भारतीय रिजर्व बैंक की 19 मई को 2,000 के नोट प्रचलन से बाहर करने की घोषणा के बाद जहाँ आम जनता ने अपने पास जमा नोटों को बैंकों में जमा करवाना शुरू कर दिया है या कम मूल्य वर्ग की करेंसी में बदलवा रही है, वहीं इस बहाने नक़दी माफ़िया (दलाल) भी ख़ूब सक्रिय हो गया है।
इस पखवाड़े ‘तहलका’ एसआईटी की आवरण कथा इसी विषय पर है। वास्तव में 2,000 रुपये के नोटों को प्रचलन से वापस लेने का आरबीआई का क़दम लोगों को नोटबंदी के भूत की याद दिलाता है, जिनके पास इस मूल्यवर्ग की बड़ी मुद्रा जमा थी। केंद्रीय बैंक ने इस क़दम को उचित ठहराते हुए कहा कि नवंबर, 2016 में 500 रुपये और 1,000 रुपये के बैंक नोटों को वापस लेने के बाद मुद्रा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए नये बैंक नोट पेश किये गये थे, और अब तक उसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है। उसने अपनी ‘स्वच्छ नोट नीति’ का भी हवाला देते हुए तर्क दिया कि ये नोट अपने अनुमानित जीवन-काल के अंत के क़रीब थे।
हालाँकि कुछ लोगों के लिए यह घबराहट का कारण बना और ‘कतार में खड़े राष्ट्र की भयावहता की याद दिला दी। यह नोट शुरुआत के समय इसमें लगाये गये नैनो चिप के विचित्र दावों के कारण उपहास का विषय भी बना था। उधर विपरीत परिस्थिति में अवसर तलाश करने वाले दलाल फिर सक्रिय हो गये हैं। मार्च, 2023 तक प्रचलन में बैंक नोटों के कुल मूल्य में 2,000 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी 10.8 फ़ीसदी थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आरबीआई की घोषणा, जो कि 2016 की नोटबंदी के ठीक साढ़े छ: साल बाद आयी, जब 15.41 लाख करोड़ रुपये के बैंक नोट बंद कर दिये गये थे, से पहले वाली चिन्ता की भावना पैदा हुई। चिन्ता को बढ़ाने की बात यह रही कि 2,000 रुपये के बैंक नोटों का विनिमय एक समय में बैंकों में 20,000 रुपये और दूरदराज़ के स्थानों में 4,000 रुपये प्रति दिन तक सीमित कर दिया गया है।
‘तहलका एसआईटी’ ने गुप्त कैमरे में दलालों को यह दावा करते हुए रिकॉर्ड किया कि वे इन नोटों को पल भर में बदल सकते हैं। एक दलाल ने दावा किया कि, ‘आरबीआई की घोषणा के 24 घंटे के भीतर मुझे कम मूल्य के नोटों के साथ दो करोड़ रुपये मूल्य के 2,000 रुपये के नोटों के आदान-प्रदान का काम मिला। नि:संदेह, यह सब काला धन था। इस दौरान मैं ऐसे लोगों से मिला हूँ, जिनके कमरे अवैध नक़दी से भरे हुए हैं; सभी 2,000 रुपये के नोटों से।’
दलाल ने नक़ली ग्राहक के रूप में उससे मिलने वाले ‘तहलका रिपोर्टर’ से कहा- ‘मुझ पर विश्वास करो। मैं उसी दिन आपके सभी 2,000 रुपये के नोटों को अन्य मूल्यवर्ग के नोटों के साथ बदलवा दूँगा; लेकिन आपको मुझे कमीशन के रूप में 15 फ़ीसदी का भुगतान करना होगा।’ ग्रेटर नोएडा में ट्रांसपोर्ट का कारोबार करने वाले शख़्त ने बताया कि 2016 में नोटबंदी के दौरान भी उसका नोट बदलने का यह धंधा ख़ूब फला-फूला था। एक अन्य दलाल, जिसे भी फ़र्ज़ी सौदे की पेशकश की गयी थी; शुद्ध हिन्दी में यह दावा करते हुए कि ‘30 करोड़ तक कह दिये हैं मैंने’, नोट बदलने के लिए सहमत हो गया।
सन् 2016 के विमुद्रीकरण के बाद सीबीआई और ईडी ने रद्द किये गये नोटों के अवैध विनिमय और धनशोधन में लिप्त होने के आरोप में कुछ बैंक अधिकारियों सहित कई लोगों को गिरफ़्तार किया था। नक़दी माफ़िया का फिर से उभरना इस अवैध धंधे पर दोबारा कार्रवाई की ज़रूरत को उजागर करता है।
बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन है, तो ध्यान दीजिए कि वे उसका सदुपयोग कर रहे हैं या दुरुपयोग? स्मार्टफोन फोन सभी के जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन बच्चों के हाथ में देर तक स्मार्टफोन रहना घातक साबित हो रहा है। सभी स्मार्टफोन में रिचार्ज के साथ इंटरनेट डाटा होना बच्चों के लिए दिलचस्प बना हुआ है, जिसके चलते वो दिन भर सोशल मीडिया और वीडियो गेमों में लगे रहते हैं।
पढ़ाई के नाम पर बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन देने वाले ज़्यादातर माँ-बाप इस बात को जानते हुए भी कि उनका बच्चा सोशल मीडिया पर समय बर्बाद कर रहा, कुछ नहीं कहते। माँ-बाप की यह एक ग़लती बच्चों का जीवन बर्बाद कर रही है। बच्चों को लेकर किये गये एक अध्ययन के मुताबिक, जो बच्चे सोशल मीडिया पर ज़्यादा समय तक एक्टिव रहते हैं या जो बच्चे वीडियो गेम खेलने में ज़्यादा समय बर्बाद करते हैं, उनकी दिमाग़ी सेहत पर बुरा असर पड़ता है।
स्वास्थ्य विशेषजों का सुझाव है कि स्मार्टफोन पर ज़्यादा समय नष्ट करने वाले बच्चे कई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। वे मोटापा, चिड़चिड़ापन, आलस, अनिद्रा, आँखों की कमज़ोरी जैसी बीमारियों के शिकार होने के साथ-साथ भूख-प्यास न लगने जैसी परेशानियों के शिकार हो रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, आज के समय में 40 फ़ीसदी बच्चे सोशल मीडिया और वीडियो गेम्स में अपना अधिकतर समय बर्बाद कर रहे हैं। शोध रिपोट्र्स की मानें, तो तीन साल से 15 साल तक के 45 फ़ीसदी बच्चे चार से पाँच घंटे हर दिन सोशल मीडिया पर वीडियो देखने और वीडियो गेम खेलने में लगा रहे हैं। भारत में ऐसे बच्चों की संख्या शहरों में ज़्यादा है, जो स्मार्ट फोन पर अपनी पढ़ाई के समय का बड़ा हिस्सा नष्ट कर रहे हैं।
कुछ महीने पहले अमेरिकी सर्जन विवेक मूर्ति ने चेतावनी वाली एक सलाह जारी करके कहा कि सोशल मीडिया बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं है। उन्होंने कहा कि आजकल बच्चे सोशल मीडिया का काफ़ी ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, जो उनके दिमाग़ को जकड़ रहा है और उनकी दिमाग़ी सेहत को बड़ा नुक़सान पहुँचा रहा है। यह सभी जानते हैं कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया सुरक्षित नहीं है। इससे बच्चे न सिर्फ़ बिगड़ सकते हैं, बल्कि बीमार, आलसी और आवारा भी हो सकते हैं। यह बात माँ-बाप को समझने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
हालाँकि कुछ बच्चे एनड्रायड मोबाइल पर पढ़ाई भी कर रहे हैं और वे काफ़ी कुछ सीख रहे हैं। लेकिन फिर भी मोबाइल को बहुत लम्बे समय तक देखते रहने से आँखों की रोशनी तो कम होती ही है, आँखों का रेटिना कमज़ोर होता है और दिमाग़ में तनाव पैदा होता है। इसलिए पढऩे वाले बच्चों को मोबाइल से सिर्फ़ दो से तीन घंटे ही पढऩा चाहिए। इससे ज़्यादा समय तक मोबाइल का उपयोग करना कई तरह से नुक़सानदायक साबित हो सकता है।
अक्सर देखा जाता है कि बच्चे मोबाइल को छोडऩा नहीं चाहते। वे अगर वीडियों देखने लगते हैं, तो घंटों तक वीडियो देखते रहते हैं और अगर वीडियो गेम खेलने लगते हैं, तो घटों तक खेलते ही रहते हैं। इससे उनका स्ट्रेस भी बढ़ता है, आँखों को भी नुक़सान होता है, एक जगह बैठे या लेटे रहने से शरीर की कोशिकाएँ भी काम करना बन्द कर देती हैं और इससे बच्चे खाना-पीना भी भूल जाते हैं।
आजकल देखा जाता है कि जो बच्चे चल भी नहीं पाते, वे भी मोबाइल देखने के आदि हो जाते हैं। छोटे-छोटे बच्चे मोबाइल के कई फंक्शन ऑन करना जानते हैं। अगर मोबाइल को लॉक कर दो, तो वे उसे भी आसानी से खोल लेते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस तकनीकि युग में पैदा हुए बच्चे बहुत समझदार हैं। लेकिन वो लोग यह नहीं समझते कि हर युग के बच्चे अपने युग की टेक्निक से वाक़िफ़ होते हैं; लेकिन आज इस टेक्निक ने बच्चों के शारीरिक विकास और उनकी सेहत से बड़ा खिलवाड़ किया है, जिसके चलते मानसिक रूप से भले ही मज़बूत हों; लेकिन तन-मन से बहुत कमज़ोर होते जा रहे हैं। उनका कॉन्फिडेंट लेवल भी घट रहा है और पढऩे की आदत भी छूटती जा रही है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रेखा कहती हैं कि सोशल मीडिया पर अधिक समय तक सक्रिय रहने वाले बच्चे आभासी दुनिया में भावुक और रिश्तों की दुनिया में कठोर होते जा रहे हैं। इसलिए बच्चों को इस जादुई ख़तरनाक चीज़ से जितनी दूर रखो, उतना अच्छा है। अगर कोई बच्चा मोबाइल से पढ़ाई भी कर रहा है, तो उसे 1-2 घंटे से ज़्यादा मोबाइल से नहीं पढऩा चाहिए। माँ-बाप को चाहिए कि वे बच्चों को ज़्यादातर किताबों से पढऩे का आदि बनाएँ। फिर भी अगर मोबाइल से पढ़ाई करनी ज़रूरी हो, तो ज़्यादा-से-ज़्यादा 2-3 घंटे ही उन्हें सिर्फ़ पढऩे के लिए मोबाइल दें। जब बच्चे मोबाइल से पढ़ाई कर रहे हों, तो उनकी आँखों पर प्रोटेक्टिव लैंस लगाने को कहें। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर धवल कहते हैं कि कुछ बच्चों में मोबाइल की इतनी बुरी लत लग चुकी है कि वे बीमार होने पर भी मोबाइल देखना नहीं भूलते। हमारे हॉस्पिटल में जो बीमार बच्चे आते हैं, उनमें से अधिकतर में देखा गया है कि उनके हाथ में मोबाइल देने के बाद वो आसानी से इंजेक्शन लगवा लेते हैं। हालाँकि यह ग़लत है; लेकिन जिन बच्चों को मोबाइल में वीडियों देखने की आदत बन चुकी है, उन्हें वीडियो देखे बगैर उनका इलाज करना मुश्किल हो जाता है। कई लोग तो अपने बच्चों की बहुत ज़्यादा मोबाइल देखने की आदत छुड़ाने की सलाह भी माँगते हैं।
डॉक्टर मनीश कहते हैं कि एनड्रायड मोबाइल बच्चों को चुपके से डस रहा है, जिसकी ख़बर माँ-बाप को नहीं लग रही है। समझदार माँ-बाप बच्चों को इस आधुनिक हथियार से अपने बच्चों को दूर रखने की कोशिश करते हैं; लेकिन यह इतना आसान नहीं है। हालाँकि बच्चों को इससे दूर नहीं किया जा सकता, तो इसके ज़्यादा इस्तेमाल से तो रोका ही जा सकता है। आज क़रीब 30 प्रतिशत बच्चे एंग्जायटी और डिप्रेशन के शिकार एनड्रायड फोन पर सोशल मीडिया के इस्तेमाल से हो रहे हैं। एनड्रायड मोबाइल के ज़्यादा इस्तेमाल से बच्चे निगेटिव सोच से भर रहे हैं। मोबाइल हाथ में होने से वो पढऩे से कतराते हैं और किसी काम में उनका मन नहीं लगता। इसलिए ये ज़िम्मेदारी माँ-बाप की है कि वे बच्चों को जब भी मोबाइल इस्तेमाल के लिए दें, तो इस बात का ध्यान रखें कि उनके बच्चे मोबाइल पर क्या कर रहे हैं।
अब तक इसे लेकर किये गये कई अध्ययन किये गये हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि माँ-बाप 3 से 17 साल तक के बच्चों को मोबाइल दूर रखें। अगर बहुत ज़रूरी हो, तो सिर्फ़ ज़रूरत के हिसाब से ही उन्हें फोन दें। यदि बच्चे फोन नहीं छोडऩा चाहते, तो उन्हें खेल-कूद और रचनात्मक कामों में लगाने की कोशिश करें, ताकि उनकी ज़िन्दगी बर्बाद होने से बच सके।
समान नागरिक संहिता को 2024 के चुनावी रण का मास्टर स्ट्रोक बनाने की तैयारी में भाजपा
भाजपा को पता है कि 2024 में उसे सत्ता तश्तरी में रखी नहीं मिलेगी। देश में राजनीतिक स्थितियाँ हाल के महीनों में भाजपा के लिए उतनी सुखद नहीं रही हैं। यदि इस साल के विधानसभा चुनावों में उसे जीत नहीं मिलती है, तो आम चुनाव की उसकी डगर कठिन हो सकती है। लिहाज़ा भाजपा इन चुनावों से पहले ऐसा कार्ड तैयार रखना चाहती है, जो उसके लिए संजीवनी का काम कर सके। इसके लिए उसने सम्भवत: समान नागरिक संहिता को चुना है और इस पर तैयारी शुरू कर दी है। बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-
ट्रिपल तलाक़, जम्मू-कश्मीर में धारा-370 और राम मंदिर निर्माण जैसे अपने एजेंडे पर काम करने के बाद भाजपा ने अब समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर नज़र टिका दी है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में उसने इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल किया था, जबकि उत्तराखण्ड में उसकी सरकार संहिता तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है।
भाजपा समान नागरिक संहिता को अगले लोकसभा चुनाव से पहले ला सकती है; क्योंकि उसका लक्ष्य 2024 में एनडीए-3 सरकार सुनिश्चित करना है। हालाँकि मोदी सरकार इसे किस रूप में लाती है, यह बहुत महत्त्वपूर्ण होगा। भाजपा, जिसमें पार्टी के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल हैं; का यूसीसी राग लोकसभा ही नहीं, बल्कि इस साल होने वाले विधानसभा के चुनाव के लिए भी है। क्योंकि भाजपा महसूस करती है कि उसकी स्थिति उतनी बेहतर नहीं है।
यदि समान नागरिक संहिता भाजपा के हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे के हिसाब से हुई, तो निश्चित ही विपक्षी दल, अन्य धार्मिक और सामाजिक संगठन इसका विरोध करेंगे। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि 21वें विधि आयोग ने मार्च, 2018 में जनता के साथ विमर्श के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि फ़िलहाल समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की ज़रूरत देश को नहीं है। अब पाँच साल बाद 22वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर आम जनता से विमर्श की प्रक्रिया शुरू कर दी है, और 15 जुलाई तक लोगों से विचार माँगे हैं। क़ानून और न्याय की संसदीय समिति ने भी यूसीसी मामले में 3 जुलाई को बैठक बुलायी है, जिसमें सुशील मोदी की अध्यक्षता में विधि आयोग और कमेटी के सदस्य भी रहेंगे। विधि आयोग को अब तक साढ़े आठ लाख से अधिक सुझाव मिल चुके हैं। समान नागरिक संहिता इसलिए देश में चर्चा के केंद्र में आ गयी है, क्योंकि इसके लागू होने के बाद देश में रहने वाले हर नागरिक के लिए समान क़ानून लागू होगा। यूसीसी में पर्सनल लॉ या विरसे के क़ानून, गोद लेने और उत्तराधिकार से जुड़े क़ानूनों को एक समान संहिता से संचालित किये जाने की संभावना है। चूँकि समान नागरिक संहिता भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र का अहम हिस्सा रही है। ज़्यादातर जानकारों को लगता है कि इसका प्रारूप उसे चुनावी लाभ देने की दृष्टि वाला बनाया जा सकता है। ऐसे में अन्य धार्मिक संगठन, जिनकी अपनी धार्मिक संहिता (पर्सनल लॉ) हैं; इस पर विरोध कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 जून को मध्य प्रदेश भाजपा के ‘मेरा बूथ, सबसे मज़बूत’ अभियान के तहत पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच अपने सम्बोधन में समान नागरिक संहिता का ज़ोरदार पक्ष लिया और ज़ोर देकर कहा कि एक ही देश में दो क़ानून नहीं हो सकते। चुनाव भाषणों को छोड़ दें, तो हाल के वर्षों में यह पहला मौक़ा है, जब प्रधानमंत्री मोदी इस तरह समान नागरिक संहिता पर बोले हैं। चूँकि विधि आयोग ने इससे जुड़ी प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दी है, मोदी का इस तरह इस पर बोलना महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
विपक्ष का सवाल है कि जब पाँच साल पहले इसी सरकार के समय विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा था कि देश को समान नागरिक संहिता की ज़रूरत नहीं है, तो अब ऐसी क्या स्थिति पैदा हो गयी कि इसे लागू किया जाए? विपक्ष के मुताबिक, संहिता लागू होने से देश में कई तरह के विवाद के पिटारे खुल जाएँगे। भाजपा का कहना है कि समान नागरिक संहिता देश में बराबरी का रास्ता खोलेगी और इसमें ग़लत क्या है? पार्टी के मुताबिक, इससे बेहतरी का रास्ता खुलेगा। बता दें कि विधि आयोग ने सन् 2016 में जब इस मुद्दे पर विचार विमर्श की प्रक्रिया शुरू की थी, तो क़रीब दो साल का समय लगा था। जनता, जिसमें तमाम धार्मिक और सामाजिक समूह शामिल हैं; के सुझावों के बाद उसने मार्च, 2018 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें साफ़तौर पर कहा गया था कि फ़िलहाल समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की ज़रूरत देश को नहीं है। हालाँकि इस रिपोर्ट में पारिवारिक क़ानून (फैमिली लॉ) में सुधार की बात ज़रूर कही गयी थी।
73साल पहले हुई गहन चर्चा
अब जब यूसीसी की चर्चा भारत में बहुत तेज़ी से हो रही है, तो दिलचस्प बात यह है कि आज से 73 साल पहले 23 नवंबर, 1948 को देश की संसद में इस विषय पर गहन चर्चा हुई थी। उस समय सवाल यह था कि क्या समान नागरिक संहिता को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं? लम्बी बहस के बाद भी इस पर कोई राय नहीं बन पायी। कारण था देश का बहुलवादी होना। जब इस पर कोई नतीजा नहीं निकल पाया, तो यह मुद्दा टाल दिया गया। एक कार्यकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें यूसीसी लागू कराने की माँग की गयी थी।
हालाँकि 7 दिसंबर, 2015 को अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को देश में यूसीसी लागू करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था और कहा था कि क़ानून बनाने का काम संसद का है।
इसके बाद इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात और उत्तराखण्ड में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए कमेटी के गठन को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दी। याचिकाकर्ता अनूप बरनवाल ने अपनी याचिका में राज्यों की इस पहल को चुनौती दी थी। प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि आर्टिकल 162 के तहत राज्यों को कमेटी के गठन का अधिकार है। अगर राज्य ऐसा कर रहे हैं, तो इसमें क्या ग़लत है। सिर्फ़ कमेटी के गठन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
दरअसल उत्तराखण्ड सरकार ने मई, 2022 में सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति को राज्य में समान नागरिक संहिता के अध्ययन और क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी सौपी गयी थी। यही नहीं, गुजरात सरकार ने भी अक्टूबर, 2022 में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए समिति गठित करने का फ़ैसला किया था। यही नहीं शादी, तलाक़, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार के लिए सभी धर्मों में एक समान क़ानून लागू करने की माँग वाली याचिका भी वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में डाली है।
मध्य प्रदेश के भाजपा कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए जब प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी इसे लागू करने की बात कर चुका है, तो वास्तव में यह उत्तराखण्ड सरकार के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के आधार पर ही कहा गया है। भाजपा के अन्य नेता भी इसी को आधार बनाकर इसका समर्थन करते हैं।
धार्मिक समूह सक्रिय
समान नागरिक संहिता की चर्चा तेज़ होने के साथ ही धार्मिक समूह भी सक्रिय हो गये हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 27 जून को इस विषय पर चर्चा के लिए बैठक की। यह उसकी इस तरह की पहली बैठक थी। कोई तीन घंटे की इस बैठक में संहिता के तमाम क़ानूनी पहलुओं पर चर्चा की गयी। बैठक में बोर्ड से जुड़े तमाम वकील मौज़ूद थे। इसमें फ़ैसला किया गया ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर एक ड्राफ्ट तैयार करेगा। साथ ही बोर्ड से जुड़े लोग विधि आयोग के अध्यक्ष से मिलने का समय माँगेगे। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जो ड्राफ्ट तैयार करेगा, उसे विधि आयोग को सौंपा जाएगा। जानकारी के मुताबिक, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने ड्राफ्ट पर मुख्य फोकस शरीयत के ज़रूरी हिस्सों पर रखेगा। दिलचस्प यह है कि बोर्ड की इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के मध्य प्रदेश के पार्टी कार्यकर्ताओं को दिये गये भाषण का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें उन्होंने समान नागरिक संहिता को लागू करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था।
मोदी के बयान के बाद एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल किया कि प्रधानमंत्री पाकिस्तान से प्रेरणा क्यों ले रहे हैं? ओवैसी ने पूछा कि क्या यूसीसी के नाम पर देश के बहुलवाद और विविधता को छीन लिया जाएगा? सरकार का कहना है कि विधि आयोग सिविल कोड को लेकर संजीदगी से विचार कर रहा है। कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद सरकार सभी सम्बन्धित पक्षों से बात करेगी। लेकिन इसे लागू करने के बारे में फ़ैसला संसद को लेना है। कोई बाहरी अथॉरटी उसे क़ानून बनाने के लिए निर्देश नहीं दे सकती। हाल के वर्षों में संसद में बिल लाकर धारा-370 ख़त्म करने जैसे फ़ैसले मोदी सरकार ने किये हैं, उन्हें देखते हुए इस बात में कोई संदेह नहीं कि ऐसा ही वह समान नागरिक संहिता को लेकर भी कर सकती है।
आने वाले दिनों में अन्य धार्मिक समूह भी इस पर बैठकें करके विधि आयोग के सम्पर्क कर सकते हैं, जिनमें वह अपना धार्मिक पक्ष रखेंगे। ऐसे में यह चीज़ ही मायने रखेगी कि विधि आयोग सबकी बात सुनकर क्या रिपोर्ट देता है। इसके बाद सरकार उसमें अपने हिसाब से चीज़ें जोड़ या हटा सकती है। संसद में जब इससे जुड़ा बिल पेश किया जाएगा, उसे देखकर ही पता चलेगा कि सरकार ने किसकी कितनी सुनी या अपने एजेंडे के हिसाब से ही बिल लाया। ज़ाहिर है संसद में इस पर जबरदस्त बहस और हंगामे की सम्भावना रहेगी।
भाजपा की तैयारी
प्रधानमंत्री मोदी के यूसीसी पर बोलने के बाद अब यह माना जा रहा है कि भाजपा इसे लागू करके 2024 के चुनाव में अपना मुख्य मुद्दा बना सकती है। भाजपा के ही बीच तेज़ चर्चा है कि लोकसभा के मानसून सत्र में भी इसे संसद में लाया जा सकता है। समान नागरिक संहिता-1998 के आज तक भाजपा के सभी चुनाव घोषणा-पत्रों का हिस्सा रहा है। नवंबर, 2019 में पार्टी सदस्य नारायण लाल पंचारिया ने इससे जुड़ा विधेयक संसद में पेश किया था। हालाँकि विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया।
एक साल बाद ही मार्च, 2020 में संसद सदस्य किरोड़ी लाल मीणा एक बार फिर बिल लेकर आये; लेकिन संसद में इसे पेश ही नहीं किया। विवाह, तलाक़, गोद लेने और उत्तराधिकार से सम्बन्धित क़ानूनों में समानता की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी याचिकाएँ दायर की गयी हैं।
सन् 2018 के विधि आयोग के परामर्श पत्र में माना था कि देश में कई परिवार क़ानून व्यवस्थाओं के भीतर की प्रथाएँ महिलाओं से भेदभाव करती हैं और उन्हें देखने की ज़रूरत है। भाजपा विपक्ष के यूसीसी को लेकर विरोध पर सावधानी भी बरत रही है।
हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक बैठक में मध्य प्रदेश में भाजपा नेताओं से विपक्ष के यूसीसी को लेकर विपक्ष के अभियान के ख़िलाफ़ अपना पक्ष मज़बूती से रखने को कहा है। कारण यह है कि मध्य प्रदेश सहित देश में कई जगह आदिवासी बहुल सीटें हैं और विपरीत अभियान भाजपा को नुक़सान कर सकता है। बैठक में आरएसएस ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा को सुझाव दिया कि नवंबर के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों और अनुसूचित जाति (एससी)-बहुल सीटों पर भाजपा की संभावनाओं को नुक़सान पहुँचाने वाले ऐसे अभियानों का मुक़ाबला करने के लिए सभी बूथ स्तर की इकाइयों को शिक्षित किया जाना चाहिए।
बैठक में विद्या भारती, संस्कार भारती और वनवासी कल्याण परिषद् सहित आरएसएस के 22 सहयोगी संगठनों ने हिस्सा लिया। याद रहे पिछले साल भारत जोड़ो यात्रा में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने मध्य प्रदेश की एक रैली में भाजपा पर हमला करते हुए कहा था कि वह आदिवासियों को वनवासी कहती है; लेकिन कांग्रेस आपको आदिवासी कहती है, अर्थात् भारत में मूल हितधारक और देश के संसाधनों के स्वामी। राहुल ने कहा था कि वे (भाजपा) यह कहकर उनके (आदिवासी) अधिकार उनसे छीन लेते हैं कि तुम्हारी भूमि न कभी तुम्हारी थी, और न कभी तुम्हारी होगी।
किन देशों में है यूसीसी?
कहाँ भारत में इसी साल के आख़िर तक यूसीसी लागू करने की संभावना जतायी जा रही है; वहीं दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जहाँ समान नागरिक संहिता पहले से लागू है। इनमें प्रगतिशील माने जाने वाले अमेरिका से लेकर राजकीय धर्म इस्लाम मानने वाले मिस्र तक शामिल हैं। अमेरिका और मिस्र के अलावा आयरलैंड, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्किये, इंडोनेशिया, सूडान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया आदि शामिल हैं। इन देशों में यूसीसी के तहत क़ानून सभी नागरिकों के लिए समान हैं। हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस जैसे देशों में देश के क़ानूनों का दूसरे धर्मों के लोगों को सख़्ती से पालन करने की हिदायत दी जाती रही है।
क्या हैं पेचीदगियाँ?
देश की स्वतंत्रता के बाद एक से ज़्यादा बार समान नागरिक संहिता की निजी (धार्मिक/सामाजिक) क़ानूनों में सुधार का मुद्दा उठा है। यदि सिर्फ़ समान नागरिक संहिता की ही बात की जाए, तो इसे लागू करने में कई चुनौतियाँ हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह मसला जम्मू कश्मीर में धारा-370 ख़त्म करने से भी कहीं ज़्यादा उलझा हुआ है।
धार्मिक समूह तो विरोध करेंगे ही, इस पर राजनीतिक सहमति बनाना भी बहुत मुश्किल काम होगा। साथ ही देश के क़ानूनों के भीतर ही कई विरोधाभास हैं। विवाह, तलाक़, गोद लेने, विरासत और उत्तराधिकार जैसे देश में ऐसे कई मामले हैं, जिनमें भरपूर धार्मिक हस्तक्षेप है। 31 अगस्त, 2018 को 21वें विधि आयोग ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि यह ध्यान रखना होगा कि सांस्कृतिक विविधता से इस हद तक समझौता नहीं हो कि एकरूपता की कोशिश ही ख़तरे का कारण बन जाए।
यूसीसी का मतलब प्रभावी रूप से विवाह, तलाक़, गोद लेने, संरक्षण, उत्तराधिकार, विरासत इत्यादि से जुड़े क़ानूनों को व्यवस्थित करना होगा। इसमें देश भर में संस्कृति, धर्म और परम्पराओं को देखना होगा। कई जनहित याचिकाएँ अभी सुप्रीम कोर्ट में लम्बित हैं। इनमें महिलाओं की सुरक्षा के साथ तलाक़, गार्जियनशिप (अभिभावक्ता) और उत्तराधिकार से सम्बन्धित क़ानूनों के नियमित करने की माँग की जा रही है। मुस्लिम महिलाओं की ओर से दायर कई याचिकाओं में इस्लामिक क़ानून में भेदभाव उजागर होता है। इनमें तत्काल तलाक़ (तलाक़-ए-बेन), अनुबंध विवाह (मुता), और दूसरे पुरुष से अल्पकालिक विवाह (निकाह हलाला) जैसी भेदभावपूर्ण प्रथाएँ शामिल हैं।
तीन तलाक़ का क़ानून आ जाने के तीन साल बाद भी यह हो रहा है। यही नहीं, सिखों के विवाह क़ानून-1909 के आनंद कारज, विवाह अधिनियम के तहत आते हैं। लेकिन उनमें तलाक़ के प्रावधानों का अभाव है। इसके कारण सिख तलाक़ हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत ही होते हैं। प्रॉपर्टी, उत्तराधिकार और अन्य कई मामलों में भी अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग तरह के क़ानून हैं।
यूसीसी लागू करने में यही पेच है। जानकार मानते हैं कि देश में इतने धर्मों के होते हुए समान नागरिक संहिता बनाना मुश्किल काम रहेगा, क्योंकि संविधान में मिले धर्म की आज़ादी और समानता के अधिकार के बीच संतुलन बनाना बेहद कठिन रहेगा। ज़ाहिर है समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो इसके चलते धर्म और जातीय आधार वाले निजी क़ानून अस्तित्व खो देंगे। केंद्र ने पिछले साल समान नागरिक संहिता पर उच्चतम न्यायालय में अपने हलफ़नामे में कहा था कि विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों के लोग अलग-अलग सम्पत्ति और वैवाहिक क़ानूनों का पालन करते हैं, जो ‘देश की एकता के ख़िलाफ़’ है।
अक्टूबर, 2022 में एक याचिका के जवाब में दायर हलफ़नामे में केंद्रीय क़ानून और न्याय मंत्रालय ने कहा था कि अनुच्छेद-44 (यूसीसी) संविधान की प्रस्तावना में निहित धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के उद्देश्य को मज़बूत करता है। मंत्रालय ने शीर्ष अदालत में कहा था कि विषय वस्तु के महत्त्व और इसमें शामिल संवेदनशीलता को देखते हुए विभिन्न समुदायों को नियंत्रित करने वाले विभिन्न व्यक्तिगत क़ानूनों के प्रावधानों के गहन अध्ययन की आवश्यकता है। केंद्र ने भारत के विधि आयोग से यूसीसी से सम्बन्धित मुद्दे की जाँच करने और उनकी सि$फारिश करने का अनुरोध किया था।
यूसीसी से क्या बदलेगा?
लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ेगी, ताकि वह कम-से-कम ग्रेजुएट हो जाएँ। ग्राम स्तर पर शादी के पंजीकरण की सुविधा होगी। बिना पंजीकरण सरकारी सुविधा बंद हो जाएगी। पति-पत्नी दोनों को तलाक़ के समान आधार और अधिकार होंगे। बहु-विवाह पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी। उत्तराधिकार में लडक़े-लडक़ी की बराबर की हिस्सेदारी (पर्सनल लॉ में लडक़े का शेयर ज़्यादा होता है) होगी। नौकरीपेशा बेटे की मौत पर पत्नी को मिलने वाले मुआवज़े में माता-पिता के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी भी शामिल होगी। पत्नी की मौत के बाद उसके अकेले माता-पिता का सहारा महिला का पति बनेगा। मुस्लिम महिलाओं को गोद लेने का हक़ मिलेगा, प्रक्रिया आसान कर दी जाएगी। हलाला और इद्दत पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी। लिव-इन रिलेशन का डिक्लेरेशन देना होगा। बच्चे के अनाथ होने पर गार्जियनशिप की प्रक्रिया आसानी की जाएगी। पति-पत्नी में झगड़े होने पर बच्चे की कस्टडी ग्रैंड पैरेंट्स (दादा-दादी या नाना-नानी) को दी जाएगी। जनसंख्या नियंत्रण पर भी बात होगी।
क्या है समान नागरिक संहिता?
संविधान के अनुच्छेद-44 में समान नागरिक संहिता की चर्चा की गयी है। राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व से सम्बन्धित इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। समान नागरिक संहिता में देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान क़ानून होता है, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक़ और ज़मीन-जायदाद के बँटवारे आदि में सभी धर्मों के लिए एक ही क़ानून लागू होता है। अभी देश में जो स्थिति है, उसमें सभी धर्मों के लिए अलग-अलग नियम हैं। सम्पत्ति, विवाह और तलाक़ के नियम हिन्दुओं, मुस्लिमों और ईसाइयों के लिए अलग-अलग हैं। इस समय देश में कई धर्म के लोग विवाह, सम्पत्ति और गोद लेने आदि में अपने पर्सनल लॉ का पालन करते हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का अपना-अपना पर्सनल लॉ है, जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं।
देश में धार्मिक क़ानून
हिन्दू विवाह अधिनियम-1955
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम-1956
हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम-1956
हिन्दू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम-1956
काज़ी अधिनियम-1880
शरीयत अधिनियम-1937
मुस्लिम विवाह अधिनियम-1939
मुस्लिम महिला (तलाकों पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम-1986
भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम-1872
पारसी विवाह और तलाक़ अधिनियम-1936
पक्ष में तर्क
धार्मिक आधार के पर्सनल लॉ संविधान की पंथनिरपेक्ष की भावना का उल्लंघन करते हैं।
हर नागरिक को अनुच्छेद-14 के तहत क़ानून के समक्ष समानता का अधिकार, अनुच्छेद-15 में धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव की मनाही और अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और निजता के संरक्षण का अधिकार है।
समान नागरिक संहिता न होने से महिलाओं के मूल अधिकार का हनन होता है। जिसमें शादी, तलाक़, उत्तराधिकार शामिल हैं। लैंगिक समानता सामाजिक समानता के लिए ज़रूरी है।
मुस्लिम महिलाएँ धर्म के आधार पर चल रहे पर्सनल लॉ की वजह से हिंसा और भेदभाव का शिकार होती हैं। उन्हें बहु-विवाह और हलाला जैसी प्रथाओं का दंश झेलना पड़ रहा है।
विरोध में तर्क
21वें विधि आयोग ने कहा था कि यूसीसी न तो आवश्यक है और न ही यह वांछनीय है। व्यक्तिगत क़ानूनों में भेदभाव और असमानता से निपटने के लिए सभी धर्मों में मौज़ूदा पारिवारिक क़ानूनों को संशोधित और संहिताबद्ध किया जाना चाहिए।
अल्पसंख्यक समुदाय यूसीसी का खुलकर विरोध करता रहा है। संविधान के मौलिक अधिकार के तहत अनुच्छेद-25 से 28 के बीच हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है।
मुस्लिम इसे अपने धार्मिक मामलों में दख़ल मानते हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल हमेशा से यूसीसी को असंवैधानिक और अल्पसंख्यक विरोधी बताता रहा है। बोर्ड का मत है कि संविधान हर नागरिक को अपने धर्म के मुताबिक जीने की अनुमति देता है। इसी कारण अल्पसंख्यकों और आदिवासी वर्गों को अपने रीति-रिवाज़, आस्था और परम्परा के मुताबिक अलग पर्सनल लॉ के पालन करने की छूट है।
तीन बड़े मामले
पहला मामला 1985 का शाह बानो का है। इस मामले में तलाक़ में मुस्लिम महिला के अधिकारों के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद को एक समान नागरिक संहिता की रूपरेखा को रेखांकित करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया था कि समान नागरिक संहिता एक अनसुलझी संवैधानिक अपेक्षा बनी हुई है। दूसरा, सन् 1995 का सरला मुद्गल मामला है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘संविधान के अनुच्छेद-44 के अंतर्गत व्यक्त की गयी संविधान निर्माताओं की इच्छा को पूरा करने में सरकार और कितना समय लेगी? उत्तराधिकार और विवाह को संचालित करने वाले परम्परागत हिन्दू क़ानून को बहुत पहले ही 1955-56 में संहिताकरण करके अलविदा कर दिया गया है। देश में समान नागरिक संहिता को अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित करने का कोई औचित्य नहीं है। कुछ प्रथाएँ मानवाधिकार और गरिमा का अतिक्रमण करती हैं। धर्म के नाम पर मानवाधिकारों का गला घोटना निर्दयता है, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मज़बूत करने के लिए नितांत आवश्यक है। तीसरा मामला 2003 का जॉन बलवत्तम मामला है। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘यह दु:ख की बात है कि अनुच्छेद-44 को आज तक लागू नहीं किया गया। संसद को अभी भी देश में एक समान नागरिक संहिता लागू के लिए क़दम उठाना है।
एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते। कोई भी देश दो क़ानूनों के आधार पर नहीं चल सकता। यदि ट्रिपल तलाक़ इस्लाम का अभिन्न अंग है, तो उसका पालन मुस्लिम-बहुल देशों मिस्र, इंडोनेशिया, क़तर, जॉर्डन, सीरिया, बांग्लादेश और पाकिस्तान में क्यों नहीं किया जाता और 90 फ़ीसदी सुन्नी मुस्लिम आबादी वाले मिस्र में ट्रिपल तलाक़ को 80-90 साल पहले ही ख़त्म कर दिया गया था। जो ट्रिपल तलाक़ की वकालत करते हैं, वे वोट बैंक के भूखे हैं, और मुस्लिम बेटियों के साथ घोर अन्याय कर रहे हैं। ऐसे ही यूसीसी का विरोध करने वाले लोग अपने हित साधने के लिए कुछ लोगों को भडक़ा रहे हैं। भारतीय मुसलमानों को समझना होगा कि कौन-से राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए उन्हें भडक़ा रहे हैं और नष्ट कर रहे हैं। हमारा संविधान भी सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों की बात करता है, और सुप्रीम कोर्ट ने भी यूसीसी लागू करने को कहा है। इसकी आलोचना करने वाले यदि वास्तव में मुसलमानों के शुभचिन्तक होते, तो समुदाय के अधिकांश परिवार शिक्षा और रोज़गार में पिछड़ नहीं रहे होते और कठिन जीवन जीने को मजबूर नहीं होते।’’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
(समान नागरिक संहिता पर मध्य प्रदेश में)
समान नागरिक संहिता को लोगों पर थोपा नहीं जा सकता। प्रधानमंत्री ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि यूसीसी साधारण प्रक्रिया है। उन्हें पिछले विधि आयोग की रिपोर्ट पढऩी चाहिए, जिसमें कहा गया है कि यह इस वक्त सही नहीं है। भाजपा की कथनी और करनी के कारण देश आज बँटा हुआ है। ऐसे में लोगों पर थोपा गया यूसीसी विभाजन को और बढ़ाएगा। एजेंडा आधारित बहुसंख्यक सरकार इसे लोगों पर थोप नहीं सकती।’’
पी. चिदंबरम
(कांग्रेस नेता एक ट्वीट में)
हमारे पास पूरे देश में एक समान और पूर्ण आपराधिक संहिता है, जो दण्ड संहिता और आपराधिक प्रक्रिया संहिता में निहित है। हमारे पास सम्पत्ति के हस्तांतरण का क़ानून है, जो सम्पत्ति और उससे जुड़े मामलों से सम्बन्धित है और पूरे देश में लागू है। फिर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट हैं; और मैं कई अधिनियमों का हवाला दे सकता हूँ, जो यह साबित करेंगे कि इस देश में व्यावहारिक रूप से एक नागरिक संहिता है, इनके मूल तत्त्व एक समान हैं और पूरे देश में लागू हैं। उन्होंने कहा कि सिविल क़ानून एकमात्र विवाह और उत्तराधिकार क़ानून का उल्लंघन करने के मामले में सक्षम नहीं हैं।’’
हिंसा की आग में मणिपुर जल रहा है। लगभग दो महीने से वहाँ हिंसा भडक़ी हुई है। इतनी बुरी तरह कभी यह पूर्वोत्तर राज्य नहीं जला। गाँव के गाँव उजड़ गये हैं। खेती, व्यवसाय ठप हो गये हैं। सम्पत्ति तथा पशुओं का भारी नुक़सान हुआ है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार अब तक 120 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। 3,000 से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं। वहीं स्थानीय जानकारियों के अनुसार, सैकड़ों लोग मारे गये हैं। बेघरों की गिनती भी कई गुना अधिक है। इस्तीफ़े की सियासत शुरू हो गयी है।
बर्बाद हो चुके घरों की संख्या भी कई सौ है। मणिपुर की मौज़ूदा सरकार की इससे बड़ी विफलता दूसरी नहीं हो सकती। विपक्षी पार्टियाँ मौज़ूदा भाजपा सरकार को बर्ख़ास्त करने की माँग कर रहे हैं। वहाँ के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह का इस्तीफ़ा माँग रहे हैं। ख़ुद वहाँ के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने हिंसा रोकने में अपनी विफलता स्वीकार करते हुए माफ़ी माँग ली है। दो मंत्रियों पर हमले हो चुके हैं। यह पहली बार है कि मणिपुर में इतनी भयानक हिंसा भडक़ी हुई है। यह भी पहली बार है कि मणिपुर धार्मिक हिंसा में जल रहा हो। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर कई बड़े केंद्रीय मंत्री मणिपुर हिंसा रोकने में नाकाम रहे हैं। हिंसा रोकने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को विपक्षी पार्टियों का आह्वान करना पड़ा। जिनके परिवार इस हिंसा का शिकार हुए हैं, वे सरकार से बचाव के लिए गुहार लगा रहे हैं। जो हिंसा पर उतरे हुए हैं, वे शान्त नहीं हो रहे हैं। हिंसा में उग्रवादी शामिल हो चुके हैं। प्रश्न यह है कि अब यह हिंसा रुकेगी कैसे?
आरक्षण को लेकर शुरू हुई यह हिंसा अब धार्मिक हिंसा में बदल गयी है। स्थानीय लोग सैन्य बलों तथा पुलिस का विरोध करने लगे हैं। विदित हो कि ये लड़ाई हिन्दू मैतई तथा ईसाई नगा, कुकी समुदायों के बीच भडक़ी है। अभी तक लगभग 200 चर्च और अधिकतर मंदिर नष्ट कर दिये हैं। जन साधारण को किसी भी प्रकार के हथियार रखने की मनाही है। वे सब्ज़ी काटने वाले चाकू, $फसल काटने वाली कुकरी, फावड़ा, जानवरों से रक्षा के लिए लाठी, डंडा आदि भी नहीं रख सकते। उनके पास समूह के रूप में हालात जानने तथा सैन्य, प्रशासन, पुलिस का निर्देश सुनने के लिए वॉकी-टॉकी हैं।
उग्रवादियों, उपद्रवियों के पास हथियार भी हैं तथा संख्या बल भी है। सुरक्षा बलों, पुलिस के विरोध में अब जनता भी उतर आयी है। कई जगहों पर स्थिति में सुधार के लिए चलाये जा रहे अभियानों को रोकना पड़ा है। 24 जून को सुरक्षाबलों ने 12 उग्रवादियों को पकड़ा था। परन्तु लगभग 1,500 महिलाओं ने सुरक्षा बलों को घेर लिया। अन्त में सुरक्षा बलों को गिरफ़्तार किये गये 12 उग्रवादियों को छोडऩा पड़ा। ये उग्रवादी समूह कांगलेई यावोल कन्ना लूप (केवाईकेएल) के थे। सुरक्षाबलों ने इन उग्रवादियों को गोला, बारूद तथा अन्य ख़तरनाक हथियारों के साथ पकड़ा था, परन्तु सैकड़ों की संख्या में एकजुट हुईं महिलाओं की भीड़ ने सुरक्षाबलों को घेर उग्रवादियों को छुड़वा दिया।
सुरक्षा बलों की शान्ति क़ायम करने के लिए सुरक्षा बलों तथा क़ानून की मदद करने की अपील पर भी महिलाएँ नहीं मानीं। घटना पूर्वी इंफाल ज़िले के इटहाम गाँव की है। 12 उग्रवादियों में 2015 में डोगरा की छठी बटालियन पर हमले का मास्टरमाइंड स्वघोषित लेफ्टिनेंट कर्नल मोइरंगथम तांबा उर्फ़ उत्तम भी था। केवाईकेएल एक प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन है। ये हिन्दू मैतई समुदाय का उग्रवादी समूह है। हाल की हिंसा में कई जगह आगजनी, हत्याओं, लूट तथा चर्चों को नष्ट करने में इस उग्रवादी समूह का हाथ रहा है। दूसरी ओर मंदिरों को नष्ट करने, लूटपाट करने, आगजनी तथा हत्याएँ करने में कुकी तथा नगा उग्रवादी समूहों ने भी कम उपद्रव नहीं किया है। हिंसा की स्थिति यह है कि मंत्री, नेता, सुरक्षाबल, पुलिस तथा जनता में कोई सुरक्षित नहीं है। 24 जून को भीड़ ने राज्य सरकार के खाद्य मंत्री एल. सुसींद्रो मैतई का एक निजी गोदाम फूँक दिया। वहाँ खड़े वाहनों को भी आग लगा दी। हमलावर भीड़ ने मंत्री के आवास में घुसने तथा उसमें आग लगाने की कोशिश की। सुरक्षाबलों ने बड़ी मुश्किल से आँसू गैस के गोले दागकर भीड़ को भगाया। कहा जा रहा है कि खाद्य मंत्री मैतई ने कुछ दिन पहले अपने आवास के बाहर एक बड़ा बॉक्स लगाकर हिंसक लोगों से उसमें अपने हथियार जमा कर अहिंसा की अपील की थी। इसी से नाराज़ लोगों ने उनके आवास पर हमला किया।
24 जून को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दोबारा सर्वदलीय बैठक बुलायी। इस बैठक में गृह मंत्री ने बताया कि मणिपुर की स्थिति सँभालने के लिए 36,000 सुरक्षाकर्मी तथा 40 आईपीएस अधिकारी तैनात किये गये हैं। 20 मेडिकल टीमें घायलों के इलाज के लिए भेजी गयी हैं। गृह मंत्री ने कहा कि मणिपुर में हिंसा की शुरुआत से एक दिन भी ऐसा नहीं रहा, जब हालात को लेकर मैंने प्रधानमंत्री मोदी से बात नहीं की हो या फिर प्रधानमंत्री ने शान्ति के निर्देश न दिए हों। इस सर्वदलीय बैठक में भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी, नित्यानंद राय, अजय कुमार मिश्रा, केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला तथा भाजपा के मणिपुर प्रभारी संबित पात्रा शामिल हुए।
विपक्षी पार्टियों की ओर से मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस नेता ओकराम इबोबी सिंह, तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन, मेघालय के मुख्यमंत्री एवं एनपीपी के नेता कोनराड संगमा, शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी, अन्नाद्रमुक नेता एम. थंबीदुरई, द्रमुक नेता तिरुचि शिवा, बीजद नेता पिनाकी मिश्रा, आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह, राजद नेता मनोज झा तथा ख़ुफ़िया ब्यूरो के निदेशक तपन डेका शामिल हुए। बैठक में विपक्षी पार्टियों ने प्रदेश में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की सलाह दी। हालाँकि सरकार ने इस पर कोई प्रतिबद्धता नहीं जतायी। कई विपक्षी पार्टियों ने मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को हटाने की माँग की, तो कुछ विपक्षी पार्टियों ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग की। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सरकार स्थिति सामान्य करने का पूरा प्रयास कर रही है। इस पर कांग्रेस ने इस बैठक को औपचारिकता करार दिया। कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि केंद्र सरकार को प्रदेश में शान्ति बहाली के लिए गम्भीर पहल करनी चाहिए। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह का तत्काल इस्तीफ़ा लेना चाहिए तथा प्रधानमंत्री को भी हिंसा पर चुप्पी तोडऩी चाहिए।
कांग्रेस नेता तथा मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने कहा कि बीरेन सिंह के मुख्यमंत्री रहते राज्य में शान्ति सम्भव नहीं है। उन्होंने केंद्र सरकार पर बैठक में बोलने के लिए अधिक समय न दिये जाने का आरोप भी लगाया। तृणमूल कांग्रेस ने प्रश्न किया कि क्या केंद्र सरकार मणिपुर को कश्मीर में बदलने की कोशिश कर रही है? राजद ने कहा कि मणिपुर की जनता को वहाँ के मुख्यमंत्री पर विश्वास नहीं रहा। शिवसेना (यूबीटी) ने भी यही कहा। शिवसेना (यूटीबी) ने कहा कि ख़ुद विदेश राज्य मंत्री राजकुमार रंजन सिंह राज्य में क़ानून-व्यवस्था चरमराने की बात स्वीकार कर चुके हैं। शिवसेना ने सवाल किया कि जवाबदेही की शुरुआत कहाँ से होगी? विदित हो कि मणिपुर की कुल जनसंख्या लगभग 38 लाख है। वहाँ के तीन प्रमुख समुदाय ही मैतई, नगा तथा कुकी हैं। मैतई हिन्दू हैं। वहीं नगा तथा कुकी ईसाई हैं। नगा तथा कुकी लगभग 50 प्रतिशत हैं। 90 प्रतिशत क्षेत्र में ये लोग रहते हैं। 10 प्रतिशत में मैतई समुदाय के लोग हैं। मैतई समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा चाहता है। अभी तक ये दर्जा कुकी तथा नगा समुदाय को मिला हुआ है। मैतई समुदाय ने मणिपुर हाई कोर्ट में याचिका लगायी कि सन् 1949 में मणिपुर का भारत में विलय हुआ, उससे पहले उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ था। अत: उन्हें दोबारा अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाए।
इसके बाद मणिपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मुद्दे पर विचार करने की सिफ़ारिश की। कुकी तथा नगा समुदाय ने इसके विरोध में जनजाति एकता रैली निकाली, जिस पर हमला हो गया। यहीं से हिंसा भडक़ी। यह 3 मई का मामला है। तबसे लगातार मणिपुर हिंसा की आग में जल रहा है। आरक्षण को लेकर शुरू हुई हिंसा अब धार्मिक हिंसा में बदल चुकी है। इसलिए इस हिंसा को शान्त करना आसान नहीं लग रहा है। इस हिंसा को शान्त करने के लिए क्या करना चाहिए, यह सरकार की समझ में नहीं आ रहा है।
मणिपुर हिंसा के बाद भी इस पर चुप रहने, चुनावी सभाएँ करने तथा विदेश यात्राओं पर जाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णय पर प्रश्न उठ रहे हैं। इतने पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप हैं। भाजपा का मणिपुर नेतृत्व, केंद्रीय नेतृत्व, असम नेतृत्व, उत्तराखण्ड नेतृत्व सब हिंसा की आग बुझाने में विफल साबित हुए हैं।
आशंका जतायी जा रही है कि मणिपुर में भडक़ी हिंसा दूसरे राज्यों में न फैल जाए। विपक्षी पार्टियाँ इसे भाजपा नेतृत्व की सबसे बड़ी विफलता मान रहे हैं तथा कह रहे हैं कि भाजपा सरकारें केवल लोगों को लड़ाना जानती हैं, शान्ति से शासन करना नहीं। हिंसा कराना भाजपा का पुराना इतिहास रहा है। इसमें कोई मतभेद नहीं कि मणिपुर हिंसा के शान्त होने तक केंद्र सरकार के असफल प्रयासों पर प्रश्न उठते रहेंगे। कहना पड़ेगा कि उसे इसके लिए उत्तरदायी होना भी चाहिए। निंदनीय यह है कि प्रधानमंत्री ने मणिपुर कुछ नहीं बोला। वह अमेरिका दौरे से लौटने के बाद मणिपुर की जगह चुनावी हित साधने मध्य प्रदेश चले गये। अमेरिका दौरे से पहले उन्होंने शान्ति दल को भी मिलने का समय नहीं दिया। राहुल गाँधी ने मणिपुर जाने की कोशिश की, तो उन्हें जाने नहीं दिया। हालाँकि वह मणिपुर गये और वहाँ के लोगों से मिले। राज्यपाल से भी मिले।
अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्तों में भारत को बरतनी चाहिए सावधानी
इसमें कोई दो-राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अमेरिकी सांसदों के ऑटोग्राफ लेने की तस्वीरें भारत में एक वर्ग को बहुत सुहाई होंगी। वे निश्चित ही इसे भारत की दुनिया में बढ़ रही ताक़त के रूप में देख रहे होंगे। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि इसे लोकप्रियता से जोडक़र देखा जाता है।
कुछ समय पहले मोदी की यात्रा के दौरान उनके घुटनों को हाथ लगाते पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री जेम्स मरापे की तस्वीरों ने भी देश के काफ़ी लोगों के मन में गर्व का एहसास पैदा किया था। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा को उनके राष्ट्रपति जो बाइडेन से चियर्स करते की तस्वीरों, उनसे ऑटोग्राफ लेते अमेरिकी के डेमोक्रेट सांसदों और उनके साथ सेल्फी खिंचाने को उताबले अनिवासी भारतीयों की तस्वीरों से अलग हटकर इस दौरे की ज़मीनी उपलब्धियों, अमेरिकी की तरफ़ से भारत को अपने चीन विरोध के प्रतीक के रूप में खड़ा करने की कोशिशों और इससे होने वाले असर के रूप में देखा जाना चाहिए। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति रहते उनकी प्रधानमंत्री मोदी से दोस्ती के समय भारत में मानवाधिकार का मुद्दा तल्ख़ी भरे अंदाज़ में उठाने वाले जो बाइडेन और उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में होते हुए आख़िर अब क्यों भारत से दोस्ती को इतनी तरजीह देने लगे हैं?
देखा जाए, तो भारत और अमेरिका के बीच सबसे चर्चित समझौता 2005 का परमाणु समझौता था, जब देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे। हालाँकि इस ऐतिहासिक परमाणु समझौते के बावजूद बाद के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच सम्बन्ध उस स्तर पर नहीं रहे। कारण यह भी था कि मनमोहन सिंह की सरकार एक गठबंधन सरकार थी। उसे समर्थन दे रहे वाम दलों का उस पर लगातार दबाव था कि वह परमाणु समझौते में आगे न बढ़े। इसका नतीजा यह हुआ कि तीन साल बाद भारत ने संसद में एक क़ानून पास किया, जो अमेरिका से रिएक्टरों की ख़रीद में बड़ी रुकावट बन गया। मनमोहन सिंह के अगले कार्यकाल (यूपीए-2) में तो दोनों देशों के रिश्तों में गर्मजोशी और प्रतिबद्धता में कमी दिखी, भले बराक ओबामा एक अर्थशास्त्री के रूप में मनमोहन सिंह के प्रशंसक रहे।
भारत और अमेरिका के रिश्तों में नया रूप डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में दिखा। प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार कहा कि ट्रम्प से उनके रिश्ते राष्ट्र प्रमुखों से ज़्यादा मित्रों जैसे हैं। यह सच हो सकता है, क्योंकि एक मौक़े पर भारत में ही विपक्ष ने मोदी पर ट्रम्प की चुनाव कैंपेन का हिस्सा बनने का आरोप लगाया। विपक्ष के आरोपों के पीछे कारण ‘हाउडी मोदी’ और ‘नमस्ते ट्रम्प’ जैसे चकाचौंध भरे कार्यक्रम थे, जिनमें मोदी ट्रम्प के चुनाव की बातें करते दिखे। इससे यह सन्देश गया कि मोदी अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी भारतीयों को ट्रम्प का समर्थन करने को कह रहे हैं। दिलचस्प यह है कि ट्रम्प के काल में जो बाइडेन और कमला हैरिस लगातार भारत में मानवाधिकार का मुद्दा उठाते रहे। यही कारण रहा कि बाइडेन जब सत्ता में आये, तो उनके प्रशासन की भारत के साथ रिश्तों में गर्माहट की काफ़ी कमी रही।
चीन से रिश्ते तल्ख़
अमेरिका की भारत से दोस्ती बढ़ाने की कोशिश क्या चीन से उसके तल्ख़ होते रिश्ते हैं? बहुत-से जानकार मानते हैं यह काफ़ी हद तक सही है। निश्चित ही प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिका यात्रा में स्वागत हुआ। इसके बाद राष्ट्रपति बाइडन ने भी कहा कि अमेरिका और भारत के रिश्ते दुनिया के लिए सबसे ज़रूरी हैं। उन्होंने यहाँ तक कहा कि आबादी के लिहाज़ से दुनिया के सबसे बड़े देश भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते अब तक के इतिहास में सबसे ज़्यादा मज़बूत हैं। बाइडेन की यह बातें निश्चित ही भारत-अमेरिका के बीच रिश्तों की अलग कहानी कहती हैं, क्योंकि इसी बाइडेन प्रशासन ने सत्ता में आने के दो साल तक भारत में अपना राजदूत तक नियुक्त नहीं किया था। ऐसे में बाइडेन का यह कहना कि दोनों देश एक दूसरे के क़रीब आये हैं, और रिश्ते गतिशील हुए हैं; महत्त्वपूर्ण है।
रिश्तों में अचानक आयी इस गर्माहट के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण अमेरिका के चीन से लगातार बिगड़ते रिश्ते हैं। अमेरिका की रणनीति को समझने वाले विषेशज्ञों का कहना है कि वह भारत को रिश्तों में संतुलन साधने के लिए साथ अपने जोड़ रहा है। इन रिश्तों को वह हिन्द प्रशांत क्षेत्र में ख़ुद को मज़बूत करने के लिए भी इस्तेमाल करना चाहता है।
दिलचस्प यह भी है कि हाल के कुछ महीनों में चीन ने भारत की सीमा पर लगातार निर्माण कर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की है। उसकी नीयत को लेकर वैसे भी ढेरों सवाल उठते रहे हैं। कई जानकार इस बात से इनकार नहीं करते कि चीन भविष्य में भारत पर हमला करने की हद तक जा सकता है।
भारत-अमेरिका के बीच इस रिश्तों के इस नये पड़ाव से चीन भी हरकत में दिखा। चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने न सिर्फ़ अमेरिका बल्कि भारत के ख़िलाफ़ भी ख़ूब ज़हर उगला। एक संपादकीय में तो ग्लोबल टाइम्स ने अमेरिका को धोखेबाज़ बताया और भारत को सलाह दी कि उसे अमेरिका से बचकर रहना चाहिए। ग्लोबल टाइम्स का मानना है कि अमेरिका अपने हितों के लिए भारत को इस्तेमाल कर रहा है।
ग्लोबल टाइम्स की मानें तो चीन और रूस का मुक़ाबला करने के लिए अमेरिका, भारत को अपने साथ जोड़ रहा है। ग्लोबल टाइम्स ने तो भारत को जापान और ऑस्ट्रेलिया का हवाला देते हुए भारत को चीन का दुश्मन न बनने की सलाह तक दे डाली।
हालाँकि भारत भी अमेरिका से रिश्तों को लेकर सावधान है। रूस के साथ वह बिगाड़ नहीं करना चाहता भले चीन से भारत के रिश्ते तनाव भरे हैं। कुछ जानकार मानते हैं कि अमेरिका के साथ खड़े होने के मामले में सावधानी ज़रूरी है क्योंकि भारत चीन पर अमेरिका के लिए किसी भी सूरत में वैसा रोल नहीं कर सकता जैसा यूक्रेन ने रूस के ख़िलाफ़ अमेरिका के लिए किया है। चीन भी ऐसा आरोप अब लगा रहा है। ग्लोबल टाइम्स का दावा है कि अमेरिका की इच्छा भारत को साथ जोडक़र क्षेत्र का सैन्यीकरण करना और संघर्ष को भडक़ाना है, ताकि क्षेत्रीय तनाव तेज़ हो।
रूस और भारत
अमेरिका भारत को उसकी ज़रूरत के महज़ 11 फ़ीसदी हथियार ही देता है, जबकि रूस भारत को 45 फ़ीसदी हथियार देता है। अमेरिका की कोशिश है कि वो मुख्य सप्लायर बने। अगर कच्चे तेल की बात करें, तो पहले भारत की निर्भरता पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन यानी ओपेक सदस्य देशों पर थी। लेकिन हमारी कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी तेज़ी से बढ़ रही है। कच्चे तेल का आयात में रूस की हिस्सेदारी पिछले सात महीनों में तेज़ी से बढ़ी है। अप्रैल, 2023 की बात करें, तो भारत के आयात में रूस का हिस्सा बढक़र 36 फ़ीसदी हो गया अर्थात् भारत ने अप्रैल में रोज़ाना 46 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात रूस से किया। ऐसे में रूस से रिश्ते बरक़रार रखते हुए भारत की रणनीति अमेरिका के साथ हुए समझौतों को अपनी ताक़त बढ़ाने में इस्तेमाल करने की है।
भारत ने क्या पाया?
प्रधानमंत्री मोदी के दौरे में दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण रक्षा-औद्योगिक सहयोग और टेक्नोलॉजी हैं। एक बड़े समझौते से भारत में ही लड़ाकू विमानों के इंजन बनाने की रास्ता खुला है। जनरल इलेक्ट्रिक और भारत की सरकारी कम्पनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड यह काम करेंगी। ज़ाहिर है इससे पहले की तुलना में अमेरिका की जेट इंजन टेक्नोलॉजी का भारत को और बेहतर हस्तांतरण हो सकेगा।
मोदी के दौरे में हुए एक सौदे के तहत अमेरिका की रक्षा और प्रौद्योगिकी कम्पनी जनरल एटॉमिक्स भारत को लड़ाकू एमक्यू-9बी बेचेगी और यह सौदा 300 करोड़ डॉलर का है। इससे भारत में फैक्ट्री स्थापना में मदद होगी और ड्रोन भारत में जोड़े (एसेंबल) जाएँगे।
इसके आलावा सेमिकंडक्टर के नज़रिये से अहम समझौते भी हुए। एक निवेश अमेरिकी चिप कम्पनी माइक्रोन टेक्नोलॉजी का तय हुआ, जो भारत में क़रीब 80 करोड़ डॉलर का निवेश करेगी। इसके तहत सेमिकंडक्टर जोडऩे और टेस्ट सुविधा स्वदेश में ही उपलब्ध होगी।
ज़ाहिर है इससे बड़े रोज़गार का रास्ता भी खुलेगा। अमेरिकी कम्पनी लैम रिसर्च भारत में 6,000 इंजीनियर को सेमिकंडक्टर से जुड़ी ट्रेनिंग देगी, जबकि अमेरिका की सेमिकंडक्टर की मशीन बनाने वाली अप्लाइड मटेरियल्स कम्पनी भी भारत में 40 करोड़ डॉलर का निवेश करेगी। इन समझौतों से भारत को सेमिकंडक्टर का आधार बनाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा अमेजॉन और गूगल भी भारत में क्रमश: 10 और 15 बिलियन डॉलर का निवेश करेंगे।
पिछले दिनों एक चर्चित हिन्दी समाचार चैनल की महिला उद्घोषिका का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह स्टूडियो में छाता लेकर एंकरिंग कर रही हैं। पीछे विशालकाय स्क्रीन पर एक वीडियो चल रहा है, जिसमें तूफ़ानी हवा चल रही है और एंकर स्टूडियो में हिल रही थीं और यह सब वह पूरे नाटकीय अंदाज़ में कर रही थीं। इस घटना ने यह ध्यान दिलाया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वर्ग की पत्रकारिता ऐसे ही गर्त में नहीं पहुँची है। ऐसे ही अगम्भीर प्रकृति के पत्रकारों ने इसके लिए अनवरत योगदान दिया है, जो अब और ज़ोरों पर है।
कुछ दिनों पूर्व प्रो. आनंद रंगनाथन ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आरोप लगाया था कि ‘मीडिया को बर्बाद प्रिंट मीडिया ने किया है।’ सम्भवत: उन्होंने सत्य को एकांगी नज़रिये से देखा है। वास्तव में मीडिया की बर्बादी का मुख्य ज़िम्मेदार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया है। कोई भी विवादित वीडियो पोस्ट करना; आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर ख़बरें दिखाना, और विवाद होने पर उसे डिलीट करके भाग जाना; किसी बलात्कार की शिकार युवती का नाम उजागर करना; तो किसी यौन हिंसा पीडि़त बच्ची की तस्वीर प्रकाशित करना; बिना नागा हर रोज़ निम्न स्तर की भाषा यानी गाली-गलौज से भरी अनुत्पादक बहसें आयोजित करना; हिंसा भडक़ने की हद तक धार्मिक विषयों की बदज़ुबानी करवाना; सरकार की छवि पर धब्बा लगाने वाली बड़ी ख़बरें छुपाना आदि अब अधिकतर टीवी चैनल्स का पेशा बन चुका है। अमर्यादित भाषा से फैलने वाले विषाक्त वातावरण के लिए यही मीडिया संस्थान ज़िम्मेदार हैं।
मामूली फ़र्ज़ीवाड़े की मिलावट को छोड़ दें, तो इतनी ग़ैर-ज़िम्मेदार प्रिंट मीडिया तो कल भी नहीं थी और आज भी नहीं है। चूँकि प्रिंट मीडिया तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता करता है, अपने लेखों, ख़बरों की निर्भीक ज़िम्मेदारी स्वीकार करता है। इसलिए उसके लिए यह आरोप सर्वथा अनुचित है। साथ ही वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपने प्रदर्शन के लिए चीखता-चिल्लाता नहीं है। इसलिए उस पर ऐसी तोहमत लगाना आसान है। इसी परिपेक्ष्य में मदन मोहन दानिश का शे’र याद आता है :-
‘ये हासिल है मिरी ख़ामोशियों का,
कि पत्थर आज़माने लग गए हैं।’
कम-से-कम प्रिंट मीडिया की मूर्खता इस स्तर की नहीं है कि सरसों के खेतों को धान-गेहूँ के खेत बताने वाले महान् पत्रकारों, जो एनडीटीवी से लेकर दूरदर्शन में काम कर रहे हैं; के सहारे अपना कार्य कर रहा है। इनका ज्ञान इस स्तर का है कि निर्धारित विषयों पर 10 पंक्तियाँ भी लिख नहीं सकते, उनकी तुलना प्रिंट मीडिया के क़लम के सिपाहियों से की भी नहीं जानी चाहिए। रही बात टीवी पर डिबेट करने की, तो उसके लिए आप बिहार और उत्तर प्रदेश के किसी भी चौराहे पर चाय की दुकान में जाइए, उनसे अच्छे वक्ता आपको वहाँ पर मिल जाएँगे।
आप देखेंगे कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का रवैया दिनोंदिन ग़ैर-ज़िम्मेदार होता जा रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के शुरुआती दिनों को याद करिए। इसके युद्धोन्माद की गम्भीर आलोचना पश्चिमी जगत में हुई। अब राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा का उदाहरण लीजिए। चर्चा की आवश्यकता उन मुद्दों की थी, जिन पर उनकी यह यात्रा आधारित है। लेकिन मीडिया की तवज्जो उनके टी-शर्ट और स्वेटर न पहनने और उनके हिन्दू दिखने के प्रयास पर थी। सबसे बढक़र इलेक्ट्रोनिक मीडिया, जो पिछले कई वर्षों से धर्म आधारित डिबेट से बाहर ही नहीं निकल पा रहा है। यदि धर्म आधारित विषयों पर ही टीवी डिबेट आयोजित किये जाने हैं, तो बहसों का प्रारूप बदलना चाहिए। यदि पूर्व की सरकारों पर धार्मिक तुष्टिकरण का आरोप लगाने से फ़ुर्सत मिले, तो कुछ प्रश्न वर्तमान सरकार से भी पूछे जाने चाहिए जैसे कि अब तक मंदिरों को सरकारी संरक्षण से मुक्त क्यों नहीं किया गया? अब तक कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास क्यों नहीं हो पाया? अगर डीएमके के शासन में तमिलनाडु में प्राचीन हिन्दू मंदिर गिराये जाने की आलोचना हो रही है, तो भाजपा शासित राज्यों में मंदिरों के ध्वंस पर विमर्श क्यों नहीं होना चाहिए?
देश के सारे मीडिया संस्थानों ने भले ही पत्रकारी नैतिकता और शुचिता का आडम्बर खड़ा कर रखा है; लेकिन वास्तविकता से सभी परिचित हैं। वे सभी विषय पर बात करना चाहते हैं; बस पत्रकारिता में आयी गिरावट को छोडक़र। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनल उन भौतिकतावादी, धन-पिपासु संस्थान सरीखे हो गये हैं; जहाँ नैतिकता की कोई जगह नहीं बची है। और जब नैतिकता पर व्यावसायिक धुंध छाती है, तो आत्मचेतना लुप्त हो जाती है। भले ही यह व्यावसायिक पत्रकार वर्ग स्वयं को शिक्षित समझे; लेकिन शिक्षा वह होती है, जो सकारात्मक परिवर्तन लाये। ओशो ठीक ही कहते हैं- ‘जो ज्ञान मुक्ति न दे, वह ज्ञान नहीं। ज्ञान की परिभाषा यही है, जो मुक्त करे।’
पत्रकारिता समाज का आईना होती है। किन्तु पेशागत यह मूल तथ्य मीडिया जगत कब का बिसरा चुका है। शिक्षा के प्रभाव के विषय में रूसो का अभिमत था कि इससे मनुष्य अच्छा नहीं, चालाक बनता है। वर्तमान के तकनीकी प्रधानता के युग में सूचनाओं की अतिशयता ने ज्ञान की नैतिक लकीर को धुँधला किया है। पत्रकारिता से जुड़ी नयी पीढ़ी के ज्ञान के न्यूनतम विमर्श का स्तर भी नीचे गिरा दिया है। इनके पास तर्क है। दुनिया बदल रही है सभी व्यावसायिकता की दौड़ में आगे निकलना चाहते हैं, भले ही उसके लिए जिस निम्नकोटि के मार्ग का अनुसरण करना पड़े।
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने के पीछे मूल कारण है, उसके आम जनता यानी हम भारत के लोगों की संप्रभुता की आवाज़ बनना बनना। लेकिन राजनीतिक मुद्दों पर बढ़ती निर्भरता, जनमुद्दों की अनदेखी आदि ने लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को संसदीय राजनीति के स्तंभ में लगभग एकाकार का कार्य कर दिया है। हालाँकि उसमें भी यह निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ट नहीं रहा, बल्कि $खेमों में बँट चुका है। जहाँ पत्रकार वर्ग या तो सत्ताधारी दल के साथ हैं या विपक्षी जमात के साथ; किन्तु कोई भी भारतीय जनता के साथ खड़े होने को तैयार नहीं है। स्वतंत्र भारत में पत्रकारिता के इतिहास पर दृष्टिपात करें, तो प्रतीत होता है कि मुख्यधारा के एक बड़े मीडिया वर्ग का सत्ता के साथ रहना उसकी नियति रहीं है। अधिक नहीं, तो पिछले दो दशकों के इतिहास पर ही नज़र डाल लें। पिछले सप्ताह लेखक एवं पत्रकार संदीप देव ने एक टिप्पणी की- ‘‘सोनिया की मनमोहनी सरकार के समय ‘पेटीकोट पत्रकारिता’ होती थी, अब ‘ख़ाकी निक्कर’ पत्रकारिता चल रही है। वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता तो कब का दम तोड़ चुकी है।’’
भाषाई आक्रामकता की अनदेखी करते हुए इस कथन को निरपेक्ष भाव से देखें, तो पत्रकारिता की वर्तमान विद्रूपता स्पष्ट समझ आएगी। नेता, राजनेता, राजनीति और अपराध के अतिरिक्त भी अन्य मूलभूत समस्याएँ इस देश में हैं, जिन पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तवज्जो की दरकार है। लेकिन मीडिया ने अब तक जितनी बहस नेताओं के मात्र विवादित बयानों पर की है, उसका दशांश भी घटती रोज़गार दर, आरक्षण की समीक्षा, जातिगत जनगणना के औचित्य, जनसंख्या विस्फोट, देश के उच्च शिक्षित प्रतिभाओं के यूरोप-अमेरिका पलायन, उच्च शिक्षा की निम्न उत्पादकता, सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण, पंचायती राज, भुखमरी, ग़रीबी, बढ़ते अपराध या तीसरी सरकार, देश में आकंठ व्याप्त भ्रष्टाचार, संसदीय मर्यादाओं एवं जनप्रतिनिधित्व का गिरता स्तर, ग्लोबल वार्मिंग एवं धारणीय विकास जैसे तमाम संवेदनशील एवं अत्यावश्यक मुद्दों पर नहीं की; जिस पर भावी भारत का भविष्य निर्भर करता है। उससे अधिक मीडिया कवरेज अतीक, मुख़्तार और लारेंस विश्नोई जैसे अपराधियों को मिलता रहा है। मानो वे कोई मसीहा हों। जैसे फ़लाँ समय इनकी गाड़ी जेल से निकली, फ़लाँ समय कोर्ट पहुँचेगी, फ़लाँ समय वहाँ पहुँचेगी आदि-आदि।
पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक ने अपने ऑनलाइन संस्करण में सिनेमाई विवादों की जानकारी देने के लिए ‘विवाद बॉलीवुड के’ नाम से एक सीरीज शुरू की है, जिसमें फ़िल्मी हीरोइनों के आपसी झगड़ों से जनता को रू-ब-रू कराने का वादा किया गया है। यही नहीं, आजकल इंटरनेट पर ख़बरें पढऩे की कोशिश में आपका सामना कुछ ऐसे शीर्षक से हो सकता है, जैसे- फ़लाँ हीरोइन ने हॉट ड्रेस फोटो शूट में कहर ढाया, फ़लाँ की बिकनी की तस्वीरें आपको आह भरने पर मजबूर कर देंगी, ब्रालेश ड्रेस में फ़लाँ हीरोइन छा गयी, इत्यादि। क्या आप इन पंक्तियों को पढ़ के असहज महसूस कर रहे हैं? किन्तु ये पंक्तियाँ पत्रकारिता के नये मानकों से आपका परिचय करवाएँगी। आजकल विभिन्न प्रकार के कल्चरल फेस्ट, संवाद-परिचर्चा वग़ैरह आयोजित किये जा रहें हैं। ऐसे आयोजनों में आजकल पत्रकारों के समकक्ष सोशल मीडिया इनफ्लुएंसरों को बहस के लिए आमंत्रित किया जा रहा है और आम-गुमनाम क्या देश के वरिष्ठ पत्रकार ऐसे कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं, तो अब पत्रकारिता का विमर्श अब इस स्तर पर आ गया है। पत्रकार एवं पत्रकारिता की आज जो दुर्दशा है, उसकी एक बड़ी वजह इसका कोई स्थापित मानक नहीं होना है। आजकल कोई भी जो छोटी-मोटी ख़बरें किसी भी तरह लिख सकता है, वह स्वयं को पत्रकार कहने के लिए तैयार बैठा है। साथ ही मीडिया जगत में विज्ञापन का कारोबार करने वाले भी खुद को पत्रकार बताते हैं। असल में भारतीय मीडिया की एक बड़ी समस्या अल्पज्ञ एवं त्वरित प्रगति को आतुर वर्ग है, जो दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से पत्रकार श्रेणी में शामिल हो गया है।
राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसे लोगों ने पत्रकारिता के मानक स्थापित किये थे। खुशवंत सिंह चाहे जितना विवादित लेखन करते रहे हों; लेकिन उनके बारे में कहा जाता था कि वह अपने लिए प्रकट अभद्र आलोचना तक अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर दिया करते थे। आज न तो पत्रकारिता की वो नैतिकता बची है, न ही मूल्य। हालाँकि इस घुप अंधकार में पत्रकारों का एक ऐसा वर्ग भी है, जो मौन होकर अपनी साधना में रत है। यह वर्ग ‘कैमरा फ्रेंडली’ नहीं हैं, किन्तु इसे पता है कि किन मुद्दों पर समाज की जागरूकता ज़रूरी है। यह सार्वजनिक मंचों पर लम्बी-लम्बी डिबेट नहीं करता; किन्तु यह जानता है कि उसके क़लम को किसे कटघरे में खड़ा करना है। यह वर्ग किसी दल या विचारधारा के साथ नहीं है, बल्कि लोकतंत्र का हामी है। इसकी आस्था का केंद्र केवल और केवल देश एवं संविधान है। इसी पत्रकारिता धर्म के अनुयायियों ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की मर्यादा को बचाकर रखा है और आम जनता के भरोसे को भी। तेज़ भागती इस दुनिया में क़लम से पैदा होने वाली जुम्बिश कुछ मंद ज़रूर पड़ी है और कैमरे वाली मीडिया ने अपना कृत्रिम आभामण्डल ज़रूर प्रसारित कर रखा है; किन्तु पत्रकारिता की यात्रा का यह प्रस्थान बिन्दु है; नियति नहीं। याद रखिए, घोर काली रात के पश्चात् सुबह बड़ी खूबसूरत होती है। पत्रकारिता उसी भोर की प्रतीक्षा में है।
अब अगले महीने बेंगलूरु में मंथन करेंगे विपक्ष के नेता
पटना में महागठबंधन के लिए 15 विपक्षी दलों की बैठक के बाद जो उत्साह और तेज़ी विपक्ष में दिख रही है, उसे धरातल पर कितनी सफलता मिलती है, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन गठबंधन की इस क़वायद ने भाजपा को भी सक्रिय कर दिया है, जो मान रही है कि विपक्ष गठबंधन के लिए ज़्यादा गंभीरता से काम कर रहा है। बेशक एक वृहद् गठबंधन के विपक्ष के रास्ते में अभी काफ़ी तीखे मोड़ और ढलानें हैं। बावजूद इसके विपक्ष एकजुट होता है, तो भाजपा के लिए यह निश्चित ही बड़ी चुनौती होगी। विपक्षी दलों की भाजपा के ख़िलाफ़ गठबंधन पर मंथन के लिए अगली बैठक 12 जुलाई को बेंगलूरु में है। इसमें सीटों के तालमेल और साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर बात हो सकती है।
विपक्षी गठबंधन से पहले ही जद(यू) नेता के.सी. त्यागी का यह दावा बहुत अहम है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी और कांग्रेस का और उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का गठबंधन लगभग तय है। उनके मुताबिक, 450 सीटों पर भाजपा के ख़िलाफ़ एक उम्मीदवार की रणनीति बन चुकी है। उनके मुताबिक इन राज्यों में बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, असम, पूरा पूर्वोत्तर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश समेत लगभग एक दर्ज़न से ज़्यादा राज्य शामिल हैं।
इधर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यह श्रेय दिया जा सकता है कि पटना में 15 दलों को वह एक छतरी के नीचे बैठाने में सफल रहे। इन 15 दलों के छ: मुख्यमंत्री और पाँच पूर्व मुख्यमंत्री बैठक में शामिल थे। इनमें से कुछ अपने दलों में अध्यक्ष की हैसियत रखते हैं, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े तो बैठक में आये ही थे। ‘तहलका’ की जानकारी बताती है कि विपक्ष के इन दलों ने मतभेद वाले मुद्दों को पीछे रखकर पहले सहमति बन सकने वाले मुद्दों को सिरे चढ़ाने का फ़ैसला किया है। टकराव वाले मुद्दों में सबसे पेचीदा मुद्दा नेतृत्व का है, जबकि सीटों के बँटवारे पर भी तलवारें कम नहीं चलेंगी। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के बीच सहमति में भी पेंच फँसा हुआ है। कांग्रेस पंजाब और दिल्ली में किसी भी सूरत में अपनी लोकसभा सीटें आम आदमी पार्टी के साथ साझा नहीं करना चाहेगी। आम आदमी पार्टी को लगता है कि चूँकि दिल्ली और पंजाब में उसकी सरकारें हैं। लिहाज़ा उसे लोग वोट देंगे। जबकि कांग्रेस का मानना है कि 2014 और 2019 से पहले 2009 में दिल्ली में उसने सभी सात, जबकि 2019 में पंजाब में 13 में से आठ सीटें जीती थीं। आम आदमी पार्टी का अध्यादेश के समर्थन के मामले में कांग्रेस से टकराव सीटों का दबाव बनाने के लिए ही है, क्योंकि कांग्रेस पहले ही कह चुकी है कि राज्य सभा में वह दिल्ली वाला अध्यादेश आने पर उसका विरोध करेगी।
आँकड़े देखें, तो साल 2019 में दिल्ली में कांग्रेस को क़रीब 23 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि आम आदमी पार्टी को 18 फ़ीसदी। उस चुनाव में भी कांग्रेस-आम आदमी पार्टी में समझौता नहीं था। पिछले साल पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को हराकर बड़ी जीत हासिल की थी। पंजाब में 2019 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को पंजाब में आठ फ़ीसदी से कुछ ज़्यादा और एक सीट मिली थी। कांग्रेस को इसके विपरीत 40 फ़ीसदी से कुछ ज़्यादा वोट और 13 में 8 सीटें मिली थीं। पंजाब में कांग्रेस और आप के लिए लोकसभा सीटों का समझौता सबसे टेढ़ी खीर साबित हो सकती है।
बेंगलूरु की बैठक में विपक्षी दल सीटों को लेकर शुरुआती बात कर सकते हैं। कांग्रेस के लिए नेतृत्व के मसले पर बात करना उसकी रणनीति में फिट नहीं बैठता लिहाज़ा वह सीटों पर बात शुरू कर सकती है। कांग्रेस इस साल होने वाले अन्य विधानसभाओं के चुनाव के नतीजे देखना चाहती है। उसे लगता है कि यदि नतीजे उसके पक्ष में रहते हैं, तो इससे देश में जनता के मूड का पता चलेगा। बेहतर नतीजों की स्थिति में मोल-भाव उसके लिए आसान हो जाएगा। कांग्रेस पटना की बैठक के बाद आपस में सीटों का गुना-भाग कर रही है कि दिल्ली, पंजाब जैसे अपने पकड़ वाले राज्यों में आप के साथ किस स्तर तक समझौता करना है। आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस का टकराव बढ़ा तो पेंच भी फँस सकता है। पटना में कांग्रेस को लेकर विरोध दिखाने के लिए ही आप नेता अरविन्द केजरीवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हुए थे। यह तय है कि कांग्रेस सीटों को लेकर एक सीमा तक ही समझौता करेगी। कांग्रेस के रुख़ के आधार पर केजरीवाल विपक्षी गठबंधन से अलग होने का रिस्क नहीं ले सकते। गठबन्धन में ऐसे कई दल हैं, जो केजरीवाल के जम्मू-कश्मीर में धारा-370 हटाने के मामले में भाजपा के साथ खड़े होने से ख़ुश नहीं हैं।
केजरीवाल के लिए भी कठिनाइयाँ कम नहीं हैं। विपक्ष के बीच वे सभी चीज़ें अपने हिसाब से नहीं चला पाएँगे। यदि ज़्यादा सख़्त रुख़ रखते हैं, तो विपक्षी ख़ेमे में अलग-थलग पड़ सकते हैं। केजरीवाल ये सब चीज़ें जानते हैं। लिहाज़ा एक सीमा तक ही विरोधी स्वर उठाएँगे। आप नेता सौरभ भारद्वाज का यह तर्क भी बहुत बेहतर नहीं था कि कांग्रेस दिल्ली और पंजाब उसके लिए छोड़ दे, तो आप मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उम्मीदवार नहीं उतारेगी। सभी को पता है कि इन तीन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य दलों के ज़्यादा गुंजाइश नहीं है। जबकि भविष्य में दिल्ली और पंजाब दोनों में कांग्रेस सीटें जीत सकती है। हाँ, गुजरात एक ऐसा राज्य है, जहाँ आम आदमी पाटी ने हाल के विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया था और वह कांग्रेस को नुक़सान कर सकती है। हालाँकि कांग्रेस यह मानती है कि देश में भाजपा विरोधी माहौल बने तब भी 2024 में शायद गुजरात में भाजपा से ज़्यादा सीटें छीनना आसान नहीं होगा।
पटना की बैठक में एक चीज़ और दिखी कि अरविंद केजरीवाल को लेकर नीतीश समेत किसी और नेता ने खुलकर पत्रकारों को कोई जवाब नहीं दिया। राहुल गाँधी ने अपनी टिप्पणी में भाजपा और आरएसएस पर देश की नींव पर हमला करने का आरोप लगाया। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि जो कश्मीर से शुरू हुआ, वो अब पूरे देश में हो रहा है। उमर अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि वह और महबूबा मुफ़्ती ऐसे बदनसीब इलाक़े से ताल्लुक़ रखते हैं, जहाँ गणतंत्र का गला दबाया जा रहा है। कश्मीर में पाँच साल से राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। हालाँकि ममता की टिप्पणी उत्साह से भरी थी। उनकी बातों का सार यही थी कि विपक्षी दलों की गाड़ी सही दिशा में जा रही है। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सकारात्मक दिखे। ममता का यह कहना मायने रखता है कि ‘हमें विरोधी कहकर सम्बोधित न करें। हम भी इसी देश के नागरिक और देशभक्त हैं।’ उनके मुताबिक, विपक्षी दल तीन बातों पर सहमत हुए हैं। इनमें पहली यह है कि हम एकजुट हैं। दूसरी, हम एक होकर लड़ेंगे। तीसरी, भाजपा के एजेंडे के ख़िलाफ़ विपक्षी गठबंधन एकजुट होकर विरोध करेगा। ममता ने जब यह कहा कि विपक्षी नेताओं ईडी और सीबीआई के अलावा वकीलों से कोर्ट में उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज करवाकर भी परेशान किया जा रहा है। उनका संकेत राहुल गाँधी को कोर्ट की तरफ़ से मानहानि मामले में दोषी ठहराने पर था। जहाँ तक बैठक की बात है, उसमें अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार के अधिकारों की रक्षा के लिए सभी उनका साथ दें और बिल राज्यसभा में न पास होने दें।
कुल मिलाकर विपक्ष की बेंगलूरु की जुलाई बैठक काफ़ी अहम होगी। उसमें गठबंधन के शुरुआती; लेकिन महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा होगी, जिस पर सहमति का आधार बनानी की कोशिश की जाएगी। इसका मक़सद भाजपा पर दबाव बनाना भी होगा; जो गठबन्धन को लेकर सवाल उठा रही है।
राहुल किसके दूल्हा?
लालू यादव राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। वह मज़ाक़ की आड़ लेकर ढके-छिपे अंदाज़ में बहुत बातें कह जाते हैं। पटना की बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब उनके बोलने की बारी आयी, तो उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से काफ़ी दिलचस्प बातें कहीं। इनमें एक उनकी शादी को लेकर भी थी। लालू ने कहा- ‘आप दूल्हा बनिए, हम सब आपके बाराती बनेंगे।’ लालू उनसे विवाह करने पर ज़ोर दे रहे थे। राजनीतिक रूप से इसे किसी और रूप में भी लिया जा सकता है।
लालू ने राहुल गाँधी को क्या ‘विपक्ष का दूल्हा’ बनने के लिए यह कहा? अर्थात् क्या लालू ने सीधे न कहकर यह कहा कि विपक्ष का आप नेतृत्व करो; बा$की दल आपके साथ (बाराती) होंगे। अभी तो राहुल गाँधी का ‘सभी मोदी चोर क्यों होते हैं?’ वाली टिप्पणी पर आपराधिक मानहानि मामले में कोई अंतिम फ़ैसला नहीं हुआ है। उनकी सदस्यता का मामला भी 2024 तक सुलटेगा या नहीं, यह भी अभी साफ़ नहीं है। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में लालू ने उनकी राजनीति की भी तारीफ़ की, जबकि ममता बनर्जी ने भी नीतीश के बाद राहुल गाँधी का नाम लेकर अपना सम्बोधन शुरू किया।
कर्नाटक चुनाव में हार के बाद भाजपा में गहन मंथन और चिन्तन चल रहा है कि किस तरह से राज्यों में होने वाले आगामी चुनावों के साथ-साथ 2024 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की जा सकती है?
पाञ्चजन्य में छपे संघ के एक लेख और नीतीश के इस इशारे ने कि भाजपा पूर्व चुनाव की तैयारी में है; इस बात को और हवा दे दी है कि भाजपा में आगामी चुनावों में किसी भी तरह साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति अपनाकर जीत के लिए कुछ अलग ही खिचड़ी पक रही है। भले ही इसकी सही-सही हवा बाहर नहीं पता चल पा रही है; लेकिन भाजपा के भीतर से ही छन-छन कर आ रही ख़बरें इस बार पूर्व चुनावों का शक़ बढ़ाती नज़र आ रही हैं। मसलन, चुनाव आयोग से केंद्र सरकार का यह पता करना कि क्या पहले चुनाव कराये जा सकते हैं? या फिर संघ का पाञ्चजन्य में लेख कि भाजपा को सिर्फ़ मोदी के जादू और हिन्दुत्व पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, पूर्व चुनाव कराने की दिशा में शक की सूई को और भी घुमाते नज़र आते हैं।
सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार ने इसकी तैयारी बहुत पहले से शुरू कर दी है? क्योंकि अभी चुनाव में क़रीब-क़रीब एक साल का समय बचा है; लेकिन मोदी सरकार ने अभी से अपने सभी मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और नेताओं, कार्यकर्ताओं को अपने नौ साल के कामों को गिनाने के लिए जनता के बीच भेज दिया है। जबकि होना यह चाहिए था कि मोदी सरकार अभी छ:-सात महीने का और इंतज़ार करती और अपने 10 साल के कामों को लेकर जनता के बीच जाती।
हालाँकि मोदी सरकार ने हमेशा तो नहीं; लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव यानी 2019 में अपने पिछले पाँच वर्षों के कामकाज को जनता के बीच ले जाकर दोबारा सत्ता सौंपने के लिए वोट माँगे थे।
दरअसल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ग्रामीण विकास विभाग के मंत्रियों के साथ बैठक में इशारों-इशारों में 2024 के आगामी लोकसभा चुनावों को समय से पहले कराने के केंद्र की मोदी सरकार की मंशा को बताते हुए कहा है कि कभी भी चुनाव हो सकते हैं। इसके पीछे एक चिन्ता, चुनाव के प्रति तैयारी का संदेश छुपा है। इसके बाद से राजनीतिक गलियारों में पूर्व चुनाव की चर्चाओं का बाज़ार गरम है। लोग यह मान रहे हैं कि नीतीश ऐसे ही इतनी बड़ी बात नहीं कहते, क्योंकि वो राजनीति के मँझे हुए खिलाड़ी हैं, और उनका हर हाल में सत्ता में बने रहना, यहाँ तक कि बिहार में भाजपा वाले गंठबंधन के बंधनों को तोडक़र एक बार फिर लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ सरकार बना लेना, भाजपा की मंशा को भाँपने और उससे डर से बाहर निकलने का साहस दिखाना किसी छोटे-मोटे नेता की वश की बात नहीं थी। यही वजह है कि नीतीश के राजनीतिक चालों और बयानों पर लोग भरोसा करते हैं और राजनीतिक लोगों में उनकी अपनी एक साख है।
यह निर्देश अपने गठबंधन के दल, अपने सांगठनिक पदाधिकारी और कार्यकर्ता के अलावा ज़िम्मेदार सरकारी महकमे को देकर उनके प्रति ज़्यादा-से-ज़्यादा आशान्वित भी हो जाते हैं। ऐसा इसलिए कि यह नीतीश कुमार भी जानते हैं कि भाजपा राम मंदिर निर्माण के पहले लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरना नहीं चाहेगी। हो सकता है कि नीतीश कुमार की पूर्व चुनावों को लेकर भविष्यवाणी $गलत साबित हो; लेकिन अकेले नीतीश कुमार ही नहीं, बल्कि कई राजनीतिक जानकार और कई राजनीतिक लोग भी इस बात को दबी ज़ुबान से कह रहे हैं कि मोदी सरकार किसी भी हाल में जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। लेकिन सवाल यह है कि क्या 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले होने वाले विधानसभा चुनावों को भी समय से पहले कराया जा सकता?
यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि कर्नाटक में भाजपा की करारी हार के बाद अब यह बातें ख़ूब हो रही हैं कि भाजपा के हाथों से अब राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और इसके अलावा महाराष्ट्र और फिर तेलंगाना, तमिलनाडु जैसे राज्य भी भाजपा के हाथों से खिसकने वाले हैं। भाजपा नेतृत्व को भी यह बात अच्छी तरह पता है। मणिपुर में वैसे भी भाजपा के ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन करने लगे हैं। दिल्ली में भाजपा हर कोशिश कर रही है; लेकिन केजरीवाल का तोड़ उसके पास नहीं है। बंगाल में ममता बनर्जी का तोड़ नहीं है। पंजाब में भी कोई जुगाड़ नहीं है। बिहार में भी उसके लिए रास्ता नहीं है। हिमाचल भी खिसक चुका है भाजपा के हाथ से, गोवा में भी जोड़-तोड़ करके भाजपा ने सरकार बनायी है।
बहरहाल विपक्षी पार्टियाँ किसी भी हाल में मोदी को सत्ता से बाहर करने के लिए तैयार बैठी हैं; लेकिन उनमें एकजुटता का न होना, मोदी सरकार के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है। लेकिन ज़्यादातर जनता महँगाई, बेरोज़गारी, भुखमरी और बढ़े टैक्स के चलते मोदी सरकार से नाराज़ है और ज़्यादातर लोग किसान आंदोलन, पहलवान आंदोलन, पेंशन के मुद्दे, सरकारी पदों पर भर्ती न होने के मुद्दे, शिक्षा व्यवस्था के ख़राब होने के मुद्दे, कालेधन के मुद्दे, देश का पैसा लेकर विदेश भागने वाले पूँजीपतियों के मुद्दे, बैंकों के ख़ाली होने के मुद्दे और नोटबंदी के क़रीब आठ साल बाद 2,000 के नोट के बन्द होने के मुद्दे और चीन के हिन्दुस्तान की ज़मीन पर पैर जमाने की कोशिश जैसे मुद्दे को लेकर मोदी सरकार से नाराज़ है। ऐसे में अगर 2024 के लोकसभा चुनाव को कुछ महीने पहले ही चुनाव आयोग कराने की घोषणा कर भी देता है, तो भी मोदी सरकार को उससे बहुत बड़ा फ़ायदा नहीं होने वाला।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह भी सोच सकते हैं कि गुजरात में उन्होंने 2002 में होने वाले विधानसभा चुनावों को 2001 में कराकर जीत हासिल की थी। इसी प्रकार से वह यही प्रयोग यहाँ भी कर सकते हैं। हालाँकि इससे जीत की गारंटी नहीं है; लेकिन कांग्रेस भी इस तरह के प्रयोग कर चुकी है। ज़्यादातर पूर्व चुनावों में सत्ताधारी दल को फ़ायदा पहुँचता है; लेकिन कई बार सरकार गिरने के बाद समयावधि से पूर्व हुए चुनावों में सत्ताधारी पार्टी बुरी तरह हार भी जाती है। हालाँकि कहा जा रहा है कि मोदी सरकार हर एंगल से चिन्तन, मनन करके, और जीत के आँकड़ों के पूरे जोड़-तोड़ की रणनीति पर मंथन करके ही पूर्व चुनावों की कोशिश करेगी।
बहरहाल नीतीश कुमार ने एक सधे अंदाज़ में पके हुए राजनीतिक की तरह भाजपा की पूर्व चुनावों की रणनीति को भाँपते हुए अपनी कमर कस ली है और अभी से बिहार में भाजपा की लोकसभा सीटों पर जीतने की तैयारी शुरू कर दी है। वह जल्द ही सभाएँ करेंगे। वह अपने आवास पर महागठबंधन के जुटान से विपक्षी एकता की शुरुआत भी कर चुके हैं। यह सच है कि 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीति बनाने से पहले भाजपा को उसके पहले होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए जीत की रणनीति बनानी ही पड़ेगी। वन नेशन, वन चुनाव का राग अलापने वाली भाजपा आज उस मोड़ पर आकर खड़ी है, जहाँ उसका जादू काफी फीका पड़ा है और स्थानीय मुद्दों से वो भागती दिखती है। जबकि विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे अहम होते हैं। लोकसभा चुनावों में आज भी मोदी पर ही भरोसा किया जाता है कि वो ही अन्त में पार्टी की नैया पार लगा सकते हैं; लेकिन अपनी ख़राब होती छवि को लेकर मोदी भी चिन्ता में हैं। राजनीति के कुछ जानकार 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले होने वाले राज्यों-मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनावों को 2024 का सेमीफाइनल मान रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए एक-डेढ़ महीने पहले चुनाव आयोग ने चुनावी तारीखों का ऐलान किया था। अगर इस बार भी समय पर चुनाव हुए, तो फिर पिछली बार की ही तरह एक-डेढ़ महीने ही चुनावी तारीखों की घोषणा होने की सम्भावना है। लेकिन अगर चुनाव पहले ही होने की तैयारी चल रही है, तो फिर तीन-चार महीने में ही पूरी तस्वीर साफ़ हो जाएगी और यह भी पता चल जाएगा कि भाजपा की आगामी चुनावों, ख़ासतौर पर लोकसभा चुनावों को लेकर क्या तैयारी है? देखना होगा कि इससे पहले भाजपा की दक्षिणी राज्यों, उत्तरी राज्यों में क्या तैयारी है। कहा तो यह जाता है कि उत्तरी राज्यों में भाजपा का वोट बैंक मज़बूत है; लेकिन दक्षिणी राज्यों में उसी एंट्री मुश्किल है। लेकिन इस बार मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान का रुख़ देखकर यह नहीं लगता कि उत्तरी राज्यों में भी अब भाजपा के लिए वो जन-समर्थन मिल सकेगा, जो साल 2014 और साल 2015 में मिला था। ज़ाहिर है इसकी वजह मोदी मैजिक का फीका होना है।
पूर्व चुनावों का होना इस बात पर भी निर्भर करता है कि अगर 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले मोदी सरकार ने नये मंत्रिमंडल का गठन किया, तो चुनाव समय पर ही होंगे। हाँ, यह ज़रूर है कि मोदी सरकार का सारा का सारा तंत्र चुनावी तैयारी में लग चुका है और यह कोशिश की जा रही है कि जितने भी शिलान्यास, उद्घाटन करने हैं, वो 2024 के चुनावों से पहले ही कर लिए जाएँ। यहाँ तक कि पुराने संसद भवन को म्यूजियम बनाकर उसका उद्घाटन करने की भी तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं। इन सब चीज़ों के मद्देनज़र आगामी सभी चुनाव बेहद दिलचस्प होने वाले हैं।
येवगेनी के विद्रोह के सूत्रधार को लेकर हैं कई चर्चाएँ
रूस में जून का आख़िरी पखवाड़ा काफ़ी हलचल वाला रहा। एक विद्रोह हुआ, जिसके बाद दुनिया भर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। लेकिन पुतिन ने जिस रणनीति से इस कथित विद्रोह का सामना किया और बाग़ी हुए निजी सेना और वागनर ग्रुप के मुखिया येवगेनी प्रिगोझिन को उनके रूसी होने के ही हथियार से परास्त किया, वह अपने आप में अनोखा था।
अभी भी अपने देश में कई भीतरी ख़तरों के बावजूद पुतिन इस विद्रोह के बहाने कई निशाने साधने में सफल रहे हैं। वागनर ग्रुप ने जब अचानक विद्रोह किया, तो पुतिन ने इसे देश के ख़िलाफ़ विद्रोह की संज्ञा दी। उन्होंने कुछ ही घंटे के भीतर राष्ट्र को दो बार सम्बोधित किया और बाग़ियों के ख़िलाफ़ सख़्ती का सन्देश दिया। अभी 12 घंटे भी नहीं हुए थे कि वागनर ग्रुप के मुखिया येवगेनी प्रिगोझिन को पीछे हटते हुए हथियार डालने पड़े और उन्होंने एक समझौते के बाद अपने लड़ाकों को वापस जाने का निर्देश दिया। पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से में रूस के राष्ट्रपति पुतिन के देश छोडऩे की ख़बरें भी ग़लत साबित हुईं।
येवगेनी पर तभी दबाव बन गया था, जब राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए पुतिन ने इसे विश्वासघात क़रार दिया। पुतिन ने लोगों और रूस की रक्षा करने का वादा किया। उन्होंने यह भी कहा कि रूस अपने भविष्य के लिए सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है। येवगेनी को इसकी सफ़ाई देनी पड़ी और उन्होंने अपने लड़ाकों को देशभक्त बताया। रूसी जनता का रुख़ पुतिन के साथ दिखा लिहाज़ा येवगेनी को अपने लड़ाकों को मॉस्को की तरफ़ आगे बढऩे से रुकने के आदेश देने पड़े।
इसके बाद रूस ने साफ़ किया कि इस घटनाक्रम से उसके यूक्रेन में ऑपरेशन पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह जारी रहेगा। सिर्फ़ 12 घंटे के भीतर विद्रोह को परास्त करने की पुतिन ने जैसी रणनीति अपनायी उससे उनके और ताक़तवर होने की संभावना है। उन्होंने विद्रोह के तुरन्त बाद ही बाग़ियों पर जिस तरह हमला कर उन्हें चेताया था, उस से ही ज़ाहिर हो गया था कि येवगेनी सफल नहीं होंगे।
येवगेनी के पीछे कौन?
येवगेनी की कथित बग़ावत को लेकर कई रिपोट्र्स सामने आयी हैं। पता नहीं इनमें कितने सच्चाई है? इनमें एक यह भी थी कि इस विद्रोह को लेकर येवगेनी प्रिगोझिन और अमेरिका के कथित तौर पर ‘सीक्रेट डील’ थी। कहा गया कि पुतिन के इतने भरोसेमंद येवगेनी का विद्रोह कथित रूप से सोची-समझी साज़िश थी। कुछ रिपोट्र्स में यह दावा किया गया कि रूस में जो कुछ भी हुआ उसके पीछे कथित तौर पर अमेरिका का हाथ था। यह भी दावा किया गया कि येवगेनी को इसके एवज़ में कथित रूप से अमेरिका की ओर से बड़ी राहत दी गयी।
सारे घटनाक्रम के दौरान अमेरिका वागनर को लेकर काफ़ी नरम दिखा। जानकारी के मुताबिक, वागनर ग्रुप पर अफ्रीकी देशों में सोने के खनन के आरोपों के मामले में प्रतिबन्ध लगना था। आरोप यह थे कि येवगेनी सोने के खनन की कमायी रूस के यूक्रेन के साथ युद्ध में इस्तेमाल कर रहा था। अब सुनने में आ रहा है कि अमेरिका प्रतिबंध टालने की सोच रहा है। वागनर के लड़ाके यूक्रेन युद्ध में ही नहीं, बल्कि लीबिया, माली और सूडान में भी काम करते हैं। उधर एक और थ्यूरी यह चली है कि येवगेनी का विद्रोह वास्तव में ‘पुतिन समर्थित’ था, जिसमें वह यह जानना चाहते थे कि ऐसे हालत में रूस के भीतर और बाहर कौन उनके ख़िलाफ़ आता है, ताकि उसकी पहचान की जा सके।
पुतिन ने जिस तरह येवगेनी के विद्रोह को देश से विश्वासघात बताया उससे रूस की जनता मज़बूती से उनके पीछे खड़ी दिखी। येवगेनी के विद्रोह से जुड़ा सारा घटनाक्रम भी काफ़ी नाटकीय रहा, जिस कारण यह सवाल उठा कि कहीं यह पुतिन की ही रणनीति का हिस्सा तो नहीं था? पुतिन को चालाक रणनीतिकार माना जाता है। यह कैसे हो सकता है कि रूस की जासूसी संस्था के प्रमुख रहे पुतिन को अपने ही वफ़ादार के विद्रोह की जानकारी न मिले?
पुतिन के साथ खड़े रहे सब
येवगेनी के विद्रोह के बावजूद रूस में तमाम नेता, सेना, जनता और रूसी राज्यों के नेता पूरी ताक़त से पुतिन के साथ खड़े रहे, जिससे संकेत मिलता है कि पश्चिमी मीडिया में पुतिन को लेकर रूस में नाराज़गी की जो ख़बरें आती रही हैं, वो सही नहीं थीं। इस विद्रोह के बहाने पुतिन ने यह भी जाँचने की कोशिश की कि क्या रूस के भीतर दूसरे लोग भी उनके ख़िलाफ़ विद्रोह की बात करेंगे? लेकिन ऐसा नहीं हुआ। होता, तो उनकी पहचान इस बहाने हो जाती।
पुतिन के दोस्त माने-जाने वाले बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने बाग़ी येवगेनी से बातचीत की। रूस की सरकारी समाचार एजेंसी स्पुतनिक न्यूज के मुताबिक, इस मध्यस्थता का अच्छा नतीजा निकला और प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए वागनर नेता ने तनाव कम करने का विकल्प चुना। इसके तुरन्त बाद उन्होंने अपने लड़ाकों को वापस लौटने का निर्देश दिया।
स्पुतनिक न्यूज के मुताबिक, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव से जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या वागनर पीएमसी के साथ हुई घटनाओं का यूक्रेन में ऑपरेशन पर असर पड़ेगा? तो उनका जवाब था- ‘किसी भी परिस्थिति में नहीं। यूक्रेन में विशेष सैन्य अभियान जारी है। अग्रिम पंक्ति में हमारे सैनिक वीरता का प्रदर्शन कर रहे हैं। वे यूक्रेन के सशस्त्र बलों के जवाबी हमले का काफ़ी प्रभावी ढंग से और सफलतापूर्वक मुक़ाबला कर रहे हैं। ऑपरेशन जारी रहेगा।’
यहाँ यह बताना भी सही होगा कि यूक्रेन के साथ रूस का युद्ध वास्तव में पूरे नाटो के साथ है और पुतिन ने इसे बेहतर तरीक़े से सँभाला है। तटस्थ रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यूक्रेन के पीछे अमेरिका सहित पूरी नाटो की ताक़त रही है। येवगेनी के विद्रोह के समय अमेरिका ने इस मामले पर सधा हुआ रुख़ अपनाया और कहा कि वह घटनाओं पर नज़र रखे हुए हैं। यह माना जाता है कि रूस की सेना यूक्रेन युद्ध में येवगेनी की मिशनरी के साथ मिलकर लडऩे में तालमेल की दिक़्क़त महसूस कर रही थी। येवगेनी के बेलारूस चले जाने के बाद अब शायद यह समस्या उन्हें न झेलनी पड़े। येवगेनी से समझौते में यह ज़ोर दिया गया कि तनाव में शामिल वागनर सैनिकों पर मुक़दमा नहीं चलाया जाएगा।
उधर रूस ने रूस में आईआरजीसी और अन्य मीडिया में पुतिन के देश से पलायन की ख़बरों को फ़र्ज़ीवाड़ा बताते हुए इन्हें पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। येवगेनी प्रिगोझिन की स्थिति पर प्रवक्ता पेस्कोव ने कहा कि व्यवसायी को देश छोडऩे की अनुमति दी जाएगी। इससे पहले येवगेनी के जो वीडियो सामने आये थे, उनमें वह पुतिन सहित रक्षा मंत्री को भी चुनौती देते दिख रहे थे। समझौते के बाद रूस ने कहा कि प्रिगोझिन के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला समाप्त कर दिया जाएगा और वह बेलारूस के लिए रवाना हो जाएँगे। उन्होंने मीडिया के लोगों से कहा- ‘यदि आप पूछते हैं कि क्या गारंटी है कि प्रिगोझिन बेलारूस के लिए रवाना हो सकते हैं, तो आपको बता दें कि यह रूसी राष्ट्रपति के शब्द हैं।’
येवगेनी ने इससे पहले रूस के रक्षा मंत्रालय पर लगाया था कि उसने वागनर के शिविर पर मिसाइल हमला किया है। साथ ही जवाबी कार्रवाई की बात कही थी। हालाँकि रूस के रक्षा मंत्रालय ने इस आरोप से इनकार किया और उकसावे का आरोप लगाया। इसके कुछ घंटे बाद ही वागनर लड़ाकों के दक्षिणी रूसी शहर रोस्तोव-ऑन-डॉन में एक सैन्य फैसिलिटी पर क़ब्ज़ा करने की रिपोर्ट आयीं। इसके ही बाद येवगेनी प्रिगोझिन ने अपने लड़ाकों को मॉस्को की तरफ़ बढऩे का आदेश दिया था। अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने भी सूत्रों के हवाले से लिखा- ‘विद्रोह से पहले अमेरिका के अधिकारियों को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को इस ख़तरे के बारे में अलर्ट करने की कोई योजना नहीं थी, क्योंकि उन्हें डर था कि रूस उन पर त$ख्तापलट करने का आरोप लगा सकता है।’ रिपोट्र्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारी कथित तौर पर इस संभावित संघर्ष को लेकर परेशान थे, क्योंकि उन्हें चिन्ता थी कि रूस में अराजकता से परमाणु जोखिम पैदा हो सकते हैं। वागनर के विद्रोह के बाद रूस के विदेश मंत्रालय ने पश्चिम को चेतावनी दी कि रूस के ख़िलाफ़ इस तरह की कोई भी कोशिश बेकार होगी। वहीं पूर्व रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने कहा- ‘एक प्रमुख परमाणु शक्ति में त$ख्तापलट के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं और मॉस्को ऐसा कभी नहीं होने देगा।’
भगवान राम के जीवन पर आधारित बॉलीवुड फ़िल्म ‘आदिपुरुष’ को जिस हिन्दुत्व के एजेंडे को मज़बूत करने के तहत बनाया गया, वो एजेंडा फेल हो चुका है। हिन्दुओं में धार्मिकता का प्रसार करने के लिए बनी यह फ़िल्म रिलीज होते ही हिन्दू संगठनों के निशाने पर आ गयी। अब इस फ़िल्म का विरोध हिन्दू संगठन ही कर रहे हैं। इस फ़िल्म के डायलॉग और पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर से लेकर फ़िल्म के सभी किरदार निशाने पर हैं। कोई इस फ़िल्म को भद्दा मज़ाक़ बता रहा है, कोई इसे फूहड़ता की पराकाष्ठा बता रहा है, तो कोई इसे भगवान राम और राम भक्त हनुमान के साथ-साथ सभी पात्रों की वेशभूषा, शारीरिक बनावट और बातचीत के तरीक़ों को बकवास बता रहा है। सबसे ज़्यादा बवाल डायलॉग्स को लेकर मचा है।
इतने पर भी फ़िल्म की टीआरपी बढ़ाने के लिए फ़िल्म के रिलीज से पहले ही करोड़ों की कमायी करने का प्रोपेगेंडा रचकर यह दिखाया जा रहा है कि फ़िल्म बहुत अच्छी है। राजनीतिक लोग भी इस फ़िल्म के विवाद में कूद गये हैं। भाजपा ने तो इस फ़िल्म में इतनी रुचि दिखायी है कि भाजपा नेताओं ने चंद अज्ञात हिन्दू दानियों के नाम पर मुफ़्त टिकट तक बँटवाये हैं। लेकिन जब विवाद हुआ और फ़िल्म आदिपुरुष के ख़िलाफ़ हिन्दू संगठनों ने ही मोर्चा खोल दिया, तो ये हिन्दू दानी ख़ामोशी से ग़ायब होने लगे। लेकिन बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है।
महाराष्ट्र से लेकर पूरे देश में हिन्दू संगठन इस फ़िल्म के विरोध में उतर आये हैं। नेपाल के काठमांडू में तो इस फ़िल्म का इतना विरोध हो रहा है कि हर भारतीय फ़िल्म को नेपाल में बैन करने के लिए मोर्चा खुल गया है। कहा जा रहा है कि काठमांडू में अब कोई बॉलीवुड फ़िल्म नहीं चलने दी जाएगी। हालाँकि भारत में इस फ़िल्म पर हिन्दू संगठन और भाजपा के लोग बंटे हुए नज़र आ रहे हैं। भाजपा के लोग इस फ़िल्म में ओछे डायलॉग बदलने से ख़ुश हैं और कह रहे हैं कि जिन डायलॉग्स का विरोध हुआ, उन्हें बदल दिया गया है। लेकिन वहीं फ़िल्म का विरोध करने वाले हिन्दू संगठनों का कहना है कि इस फ़िल्म के ज़रिये हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ किया गया है। कहा जा रहा है कि इस फ़िल्म के डायलॉग और पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर, हीरो (राम बने) प्रभास और हीरोइन (सीता बनीं) कृति सेनन का विरोध हो रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि इस फ़िल्म को हिन्दुत्व के एजेंडे के तहत बनाया गया है और बड़ी चालाकी से रावण की भूमिका एक मुस्लिम एक्टर को दी गयी है। इससे ब्राह्मण कुल में जन्मे प्रकांड पंडित रावण को एक ख़तरनाक विलेन की तरह दिखाकर मुस्लिम समाज को रावण का चेहरा दिखाने की कोशिश की गयी है। हालाँकि फ़िल्म का विरोध हिन्दू संगठन ही कर रहे हैं, मुस्लिम समाज इस पर ख़ामोश है। यह विरोध इतना तगड़ा है कि हिन्दू संगठन सिनेमा घरों में ताले लगाने की माँग कर रहे हैं। कुछ हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने इस फ़िल्म के विरोध में अपना सिर मुंडवा लिया है। मनोज मुंतशिर को पुलिस सुरक्षा देनी पड़ी है।
इस बीच एक फोटो वायरल हो रहा है, जिसमें मनोज मुंतशिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे हाथ जोड़े खड़े हैं और प्रधानमंत्री एक हाथ से उनके हाथों के थामे दूसरे हाथ से उनकी बाँह पकडक़र उन्हें उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं। बता दें कि पिछले कुछ महीनों से मनोज मुंतशिर के नाम में उनका जातीय सरनेम शुक्ला जोडक़र दिखाया जा रहा है और उनके कुछ ऐसे कार्यक्रम कराये जा रहे हैं, जिसमें वो हिन्दुत्व का एजेंडा बढ़ाते हुए दिख रहे हैं। वायरल हो रही प्रधानमंत्री के साथ उनकी तस्वीर को इसी हिन्दुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने और फ़िल्म आदिपुरुष को बनाने का एजेंडा बताया जा रहा है।
इस फ़िल्म में एक-एक किरदार का विरोध किया जा रहा है और लोग रामानंद सागर की रामायण और उसके डायलॉग लिखने वाले राही मासूम रज़ा की तारीफ़ कर रहे हैं। विरोध इतना हो रहा है कि माता सीता की भूमिका निभाने वाली कृति सेनन के बचाव में उनकी माँ को आना पड़ा है। उनकी माँ गीता सेनन ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाली है, जिसमें लिखा है कि ‘जय श्री राम। जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन तैसी…। इसका अर्थ है कि अच्छी सोच और दृष्टि से देखो, तो सृष्टि सुन्दर ही दिखायी देगी। भगवान राम ने ही हमें सिखाया है कि शबरी के बेर में उसका प्रेम देखो, न कि ये कि वो जूठे थे। इंसान की ग़लतियों को नहीं देखो, उसकी भावनाओं को समझो। लेकिन विरोध करने वाले इतने ख़फ़ा हैं कि वो किसी भी हाल में इस फ़िल्म को नहीं चलने देना चाहते। लोग इस फ़िल्म को नौटंकी कह रहे हैं और इसे भगवान राम, माता सीता और राम भक्त हनुमान का अपमान बता रहे हैं। आदिपुरुष के डायलॉग्स पर आम लोगों से लेकर हिन्दू संगठन, कुछ चर्चित लोग भी ख़फ़ा बताये जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि फ़िल्मों और फ़िल्मी सितारों के विरोध पर हमेशा एकजुट हो जाने वाले बॉलीवुड कलाकार इस फ़िल्म के विरोध पर ख़ामोश हैं, बचाव उन्हें ही करना पड़ रहा है, जिनका विरोध हो रहा है। अगर ग़ौर करें, तो देखेंगे कि पिछले कुछ वर्षों में हिन्दुत्व को बढ़ावा देने को लेकर बनी कुछ फ़िल्मों के विरोध पर फ़िल्म में एक्टिंग करने वालों को छोडक़र बाक़ी के बॉलीवुड कलाकार ख़ामोश रहे हैं।
दरअसल लोग ‘आदिपुरुष’ फ़िल्म को ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फ़िल्मों की तरह ही एक प्रोपेगेंडा मान रहे हैं। इस फ़िल्म का प्रोपेगेंडा इस बात से भी साबित होता है कि इसे दिखाने के लिए मुफ़्त हॉल टिकट बाँटने वाले कहाँ से आ गये, जबकि आज तक ऐसा नहीं हुआ कि किसी फ़िल्म के टिकट बाँटने के लिए एक नये तरह के दानदाता प्रकट हो जाएँ।
किसी थिएटर में फ़िल्म मुफ़्त दिखाने और फ़िल्म को टैक्स मुफ़्त करने जैसे मामले तो सामने आये हैं; लेकिन मुफ़्त टिकट बाँटने के लिए ऐसे अज्ञात लोगों का सामने आना, जिनका फ़िल्म से कोई सीधा रिश्ता तक नहीं है; समझ से बाहर की बात है।
फ़िल्म आदिपुरुष के विरोध का यह हाल है कि इसके डायरेक्टर ओम राउत के ट्विटर और इंस्टाग्राम पर उनका जमकर विरोध हो रहा है। प्रभास की लोकप्रियता भी इस फ़िल्म से ख़तरे में आयी है और मनोज मुंतशिर पर भी हिन्दू विरोधी होने के आरोप लग रहे हैं। हालाँकि लोग कुछ दिनों में भूल जाएँगे, हो सकता है कि इस फ़िल्म और इसके बनाने वालों का विरोध शान्त करने के लिए जल्द ही कोई और धार्मिक फ़िल्म बन जाए, जिससे हिन्दू संगठन ख़ुश हो जाएँ। क्योंकि जिन लोगों ने इस फ़िल्म से राजनीतिक फ़ायदे लेने चाहे, वो ऐसी फ़िल्मों को जानबूझकर जनता को परोसेंगे, जिससे उनका फ़ायदा हो। बॉलीवुड का ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल करोड़ों लोगों के साथ-साथ फ़िल्मी दुनिया से भी एक छलावा है।
अच्छा यह है कि इस फ़िल्म के विरोध में हिन्दू संगठन शान्ति से विरोध कर रहे हैं। सिनेमा घरों में फ़िल्म देखने आने वालों को हिन्दू संगठनों के लोग हाथ जोडक़र फ़िल्म देखने से मना कर रहे हैं। जिस फ़िल्म को देखने के लिए हिन्दू संगठन काफ़ी उत्साहित थे, फ़िल्म के डायलॉग सुनने और फ़िल्म का ट्रेलर देखने के बाद से ही वो ही ख़फ़ा हो गये। जबकि यह प्रचार किया गया था कि फ़िल्म आदिपुरुष पूरी दुनिया में धूम मचा देगी। देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी फ़िल्म को देखने के लिए एडवांड बुकिंग हो रही है। लेकिन भारत के पड़ोसी देश नेपाल में ही फ़िल्म का जबरदस्त विरोध हुआ है। कई सिनेमा घरों से फ़िल्म हट चुकी है। बताया जा रहा है कि आदिपुरुष फ़िल्म बनने के समय से ही इसका विरोध हो रहा था; लेकिन वो विरोध चंद लोगों का था, इसलिए फ़िल्म बनाने वालों पर इसका कोई असर नहीं हुआ, और उन्होंने हिन्दुओं के आस्था वाले त्रेता युग के पात्रों को अभद्र ढंग से पेश करते हुए उनकी भाषा और उनकी वेशभूषा को भी अजीबोग़रीब बना दिया, जो कि उन ऐतिहासिक पात्रों का अपमान है। इस फ़िल्म को बनने मे तीन वर्ष लगे, और इन तीन वर्षों में इस फ़िल्म को लेकर कई विवाद हुए। बताया जा रहा है कि जब अगस्त 2020 में फ़िल्म आदिपुरुष का टाइटल जारी करने के दौरान प्रभास का पोस्टर भगवान राम के नये रूप में जारी किया, तब कुछ लोगों ने इस पर सवाल उठाये; लेकिन फ़िल्म बनाने वालों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। यह भी कहा गया कि इस फ़िल्म का ये पोस्टर एक एनिमेटेड फ़िल्म लॉर्ड शिवा के एक पोस्टर की नक़ल है। इसके बाद सैफ़ अली ख़ान के रावण की भूमिका में आने की चर्चा हुई, तो भी कुछ लोगों ने विरोध दर्ज कराया। तब सैफ़ अली ख़ान ने अपने रोल और उसके महत्त्व को लोगों को बताया कि वह किस प्रकार एक बड़े राजा की बहन की नाक काटने को लेकर जस्टिस करने के लिए लड़ाई को लेकर उत्सुक हैं। लेकिन सैफ़ अली ख़ान के इस बयान पर भी ख़ूब विवाद हुआ। इसके बाद अक्टूबर, 2022 में आदिपुरुष का पहला टीजर अयोध्या में हुए ग्रैंड इवेंट के साथ शेयर किया गया, तो लोगों ने इसे ख़राब बताया। अब फ़िल्म का विरोध इतना बढ़ गया है कि फ़िल्म के डायलॉग बदलकर उसे दबाने की कोशिश की गयी है।
इसी साल अप्रैल में मुंबई हाई कोर्ट में इस फ़िल्म के मेकर्स, कलाकारों और डायरेक्टर ओम राउत के ख़िलाफ़ एक याचिका दर्ज भी हुई थी, जिसमें फ़िल्म के किरदारों को अनुचित तरीक़े से दिखाने और इस फ़िल्म के द्वारा हिन्दुओं की भावनाओं का आहत करने का आरोप लगाया गया है। इस फ़िल्म में फ़िल्माये गये सीन के अलावा एक विवाद इस बात को लेकर भी छिड़ा हुआ है कि आदिपुरुष के डायरेक्टर ओम राउत ने तिरुमाला मंदिर में पूजा के बाद वापस जा रही कृति सेनन को किस किया। इस किस का वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो हंगामा हो गया। खैर 16 जून जब सिनेमा घरों में आदिपुरुष फ़िल्म रिलीज हुई, तो इसे देखने के लिए भारी भीड़ जुटी, क्योंकि इसमें ज़्यादातर के पास मुफ़्त में मिले सिनेमा के टिकट थे; लेकिन इस फ़िल्म के विरोध ने मुफ़्त में फ़िल्म देखने वालों के इरादों पर भी पानी फेर दिया, क्योंकि हिन्दू संगठन सिनेमा घरों के सामने पहुँचकर फ़िल्म का विरोध करने लगे। हाल यह हुआ कि अभद्र भाषा में लिखे गये डायलॉग बदलने के बावजूद विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है।