कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण का चुनाव प्रचार अंतिम दौर में है। यहां अब सारे मुद्दे गौण हो चुके हैं और महिला आरक्षण का मुद्दा बड़ा चुनावी हथियार के रूप में उभर कर सामने आया है। दरअसल, सीधी जंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच है। दोनों दिग्गज नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा कर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल का चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांकुड़ा के बरजोरा की एक जनसभा में कांग्रेस, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर जबरदस्त हमला किया और कहा कि इन लोगों ने महिला आरक्षण का विरोध करके एक तरह से ‘भ्रूण हत्या’ जैसा अपराध किया है। लेकिन उनकी सरकार महिलाओं को उनका हक और प्रतिनिधित्व देने के लिए वचनबद्ध है।
इधर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के इस हमले के सामने रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय बेहद आक्रामक रणनीति अपनाई है। उन्होंने उक्त प्रकरण को एक नए नैरेटिव में तब्दील कर दिया है। ममता बनर्जी का दावा है कि उनकी सरकार महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर केवल भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धरातल पर दिख रहा है। साथ ही, जब राष्ट्रीय स्तर पर महिला आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा भी शुरू नहीं हुई थी, तब उनकी सरकार ने पंचायत से लेकर विधानसभा स्तर तक महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर दी थी।
ममता बनर्जी अब प्रत्यक्ष रूप से महिला मतदाओं से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि अब दोनों ही पक्ष खुद को महिलाओं का असली हितैषी साबित करने की होड़ में लगे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि अब महिलाओं के लिए कोटा 33 प्रतिशत नहीं, बल्कि 50 प्रतिशत होना चाहिए। तृणमूल सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने भी सार्वजनिक रूप से महिलाओं के लिए ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी की मांग उठाई है।
सितम्बर 2023 में जब संसद में महिला आरक्षण विधेयक भारी बहुमत से पारित हुआ था, उस दौरान तृणमूल ने इसका समर्थन किया था। लेकिन पार्टी ने दो प्रमुख चिंताएं जताई थीं, जिनमें पहली ओबीसी महिलाओं के लिए कोटा नहीं होना और दूसरा इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ कर देखना।
इस बार तृणमूल कांग्रेस ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के विरोध में मतदान किया। जिससे यह विधेयक गिर गया। ममता बनर्जी का आरोप है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना केंद्र सरकार की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
ममता बनर्जी का मानना है कि परिसीमन का असली मकसद लोक सभा सीटों की वर्तमान संख्या 550 से बढ़ाकर करीब 850 करना है। यदि ऐसा होता है तो इससे देश का संघीय ढांचा प्रभावित होगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस विधेयक को एक मुखौटा करार दिया है। वह मजबूती के साथ कहती हैं कि वर्ष 2024 के लोक सभा के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 29 में से 11 महिलाओं को संसद में भेजा जो करीब 38 प्रतिशत है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 14 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। इसके इतर कन्याश्री, रूपश्री और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं को वे महिला केंद्रित शासन के सबसे बड़े प्रमाण के रूप में पेश कर ही हैं।
ममता के इस रुख का विपक्ष भी समर्थन कर रहा है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने उन्हें सराहा है। वहीं, वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने भी 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। चिदंबरम का तर्क है कि जब 2023 के संशोधन में पहले से ही अनुच्छेद 334-ए जोड़ दिया गया था तो इसे लागू करने में इतनी देर क्यों की गई। उनका मानना है कि यह कदम तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी राज्यों के प्रचार को प्रभावित करने के लिए उठाया गया है। यह महज एक राजनीतिक स्टंट के सिवा कुछ और नहीं है।
बहरहाल, महिला आरक्षण का यह पूरा विवाद बंगाल चुनाव के केंद्र में है। एक तरफ भाजपा इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है तो वहीं तृणमूल कांग्रेस अपने जमीनी रिकॉर्ड और केंद्र की मंशा पर सवाल उठा कर चुनावी मैदान में डटी है। ऐसे में अब यह देखने वाली बात होगी कि बंगाल की जनता आरक्षण के मुद्दे को किस रूप में लेती है, सुधार या राजनीतिक दांवपेंच के रूप में। हां, इतना तो तय है कि इसका असर निश्चित रूप से चुनाव पर पड़ेा।



