मेहरबानी की मार

कहानी दिसंबर, 2010 से शुरू होती है. उत्तर प्रदेश में तब भी भारी बिजली संकट था. उन्हीं दिनों तत्कालीन बसपा सरकार ने 24 दिन में ही समस्या को दूर करने का एक उपाय खोज निकाला और निजी क्षेत्र की नौ बिजली कंपनियों के साथ बिजली घर लगाने के सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए. ये करार 10 दिसंबर, 2010 से चार जनवरी, 2011 के बीच हुए. तय हुआ कि 18 महीने में बिजली घरों का काम शुरू हो जाएगा. शर्त यह भी थी कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो बिजली कंपनियों की धरोहर राशि जब्त कर ली जाएगी.  बसपा सरकार ने जो करार किया था उसके हिसाब से 18 महीने की मियाद जून, 2012 में पूरी हो गई, लेकिन एक भी कंपनी का काम शुरू नहीं हुआ. इस दौरान मार्च, 2012 में प्रदेश का निजाम भी बदल गया और बसपा के बदले समाजवादी पार्टी की सरकार आ गई. पर सपा सरकार ने एमओयू के हिसाब से करार निरस्त करके कंपनियों की करोड़ों की धरोहर राशि जब्त नहीं की. इसकी बजाय दरियादिली दिखाते हुए उसने उन्हीं कंपनियों को फिर से 18 महीने की मोहलत और दे दी.

अब सवाल कई हैं. बसपा की सरकार मई, 2007 में बन गई थी. उस समय भी उत्तर प्रदेश में बिजली का भारी संकट था. तो फिर 2007 से लेकर नवंबर, 2010 तक कोई करार क्यों नहीं किया गया? आखिर आनन-फानन में 24 दिन में ही नौ कंपनियों से 10,340 मेगावाट बिजली बनाने का करार क्यों? और जब बिजली कंपनियों ने 18 महीने तक कोई काम नहीं किया तो सपा सरकार ने यह करार रद्द क्यों नहीं किया? सवाल यह भी है कि जब सपा सरकार ने पूर्ववर्ती बसपा सरकार के कई बड़े फैसले निरस्त किए हैं तो निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियों पर इतनी मेहरबानी क्यों. इन सब सवालों के जवाब में आॅल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के सेक्रेटरी जनरल शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ‘सपा हो चाहे बसपा, सभी ने निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियों को फायदा देने के लिए ऐसा किया. कंपनियों पर दरियादिली दिखाने में सपा सरकार पूर्ववर्ती बसपा सरकार से भी दो कदम आगे निकल गई है.’  

अगर पूरे करार पर गौर से नजर डाली जाए तो तथ्य दुबे की बात की पुष्टि करते लगते हैं. पहले बसपा सरकार के करार पर नजर डालते हैं जो आनन-फानन में किया गया. हुआ यह था कि केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने एक अध्ययन के बाद पाया कि एमओयू के माध्यम से बनने वाले बिजली घरों की बिजली प्रतिस्पर्धात्मक रूप से बनने वाले बिजलीघरों की तुलना में काफी महंगी पड़ रही है. लिहाजा केंद्र सरकार ने पांच जनवरी, 2011 को सभी राज्यों के लिए नियम बना दिए कि अब एमओयू के माध्यम से बिजली घर नहीं लगाए जा सकते. दुबे कहते हैं, ‘बसपा सरकार को जब इस बात की भनक लगी कि केंद्र सरकार नए नियम बनाने जा रही है तो आनन-फानन में उसने 24 दिन के भीतर 10,340 मेगावाट बिजली बनाने का करार निजी क्षेत्र के बिजली घरों से कर लिया. करार में कंपनियों से जमानत राशि पांच लाख रुपये प्रति मेगावाट की दर से जमा करवाई गई. इस तरह कंपनियों की ओर से सरकार के पास करीब साढ़े पांच अरब रुपये जमानत राशि के रूप में जमा हुए. बसपा सरकार ने करार के तहत कंपनियों को 18 महीने का समय काम शुरू करने के लिए दिया था. करार में लिखा था कि यदि कंपनियां 18 महीने में काम नहीं शुरू करती हैं तो उनकी जमानत राशि जब्त कर ली जाएगी.’ 

जून, 2012 में 18 महीने की मियाद पूरी हो गई, लेकिन तब तक किसी भी कंपनी ने काम शुरू नहीं किया था. इसके बावजूद सपा सरकार ने लगभग साढ़े पांच अरब की जमानत राशि जब्त करने के बजाय कंपनियों को 18 महीने की मोहलत और दे दी. दुबे कहते हैं, ‘केंद्र सरकार के पांच जनवरी, 2011 के नियम के अनुसार एमओयू के माध्यम से बिजली घर लगाए ही नहीं जा सकते. तो सपा सरकार ने समय से काम शुरू न करने वाली बिजली कंपनियों की अरबों की जमानत राशि जब्त करने के बजाय 18 महीने की मोहलत और कैसे दे दी? उधर इस दौरान मशीनरी और प्लांट की लागत 10-15 प्रतिशत तक बढ़ गई है. सरकार ने 18 महीने का समय और दे दिया है लिहाजा बिजली घर लगने तक यह लागत 2010 के मुकाबले 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी.’ दुबे कहते हैं कि इसका असर बिजली की लागत पर दिखेगा और प्रभाव आम जनता पर पड़ेगा. सपा सरकार की दरियादिली यहीं तक सीमित नहीं है. तीन जुलाई को विधानसभा सत्र के अंतिम दिन सरकार ने एक अध्यादेश पारित करा लिया जिसके तहत कंपनियों को विदेशी कोयला आयात करने की छूट भी दे दी गई. विदेशी कोयले को आयात करने के पीछे सपा सरकार ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार समय पर बिजली घरों को कोयला उपलब्ध नहीं करवा पा रही है. 

  • डेढ़ साल पहले सरकार ने नौ बिजली कंपनियों के साथ समझौता किया
  • तय हुआ कि 18 महीने में नए बिजली घरों का काम शुरू हो जाएगा
  • 18 महीने की मियाद जून, 2012 में पूरी हो गई लेकिन काम शुरू नहीं हुआ
  • इस बीच सरकार बदल गई, उसने मियाद 18 महीने और बढ़ा दी
  • इस दौरान बिजली घर निर्माण लागत में 25-30 फीसदी बढ़ोतरी होने का अनुमान है जिसका बोझ आखिर में आम आदमी पर ही पड़ना है
  • सहमति पत्र वाले तरीके के बजाय प्रतिस्पर्धात्मक तरीका अपनाया जाता तो बिजली सस्ती पड़ती 
  • नौ में से चार बिजली कंपनियों के पास तो बिजली घर लगाने का कोई अनुभव नहीं है

सपा सरकार की बिजली कंपनियों पर इस मेहरबानी का खमियाजा आम जनता को कैसे भुगतना पड़ेगा अब जरा इस पर भी गौर करें. देशी कोयले की कीमत करीब तीन हजार रुपये प्रति टन है. एक यूनिट बिजली बनने में करीब आठ सौ ग्राम कोयला खर्च होता है. इस लिहाज से भारतीय कोयले से एक यूनिट बिजली बनाने में करीब ढाई रुपये का खर्च आता है. आयातित कोयले की कीमत करीब आठ हजार रुपये प्रति टन है. लिहाजा आयातित कोयले से एक यूनिट बिजली बनाने में करीब साढ़े छह रुपये का खर्च आएगा. आयातित कोयले की ढुलाई में भी अच्छा खासा कंपनियों को खर्च करना पड़ेगा क्योंकि चेन्नई हो चाहे मुंबई सभी बंदरगाह उत्तर प्रदेश से 1,500 से 2,000 किलोमीटर की दूरी पर हैं. जबकि भारतीय कोयला पड़ोसी राज्य बिहार या झारखंड से ही मंगाया जाता है जिस पर ढुलाई का खर्च भी कम आता है. इस हिसाब से सरकार को आयातित कोयले से बनने वाली बिजली देशी कोयले से बनने वाली बिजली से करीब तीन गुना अधिक महंगी पड़ेगी. आखिरकार इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर ही पड़ेगा.

निजी क्षेत्र से लगने वाले बिजली घरों की बिजली आखिर और कैसे महंगी होती है जो सीधे आम जनता को प्रभावित करती है? उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ के महासचिव ओम प्रकाश पांडे बताते हैं, ‘एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों के जमीन अधिग्रहण में सिर्फ सरकार को मदद करना होता है. बाकी कोयला, पानी व पर्यावरण का क्लीयरेंस कंपनी को खुद लेना होता है. आम तौर पर बिजली घर लगाने के लिए कंपनियों को अतिरिक्त खर्च नहीं करना चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं पाता.’ पांडे आगे बताते हैं कि कंपनी लगाने के नाम पर नीचे से ऊपर तक रुपये की जो बंदरबांट होती है वह करोड़ों में पहुंच जाती है जिसका कोई लेखा-जोखा नहीं होता.

देशी कोयले के मुकाबले आयातित कोयले से बनने वाली बिजली करीब तीन गुना अधिक महंगी पड़ेगी. इसका बोझ आखिरकार आम जनता को ही उठाना है

लिहाजा कंपनी लगने के बाद मालिकान सब जोड़ कर कंपनी लगाने का खर्च सरकार के पास पेश करते हैं जिसके हिसाब से बिजली का रेट तय होता है. कंपनी लगाने में जो लागत आएगी वह तथा 16 प्रतिशत रिटर्न आॅन कैपिटल इनवेस्टमेंट यानी निवेश पर मिलने वाले फायदे के आधार पर बिजली का रेट निर्धारित होता है. जानकार बताते हैं कि एमओयू के माध्यम से बिजली घर लगाने में सरकार बिजली की दर का निर्धारण नहीं कर सकती, ऐसे में बिजली की दर क्या हो, यह फैसला पूरी तरह से कंपनियों पर ही टिका होता है. उधर, प्रतिस्पर्धात्मक रूप से लगने वाले बिजली घरों में कंपनियों से अगले 25 साल तक की दरें मांगी जाती हैं. जिसकी दरें सबसे कम होती हैं, उसे ही काम करने का मौका दिया जाता है. 25 साल की दर इसलिए मांगी जाती है कि एक बिजली घर की उम्र 25 साल मानी गई है. इतना ही नहीं, प्रतिस्पर्धात्मक रूप से लगने वाले बिजली घरों के लिए पानी, कोयला, पर्यावरण क्लीयरेंस आदि सब कुछ सरकार को करके देना होता है. इस कारण कंपनी लगाने में भी काफी सहूलियत रहती है और बिजली का उत्पादन भी समय से होने लगता है. 

एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों का इतिहास टटोलने पर उम्मीदें कम ही जगती हैं. उदाहरण के लिए दादरी गैस परियोजना को ही लिया जाए. जून, 2005 में सपा सरकार ने ही दिल्ली के निकट दादरी में किसानों की बेशकीमती 2,500 एकड़ जमीन अंबानी समूह को कुल 7,400 मेगावाट का बिजली घर लगाने के लिए दी थी. योजना के प्रथम चरण में दादरी में 3,740 मेगावाट तथा दूसरे चरण में 3,660 मेगावाट का प्लांट लगना था. लेकिन अंबानी बंधुओं की आपसी लड़ाई के कारण प्लांट आज तक नहीं लग पाया. अनिल अंबानी के उक्त प्लांट को शुरू करने के लिए गैस चाहिए. केजी गैस बेसिन की लीज केंद्र सरकार ने मुकेश अंबानी को दी है. दोनों भाइयों की आपसी लड़ाई के कारण प्लांट को गैस ही उपलब्ध नहीं हो पा रही है. इसलिए सात साल बाद भी मौके पर काम शुरू नहीं हो सका है. इसके बावजूद किसानों की 2,500 एकड़ उपजाऊ जमीन आज भी दादरी प्रोजेक्ट के नाम पर अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली कंपनी के पास ही है. शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ‘यदि यही कंपनी प्रतिस्पर्धात्मक रूप से टेंडर आमंत्रित कर लगाई गई होती तो गैस आदि की व्यवस्था करना सरकार के जिम्मे होता और आज तक प्लांट शुरू हो गया होता. गैस का जो विवाद दोनों भाइयों के बीच कायम है सरकार उसका कोई न कोई हल ढूंढ़ कर प्लांट शुरू करने की पहल करती. दादरी प्लांट शुरू होने के बाद बिजली की जो समस्या आज प्रदेश के सामने है वह न होती.’ 

एमओयू के माध्यम से शुरू हो चुके रिलायंस समूह के रोजा बिजली घर का उदाहरण और भी दिलचस्प है. 2005 में इस प्लांट का भी एमओयू हुआ था जो चालू हो गया है. लेकिन समस्या यह है कि इसकी बिजली इतनी महंगी है कि बिजली खरीदने में सरकार की कमर ही टूट जाती है. रोजा बिजली घर से एक यूनिट बिजली की लागत करीब 5.34 रुपये आ रही है. जबकि ओबरा, पनकी, हरदुआगंज और परीक्शा बिजली घरों में एक यूनिट बिजली की लागत दो रुपये प्रति यूनिट ही है. इनमें से अनपरा की बिजली 1.20 रुपये की ही है. रोजा से महंगी बिजली खरीद के कारण उत्तर प्रदेश सरकार पर बिजली का 350 करोड़ रुपये बकाया हो गया है. बकाया भुगतान न होने के कारण चार जुलाई को कंपनी ने रोजा बिजली घर से उत्पादन ही बंद कर दिया. निजी क्षेत्र की कंपनी ने मनमानी करते हुए उस समय अपना उत्पादन बंद किया जिस समय प्रदेश में बिजली के लिए मारामारी थी क्योंकि इस समय गर्मी पूरे चरम पर थी और धान लगाने के लिए किसानों को सिंचाई की भी बहुत जरूरत थी. 

सहमति पत्र वाले रास्ते में सरकार बिजली की दर का निर्धारण नहीं कर सकती. यह फैसला पूरी तरह से बिजली घर लगाने वाली कंपनियों पर ही टिका होता है

बिजली खरीद पर नजर डालें तो केंद्रीय बिजली खरीद का औसत तीन रुपये प्रति यूनिट पड़ रहा है जबकि निजी क्षेत्र से 2011-12 में खरीदी गई बिजली का औसत 4.64 रुपये आया है. जिसमें से रोजा का औसत 5.34 रुपये आ रहा है. रोजा बिजली घर के उदाहरण से यह स्पष्ट है कि जो बात केंद्रीय बिजली नियामक आयोग ने कही है कि ओएमयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों की बिजली महंगी पड़ती है, वह सच है. अब तक बात हुई एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों पर सरकार की मेहरबानी की. अब अगर उन कंपनियों पर नजर डालें जिन्होंने बिजली घर लगाने के लिए सरकार से करार किया है तो और भी चौंकाने वाली बात सामने आती है. आॅल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के सेक्रेटरी जनरल शैलेंद्र दुबे का आरोप है कि इनमें से चार कंपनियों के पास देश के किसी भी राज्य में बिजली घर लगाने का कोई तजुर्बा नहीं है.

यूनीटेक मशींस लिमिटेड, पारिख एल्यूमिनैक्स, वेल्सपन पावर लिमिटेड और क्रिएटिव थर्मोलाइट प्राइवेट लिमिटेड ने बिजली घर लगाने का काम कभी नहीं किया. दो बिजलीघरों का काम बजाज हिंदुस्तान लिमिटेड के पास है. इस कंपनी ने उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में छोटे प्लांट ही लगाए हैं. बड़े प्लांट का अनुभव इसके पास भी नहीं है. इन कंपनियों में टोरेंट पावर लिमिटेड और लैन्को के पास ही बिजली घर लगाने का अनुभव है. दुबे सवाल करते हैं, ‘जब सरकार और बिजली विभाग के भी बड़े अधिकारियों को ये बात अच्छी तरह मालूम है कि कुछ कंपनियों के पास बिजली घर लगाने का अनुभव एकदम नहीं है तो आखिर उन्हें काम किस लिहाज से दिया गया? अनुभवहीन कंपनियों को काम देना ही सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाता है.’ बिजली उत्पादन निगम के पूर्व सीएमडी अभय शरण कपूर भी एमओयू के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों पर सवालिया निशान लगाते हैं. कपूर कहते हैं, ‘प्रतिस्पर्धात्मक रूप से टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से लगने वाले बिजली घरों की बिजली का रेट वाजिब मिल जाता है जबकि एमओयू में रेट को लेकर कंपनियां पूरी तरह ईमानदारी नहीं बरतती हैं.’ 

उधर, उत्तर प्रदेश ऊर्जा निगम के सीएमडी अवनीश अवस्थी किसी गड़बड़ी से इनकार करते हैं.  वे कहते हैं, ‘जिन कंपनियों से एमओयू हुआ, उन्हें 18 महीने का समय कोल लिंकेज की व्यवस्था करने के लिए दिया गया है. इसके अतिरिक्त कोयला आयात करने की जो बात सरकार ने कही है वह केंद्र सरकार के निर्देश पर हुआ है क्योंकि केंद्र ने ही कहा है कि कोयले की कुछ व्यवस्था सुनिश्चित की जाए.’जनता की जेब पर कम भार डालने के लिए एमओयू के बजाय प्रतिस्पर्धात्मक तरीका क्यों नहीं अपनाया गया, यह पूछने पर अवस्थी ने कहा, ‘सारा काम एमओयू से ही नहीं किया जा रहा. 6,000 मेगावाट बिजली बनाने के लिए टेंडर प्रक्रिया भी अपनाई जा रही है ताकि आम जनता पर महंगी बिजली का बोझ न पड़े.’