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जो जो बच्चन बने, वे नायक थे, लेकिन सबसे ज़्यादा जले भी वही : गैंग्स ऑफ वासेपुर

फ़िल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर 2

निर्देशक अनुराग कश्यप

लेखक जीशान कादरी, अखिलेश जायसवाल, सचिन के. लाडिया, अनुराग कश्यप

अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, तिग्मांशु धूलिया, रिचा चड्ढ़ा, हुमा कुरैशी, राजकुमार यादव, पंकज त्रिपाठी, जीशान कादरी

 

वह शुरू से जानता है कि वह पानी को मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश कर रहा है और वह जितना कसके पकड़ता है, पानी उतना जल्दी छूटता जाता है और जीवन भी. जीवन, जिससे उसे मोहब्बत है, बिल्कुल शुरू से ही. बल्कि ज़िन्दगी से उस जितनी मोहब्बत पूरी फ़िल्म में किसी को नहीं. उसके अलावा किसी लड़ैया में इतना साहस नहीं कि अपने खूनी वर्तमान से पीछे जाकर देखे कि उसे तो नहीं करना था यह सब, और एक अलसुबह चौबारे पर खड़ा रोने लगे. कि कैसे वह शशि कपूर था अन्दर, या हो रहा था/होना चाहता था, और उसके मरते संजीव कुमार ने, या कोसती वहीदा रहमान ने, या पीठ में छुरा घोंपते प्राण ने उसे बच्चन बनाकर छोड़ा. जो जो बच्चन बने, वे नायक थे, लेकिन अन्दर से और बाहर से सबसे ज़्यादा जले भी वे ही.

वह लकड़बग्घों की ऐसी दुनिया में है, जहां उन गानों के लिए कोई जगह नहीं, जो उसकी मोहसिना उसे ज़िन्दा रखने के लिए गाती है, कभी उसे बांहों में भरकर, कभी फ़ोन पर. वहां नहीं मारना कायरता है और वह एक समय तक गांजे को चुनता है ताकि अपने बाहर की दुनिया से रिश्ता तोड़ ले. लेकिन बदला उसी को अपना आख़िरी हथियार चुनता है और जब बदला अन्दर हो, तब बाहर के बादल, बारिश और बच्चे नहीं दिखते. अपने बच्चे भी नहीं.

फ़ैज़ल ख़ान की हिंसा उसकी इच्छा से ज़्यादा उसका कवच है, भले ही वह ख़ुद इसे जानता है या नहीं. इसी कवच के कारण वह मारकर या मारते हुए अपने पिता जितने घृणित ढंग से नहीं हँस पाता. जश्न मनाने का उसके पास कोई कारण नहीं। उसके जैसे दो रूप हैं. लोहे के टेंडरों की बात कोई और करता है और मोहसिना से गाने कोई और सुनता है. वह पैसा कमाता है, शक्तिशाली बनता है लेकिन उसके बचपन से लेकर अंत तक उसके भीतर तक कुछ नहीं पहुंचता, सिनेमा और मोहसिना के सिवा. और दोनों के साथ ही वह रो रहा है.

इस हिस्से में फ़िल्म कहीं उभरकर पॉलिटिकल नहीं होती. अपने गानों में खूब होती है, शादी के गानों में भी. और इक्का-दुक्का जगह अपने डायलॉग्स में, जब यह शहाबुद्दीन की तरह चुनाव जीतकर खुला खेलने और गाय का दूध दुहकर मुख्यमंत्री बनने की बात करती है। लेकिन मुख्यत: यह व्यक्तिगत कहानी और कभी-कभी कविता कहने वाला शुद्ध सिनेमा है और आप और हम चाहें या न चाहें, इसे कोई क्रांति नहीं करनी। हां, हंसी के खोल में क्रूर परपेंडिकुलर देना है, जिसका मरना तसल्ली दे. अपने किरदारों के संजय दत्तीय और सलमान ख़ानी स्टाइलों और आपकी हंसी के बीच यह आपको मांस के लोथड़ों और खून की नालियों के रास्ते पर ले जाएगी और आपका हाल नहीं पूछेगी. आपको बुज़ुर्गाना सलाह नहीं देगी, सुधरने या बिगड़ने (आपके लिए इनके जो भी अर्थ हों) की सीख नहीं देगी, और भावुक नहीं करेगी, सन्न करेगी। आप जब बाहर निकलते हैं तो आप नहीं जानते कि आपको क्या करना चाहिए. बल्कि आप हैं कौन और क्या आपको भूख लगी है और क्या यह सही समय है कि आप कहीं चैन से बैठकर सब्जी-रोटी खा लें. क्या अब के बाद कोई भी सही समय होगा ऐसा? यह एक शानदार सिनेमाई दावत थी भीतर, अपने सारे खेलों और जादू के साथ, लेकिन आप इतने बेचैन क्यों हैं?

लेकिन बेचैनी की बात से पहले हमें उस सिनेमाई दावत की बात करनी चाहिए, जिसमें इतने लम्बे-लम्बे शॉट हैं (कभी कभी शायद उनके खूबसूरत भ्रम भी) कि कभी-कभी तो फिल्म का यथार्थ बाहर के यथार्थ से कुछ ग्राम ज्यादा विश्वसनीय होने लगता है. अनुराग और राजीव रवि इतनी खूबसूरती से अंधेरे और उजाले के बीच अपने लम्बे दृश्यों को तैरने देते हैं. ख़ासकर फ़ैज़ल के घर पर हमले के वक़्त उसका अपनी छत पर पहुंचना, घायल होना और फिर छतें फाँदते हुए उसका गिरना, घायल होना, ठहरना, फिर उठना – विजुअली यह पूरा सीक्वेंस दुनिया भर के सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ हिस्सों में से एक है. इसका ठहराव और एक समय के बाद पीछे शुरू हुआ संगीत इसे और कमाल बनाता है. बल्कि उससे पहले सुल्तान के अपने साथियों के साथ उसके घर पर हमला करने और तब फ़ैज़ल के ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ वाले कमरे से पूरे परिवार को सुरक्षित जगह तक ले जाने वाले हिस्से जिस तरह शूट किए गए हैं, वे इस फ़िल्म को अलग कतार में ले जाते हैं. हमारे सिनेमा में, और खासकर इस जॉनर और इस कहानी के सिनेमा में और वह भी इतने सारे किरदारों के दृश्यों में, इतने कम कट्स के साथ अपनी बात कहना बतौर फ़िल्मकार, अनुराग को भी बहुत ऊपर ले जाता है. फ़ज़लू को मारने के सीन से लेकर आख़िर में स्लो मोशन में ऊपर फ़ैज़ल तक बन्दूकें पहुंचा रहे टैन्जेंट और डेफ़िनेट तक बहुत सारे लाजवाब सीन हैं. लम्बे चेज़ सीक्वेंस हैं, जो बेचैन तो हैं ही, उससे ज़्यादा मज़ेदार हैं. ख़ासकर शमशाद का डेफ़िनेट का पीछा करने का सीक्वेंस बहुत अच्छा है. इस पूरे सीक्वेंस में राजकुमार यादव ने कमाल ऐक्टिंग की है.     

‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की एक और उपलब्धि यह है कि यह हमें अपने किरदारों की साधारण हिन्दुस्तानी ज़िन्दगियों में, बिना उनकी सादगी और ज़बान खोए, हंसने-मुस्कुराने की खूब सारी जगहें देती है. और ऐसा करने के लिए इसे बाहर से कुछ लाने या कुछ नया ‘क्रियेट’ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, बल्कि यह वह सब पकड़ती है, जो हर वासेपुर के हर मोड़ पर हम सब देखते आए हैं. वे कभी विडम्बनाएं हैं, कभी भोलापन या बेवकूफ़ी और कभी-कभी हमारे बीच की बेहद आम बात कि फ़िल्मी कलाकारों के ज़िक्र में एक बुज़ुर्ग कहते हैं कि वो नरगिस और सुनील दत्त का बेटा है ना. चार आदमियों के बीच बैठे एक आदमी को फ़ैज़ल ख़ान ने मार दिया है और फ़िल्म बाकी चारों के बाद के रिएक्शन पर ठहरती है, जब भौचक्के वे फिर से सिगरेट पीने और चने खाने लगे हैं. या यह कि मातम पर यशपाल शर्मा जिस बैंड पर चढ़कर ‘तेड़ी मेहड़बानियां’ या ‘याद तेड़ी आएगी’ गा रहे हैं, उसका नाम ‘आशा बैंड’ है. या यह कि एक-दूसरे की जान के प्यासे फ़िल्म के किरदार जिन गलियों से भाग रहे हैं, उनमें ‘मैंने प्यार किया’ या ‘दिल तो पागल है’ के पोस्टर लगे हैं. कहीं पीछे कैलेंडर है, जो पाप न करने की सीख दे रहा है. सुल्तान की हत्या करने निकले तीन लोग उसे घेरने के दौरान आपस में फ़ोन पर यह बात कर रहे हैं कि हैल्मेट लगाकर कितनी गर्मी लगती है और कटहल से क्या क्या किया जा सकता है. या चप्पलों के जो दृश्य हैं, कि दुकान लूटने घुसने लड़के बाहर चप्पल उतारकर घुसते हैं. फ़ैज़ल को उसके बाप के मरने की ख़बर मिली है और वह चला जाता है और फिर चप्पल पहनने लौटता है. या एक सीन में पीछे ऋचा समझा रही हैं कि वॉशिंग मशीन में रंगीन और सफेद कपड़े अलग-अलग धोने हैं.

यह ऐसी फ़िल्म है, जिसके इतने सारे ऐक्टर या लगभग सभी ऐक्टर अपनी ऊंचाइयां छूते हैं. तिग्मांशु धूलिया दूसरे हिस्से में पहले से भी आगे जाते हैं, ऋचा चड्ढ़ा भी। नवाज़ुद्दीन, जिन्होंने बेहद मुश्किल किरदार और पहले हिस्से से दूसरे में उसका बदलाव जिया है, जिसका बाहर का कवच लोहा है और अन्दर कहीं मोम. राजकुमार यादव, जिनका किरदार छोटा है, लेकिन प्रतिभा नहीं. ज़ीशान क़ादरी, पंकज त्रिपाठी, विनीत कुमार और बहुत सारे वे लोग, जिनके नाम यहां नहीं लिए जा सके। और क्या यह दोहराने की ज़रूरत है कि स्नेहा खानवलकर का संगीत (वरुण ग्रोवर और पीयूष मिश्रा  के बोल) और जी.वी. प्रकाश कुमार का बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म को कहां ले जाता है?

लेकिन यह बेचैन क्यों करती है? क्या उस बच्चे के लिए, जिसके लिए उसके अब्बू बस एक हलो छोड़कर गए हैं और बदले और मौत की विरासत, जिसे जो भूल सकेगा, वही बचेगा? या फ़िल्मों की दीवानी उसकी मां के लिए, जो आख़िर अपने हीरो की मौत लेकर फ़िल्मों के इस शहर आई है? या हमारे लिए, जिनके पास यह कोई रास्ता नहीं छोड़ती? न बदला, न गांजा. न बच्चन, न शशि कपूर. फ़िल्म के दौरान चलती हंसी के बाद आख़िर एक सन्नाटा. ऐसा डर, जो आख़िर निडर बनाता है और संत भी। या बस बेहतर इंसान, जिसे फिर से याद आया है कि रोटी चाँद से बड़ी है.

– गौरव सोलंकी

हो हरी

जाऊं कि न जाऊं! जाने पर खतरा है न जाने पर भी खतरा! करूं तो क्या करूं! जाने दो, छींटाकशी तो रोज की बात है. हां, मगर कल तो छेड़खानी हुई है, बाकायदा छेड़खानी. टच करने की कोशिश की है! अगर ऐसे ही चुप रही तो कल को बात और बढ़ जाएगी! तो फिर क्या करूं, चली जाऊं क्या?

क्या जाऊं! इस बात की क्या गारंटी कि वे भी इसे गंभीरता से लेंगे. आजकल छेड़खानी को कौन गंभीरता से लेता है. अगर लोग इसे गंभीरता से लेते तो ऐसी घटना आम नहीं होती. ऐसी घटनाओं पर जिम्मेदारों का तब तक ध्यान नहीं जाता है, जब तब वह वीभत्स रूप न ले ले या फिर जिसके साथ घटना हुई हो, वह कोई विशिष्ट हो. तो फिर न जाऊं! हाय राम! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूं! अकेले जाने का ख्याल आया भी तो आया कैसे! किसी को अपने साथ ले लेती हूं, मगर कौन चलेगा मेरे साथ. हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है. कई तो मेरे जैसे होते हैं जिनको जान से ज्यादा अपनी इज्जत प्यारी होती है. फिर कोई वहां क्यों जाना चाहेगा? क्या करूं! अगर मैं वहां गई और मां-बाप को पता चल गया, तो मेरी घर वापसी का टिकट कटना तय है. घर वापस चली जाऊं! क्या रखा है यहां. दिन भर खटने के बाद आखिर मिलता ही कितना है. घर वापस जाकर करूंगी भी क्या. कैसा समाज है, कैसे लोग हैं. कल जब मैंने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का विरोध किया था, वहां कौन बोला था. अगर लोग बोलने लगे, तो हम जैसों को क्या जरूरत है, वहां जाने की. इत्ते बेवकूफ तो नहीं है हम कि बैल से कहें कि आ बैल मुझे मार!

मगर ऐसा कितने दिनों तक चलेगा? वहां जाना तो पडे़गा ही. अरे कोई जबरदस्ती है क्या भाई! जाओ नहीं जाती. हां, मगर कल को फिर कोई ऐसी-वैसी घटना हो गई तो! तब मैं क्या करूंगी! कहीं कोई कांड हो गया, तो कल को लोग यही कहेंगे कि आप हमारे पास आई क्यों नहीं. सही बात है, तो चली जाती हूं. चली ही जाती हूं! वहां चली तो जाऊं, मगर न जाने कैसे-कैसे सवाल पूछेंगे. कैसे पूछेंगे! कैसी नजरों से देखेंगे! मेरे बारे में क्या सोचेंगे! वहां जा कर पछताना न पडे़! कहीं पूछताछ के बहाने बार-बार बुलाए न! यह भी हो सकता है कि पूछताछ के बहाने रात-बिरात घर ही आ धमके! कहीं वहां मेरे साथ ऐसा-वैसा कुछ हो गया तब! तब कहां जाऊंगी!

मैं आज की नारी हूं. अपने अधिकारों को अच्छी तरह से जानती हूं. मैं नहीं लडूंगी तो कौन लडे़गा. अगर वहां कुछ ऐसा-वैसा मेरे साथ हुआ, तो उन्हें मुंहतोड़ जवाब दूंगी. मगर ऐसी नौबत ही क्यों आए. जब यही करना है, तो वहां जाने की जरूरत ही क्या है! हां, तो वे अपनी तनख्वाह भी हमें दे, जब उनका भी काम हमें ही करना है! अरे यार, मैं वहां जाने की सोच ही क्यों रही हूं! ऐसा करती हूं बॉडी गार्ड रख लेती हूं. तब जाती हूं वहां पर. सेफ रहूंगी. या फिर ऐसा करती हूं कि पहले एक गन खरीदती हूं, फिर वहां जाती हूं. अरे यार कैसे-कैसे आइडिया आ रहे हैं! क्या करूं! अकेले जाऊं या किसी को साथ ले जाऊं ? पहले किसी से फोन करवा देती हूं. मगर किससे! मेरे जाने में इतने रुतबे वाला कौन है! छोड़ो! कल देखते हैं. कल अगर ऐसा हुआ तो चलेंगे थाने में रपट लिखाने. नहीं यार, कल छेड़खानी न हो जाए! रपट लिखाने जाऊं तो कहीं रपट ही न जाऊं! उफ! पता नहीं छेड़खानी समस्या है कि उसकी रपट लिखवाना!  वह न जाने कब से थाने जाने के बारे में सोच रही है और न जाने कब तक सोचती ही रहेगी…

-अनूप मणि त्रिपाठी

जाऊं कि न जाऊं!

जाऊं कि न जाऊं! जाने पर खतरा है न जाने पर भी खतरा! करूं तो क्या करूं! जाने दो, छींटाकशी तो रोज की बात है. हां, मगर कल तो छेड़खानी हुई है, बाकायदा छेड़खानी. टच करने की कोशिश की है! अगर ऐसे ही चुप रही तो कल को बात और बढ़ जाएगी! तो फिर क्या करूं, चली जाऊं क्या?

क्या जाऊं! इस बात की क्या गारंटी कि वे भी इसे गंभीरता से लेंगे. आजकल छेड़खानी को कौन गंभीरता से लेता है. अगर लोग इसे गंभीरता से लेते तो ऐसी घटना आम नहीं होती. ऐसी घटनाओं पर जिम्मेदारों का तब तक ध्यान नहीं जाता है, जब तब वह वीभत्स रूप न ले ले या फिर जिसके साथ घटना हुई हो, वह कोई विशिष्ट हो. तो फिर न जाऊं! हाय राम! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूं! अकेले जाने का ख्याल आया भी तो आया कैसे! किसी को अपने साथ ले लेती हूं, मगर कौन चलेगा मेरे साथ. हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है. कई तो मेरे जैसे होते हैं जिनको जान से ज्यादा अपनी इज्जत प्यारी होती है. फिर कोई वहां क्यों जाना चाहेगा? क्या करूं! अगर मैं वहां गई और मां-बाप को पता चल गया, तो मेरी घर वापसी का टिकट कटना तय है. घर वापस चली जाऊं! क्या रखा है यहां. दिन भर खटने के बाद आखिर मिलता ही कितना है. घर वापस जाकर करूंगी भी क्या. कैसा समाज है, कैसे लोग हैं. कल जब मैंने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का विरोध किया था, वहां कौन बोला था. अगर लोग बोलने लगे, तो हम जैसों को क्या जरूरत है, वहां जाने की. इत्ते बेवकूफ तो नहीं है हम कि बैल से कहें कि आ बैल मुझे मार!

मगर ऐसा कितने दिनों तक चलेगा? वहां जाना तो पडे़गा ही. अरे कोई जबरदस्ती है क्या भाई! जाओ नहीं जाती. हां, मगर कल को फिर कोई ऐसी-वैसी घटना हो गई तो! तब मैं क्या करूंगी! कहीं कोई कांड हो गया, तो कल को लोग यही कहेंगे कि आप हमारे पास आई क्यों नहीं. सही बात है, तो चली जाती हूं. चली ही जाती हूं! वहां चली तो जाऊं, मगर न जाने कैसे-कैसे सवाल पूछेंगे. कैसे पूछेंगे! कैसी नजरों से देखेंगे! मेरे बारे में क्या सोचेंगे! वहां जा कर पछताना न पडे़! कहीं पूछताछ के बहाने बार-बार बुलाए न! यह भी हो सकता है कि पूछताछ के बहाने रात-बिरात घर ही आ धमके! कहीं वहां मेरे साथ ऐसा-वैसा कुछ हो गया तब! तब कहां जाऊंगी!

मैं आज की नारी हूं. अपने अधिकारों को अच्छी तरह से जानती हूं. मैं नहीं लडूंगी तो कौन लडे़गा. अगर वहां कुछ ऐसा-वैसा मेरे साथ हुआ, तो उन्हें मुंहतोड़ जवाब दूंगी. मगर ऐसी नौबत ही क्यों आए. जब यही करना है, तो वहां जाने की जरूरत ही क्या है! हां, तो वे अपनी तनख्वाह भी हमें दे, जब उनका भी काम हमें ही करना है! अरे यार, मैं वहां जाने की सोच ही क्यों रही हूं! ऐसा करती हूं बॉडी गार्ड रख लेती हूं. तब जाती हूं वहां पर. सेफ रहूंगी. या फिर ऐसा करती हूं कि पहले एक गन खरीदती हूं, फिर वहां जाती हूं. अरे यार कैसे-कैसे आइडिया आ रहे हैं! क्या करूं! अकेले जाऊं या किसी को साथ ले जाऊं ? पहले किसी से फोन करवा देती हूं. मगर किससे! मेरे जाने में इतने रुतबे वाला कौन है! छोड़ो! कल देखते हैं. कल अगर ऐसा हुआ तो चलेंगे थाने में रपट लिखाने. नहीं यार, कल छेड़खानी न हो जाए! रपट लिखाने जाऊं तो कहीं रपट ही न जाऊं! उफ! पता नहीं छेड़खानी समस्या है कि उसकी रपट लिखवाना!  वह न जाने कब से थाने जाने के बारे में सोच रही है और न जाने कब तक सोचती ही रहेगी…

-अनूप मणि त्रिपाठी

 

'मुझे नकल मर्डर बनानी पड़ी ताकि ओरिजिनल गैंगस्टर बना सकूं'

हम मलाड की एक बहुमंजिला इमारत की छत पर अनुराग बसु से मिले. भिलाई में पला-बढ़ा एक मध्यवर्गीय बंगाली लड़का, जो बीस से थोड़ा ही ऊपर होगा, जब उसने टीवी का मशहूर सीरियल तारा बनाया. बाद में और भी बहुत-से मशहूर धारावाहिक और फिल्में. लेकिन इतना ईमानदार कि यह कहने से पहले एक पल को भी नहीं झिझकता कि उसे ‘नकल’ मर्डर बनानी पड़ी ताकि अपनी असल गैंगस्टर बनाने को मिले. बाद में हमने समोसे खाए और बरफी  की बातें कीं. नि:स्वार्थ प्यार की, राम जैसे किरदारों के बोरिंग होने की, एक्यूट ल्यूकीमिया से उबरने के बाद उनके जीवन के बदलने की, राजकुमार हीरानी की फिल्मों के पहले दिन के शो के लिए उतावला रहने की, काइट्स  की, राकेश रोशन के लोकतंत्र की और महेश भट्ट की बातें, जो चाहते हैं कि उनके सब निर्देशक एक ही तरह की फिल्में बनाते रहें. अनुराग की फिल्मों की तरह ही उनकी बातों में भी दुर्लभ बेबाकी है, बेचैनी है, लेकिन एक व्यावहारिक संतुलन भी है. उनकी फिल्मों का अपना कोई एक अलग और स्पष्ट रंग भले ही न हो (और वे ऐसा चाहते भी हैं), लेकिन उनकी फिल्में हिंदी सिनेमा को उम्मीद का एक पक्का रंग देती हैं. हम उस प्यारे रंग को सीधे आपसे बात करने देते हैं.

फिल्म बनाते हुए यह मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगता है कि आप फिल्म की खूबसूरती, उसकी ऐस्थेटिक्स भी बरकरार रखें और वह लोगों को भी अच्छी लग रही हो. फिल्म मनोरंजक हो, समांतर फिल्म न हो. हमारे यहां राजकुमार हीरानी ने ही इस फॉर्मूले को क्रैक किया है. वे ऐसी फिल्में बना रहे हैं, जिनकी आलोचक भी तारीफ करेगा, फिल्मकार भी, दर्शक भी. अपनी फिल्मों से मैं भी वही जगह ढूंढ़ रहा हूं. लेकिन पता नहीं कि मिलेगा क्या! जिस दौर में मैं इंडस्ट्री में आया, यहां लोग किसी विदेशी फिल्म की डीवीडी ही देते थे बनाने को. अगर आपको बनानी है तो कोई और विकल्प ही नहीं है. मेरे पास गैंगस्टर की स्क्रिप्ट थी पहले से और बनाना भी चाहता था, लेकिन गैंगस्टर को कोई निर्माता बना नहीं रहा था क्योंकि वो ओरिजिनल थी. उसे बनाने के लिए मुझे पहले एक नकल बनानी पड़ी, मर्डर. खुद को साबित किया मर्डर में, उसका ठप्पा लग गया, तब मैं अपनी ओरिजिनल फिल्में बना पाया. वह अजीब दौर था. लोग डंके की चोट पर नकल बना रहे थे. मैंने स्क्रीनप्ले लिखकर ‘मर्डर’ को मूल फिल्म से थोड़ा-बहुत अलग किया लेकिन बीज तो प्रेरित ही था.

‘मर्डर’, ‘गैंगस्टर’ के बाद ‘लाइफ इन अ मैट्रो’ लेकर भी मैं भट्ट साहब के पास ही गया था लेकिन वे एक ही तरह की फिल्में बनाना चाहते थे, उनसे हटना नहीं चाहते थे. उन्होंने खुद अलग अलग तरह की फिल्में बनाई हैं, लेकिन वे नहीं चाहते कि उनके निर्देशक अलग अलग तरह की फिल्में बनाएं. इसीलिए मैं ‘मैट्रो’ बाहर ले के गया. मैं उनके ढांचे में नहीं ढला. लेकिन उनसे सीखा बहुत कुछ. कोई भी फिल्म पूरी देखने के बाद जो वो समझते हैं ना फिल्म को, वो उनका एरियल व्यू कमाल का है. अब भी फिल्में बनाने के बाद मैं कई बार उनकी नजर से ही देखना चाहता हूं अपनी फिल्म को, उससे डीटैच होके. ‘काइट्स’ के बाद मीडिया ने जितना कहा, मैं उतना दुखी या असंतुष्ट नहीं था. ऐसी बातें बाहर आईं कि मैंने जैसे अपनी ही फिल्म को डिसऑन कर दिया है. ऐसी बात नहीं है. फिल्म मैंने ही बनाई है. किसी का कोई हस्तक्षेप हुआ है तो इसीलिए ना कि मैंने होने दिया है. जैसी भी बनी, जैसी भी प्रतिक्रियाएं आईं, लेकिन फिल्म तो वह मेरी ही है. मैं बहुत गरमदिमाग और जिद्दी इंसान हूं. मैं इससे नाखुश था कि जिस तरह से शुरू की थी, फिल्म वैसी नहीं रही और प्रमोशन में इतनी बड़ी बन गई.

बहरे-गूंगे की कहानी सुनते ही लगता है कि कोई डार्क फिल्म होगी लेकिन बरफी के साथ ऐसा नहीं है, यह जिंदगी का जश्न मनाने की कहानी है
फिल्म बरफी का एक दृश्यलेकिन ऐसा भी नहीं हुआ कि मेरे दो साल पूरे पानी में चले गए. मैंने बहुत कुछ पाया है उस फिल्म से. दुनिया में पहचान मिली. उससे पहले मुझे बाहर कोई नहीं जानता था. मैट्रो और गैंगस्टर की यहां आलोचकों ने बहुत तारीफ की लेकिन बाहर के अखबारों ने एक लाइन तक नहीं लिखी उनके बारे में. फिल्म रेटिंग की वेबसाइट ‘रोटन टॉमेटो’ में देखिए, अभी भी उसके 82 प्रतिशत वोट हैं. बड़े बड़े आलोचक, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट वगैरा, जिनके आलोचकों के मैं रीव्यू पढ़ता हूं, उन्होंने अच्छा रीव्यू किया. मुझे उम्मीद नहीं थी इसकी, क्योंकि बीच की फिल्म थी वो. ना बॉलीवुड थी, न हॉलीवुड, बीच की खिचड़ी थी वो. ‘काइट्स’ के बाद जानबूझकर चुनिंदा रीव्यू पढ़े मैंने. स्टार कितने दिए हैं, यह पूछकर पढ़ता था. मैंने फिल्म के बारे में खराब चीजें पढ़ी ही नहीं, इसलिए डिप्रेशन नहीं हुआ. नकारात्मकता नहीं आने दी अपने अन्दर. क्योंकि जिस चीज पर आप इतनी मेहनत करते हैं, लोग उसे उड़ा देते हैं तो आप पर, आपके अगले काम पर उसका बहुत बुरा असर पड़ता है. मैं इसलिए नाराज था कि ‘काइट्स’ के बारे में हमने ठीक तरह से लोगों को पहले बताया नहीं. लोग कुछ और सोच कर आए और उन्हें कुछ और मिला. हमें तो पता था कि हम क्या बना रहे हैं. राकेश रोशन से बड़ा ‘मासी’ प्रोड्यूसर इस देश में नहीं है. इसलिए ऐसा नहीं है कि हमें पता नहीं था. लेकिन करते करते, जिस तरह से शुरू हुई थी, वो नहीं रही, पैन इंडिया बड़ी फिल्म बन गई और लोगों को भी वही बताया जाने लगा.

आपने जैसी फिल्म बनाई है, उसे उस तरह से लाने की हिम्मत होनी चाहिए. जो बनाई है, उसी तरह से उसी फिल्म को प्रमोट करने की, लेकिन प्रमोशन के टाइम पे लोग डर जाते हैं – ‘नहीं यार, इसे और तरीके से पेश करते हैं ताकि लोग और देखने आएं.’ और जब आपकी फिल्म महंगी खरीदी बेची जाती है तब आपका मुख्य लक्ष्य पहले 3 दिन के दर्शक होते हैं. तब आप ऐसे प्रोमो बनाते हैं ताकि कुछ भी करके कमाल की ओपनिंग लग जाए. लेकिन मेरा हमेशा यही मानना है कि आप फिल्म के लिए सच्चे रहो. जैसी फिल्म है, वैसा ही ट्रेलर और प्रमोशन होना चाहिए. ‘काइट्स’ का विषय राकेश जी ने मुझे दिया था. कहानी से ही फिल्म तय हो जाती है. निर्देशक का काम है उसे निखारना. मैंने और राकेश जी ने, सबने मिलके स्क्रीनप्ले लिखा. उस कहानी को जितना रोचक बनाया जा सकता था, बनाया. और डायरेक्शन में कोई हस्तक्षेप नहीं था. शूटिंग में ऐसा नहीं था कि राकेश जी पूरे समय पीछे बैठे रहते थे. वह फिल्म बहुत लोकतांत्रिक ढंग से बनी है. इस तरह के लोकतांत्रिक वातावरण में मैंने इससे पहले काम नहीं किया था जहां 3-4 लोग बैठ के फैसले लेते हों. लेकिन यह सब स्क्रिप्ट के लेवल तक ही था.

हां, जिस तरह की आजादी मैंने भट्ट साहब के यहां इंजॉय की थी, कि आप ही लिखें, डायरेक्ट करें, कैसे भी बनाएं, यहां ऐसा नहीं था. यह भी नहीं था कि राकेश जी के यहां काम के ढंग का मुझे पता नहीं था और बनते-बनते पता चला. मुझे पता था कि वहां इस तरीके से ही फिल्म बनेगी, इसलिए मैंने भी उसी तरीके से बनाई. लेकिन उसके बाद मैंने यह भी तय किया कि अगली बार से हमेशा अपने मन से ही काम करूंगा, ऐसे सिस्टम में नहीं करूंगा. फिल्म डेमोक्रेटिक ढंग से नहीं बन सकती, उसमें तानाशाही ही चलती है. एक के दिमाग से ही काम हो पाता है. यह लोकतांत्रिक सेटअप खराब नहीं है. यशराज में, विधु के यहां भी ऐसे ही बनती हैं फिल्में, लेकिन मैं इसमें फिट नहीं बैठता. मुझे लगता है कि मेरे किरदार अपने रिश्तों में, प्रोफेशन में, या जीवन में ठीक से परिभाषित नहीं रहते क्योंकि मैं खुद ही ठीक से परिभाषित नहीं हूं. मेरे आसपास के लोग भी नहीं हैं, हम सब कनफ्यूज्ड हैं. मैं जब बारहवीं में पढ़ रहा था, मुझे पता नहीं था कि बम्बई आऊंगा, ग्रेजुएशन किया तो मुझे पता नहीं था कि डायरेक्टर बनना है. मैं रिलेशनशिप में भी यहां से वहां बहुत पहले से गुलाटी मारता था. वह मेरा व्यक्तित्व दिखता है शायद. सबमें कमियां या ऐब होते हैं, मैं उन्हें छिपाना नहीं चाहता. मैं अपनी फिल्मों में राम की कहानी नहीं दिखाना चाहता. ऐसे किरदार मुझे बोरिंग लगते हैं.

मर्डर से पहले मैं एक एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर से गुजरा था. उसी ने मुझे जोड़ा उस कहानी से. जैसा जीवन आप जी रहे होते हैं, आप वैसी ही कहानियां चुनते हैं अपने आसपास से. इसीलिए अब बरफी बन रही है. उस वक्त मैं कभी बरफी न बनाता. बीमारी के बाद मेरा फोकस बदल गया, पहले प्राथमिकताओं का क्रम था – पैसा, काम, घर, परिवार, प्यार. अब काम अंत में आ गया, पैसा भी. पहले परिवार और घर. हालांकि अब पैसा ज्यादा कमा रहा हूं. पैसे के पीछे भागो तो कभी हाथ में नहीं आता. नहीं भागो तो अपने आप आता है. लेकिन सिर्फ ये प्राथमिकताएं ही बदली हैं. बाकी कुछ नहीं बदला. बाकी तो आज भी कभी कभार सिगरेट पी लेता हूं. नहीं पीनी चाहिए मुझे.

इन दिनों बरफी की कहानी के बारे में इस डर से नहीं बताना चाह रहा कि कहीं मैं सारी कहानी, या अन्दरूनी परतें न बता दूं कहते कहते. उसमें आपस में जुड़े हुए हुक हैं. उस कहानी का आपको पता न हो, तभी देखने का मज़ा आएगा. बहरे गूंगे से डार्क फिल्म लगती है, क्योंकि आमतौर पर ऐसे किरदारों की ऐसी ही फिल्में बनती हैं, लेकिन यह फिल्म जिन्दगी का जश्न मनाने की कहानी है. हमें वे बेचारे लगते हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि वे बेचारे हैं. पहले कुछ छोटी कहानियां लिखी थीं. उनसे इश्क हो गया मुझे. काइट्स के बाद उन्होंने फिल्म का शेप लिया. कहानी से मिलते जुलते किरदारों से मैं मिला हूं. बीमार पड़ने से पहले तक मैं बहुत स्वार्थी था, पैसे के पीछे भागता था. लेकिन बीमारी के बाद कुछ बदलाव आया, कुछ एनजीओज़ से जुड़ा. नज़रिया बदला. मैं न बदलता तो शायद यह कहानी मेरे दिमाग में नहीं आती. मुस्कान नाम का डिसएबिलिटी स्कूल है भिलाई में. वहां गया था. वहीं से मेरा मुख्य किरदार निकला.

मरफी रेडियो का एक विज्ञापन था ना, उसमें जो बच्चा था. फिल्म में मेरे मुख्य किरदार की मां वैसा ही बच्चा चाहती है – मरफी बेबी. जो बच्चा होता है, उसका नाम मरफी रखा जाता है. त्रासदी यह कि उसकी मां रेडियो से शॉक लगने से ही मरती है. मरफी ठीक से बोल नहीं पाता और अपने अस्पष्ट उच्चारण में जब अपना नाम बोलता है तो वह बरफी जैसा सुनता है. धीरे-धीरे सारा शहर उसे बरफी ही कहने लगता है. हम सबमें इतना कपट भर गया है, निस्वार्थ प्यार तो चला ही गया है. भिलाई के उस स्कूल में मैंने देखा कि उनके बीच में वह निस्वार्थ प्यार है. मुट्ठी भर धूप और आसमान के साथ वे जी लेते हैं. इतनी शुद्ध प्रेमकहानी हम करते नहीं. इससे पहले मैंने भी कहां की है? बरफी मेरी पिछली फिल्मों से इतनी अलग है कि काइट्स से बरफी के सैट पर आने के बाद चार पांच दिन मुझे बहुत दिक्कत हुई. समझ ही नहीं आ रहा था कि कैमरा एंगल कैसे लगाऊं मैं.

जिस दिन रणबीर का आखिरी शॉट था और मैंने शॉट से पहले घोषणा की कि यह आखिरी शॉट है तो सारी यूनिट भावुक हो गई थी. ऐसा मैंने इससे पहले कभी किसी फिल्म में नहीं देखा. लोगों की आंखों में आंसू आ गए थे. पता न अहीं ये रणबीर ने किया है या किरदार ने, लेकिन वो पूरी यूनिट का लाड़ला बन गया था. जहां तक प्रियंका की बात है, बरफी की शुरुआत में ही आप भूल जाएंगे कि यह लड़की प्रियंका चोपड़ा है. यह करना बहुत बड़ी बात है. इलियाना शुरू में डर रही थी कि दो बड़े सितारों के साथ लान्च होके वो छिप न जाए. लेकिन धीरे-धीरे उसका डर चला गया. मेरे सेट पर थियेटर जैसा माहौल होता है. कोई बड़े छोटे का क्रम नहीं है. हम तो मेकअप वैन्स पर भी अभिनेताओं का नाम नहीं लिखते. रणबीर कपूर का नाम नहीं, किरदार का नाम लिखते हैं. बाहर आप कोई भी हों लेकिन जब आप सेट पर आएंगे तो सबके बराबर ही होंगे.

 

‘फासीवादी विचारों से टकरा कर ही अच्छा लेखन संभव हो पाता है’

आलोचना के शिखर पुरुष कहे जाने वाले नामवर सिंह सात दशक से भी ज्यादा समय से साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं. ‘कविता के नए प्रतिमान’ ,‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘कहानी- नई कहानी’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘छायावाद’ ‘इतिहास और आलोचना’ और ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ उनकी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं. ‘कविता के नए प्रतिमान’ और ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का पाठ हिंदी साहित्य के छात्र अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ की तरह करते हैं. ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए उन्हें 1971 में साहित्य अकादेमी सम्मान मिला था. वे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में भारतीय भाषा विभाग के संस्थापक अध्यक्ष हुए और वहां कई दशकों तक अध्यापन का कार्य भी किया. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त है. वे राजकमल प्रकाशन समूह से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘आलोचना’ का लंबे समय से संपादन कर रहे हैं. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से उन्होंने कलम नहीं चलाई है. लेकिन उनके कहे का भी वजन इतना है कि मौखिक साहित्य की परंपरा को भी उन्होंने समृद्ध करने में कोई कोर कसर नहीं रखी है. हालांकि वे मौखिक साहित्य को साहित्य नहीं मानते. 28 जुलाई को नामवर सिंह ने 86 साल पूरे किए. उनसे स्वतंत्र मिश्र की बातचीत.

आप आलोचना के शिखर पुरुष हैं. क्या उम्र के इस पड़ाव में आपको लगता है कि कुछ करना रह गया? 

देखिए, आकांक्षाओं पर कोई लगाम नहीं लगा सकता, लेकिन उम्र के इस पड़ाव में आकर पढ़ने-लिखने की क्षमता में कमी आ जाती है. एक अरसे से लिखना छूट गया है. अब बोलना ज्यादा होता है जिसे हम मौखिक साहित्य कहते हैं. लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर इसे साहित्य नहीं मानता. मेरे श्रद्धेय रामविलास शर्मा ने प्रतिज्ञा की थी कि वे सभा, गोष्ठियों में नहीं जाएंगे. उन्होंने इसे जीवन के अंतिम दिनों तक निभाया भी. वे आसन मार कर लिखते रहे. बाद के दिनों में वे लिख नहीं पाते थे. वे तैयारी करके रखते और कोई जाता और उनके कहे को कागज पर उतार लेता. मैं उन दिनों जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में था. मैंने उनके लिए यह व्यवस्था की थी. बाद की बहुत सारी किताबें उन्होंने बोलकर ही लिखवाई है. मैं ऐसा नहीं कर पाया. मुझे इसका अभ्यास भी नहीं है. मैं दिनभर पढ़ने-पढ़ाने, मिलने-मिलाने और सभा-गोष्ठियों में व्यस्त रहता और फिर रात को खाना खाकर दस बजे रात से लेकर सुबह के चार-पांच बजे तक रोज लिखने का काम करता. मैंने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ सात या आठ दिन में लिखी थी. ‘कविता के नए प्रतिमान’ मैंने एक महीने में पूरी की थी. पिछले 11-12 साल से दिन भर की व्यस्तताओं के बाद अब रात को सिर्फ पढ़ने का काम हो पाता है. 

पिछले दिनों आप पर  ‘जेएनयू में नामवर’ किताब आई. हाल ही में राजकमल से भी चार किताबें प्रकाशित हुई हैं. सामयिक प्रकाशन से भी प्रेम भारद्वाज के संपादन में आप पर एक किताब आई है. आप इसे कैसे देखते हैं?

सच पूछिए तो मुझे आशीष त्रिपाठी की किताबों के प्रकाशन से खुशी मिली है. आशीष बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं. अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में मेरे छपे लेखों को वे संकलित करने का काम कर रहे हैं. मेरी आठ पुस्तकें राजकमल से छप चुकी हैं जबकि चार पुस्तकें अभी प्रकाशित होनी हैं. आशीष की इस योजना के अंतगर्त दो साल के भीतर कुल बारह खंडों में इसे समेटने की योजना है. इससे लोगों को यह पता चलेगा कि मैंने बोलने से ज्यादा लिखने का काम किया है. ये साहित्य से संबंधित मेरे अलग-अलग विषयों पर लिखे गए लेख हैं. बहुत सारे लोग अपने भाषण तक का रिकॉर्ड भी रखते हैं. यह कला मुझे नहीं आती और मुझे यह थोड़ा अहंवादी भी लगता है. अज्ञेय जी शुरू से ही अपने साथ एक छोटा-सा टेप रिकॉर्डर लेकर चलते थे. इसलिए अज्ञेय जी का बोला हुआ कुछ भी लुप्त नहीं हुआ है. मैंने ऐसा कभी नहीं किया. मुझे लगता है कि ऐसा करने से आदमी आत्मचेतस हो जाता है. मुक्त होकर बोलने का अपना मजा है. 

राजेंद्र यादव ने बहुत लंबे अरसे से कहानी लिखनी बंद कर दी है. वे कहते हैं कि मुझे बड़े दायरे तक अपनी बात पहुंचानी है इसलिए मैंने वैचारिक लेखन का सहारा लेना शुरू कर दिया है. आप क्या सोचते हैं?

वे ठीक कर रहे हैं. यह समझदारी का सूचक है. उन्हें लगा कि मैं अब कहानी या उपन्यास नहीं लिख सकता हूं तब उन्होंने छोड़ दिया. वे जिस स्तर का लेखन चाह रहे होंगे नहीं लिख पा रहे होंगे. और ‘हंस’ के संपादक के तौर पर लिखना तो हो ही रहा था. सच है कि उन्होंने ‘हंस’ में अपनी लेखनी के बूते कई जरूरी बहसों को भी जन्म दिया है. उनका लेखन महत्वपूर्ण है. उन्होंने इन लेखों का संकलन भी तैयार करवाया है. 

लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या कहानी या उपन्यास की तुलना में वैचारिक लेखन की पहुंच ज्यादा लोगों तक होती है? 

वैचारिक लेखन अपने विचार के प्रचार के लिए होता है, जबकि रचनात्मक साहित्यिक लेखन आस्वाद के लिए. दोनों के कार्य अलग-अलग होते हैं. इस समय राजेंद्र यादव का वैचारिक लेखन ज्यादा लोगों तक पहुंच रहा है लेकिन एक समय था जब उनकी कहानियां बड़े दायरे तक पहुंच रही थीं. तात्कालिक समस्याओं पर उन्होंने खुलकर बहुत जोरदार ढंग से लिखा है. उनके वैचारिक लेखन को लोग नहीं भूल पाएंगे. 

पिछले दिनों आपने  ‘तद्भव’  पत्रिका के कार्यक्रम में साहित्य को सत्ता की कांता यानी जोरू कहा था. क्या आपको लगता है कि साहित्य सत्ता की जकड़ से बाहर हो पाया है? 

मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा है कि मैंने ऐसा कुछ कहा है. साहित्य सत्ता को चुनौती देने का काम करता है. लेकिन सत्ता लोकतांत्रिक है और यदि वह कोई काम लोक हित में करती हो तब उसकी आलोचना करने का कोई मतलब नहीं. लेकिन यदि कोई फासीवादी सरकार सत्ता में आती है तो वह मुक्त विचारों पर प्रतिबंध लगाती है. ऐसी स्थिति में सत्ता से टकरा कर ही अच्छा लेखन हो सकता है.

पिछले दिनों आपके भाई काशीनाथ सिंह को ‘रेहन पर रघ्घू’  के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया. उन्होंने  ‘तहलका’ को दिए इंटरव्यू में कहा था कि अगर उन्हें ‘काशी का अस्सी’  किताब के लिए पुरस्कृत किया गया होता तो ज्यादा खुशी मिलती. उन्होंने यह भी कहा था कि साहित्य अकादेमी ने ज्यादातर मौकों पर लेखकों को उनकी श्रेष्ठ रचना को पुरस्कृत करने के बजाय उनकी दूसरी कृति को सम्मानित किया है.

काशी की ‘काशी का अस्सी’ मुझे भी प्रिय है. काशी ने बिल्कुल ठीक कहा है. साहित्य अकादेमी की पुरस्कार देने की प्रक्रिया में ही खामियां हैं. पंत जी को उनकी बड़ी कमजोर किताब के लिए पुरस्कृत किया गया. उन्हें बहुत देर से पुरस्कार दिया गया. यशपाल और रेणु के साथ भी अकादेमी ने यही किया. रेणु को सर्वश्रेष्ठ कृति ‘मैला आंचल’ के लिए पुरस्कार नहीं दिया गया. जैनेंद्र जी को उनकी सबसे कमजोर किताब के लिए पुरस्कृत किया गया. उन्हें बहुत देर से पुरस्कृत किया गया. उदय प्रकाश के साथ भी ऐसा ही हुआ है. साहित्य अकादेमी ही नहीं बल्कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भी लोगों को अच्छी किताबों के लिए नहीं दिया गया है. कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ बहुत देर से मिला. निर्मल वर्मा को ज्ञानपीठ उनकी बहुत कमजोर किताब के लिए मिला है. पुरस्कार देने की प्रक्रिया में ही समस्या है जिसकी वजह से ऐसा होता आया है.उसकी राजनीति ही अलग है. इसलिए पुरस्कार किसी कृति या कृतिकार के श्रेष्ठ होने का मानदंड नहीं है. कई लेखकों के साथ ऐसा हुआ है. इसलिए काशी के साथ भी ऐसा हुआ है तो उससे काशी का लेखन छोटा नहीं होगा बल्कि पुरस्कार देने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठेगा. 

पत्रिका  ‘फॉरवर्ड प्रेस’  में प्रेम कुमार मणि ने लिखा है कि गोदान में प्रेमचंद का गांव दूर से दिखता है जबकि रेणु का गांव भोगा हुआ गांव है. वे रेणु को बड़ा करने के लिए प्रेमचंद को छोटा बता रहे हैं. आपकी टिप्पणी चाहूंगा.

पहली बात यह कि रेणु और प्रेमचंद की तुलना नहीं होनी चाहिए. तुलना समसामयिक लेखकों की ही होनी चाहिए. रेणु की तुलना उनके युग के लेखकों से की जानी चाहिए. प्रेमचंद से रेणु की तुलना कैसे हो सकती है. प्रेमचंद का ऐतिहासिक महत्व है. प्रेमचंद की तुलना में रेणु ने बहुत कम लिखा है. प्रेमचंद ने तीन सौ से ज्यादा कहानियां लिखी हैं. उनसे कई गुना बड़े उपन्यास लिखे हैं. प्रेमचंद के कथा-साहित्य की दुनिया बहुत बड़ी है. महत्वपूर्ण बात तो यह है कि उन्होंने स्वाधीनता संघर्ष के दौर में अपना लेखन किया. इसलिए उनकी जगह कोई नहीं ले सकता है. अलग-अलग दौर में बहुत बड़े साहित्यकार हो सकते हैं लेकिन वे प्रेमचंद नहीं हो सकते. 

दलित साहित्य और स्त्री लेखन के बारे में आप क्या सोचते हैं? 

दलित लेखन बड़ी मात्रा में हो रहा है, यह बहुत अच्छी बात है. लेकिन स्त्रियों के मुकाबले दलित लेखन कम हो रहा है. गुणवत्ता के दृष्टिकोण से अगर देखें तो दलित लेखन के मुकाबले स्त्रियों का लेखन ज्यादा मजबूत भी है. दलित लेखन में कुछ ही लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं. दलित विमर्श की तुलना में स्त्री विमर्श पर केंद्रित पत्रिकाएं कम हैं. लेकिन स्त्री विमर्श पर पुस्तकों की संख्या ज्यादा है. संख्या की दृष्टि से नहीं गुणवत्ता के आधार पर साहित्य को देखने की दरकार है. पश्चिमी देशों में वुमेन स्टडीज (स्त्रियों द्वारा रचे गए साहित्य का अध्ययन) और ब्लैक स्टडीज (अश्वेत समुदाय द्वारा रचे गए साहित्य का अध्ययन) के नतीजों को अनुपात और गुणवत्ता के आधार पर देखा जाए तो बहुत अच्छा ब्लैक लिटरेचर लिखा गया है. ब्लैक लिटरेचर अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप सभी जगह लिखा जा रहा है. उस लिहाज से हमारे यहां दलित साहित्य कम है. ब्लैक लिटरेचर 19वीं शताब्दी से ही मिलना शुरू हो जाता है. हमारे यहां बाबा साहब आंबेडकर के बाद दलित लेखन की शुरुआत हुई. शायद देर से शुरू होने की वजह से दलित लेखन का स्तर गुणवत्ता के लिहाज से कमजोर है. 

साहित्य में नई पौध के बारे में क्या सोचते हैं?

देखिए, नए लोग हम लोगों से बेहतर स्थिति में हैं और बहुत ही अच्छा लिख रहे हैं. कविता और कहानियां अच्छी आ रही हैं. आम तौर पर उपन्यास उतने अच्छे नहीं आ रहे हैं. आलोचनात्मक लेखन का स्तर बहुत बढ़िया है. अब बहुत सारी पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगी हैं और हर पत्रिका में युवा कहानीकार और युवा कवि छप रहे हैं. कुछ समय पहले ‘कथादेश’ का कहानी विशेषांक आया था. उसमें युवाओं की बहुत अच्छी कहानियां पढ़ने को मिलीं. दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आता है जिसमें मुझे नई किताबों पर बात करनी होती है. पिछले चार साल से यह कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है. इस कार्यक्रम को करने के दौरान मुझे अंदाजा हुआ कि अच्छी कविता, कहानियां और आलोचना की गंभीर पुस्तकें लिखी जा रही हैं.

पूरी रात यही कशमकश थी कि जाऊं या फिर इस नई पहचान से हार मान लूं’

 

मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे से ताल्लुक रखती हूं. वहां जिंदगी के गुजारे कई सालों में मैंने हमेशा यह अनुभव किया कि इंसानियत सभी धर्मों से बड़ी होती है. हमारे यहां आपसी रिश्तों की जगह भगवान या अल्लाह से पहले थी. लेकिन मेरी इंसानियत से परे एक दूसरी पहचान भी है यह मुझे दिल्ली में हुए बटला हाउस एनकाउंटर के बाद महसूस हुआ. वह थी मेरी धार्मिक पहचान. तब तक मैं भी दिल्ली आ चुकी थी और इस जगह के पास ही रहती थी. अब हर रोज घर से  बाहर जाते हुए यह पहचान भी मेरे साथ चलती थी जिसे ढोने की अब आदत-सी पड़ती जा रही थी. मैं अपने गैरमुस्लिम दोस्तो के बीच रोज अपनी पहचान को खड़ा करने की जद्दोजहद करती. उनसे किसी भी ऐसी बहस करने से खुद को रोज बचाने की नाकाम कोशिश करती जो मेरी नई पहचान से जुड़ी थी.

 उन दिनों कहीं न कहीं मेरे मन में यह बात घर करने लगी थी कि अगर इसी तरह का माहौल रहा तो फिजा बद से बदतर होती जाएगी ओर अन्य धर्मों के लोग मुसलमानों से सच में नफरत करने लगेंगे. शायद इसके कुछ बीज पड़ने भी लगे थे जब मेरी एक सहपाठी ने मुंह बनाकर कहा था कि मुसलमान तो लड़ने ओर खाने में ही आगे होते हैं बस. लेकिन कहते हैं न कि हालात आपकी सोच पर कितना भी असर क्यों न डालें, कभी-कभी आपके साथ कुछ ऐसा भी हो जाता है जो फिर से आपकी सकारात्मक सोच को और पुख्ता बना देता है. मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. इसके बाद मैं दोबारा यह सोचने लगी कि इंसानी रिश्तों की बुनियाद धर्म से कहीं ज्यादा मजबूत होती है. शायद मेरे लिए इस बात को अब कभी भी भुला पाना संभव नहीं होगा.

बात दो साल पहले की है. मुझे अपने कुछ साथियों के साथ एक विश्वास बहाली संवाद प्रकिया (इंटर फेथ डायलॉग) में हिस्सा लेने के लिए मथुरा जाने का निमंत्रण मिला. हमें दिल्ली से मथुरा के लिए अगली सुबह निकलना था, अगले ही दिन बाबरी मस्जिद पर भी फैसला आना था इसलिए वह रात मेरे लिए अहम थी. देश के बहुत सारे राजनेताओं, मौलवियों और धर्म गुरुओं के लिए भी वह रात अहम थी जो कई सालों से लोगों की भावनाओं से सियासी रोटियां सेंक रहे थे. हर आम इंसान की तरह मेरे परिवार वाले भी चिन्तित थे. उन के मन में एक अजीब-सा डर भी था. उन्हें लग रहा था कि मथुरा तो हिंदू बहुल इलाका है और इसलिए मेरा वहां जाना ठीक नहीं है. उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि मैं इस सेमिनार में ना जाऊं क्योंकि अपने ग्रुप में मैं अकेली मुसलिम छात्रा थी. मैंने उन्हें काफी समझाया मगर परिवार वालों की मुखालफत पुरजोर तरीके से जारी रही. 

‘मुझे लग रहा था कि अगर मैं इस आयोजन में न आती तो मेरे मन की गलतफहमियां शायद ही कभी दूर हो पातीं’

उस दिन मुझे रह-रह कर यही अफसोस हुआ कि आखिर कब तक धर्म की यह राजनीति चलेगी. पहली बार उन टेलीविजन चैनलों पर भी बहुत गुस्सा आया जो मेरी मां की परेशानी को अपने नाटकीय अन्दाज में और बढ़ाने पर तुले हुऐ थे. इस अंदाज में कि दंगा न भी होता तो पक्का करवा देते. पूरी रात मैं इसी कशमकश में रही कि जाऊं या फिर इस नई पहचान से हार मान लूं. सुबह होते-होते मैं अपनी नई पहचान से जीत चुकी थी. मैं अपने मन के फैसले पर अडिग रही और घरवालों को बिना इत्तिला दिए कृष्ण की नगरी मथुरा पहुंच गई.

मथुरा पहुंचने पर हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया. हमारे ठहरने का इंतजाम एक स्थानीय आश्रम में किया गया था. यह जगह मेरी कल्पनाओं से बिल्कुल अलग थी. यहां बहुत सारे मंदिरों की घंटियां समवेत होकर मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही थीं जो बहुत सुकून दे रही थी. हम लोग मथुरा में पांच दिन रहे. आश्रम के गुरु से लेकर आम सेवक तक ने हमें बहुत आदर व सम्मान दिया. मैं भी और साथियों के साथ बैठकर प्रवचन सुनती थी. मैंने एक दिन भी यह महसूस नहीं किया कि मेरी पहचान वहां मौजूद लोगों से अलग है.

फिर एक दिन मैंने हिम्मत जुटा कर आश्रम के गुरू जी, जिनका नाम मुझे याद नहीं आ रहा, से अयोध्या फैसले पर बात की. मैंने उनसे पूछा कि क्या वजह है जो साथ-साथ रहने वाले हिंदू-मुसलमान इतने दूर होते जा रहे हैं. उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रख कर सिर्फ इतना कहा कि मंदिर-मस्जिद को लेकर होने वाली सियासत से वह अब ऊब चुके हैं. उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि मंदिर-मस्जिद से ज्यादा उनके लिए मानवता अहमियत रखती है.  

मथुरा से वापस दिल्ली लौटते समय इंटर फेथफुल डायलॉग में जाने के फैसले को लेकर मेरे मन में एक आत्मसंतुष्टि का भाव था. मुझे लग रहा था कि अगर मैं वहां नहीं जाती तो मेरे मन में जो गलतफहमियां घर करने लगी थीं वह शायद ही कभी दूर हो पातीं. मानवीयता के इस रूप के दर्शन से भी मैं वंचित रह जाती. थोड़े-से भटकाव के शिकार लोगों की सोच को मैं आम लोगों की सोच मानती रहती और मानवता पर शर्मसार होती रहती.  आखिर धर्म के नाम पर आम आदमी को लड़वाकर उससे सियासी फायदा लेने का यह खेल कब रुकेगा?

 

सरकार को गरियाने वाले अपना काम तो ठीक से करें

दुनिया में कोई भी ऐसा लोकतंत्र नहीं है जहां की सरकार को लेकर वहां के मीडिया और विपक्ष टिप्पणी नहीं करते. यह लोकतंत्र का एक स्वाभाविक लक्षण है. लेकिन यह भी सच है कि किसी पर टिप्पणी करना बहुत आसान होता है और हकीकत को सही संदर्भों में देखना बहुत मुश्किल. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यह दूसरी सरकार बेहद नाकाम है. अगर सचमुच ऐसा है तो विपक्ष की कामयाबी क्यों नहीं दिख रही है. उन्हें कई बार सरकार को घेरने के मौके मिले लेकिन किसी भी मौके पर वे कामयाब नहीं हुए. इसलिए उनके पास यह नैतिक अधिकार नहीं है कि वे मनमोहन सिंह की सरकार पर तरह-तरह के आरोप लगाएं.

2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) बनवाने को लेकर विपक्ष ने संसद को तकरीबन एक साल तक ठप किए रखा. अब जेपीसी की जांच के बारे में जो खबरें आ रही हैं उनके आधार पर क्या यह कहा जा सकता है कि कसूरवार की पहचान की जा सकेगी? हमने पहले भी कहा था कि इस मामले पर भारत के महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक (सीएजी) की रिपोर्ट को पीएसी में भेजना ही पड़ेगा. इस समिति की अध्यक्षता भाजपा के ही वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी कर रहे हैं. लेकिन वे नहीं माने. अब तक सबूत के साथ कोई आरोप ठोस तौर पर किसी के खिलाफ तय नहीं हो पा रहा है. अन्य कई मामले हैं जिनमें विपक्ष जमकर हो-हल्ला करता है लेकिन जब उनसे यह पूछा जाता है कि रास्ता बताइए तो वे इधर-उधर झांकने लगते हैं. राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर भी विपक्ष ने बड़े आरोप लगाए थे. लेकिन अब जब जांच चल रही है तो सरकार के अलावा कोई भी उसमें दिलचस्पी लेकर दूध का दूध और पानी का पानी करवाने की कोशिश नहीं कर रहा. ऐसे में विपक्ष से मुझे निराशा होती है. वे एक घोटाले का मुद्दा उठाते हैं और उसमें जांच का आदेश होते ही अगले घोटाले के इंतजार में पुराने को भूल जाते हैं. कायदे से होना यह चाहिए कि जब किसी घोटाले की जांच चल रही हो तो विपक्ष के पास जितने सबूत हैं वे पेश करें. अगर जांच सही ढंग से आगे नहीं बढ़ती तो इसके लिए सरकार जितनी कसूरवार है उससे कम विपक्ष भी नहीं है.

अभी जिन घोटालों की बात हो रही है अगर वे सही में घोटाले हैं तो उनकी जड़ तो संप्रग-1 में है. जहां तक मेरी जानकारी है उसके मुताबिक संप्रग-2 के कार्यकाल में कुछ ऐसा नहीं हुआ है जिसे घोटाला कहा जा सके. अब लोग कहते हैं कि संप्रग-1 के कार्यकाल में सब अच्छा था और संप्रग-2 में सब खराब है. जबकि सच्चाई यह है कि संप्रग-2 की सारी दिक्कतें संप्रग-1 से होकर ही आई हैं. जो भी लोग आरोप लगाते हैं, उन्हें बेसिरपैर की बात करने के बजाय वे ठोस मुद्दे उठाने चाहिए जिनमें दम हो. विपक्ष इस बात को बड़ा भारी मुद्दा बना देती है कि टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री को ‘अंडरअचीवर’ बता दिया इसलिए वे ऐसे ही हैं. वे इस बात पर दिमाग ही नहीं लगाते कि किसी पत्रिका के कह देने से कोई कामयाब या नाकामयाब नहीं होता. अगर टाइम की बात अंतिम सच्चाई है तो फिर उसने 2002 में तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में काफी बुरा-भला लिखा था. इस पर भाजपा की बोलती बंद हो जाती है. विपक्ष सिर्फ हंगामा करना चाहता है. उसे लगता है कि हंगामा करने से कांग्रेस की यह दीवार गिर जाएगी. लेकिन ऐसा होने वाला नहीं है. भाजपा एक धक्का लगाकर मस्जिद तो तोड़ सकती है लेकिन कांग्रेस को नहीं तोड़ सकती.

विपक्ष एक घोटाले का मुद्दा उठाता है और उसमें जांच का आदेश होते ही अगले घोटाले के इंतजार में पुराने को भूल जाता है

अगर देश में एक मजबूत विपक्ष होता तो उनके पास अपनी ताकत दिखाने का सबसे अच्छा मौका राष्ट्रपति चुनाव था. इस चुनाव के बारे में सबको बहुत पहले से पता था. अगर विपक्ष एकजुट होकर हमारे उम्मीदवार को हरा देता तो हम बहुत ही दिक्कत में पड़ते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं करके अपनी कमजोरी को खुद ही सार्वजनिक कर दिया. विपक्ष की ओर से जिन अब्दुल कलाम का नाम आगे किया जा रहा था उनसे पूछा भी नहीं गया था कि आप चुनाव में खड़ा होना चाहते हैं या नहीं. सरकार को गाली देने वाला राजनीतिक वर्ग खुद तो सही प्रतिपक्ष बनना नहीं चाहता लेकिन सरकार पर दिन-रात नए-नए आरोप लगाता रहता है. विपक्ष की नाकामी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे खुद को देश की जनता के सामने विकल्प के तौर पर पेश करने में कामयाब नहीं हो रहे. भाजपा में तो इस बात पर आपसी सहमति नहीं है कि कौन उनका नेतृत्व करेगा. ऐसे में मुझे यह नहीं लगता कि प्रतिपक्ष से इस सरकार को किसी तरह का कोई खतरा है. 

सरकार पर जो भी लोग आरोप लगा रहे हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता होती है तो उस वक्त किसी भी सरकार के लिए काम करना मुश्किल होता है. जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल नहीं था तो इन्हीं मनमोहन सिंह की सरकार ने बढ़िया विकास दर बनाए रखी थी. मनमोहन सिंह ने हमेशा यह साबित किया है कि वे बतौर वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री देश को अच्छे ढंग से चला सकते हैं. मैं ऐसा इसलिए भी मानता हूं कि भाजपा के बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी ने  2009 के आम चुनाव में कोशिश की थी कि झगड़ा मनमोहन सिंह बनाम आडवाणी बन जाए. लेकिन नतीजा क्या हुआ? मनमोहन सिंह को जनादेश मिला और आडवाणी को देश की जनता ने नकार दिया. मुझे लगता है कि इस सरकार के कार्यकाल में जो दो साल का वक्त बचा हुआ है उसमें मनमोहन सिंह वैसे कदम उठाएंगे जिससे इस सरकार की छवि और अच्छी हो. मैं ऐसा इसलिए भी मानता हूं कि दो साल पहले कोई यह नहीं कह सकता था कि इस सरकार को लेकर इतने तरह के सवाल उठाए जाएंगे. राजनीति में दो साल बहुत लंबा वक्त होता है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैरल्ड विल्सन कहते थे कि राजनीति में एक हफ्ता भी बहुत लंबा समय है. मुझे भरोसा है कि जो कमियां अभी दिख रही हैं उन्हें अगले दो साल में दूर कर लिया जाएगा.

आज अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर सरकार पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं. लेकिन अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को दूर करने के लिए दो साल का वक्त बहुत होता है. मनमोहन सिंह के बारे में ही यह कहा जाता है कि यह उन्हीं का बनाया हुआ आर्थिक कार्यक्रम है जिस पर चलते हुए देश ने नौ फीसदी तक की विकास दर हासिल की. इसलिए भरोसे के साथ यह कहा जा सकता है कि अभी जो स्थिति थोड़ी गड़बड़ हुई है उसे वे वापस अच्छे स्तर पर ले जा सकते हैं. माइकल औशियन नाम के एक अमेरिकी पत्रकार हैं. उन्होंने अपने एक हालिया लेख में जानकारी दी है कि औपचारिक तौर पर चीन ने यह स्वीकार किया है कि इस साल उसके आर्थिक विकास की दर मात्र 7.5 फीसदी होगी. इसका मतलब यह हुआ कि चीन और भारत की विकास दर में अब कोई फर्क नहीं रहा. इस बात को कोई नकार नहीं सकता है कि दुनिया में जो अभी की आर्थिक स्थिति है वह किसी के लिए भी अच्छी नहीं है. भारत भी इसका अपवाद नहीं है. लेकिन मनमोहन सिंह ने कभी नहीं कहा कि आज की हमारी हालत दुनिया की वजह से ही है. वे अपने हिसाब से स्थिति सुधारने का काम कर रहे हैं. जहां तक आर्थिक वृद्धि को गति देने का मामला है तो इस बारे में मनमोहन सिंह से अधिक जानकार व्यक्ति देश में कोई नहीं है. उन्होंने पहले भी ऐसा किया है और इसे एक बार फिर से साबित करेंगे. 

महंगाई को लेकर इस सरकार की काफी आलोचना हो रही है. हमें यह समझना होगा कि हर साल का कुछ समय ऐसा होता है जब खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं और कुछ समय ऐसा होता है जब इनकी कीमतों में कमी आती है. कई बार सरकार को वैसी नीतियां अपनानी पड़ती हैं जिससे महंगाई तो घटती है लेकिन इसका बुरा असर औद्योगिक मोर्चे पर होता है. भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दर ऊंचे रखे तो इसका अच्छा असर तो यह हुआ कि कीमतें नहीं बढ़ीं लेकिन औद्योगिक विकास पर इसका बुरा असर इस तरह से पड़ा कि उद्योगपति कर्ज नहीं ले पाए. इन बातों को देखते हुए कई बार सरकार महंगाई को कम करने वाले कदम नहीं उठा पाती. ऐसा नहीं है कि सरकार को नहीं पता है कि महंगाई कम करने के लिए क्या कदम उठाने होंगे. लेकिन सरकार को यह भी पता है कि उन कदमों का दूसरे क्षेत्रों पर क्या असर पड़ेगा. मनमोहन सिंह इन दोनों के बीच संतुलन साधते हुए चल रहे हैं. महंगाई एक समस्या है और इसको लेकर सरकार की संवेदनशीलता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि तकरीबन हर संसद सत्र में इस पर चर्चा की जाती है. विपक्ष के लोग जब महंगाई को लेकर हो-हल्ला मचाते हैं तो मुझे सबसे अधिक अफसोस इस बात का होता है कि इसे रोकने के लिए एक भी रचनात्मक सुझाव अब तक न तो लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने दिया है और न ही राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने. जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो उस वक्त भी महंगाई दर काफी ऊंची थी. अगर विपक्ष में इतने ही जानकार लोग हैं तो उस वक्त उन लोगों ने महंगाई को काबू में करने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया था. यह समझने वाली बात है कि एक विकासशील देश में थोड़ी-बहुत महंगाई की जरूरत होती है लेकिन ज्यादा महंगाई की स्थिति पैदा होने से रोकना भी उतना ही जरूरी है. मनमोहन सिंह इस बात को समझते हैं और इसलिए वे इन दोनों बातों में संतुलन साधते हुए चल रहे हैं.

आज सरकार पर यह आरोप भी लग रहा है कि नीतियों के स्तर पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही है. मेरी राय इस मामले में थोड़ी अलग है. जिन नीतियों को आगे बढ़ाने की बात विपक्ष कर रहा है, उनमें ज्यादातर तो मध्य वर्ग की जेबें भरने वाली हैं. गरीबों की बात कोई नहीं कर रहा है. मेरा मानना है कि सबसे ज्यादा अगर किसी नीति को लेकर गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही तो वह है पंचायती राज. लेकिन इसकी बात कोई नहीं कर रहा है. हर कोई उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने की बात कर रहा है जिससे पूंजीपतियों का भला हो. आज विपक्ष के लोग इस बात को लेकर सरकार पर निशाना साध रहे हैं कि खुदरा में विदेशी निवेश को लेकर सरकार ने सही रवैया नहीं अपनाया. लेकिन वे इस बात को भूल जाते हैं कि जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने क्या किया. खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का पक्ष लेने और विरोध करने वालों के पास अपने-अपने तर्क हैं. किसी भी पक्ष के तर्कों को सिरे से खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है. लेकिन इस मामले में एक रास्ता यह हो सकता है कि केंद्र सरकार यह तय करे कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश आए और राज्य सरकारें यह तय करें कि वे ऐसे स्टोर अपने राज्य में चाहती हैं या नहीं. मेरे मन में भी खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर कुछ शंका है. खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का पक्ष लेने वाले यह तर्क देते हैं कि वे कोल्ड स्टोरेज बनाएंगे. मेरे समझ में यह नहीं आता कि कोल्ड स्टोरेज भारत सरकार क्यों नहीं बना सकती. सरकार ऐसे गोदाम बनाए और इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी पंचायतों को दी जाए. 

दो साल में मनमोहन सिंह कोई ऐसा चमत्कार करेंगे कि भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सुधरेंगे और तीस्ता का विवाद भी सुलझ जाएगा

इस सरकार पर विपक्ष के लोग यह आरोप भी लगाते हैं कि विदेश नीति के मामले में यह बहुत अधिक अमेरिकापरस्त हो गई है. आरोप यह भी है कि अमेरिका के चक्कर में हमने ईरान को भी नाराज कर दिया है. लेकिन वास्तविकता यह है कि अब भी हम सबसे ज्यादा तेल ईरान से ही खरीदते हैं. हां, पहले की तुलना में थोड़ी कमी आई है. अमेरिका तो चाहता है कि हम ईरान से तेल खरीदना बंद कर दें लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार ने तो ऐसा नहीं किया. ईरान को तेल का भुगतान करने को लेकर जब अमेरिका ने प्रतिबंध का रास्ता अपनाया तो हमने अपने रास्ते निकाले. भारत की कंपनियां वहां जाकर कारोबार कर रही हैं और हम ईरान को तेल का भुगतान अब रुपये में भी कर रहे हैं. अमेरिका चाह रहा था कि भारत की फौज अफगानिस्तान जाए लेकिन भारत सरकार ने इसे नहीं स्वीकारा. अमेरिका हमारे जवानों को ईराक भेजना चाह रहा था लेकिन हमने यह भी नहीं माना. लीबिया को लेकर भी अमेरिका के उलट हमारा रुख रहा. अमेरिका ने पूरी कोशिश कि चीन के खिलाफ उनका जो अभियान है उसमें भारत उनका साथ दे. लेकिन भारत सरकार ने अमेरिका को यह साफ-साफ बता दिया कि हम चीन से दोस्ती चाहते हैं न कि दुश्मनी. यह सच है कि अभी रुस के साथ उतना करीब का रिश्ता भारत का नहीं है जितना सोवियत संघ के जमाने में था लेकिन अब भी हम उनके करीब हैं और यह रिश्ता आगे बढ़ रहा है. कभी-कभार मेरे मन में भी यह शंका पैदा होती है कि कहीं भारत अमेरिकापरस्त तो नहीं होता जा रहा लेकिन मैं जब इन उदाहरणों को देखता हूं तो मुझे यह जवाब मिलता है कि ऐसा नहीं हुआ है. मनमोहन सिंह सरकार की विदेश नीति की सबसे अच्छी बात यह है कि पाकिस्तान के साथ दोस्ती के लिए जिस तरह के कदम इस सरकार ने उठाए उतने कदम शायद किसी सरकार ने नहीं उठाए. राजीव गांधी ने कई कदम इस दिशा में उठाए थे और बेनजीर भुट्टो के साथ वे इस दिशा में बढ़ भी रहे थे लेकिन वीपी सिंह की सरकार सत्ता में आ गई और यह काम पूरा नहीं हो पाया. मुझे ऐसा लगता है कि अगले दो साल में मनमोहन सिंह कोई ऐसा चमत्कार करेंगे कि भारत-पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे हो जाएंगे और बांग्लादेश के साथ तीस्ता का विवाद भी सुलझ जाएगा. 

मनमोहन सिंह की इस सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप कुछ लोग लगाते हैं. लेकिन ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि सीबीआई तब भी थी जब वीपी सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी समेत अन्य गैरकांग्रेसी सरकारें केंद्र की सत्ता पर काबिज थीं. अगर सीबीआई एक ऐसी घटिया एजेंसी है जिसका राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है तो गैरकांग्रेसी सरकारों ने इसे ठीक क्यों नहीं किया? किसी गैरकांग्रेसी सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे सीबीआई के कामकाज में या संचालन में कोई बड़ा बदलाव हुआ हो. यह कहना बड़ा आसान है कि केंद्र सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करती है. लेकिन दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि राज्य सरकारें जब दिक्कत में पड़ जाती हैं तो फिर वे खुद ही कहती हैं कि इस मामले की सीबीआई जांच हो. अगर सीबीआई का इस्तेमाल केंद्र सरकार अपने हिसाब से ही करती तो फिर राज्य सरकारें कई मामले सीबीआई के हाथ में नहीं देतीं. इसलिए जो लोग केंद्र पर इस तरह के आरोप लगा रहे हैं वे सुविधा की राजनीति कर रहे हैं. 

इस सरकार पर विपक्ष का एक बड़ा आरोप है कि कहने को मनमोहन सिंह सरकार के मुखिया हैं लेकिन नियंत्रण कहीं और है इसलिए वे खुलकर काम नहीं कर पा रहे हैं. अब इसमें देखने वाली बात यह है कि अगर मनमोहन सिंह राय-मशविरा नहीं करें तो उन पर यह इल्जाम लगेगा कि वे विचार-विमर्श नहीं करते. अगर वे विभिन्न मामलों को लेकर राय-सलाह करते हैं तो उन पर विपक्ष के लोग यह आरोप लगाते हैं कि ये तो बलहीन प्रधानमंत्री हैं. तो आखिर मनमोहन सिंह करें क्या? हम सबको यह समझना चाहिए कि यह सरकार न तो मनमोहन सिंह की है और न ही कांग्रेस की. यह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मिली-जुली सरकार है जिसमें कई पार्टियां शामिल हैं. ऐसे सरकार में सभी घटकों की बातों को सुनने की आवश्यकता होती है. अगर गठबंधन सरकार में सबको साथ लेकर नहीं चला जाए तो कोई न कोई दिक्कत रास्ते में निश्चित तौर पर आएगी. जो लोग मनमोहन सिंह की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते हैं उन्हें यह देखना चाहिए कि जब भी सरकार पर खतरा मंडराया तो उन्होंने किस तरह की राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया. 2008 में जब परमाणु समझौते को लेकर वाम दलों ने सरकार का साथ छोड़ दिया तो लगा कि अब तो यह सरकार आगे नहीं बढ़ पाएगी. लेकिन मनमोहन सिंह ने समाजवादी पार्टी को साथ लिया. इसके बाद उन्होंने परमाणु समझौता भी किया और न सिर्फ कार्यकाल पूरा किया बल्कि दोबारा जीतकर भी आए. लोकपाल के हंगामे के दौरान भी लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अब इस सरकार के गिने-चुने दिन बचे हैं. इसके बावजूद मनमोहन सिंह की सरकार मजबूती के साथ आगे बढ़ती रही.

लोग तो यह भी आरोप लगाते हैं कि हम घटक दलों को साथ लेकर नहीं चलते. अगर यह आरोप सही होता तो मनमोहन सिंह की सरकार आठ साल तक नहीं चल पाती. एक गठबंधन के अलग-अलग दलों के बीच मतभेद रहना स्वाभाविक है. यदि ममता बनर्जी और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं होता तो फिर वे कांग्रेस में या कांग्रेस के लोग उनकी पार्टी में क्यों नहीं होते? हमें यह समझना होगा कि इस गठबंधन सरकार में अलग-अलग पार्टियां हैं और उनकी अलग-अलग राजनीति है. इसलिए इस तरह की सरकार को चलाने में थोड़ी मुश्किल होती है और कई बार मतभेद सतह पर आते दिखते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस अपने सहयोगियों को साथ लेकर नहीं चलती है. सबको साथ लेकर चलने की कला को अटल बिहारी वाजपेयी ‘गठबंधन धर्म’ कहते थे और कांग्रेस इसका पालन बहुत अच्छे से करती है. कांग्रेस इस गठबंधन सरकार को चलाते हुए इस बात को सही ढंग से समझती है कि बाएं हाथ और दाएं हाथ के मिलने से ही नमस्ते बनता है. एक हाथ से यह काम नहीं हो सकता. 

दो बहुत बुनियादी सुधार 1990-91 में हुए. मनमोहन सिंह ने आर्थिक नीतियों के स्तर पर जो बदलाव किए उन्हें आर्थिक सुधार कहा गया. इसके पहले राजीव गांधी के समय में पंचायती राज को लेकर सुधार की शुरुआत हुई थी जिसके लिए जरूरी संविधान संशोधन दो तिहाई बहुमत में पांच वोट कम पड़ जाने से नहीं हो पाया था. 1992 में नरसिंह राव के कार्यकाल में 73वां और 74वां संविधान संशोधन करके प्रशासनिक सुधारों का रास्ता साफ किया गया. उस समय यह धारणा बनी कि हम जो बदलाव रूपी रथ चलाना चाहते हैं उसका एक पहिया है आर्थिक सुधार और दूसरा है प्रशासनिक सुधार. लेकिन एक पहिया बहुत आगे बढ़ गया है और दूसरा घिसटते हुए बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है. मेरी समझ से देश की बुनियादी समस्या यह है. अगर इन दोनों का समन्वय यह सरकार सही ढंग से करे तो मैं इस बात का भरोसा दिला सकता हूं कि अगले आम चुनाव में कांग्रेस को न सिर्फ 200 से अधिक सीटें बल्कि अपने बूते बहुमत हासिल होगा.

संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे बुरी सरकार है

 

जब से हम स्वतंत्र हुए हैं तब से कोई न कोई भ्रष्टाचार का मामला सामने आता रहा है. लेकिन इतनी भ्रष्ट सरकार आजाद भारत में पहले कभी नहीं आई. इस सरकार के जितने मंत्री भ्रष्टाचार के तरह-तरह के आरोपों से घिरे हैं उतने किसी भी सरकार के नहीं रहे. ऐसा माहौल दिखता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपने मंत्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है जिसकी वजह से यह स्थिति पैदा हुई है. मनमोहन सिंह पिछले आठ साल से सरकार चला रहे हैं, लेकिन उनके मंत्रियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. भ्रष्टाचार से बड़ी चिंता की बात यह है कि यह सरकार उस पर पर्दा डालने की कोशिश आखिर तक करती रहती है. ए राजा के मामले में पूरे देश ने यह देखा. सुरेश कलमाड़ी के मामले में भी ऐसा ही हुआ. अब पी चिदंबरम को सरकार लगातार बचाने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री उनके बचाव में खड़े नजर आ रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि यह इस सरकार की फितरत है कि जब भी कोई मामला सामने आए तो पहले उस पर पर्दा डालने की कोशिश करो और अगर कोई मामले को संसद में उठाता है तो उसे सिरे से खारिज करो.

यह सरकार सिर्फ न्यायपालिका के सामने जाकर झुकती है. जब न्यायपालिका से आदेश आता है तब सरकार कार्रवाई शुरू करती है. 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की सिफारिश के बावजूद सीबीआई जांच के आदेश नहीं दिए गए. इस निर्देश के एक साल के बाद जब कोर्ट का डंडा पड़ा तब जाकर यह मामला सीबीआई को जांच के लिए मिला. अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि भ्रष्टाचार से अनुपयोगी और दिखावे की चीजों का उपभोग (कॉन्सपीक्युअस कन्जंप्शन) बढ़ता है क्योंकि भ्रष्टाचार का पैसा लोग रोजमर्रा के कामों पर तो खर्च करते नहीं. देखा जाए तो बेलगाम होती महंगाई के पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही है. मैंने लोकसभा में भी कहा था कि सरकार जब नाकाम होती है तो हर मोर्चे पर हो जाती है. इस सरकार की सबसे ज्यादा असफलता आर्थिक मोर्चे पर दिखती है. जबकि इस सरकार से सबसे ज्यादा उम्मीदें आर्थिक मोर्चे पर ही थीं. आर्थिक मामले पर जो हम लोग संजोकर गए थे उसमें से एक-एक चीज आज बिखर चुकी है. रुपये के अवमूल्यन से लेकर विकास दर और राजकोषीय घाटे तक के मोर्चे पर हालत खस्ता है. इससे यह लगता है कि आर्थिक मामलों पर से सरकार ने पूरी तरह से नियंत्रण खो दिया है.

मनमोहन सिंह ने बतौर वित्त मंत्री 1991 में जो पाठ पढ़ाया था उससे आज वे स्वयं हट गए हैं. उस वक्त उन्होंने कहा था कि महंगाई की सबसे ज्यादा मार गरीब पर पड़ती है. लेकिन आज उन्हें अपनी वही बात याद नहीं है. यह स्थिति कोई तीन या छह महीने से नहीं है बल्कि महंगाई की यह स्थिति तो पिछले तीन-चार साल से बनी हुई है. दुनिया की बड़ी आर्थिक एजेंसियां और आर्थिक पत्र-पत्रिकाएं आर्थिक मामलों को लेकर आज हिंदुस्तान की भर्त्सना कर रही हैं. हाल ही में दुनिया की एक प्रमुख पत्रिका ‘टाइम’ ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘अंडरअचीवर’ का तमगा दे डाला. इससे पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि भारत के विकास की जो कहानी थी वह खत्म हो गई है. लोग तो यह भी कह रहे हैं कि भारत की विकास की कहानी अस्थायी थी और उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा था.

2010-2011 में भारतीय उद्योगपतियों ने 44 अरब डॉलर देश के बाहर निवेश किए, जबकि देश में निवेश हुआ सिर्फ 27 अरब डॉलर का

 बतौर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी पूरी तरह से असफल रहे हैं और वे अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में छोड़कर गए हैं. आज हर आर्थिक संकेतक नकारात्मक स्थिति की पुष्टि कर रहा है. इसके बावजूद सरकार स्थिति से निपटने के लिए जरूरी कदम उठाने के बजाय इनकार की मुद्रा अपनाए हुए है. सरकार रेटिंग एजेंसियों समेत उन सभी लोगों को गलत ठहरा रही है जो अर्थव्यवस्था की बदहाली की बात उठा रहे हैं. इस सरकार की समझ में यह क्यों नहीं आता कि जब तक समस्या को समझेंगे नहीं तब तक उसका समाधान कैसे होगा.

अर्थव्यवस्था की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2010-2011 में 44 अरब डॉलर भारत के उद्योगपतियों ने देश के बाहर निवेश किया. जबकि इसी दौरान देश में निवेश हुआ सिर्फ 27 अरब डॉलर. अब देश का उद्योगपति देश में निवेश नहीं कर रहा है. देश का उद्योगपति अपने धन को बाहर ले जा रहा है. इस पर सरकार को विचार करना चाहिए. अगर कुछ बंदिशें लगाने की जरूरत पड़े तो लगाई जानी चाहिए. उदारीकरण का यह मतलब नहीं है कि देश गरीबी में गोते खाता रहे और अमीरी देश के बाहर जाए.

जब केंद्र में राजग सरकार थी तो उस दौरान ‘फिसकल रेस्पांसिबिलिटी ऑफ बजट मैनेजमेंट एक्ट’ पास हुआ. इसका मकसद था सरकारी घाटे को नियंत्रण में रखना. संप्रग की पहली सरकार ने सत्ता में आने के बाद इसे अधिसूचित किया. इस कानून में यह प्रावधान था कि राजस्व घाटे को शून्य पर लाएंगे और वित्तीय घाटे को दो-तीन प्रतिशत के आस-पास लाएंगे. लेकिन 2008-09 में भारत का वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 6.2 फीसदी था और राजस्व घाटा वित्तीय घाटे का 75.2 फीसदी हो गया. 2009-10 में वित्तीय घाटा जीडीपी का 6.6 फीसदी था और राजस्व घाटा वित्तीय घाटे का 80.7 फीसदी. वित्त मंत्री अब इसे 72.5 फीसदी पर लाने की बात कह रहे हैं. यह है अर्थव्यवस्था की हालत. यह बात आर्थिक मसलों की जरा-सी भी समझ वाला हर व्यक्ति जानता है कि राजस्व खर्च अनुत्पादक होता है. इससे उत्पादन नहीं बढ़ता है. उत्पादन बढ़ता है पूंजीगत व्यय से.

 महंगाई से लोग बेहाल हैं और यह सरकार बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है. जब संसद में महंगाई पर चर्चा चल रही थी तो मैंने कहा था कि रसोई में आग लग गई. अब कोई कहे कि रसोई में आग नहीं जलेगी तो खाना कैसे बनेगा. मगर आग जलने और आग लगने में अंतर है. आज गृहिणी आग जला नहीं रही है, उसकी रसोई ही जल गई है. रसोई की हर चीज उसकी पकड़ से बाहर हो गई है. यहां तक कि आग जलाने वाली चीज एलपीजी भी महंगी हो गई है. 2009 के दिसंबर में संसद की वित्त समिति ने महंगाई के बारे में ‘कंप्रीहैन्सिव फूड प्राइसिंग ऐंड मैनेजमैंट पॉलिसी’ तैयार करने की सिफारिश की थी. उस पर अब तक कुछ नहीं हुआ.

 अर्थशास्त्र में महंगाई को गरीबों के ऊपर सबसे घटिया किस्म का टैक्स कहा गया है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इतने बड़े अर्थशास्त्री हैं, वे इस बात को समझते ही होंगे. लेकिन इसके बावजूद महंगाई रोकने की कोशिश सरकार नहीं कर रही है. आर्थिक विषयों पर शोध करने वाली एजेंसी ‘क्रिसिल’ की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन साल में यानी 2008-09 से 2010-11 तक, महंगाई के चलते देश के लोगों ने तकरीबन छह लाख करोड़ रुपये अधिक खर्च किए. इसका क्या मतलब हुआ? मतलब यह हुआ कि अगर महंगाई को हमने पांच फीसदी पर नियंत्रित किया होता तो यह भार उनके ऊपर नहीं पड़ता. लेकिन महंगाई इन तीन वर्षों में आठ प्रतिशत या उससे ऊपर रही. वह 20 प्रतिशत तक भी गई. इस वजह से आपकी, हमारी और गरीबों की जेब से छह लाख करोड़ रुपये अधिक खर्च हुए. यानी दो लाख करोड़ रुपये हर साल. भारत सरकार का कुल कर राजस्व है तकरीबन 6.64 लाख करोड़ रुपये. इसका मतलब यह हुआ कि प्रतिवर्ष सरकारी राजस्व का लगभग एक तिहाई महंगाई के चलते इस देश के लोगों को अतिरिक्त देना पड़ रहा है.

कुछ महीने पहले एशियन डेवलपमेंट बैंक की भी एक रिपोर्ट आई थी. इसमें कहा गया है कि भारत में 20 महीने में जिस दर की महंगाई रही है और खासकर जैसे खाद्यान्नों की महंगाई रही है, उसके चलते पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए. हम आज प्रतिवर्ष आठ-नौ प्रतिशत की दर से विकास कर रहे हैं. विकास से गरीबी और गरीबों की संख्या घटनी चाहिए. लेकिन अगर हमने महंगाई पर नियंत्रण नहीं पाया तो उसका यही नतीजा होगा जो एशियन डेवलपमेंट बैंक ने कहा है. यानी और अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जाएंगे, गरीबी घटेगी नहीं.

खुद इसी सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि देश की आबादी में सबसे कम आमदनी वाले नीचे के 20 प्रतिशत लोग अपनी आमदनी का 67 प्रतिशत खाने-पीने की चीजों पर खर्च करते हैं. अब अगर रसोई में आग लगी हो तो उस 20 प्रतिशत की क्या हालत होगी? हम ऊपर के 20 प्रतिशत को भूल जाएं, बीच के 20 प्रतिशत को भूल जाएं, ये जो नीचे के 20 प्रतिशत लोग हैं वे आज महंगाई की मार सहते-सहते मिट्टी में मिल रहे हैं. इन लोगों को यह नहीं कहा जा सकता है कि आज देश जो आठ फीसदी की दर से विकास कर रहा है तुम उसी को खाकर अपनी भूख मिटा लो. यह कैसी विकास दर है जो खुद लोगों को ही खा रही है. मैं सिरे से इस सिद्धांत को खारिज करता हूं कि किसी भी कीमत पर विकास होना चाहिए. अगर विकास का मतलब महंगाई है तो ऐसे विकास का कोई मतलब नहीं है.

बीच-बीच में सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग इस तरह के बयान देते हैं जिससे महंगाई नियंत्रित होने के बजाय और बढ़ जाती है. प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष हर दो महीने बाद कहते हैं कि अगले दो महीने में हम महंगाई को नियंत्रित कर लेंगे. इसके दो महीने बाद फिर कहते हैं कि अगले दो महीने में हम महंगाई नियंत्रित कर लेंगे. इन बयानों के बाद जो मुनाफाखोर हैं वे सोचते हैं कि फिर दो महीने की मोहलत मिल गई है और अब जैसे चाहेंगे वैसे लोगों को चूसेंगे. महंगाई को लेकर सरकार कितनी असंवेदनशील है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तेजी से बढ़ती महंगाई के बावजूद सरकार ने बार-बार पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस के दाम बढ़ाए. सरकार को इस बात को समझना होगा कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ेगी तो बाकी चीजों की कीमतों में भी वृद्धि होगी. विनिर्माण क्षेत्र इससे बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. लेकिन संप्रग सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है.

प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि आज हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक सुरक्षा है. उन्होंने माओवाद को सबसे बड़ी चुनौती बताया है. लेकिन इसके बावजूद माओवाद के ऊपर कहीं कोई नियंत्रण नजर नहीं आ रहा है. हमें यह समझना चाहिए कि माओवाद किसी एक सूबे की समस्या नहीं है बल्कि यह पूरे देश की समस्या है. इससे निपटने में सरकार की जो भूमिका दिखनी चाहिए वह नहीं दिख रही है. जो कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे कदम मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली दोनों सरकार ने पिछले आठ साल में नहीं उठाए हैं. अगर प्रधानमंत्री यह मानते हैं कि आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माओवाद है तो सच्चाई यह है कि यह खतरा घटा नहीं है बल्कि और बढ़ गया है. इसमें भी सबसे तकलीफ की बात यह है कि आंध्र प्रदेश में सरकार ने माओवादियों से समझौता किया और असम में उल्फा से. जबकि उल्फा को खदेड़कर असम से बाहर किया गया था. इसका मतलब यह हुआ कि जहां इस सरकार को राजनीतिक लाभ लेना होता है वहां माओवादियों से समझौता कर लेती है. एक तरफ तो ये समझौता करके चुनाव जीतते हैं और दूसरी तरफ उन्हें ही आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा भी बताते रहते हैं.

बाहरी आतंकवाद से निपटने में भी यह सरकार नाकाम दिखती है. अब भी हम देश को ऐसे सुरक्षा कवच में नहीं डाल पाए हैं जो जरूरी है. अमेरिका पर एक आतंकी हमला हुआ और उसके बाद उसने खुद को ऐसे सुरक्षा कवच में डाला कि उसके बाद आतंकवादी कभी अपने मंसूबों को पूरा करने में कामयाब नहीं हो पाए हैं. भारत में स्थिति इसके उलट है. यहां एक के बाद एक लगातार आतंकी हमले होने के बावजूद अब तक कोई चाक-चौबंद व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है. स्थिति ऐसी है कि जो जब चाहे तब भारत पर हमला कर सकता है. भारत पर आतंकवादी खतरा अब भी बरकरार है और मुंबई में जिस तरह का हमला 2008 में हुआ था उस तरह के हमले की आशंका भी लगातार बनी हुई है. 

प्रतिवर्ष सरकारी राजस्व का लगभग एक तिहाई महंगाई के चलते इस देश के लोगों को अतिरिक्त देना पड़ रहा है

विदेश नीति के मोर्चे पर भी इस सरकार की नाकामी बिल्कुल साफ है. विदेश नीति के मामले में देखें तो इस सरकार का झुकाव अमेरिका की तरफ बहुत ज्यादा है. जब हमारी सरकार केंद्र में थी तो कांग्रेस हम पर लगातार आरोप लगाती थी कि हम अमेरिका के हिसाब से अपनी विदेश नीति बना रहे हैं. जब 2004 में कांग्रेस की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी तो उस वक्त जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम इन लोगों ने बनाया था उसमें यह कहा गया था कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के समय विदेश नीति में अमेरिका के प्रति जो झुकाव दिखता था उसे हम दुरुस्त करेंगे. जबकि हुआ यह कि संप्रग सरकार की विदेश नीति कहीं अधिक अमेरिका के पक्ष में झुकी नजर आती है. अमेरिका के साथ 2005 में जब परमाणु समझौता हो रहा था तो उस वक्त लोगों को सरकार ने सब्जबाग दिखाया कि बस कल ही आपके घर में बिजली पहुंचने वाली है. लेकिन सात साल गुजरने के बावजूद उस समझौते के आधार पर एक मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं हो पाया है. वहीं दूसरी तरफ परमाणु ऊर्जा को लेकर देश का अपना जो शोध है उसे इस सरकार ने वैसा बढ़ावा नहीं दिया जैसा दिया जाना चाहिए था. परमाणु समझौते को लेकर जिस तरह का रवैया इस सरकार ने कदम-कदम पर दिखाया उससे अमेरिका के प्रति इस सरकार का झुकाव स्पष्ट दिखता है.

ईरान के साथ हमारे हमेशा से मित्रता के संबंध रहे हैं. ईरान ही एक ऐसा देश है जिसके जरिए हम अफगानिस्तान और मध्य एशिया जाते हैं. ईरान से भारत को काफी तेल मिलता है. लेकिन ईरान को भारत ने नाराज किया. अब अमेरिका के दबाव में आकर हम ईरान से तेल की खरीद कम कर रहे हैं. इसके बाद भारत सरकार अमेरिका को कहती है कि हमने आपके कहने पर ईरान से तेल खरीद में कटौती कर दी है और अब हमें छूट दे दीजिए. वहीं दूसरी तरफ रूस से संबंधों को लेकर भी यह सरकार नाकाम दिख रही है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का पाकिस्तान जाना भारत के लिए चिंता का एक बड़ा संकेत है. रूस को भारत हमेशा से अपना सबसे अच्छा मित्र मानता रहा है. लेकिन आज हमारा सबसे अच्छा मित्र हमारे सबसे बड़े दुश्मन के यहां जा रहा है. इससे पहले कभी रूस का कोई राष्ट्राध्यक्ष पाकिस्तान नहीं गया. आज रूस ऐसा इसलिए कर रहा है कि वह देख रहा है कि भारत अमेरिका के साथ अपनी सांठ-गांठ बढ़ा रहा है. अमेरिका के साथ भारत की गलबहियों को देखते हुए रूस ने भी अब स्वतंत्र तौर पर दूसरे देशों के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से देखना शुरू कर दिया है.

सुरक्षा के मामले में देश की जो कमजोरी है उसे पूर्व सेनाप्रमुख जनरल वीके सिंह ने उजागर किया. रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार की स्थिति पूरे देश के सामने है. हाल ही में अभिषेक वर्मा नाम के एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है. यह व्यक्ति बहुत दिनों से स्वतंत्र चल रहा था. लेकिन अब जाकर उसकी गिरफ्तारी हो पाई है. उसकी गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि रक्षा सौदों में कितने बड़े स्तर पर दलाली का काम चल रहा है. वॉर रूम लीक जैसी गंभीर घटनाएं भी इस सरकार की नाकामी को ही दिखाती हंै. कुल मिलाकर देखा जाए तो आज हर सुरक्षा सौदे में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार है. इसका सबसे बुरा असर देश की रक्षा तैयारियों पर पड़ रहा है. 

नीतियों के स्तर पर दो बातें हैं. एक बात तो यह है कि आप कोई नीति बनाएं और फिर उसे लागू करें. ऐसा करने पर देश में नीतियों को लेकर भरोसा बढ़ेगा. लेकिन यहां तो कोई नीति ही नहीं बन पा रही है. नीतियों के स्तर पर संप्रग सरकार उम्मीद तो बड़ी बंधाती है लेकिन हकीकत में कुछ कर नहीं पाती. अभी हाल में रुपये के अवमूल्यन और महंगाई को लेकर जब हर ओर से सरकार पर दबाव बना तो प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक इस बारे में बड़ी घोषणाएं करने वाला है. इससे सबकी उम्मीदें बढ़ गईं. लेकिन रिजर्व बैंक ने जो घोषणाएं कीं वे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया की तरह थीं. इससे हुआ यह कि रुपया डॉलर के मुकाबले कहीं अधिक कमजोर हुआ और शेयर बाजार का सूचकांक भी नीचे गया. इस सरकार की आदत में यह शामिल हो गया है कि आशाएं बंधाओ और उस पर खरा नहीं उतरो.

 पेंशन बिल एक उदाहरण है. ममता बनर्जी इसका विरोध कर रही हैं. उनके विरोध की वजह से यह बिल संसद में नहीं आया. सरकार ने भाजपा से बात कर ली थी. हमने कहा था कि हम इस बिल का समर्थन करेंगे. लेकिन सरकार इस बिल को लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. बजट सत्र के बाद सरकार ने यह घोषणा की कि यह बिल कैबिनेट के एजेंडे में आ गया है. इसके बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल के दूसरे नेता और रेल मंत्री मुकुल रॉय ने चिट्ठी लिख दी और पेंशन बिल का विषय कैबिनेट के एजेंडे से हटा दिया गया. इस तरह की बातों से ज्यादा परेशानी होती है. आप कह रहे हो कि हम फैसला करने जा रहे हैं लेकिन आप फैसला कर नहीं पा रहे हैं. खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) लाने की इन्होंने घोषणा कर दी. इसके बाद जब विरोध हुआ तो सरकार ने अपने कदम पीछे हटा लिए. सरकार के इस तरह के रवैये से निवेशकों को ज्यादा निराशा होती है और सरकार के बारे में कोई स्पष्ट राय नहीं बन पाती. आज अर्थव्यवस्था को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह विश्वास के संकट से जूझ रही है. जब यह सरकार बनी थी तब दावा किया गया था कि रोजगार के करोड़ों अवसर पैदा होंगे. लेकिन इस मामले में जो वैश्विक रिपोर्ट आ रही है और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट भी बता रही है कि रोजगार सृजन के मामले में हालत खराब है. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रोजगार सृजन का काम हो ही नहीं रहा है. 

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यह सरकार संघीय ढांचे को भी चुनौती देती दिख रही है. कई मामलों में केंद्र सरकार अपना निर्णय राज्यों पर थोपने का काम कर रही है. यही वजह है कि ज्यादातर राज्य केंद्र सरकार से नाराज हैं. राज्यों और केंद्र के बीच टकराव का वातावरण बना हुआ है. यह भारत की संघीय व्यवस्था के लिए बहुत अशुभ संकेत है. सबसे बड़ी बात यह है कि कोई भी सरकार जो नुकसान करके जाती है उन नुकसानों की भरपाई के लिए अगली सरकार को बहुत मेहनत करनी पड़ती है. 

आज कई राज्य केंद्र सरकार पर भेदभाव करने का आरोप लगा रहे हैं. यह सरकार उन राज्यों की मांगों को अधिक तवज्जो देती है जहां की सत्ताधारी पार्टी इनकी सहयोगी हो. लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं, उनको लेकर इस सरकार का रवैया बिल्कुल अलग होता है. केंद्र सरकार का यह रवैया संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी उस समय केरल में माकपा की सरकार थी. मुख्यमंत्री थे ईके नयनार. उस वक्त मैं केंद्रीय वित्त मंत्री था. उस दौरान नयनार ने मुझे एक पत्र लिखकर केंद्र की ओर से की गई मदद के लिए आभार जताया था और कहा था कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने माकपा की केरल सरकार के साथ कोई भेदभाव नहीं किया. वह पत्र आज भी वित्त मंत्रालय में कहीं न कहीं पड़ा होगा. बतौर केंद्रीय वित्त मंत्री जब मैं मूल्यवर्धित कर (वैट) सुधार की बात कर रहा था तब मैंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नेतृत्व में पहली समिति बनाई. इसके बाद बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता की अगुवाई में राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति इस मसले पर बनाई. ऐसा इसलिए किया कि हम लोग संघीय ढांचे में विश्वास रखते थे और भेदभाव की नीति पर नहीं चलते थे. माकपा से बड़ा भाजपा का राजनीतिक विरोधी कोई नहीं है. इसके बावजूद हमने केरल और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकारों के साथ बिल्कुल वैसा ही व्यवहार रखा जैसा व्यवहार अपनी पार्टी की सरकारों के साथ रखते थे. जबकि मौजूदा सरकार कई राज्यों के साथ भेदभाव कर रही है. यह रवैया सरकार की संकीर्ण मानसिकता को दिखाता है. 

यह सरकार संवैधानिक संस्थाओं से टकराने में भी बिल्कुल हिचकिचा नहीं रही है. अल्पसंख्यकों के आरक्षण का ही मामला लीजिए. इस मामले में सरकार चलाने वाले लोग जानते हैं कि जो बात वे अल्पसंख्यकों के आरक्षण को लेकर कह रहे हैं वह असंवैधानिक है. इसके बावजूद सरकार के अलग-अलग मंत्री इस मसले पर बयानबाजी कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में जब सरकार के खिलाफ फैसला दे दिया तो फिर फटकार सुनने के लिए केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय चली गई. यह सरकार सिर्फ और सिर्फ वोट के लिए जान-बूझकर गैरसंवैधानिक कार्य कर रही है. केंद्र सरकार महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक (सीएजी), चुनाव आयोग, अदालत और लोक लेखा समिति (पीएसी) से अनावश्यक टकरा रही है. 2जी घोटाले पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के मामले में भी सरकार का यही रवैया है. आज प्रधानमंत्री यह क्यों नहीं कहते कि मैं जेपीसी के सामने जाऊंगा. वे जानते थे कि पीएसी के पास यह अधिकार नहीं है कि वह किसी मंत्री को बुलाए. इसलिए उन्होंने कहा कि मैं पीएसी के सामने जाने के लिए तैयार हूं. आज जब जेपीसी में आने की मांग उठ रही है तो वे चुप्पी साधे हुए हैं.

इस सरकार के ज्यादातर मंत्री बहुत दंभी हैं. उनके मन में यह भाव पैदा हो गया है कि उनके जैसा दुनिया में और कोई है ही नहीं. मनमोहन सिंह के बारे में आम धारणा यह बना दी गई है कि वे बहुत सरल, सहज और सभ्य हैं. लेकिन इनकी सच्चाई को समझने के लिए एक घटना का जिक्र करना जरूरी है. मई, 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और जुलाई में बजट आया. बजट के बाद संसद में वित्त विधेयक पर विवाद चल रहा था. इस संबंध में हम लोग – जॉर्ज फर्नांडिस, लालकृष्ण आडवाणी और मैं – एक कागज देने मनमोहन सिंह के पास गए. थे. जॉर्ज फर्नांडिस ने कागज मनमोहन सिंह के हाथ में दिया और उन्होंने सबके सामने ही उसे उठाकर फेंक दिया. उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस ने यह भी कहा था कि मनमोहन सिंह ने अपने पुराने संबंधों का भी खयाल नहीं रखा. मनमोहन सिंह जब अधिकारी होते थे तो उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस के अंडर भी काम किया था. यह घटना प्रधानमंत्री की सरलता, सहजता और सभ्यता के दावों की पोल खोलती है. इस घटना से मनमोहन सिंह ने न सिर्फ अपने आचरण को दिखाया बल्कि दूसरे मंत्रियों को भी ऐसा ही व्यवहार अपनाने को प्रेरित किया. आज यही मंत्रियों के दंभी रवैये के रूप में सबके सामने आ रहा है.

रूस को भारत हमेशा अपना सबसे अच्छा मित्र मानता रहा है. लेकिन वह हमारी नीतियों के चलते हमारे सबसे बड़े दुश्मन के यहां जा रहा है

यह सरकार जनभावना की बिल्कुल कद्र नहीं करती. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रधानमंत्री खुद अनिर्वाचित हैं. जो जनता के बीच जाते ही नहीं हैं, उन्हें यह कैसे पता होगा कि जनभावना क्या चीज होती है? हम जैसे चुनाव लड़ने वाले लोग जब अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाते हैं तो हर रोज सैकड़ो लोगों से मिलते हैं और गांव-गांव घूमते हैं. मनमोहन सिंह का न तो कोई निर्वाचन क्षेत्र है और न ही उनसे उनके मतदाता मिलते हैं और न ही वे किसी गांव में जाते हैं. जनता दरबार ही लगा लिया होता! लेकिन ऐसा भी नहीं है. इसलिए जनभावना के प्रति उपेक्षा का भाव उनके लिए स्वाभाविक ही है. इस सरकार में तो जिनके भी हाथों में फैसला करने का अधिकार है वे सभी आराम से अपनी-अपनी जगह बैठे हुए हैं. 

जब 2004 में संप्रग की सरकार बनी तो उस वक्त कहा गया कि मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होंगे, जो सिर्फ सरकार चलाएंगे. वहीं सोनिया गांधी संप्रग की अध्यक्ष होंगी और राजनीति देखेंगी. उस समय मीडिया में जमकर यह चला था कि इससे अच्छी व्यवस्था पहले कभी नहीं बनी. कुछ लोग कहने लगे कि मनमोहन सिंह सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) की तरह सरकार चलाएंगे और देश बहुत तेजी से तरक्की की राह पर बढ़ेगा. तरक्की की कयासबाजियों को इस बात ने भी बल दिया कि प्रधानमंत्री की पहचान बड़े अर्थशास्त्री के तौर पर थी. कहा गया कि प्रधानमंत्री को चुनाव भी कहीं से नहीं लड़ना है इसलिए वे चुनावी राजनीति के दबावों से मुक्त होकर काम कर सकेंगे. हम जैसे लोग जो चुनाव लड़ते हैं उनके पास उनके संसदीय क्षेत्र से विभिन्न मसलों पर लगातार फोन आते हैं. लेकिन मनमोहन सिंह के पास कोई फोन नहीं आता क्योंकि उनका कोई संसदीय क्षेत्र ही नहीं है. 

दुनिया की बड़ी पत्रिकाओं में ‘दि इकॉनोमिस्ट’ को शुमार किया जाता है. इस पत्रिका ने हाल में यह कहा कि पिछले आठ साल से भारत पर अनिर्वाचित प्रधानमंत्री शासन कर रहा है. बाहर वाले भी देखते हैं कि प्रधानमंत्री ने कभी चुनाव लड़ा नहीं. एक दफा दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़े भी तो हार गए. संविधान में यह नहीं लिखा हुआ है कि प्रधानमंत्री लोकसभा का ही होना चाहिए. लेकिन संविधान की मर्यादा का तकाजा है कि प्रधानमंत्री लोकसभा का हो. जब प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कांग्रेस ने बना दिया तो उनके सामने इस बात के लाले पड़ गए कि किसे सदन का नेता बनाएं. देश का प्रधानमंत्री पूरे देश का नेता होता है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कम समय के लिए प्रधानमंत्री बना है या फिर अधिक समय के लिए. जो अपनी पार्टी का भी सर्वोच्च नेता नहीं ह,ै उसे देश या फिर देश के बाहर के लोग भारत का नेता कैसे मानेंगे.

 इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था को ही संप्रग के अनिर्वाचित प्रधानमंत्री वाले तरीके ने खंडित कर दिया. मनमोहन सिंह भले ही प्रधानमंत्री के पद पर हों लेकिन उनके पास कोई ताकत नहीं है. ताकत है सोनिया गांधी के पास, लेकिन उनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं है. संप्रग का यह प्रयोग ही देश की अभी की सारी दिक्कतों की जड़ में है क्योंकि हर जगह नेतृत्व का अभाव दिखता है. ममता बनर्जी और डीएमके तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी सहयोगी थे. ये दोनों इस सरकार में भी हैं. लेकिन जो स्थितियां आज पैदा हो रही हैं वे हमारे समय में तो नहीं हो रही थीं. हम इन दोनों को ठीक ढंग से साथ लेकर चलते रहे. संप्रग से कहीं अधिक सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने का काम राजग ने किया था. हम ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि हमारे पास अटल बिहारी वाजपेयी जैसा नेतृत्व था.

जबकि मनमोहन सिंह के पास नेतृत्व की क्षमता नहीं है. मनमोहन सिंह के पास न नैतिक ताकत है, न राजनीतिक. और न सरकारी ताकत. प्रधानमंत्री के पास कोई ताकत नहीं है. इस वजह से जिस नेतृत्व की आवश्यकता इस देश को अभी है वह नहीं मिल पाया. इस सरकार के शुरुआत के दो-तीन साल तो यह सोचते हुए कट गए कि प्रधानमंत्री बहुत ईमानदार हैं इसलिए सब ठीक चलेगा. लेकिन कभी-न-कभी तो इसे बिखरना ही था. अब संप्रग-2 में यह बिखराव बिल्कुल साफ दिख रहा है. यह सरकार नेतृत्व और विश्वसनीयता के गंभीर संकट से गुजर रही है. जब प्रणब मुखर्जी सरकार का हिस्सा थे तो सारी जिम्मेदारी उन पर छोड़ रखी थी.

 देश के प्रधानमंत्री को जब भी समय मिलता है तो वह संसद के सदन में आकर बैठता है. चाहे वह लोकसभा में बैठे या राज्यसभा में. जब संसद में प्रश्नकाल चल रहा होता है तब मनमोहन सिंह सदन में आते हैं. इसके बाद शून्य काल शुरू होता है और सांसद कहते रह जाते हैं कि मैं प्रधानमंत्री जी को यह बताना चाहूंगा, वह बताना चाहूंगा लेकिन मनमोहन सिंह इन बातों की अनदेखी करते हुए सदन से उठकर चले जाते हैं. संसद की इतनी अवज्ञा और किसी शासन में नहीं हुई. मनमोहन सिंह की संसद में कोई दिलचस्पी ही नहीं है. जो संसद में पला-बढ़ा उसे तो इसकी कार्यवाही में दिलचस्पी होगी लेकिन जिसका कोई संबंध ही नहीं रहा उसकी इसमें दिलचस्पी कैसे होगी? प्रधानमंत्री का संसद में रुचि नहीं होना इस सरकार और देश की एक सबसे बड़ी समस्या है.

 

कोकराझार की करुण पुकार

82 साल के बिशेश्वर बोडो अपने गांव जाने के लिए व्याकुल हैं. गोसाईगांव तहसील में पड़ने वाला उनका गांव ओडलागुड़ी उस कोकराझार कस्बे से आधा घंटा दूर है जहां वे फिलहाल अपनी बेटी के साथ रह रहे हैं. कस्बे में लगे कर्फ्यू की वजह से गांव जाना तो दूर वे अपने घर से बाहर तक नहीं निकल सकते. यह कर्फ्यू उन भीषण दंगों की वजह से लगा है जिनमें आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक 58 से भी ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और दो लाख से भी ज्यादा लोगों को घर-बार छोड़कर राहत शिविरों की शरण लेनी पड़ी है. गैरआधिकारिक आंकड़े यह नुकसान कहीं ज्यादा बता रहे हैं. भर्राए गले के साथ बिशेश्वर कहते हैं, ‘टीवी पर खबर आ रही है कि मेरा गांव जल रहा है. पता नहीं मेरे आस-पड़ोस के लोगों का क्या हुआ होगा. गांव में मैं अकेला रहता था तो मेरी बेटी कुछ महीने पहले मुझे यहां ले आई. इसलिए मैं सुरक्षित हूं. पता नहीं कितने दिन और चलेगा यह खूनखराबा.’ 

बोडो, नेपाली, आदिवासी, बांग्लाभाषी हिंदू और मुसलिम समुदाय की मिली-जुली आबादी वाले निचले असम के इस इलाके में सामुदायिक हिंसा कोई नई बात नहीं. इसके कारण भी अनजाने नहीं हैं. लेकिन क्षुद्र स्वार्थों से भरी राजनीति के चलते अब तक इस समस्या के समाधान की कोई स्थायी उम्मीद नहीं जग सकी है. दरअसल मूल निवासी बनाम प्रवासी के नाम पर हो रहा टकराव पिछले कई दशक से इस हिंसा का बीज बनता रहा है. राज्य में जनसांख्यिकी का अनुपात बदल रहा है. जमीन और रोजगार की उपलब्धता घट रही है. इन मुद्दों पर होने वाली राजनीतिक रस्साकशी के चलते असम पर अधिकार का मुद्दा जब-तब गरमाता रहता है.  

हालिया हिंसा की शुरुआत तब हुई जब 19 जुलाई को कोकराझार जिले में मुसलिम समुदाय के दो छात्र नेताओं पर अज्ञात लोगों ने गोली चलाई. जवाबी हमले में बोडो लिबरेशन टाइगर्स नामक संगठन के चार पूर्व सदस्य मारे गए. इसके बाद तो हिंसा का दायरा तेजी से फैला और एक के बाद एक कई जिलों के गांव इसकी चपेट में आते गए.  असम की सबसे बड़ी जनजाति बोडो असम की कुल जनसंख्या का महज पांच फीसदी है. इसके मुकाबले बांग्लादेश से आए मुसलमानों की आबादी, जो इस इलाके में महज चार दशक पहले आई है, पूरे असम की जनसंख्या का 33 फीसदी हो गई है. इसकी वजह से सिर्फ बोडो ही नहीं बल्कि दूसरे जातीय गुटों का भी मुसलिम समुदाय के साथ टकराव बढ़ गया है. 

उम्मीद की जा रही थी कि स्वायत्तता के बाद सब ठीक हो जाएगा, लेकिन बोडो समुदाय की बदहाल स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया

1952 में पहली बार बोडो और मुसलिम समुदाय का टकराव हुआ था. यही वह दौर था जब पहली बार मुसलिम आबादी इस इलाके में आ रही थी. 90 के दशक की शुरुआत में दोनों समूहों के बीच फिर सिलसिलेवार संघर्ष हुआ जिसके बाद मुसलिम आबादी को पीछे हटना पड़ा. तभी बोडो स्वायत्तता की बात पहली बार उठी. नतीजतन 1993 में बोडो स्वायत्त परिषद (बीएसी) बनी. बोडो समुदाय की मौजूदगी निचले असम के मैदानों में उत्तरी बंगाल से लगने वाले इलाकों तक है. यह इलाका कछारी, कोच, राजबोंघिस और आदिवासी लोगों का भी परंपरागत निवास रहा है. 1996 और 1998 में बोडो और आदिवासियों के बीच भी खूनी संघर्ष हो चुका है. इसमें 300 लोगों की जान चली गई थी.

अस्सी के दशक के आखिरी सालों में उपेंद्रनाथ ब्रह्म की अगुवाई में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन (एबीएसयू) द्वारा शुरू किया गया पृथक बोडोलैंड आंदोलन बेहद हिंसक रहा था. मसले के हल के लिए बनी बोडो स्वायत्त परिषद से समुदाय का एक हिस्सा खुश नहीं था, इसलिए हजारों बोडो युवा पूर्ण आजादी के समर्थन में भूमिगत हो गए. नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ बोडोलैंड  (एनडीबीएफ) और बोडो लिबरेशन टाइगर्स (बीएलटी) ने हथियार उठा लिए. बीएलटी 2003  में हिंसा की राह छोड़कर मुख्यधारा में आ गया जिसके बाद बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) का मार्ग प्रशस्त हुआ. 

बागी बीएलटी राजनीतिक चोला ओढ़कर अब बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट  हो गया था. बीटीसी की कमान इसके हाथ में थी और इस तरह इसके मुखिया हग्रामा मोहिलारी ने बोडो राजनीति पर एक तरह से कब्जा कर लिया था.  लेकिन सत्ताधारी कांग्रेस से जुड़े होने के बावजूद वे बोडो समुदाय की जिंदगी में कोई खास फर्क नहीं ला सके. इसका नतीजा यह हुआ कि  साल 2010 में एबीएसयू ने फिर अलग बोडोलैंड की मांग शुरू कर दी. एबीएसयू के फायरब्रांड अध्यक्ष प्रमोद बोरो कहते हैं, ‘बोडो जनता ने दो दो स्वायत्तशासी संस्थाएं देख लीं. दोनों बोडो जनता के अधिकारों की रक्षा कर पाने में नाकाम रही हैं. इस हिंसा में बोडो अपने ही घर में बेघर हो रहे हैं.’ एबीएसयू ने एक बार फिर से पृथक बोडोलैंड की मांग शुरू कर दी है, लेकिन आज हालात अस्सी के दशक के विपरीत हैं. संगठन का बड़ा हिस्सा सरकार के साथ बातचीत में लगा हुआ है. हालांकि उसका कहना है कि पृथक राज्य की मांग पर कोई समझौता नहीं होगा. बातचीत विरोधी गुट नेता रंजन दैमारी अब भी गुवाहाटी केंद्रीय जेल में हैं, लेकिन उनके समर्थक इस इलाके में फैले हुए हैं जो जब-तब हिंसा फैलाते रहते हैं. 

पिछले कुछ समय के दौरान बीटीसी और इस पर कब्जा जमाए हग्रामा मोहिलारी की छवि लगातार धूमिल होती गई है. कोकराझार के रंजन बसुमतारी कहते हैं, ‘असम सरकार को बोडो इलाकों की कोई फिक्र नहीं. उन्होंने इसे हग्रामा के लिए छोड़ दिया था ताकि वे इसे मनमर्जी से लूट सकें. बोडो जनता की हालत सुधारने से ज्यादा हग्रामा को अपनी सत्ता की  चिंता है. गोगोई ऐसे सहयोगी के साथ खुश हैं और हग्रामा भी कांग्रेस के ठेकेदार की तरह काम कर रहे हैं.’ 2003 में बीटीसी के गठन के बाद बोडो इलाकों में नाममात्र का विकास देखने को मिला है, जबकि इस दौरान हिंसा बढ़ी है. बीएलटी के पुराने नेता व्यापारी और ठेकेदार बन गए हैं जो अब हथियारों का इस्तेमाल अपने प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने के लिए करते हैं. ताकत हाथ में आने के बाद हग्रामा और उनके सहयोगियों में विचारधारा का क्षरण भी तेजी से हुआ है. 

चाहे भूमिगत एनडीएफबी हो या हथियार डाल चुकी बीएलटी,  दोनों के ज्यादातर कैडर के पास अवैध हथियार हैं. इनमें से कुछ तो फिरौती भी वसूलने लगे हैं. इससे बोडो इलाकों में जंगलराज जैसी स्थिति लगती है. कोकराझार राजकीय अस्पताल में भर्ती एक बोडो महिला बताती है, ‘आम बोडो यहां सुरक्षित नहीं है. हथियारबंद लोग खुलेआम घूमते हैं. इनमें सिर्फ बोडो विद्रोही ही नहीं हैं. इनकी आड़ में स्थानीय गुंडे-बदमाश भी गिरोह चला रहे हैं.’  जातीय संघर्ष की वजह से यह अराजकता और बढ़ी है. ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष अब्दुल रहमान अहमद कहते हैं, ‘पिछले तीन साल के दौरान गैरबोडो समुदायों के नेताओं पर लगातार हमले होते रहे हैं. इससे बीटीसी इलाके में रहने वाले गैर-बोडो समुदायों में भय व्याप्त है.’   

पिछले छह महीने के दौरान बोडोलैंड में रहने वाला गैर-बोडो समुदाय अपने साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ मुखर हुआ था. इसके नतीजे में नॉन बोडो सुरक्षा समिति का गठन भी हुआ था. इसका काम था गैर-बोडो लोगों के साथ होने वाले अत्याचार का विरोध. मुसलिम नेताओं द्वारा गठित इस संगठन को कुछ बांग्लाभाषी हिंदुओं, नेपालियों और राजबोंघिस समुदाय का समर्थन प्राप्त था. ये बोडोलैंड का विरोध नहीं कर रहे थे लेकिन गैर बोडो समुदाय के लिए अधिकारों की मांग कर रहे थे. 

गैर-बोडो संगठन के उभार के पीछे राजनीति की भूमिका भी देखी जा रही है. इस आशंका को मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी खारिज नहीं किया है. वे कहते हैं, ‘हमारे पास सुरक्षा बलों की कमी है. केंद्र ने अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजने का वादा किया है. एक हफ्ते के भीतर हालात काबू में आ जाएंगे लेकिन मैं इसके पीछे राजनीतिक षड्यंत्र से इनकार नहीं कर सकता. हमें इन हालात से निपटना है.’ लेकिन साफ है कि गोगोई सरकार ने 2008 में उदलगुड़ी में हुई  हिंसा से कोई सीख नहीं ली है जिसमें 54 लोग मारे गए थे. इसकी जांच के लिए गठित जस्टिस पीसी फूकन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में असम पुलिस की बखिया उधेड़ते हुए उसकी खुफिया क्षमता पर सवाल खड़े किए थे. आयोग ने हिंसा भड़कने के लिए मुसलिम स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ असम को जिम्मेदार माना था जो इलाके में जबरन बंद थोपने की कोशिश कर रही थी. हमेशा की तरफ इस बार भी समय रहते स्थिति काबू में आ सकती थी. लेकिन पुलिस ने हालात को हाथ से निकलने का मौका दिया. अब सरकार और उसके गृह विभाग को जवाब खोजना पड़ रहा है. 

बिजली पर बेपरवाही

बिजली की भारी किल्लत से जूझ रहा बिहार अगले पांच साल में ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य लेकर चल रहा है. राज्य सरकार अपने पुराने बिजली घरों की मरम्मत करा रही है और नए बिजली घर बना रही है. कुछ समय पहले औरंगाबाद जिले के नबीनगर में एक बिजलीघर का शिलान्यास करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जल्द ही बिहार को बाहर से बिजली लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी.  

लेकिन यह भविष्य की बात है. बिहार के वर्तमान पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि यहां बिजली निगलने वाले खिलाडि़यों की एक फौज है और उन खिलाडि़यों को विजेता बनाने वाले रेफरी भी मैदान में अपनी पूरी ऊर्जा लगाते हैं. जब तक इस भ्रष्ट गठजोड़ पर नकेल नहीं कसी जाती तब तक बिजली के मोर्चे पर भविष्य में आत्मनिर्भरता के कोई खास मायने नहीं लगते. राज्य विद्युत बोर्ड ने बिहार विद्युत नियामक आयोग को 2011 के जो आंकड़े बताए हैं उनके हिसाब से 57 प्रतिशत से अधिक बिजली का ‘एयर ट्रांसमिशन ऐंड कॉमर्शियल लॉस’ हो जाता है. यानी 100 रुपये की बिजली है तो उसमें सरकार को 57 रुपये से ज्यादा का नुकसान है. यह नुकसान एक रिकॉर्ड की तरह है. देश के सभी राज्यों में यह नुकसान होता है. लेकिन बिहार में नुकसान के इस खेल को देखें तो साफ लगता है कि यह नुकसान जितना होता नहीं, उससे ज्यादा कहीं सुनियोजित तरीके से कराया जाता है. 

लेकिन पहली व्यवस्था के पंगु होने और दूसरी के आने के बीच के वक्त का हिसाब-किताब जब होगा तब शायद एक और कीर्तिमान कायम हो. 

बिहार सरकार फिलहाल 500 मेगावाट बिजली की खरीदारी कर रही है. इसमें 300 मेगावाट बिजली एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम लिमिटेड से 4.31 रुपये की दर से तथा 200 मेगावाट अडानी ग्रुप से 4.41 रुपये की दर से ली जा रही है. इतनी महंगी खरीदी गई बिजली में यदि 57 प्रतिशत से अधिक नुकसान हो तो यह सवाल अहम हो जाता है. जानकार बताते हैं कि मानकों के हिसाब से यह नुकसान 29 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. ऊर्जा क्षेत्र में सुधार के लिए तय हो रहे मानदंड को मानें तो यह नुकसान 15 प्रतिशत में सिमटकर रहना चाहिए था. लेकिन बिजली को लेकर भविष्य के सपने में मगन महकमे में यह सवाल हाशिये पर है. राज्य विद्युत बोर्ड के प्रवक्ता हरेराम पांडेय कहते हैं, ‘नुकसान 40 प्रतिशत के करीब ही होगा. किन्हीं विशेष परिस्थितियों के रिकॉर्ड के आधार पर आप 57 प्रतिशत नुकसान की बात कर रहे हैं’. हम उन्हें ध्यान दिलाते हैं कि पिछले तीन साल से विद्युत विभाग के निगरानी कोषांग की पुलिस की गतिविधि ही बिजली चोरी को रोकने-रुकवाने को लेकर लगभग ठप पड़ी हुई है तो बिजली चोरी में एक रिकॉर्ड क्यों नहीं बन रहा होगा. पांडेय कहते हैं, ‘विद्युत बोर्ड अपने तरीके से विशेष पुलिस बल क जरिए बिजली चोरों पर छापेमारी कर रहा है. हम विभाग में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ भी लोगों को आगाह करते रहे हैं.’

पर असल सवाल यह है कि आखिर क्यों 1992 में गठित उस विद्युत विभाग निगरानी कोषांग को अचानक पंगु होना पड़ा जो बना ही बिजली चोरी रोकने के लिए था. क्यों आज यह स्थिति है कि कोषांग की पुलिस आज बिजली चोरी होते हुए देखकर भी तमाशबीन बनने को विवश है, क्योंकि उसे अब यह अधिकार नहीं है कि वह बिजली चोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई करे? राज्य के ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव अजय नायक  कहते हैं, ‘57 नहीं, यह नुकसान करीब 46 प्रतिशत है.’ वे यह भी बताते हैं कि समस्या को दूर करने के लिए पटना में वितरण व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है. वे और योजनाएं भी गिनाते हैं. निगरानी कोषांग विभाग पंगु बना दिया गया है तो बड़े चोर कैसे पकड़े जाएंगे, पूछने पर नायक कहते हैं, ‘दूसरे रास्ते बिजली चोरों को पकड़ने की कोशिश जारी है. बिजली के अलग से न्यायालय बनाकर त्वरित कार्रवाई भी की जा रही है.’ यानी बिजली बोर्ड से लेकर ऊर्जा विभाग तक इस सवाल का ठोस जवाब नहीं मिल पाता कि आखिर बिजली की चोरी रोकने के लिए बने निगरानी कोषांग को क्यों पंगु बनाया गया. लेकिन थोड़ा अतीत में जाने पर मामला कुछ-कुछ साफ होता है. जो दस्तावेज तहलका को मिले हैं, उनमें बड़े खेल के संकेत मिलते हैं. 

बात 2008 की है. विद्युत निगरानी कोषांग के महानिदेशक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आनंद शंकर हुआ करते थे. उनके निर्देश पर बिजली के बड़े खिलाडि़यों पर छापेमारी शुरू हुई. कई केस दर्ज हुए. इनमें एक केस नंबर 67/2008 भी था जो दादीजी स्टील नाम की एक कंपनी के खिलाफ था. निगरानी कोषांग को पता चला कि ऐसी ही चोरी को लेकर बिजली बोर्ड ने कई प्रतिष्ठानों से टैंपर्ड मीटर जब्त किया था और बिजली चोरी के ठोस साक्ष्य भी मिले थे, लेकिन बोर्ड की ओर से बिजली के उन चोरों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराया जा सका था. जब दादीजी स्टील पर मामला दर्ज हुआ तो आनन-फानन में बोर्ड ने भी कइयों पर मामले दर्ज करा दिए. लेकिन इतने दिन तक चुप्पी क्यों साधे रहा, इसे स्पष्ट नहीं किया जा सका. फिर बिजली बोर्ड अध्यक्ष स्वप्न मुखर्जी ने एक रास्ता निकाला और घोषणा की कि जिन प्रतिष्ठानों या उपभोक्ताओं के मीटर टैंपर्ड हैं वे इसकी स्वैच्छिक घोषणा करें. राज्य में करीब 28 लाख उपभोक्ता हैं, लेकिन 52 बड़े उपभोक्ताओं ने ही यह घोषणा की कि उनका मीटर टैंपर्ड है और उसे बदला जाए. 

खेल यहीं पर हुआ. जिन उपभोक्ताओं के टैंपर्ड मीटर जब्त किए गए थे, उन्होंने भी स्वैच्छिक घोषणा की बहती गंगा में हाथ धोया और बोर्ड ने भी उन पर मेहरबानी की. जिस स्टील कंपनी के खिलाफ निगरानी कोषांग ने कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और जिसके मामले में तीन साल की सजा के साथ करीब 20 करोड़ रु जुर्माने की संभावना थी,  उसने भी करीब दो माह बाद स्वैच्छिक घोषणा करके अपने बचने का रास्ता निकाल लिया और मात्र एक करोड़ का जुर्माना भरकर छुट्टी पाने की कोशिश की. लेकिन बात बड़ी थी. आनंद शंकर सख्त छवि वाले अधिकारी थे  इसलिए उन्होंने कई और बड़ी मछलियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया. तभी उनका तबादला हो गया. उनकी जगह 27 फरवरी, 2009 को दूसरे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मनोज नाथ आए. नाथ ने पाया कि बिजली बोर्ड के तब के अध्यक्ष स्वप्न मुखर्जी ने स्वैच्छिक घोषणा की आखिरी तिथि 5 जुलाई, 2008 की तय सीमा गुजर जाने के बाद भी स्वैच्छिक घोषणा को स्वीकारा है और बड़े खेल के रास्ते खोले हैं. साथ ही यह भी कि बिजली के जिन चोरों को टैंपर्ड मीटर के साथ पकड़ा गया था उन्हें भी स्वैच्छिक घोषणा का लाभ देकर सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया और चोरों को खुली छूट दी गई.

बिजली से ही राज्य में विकास का रास्ता खुलेगा है. लेकिन जो बिजली है, उसमें आधे से अधिक यूं ही व्यर्थ हो जा रही है

नाथ ने बोर्ड के अध्यक्ष पर केस किया. अध्यक्ष ने स्वीकारा भी कि दादीजी स्टील को स्वैच्छिक घोषणा का लाभ नहीं मिलना चाहिए था. लेकिन इसी बीच ‘आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास’ वाला खेल हुआ. जिस रोज महानिदेशक मनोज नाथ ने केस दर्ज कराया, उसी रोज अध्यक्ष ने भी नाथ पर केस दर्ज करा दिया. उनका आरोप था कि नाथ ने उनसे बिजली बोर्ड परिसर, जहां विद्युत निगरानी कोषांग महानिदेशक का कार्यालय है, सुसज्जित कार्यालय की मांग की और इसे  में मानने पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया और फिर यह विद्वेषपूर्ण केस भी किया. इससे मामले का रुख ही बदल गया. बिजली बोर्ड के अध्यक्ष ने बिजली चोरी के सार्वजनिक मामले को निजी दायरे में समेटने की कोशिश की. नतीजतन पूर्व महानिदेशक आनंद शंकर द्वारा बिजली चोरी का मामला दर्ज करवाने और फिर बाद में महानिदेशक मनोज नाथ द्वारा स्वैच्छिक घोषणा के खेल से संबंधित मामला दर्ज करवाने का मामला अदालत में पहुंचा. पटना हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत कोषांग पुलिस को ऊर्जा चोरी से किया गया कदाचार दर्ज करने का अधिकार ही नहीं है. हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया, बिजली बोर्ड इसे सिर आंखों पर लेकर लौट गया और तब से विद्युत निगरानी कोषांग नख-दंतहीन संस्था बनकर रह गया है. 

जानकार बताते हैं कि न्यायालय को जो सबूत और साक्ष्य उपलब्ध कराए गए थे, उस आधार पर फैसला सही है. लेकिन बड़ा सवाल कुछ और है. बिहार सरकार ने ही दो दशक पहले विद्युत निगरानी कोषांग को शुरू किया था. इसने दो दशक में बिजली चोरी के कई मामले उजागर किए और कई केसों को इसके जरिए एक अंजाम तक पहुंचाया जाना था. सवाल यह है कि उसी संस्था के अचानक अधिकारविहीन होने का फैसला सरकार ने स्वीकार कैसे कर लिया. सरकार और बिजली बोर्ड ने इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों नहीं किया? यह सवाल इसलिए अहम है कि इस फैसले के कुछ माह पहले ही जब नौबतपुर के एक किसान पर 60 हजार रुपये की बिजली चोरी का मामला बना था और हाई कोर्ट ने विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत एक ऐसा ही फैसला सुनाया था तो बिजली बोर्ड सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2010 में साफ कहा था कि ऊर्जा चोरी के मामले में पुलिस को 2007 में हुए विद्युत अधिनियम के संशोधन के बाद के ही नहीं, इससे पहले के मामलों में भी केस दर्ज करने का अधिकार है. 

नाथ कहते हैं, ’साफ है कि बिजली बोर्ड यह मामला इरादतन हार गया क्योंकि हाई कोर्ट के सामने समान मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बात बताई ही नहीं गई. बोर्ड ने यह भी नहीं सोचा कि इसका क्या असर पड़ेगा. निगरानी कोषांग ने अब तक जो केस दर्ज किए होंगे वे सब खारिज होने शुरू हो जाएंगे और सरकार को यह जवाब देना होगा कि निगरानी कोषांग के जरिए दो दशक से बिजली चोरों को पकड़ने और उन पर  कार्रवाई की जो कवायद होती रही, वह गलत थी.’ जानकार बताते हैं कि इस फैसले से स्टील कंपनी पर 20 करोड़ रुपये के जुर्माने वाला मामला तो ठंडे बस्ते में गया ही, और भी कई नुकसान हुए. मसलन जिन 52 उपभोक्ताओं ने स्वैच्छिक घोषणा का लाभ उठाया था उनमें दस ऐसे भी थे  जो आदतन बिजली चोर रहे थे और जिनसे मोटा राजस्व वसूला जाना था. दो और बड़े उपभोक्ताओं से भी करीब 160 करोड़  वसूले जाने थे, जिन पर 2005 में ही मामला दर्ज हुआ था. लेकिन हाई कोर्ट के फैसले की आड़ में अब यह राजस्व उगाहने की बात तो दूर, पहले दर्ज हुए मामले भी खुर्द-बुर्द हो सकते हैं. 

क्या यह खेल सिर्फ बिजली बोर्ड का है? या इसमें एक बड़ा गठजोड़ लगा हुआ है? पुलिस ने इस मामले को मुख्यमंत्री तक पहुंचाया. मनोज नाथ के बाद इस पद पर आए ढौंढियाल ने भी कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए और दो बड़े उपभोक्ता, जिनसे 160 करोड़ वसूले जाने हैं, उनके मामले में तो सुप्रीम कोर्ट जरूर जाना चाहिए.  सूत्र बताते हैं कि सरकार की ओर से भी बात आई कि सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे. इस संदर्भ में 21 जुलाई, 2011 को ही अभ्यावेदन भेजा गया था और उस आधार पर 90 दिन के अंदर सुप्रीम कोर्ट में मामला जाना चाहिए था लेकिन अब तक वह जस-का-तस पड़ा हुआ है. हम बिजली बोर्ड के अध्यक्ष पीके राय से बात करने की कोशिश करते हैं, लेकिन बात नहीं हो पाती. विभाग की ओर से हरेराम पांडेय ही फिर से उपलब्ध होते हैं. लेकिन बोर्ड क्यों सुप्रीम कोर्ट नहीं गया, इसका जवाब देना वे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात बताते हैं. राज्य के विकास आयुक्त अशोक कुमार सिन्हा कहते हैं, ‘निगरानी वाला मामला तो हाई कोर्ट का है, लेकिन बिजली चोरी रोकने के लिए हम लोग नए कदम उठा रहे हैं. वितरण की नई व्यवस्था की जा रही है और बिजली चोरी रोकने के लिए अलग से थाना खोलने का प्रस्ताव तैयार हुआ है. इससे बहुत हद तक अंकुश लगेगा.’