नई दिल्ली: महिला आरक्षण कानून को लेकर अब देश में नई बहस छिड़ गई है। Centre for Social Research (CSR) और Women Power Connect (WPC) ने एक प्रेस रिलीज जारी करते हुए सभी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे इस कानून को जल्द से जल्द लागू करने के लिए एकजुट हों। उनका कहना है कि महिलाएं लंबे समय से अपने हक का इंतजार कर रही हैं और अब इसे टालने की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है। संगठनों का मानना है कि यह सिर्फ सीटों का मामला नहीं है, बल्कि इससे देश की राजनीति की तस्वीर बदल सकती है। इससे महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और फैसले लेने की प्रक्रिया ज्यादा समावेशी होगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, अभी भी संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 14% के आसपास ही है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। वहीं, पंचायत स्तर पर महिलाओं की भागीदारी 40% से ज्यादा है, जो दिखाता है कि अगर मौका मिले तो महिलाएं नेतृत्व में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।

संगठनों ने यह भी कहा कि इस कानून को लागू करने में देरी की बड़ी वजह जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाएं हैं। अगर इन्हें बहाना बनाया गया, तो यह सुधार और भी पीछे खिसक सकता है। इसलिए जरूरी है कि सरकार और सभी पार्टियां मिलकर इसे जल्द लागू करने का रास्ता निकालें।
इसके साथ ही, राजनीतिक दलों से यह भी अपील की गई है कि वे टिकट वितरण में महिलाओं को प्राथमिकता दें और उन्हें नेतृत्व के मौके दें। सिर्फ कानून बना देना काफी नहीं है, बल्कि उसे सही तरीके से लागू करना भी उतना ही जरूरी है।
अंत में संगठनों ने कहा कि यह सिर्फ महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र को मजबूत करने का सवाल है। अगर इस कानून को सही तरीके से लागू किया गया, तो यह भारत की राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।




