहीं सकता है कि दुनिया में जो अभी की आर्थिक स्थिति है वह किसी के लिए भी अच्छी नहीं है. भारत भी इसका अपवाद नहीं है. लेकिन मनमोहन सिंह ने कभी नहीं कहा कि आज की हमारी हालत दुनिया की वजह से ही है. वे अपने हिसाब से स्थिति सुधारने का काम कर रहे हैं. जहां तक आर्थिक वृद्धि को गति देने का मामला है तो इस बारे में मनमोहन सिंह से अधिक जानकार व्यक्ति देश में कोई नहीं है. उन्होंने पहले भी ऐसा किया है और इसे एक बार फिर से साबित करेंगे. 

महंगाई को लेकर इस सरकार की काफी आलोचना हो रही है. हमें यह समझना होगा कि हर साल का कुछ समय ऐसा होता है जब खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं और कुछ समय ऐसा होता है जब इनकी कीमतों में कमी आती है. कई बार सरकार को वैसी नीतियां अपनानी पड़ती हैं जिससे महंगाई तो घटती है लेकिन इसका बुरा असर औद्योगिक मोर्चे पर होता है. भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दर ऊंचे रखे तो इसका अच्छा असर तो यह हुआ कि कीमतें नहीं बढ़ीं लेकिन औद्योगिक विकास पर इसका बुरा असर इस तरह से पड़ा कि उद्योगपति कर्ज नहीं ले पाए. इन बातों को देखते हुए कई बार सरकार महंगाई को कम करने वाले कदम नहीं उठा पाती. ऐसा नहीं है कि सरकार को नहीं पता है कि महंगाई कम करने के लिए क्या कदम उठाने होंगे. लेकिन सरकार को यह भी पता है कि उन कदमों का दूसरे क्षेत्रों पर क्या असर पड़ेगा. मनमोहन सिंह इन दोनों के बीच संतुलन साधते हुए चल रहे हैं. महंगाई एक समस्या है और इसको लेकर सरकार की संवेदनशीलता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि तकरीबन हर संसद सत्र में इस पर चर्चा की जाती है. विपक्ष के लोग जब महंगाई को लेकर हो-हल्ला मचाते हैं तो मुझे सबसे अधिक अफसोस इस बात का होता है कि इसे रोकने के लिए एक भी रचनात्मक सुझाव अब तक न तो लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने दिया है और न ही राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने. जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो उस वक्त भी महंगाई दर काफी ऊंची थी. अगर विपक्ष में इतने ही जानकार लोग हैं तो उस वक्त उन लोगों ने महंगाई को काबू में करने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया था. यह समझने वाली बात है कि एक विकासशील देश में थोड़ी-बहुत महंगाई की जरूरत होती है लेकिन ज्यादा महंगाई की स्थिति पैदा होने से रोकना भी उतना ही जरूरी है. मनमोहन सिंह इस बात को समझते हैं और इसलिए वे इन दोनों बातों में संतुलन साधते हुए चल रहे हैं.

आज सरकार पर यह आरोप भी लग रहा है कि नीतियों के स्तर पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही है. मेरी राय इस मामले में थोड़ी अलग है. जिन नीतियों को आगे बढ़ाने की बात विपक्ष कर रहा है, उनमें ज्यादातर तो मध्य वर्ग की जेबें भरने वाली हैं. गरीबों की बात कोई नहीं कर रहा है. मेरा मानना है कि सबसे ज्यादा अगर किसी नीति को लेकर गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही तो वह है पंचायती राज. लेकिन इसकी बात कोई नहीं कर रहा है. हर कोई उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने की बात कर रहा है जिससे पूंजीपतियों का भला हो. आज विपक्ष के लोग इस बात को लेकर सरकार पर निशाना साध रहे हैं कि खुदरा में विदेशी निवेश को लेकर सरकार ने सही रवैया नहीं अपनाया. लेकिन वे इस बात को भूल जाते हैं कि जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने क्या किया. खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का पक्ष लेने और विरोध करने वालों के पास अपने-अपने तर्क हैं. किसी भी पक्ष के तर्कों को सिरे से खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है. लेकिन इस मामले में एक रास्ता यह हो सकता है कि केंद्र सरकार यह तय करे कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश आए और राज्य सरकारें यह तय करें कि वे ऐसे स्टोर अपने राज्य में चाहती हैं या नहीं. मेरे मन में भी खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर कुछ शंका है. खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का पक्ष लेने वाले यह तर्क देते हैं कि वे कोल्ड स्टोरेज बनाएंगे. मेरे समझ में यह नहीं आता कि कोल्ड स्टोरेज भारत सरकार क्यों नहीं बना सकती. सरकार ऐसे गोदाम बनाए और इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी पंचायतों को दी जाए. 

दो साल में मनमोहन सिंह कोई ऐसा चमत्कार करेंगे कि भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सुधरेंगे और तीस्ता का विवाद भी सुलझ जाएगा

इस सरकार पर विपक्ष के लोग यह आरोप भी लगाते हैं कि विदेश नीति के मामले में यह बहुत अधिक अमेरिकापरस्त हो गई है. आरोप यह भी है कि अमेरिका के चक्कर में हमने ईरान को भी नाराज कर दिया है. लेकिन वास्तविकता यह है कि अब भी हम सबसे ज्यादा तेल ईरान से ही खरीदते हैं. हां, पहले की तुलना में थोड़ी कमी आई है. अमेरिका तो चाहता है कि हम ईरान से तेल खरीदना बंद कर दें लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार ने तो ऐसा नहीं किया. ईरान को तेल का भुगतान करने को लेकर जब अमेरिका ने प्रतिबंध का रास्ता अपनाया तो हमने अपने रास्ते निकाले. भारत की कंपनियां वहां जाकर कारोबार कर रही हैं और हम ईरान को तेल का भुगतान अब रुपये में भी कर रहे हैं. अमेरिका चाह रहा था कि भारत की फौज अफगानिस्तान जाए लेकिन भारत सरकार ने इसे नहीं स्वीकारा. अमेरिका हमारे जवानों को ईराक भेजना चाह रहा था लेकिन हमने यह भी नहीं माना. लीबिया को लेकर भी अमेरिका के उलट हमारा रुख रहा. अमेरिका ने पूरी कोशिश कि चीन के खिलाफ उनका जो अभियान है उसमें भारत उनका साथ दे. लेकिन भारत सरकार ने अमेरिका को यह साफ-साफ बता दिया कि हम चीन से दोस्ती चाहते हैं न कि दुश्मनी. यह सच है कि अभी रुस के साथ उतना करीब का रिश्ता भारत का नहीं है जितना सोवियत संघ के जमाने में था लेकिन अब भी हम उनके करीब हैं और यह रिश्ता आगे बढ़ रहा है. कभी-कभार मेरे मन में भी यह शंका पैदा होती है कि कहीं भारत अमेरिकापरस्त तो नहीं होता जा रहा लेकिन मैं जब इन उदाहरणों को देखता हूं तो मुझे यह जवाब मिलता है कि ऐसा नहीं हुआ है. मनमोहन सिंह सरकार की विदेश नीति की सबसे अच्छी बात यह है कि पाकिस्तान के साथ दोस्ती के लिए जिस तरह के कदम इस सरकार ने उठाए उतने कदम शायद किसी सरकार ने नहीं उठाए. राजीव गांधी ने कई कदम इस दिशा में उठाए थे और बेनजीर भुट्टो के साथ वे इस दिशा में बढ़ भी रहे थे लेकिन वीपी सिंह की सरकार सत्ता में आ गई और यह काम पूरा नहीं हो पाया. मुझे ऐसा लगता है कि अगले दो साल में मनमोहन सिंह कोई ऐसा चमत्कार करेंगे कि भारत-पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे हो जाएंगे और बांग्लादेश के साथ तीस्ता का विवाद भी सुलझ जाएगा. 

मनमोहन सिंह की इस सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप कुछ लोग लगाते हैं. लेकिन ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि सीबीआई तब भी थी जब वीपी सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी समेत अन्य गैरकांग्रेसी सरकारें केंद्र की सत्ता पर काबिज थीं. अगर सीबीआई एक ऐसी घटिया एजेंसी है जिसका राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है तो गैरकांग्रेसी सरकारों ने इसे ठीक क्यों नहीं किया? किसी गैरकांग्रेसी सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे सीबीआई के कामकाज में या संचालन में कोई बड़ा बदलाव हुआ हो. यह कहना बड़ा आसान है कि केंद्र सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करती है. लेकिन दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि राज्य सरकारें जब दिक्कत में पड़ जाती हैं तो फिर वे खुद ही कहती हैं कि इस मामले की सीबीआई जांच हो. अगर सीबीआई का इस्तेमाल केंद्र सरकार अपने हिसाब से ही करती तो फिर राज्य सरकारें कई मामले सीबीआई के हाथ में नहीं देतीं. इसलिए जो लोग केंद्र पर इस तरह के आरोप लगा रहे हैं वे सुविधा की राजनीति कर रहे हैं. 

इस सरकार पर विपक्ष का एक बड़ा आरोप है कि कहने को मनमोहन सिंह सरकार के मुखिया हैं लेकिन नियंत्रण कहीं और है इसलिए वे खुलकर काम नहीं कर पा रहे हैं. अब इसमें देखने वाली बात यह है कि अगर मनमोहन सिंह राय-मशविरा नहीं करें तो उन पर यह इल्जाम लगेगा कि वे विचार-विमर्श नहीं करते. अगर वे विभिन्न मामलों को लेकर राय-सलाह करते हैं तो उन पर विपक्ष के लोग यह आरोप लगाते हैं कि ये तो बलहीन प्रधानमंत्री हैं. तो आखिर मनमोहन सिंह करें क्या? हम सबको यह समझना चाहिए कि यह सरकार न तो मनमोहन सिंह की है और न ही कांग्रेस की. यह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मिली-जुली सरकार है जिसमें कई पार्टियां शामिल हैं. ऐसे सरकार में सभी घटकों की बातों को सुनने की आवश्यकता होती है. अगर गठबंधन सरकार में सबको साथ लेकर नहीं चला जाए तो कोई न कोई दिक्कत रास्ते में निश्चित तौर पर आएगी. जो लोग मनमोहन सिंह की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते हैं उन्हें यह देखना चाहिए कि जब भी सरकार पर खतरा मंडराया तो उन्होंने किस तरह की राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया. 2008 में जब परमाणु समझौते को लेकर वाम दलों ने सरकार का साथ छोड़ दिया तो लगा कि अब तो यह सरकार आगे नहीं बढ़ पाएगी. लेकिन मनमोहन सिंह ने समाजवादी पार्टी को साथ लिया. इसके बाद उन्होंने परमाणु समझौता भी किया और न सिर्फ कार्यकाल पूरा किया बल्कि दोबारा जीतकर भी आए. लोकपाल के हंगामे के दौरान भी लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अब इस सरकार के गिने-चुने दिन बचे हैं. इसके बावजूद मनमोहन सिंह की सरकार मजबूती के साथ आगे बढ़ती रही.

लोग तो यह भी आरोप लगाते हैं कि हम घटक दलों को साथ लेकर नहीं चलते. अगर यह आरोप सही होता तो मनमोहन सिंह की सरकार आठ साल तक नहीं चल पाती. एक गठबंधन के अलग-अलग दलों के बीच मतभेद रहना स्वाभाविक है. यदि ममता बनर्जी और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं होता तो फिर वे कांग्रेस में या कांग्रेस के लोग उनकी पार्टी में क्यों नहीं होते? हमें यह समझना होगा कि इस गठबंधन सरकार में अलग-अलग पार्टियां हैं और उनकी अलग-अलग राजनीति है. इसलिए इस तरह की सरकार को चलाने में थोड़ी मुश्किल होती है और कई बार मतभेद सतह पर आते दिखते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस अपने सहयोगियों को साथ लेकर नहीं चलती है. सबको साथ लेकर चलने की कला को अटल बिहारी वाजपेयी ‘गठबंधन धर्म’ कहते थे और कांग्रेस इसका पालन बहुत अच्छे से करती है. कांग्रेस इस गठबंधन सरकार को चलाते हुए इस बात को सही ढंग से समझती है कि बाएं हाथ और दाएं हाथ के मिलने से ही नमस्ते बनता है. एक हाथ से यह काम नहीं हो सकता. 

दो बहुत बुनियादी सुधार 1990-91 में हुए. मनमोहन सिंह ने आर्थिक नीतियों के स्तर पर जो बदलाव किए उन्हें आर्थिक सुधार कहा गया. इसके पहले राजीव गांधी के समय में पंचायती राज को लेकर सुधार की शुरुआत हुई थी जिसके लिए जरूरी संविधान संशोधन दो तिहाई बहुमत में पांच वोट कम पड़ जाने से नहीं हो पाया था. 1992 में नरसिंह राव के कार्यकाल में 73वां और 74वां संविधान संशोधन करके प्रशासनिक सुधारों का रास्ता साफ किया गया. उस समय यह धारणा बनी कि हम जो बदलाव रूपी रथ चलाना चाहते हैं उसका एक पहिया है आर्थिक सुधार और दूसरा है प्रशासनिक सुधार. लेकिन एक पहिया बहुत आगे बढ़ गया है और दूसरा घिसटते हुए बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है. मेरी समझ से देश की बुनियादी समस्या यह है. अगर इन दोनों का समन्वय यह सरकार सही ढंग से करे तो मैं इस बात का भरोसा दिला सकता हूं कि अगले आम चुनाव में कांग्रेस को न सिर्फ 200 से अधिक सीटें बल्कि अपने बूते बहुमत हासिल होगा.

संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे बुरी सरकार है

 

जब से हम स्वतंत्र हुए हैं तब से कोई न कोई भ्रष्टाचार का मामला सामने आता रहा है. लेकिन इतनी भ्रष्ट सरकार आजाद भारत में पहले कभी नहीं आई. इस सरकार के जितने मंत्री भ्रष्टाचार के तरह-तरह के आरोपों से घिरे हैं उतने किसी भी सरकार के नहीं रहे. ऐसा माहौल दिखता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपने मंत्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है जिसकी वजह से यह स्थिति पैदा हुई है. मनमोहन सिंह पिछले आठ साल से सरकार चला रहे हैं, लेकिन उनके मंत्रियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. भ्रष्टाचार से बड़ी चिंता की बात यह है कि यह सरकार उस पर पर्दा डालने की कोशिश आखिर तक करती रहती है. ए राजा के मामले में पूरे देश ने यह देखा. सुरेश कलमाड़ी के मामले में भी ऐसा ही हुआ. अब पी चिदंबरम को सरकार लगातार बचाने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री उनके बचाव में खड़े नजर आ रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि यह इस सरकार की फितरत है कि जब भी कोई मामला सामने आए तो पहले उस पर पर्दा डालने की कोशिश करो और अगर कोई मामले को संसद में उठाता है तो उसे सिरे से खारिज करो.

यह सरकार सिर्फ न्यायपालिका के सामने जाकर झुकती है. जब न्यायपालिका से आदेश आता है तब सरकार कार्रवाई शुरू करती है. 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की सिफारिश के बावजूद सीबीआई जांच के आदेश नहीं दिए गए. इस निर्देश के एक साल के बाद जब कोर्ट का डंडा पड़ा तब जाकर यह मामला सीबीआई को जांच के लिए मिला. अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि भ्रष्टाचार से अनुपयोगी और दिखावे की चीजों का उपभोग (कॉन्सपीक्युअस कन्जंप्शन) बढ़ता है क्योंकि भ्रष्टाचार का पैसा लोग रोजमर्रा के कामों पर तो खर्च करते नहीं. देखा जाए तो बेलगाम होती महंगाई के पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही है. मैंने लोकसभा में भी कहा था कि सरकार जब नाकाम होती है तो हर मोर्चे पर हो जाती है. इस सरकार की सबसे ज्यादा असफलता आर्थिक मोर्चे पर दिखती है. जबकि इस सरकार से सबसे ज्यादा उम्मीदें आर्थिक मोर्चे पर ही थीं. आर्थिक मामले पर जो हम लोग संजोकर गए थे उसमें से एक-एक चीज आज बिखर चुकी है. रुपये के अवमूल्यन से लेकर विकास दर और राजकोषीय घाटे तक के मोर्चे पर हालत खस्ता है. इससे यह लगता है कि आर्थिक मामलों पर से सरकार ने पूरी तरह से नियंत्रण खो दिया है.

मनमोहन सिंह ने बतौर वित्त मंत्री 1991 में जो पाठ पढ़ाया था उससे आज वे स्वयं हट गए हैं. उस वक्त उन्होंने कहा था कि महंगाई की सबसे ज्यादा मार गरीब पर पड़ती है. लेकिन आज उन्हें अपनी वही बात याद नहीं है. यह स्थिति कोई तीन या छह महीने से नहीं है बल्कि महंगाई की यह स्थिति तो पिछले तीन-चार साल से बनी हुई है. दुनिया की बड़ी आर्थिक एजेंसियां और आर्थिक पत्र-पत्रिकाएं आर्थिक मामलों को लेकर आज हिंदुस्तान की भर्त्सना कर रही हैं. हाल ही में दुनिया की एक प्रमुख पत्रिका ‘टाइम’ ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘अंडरअचीवर’ का तमगा दे डाला. इससे पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि भारत के विकास की जो कहानी थी वह खत्म हो गई है. लोग तो यह भी कह रहे हैं कि भारत की विकास की कहानी अस्थायी थी और उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा था.

2010-2011 में भारतीय उद्योगपतियों ने 44 अरब डॉलर देश के बाहर निवेश किए, जबकि देश में निवेश हुआ सिर्फ 27 अरब डॉलर का

 बतौर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी पूरी तरह से असफल रहे हैं और वे अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में छोड़कर गए हैं. आज हर आर्थिक संकेतक नकारात्मक स्थिति की पुष्टि कर रहा है. इसके बावजूद सरकार स्थिति से निपटने के लिए जरूरी कदम उठाने के बजाय इनकार की मुद्रा अपनाए हुए है. सरकार रेटिंग एजेंसियों समेत उन सभी लोगों को गलत ठहरा रही है जो अर्थव्यवस्था की बदहाली की बात उठा रहे हैं. इस सरकार की समझ में यह क्यों नहीं आता कि जब तक समस्या को समझेंगे नहीं तब तक उसका समाधान कैसे होगा.

अर्थव्यवस्था की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2010-2011 में 44 अरब डॉलर भारत के उद्योगपतियों ने देश के बाहर निवेश किया. जबकि इसी दौरान देश में निवेश हुआ सिर्फ 27 अरब डॉलर. अब देश का उद्योगपति देश में निवेश नहीं कर रहा है. देश का उद्योगपति अपने धन को बाहर ले जा रहा है. इस पर सरकार को विचार करना चाहिए. अगर कुछ बंदिशें लगाने की जरूरत पड़े तो लगाई जानी चाहिए. उदारीकरण का यह मतलब नहीं है कि देश गरीबी में गोते खाता रहे और अमीरी देश के बाहर जाए.

जब केंद्र में राजग सरकार थी तो उस दौरान ‘फिसकल रेस्पांसिबिलिटी ऑफ बजट मैनेजमेंट एक्ट’ पास हुआ. इसका मकसद था सरकारी घाटे को नियंत्रण में रखना. संप्रग की पहली सरकार ने सत्ता में आने के बाद इसे अधिसूचित किया. इस कानून में यह प्रावधान था कि राजस्व घाटे को शून्य पर लाएंगे और वित्तीय घाटे को दो-तीन प्रतिशत के आस-पास लाएंगे. लेकिन 2008-09 में भारत का वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 6.2 फीसदी था और राजस्व घाटा वित्तीय घाटे का 75.2 फीसदी हो गया. 2009-10 में वित्तीय घाटा जीडीपी का 6.6 फीसदी था और राजस्व घाटा वित्तीय घाटे का 80.7 फीसदी. वित्त मंत्री अब इसे 72.5 फीसदी पर लाने की बात कह रहे हैं. यह है अर्थव्यवस्था की हालत. यह बात आर्थिक मसलों की जरा-सी भी समझ वाला हर व्यक्ति जानता है कि राजस्व खर्च अनुत्पादक होता है. इससे उत्पादन नहीं बढ़ता है. उत्पादन बढ़ता है पूंजीगत व्यय से.

 महंगाई से लोग बेहाल हैं और यह सरकार बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है. जब संसद में महंगाई पर चर्चा चल रही थी तो मैंने कहा था कि रसोई में आग लग गई. अब कोई कहे कि रसोई में आग नहीं जलेगी तो खाना कैसे बनेगा. मगर आग जलने और आग लगने में अंतर है. आज गृहिणी आग जला नहीं रही है, उसकी रसोई ही जल गई है. रसोई की हर चीज उसकी पकड़ से बाहर हो गई है. यहां तक कि आग जलाने वाली चीज एलपीजी भी महंगी हो गई है. 2009 के दिसंबर में संसद की वित्त समिति ने महंगाई के बारे में ‘कंप्रीहैन्सिव फूड प्राइसिंग ऐंड मैनेजमैंट पॉलिसी’ तैयार करने की सिफारिश की थी. उस पर अब तक कुछ नहीं हुआ.

 अर्थशास्त्र में महंगाई को गरीबों के ऊपर सबसे घटिया किस्म का टैक्स कहा गया है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इतने बड़े अर्थशास्त्री हैं, वे इस बात को समझते ही होंगे. लेकिन इसके बावजूद महंगाई रोकने की कोशिश सरकार नहीं कर रही है. आर्थिक विषयों पर शोध करने वाली एजेंसी ‘क्रिसिल’ की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन साल में यानी 2008-09 से 2010-11 तक, महंगाई के चलते देश के लोगों ने तकरीबन छह लाख करोड़ रुपये अधिक खर्च किए. इसका क्या मतलब हुआ? मतलब यह हुआ कि अगर महंगाई को हमने पांच फीसदी पर नियंत्रित किया होता तो यह भार उनके ऊपर नहीं पड़ता. लेकिन महंगाई इन तीन वर्षों में आठ प्रतिशत या उससे ऊपर रही. वह 20 प्रतिशत तक भी गई. इस वजह से आपकी, हमारी और गरीबों की जेब से छह लाख करोड़ रुपये अधिक खर्च हुए. यानी दो लाख करोड़ रुपये हर साल. भारत सरकार का कुल कर राजस्व है तकरीबन 6.64 लाख करोड़ रुपये. इसका मतलब यह हुआ कि प्रतिवर्ष सरकारी राजस्व का लगभग एक तिहाई महंगाई के चलते इस देश के लोगों को अतिरिक्त देना पड़ रहा है.

कुछ महीने पहले एशियन डेवलपमेंट बैंक की भी एक रिपोर्ट आई थी. इसमें कहा गया है कि भारत में 20 महीने में जिस दर की महंगाई रही है और खासकर जैसे खाद्यान्नों की महंगाई रही है, उसके चलते पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए. हम आज प्रतिवर्ष आठ-नौ प्रतिशत की दर से विकास कर रहे हैं. विकास से गरीबी और गरीबों की संख्या घटनी चाहिए. लेकिन अगर हमने महंगाई पर नियंत्रण नहीं पाया तो उसका यही नतीजा होगा जो एशियन डेवलपमेंट बैंक ने कहा है. यानी और अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जाएंगे, गरीबी घटेगी नहीं.

खुद इसी सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि देश की आबादी में सबसे कम आमदनी वाले नीचे के 20 प्रतिशत लोग अपनी आमदनी का 67 प्रतिशत खाने-पीने की चीजों पर खर्च करते हैं. अब अगर रसोई में आग लगी हो तो उस 20 प्रतिशत की क्या हालत होगी? हम ऊपर के 20 प्रतिशत को भूल जाएं, बीच के 20 प्रतिशत को भूल जाएं, ये जो नीचे के 20 प्रतिशत लोग हैं वे आज महंगाई की मार सहते-सहते मिट्टी में मिल रहे हैं. इन लोगों को यह नहीं कहा जा सकता है कि आज देश जो आठ फीसदी की दर से विकास कर रहा है तुम उसी को खाकर अपनी भूख मिटा लो. यह कैसी विकास दर है जो खुद लोगों को ही खा रही है. मैं सिरे से इस सिद्धांत को खारिज करता हूं कि किसी भी कीमत पर विकास होना चाहिए. अगर विकास का मतलब महंगाई है तो ऐसे विकास का कोई मतलब नहीं है.

बीच-बीच में सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग इस तरह के बयान देते हैं जिससे महंगाई नियंत्रित होने के बजाय और बढ़ जाती है. प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष हर दो महीने बाद कहते हैं कि अगले दो महीने में हम महंगाई को नियंत्रित कर लेंगे. इसके दो महीने बाद फिर कहते हैं कि अगले दो महीने में हम महंगाई नियंत्रित कर लेंगे. इन बयानों के बाद जो मुनाफाखोर हैं वे सोचते हैं कि फिर दो महीने की मोहलत मिल गई है और अब जैसे चाहेंगे वैसे लोगों को चूसेंगे. महंगाई को लेकर सरकार कितनी असंवेदनशील है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तेजी से बढ़ती महंगाई के बावजूद सरकार ने बार-बार पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस के दाम बढ़ाए. सरकार को इस बात को समझना होगा कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ेगी तो बाकी चीजों की कीमतों में भी वृद्धि होगी. विनिर्माण क्षेत्र इससे बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. लेकिन संप्रग सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है.

प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि आज हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक सुरक्षा है. उन्होंने माओवाद को सबसे बड़ी चुनौती बताया है. लेकिन इसके बावजूद माओवाद के ऊपर कहीं कोई नियंत्रण नजर नहीं आ रहा है. हमें यह समझना चाहिए कि माओवाद किसी एक सूबे की समस्या नहीं है बल्कि यह पूरे देश की समस्या है. इससे निपटने में सरकार की जो भूमिका दिखनी चाहिए वह नहीं दिख रही है. जो कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे कदम मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली दोनों सरकार ने पिछले आठ साल में नहीं उठाए हैं. अगर प्रधानमंत्री यह मानते हैं कि आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माओवाद है तो सच्चाई यह है कि यह खतरा घटा नहीं है बल्कि और बढ़ गया है. इसमें भी सबसे तकलीफ की बात यह है कि आंध्र प्रदेश में सरकार ने माओवादियों से समझौता किया और असम में उल्फा से. जबकि उल्फा को खदेड़कर असम से बाहर किया गया था. इसका मतलब यह हुआ कि जहां इस सरकार को राजनीतिक लाभ लेना होता है वहां माओवादियों से समझौता कर लेती है. एक तरफ तो ये समझौता करके चुनाव जीतते हैं और दूसरी तरफ उन्हें ही आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा भी बताते रहते हैं.

बाहरी आतंकवाद से निपटने में भी यह सरकार नाकाम दिखती है. अब भी हम देश को ऐसे सुरक्षा कवच में नहीं डाल पाए हैं जो जरूरी है. अमेरिका पर एक आतंकी हमला हुआ और उसके बाद उसने खुद को ऐसे सुरक्षा कवच में डाला कि उसके बाद आतंकवादी कभी अपने मंसूबों को पूरा करने में कामयाब नहीं हो पाए हैं. भारत में स्थिति इसके उलट है. यहां एक के बाद एक लगातार आतंकी हमले होने के बावजूद अब तक कोई चाक-चौबंद व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है. स्थिति ऐसी है कि जो जब चाहे तब भारत पर हमला कर सकता है. भारत पर आतंकवादी खतरा अब भी बरकरार है और मुंबई में जिस तरह का हमला 2008 में हुआ था उस तरह के हमले की आशंका भी लगातार बनी हुई है. 

प्रतिवर्ष सरकारी राजस्व का लगभग एक तिहाई महंगाई के चलते इस देश के लोगों को अतिरिक्त देना पड़ रहा है

विदेश नीति के मोर्चे पर भी इस सरकार की नाकामी बिल्कुल साफ है. विदेश नीति के मामले में देखें तो इस सरकार का झुकाव अमेरिका की तरफ बहुत ज्यादा है. जब हमारी सरकार केंद्र में थी तो कांग्रेस हम पर लगातार आरोप लगाती थी कि हम अमेरिका के हिसाब से अपनी विदेश नीति बना रहे हैं. जब 2004 में कांग्रेस की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी तो उस वक्त जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम इन लोगों ने बनाया था उसमें यह कहा गया था कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के समय विदेश नीति में अमेरिका के प्रति जो झुकाव दिखता था उसे हम दुरुस्त करेंगे. जबकि हुआ यह कि संप्रग सरकार की विदेश नीति कहीं अधिक अमेरिका के पक्ष में झुकी नजर आती है. अमेरिका के साथ 2005 में जब परमाणु समझौता हो रहा था तो उस वक्त लोगों को सरकार ने सब्जबाग दिखाया कि बस कल ही आपके घर में बिजली पहुंचने वाली है. लेकिन सात साल गुजरने के बावजूद उस समझौते के आधार पर एक मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं हो पाया है. वहीं दूसरी तरफ परमाणु ऊर्जा को लेकर देश का अपना जो शोध है उसे इस सरकार ने वैसा बढ़ावा नहीं दिया जैसा दिया जाना चाहिए था. परमाणु समझौते को लेकर जिस तरह का रवैया इस सरकार ने कदम-कदम पर दिखाया उससे अमेरिका के प्रति इस सरकार का झुकाव स्पष्ट दिखता है.

ईरान के साथ हमारे हमेशा से मित्रता के संबंध रहे हैं. ईरान ही एक ऐसा देश है जिसके जरिए हम अफगानिस्तान और मध्य एशिया जाते हैं. ईरान से भारत को काफी तेल मिलता है. लेकिन ईरान को भारत ने नाराज किया. अब अमेरिका के दबाव में आकर हम ईरान से तेल की खरीद कम कर रहे हैं. इसके बाद भारत सरकार अमेरिका को कहती है कि हमने आपके कहने पर ईरान से तेल खरीद में कटौती कर दी है और अब हमें छूट दे दीजिए. वहीं दूसरी तरफ रूस से संबंधों को लेकर भी यह सरकार नाकाम दिख रही है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का पाकिस्तान जाना भारत के लिए चिंता का एक बड़ा संकेत है. रूस को भारत हमेशा से अपना सबसे अच्छा मित्र मानता रहा है. लेकिन आज हमारा सबसे अच्छा मित्र हमारे सबसे बड़े दुश्मन के यहां जा रहा है. इससे पहले कभी रूस का कोई राष्ट्राध्यक्ष पाकिस्तान नहीं गया. आज रूस ऐसा इसलिए कर रहा है कि वह देख रहा है कि भारत अमेरिका के साथ अपनी सांठ-गांठ बढ़ा रहा है. अमेरिका के साथ भारत की गलबहियों को देखते हुए रूस ने भी अब स्वतंत्र तौर पर दूसरे देशों के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से देखना शुरू कर दिया है.

सुरक्षा के मामले में देश की जो कमजोरी है उसे पूर्व सेनाप्रमुख जनरल वीके सिंह ने उजागर किया. रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार की स्थिति पूरे देश के सामने है. हाल ही में अभिषेक वर्मा नाम के एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है. यह व्यक्ति बहुत दिनों से स्वतंत्र चल रहा था. लेकिन अब जाकर उसकी गिरफ्तारी हो पाई है. उसकी गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि रक्षा सौदों में कितने बड़े स्तर पर दलाली का काम चल रहा है. वॉर रूम लीक जैसी गंभीर घटनाएं भी इस सरकार की नाकामी को ही दिखाती हंै. कुल मिलाकर देखा जाए तो आज हर सुरक्षा सौदे में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार है. इसका सबसे बुरा असर देश की रक्षा तैयारियों पर पड़ रहा है. 

नीतियों के स्तर पर दो बातें हैं. एक बात तो यह है कि आप कोई नीति बनाएं और फिर उसे लागू करें. ऐसा करने पर देश में नीतियों को लेकर भरोसा बढ़ेगा. लेकिन यहां तो कोई नीति ही नहीं बन पा रही है. नीतियों के स्तर पर संप्रग सरकार उम्मीद तो बड़ी बंधाती है लेकिन हकीकत में कुछ कर नहीं पाती. अभी हाल में रुपये के अवमूल्यन और महंगाई को लेकर जब हर ओर से सरकार पर दबाव बना तो प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक इस बारे में बड़ी घोषणाएं करने वाला है. इससे सबकी उम्मीदें बढ़ गईं. लेकिन रिजर्व बैंक ने जो घोषणाएं कीं वे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया की तरह थीं. इससे हुआ यह कि रुपया डॉलर के मुकाबले कहीं अधिक कमजोर हुआ और शेयर बाजार का सूचकांक भी नीचे गया. इस सरकार की आदत में यह शामिल हो गया है कि आशाएं बंधाओ और उस पर खरा नहीं उतरो.

 पेंशन बिल एक उदाहरण है. ममता बनर्जी इसका विरोध कर रही हैं. उनके विरोध की वजह से यह बिल संसद में नहीं आया. सरकार ने भाजपा से बात कर ली थी. हमने कहा था कि हम इस बिल का समर्थन करेंगे. लेकिन सरकार इस बिल को लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. बजट सत्र के बाद सरकार ने यह घोषणा की कि यह बिल कैबिनेट के एजेंडे में आ गया है. इसके बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल के दूसरे नेता और रेल मंत्री मुकुल रॉय ने चिट्ठी लिख दी और पेंशन बिल का विषय कैबिनेट के एजेंडे से हटा दिया गया. इस तरह की बातों से ज्यादा परेशानी होती है. आप कह रहे हो कि हम फैसला करने जा रहे हैं लेकिन आप फैसला कर नहीं पा रहे हैं. खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) लाने की इन्होंने घोषणा कर दी. इसके बाद जब विरोध हुआ तो सरकार ने अपने कदम पीछे हटा लिए. सरकार के इस तरह के रवैये से निवेशकों को ज्यादा निराशा होती है और सरकार के बारे में कोई स्पष्ट राय नहीं बन पाती. आज अर्थव्यवस्था को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह विश्वास के संकट से जूझ रही है. जब यह सरकार बनी थी तब दावा किया गया था कि रोजगार के करोड़ों अवसर पैदा होंगे. लेकिन इस मामले में जो वैश्विक रिपोर्ट आ रही है और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट भी बता रही है कि रोजगार सृजन के मामले में हालत खराब है. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रोजगार सृजन का काम हो ही नहीं रहा है. 

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यह सरकार संघीय ढांचे को भी चुनौती देती दिख रही है. कई मामलों में केंद्र सरकार अपना निर्णय राज्यों पर थोपने का काम कर रही है. यही वजह है कि ज्यादातर राज्य केंद्र सरकार से नाराज हैं. राज्यों और केंद्र के बीच टकराव का वातावरण बना हुआ है. यह भारत की संघीय व्यवस्था के लिए बहुत अशुभ संकेत है. सबसे बड़ी बात यह है कि कोई भी सरकार जो नुकसान करके जाती है उन नुकसानों की भरपाई के लिए अगली सरकार को बहुत मेहनत करनी पड़ती है. 

आज कई राज्य केंद्र सरकार पर भेदभाव करने का आरोप लगा रहे हैं. यह सरकार उन राज्यों की मांगों को अधिक तवज्जो देती है जहां की सत्ताधारी पार्टी इनकी सहयोगी हो. लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं, उनको लेकर इस सरकार का रवैया बिल्कुल अलग होता है. केंद्र सरकार का यह रवैया संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी उस समय केरल में माकपा की सरकार थी. मुख्यमंत्री थे ईके नयनार. उस वक्त मैं केंद्रीय वित्त मंत्री था. उस दौरान नयनार ने मुझे एक पत्र लिखकर केंद्र की ओर से की गई मदद के लिए आभार जताया था और कहा था कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने माकपा की केरल सरकार के साथ कोई भेदभाव नहीं किया. वह पत्र आज भी वित्त मंत्रालय में कहीं न कहीं पड़ा होगा. बतौर केंद्रीय वित्त मंत्री जब मैं मूल्यवर्धित कर (वैट) सुधार की बात कर रहा था तब मैंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नेतृत्व में पहली समिति बनाई. इसके बाद बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता की अगुवाई में राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति इस मसले पर बनाई. ऐसा इसलिए किया कि हम लोग संघीय ढांचे में विश्वास रखते थे और भेदभाव की नीति पर नहीं चलते थे. माकपा से बड़ा भाजपा का राजनीतिक विरोधी कोई नहीं है. इसके बावजूद हमने केरल और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकारों के साथ बिल्कुल वैसा ही व्यवहार रखा जैसा व्यवहार अपनी पार्टी की सरकारों के साथ रखते थे. जबकि मौजूदा सरकार कई राज्यों के साथ भेदभाव कर रही है. यह रवैया सरकार की संकीर्ण मानसिकता को दिखाता है. 

यह सरकार संवैधानिक संस्थाओं से टकराने में भी बिल्कुल हिचकिचा नहीं रही है. अल्पसंख्यकों के आरक्षण का ही मामला लीजिए. इस मामले में सरकार चलाने वाले लोग जानते हैं कि जो बात वे अल्पसंख्यकों के आरक्षण को लेकर कह रहे हैं वह असंवैधानिक है. इसके बावजूद सरकार के अलग-अलग मंत्री इस मसले पर बयानबाजी कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में जब सरकार के खिलाफ फैसला दे दिया तो फिर फटकार सुनने के लिए केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय चली गई. यह सरकार सिर्फ और सिर्फ वोट के लिए जान-बूझकर गैरसंवैधानिक कार्य कर रही है. केंद्र सरकार महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक (सीएजी), चुनाव आयोग, अदालत और लोक लेखा समिति (पीएसी) से अनावश्यक टकरा रही है. 2जी घोटाले पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के मामले में भी सरकार का यही रवैया है. आज प्रधानमंत्री यह क्यों नहीं कहते कि मैं जेपीसी के सामने जाऊंगा. वे जानते थे कि पीएसी के पास यह अधिकार नहीं है कि वह किसी मंत्री को बुलाए. इसलिए उन्होंने कहा कि मैं पीएसी के सामने जाने के लिए तैयार हूं. आज जब जेपीसी में आने की मांग उठ रही है तो वे चुप्पी साधे हुए हैं.

इस सरकार के ज्यादातर मंत्री बहुत दंभी हैं. उनके मन में यह भाव पैदा हो गया है कि उनके जैसा दुनिया में और कोई है ही नहीं. मनमोहन सिंह के बारे में आम धारणा यह बना दी गई है कि वे बहुत सरल, सहज और सभ्य हैं. लेकिन इनकी सच्चाई को समझने के लिए एक घटना का जिक्र करना जरूरी है. मई, 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और जुलाई में बजट आया. बजट के बाद संसद में वित्त विधेयक पर विवाद चल रहा था. इस संबंध में हम लोग – जॉर्ज फर्नांडिस, लालकृष्ण आडवाणी और मैं – एक कागज देने मनमोहन सिंह के पास गए. थे. जॉर्ज फर्नांडिस ने कागज मनमोहन सिंह के हाथ में दिया और उन्होंने सबके सामने ही उसे उठाकर फेंक दिया. उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस ने यह भी कहा था कि मनमोहन सिंह ने अपने पुराने संबंधों का भी खयाल नहीं रखा. मनमोहन सिंह जब अधिकारी होते थे तो उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस के अंडर भी काम किया था. यह घटना प्रधानमंत्री की सरलता, सहजता और सभ्यता के दावों की पोल खोलती है. इस घटना से मनमोहन सिंह ने न सिर्फ अपने आचरण को दिखाया बल्कि दूसरे मंत्रियों को भी ऐसा ही व्यवहार अपनाने को प्रेरित किया. आज यही मंत्रियों के दंभी रवैये के रूप में सबके सामने आ रहा है.

रूस को भारत हमेशा अपना सबसे अच्छा मित्र मानता रहा है. लेकिन वह हमारी नीतियों के चलते हमारे सबसे बड़े दुश्मन के यहां जा रहा है

यह सरकार जनभावना की बिल्कुल कद्र नहीं करती. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रधानमंत्री खुद अनिर्वाचित हैं. जो जनता के बीच जाते ही नहीं हैं, उन्हें यह कैसे पता होगा कि जनभावना क्या चीज होती है? हम जैसे चुनाव लड़ने वाले लोग जब अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाते हैं तो हर रोज सैकड़ो लोगों से मिलते हैं और गांव-गांव घूमते हैं. मनमोहन सिंह का न तो कोई निर्वाचन क्षेत्र है और न ही उनसे उनके मतदाता मिलते हैं और न ही वे किसी गांव में जाते हैं. जनता दरबार ही लगा लिया होता! लेकिन ऐसा भी नहीं है. इसलिए जनभावना के प्रति उपेक्षा का भाव उनके लिए स्वाभाविक ही है. इस सरकार में तो जिनके भी हाथों में फैसला करने का अधिकार है वे सभी आराम से अपनी-अपनी जगह बैठे हुए हैं. 

जब 2004 में संप्रग की सरकार बनी तो उस वक्त कहा गया कि मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होंगे, जो सिर्फ सरकार चलाएंगे. वहीं सोनिया गांधी संप्रग की अध्यक्ष होंगी और राजनीति देखेंगी. उस समय मीडिया में जमकर यह चला था कि इससे अच्छी व्यवस्था पहले कभी नहीं बनी. कुछ लोग कहने लगे कि मनमोहन सिंह सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) की तरह सरकार चलाएंगे और देश बहुत तेजी से तरक्की की राह पर बढ़ेगा. तरक्की की कयासबाजियों को इस बात ने भी बल दिया कि प्रधानमंत्री की पहचान बड़े अर्थशास्त्री के तौर पर थी. कहा गया कि प्रधानमंत्री को चुनाव भी कहीं से नहीं लड़ना है इसलिए वे चुनावी राजनीति के दबावों से मुक्त होकर काम कर सकेंगे. हम जैसे लोग जो चुनाव लड़ते हैं उनके पास उनके संसदीय क्षेत्र से विभिन्न मसलों पर लगातार फोन आते हैं. लेकिन मनमोहन सिंह के पास कोई फोन नहीं आता क्योंकि उनका कोई संसदीय क्षेत्र ही नहीं है. 

दुनिया की बड़ी पत्रिकाओं में ‘दि इकॉनोमिस्ट’ को शुमार किया जाता है. इस पत्रिका ने हाल में यह कहा कि पिछले आठ साल से भारत पर अनिर्वाचित प्रधानमंत्री शासन कर रहा है. बाहर वाले भी देखते हैं कि प्रधानमंत्री ने कभी चुनाव लड़ा नहीं. एक दफा दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़े भी तो हार गए. संविधान में यह नहीं लिखा हुआ है कि प्रधानमंत्री लोकसभा का ही होना चाहिए. लेकिन संविधान की मर्यादा का तकाजा है कि प्रधानमंत्री लोकसभा का हो. जब प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कांग्रेस ने बना दिया तो उनके सामने इस बात के लाले पड़ गए कि किसे सदन का नेता बनाएं. देश का प्रधानमंत्री पूरे देश का नेता होता है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कम समय के लिए प्रधानमंत्री बना है या फिर अधिक समय के लिए. जो अपनी पार्टी का भी सर्वोच्च नेता नहीं ह,ै उसे देश या फिर देश के बाहर के लोग भारत का नेता कैसे मानेंगे.

 इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था को ही संप्रग के अनिर्वाचित प्रधानमंत्री वाले तरीके ने खंडित कर दिया. मनमोहन सिंह भले ही प्रधानमंत्री के पद पर हों लेकिन उनके पास कोई ताकत नहीं है. ताकत है सोनिया गांधी के पास, लेकिन उनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं है. संप्रग का यह प्रयोग ही देश की अभी की सारी दिक्कतों की जड़ में है क्योंकि हर जगह नेतृत्व का अभाव दिखता है. ममता बनर्जी और डीएमके तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी सहयोगी थे. ये दोनों इस सरकार में भी हैं. लेकिन जो स्थितियां आज पैदा हो रही हैं वे हमारे समय में तो नहीं हो रही थीं. हम इन दोनों को ठीक ढंग से साथ लेकर चलते रहे. संप्रग से कहीं अधिक सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने का काम राजग ने किया था. हम ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि हमारे पास अटल बिहारी वाजपेयी जैसा नेतृत्व था.

जबकि मनमोहन सिंह के पास नेतृत्व की क्षमता नहीं है. मनमोहन सिंह के पास न नैतिक ताकत है, न राजनीतिक. और न सरकारी ताकत. प्रधानमंत्री के पास कोई ताकत नहीं है. इस वजह से जिस नेतृत्व की आवश्यकता इस देश को अभी है वह नहीं मिल पाया. इस सरकार के शुरुआत के दो-तीन साल तो यह सोचते हुए कट गए कि प्रधानमंत्री बहुत ईमानदार हैं इसलिए सब ठीक चलेगा. लेकिन कभी-न-कभी तो इसे बिखरना ही था. अब संप्रग-2 में यह बिखराव बिल्कुल साफ दिख रहा है. यह सरकार नेतृत्व और विश्वसनीयता के गंभीर संकट से गुजर रही है. जब प्रणब मुखर्जी सरकार का हिस्सा थे तो सारी जिम्मेदारी उन पर छोड़ रखी थी.

 देश के प्रधानमंत्री को जब भी समय मिलता है तो वह संसद के सदन में आकर बैठता है. चाहे वह लोकसभा में बैठे या राज्यसभा में. जब संसद में प्रश्नकाल चल रहा होता है तब मनमोहन सिंह सदन में आते हैं. इसके बाद शून्य काल शुरू होता है और सांसद कहते रह जाते हैं कि मैं प्रधानमंत्री जी को यह बताना चाहूंगा, वह बताना चाहूंगा लेकिन मनमोहन सिंह इन बातों की अनदेखी करते हुए सदन से उठकर चले जाते हैं. संसद की इतनी अवज्ञा और किसी शासन में नहीं हुई. मनमोहन सिंह की संसद में कोई दिलचस्पी ही नहीं है. जो संसद में पला-बढ़ा उसे तो इसकी कार्यवाही में दिलचस्पी होगी लेकिन जिसका कोई संबंध ही नहीं रहा उसकी इसमें दिलचस्पी कैसे होगी? प्रधानमंत्री का संसद में रुचि नहीं होना इस सरकार और देश की एक सबसे बड़ी समस्या है.

 

कोकराझार की करुण पुकार

82 साल के बिशेश्वर बोडो अपने गांव जाने के लिए व्याकुल हैं. गोसाईगांव तहसील में पड़ने वाला उनका गांव ओडलागुड़ी उस कोकराझार कस्बे से आधा घंटा दूर है जहां वे फिलहाल अपनी बेटी के साथ रह रहे हैं. कस्बे में लगे कर्फ्यू की वजह से गांव जाना तो दूर वे अपने घर से बाहर तक नहीं निकल सकते. यह कर्फ्यू उन भीषण दंगों की वजह से लगा है जिनमें आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक 58 से भी ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और दो लाख से भी ज्यादा लोगों को घर-बार छोड़कर राहत शिविरों की शरण लेनी पड़ी है. गैरआधिकारिक आंकड़े यह नुकसान कहीं ज्यादा बता रहे हैं. भर्राए गले के साथ बिशेश्वर कहते हैं, ‘टीवी पर खबर आ रही है कि मेरा गांव जल रहा है. पता नहीं मेरे आस-पड़ोस के लोगों का क्या हुआ होगा. गांव में मैं अकेला रहता था तो मेरी बेटी कुछ महीने पहले मुझे यहां ले आई. इसलिए मैं सुरक्षित हूं. पता नहीं कितने दिन और चलेगा यह खूनखराबा.’ 

बोडो, नेपाली, आदिवासी, बांग्लाभाषी हिंदू और मुसलिम समुदाय की मिली-जुली आबादी वाले निचले असम के इस इलाके में सामुदायिक हिंसा कोई नई बात नहीं. इसके कारण भी अनजाने नहीं हैं. लेकिन क्षुद्र स्वार्थों से भरी राजनीति के चलते अब तक इस समस्या के समाधान की कोई स्थायी उम्मीद नहीं जग सकी है. दरअसल मूल निवासी बनाम प्रवासी के नाम पर हो रहा टकराव पिछले कई दशक से इस हिंसा का बीज बनता रहा है. राज्य में जनसांख्यिकी का अनुपात बदल रहा है. जमीन और रोजगार की उपलब्धता घट रही है. इन मुद्दों पर होने वाली राजनीतिक रस्साकशी के चलते असम पर अधिकार का मुद्दा जब-तब गरमाता रहता है.  

हालिया हिंसा की शुरुआत तब हुई जब 19 जुलाई को कोकराझार जिले में मुसलिम समुदाय के दो छात्र नेताओं पर अज्ञात लोगों ने गोली चलाई. जवाबी हमले में बोडो लिबरेशन टाइगर्स नामक संगठन के चार पूर्व सदस्य मारे गए. इसके बाद तो हिंसा का दायरा तेजी से फैला और एक के बाद एक कई जिलों के गांव इसकी चपेट में आते गए.  असम की सबसे बड़ी जनजाति बोडो असम की कुल जनसंख्या का महज पांच फीसदी है. इसके मुकाबले बांग्लादेश से आए मुसलमानों की आबादी, जो इस इलाके में महज चार दशक पहले आई है, पूरे असम की जनसंख्या का 33 फीसदी हो गई है. इसकी वजह से सिर्फ बोडो ही नहीं बल्कि दूसरे जातीय गुटों का भी मुसलिम समुदाय के साथ टकराव बढ़ गया है. 

उम्मीद की जा रही थी कि स्वायत्तता के बाद सब ठीक हो जाएगा, लेकिन बोडो समुदाय की बदहाल स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया

1952 में पहली बार बोडो और मुसलिम समुदाय का टकराव हुआ था. यही वह दौर था जब पहली बार मुसलिम आबादी इस इलाके में आ रही थी. 90 के दशक की शुरुआत में दोनों समूहों के बीच फिर सिलसिलेवार संघर्ष हुआ जिसके बाद मुसलिम आबादी को पीछे हटना पड़ा. तभी बोडो स्वायत्तता की बात पहली बार उठी. नतीजतन 1993 में बोडो स्वायत्त परिषद (बीएसी) बनी. बोडो समुदाय की मौजूदगी निचले असम के मैदानों में उत्तरी बंगाल से लगने वाले इलाकों तक है. यह इलाका कछारी, कोच, राजबोंघिस और आदिवासी लोगों का भी परंपरागत निवास रहा है. 1996 और 1998 में बोडो और आदिवासियों के बीच भी खूनी संघर्ष हो चुका है. इसमें 300 लोगों की जान चली गई थी.

अस्सी के दशक के आखिरी सालों में उपेंद्रनाथ ब्रह्म की अगुवाई में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन (एबीएसयू) द्वारा शुरू किया गया पृथक बोडोलैंड आंदोलन बेहद हिंसक रहा था. मसले के हल के लिए बनी बोडो स्वायत्त परिषद से समुदाय का एक हिस्सा खुश नहीं था, इसलिए हजारों बोडो युवा पूर्ण आजादी के समर्थन में भूमिगत हो गए. नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ बोडोलैंड  (एनडीबीएफ) और बोडो लिबरेशन टाइगर्स (बीएलटी) ने हथियार उठा लिए. बीएलटी 2003  में हिंसा की राह छोड़कर मुख्यधारा में आ गया जिसके बाद बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) का मार्ग प्रशस्त हुआ. 

बागी बीएलटी राजनीतिक चोला ओढ़कर अब बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट  हो गया था. बीटीसी की कमान इसके हाथ में थी और इस तरह इसके मुखिया हग्रामा मोहिलारी ने बोडो राजनीति पर एक तरह से कब्जा कर लिया था.  लेकिन सत्ताधारी कांग्रेस से जुड़े होने के बावजूद वे बोडो समुदाय की जिंदगी में कोई खास फर्क नहीं ला सके. इसका नतीजा यह हुआ कि  साल 2010 में एबीएसयू ने फिर अलग बोडोलैंड की मांग शुरू कर दी. एबीएसयू के फायरब्रांड अध्यक्ष प्रमोद बोरो कहते हैं, ‘बोडो जनता ने दो दो स्वायत्तशासी संस्थाएं देख लीं. दोनों बोडो जनता के अधिकारों की रक्षा कर पाने में नाकाम रही हैं. इस हिंसा में बोडो अपने ही घर में बेघर हो रहे हैं.’ एबीएसयू ने एक बार फिर से पृथक बोडोलैंड की मांग शुरू कर दी है, लेकिन आज हालात अस्सी के दशक के विपरीत हैं. संगठन का बड़ा हिस्सा सरकार के साथ बातचीत में लगा हुआ है. हालांकि उसका कहना है कि पृथक राज्य की मांग पर कोई समझौता नहीं होगा. बातचीत विरोधी गुट नेता रंजन दैमारी अब भी गुवाहाटी केंद्रीय जेल में हैं, लेकिन उनके समर्थक इस इलाके में फैले हुए हैं जो जब-तब हिंसा फैलाते रहते हैं. 

पिछले कुछ समय के दौरान बीटीसी और इस पर कब्जा जमाए हग्रामा मोहिलारी की छवि लगातार धूमिल होती गई है. कोकराझार के रंजन बसुमतारी कहते हैं, ‘असम सरकार को बोडो इलाकों की कोई फिक्र नहीं. उन्होंने इसे हग्रामा के लिए छोड़ दिया था ताकि वे इसे मनमर्जी से लूट सकें. बोडो जनता की हालत सुधारने से ज्यादा हग्रामा को अपनी सत्ता की  चिंता है. गोगोई ऐसे सहयोगी के साथ खुश हैं और हग्रामा भी कांग्रेस के ठेकेदार की तरह काम कर रहे हैं.’ 2003 में बीटीसी के गठन के बाद बोडो इलाकों में नाममात्र का विकास देखने को मिला है, जबकि इस दौरान हिंसा बढ़ी है. बीएलटी के पुराने नेता व्यापारी और ठेकेदार बन गए हैं जो अब हथियारों का इस्तेमाल अपने प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने के लिए करते हैं. ताकत हाथ में आने के बाद हग्रामा और उनके सहयोगियों में विचारधारा का क्षरण भी तेजी से हुआ है. 

चाहे भूमिगत एनडीएफबी हो या हथियार डाल चुकी बीएलटी,  दोनों के ज्यादातर कैडर के पास अवैध हथियार हैं. इनमें से कुछ तो फिरौती भी वसूलने लगे हैं. इससे बोडो इलाकों में जंगलराज जैसी स्थिति लगती है. कोकराझार राजकीय अस्पताल में भर्ती एक बोडो महिला बताती है, ‘आम बोडो यहां सुरक्षित नहीं है. हथियारबंद लोग खुलेआम घूमते हैं. इनमें सिर्फ बोडो विद्रोही ही नहीं हैं. इनकी आड़ में स्थानीय गुंडे-बदमाश भी गिरोह चला रहे हैं.’  जातीय संघर्ष की वजह से यह अराजकता और बढ़ी है. ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष अब्दुल रहमान अहमद कहते हैं, ‘पिछले तीन साल के दौरान गैरबोडो समुदायों के नेताओं पर लगातार हमले होते रहे हैं. इससे बीटीसी इलाके में रहने वाले गैर-बोडो समुदायों में भय व्याप्त है.’   

पिछले छह महीने के दौरान बोडोलैंड में रहने वाला गैर-बोडो समुदाय अपने साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ मुखर हुआ था. इसके नतीजे में नॉन बोडो सुरक्षा समिति का गठन भी हुआ था. इसका काम था गैर-बोडो लोगों के साथ होने वाले अत्याचार का विरोध. मुसलिम नेताओं द्वारा गठित इस संगठन को कुछ बांग्लाभाषी हिंदुओं, नेपालियों और राजबोंघिस समुदाय का समर्थन प्राप्त था. ये बोडोलैंड का विरोध नहीं कर रहे थे लेकिन गैर बोडो समुदाय के लिए अधिकारों की मांग कर रहे थे. 

गैर-बोडो संगठन के उभार के पीछे राजनीति की भूमिका भी देखी जा रही है. इस आशंका को मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी खारिज नहीं किया है. वे कहते हैं, ‘हमारे पास सुरक्षा बलों की कमी है. केंद्र ने अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजने का वादा किया है. एक हफ्ते के भीतर हालात काबू में आ जाएंगे लेकिन मैं इसके पीछे राजनीतिक षड्यंत्र से इनकार नहीं कर सकता. हमें इन हालात से निपटना है.’ लेकिन साफ है कि गोगोई सरकार ने 2008 में उदलगुड़ी में हुई  हिंसा से कोई सीख नहीं ली है जिसमें 54 लोग मारे गए थे. इसकी जांच के लिए गठित जस्टिस पीसी फूकन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में असम पुलिस की बखिया उधेड़ते हुए उसकी खुफिया क्षमता पर सवाल खड़े किए थे. आयोग ने हिंसा भड़कने के लिए मुसलिम स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ असम को जिम्मेदार माना था जो इलाके में जबरन बंद थोपने की कोशिश कर रही थी. हमेशा की तरफ इस बार भी समय रहते स्थिति काबू में आ सकती थी. लेकिन पुलिस ने हालात को हाथ से निकलने का मौका दिया. अब सरकार और उसके गृह विभाग को जवाब खोजना पड़ रहा है. 

बिजली पर बेपरवाही

बिजली की भारी किल्लत से जूझ रहा बिहार अगले पांच साल में ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य लेकर चल रहा है. राज्य सरकार अपने पुराने बिजली घरों की मरम्मत करा रही है और नए बिजली घर बना रही है. कुछ समय पहले औरंगाबाद जिले के नबीनगर में एक बिजलीघर का शिलान्यास करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जल्द ही बिहार को बाहर से बिजली लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी.  

लेकिन यह भविष्य की बात है. बिहार के वर्तमान पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि यहां बिजली निगलने वाले खिलाडि़यों की एक फौज है और उन खिलाडि़यों को विजेता बनाने वाले रेफरी भी मैदान में अपनी पूरी ऊर्जा लगाते हैं. जब तक इस भ्रष्ट गठजोड़ पर नकेल नहीं कसी जाती तब तक बिजली के मोर्चे पर भविष्य में आत्मनिर्भरता के कोई खास मायने नहीं लगते. राज्य विद्युत बोर्ड ने बिहार विद्युत नियामक आयोग को 2011 के जो आंकड़े बताए हैं उनके हिसाब से 57 प्रतिशत से अधिक बिजली का ‘एयर ट्रांसमिशन ऐंड कॉमर्शियल लॉस’ हो जाता है. यानी 100 रुपये की बिजली है तो उसमें सरकार को 57 रुपये से ज्यादा का नुकसान है. यह नुकसान एक रिकॉर्ड की तरह है. देश के सभी राज्यों में यह नुकसान होता है. लेकिन बिहार में नुकसान के इस खेल को देखें तो साफ लगता है कि यह नुकसान जितना होता नहीं, उससे ज्यादा कहीं सुनियोजित तरीके से कराया जाता है. 

लेकिन पहली व्यवस्था के पंगु होने और दूसरी के आने के बीच के वक्त का हिसाब-किताब जब होगा तब शायद एक और कीर्तिमान कायम हो. 

बिहार सरकार फिलहाल 500 मेगावाट बिजली की खरीदारी कर रही है. इसमें 300 मेगावाट बिजली एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम लिमिटेड से 4.31 रुपये की दर से तथा 200 मेगावाट अडानी ग्रुप से 4.41 रुपये की दर से ली जा रही है. इतनी महंगी खरीदी गई बिजली में यदि 57 प्रतिशत से अधिक नुकसान हो तो यह सवाल अहम हो जाता है. जानकार बताते हैं कि मानकों के हिसाब से यह नुकसान 29 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. ऊर्जा क्षेत्र में सुधार के लिए तय हो रहे मानदंड को मानें तो यह नुकसान 15 प्रतिशत में सिमटकर रहना चाहिए था. लेकिन बिजली को लेकर भविष्य के सपने में मगन महकमे में यह सवाल हाशिये पर है. राज्य विद्युत बोर्ड के प्रवक्ता हरेराम पांडेय कहते हैं, ‘नुकसान 40 प्रतिशत के करीब ही होगा. किन्हीं विशेष परिस्थितियों के रिकॉर्ड के आधार पर आप 57 प्रतिशत नुकसान की बात कर रहे हैं’. हम उन्हें ध्यान दिलाते हैं कि पिछले तीन साल से विद्युत विभाग के निगरानी कोषांग की पुलिस की गतिविधि ही बिजली चोरी को रोकने-रुकवाने को लेकर लगभग ठप पड़ी हुई है तो बिजली चोरी में एक रिकॉर्ड क्यों नहीं बन रहा होगा. पांडेय कहते हैं, ‘विद्युत बोर्ड अपने तरीके से विशेष पुलिस बल क जरिए बिजली चोरों पर छापेमारी कर रहा है. हम विभाग में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ भी लोगों को आगाह करते रहे हैं.’

पर असल सवाल यह है कि आखिर क्यों 1992 में गठित उस विद्युत विभाग निगरानी कोषांग को अचानक पंगु होना पड़ा जो बना ही बिजली चोरी रोकने के लिए था. क्यों आज यह स्थिति है कि कोषांग की पुलिस आज बिजली चोरी होते हुए देखकर भी तमाशबीन बनने को विवश है, क्योंकि उसे अब यह अधिकार नहीं है कि वह बिजली चोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई करे? राज्य के ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव अजय नायक  कहते हैं, ‘57 नहीं, यह नुकसान करीब 46 प्रतिशत है.’ वे यह भी बताते हैं कि समस्या को दूर करने के लिए पटना में वितरण व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है. वे और योजनाएं भी गिनाते हैं. निगरानी कोषांग विभाग पंगु बना दिया गया है तो बड़े चोर कैसे पकड़े जाएंगे, पूछने पर नायक कहते हैं, ‘दूसरे रास्ते बिजली चोरों को पकड़ने की कोशिश जारी है. बिजली के अलग से न्यायालय बनाकर त्वरित कार्रवाई भी की जा रही है.’ यानी बिजली बोर्ड से लेकर ऊर्जा विभाग तक इस सवाल का ठोस जवाब नहीं मिल पाता कि आखिर बिजली की चोरी रोकने के लिए बने निगरानी कोषांग को क्यों पंगु बनाया गया. लेकिन थोड़ा अतीत में जाने पर मामला कुछ-कुछ साफ होता है. जो दस्तावेज तहलका को मिले हैं, उनमें बड़े खेल के संकेत मिलते हैं. 

बात 2008 की है. विद्युत निगरानी कोषांग के महानिदेशक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आनंद शंकर हुआ करते थे. उनके निर्देश पर बिजली के बड़े खिलाडि़यों पर छापेमारी शुरू हुई. कई केस दर्ज हुए. इनमें एक केस नंबर 67/2008 भी था जो दादीजी स्टील नाम की एक कंपनी के खिलाफ था. निगरानी कोषांग को पता चला कि ऐसी ही चोरी को लेकर बिजली बोर्ड ने कई प्रतिष्ठानों से टैंपर्ड मीटर जब्त किया था और बिजली चोरी के ठोस साक्ष्य भी मिले थे, लेकिन बोर्ड की ओर से बिजली के उन चोरों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराया जा सका था. जब दादीजी स्टील पर मामला दर्ज हुआ तो आनन-फानन में बोर्ड ने भी कइयों पर मामले दर्ज करा दिए. लेकिन इतने दिन तक चुप्पी क्यों साधे रहा, इसे स्पष्ट नहीं किया जा सका. फिर बिजली बोर्ड अध्यक्ष स्वप्न मुखर्जी ने एक रास्ता निकाला और घोषणा की कि जिन प्रतिष्ठानों या उपभोक्ताओं के मीटर टैंपर्ड हैं वे इसकी स्वैच्छिक घोषणा करें. राज्य में करीब 28 लाख उपभोक्ता हैं, लेकिन 52 बड़े उपभोक्ताओं ने ही यह घोषणा की कि उनका मीटर टैंपर्ड है और उसे बदला जाए. 

खेल यहीं पर हुआ. जिन उपभोक्ताओं के टैंपर्ड मीटर जब्त किए गए थे, उन्होंने भी स्वैच्छिक घोषणा की बहती गंगा में हाथ धोया और बोर्ड ने भी उन पर मेहरबानी की. जिस स्टील कंपनी के खिलाफ निगरानी कोषांग ने कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और जिसके मामले में तीन साल की सजा के साथ करीब 20 करोड़ रु जुर्माने की संभावना थी,  उसने भी करीब दो माह बाद स्वैच्छिक घोषणा करके अपने बचने का रास्ता निकाल लिया और मात्र एक करोड़ का जुर्माना भरकर छुट्टी पाने की कोशिश की. लेकिन बात बड़ी थी. आनंद शंकर सख्त छवि वाले अधिकारी थे  इसलिए उन्होंने कई और बड़ी मछलियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया. तभी उनका तबादला हो गया. उनकी जगह 27 फरवरी, 2009 को दूसरे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मनोज नाथ आए. नाथ ने पाया कि बिजली बोर्ड के तब के अध्यक्ष स्वप्न मुखर्जी ने स्वैच्छिक घोषणा की आखिरी तिथि 5 जुलाई, 2008 की तय सीमा गुजर जाने के बाद भी स्वैच्छिक घोषणा को स्वीकारा है और बड़े खेल के रास्ते खोले हैं. साथ ही यह भी कि बिजली के जिन चोरों को टैंपर्ड मीटर के साथ पकड़ा गया था उन्हें भी स्वैच्छिक घोषणा का लाभ देकर सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया और चोरों को खुली छूट दी गई.

बिजली से ही राज्य में विकास का रास्ता खुलेगा है. लेकिन जो बिजली है, उसमें आधे से अधिक यूं ही व्यर्थ हो जा रही है

नाथ ने बोर्ड के अध्यक्ष पर केस किया. अध्यक्ष ने स्वीकारा भी कि दादीजी स्टील को स्वैच्छिक घोषणा का लाभ नहीं मिलना चाहिए था. लेकिन इसी बीच ‘आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास’ वाला खेल हुआ. जिस रोज महानिदेशक मनोज नाथ ने केस दर्ज कराया, उसी रोज अध्यक्ष ने भी नाथ पर केस दर्ज करा दिया. उनका आरोप था कि नाथ ने उनसे बिजली बोर्ड परिसर, जहां विद्युत निगरानी कोषांग महानिदेशक का कार्यालय है, सुसज्जित कार्यालय की मांग की और इसे  में मानने पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया और फिर यह विद्वेषपूर्ण केस भी किया. इससे मामले का रुख ही बदल गया. बिजली बोर्ड के अध्यक्ष ने बिजली चोरी के सार्वजनिक मामले को निजी दायरे में समेटने की कोशिश की. नतीजतन पूर्व महानिदेशक आनंद शंकर द्वारा बिजली चोरी का मामला दर्ज करवाने और फिर बाद में महानिदेशक मनोज नाथ द्वारा स्वैच्छिक घोषणा के खेल से संबंधित मामला दर्ज करवाने का मामला अदालत में पहुंचा. पटना हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत कोषांग पुलिस को ऊर्जा चोरी से किया गया कदाचार दर्ज करने का अधिकार ही नहीं है. हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया, बिजली बोर्ड इसे सिर आंखों पर लेकर लौट गया और तब से विद्युत निगरानी कोषांग नख-दंतहीन संस्था बनकर रह गया है. 

जानकार बताते हैं कि न्यायालय को जो सबूत और साक्ष्य उपलब्ध कराए गए थे, उस आधार पर फैसला सही है. लेकिन बड़ा सवाल कुछ और है. बिहार सरकार ने ही दो दशक पहले विद्युत निगरानी कोषांग को शुरू किया था. इसने दो दशक में बिजली चोरी के कई मामले उजागर किए और कई केसों को इसके जरिए एक अंजाम तक पहुंचाया जाना था. सवाल यह है कि उसी संस्था के अचानक अधिकारविहीन होने का फैसला सरकार ने स्वीकार कैसे कर लिया. सरकार और बिजली बोर्ड ने इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों नहीं किया? यह सवाल इसलिए अहम है कि इस फैसले के कुछ माह पहले ही जब नौबतपुर के एक किसान पर 60 हजार रुपये की बिजली चोरी का मामला बना था और हाई कोर्ट ने विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत एक ऐसा ही फैसला सुनाया था तो बिजली बोर्ड सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2010 में साफ कहा था कि ऊर्जा चोरी के मामले में पुलिस को 2007 में हुए विद्युत अधिनियम के संशोधन के बाद के ही नहीं, इससे पहले के मामलों में भी केस दर्ज करने का अधिकार है. 

नाथ कहते हैं, ’साफ है कि बिजली बोर्ड यह मामला इरादतन हार गया क्योंकि हाई कोर्ट के सामने समान मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बात बताई ही नहीं गई. बोर्ड ने यह भी नहीं सोचा कि इसका क्या असर पड़ेगा. निगरानी कोषांग ने अब तक जो केस दर्ज किए होंगे वे सब खारिज होने शुरू हो जाएंगे और सरकार को यह जवाब देना होगा कि निगरानी कोषांग के जरिए दो दशक से बिजली चोरों को पकड़ने और उन पर  कार्रवाई की जो कवायद होती रही, वह गलत थी.’ जानकार बताते हैं कि इस फैसले से स्टील कंपनी पर 20 करोड़ रुपये के जुर्माने वाला मामला तो ठंडे बस्ते में गया ही, और भी कई नुकसान हुए. मसलन जिन 52 उपभोक्ताओं ने स्वैच्छिक घोषणा का लाभ उठाया था उनमें दस ऐसे भी थे  जो आदतन बिजली चोर रहे थे और जिनसे मोटा राजस्व वसूला जाना था. दो और बड़े उपभोक्ताओं से भी करीब 160 करोड़  वसूले जाने थे, जिन पर 2005 में ही मामला दर्ज हुआ था. लेकिन हाई कोर्ट के फैसले की आड़ में अब यह राजस्व उगाहने की बात तो दूर, पहले दर्ज हुए मामले भी खुर्द-बुर्द हो सकते हैं. 

क्या यह खेल सिर्फ बिजली बोर्ड का है? या इसमें एक बड़ा गठजोड़ लगा हुआ है? पुलिस ने इस मामले को मुख्यमंत्री तक पहुंचाया. मनोज नाथ के बाद इस पद पर आए ढौंढियाल ने भी कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए और दो बड़े उपभोक्ता, जिनसे 160 करोड़ वसूले जाने हैं, उनके मामले में तो सुप्रीम कोर्ट जरूर जाना चाहिए.  सूत्र बताते हैं कि सरकार की ओर से भी बात आई कि सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे. इस संदर्भ में 21 जुलाई, 2011 को ही अभ्यावेदन भेजा गया था और उस आधार पर 90 दिन के अंदर सुप्रीम कोर्ट में मामला जाना चाहिए था लेकिन अब तक वह जस-का-तस पड़ा हुआ है. हम बिजली बोर्ड के अध्यक्ष पीके राय से बात करने की कोशिश करते हैं, लेकिन बात नहीं हो पाती. विभाग की ओर से हरेराम पांडेय ही फिर से उपलब्ध होते हैं. लेकिन बोर्ड क्यों सुप्रीम कोर्ट नहीं गया, इसका जवाब देना वे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात बताते हैं. राज्य के विकास आयुक्त अशोक कुमार सिन्हा कहते हैं, ‘निगरानी वाला मामला तो हाई कोर्ट का है, लेकिन बिजली चोरी रोकने के लिए हम लोग नए कदम उठा रहे हैं. वितरण की नई व्यवस्था की जा रही है और बिजली चोरी रोकने के लिए अलग से थाना खोलने का प्रस्ताव तैयार हुआ है. इससे बहुत हद तक अंकुश लगेगा.’ 

गुवाहाटी की शर्म और सबक

ऐसे मामलों से सबक न लेने वाले उन्हें दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं

यह सचमुच हिला देने वाली घटना थी. देश ने न्यूज चैनलों के पर्दे पर देखा कि  असम की राजधानी गुवाहाटी की एक मुख्य सड़क पर रात के करीब साढ़े नौ बजे के आस-पास एक युवा लड़की को कोई 15-20 लंपटों-गुंडों की भीड़ ने घेर लिया, उसे सरेआम बेइज्जत किया, बुरी तरह पीटा-घसीटा, उसके कपड़े फाड़ने और नंगा करने की कोशिश की. मदद के लिए गुहार करती उस लड़की की किसी ने कोई मदद नहीं की. न राहगीर रुके, न आस-पास खड़े लोग आगे आए और न पुलिस नजर आई. हालांकि उस चैनल के रिपोर्टर और कैमरामैन की भूमिका पर भी सवाल उठे कि उन्होंने भी उस लड़की की कोई मदद नहीं की और उल्टे पूरी घटना को फिल्माने में जुटे रहे.

सनसनीखेज खबर और दृश्यों की बेसब्र तलाश न्यूज चैनलों को यहां तक ले आई है, जहां उनके रिपोर्टर और संपादक अब ‘खबरें गढ़ने’ लगे हैं

कुछ चैनलों ने यह बहस उठाई कि उस परिस्थिति में जब कोई संकट या मुश्किल में हो, एक रिपोर्टर की भूमिका क्या होनी चाहिए. क्या उसे पहले पीड़ित को बचाने की कोशिश करनी चाहिए या उसे पहले रिपोर्ट करने और इसके लिए घटना फिल्माने को प्राथमिकता देनी चाहिए? यह एक क्लासिक नैतिक दुविधा है जिसका उत्तर आसान नहीं है और वह बहुत हद तक मौके की नजाकत और उसमें हस्तक्षेप करने की पत्रकार की सामर्थ्य और उसके तरीके पर निर्भर करता है. ऐसे कई उदाहरण हैं जब विषम परिस्थितियों में पत्रकारों ने घटना को रिपोर्ट भी किया है और पीड़ित को बचाने की भी कोशिश की है. लेकिन ऐसे भी उदाहरण हैं जब पत्रकारों ने पीड़ित को बचाने के बजाय उसे रिपोर्ट करने को प्राथमिकता दी है और उसकी कीमत चुकाई है. इस आलोचना के बावजूद काफी लोगों ने माना कि यह शर्मनाक वाकया सामने लाकर और अपराधियों की पहचान करने में मदद करके चैनल ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों और पुलिस के नाकारेपन का पर्दाफाश करके अपना पेशेवर फर्ज निभाया है.

लेकिन जल्दी ही एक ऐसी भयावह सच्चाई सामने आई जिसने टीवी पत्रकारिता को शर्मसार कर दिया. पता चला कि इस शर्मनाक हादसे के लिए एक असमिया चैनल का रिपोर्टर भी उतना ही जिम्मेदार है जिसने अपराधियों को न सिर्फ उस लड़की को बेइज्जत करने को उकसाया बल्कि संभवतः इसकी पूर्व योजना भी बनाई. लेकिन क्या इसके लिए वह अकेला रिपोर्टर जिम्मेदार है? चैनल के संपादकों ने रॉ फुटेज में रिपोर्टर की उकसावे वाली भूमिका को क्यों अनदेखा किया? हालांकि इस बीच रिपोर्टर की गिरफ्तारी हो चुकी है और संपादक को इस्तीफा देने पड़ा है, लेकिन असल सवाल यह है कि एक रिपोर्टर को इस तरह एक खबर ‘बनाने’ यानी मैन्युफैक्चर करने की जरूरत क्यों पड़ी या उसकी प्रेरणा कहां से मिली.

 दरअसल, कुछ अलग, सबसे पहले, ड्रामैटिक और सनसनीखेज खबर और दृश्यों की बेसब्र तलाश न्यूज चैनलों को यहां तक ले आई है, जहां उनके रिपोर्टर और संपादक अब ‘खबरें गढ़ने’ लगे हैं.  यहां तक कि इसके लिए वे एक युवा लड़की को सरेआम बेइज्जत और नंगा करने की हद तक पहुंच गए. यह घटना सभी छोटे-बड़े न्यूज चैनलों के लिए एक बड़ा सबक है. इसके बावजूद अधिकांश राष्ट्रीय चैनल ऐसा जताने की कोशिश कर रहे हैं कि यह घटना एक अपवाद है और सिर्फ क्षेत्रीय चैनलों तक सीमित और उनके बीच की अनैतिक होड़ का नतीजा है. गोया वे खुद दूध के धुले हैं और उनका इस गंदगी से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है. क्या वे दिल्ली की शिक्षिका उमा खुराना के फर्जी स्टिंग या जालंधर से लेकर बनारस तक लोगों को उकसा कर आत्मदाह करने या जहर पीने के लिए प्रेरित करने जैसे मामले भूल गए? गुवाहाटी की शर्म एक चेतावनी और सबक दोनों है. चैनलों को याद रखना चाहिए कि ऐसे शर्मनाक मामलों से सबक नहीं लेने वाले उन्हें दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं.

अनवरत असंतोष की फैक्टरी

बीती 18 जुलाई को मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड की मानेसर इकाई से  खबर आई कि मजदूरों और प्रबंधन के लोगों के बीच हुई झड़प में कंपनी के महाप्रबंधक (एचआर) अवनीश कुमार देव की मौत हो गई है. इसके बाद मारुति, सरकार और मीडिया के एक बड़े हिस्से ने कंपनी के मजदूरों को खलनायक बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. कंपनी प्रबंधन और प्रशासन की ओर से मिल रही जानकारी के आधार पर आती खबरों में कहा गया कि प्रबंधन के भोले-भाले अधिकारियों पर मजदूरों ने बिना बात के हमला किया और एक अधिकारी को जिंदा जला दिया.

इन खबरों की मानें तो कंपनी में सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन अचानक मजदूरों का दिमाग खराब हो गया और उन्होंने प्रबंधन के लोगों पर हल्ला बोल दिया. लेकिन अगर कोई मजदूरों से या उन लोगों से जाकर बात करे जो मजदूरों की लड़ाई लड़ रहे हैं तो पूरे मामले का दूसरा पक्ष भी उभरकर सामने आता है. हालांकि 18 जुलाई की घटना के बाद मानेसर इकाई के सारे मजदूर कंपनी छोड़कर भाग गए हैं. यहां तक कि कंपनी के मजदूर यूनियन के नेता भी भूमिगत हैं क्योंकि पुलिस इन मजदूरों की तलाश उपद्रवी मानकर गिरफ्तार करने के लिए कर रही है. मगर मजदूरों की गैरमौजूदगी में भी उनकी बात सामने आ रही है. जब मजदूरों के खिलाफ प्रबंधन, प्रशासन और सरकार ने तरह-तरह के आरोप लगाना जारी रखा तो मानेसर इकाई की मजदूर यूनियन के अध्यक्ष राम मेहर ने अज्ञात स्थान से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की. इसमें उन्होंने मजदूरों का पक्ष रखा. मानेसर इकाई के सौ से अधिक मजदूरों के गिरफ्तार होने और बाकी के भूमिगत होने के बाद मजदूर संगठनों के जो अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता इनकी लड़ाई लड़ रहे हैं उनकी मानें तो मजदूरों को उकसाने का काम खुद कंपनी प्रबंधन ने किया. इस पूरे मामले में कौन सही-कौन गलत के नतीजे पर पहुंचने से पहले पूरे घटनाक्रम को हर तरफ से जानना जरूरी है.

घटना के बाद कंपनी की तरफ से जारी बयान में बताया गया था कि तनातनी की शुरुआत 18 जुलाई की सुबह उस वक्त हुई जब एक मजदूर ने एक सुपरवाइजर को पीट दिया. इसके बाद जब प्रबंधन ने उस मजदूर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की बात की तो मारुति मजदूर यूनियन के अधिकारियों ने प्रबंधन को ऐसा करने से रोका. कंपनी के लिखित बयान के मुताबिक जब पहली शिफ्ट का काम खत्म करके अधिकारी और सुपरवाइजर गेट से बाहर निकल रहे थे तो मजदूरों ने उन्हें जाने नहीं दिया और बंधक बना लिया. इसके बाद जब प्रबंधन की तरफ से बातचीत की कोशिश चल रही थी तो अचानक मजदूर हिंसक हो गए और उन्होंने न सिर्फ अधिकारियों को पीटना शुरू कर दिया बल्कि कंपनी की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मकसद से आग लगाना भी शुरू कर दिया. कंपनी के मुताबिक मजदूरों ने कंपनी के 40 अधिकारियों को घायल कर दिया. बाद में मारुति के महाप्रबंधक (एचआर) अवनीश कुमार देव की जलने से मौत की खबर आई.

समझौते के बाद दस महीने से अधिक वक्त गुजरने के बावजूद अब तक न तो शिकायत निवारण समिति बनाई गई और न ही मजदूर कल्याण समिति बनी

मगर कंपनी की मजदूर यूनियन के अध्यक्ष राम मेहर ने अज्ञात स्थान से जो प्रेस विज्ञप्ति मीडिया को भेजी थी उसके मुताबिक मामला कुछ और ही था. राम मेहर के मुताबिक 18 जुलाई को एक सुपरवाइजर ने एक नियमित दलित मजदूर को जातिसूचक गाली दी, जिसका विरोध मजदूरों ने न्यायसंगत तरीके से किया. अपने बयान में राम मेहर कहते हैं, ‘उस सुपरवाइजर के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाय प्रबंधन ने उस मजदूर को निलंबित कर दिया जिसे जातिसूचक गाली सुननी पड़ी थी. प्रबंधन ने मजदूरों की जांच की मांग को भी खारिज कर दिया. इसके बाद यूनियन के अधिकारियों के साथ जब मजदूर एचआर अधिकारियों के पास मजदूर का निलंबन वापस लेने और सुपरवाइजर पर लगे आरोपों की जांच की मांग के साथ पहुंचे तो उन्होंने इन मांगों को सिरे से खारिज कर दिया.’ वे आगे कहते हैं, ‘बातचीत से इस मसले को सुलझाने की कोशिश चल ही रही थी कि प्रबंधन ने मजदूरों को पिटवाने के मकसद से 100 से अधिक बाउंसरों को बुलवा लिया. कंपनी के गेट बंद कर दिए गए और बाउंसरों ने मजदूरों पर हल्ला बोल दिया. बाद में मजदूरों की पिटाई करने में प्रबंधन के लोग भी शामिल हो गए और कुछ देर में पुलिस भी उनका साथ देने आ गई.’ दरअसल, जिन लोगों ने मारुति में पिछले साल के संघर्ष को करीब से देखा था और जो इसके बाद भी वहां के कामगारों के संपर्क में रहे उन्हें पता था कि कंपनी में असंतोष की चिंगारी कभी बुझी ही नहीं थी. हालांकि पिछले वर्ष का संघर्ष मुख्यतः मानेसर इकाई के लिए अलग मजदूर संगठन बनाने के लिए था, लेकिन इसकी जड़ में कहीं अधिक बड़ी समस्याएं थीं. ये समस्याएं सिर्फ मारुति के मजदूरों की नहीं बल्कि मोटे तौर पर पूरे औद्योगिक क्षेत्र के मजदूरों की हैं.

जब पिछले साल मारुति की मानेसर इकाई के मजदूरों का संघर्ष अपने चरम पर था तो उस वक्त तहलका की बातचीत कई मजदूरों से हुई थी. इनमें से एक गजेंद्र सिंह का कहना था, ‘नौ घंटे की शिफ्ट में साढ़े सात मिनट के दो ब्रेक मिलते हैं. इसी में आपको पेशाब भी करना है और चाय-बिस्कुट भी खाने हैं. ज्यादातर बार ऐसा होता है कि हमारे एक हाथ में चाय होती है, एक हाथ में बिस्कुट और हम शौचालय में खड़े होते हैं.’ छुट्टियों और मेडिकल सुविधाओं को लेकर भी मजदूरों में गहरा असंतोष था. अभियान में मजदूरों के बीच समन्वयक का काम करने वाले सुनील कुमार ने बताया था, ‘कागजी तौर पर तो हमें कई छुट्टियां दिए जाने का प्रावधान है लेकिन हकीकत यह है कि यहां छुट्टी पर जाने पर काफी पैसे कट जाते हैं. एक कैजुअल लीव लेने पर कंपनी प्रबंधन 1,750 रुपये तक पगार से काट लेता है. महीने में आठ हजार रुपये तक छुट्टी करने के लिए काट लिए जाते हैं. अगर आपने चार दिन की छुट्टी ली और यह इस महीने की 29 तारीख से अगले महीने की 2 तारीख तक की है तो आपके दो महीने के पैसे यानी 16,000 रुपये तक कट जाएंगे. आखिर यह कहां का न्याय है?’

दरअसल, कंपनी ने अपनी एचआर पॉलिसी इस तरह बनाई है कि पगार का एक बड़ा हिस्सा ‘अटेंडेंस रिवॉर्ड’ में डाल दिया गया है और अगर कोई एक दिन भी गैरहाजिर हो तो इसमें 25 फीसदी की कटौती कर दी जाती है. एक अन्य मजदूर गजेंद्र के मुताबिक, ’अगर काम करते समय किसी को चोट लगी तो कंपनी सिर्फ फर्स्ट एड कर देगी. उसके बाद जो भी इलाज होगा वह खुद ही कराना पड़ता है. अगर इस वजह से कोई छुट्टी ली तो कंपनी उसके पैसे भी काटती है.’ कंपनी की मानेसर इकाई में नियमित और ठेके पर काम करने वाले मजदूरों के बीच कई स्तरों पर होने वाला भेदभाव भी यहां के मजदूरों में असंतोष की एक वजह है. इस इकाई में तकरीबन 3,500 मजदूर काम करते हैं. इनमें से तकरीबन 2,000 ठेके पर काम करने वाले हैं. कंपनी में ठेका मजदूर के तौर पर कार्यरत मनोज वर्मा ने बताया था, ‘नियमित मजदूरों की मासिक पगार 16,000 रुपये है. जबकि ठेके पर काम करने वाले हम जैसे लोगों को हर महीने सिर्फ 6,500 रुपये मिलते हैं.’ यह कहानी सिर्फ मारुति की नहीं बल्कि औद्योगिक क्षेत्र की ज्यादातर कंपनियों की है. मारुति के मजदूरों को लगता था कि अगर उनकी अपनी सशक्त मजदूर यूनियन होगी तो सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. पिछले साल जब दोनों पक्षों में समझौता हुआ तो कंपनी ने न सिर्फ मजदूर यूनियन को मान्यता देने की बात मानी बल्कि मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए शिकायत निवारण समिति बनाने पर भी सहमति दे दी. इस बात पर भी सहमति बनी थी कि कंपनी मजदूरों के कल्याण के लिए भी एक समिति बनाएगी. लेकिन तकरीबन दस महीने से अधिक गुजरने के बावजूद अब तक न तो शिकायत निवारण समिति बनाई गई और न ही मजदूर कल्याण समिति. यूनियन को मान्यता तो मिली लेकिन उसे पूरे अधिकार प्रबंधन ने नहीं दिए.

नियमित और ठेका मजदूरों के बीच कई स्तरों पर होने वाला भेदभाव भी मारुति के मजदूरों में असंतोष की एक बहुत बड़ी वजह है

मारुति मजदूरों के बीच काम करने वाले इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ता श्यामवीर तहलका को बताते हैं, ‘नई यूनियन की हालत यह थी कि इसके पदाधिकारियों को प्रबंधन बात-बात पर जलील करता था ताकि मजदूरों के मन में उनको लेकर सम्मान न पैदा हो. अगर कोई बाहरी व्यक्ति यूनियन के पदाधिकारियों से मिलने जाता तो कंपनी प्रबंधन से इसके लिए अनुमति लेनी होती थी. जबकि दूसरी कंपनियों की यूनियन वाले खुद तय करते हैं कि उन्हें किससे मिलना है और किससे नहीं.’ मजदूरों के पक्ष में अभियान चलाने वाले क्रांतिकारी लोकाधिकार संगठन के कमलेश कुमार बताते हैं, ‘कंपनी प्रबंधन को यह बात भी हजम नहीं हो रही थी कि आखिर नियमित मजदूर ठेका मजदूरों के हक की लड़ाई क्यों लड़ रहे हैं. प्रबंधन के अधिकारी नियमित मजदूरों को यह कहते थे कि तुम्हारा काम तो ठीक चल रहा है फिर क्यों ठेका मजदूरों के लिए परेशान होते हो. प्रबंधन की तमाम कोशिशों के बावजूद ठेका मजदूरों का असंतोष बढ़ता गया और उन्हें नियमित मजदूरों का भी भरपूर साथ मिल रहा था. सभी मजदूरों को एकजुट करने और उनके असंतोष को और भी भड़काने का काम पिछले साल बनाया गया कोड ऑफ कंडक्ट कर रहा था. आम तौर पर इस क्षेत्र की जो दूसरी कंपनियां हैं उनके कोड ऑफ कंडक्ट में 12 बिंदु होते हैं लेकिन मारुति ने 103 बिंदुओं वाला कोड ऑफ कंडक्ट लाया. इसके जरिए मजदूरों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लादे गए.’

कमलेश कुमार कहते हैं, ‘मारुति में मजदूरों की पगार को लेकर आखिरी समझौता 2009 में हुआ था जिसकी मियाद 2012 के मार्च में खत्म हो गई थी. मजदूर यूनियन और अन्य मजदूरों की तरफ से प्रबंधन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था कि उनकी पगार बढ़ाई जाए और अगले तीन साल के लिए नया वेतन ढांचा तैयार हो.’ श्यामवीर कहते हैं, ‘इन बातों को लेकर यूनियन और प्रबंधन में लगातार चल रही बातचीत बेनतीजा रह रही थी. प्रबंधन का यह कहना था कि हम ठेका और प्रशिक्षु मजदूरों के बारे में कोई बात नहीं करेंगे लेकिन नियमित मजदूर इनकी बात बार-बार उठा रहे थे. आज प्रबंधन बार-बार इस झूठ को दोहरा रहा है कि 18 जुलाई तक कंपनी में सब कुछ ठीक-ठाक था. लेकिन सच्चाई यह है कि मजदूरों ने शिफ्ट से पहले होने वाली 15 मिनट की असेंबली में 16 जुलाई से ही जाना बंद कर दिया था. इसके बावजूद प्रबंधन ने मजदूरों की समस्याओं को सुलझाने के बजाए उन्हें टालने का रवैया अपनाया.’

इन आरोपों पर कंपनी का पक्ष रखते हुए मारुति के मुख्य परिचालन अधिकारी (एडमिनिस्ट्रेशन) एसवाई सिद्दीकी कहते हैं, ‘पिछले एक साल से हम मजदूरों के साथ संबंध मजबूत करने के लिए प्रयासरत हैं. पिछले साल अक्टूबर में त्रिपक्षीय समझौता हुआ था. इसमें मारुति प्रबंधन और मजदूरों के अलावा हरियाणा सरकार भी एक पक्ष थी. दोनों समितियों के लिए हमने अपने प्रतिनिधि नामित किए और राज्य सरकार ने भी, लेकिन मजदूरों ने अपने प्रतिनिधियों को नामित नहीं किया. इन समितियों का गठन हमारी वजह से नहीं बल्कि मजदूरों की वजह से टला.’ नियमित और ठेका मजदूरों के बीच भेदभाव के मसले पर वे कहते हैं, ‘ठेका वाले मजदूरों को रखना गैरकानूनी तो है नहींे. यह सच है कि उन्हें सुविधाएं कम मिलती हैं. कंपनी पिछले कुछ समय से मुख्य कार्यों में सिर्फ नियमित मजदूरों को रखने की योजना पर काम कर रही है.’ पगार को लेकर मजदूरों और प्रबंधन के बीच चल रहे टकराव पर सिद्दीकी कहते हैं, ‘पगार बढ़ाने को लेकर बातचीत अंतिम दौर में थी और लग रहा था कि सहमति बन जाएगी.’ कंपनी की आगे की रणनीति पर वे कहते हैं कि हम चाहते हैं कि जो भी कसूरवार हैं उन्हें सजा मिले.

मारुति समेत पूरे औद्योगिक क्षेत्र में काम कर रहे मजदूरों के बीच बढ़ते असंतोष की मूल वजहों की ओर ध्यान दिलाते हुए ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के महासचिव और वरिष्ठ माकपा नेता गुरुदास दासगुप्त बताते हैं, ‘निजी क्षेत्र की कंपनियों को लगता है कि सरकार उनके साथ है इसलिए वे जो चाहें कर सकती हैं. मुनाफा और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में ये कंपनियां मजदूरों को इंसान मानने को तैयार ही नहीं हैं.’  मारुति के मामले में वे कहते हैं, ‘इस कंपनी में भी हिंसा की वजह प्रबंधन का असंवेदनशील और दमनकारी रवैया है. पहले भी इस कंपनी ने मजदूरों के साथ ज्यादती की है लेकिन सरकार ने कभी उसको कुछ नहीं कहा.’ तो क्या शोषण से उपजे गुस्से में मजदूरों द्वारा किसी की हत्या कर देने को सही ठहरा दिया जाए? ‘न तो मैं और न ही कोई और हत्या को सही ठहरा सकता है. लेकिन आपको समझना होगा कि श्रम कानूनों की पूरी तरह से अनदेखी करके जानवरों जैसा बर्ताव करने से कैसी मानसिकता विकसित हो रही है’ दासगुप्ता कहते हैं. इस बीमारी के इलाज के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘कंपनियां मजदूरों को भी इंसान समझें और सरकार उद्योगों में श्रम कानूनों का पालन सुनिश्चित करे.’

क्या पंजाब में भाजपा हाशिये पर पहुंच जाएगी?

हाल ही में पंजाब के मनसा जिले में एक फैक्टरी के नजदीक 25 गायों के शव मिले थे, धार्मिक रूप से यह काफी संवेदनशील मसला था इसलिए तुरंत ही वहां ग्रामीणों का प्रदर्शन शुरू हो गया. पूरे इलाके में कुछ दिन कर्फ्यू लगा रहा. राजनीतिक प्रेक्षक और जनता उम्मीद कर रहे थे कि यह गाय से संबंधित विषय है इसलिए पंजाब में सत्तासीन शिरोमणि अकाली दल की सहयोगी भाजपा तुरंत ही तीव्र प्रतिक्रिया देगी. लेकिन यहीं पंजाब की राजनीति में आ रहे बदलाव की एक ऐसी झलक दिखी जो आने वाले दिनों में भाजपा के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है. इससे पहले गाय वाले मसले पर भाजपा जिला बंद या आंदोलन जैसे किसी राजनीतिक स्टंट का कुछ भी बयान देती राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने ऐसी घोषणाएं कर दीं जिन्हें सुनकर न सिर्फ भाजपा के पैरों तले जमीन खिसक गई साथ ही यह भी साबित हो गया कि यह अकाली दल भाजपा के वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए खुद भाजपा के एजेंडे पर उससे आगे जा सकता है. मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि फैक्टरी की जमीन को अधिगृहीत करके वहां मृत गायों की याद में गाय स्मारक बनाया जाएगा. इसके साथ ही बादल ने राज्य के डीजीपी को यह आदेश  दिया कि गायों को मारने और उन पर की गई हिंसा से संबंधित जितने भी मामले थानों में लंबित हैं उन्हें तत्काल प्रभाव से निपटाया जाए. सभी जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि गाय से संबंधित मामलों को वे बेहद संवेदनशीलता और प्राथमिकता से देखें. मुख्यमंत्री की इन ‘क्रांतिकारी’ घोषणाओं के बाद स्वाभाविक ही है कि भाजपा के पास कुछ कहने-करने को नहीं बचा. 

वैसे दोनों दलों के बीच के राजनीतिक प्रेम संबंध में बदलाव की बुनियाद उसी दिन पड़ गई थी जब इसी साल मार्च में विधानसभा चुनाव नतीजे घोषित हुए. अकाली दल को इसमें 56 सीटें मिली थीं. यानी 117 की विधानसभा में 59 सीटों के बहुमत से बस तीन कम. गठबंधन में शामिल बीजेपी को 12 सीटें मिलीं. इससे अकाली दल-भाजपा गठबंधन की सीटें 68 हो गईं. बहुमत से 9 सीटें ज्यादा. हालांकि जैसा पहले कहा जा चुका है कि अकाली दल अगर अपने दम पर सरकार बनाने की सोचता तो उसे सिर्फ तीन सीटों की और जरूरत थी. लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव (2007) में ऐसी स्थिति नहीं थी. 2007 में अकाली दल को केवल 49 सीटें हासिल हुई थीं, कांग्रेस उससे केवल पांच सीटें पीछे थी. उस समय अकाली दल और भाजपा गठबंधन की सरकार बनाने का काम भाजपा ने किया. भाजपा ने उस चुनाव में रिकॉर्ड 19 सीटें जीती थीं. ये 19 सीटें जब अकाली दल के 49 सीटों से जुड़ीं तो गठबंधन ने सरकार बनाने का जादुई आंकड़ा आसानी से पार कर लिया.

लेकिन इस बार ऐसी स्थिति नहीं थी. चुनाव नतीजे बता रहे थे गठबंधन का दूसरा साथी अर्थात भाजपा कमजोर हुई है और अकाली दल पिछले चुनाव के मुकाबले काफी मजबूत हुआ. इतना कि उसे अपने बलबूते  पर सरकार बनाने में अब कोई खास मुश्किल नहीं दिख रही है. यही वजह है पिछले दिनों पंजाब में ऐसी कई घटनाएं हुईं जो दिखाती हैं कि अकाली दल अपनी इस योजना को अमली जामा पहनाने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है. वरिष्ठ पत्रकार बलवंत तक्षक इस बात पर सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘राज्य में भाजपा का कोई खास आधार नहीं है. वे अकाली दल की वजह से ही सत्ता में हैं. अपने दम पर तो राज्य में वह कुछ कर नहीं सकती. अब अकाली भी यही चाहते हैं कि उसे पंजाब में कमजोर बनाए रखा जाए. वे चाहते हैं कि भाजपा बस 10-15 सीटें जीतने के साथ जूनियर पार्टनर की तरह चुपचाप उनके साथ काम करती रहे.’ गठबंधन के दोनों सहयोगी अकाली दल और भाजपा ने अपनी जरूरत के हिसाब से राज्य में एक मॉडल तैयार किया था जिसमें अकाली दल जैसा कि माना जाता रहा है कि गांव और किसानों की पार्टी है वह पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगा तो भाजपा शहरी क्षेत्रों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाएगी. अकाली दल जहां सिखों के वोट ले आएगा वहीं भाजपा गैरसिख खासकर हिंदुओं के वोट गठबंधन को दिलाएगी. इस तरह एक तरफ जहां क्षेत्र (ग्रामीण और शहरी) के आधार पर दोनों पार्टियों के बीच कार्य विभाजन था वहीं धर्म के आधार पर भी दोनों ने अपनी अपनी हिस्सेदारी तय कर ली थी. 

‘अगर हम अकाली दल को हिंदुओं को टिकट देने से मना करेंगे तो वे यह सवाल पूछने लगेंगे कि हम सिखों को टिकट क्यों देते हैं’

इस तरह गठबंधन को शहरी, ग्रामीण, सिख और गैरसिख (खासकर हिंदूओं) सभी के वोट मिल जाते थे. लेकिन इस सत्ता संतुलन में पहली दरार तब पड़ी जब अकाली दल ने विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड 11 हिंदुओं को टिकट दिया. यह शुरुआत फिर आगे बढ़ती गई और अकाली दल ने भाजपा के वोट बैंक समझे जाने वाले हिंदुओं को पार्टी से जोड़ने की गंभीर शुरुआत की. बीजेपी के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘पार्टी को अकाली दल के इस रवैये से दिक्कत तो थी लेकिन वह कुछ कर नहीं सकती थी क्योंकि अगर आप आज उन्हें हिंदुओं को टिकट देने से रोकेंगे तो वो इस बात का विरोध करेंगे कि हम किसी सिख को क्यों टिकट दे रहे हैं.’  

दोनों दलों के बीच दरार को चौड़ा करने का काम एक और बड़ी घटना ने किया. जब बादल सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजौना को मिली फांसी की सजा को लागू करने से इनकार कर दिया. भाजपा अकाली दल के इस व्यवहार से बेहद नाराज थी. जिस आदमी को पार्टी आतंकवादी और हत्यारा मानती थी, उसी की फांसी की सजा रुकवाने के लिए उसका गठबंधन सहयोगी (अकाली दल) दिल्ली में केंद्र सरकार के सामने विनम्र प्रार्थना कर रहा था. अकाली दल ने भाजपा की एक नहीं सुनी, किसी तरह न सिर्फ राजौना की फांसी पर राष्ट्रपति के माध्यम से रोक लगवाई गई बल्कि उन्हीं दिनों अकाल तख्त ने उसे जिंदा शहीद की उपाधि से भी नवाजा. इसके बाद मामला आया अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर के प्रांगण में ब्लू स्टार मेमोरियल बनाए जाने का. भाजपा पंजाब प्रभारी और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का इस मसले पर कहना था, ‘हम आतंकवाद और उसमें लिप्त लोगों को किसी तरह का समर्थन देने या फिर उनका महिमामांडन करने के सख्त खिलाफ हैं. हम मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से इस विषय पर बात करेंगे कि वे स्मारक के बनने पर जल्द से जल्द रोक लगवाएं.’ वैसे स्मारक पर तो रोक नहीं लगी और स्मारक का बाहरी ढांचा बन कर तैयार हो गया है. इस मामले में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी.­   

इसके बाद दोनों दलों के बीचे के संबंधों में सबसे बडा झटका हाल ही में संपन्न हुई नगरपालिका चुनावों में लगा. इस चुनाव में अकाली दल को भाजपा से अधिक सीटें हासिल हुई हैं. जबकि इससे पहले तक भाजपा यह मानती आई हुई थी कि शहरी क्षेत्रों में उसका जनाधार है और ग्रामीण क्षेत्रों में अकाली दल का. अभी नतीजे आए ही थे कि भाजपा ने अकाली दल पर यह आरोप लगाना शुरू कर दिया कि अकाली दल के नेताओं ने षड्यंत्र के तहत पार्टी के प्रत्याशियों के खिलाफ डमी कैंडिडेट खड़े कर दिए थे जिससे उनके कई प्रत्याशी हार गए. यह लड़ाई अभी चल ही रही थी कि कुछ धार्मिक संगठनों की तरफ से यह मांग आई कि अमृतसर चूंकि सिखों की धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है, ऐसे में यहां का मेयर कोई सिख ही होना चाहिए और वह अकाली दल से हो. भाजपा ने उसके और अकाली दल के बीच हुई राजनीतिक सहमति का हवाला देते हुए कहा कि 1997 में जो राजनीतिक गठजोड़ का समझौता हुआ था उसके अनुसार अमृतसर और जालंधर में मेयर भाजपा का बनेगा जबकि लुधियाना और पटियाला में मेयर अकाली दल का बनेगा. 

इस घटनाक्रम के बाद भाजपा के नेता अकाली दल को गठबंधन धर्म निभाने की नसीहत देते नजर आए. अभी तक दोनों दल यह तय नहीं कर पाए हैं कि मेयर किस दल से होगा. प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष विनोद शर्मा दोनों दलों के संबंध के इस स्थिति तक पहुंच जाने के सवाल पर कहते हैं, ‘हमारा समझौता बादल (प्रकाश सिंह बादल) साहब से है. वे हमेशा भाजपा को एक मजबूत साथी के तौर पर न सिर्फ देखते हैं साथ ही हमारा बेहद सम्मान करते हैं. लेकिन नीचे की लीडरशीप इस भावना से परिचित नहीं है. उसकी तरफ से समय-समय पर दिक्कतें आती रहती हैं.’ इस तरह से पिछले कुछ समय में कई ऐसी घटनाएं, घोषणाएं और बयानबाजियां सामने आई हैं जिन्होंने दोनों दलों के बीच तेजी से उभर रही दरार की तरफ इशारा किया है. लेकिन भाजपा की तरफ से अभी तक आक्रामक रुख देखने को नहीं मिला है.  बलवंत तक्षक कहते हैं, ‘भाजपा जानती है कि वह यहां बिना अकाली दल के कुछ नहीं है इसलिए वह जनता को दिखाने के लिए बयानबाजी तो करती रहती है लेकिन इस हद तक विरोध नहीं करती कि संबंध खत्म हो जाए.’