नई दल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच चल रही सीजफायर बातचीत एक बार फिर अनिश्चितता के घेरे में आ गई है। इस्लामाबाद में होने वाली बैठक को लेकर जहां अमेरिका तैयार नजर आ रहा है, वहीं ईरान का रुख अभी भी साफ नहीं है। कभी बातचीत के लिए हामी भरना और कभी चुप्पी साध लेना—इसी असमंजस ने पूरे मामले को उलझा दिया है।
28 फरवरी से शुरू हुआ यह तनाव अब सैन्य ताकत और कूटनीति के बीच फंसा हुआ दिखाई दे रहा है। पहली बातचीत से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला था और अब 22 अप्रैल की समय सीमा खत्म होने के करीब है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका इस डेडलाइन को आगे बढ़ाएगा या फिर हालात और बिगड़ सकते हैं।
दरअसल, बातचीत जिन मुद्दों पर होनी थी, उनमें भी बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां मिसाइल कार्यक्रम पर चर्चा होनी थी, अब ध्यान यूरेनियम संवर्धन और होर्मुज जलडमरूमध्य पर शिफ्ट हो गया है। यही वो जगह है जहां सबसे ज्यादा पेच फंसा हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्ती से रोक लगाए, जबकि ईरान इस पर किसी भी तरह की सख्ती मानने को तैयार नहीं दिख रहा।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी दोनों देशों के बीच खींचतान जारी है। यह दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है और इस पर नियंत्रण को लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब यह मुद्दा दोनों देशों के लिए ‘रेड लाइन’ बनता जा रहा है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी बाधा भरोसे की कमी बनकर सामने आई है। ईरान को अमेरिका की मंशा पर संदेह है। हाल ही में समुद्र में हुई कार्रवाई, जिसमें ईरानी जहाज को रोका गया, उसने इस अविश्वास को और गहरा कर दिया है। ईरान का मानना है कि अमेरिका दबाव बनाकर उसे झुकाने की कोशिश कर रहा है।
वहीं, अमेरिका की ओर से भी सख्त रुख जारी है। डोनाल्ड ट्रंप के बयान लगातार तनाव को बढ़ा रहे हैं, जिससे बातचीत का माहौल और मुश्किल होता जा रहा है।
कुल मिलाकर, हालात ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हो गए हैं जहां एक तरफ बातचीत की कोशिशें हैं, तो दूसरी तरफ टकराव का खतरा भी बना हुआ है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आखिरी वक्त में कोई रास्ता निकलेगा या फिर यह तनाव और गहराएगा।




