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कोरोना: कर्नाटक सरकार ने एडवाइजरी जारी कर मास्क पहनने की दी सलाह, यूपी और केरल में 5 लोगों की मौत

देश में पिछले 24 घंटे में कोरोना के 335 नए मामले सामने आए है। इसी के साथ उत्तर प्रदेश और केरल में कोरोना से पांच लोगों की जान चली गर्इ है।

केरल में कोरोना का सबसे घातक वेरिएंट जेएन-1 पकड़ में आया है और इससे सबक लेते हुए कर्नाटक सरकार ने एडवाइजरी जारी की है। स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव ने प्रदेश के सभी वरिष्ठ नागरिकों और अन्य बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए मास्क पहनने की सलाह जारी की है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सोमवार को हेल्थ बुलेटिन में कहा कि रविवार को कोरोना केस 1700 से ज्यादा हो गए हैं। केरल मे कोरोना का सबसे नया वेरिएंट पकड़ में आया है, जिसने पहले सिंगापुर और फिर अमेरिका और चीन में केसों को काफी बढ़ा दिया है। पड़ोसी राज्य में कोरोना के बढ़ते केसों को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने भी एडवाइजरी जारी की है।  

राजस्थान के दौसा में स्कूल जा रही 13 साल की बच्ची के साथ किया गया गैंगरेप

राजस्थान के दौसा में 13 साल की बच्ची के साथ गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया गया है। बच्ची 8वीं क्लास की छात्रा है। बच्ची के साथ इस घटना को तब अंजाम दिया गया जब वह परीक्षा देने के लिए जा रही थी।

असिस्टेंट पुलिस सुपरिटेंडेंट रामचंद्र सिंह नेहरा ने बताया कि, “लालसोट कस्बे का मंडवारी थाना क्षेत्र में घटना हुई जब दो आरोपियों ने बच्ची को अगवा कर लिया। बच्ची के साथ गैंगरेप के बाद उन्होंने इसे मलरना डूंगर में एक पेट्रोल पंप के पास छोड़ कर भाग गए। रविवार रात दो आरोपियों को हिरासत में लिया गया है और प्राथमिक पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा।”

नेहरा ने आगे बताया कि, “स्थानीय पुलिस ने बच्ची के माता-पिता से संपर्क किया और दौसा पुलिस से भी बात की जिसके बाद दोनों मौके पर पहुंचे। पूछताछ के दौरान बच्ची ने बताया कि एक आरोपी सुरेश मीणा (22) को वह जानती है। वह एक अन्य आरोपी के साथ बाइक से आया और उसे जबरन बाइक पर बैठा लिया। बाद में उन्होंने उसके साथ गैंगरेप किया।”

बता दें, पीड़िता के बयान के आधार पर मंडवारी पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 363, 376, 376 डी और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। बच्ची की मेडिकल जांच और आरोपियों से पूछताछ जारी है।

अवैध निर्माण से त्रस्त उत्तराखण्ड

जोशीमठ और सिल्क्यारा हादसों के बावजूद नहीं सीखा कोई सबक़

उत्तराखण्ड में पर्यावरण से खिलवाड़ रुकना चाहिए। पहाड़ों पर अवैध निर्माण के चलते वहाँ का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ रहा है। कई बार इस अवैध निर्माण के चलते हादसे हुए हैं और बड़ी संख्या में लोग असमय मृत्यु का शिकार हुए हैं। हाल में उत्तरकाशी के सिल्क्यारा में अचानक बंद हुई सुरंग काटकर उससे भले ही 41 श्रमिकों को किसी तरह 17 दिन के बाद बाहर निकाल लिया गया और वहाँ फ़िलहाल काम भी रोक दिया गया है। लेकिन साथ लगते नैनीताल में तमाम निर्माण कार्य धड़ल्ले से हो रहे हैं। पारिस्थितिक रूप से नाज़ुक इस पर्यटन शहर में भवन निर्माण के नियमों का उल्लंघन हो रहा है और भ्रष्ट अधिकारी उल्लंघनकर्ताओं के साथ मिले हुए हैं। इसी का ख़ुलासा कर रही तहलका एसआईटी की ख़ास रिपोर्ट :-

उत्तराखण्ड में निर्माण के कई नियम बने हैं; लेकिन क़ानून को ताक पर रख आपको सब कुछ मिलेगा- ज़मीन, रिजॉर्ट, भवन और वो सब कुछ जो आप चाहते हैं। उत्तराखण्ड में तमाम पर्यावरणीय ख़तरों के बावजूद इस ग़ैर-क़ानूनी धंधे से जुड़े लोग, जिनमें सरकारी कर्मी भी शामिल हैं; सक्रिय हैं। बस पैसा फेंको, तमाशा देखो।

‘तहलका’ रिपोर्टर ने इस मामले में केशव गिरी गोस्वामी से बातचीत की। हैरानी की बात यह है कि गोस्वामी सरकारी कर्मचारी हैं और नैनीताल में झील विकास प्राधिकरण (एलडीए) में 1993 से पर्यवेक्षक के रूप में कार्यरत हैं। गोस्वामी ने दावा किया- ‘मैं आपको सभी निर्माण नियमों में आपकी पसंद का रिसॉर्ट बनाने में सहायता के लिए ढील दूँगा। मैं मानता हूँ कि एक व्यवसायी के लिए सभी नियमों का पालन करना हमेशा संभव नहीं। व्यावहारिक रूप से देखा जाए, तो हर नियम का सख़्ती से पालन करने से व्यापार में बाधा आ सकती है। मैं एक ड्राफ्ट्समैन का प्रबंध करूँगा, जो मेरा मातहत है। वह आपके लिए रिसॉर्ट का एक नक़्शा बनाएगा और आपको इसके एवज़ में दिये जाने वाले पैसे (रिश्वत) बताएगा, जो आपको देने होंगे।’

एक ग़ौर करने लायक बात है। उत्तराखण्ड हाल के वर्षों में बार-बार दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के कारण सुर्ख़ियों में रहा है। चाहे वह जोशीमठ और नैनीताल के घरों में दरारें आने की बात हो, चाहे सन् 2013 में केदारनाथ में हुई त्रासदी हो या फिर चाहे हाल में उत्तरकाशी में सिल्क्यारा सुरंग में मलबा गिरने से 41 लोगों के 17 दिन तक सुरंग के भीतर फँसे रहने की घटना हो। सवाल उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों हुआ है? क्यों ऐसी भयावह घटनाएँ इस पहाड़ी राज्य में हुई हैं? ‘तहलका’ एसआईटी की जाँच-पड़ताल का लब्बोलुआब यह है कि हाल के वर्षों में उत्तराखण्ड के इस पहाड़ी राज्य में हुई त्रासदियों से किसी ने कोई सबक़ नहीं सीखा है।

विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन तमाम हादसों में यदि कोई एक सामान्य सूत्र है, वह है- उत्तराखण्ड में चल रहा अवैध और अनियोजित निर्माण। पर्यावरणविद् भविष्य में आपदाओं को रोकने के लिए सरकार पर तत्काल निर्माण रोकने पर भी ज़ोर देते हैं। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने जब गोस्वामी के सामने भवन निर्माण के नियमों तो तोडक़र उत्तराखण्ड के नैनीताल में एक रिसॉर्ट बनाने का काल्पनिक प्रस्ताव पेश किया, तो आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने तत्परता से हमारी योजना पर सहमति जता दी। यहाँ यह बता दें कि एलडीए विभाग में केशव गिरी गोस्वामी की ज़िम्मेदारी उनकी निगरानी वाले भवाली और मुक्तेश्वर जैसे इलाक़ों में अवैध निर्माण रोकना है। लेकिन अपने अधिकार क्षेत्र में नियमों और एलडीए के निर्माण मानदंडों का पालन सुनिश्चित करने की जगह यह श्रीमान ‘तहलका’ एसआईटी के खोजी रिपोर्टर को तमाम नियम-क़ायदे ताक पर रखकर मदद करने के लिए बे-हिचक सहमत हो गये। यह सब रिश्वत के बदले होना है, जो रिपोर्टर ने बाद में देने की बात कही।

रिपोर्टर : मतलब सारे क़ानून, नियम तो फॉलो नहीं कर पाएँगे हम..?

गोस्वामी : सारे कौन करता है, कोई नहीं करता है…सारे तो कर ही नहीं पाता है, बिल्डिंग पास करवाने पे, नक़्शा पास करवाने पे, अप्रूव हो गया…वो ख़ुद मिलेगा, कितना ख़र्चा लगेगा बताएगा

रिपोर्टर : ड्राफ्टमैन आपका, नाम क्या है उसका?

गोस्वामी : नाम क्या है, …उसका? ए.के. ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग..।

रिपोर्टर : आपका बंदा है?

गोस्वामी : मेरा बंदा है। …मेरे कहने पर नक़्शा भी बनाएगा, ख़र्चा भी बताएगा, मेरे कहने पर…। आप अपना हैडेक ही उसको दे दीजिए जी…!

रिपोर्टर : एलडीए का ख़र्चा? सरकारी ख़र्चे की बात नहीं कर रहा हूँ मैं।

गोस्वामी : हाँ; प्राइवेट ख़र्चा। …हाँ, वो ख़र्चा जाएगा। …ङ्गङ्गङ्ग, ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग पर, वो तो आपको पता ही है; वो व्यवस्था वो करेगा।

रिपोर्टर : मुझे एक बंदा चाहिए था, एलडीए का; मिल नहीं रहा था, अब आप मिल गये।

‘तहलका’ रिपोर्टर ने गोस्वामी को सूचित किया कि एलडीए में हमारे संपर्कों की कमी के कारण वह रिश्वत का पैसा सीधे उन्हें देना पसंद करेंगे। गोस्वामी ने इस बात को स्वीकार कर लिया।

रिपोर्टर : मैं किसी को नहीं जानता, …मैं आपको जानता हूँ।

गोस्वामी : हाँ-हाँ।

रिपोर्टर : जो भी लेन-देन पैसे की होगी, वो आपसे होगी।

गोस्वामी : हाँ-हाँ; …कोई चिन्ता नहीं है।

‘तहलका’ रिपोर्टर ने गोस्वामी से बातचीत में दोहराया कि हमारे रिसॉर्ट के निर्माण के लिए एलडीए के निर्धारित सभी नियमों का पालन करना हमारे लिए अव्यावहारिक होगा। गोस्वामी ने रिपोर्टर को इस मामले में दोबारा आश्वस्त करने की कोशिश की और हर नियम का पालन करने की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए उनकी बात पर सहमति जतायी।

रिपोर्टर : देखो, अगर 100 नियम हैं एलडीए के बिल्डिंग बनाने में, तो 100 के 100 नियम फॉलो करना तो मुश्किल है?

गोस्वामी : फिर तो बिल्डिंग ही नहीं बनेगी…।

रिपोर्टर : बिल्डिंग बनेगी नहीं, …मुनाफ़ा भी नहीं होगा।

गोस्वामी : कहीं नहीं बनेगी…।

रिपोर्टर : तो 100 में से 10 फॉलो कर लिये, 90 छोड़ दिये।

गोस्वामी : 10 तो ऑटोमेटिकली छूट जाते हैं…।

रिपोर्टर : नहीं, 90 छोड़ दिये, 10 मान लिये।

गोस्वामी : नक़्शे जब पास हो जाते हैं तो, …तो फिर तो आदमी का ख़ुद भी राइट होता है। …प्लानिंग की ज़िम्मेदारी भी होती हैं। …पास तो तभी करेंगे, जब कुछ नॉम्र्स तो होंगे उसके; वैसे तो करेंगे नहीं। …खुले में तो कर नहीं देंगे। …हर चीज़ देखना पड़ता है। …बैकग्राउंड में कितना छोडऩा है, क्या छोडऩा है, …सब चीज़ देखनी पड़ती है।

गोस्वामी को जब ‘तहलका’ रिपोर्टर ने बताया कि जोशीमठ संकट के बाद उत्तराखण्ड में रिसॉर्ट बनाना एक कठिन काम बन गया है, क्योंकि सरकार ने पहाडिय़ों में निर्माण गतिविधियों पर अपनी निगरानी बढ़ा दी है; तो गोस्वामी ने रिपोर्टर के डर को दूर करने की कोशिश की और कहा कि वह उनकी हर संभव मदद करेंगे।

रिपोर्टर : हमारे कई साथी हैं, जिनके मुक्तेश्वर में रिसॉर्ट हैं। …वो सब कह रहे हैं- भाई पहाड़ों में काम करना बहुत मुश्किल हो गया है, जोशीमठ के बाद। …जोशीमठ में जो क्रैक्स आये हैं ना, …इसलिए हमें भी डर लगता है; कहीं हमें भी सारे नियम फॉलो न करने पड़ें।

गोस्वामी : नियम तो कुछ फॉलो करने पड़ते हैं, जो मदद होगी, धरातल में वो करेंगे।

अब ‘तहलका’ के कैमरे पर गोस्वामी ने दावा किया कि जब नैनीताल में निजी मकानों में दरारें आयीं, तो कैसे एलडीए ने मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की थी। हालाँकि उन्होंने कहा कि जिन मकानों में दरारें आयीं, उन्हें एलडीए ने मंज़ूरी नहीं दी थी। लेकिन प्राधिकरण ने क़ानूनी कार्रवाई कर इज़्ज़त बचाने का काम किया।

रिपोर्टर : तो नैनीताल की बिल्डिंग्स में भी क्रैक्स आ गये हैं क्या?

गोस्वामी : नैनीताल में भी आये हैं।

रिपोर्टर : क्रैक्स आये हैं! जोशीमठ की तरह?

गोस्वामी : हाँ-हाँ।

रिपोर्टर : तो वो क्या प्राइवेट बिल्डिंग में हैं, …या सरकारी?

गोस्वामी : अपने मकानों में हो रहे हैं, …पर्सनल।

रिपोर्टर : तो उसमें एलडीए का क्या लेना-देना?

गोस्वामी : एलडीए का लेना-देना तो पूरा होता है…अतिक्रमण में; …पूरा ज़िला विकास प्राधिकरण के अंडर वो है, …बिलकुल बॉडी के अंदर है ये।

रिपोर्टर : जिन मकानों में क्रैक्स हैं, वो एलडीए से अप्रूव्ड हैं?

गोस्वामी : वो अप्रूव्ड नहीं होंगे, …वो ऐसे बनाये होंगे; …हमने क़ानूनी कार्रवाई की होगी, अपनी बचत तो की होगी हमने।

रिपोर्टर : हा..हा…हा….।

गोस्वामी : बचत तो करते ही हैं हम अपनी।

रिपोर्टर : मतलब, बिना एरिया के अप्रूव किये होंगे?

गोस्वामी : हाँ, थोड़ी-बहुत, …1-2 कमरे का।

‘तहलका’ रिपोर्टर ने गोस्वामी को नैनीताल में एक रिसॉर्ट के निर्माण के लिए ज़मीन लेने के अपने इरादे के बारे में बताया; जब रिपोर्टर ने उप-नियम के उल्लंघन के साथ भवन की मंज़ूरी के लिए उनकी मदद माँगी। उन्होंने फिर यह कहकर रिपोर्टर को आश्वस्त करने की कोशिश की कि किसी के लिए भी सभी नियमों का पालन करना कठिन है।

रिपोर्टर : अब ऐसा है, मुझे ज़मीन बताओ; …क्लीन ज़मीन। पेड़ न हो, …15-20 नाली, उस पर हम बनाएँगे रिसॉर्ट। ठीक है? अब उसमें वायलेशन हो, वो आपको देखना है।

गोस्वामी : जो भी है, मैं करवा दूँगा; …जो मदद होगी।

रिपोर्टर : ठीक है। …क्यूँकि उसमें सारे क़ानून हैं, अगर हम फॉलो करेंगे।

गोस्वामी : सारे तो नहीं हो पाते हैं, …कोई कर ही नहीं पाता है।

जब रिपोर्टर ने पूछा कि इस मदद के बदले उन्हें कितनी रिश्वत देनी होगी, तो गोस्वामी ने जवाब दिया कि वह काम पूरा होने के बाद ही कैश लेंगे। हमारी तरफ़ से रिश्वत का भुगतान ड्राफ्ट्समैन को नहीं, बल्कि सिर्फ़ उसे करने का इरादा जताने पर वह तुरन्त सहमत हो गया।

रिपोर्टर : आप अपना ख़र्चा-पानी बता दो?

गोस्वामी : जो चाय-पानी दे दोगे, जब आपका काम हो जाएगा; आपसे तो हम ले लेंगे।

रिपोर्टर : मैं पैसे आप ही को दूँगा; …ड्राफ्टमैन को नहीं।

गोस्वामी : कोई दिक़्क़त नहीं है, …कोई टेंशन नहीं है। मैं आपको मिलवाऊँगा।

रिपोर्टर : आपका जॉब ही होगा? …अंडर दि टेबल की बात कर रहा हूँ मैं।

जैसे ही रिसॉर्ट के निर्माण के सम्बन्ध में चर्चा आगे बढ़ी, गोस्वामी ने रिपोर्टर को सभी सम्बन्धित सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देकर परियोजना को आसान बनाने में अपनी सहायता का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा कि यह निर्माण प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाना सुनिश्चित करेगा और साथ ही अधिकारियों की तरफ़ से विनियमन उल्लंघनों से भी सुरक्षित करेगा।

रिपोर्टर : रिसॉर्ट बनाने के लिए खुली छूट दे देना।

गोस्वामी : रिसॉर्ट के लिए तो ज़मीन देखूँगा भैया!

रिपोर्टर : ज़मीन देख लो आप, उसमें रिसॉर्ट बनाने के लिए खुली छूट दे देना।

गोस्वामी : खुली छूट क्या, …जब मैं साथ रहूँगा, तो कोई दिक़्क़त ही नहीं है।

रिपोर्टर : ऐसा न हो आप ओ.के. कर दो, …ऊपर वाला कोई टाँग अड़ा दे?

गोस्वामी : न-न, ऐसा नहीं है। …ऊपर वाला टाँग नहीं अड़ाएगा। …ऊपर वाले का भी मुँह बन्द किया जाता है, …वो बंदा ऊपर तक होता है, ऐसा कुछ नहीं है।

रिपोर्टर : ठीक है, …तो आप ज़मीन बता दो उसके बाद एक बार और बैठ लेंगे। …उसमें पूरा एस्टीमेट बना लेंगे। ख़र्चा-पानी, आपका कितना होगा, उसका कितना होगा, फिर कॉटेज की कॉस्टिंग कर लेंगे।

गोस्वामी : ठीक है।

गोस्वामी ने अब गारंटी दी कि वह एलडीए के वरिष्ठ अधिकारियों को सँभाले लेंगे, ताकि यह सुनिश्चित हो जाएगा कि वे हमारे निर्माण का विरोध नहीं करेंगे। इस भरोसे को पुख़्ता करने के लिए उन्होंने ‘तहलका’ रिपोर्टर से 1,000 रुपये स्वीकार कर लिये।

रिपोर्टर : ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग कौन हैं अभी आपके?

गोस्वामी : ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग जी हैं, …ङ्गङ्गङ्गङ्गङ्ग बहुत बढिय़ा आदमी है।

रिपोर्टर : ये तो आईएएस हैं?

गोस्वामी : आईएएस हैं।

रिपोर्टर : आपकी जान-पहचान है?

गोस्वामी : बहुत बढिय़ा।

रिपोर्टर : ऊपर से कोई दिक़्क़त तो नहीं आएगी बनाने में?

गोस्वामी : कोई दिक़्क़त नहीं आएगी, आप कोशिश करेंगे, तो कोई दिक़्क़त नहीं आएगी। …कोशिश करनी पड़ेगी।

रिपोर्टर : ये लो ख़र्चा-पानी, …रुपीज 1,000 हैं।

गोस्वामी : हाँ ठीक है, …आप मुझे फोन कीजिएगा। जहाँ पे लोगे मुझे बता दीजिएगा, आप अपनी समझ से लीजिए।

रिपोर्टर : चाहे अपार्टमेंट लूँ?

गोस्वामी : हाँ, बस जानकारी दीजिएगा।

गोस्वामी ने रिपोर्टर को सूचित किया कि मुक्तेश्वर और भवाली उनके अधिकार क्षेत्र में हैं और हमें अपने रिसॉर्ट निर्माण के लिए इन क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण करने की सलाह दी। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया। चूँकि ये क्षेत्र उनके दायरे में हैं, इसलिए हमें (रिपोर्टर को) निर्माण प्रक्रिया के दौरान किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।

गोस्वामी : मुक्तेश्वर में चलेगा…?

रिपोर्टर : एलडीए है मुक्तेश्वर में?

गोस्वामी : हाँ-हाँ; है। …मेरी ही ड्यूटी है।

रिपोर्टर : जहाँ आपकी ड्यूटी हो..।

गोस्वामी : भवाली मेरी ड्यूटी है।

रिपोर्टर : मुक्तेश्वर?

गोस्वामी : मेरी है।

रिपोर्टर : नैनीताल?

गोस्वामी : नैनीताल विश्नोई की है।

रिपोर्टर : मतलब, आपके होते हुए कोई दिक़्क़त न आये?

गोस्वामी : दिक़्क़त आने की कोई बात ही नहीं है। …जहाँ हम बीच में आएँगे तो, …अगर हम बीच में हैं तो कोई दिक़्क़त नहीं है।

गोस्वामी ने इसके बाद रिपोर्टर के (काल्पनिक) रिसॉर्ट के नक़्शे को मंज़ूरी देने के लिए ज़रूरी चीज़ों के बारे में बताया और उन्हें भरोसा दिलाया कि वह (गोस्वामी) इस काम को तेज़ी से करवा सकते हैं। वित्तीय पहलू को लेकर उन्होंने बताया कि ड्राफ्ट्समैन हमें (रिपोर्टर को) उस राशि के बारे में बता देगा, जो रिश्वत के रूप में देनी होगी।

रिपोर्टर : अब ये बताओ सर! …रिसॉर्ट में जो नक़्शे वग़ैरह पास होंगे कॉटेज के, उसका क्या हिसाब-किताब रहेगा?

गोस्वामी : उसका पहले आर्किटेक्ट से नक़्शा बनवाएँगे, …फिर उसके बाद मालूमात करके ऑनलाइन सबमिट हो जाएगा।

रिपोर्टर : एलडीए में?

गोस्वामी : एलडीए में…जो भी उसके, …जो भी उसके नॉम्र्स होंगे; …जो एरिया आपको छोडऩा पड़ेगा, …साइड एरिया छोडऩा पड़ता है; …जिस हिसाब से…पेड़ भी न गिरे. …पेड़ भी नहीं गिरना चाहिए; …पेड़ हुए, तो दिक़्क़त आ जाएगी।

रिपोर्टर : पेड़ नहीं होने चाहिए? ठीक है उसके बाद?

गोस्वामी : उसके बाद पास करवाएँगे। …पास जो करवाएगा, वो डॉक्यूमेंट्स लेगा आपके, …वो एलडीए का ही होगा।

रिपोर्टर : ख़र्चा-पानी?

गोस्वामी : ख़र्चा-पानी…, वो करवा देंगे।

रिपोर्टर : मतलब, जल्दी हो जाए नक़्शा पास। अच्छा सर! रिसॉर्ट बनाने में कोई दिक़्क़त परेशानी आये…?

गोस्वामी : अरे, कुछ नहीं होता।

रिपोर्टर : क्योंकि आप एलडीए में हो इसलिए बात कर रहा हूँ। …ऐसा न हो कि ये का$गज़ लाओ, ये अप्रूवल लाओ?

गोस्वामी : अरे, ऐसा है…वो तो बिडिंग होगी ना! …वो जो डॉक्यूमेंट बनाता है, नक़्शा बनाता है, ख़ुद लगा रहता है उसके पीछे। …तुम्हारा हैडेक कम रहेगा…वैसे हम भी दिलवा देंगे, … तो पूरा हैडेक उस पर रहेगा।

रिपोर्टर : ख़र्चा-पानी तो बता दो?

गोस्वामी : ख़र्चा-पानी वो बताएगा।

रिपोर्टर : एक अंदाज़ा तो बता दो?

गोस्वामी : अंदाज़ा तो वही बताएँगे साहिब! …कितना है? क्या है?

रिपोर्टर : मान लो 20 कॉटेज हैं, …20 कॉटेज का नक़्शा अप्रूव करवाना है हमें, …कितना ख़र्चा आ जाएगा?

गोस्वामी : अब ये तो ड्राफ्ट्समैन बताएगा।

उत्तराखण्ड में सन् 2013 में आयी त्रासदी ने दुनिया को खौफ़ से भर दिया था। यह विनाशकारी घटना, जोशीमठ की घटना और हाल में सिल्क्यारा सुरंग में लोगों के फँसने की घटना से ये सवाल उठते हैं कि क्या हमने इन त्रासदियों से कुछ सीखा है?

विशेषज्ञ हिमालयी राज्यों में अनियोजित, अवैध और भारी-भरक़म निर्माण को इन आपदाओं के सबसे बड़े कारणों में से एक मानते हैं। ‘तहलका’ एसआईटी के इस ख़ुलासे से साफ़ ज़ाहिर होता है कि पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनियों के बावजूद उत्तराखण्ड में अवैध और अनियमित निर्माण गतिविधियाँ जारी हैं। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि कैसे सरकारी अधिकारियों और भू-माफ़िया की मिलीभगत से यह सब हो रहा है।

अब हमारे सामने एक स्पष्ट विकल्प है कि क्या अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता मिलनी चाहिए या पारिस्थितिकी तंत्र को प्राथमिकता मिलनी चाहिए? क्या हम अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए हिमालय के बेहद नाज़ुक संतुलन और सुंदरता का नुक़सान करने को तैयार हैं? यह कार्रवाई करने का वक्त है।

हादसों के बीच पहाड़ों पर अवैध निर्माण जारी!

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के केंद्र के 2019 के फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरक़रार रखने के बाद वर्तमान पखवाड़े में मीडिया में काफ़ी बहस देखी गयी। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ में विभाजित करने के फ़ैसले को बरक़रार रखते हुए कहा कि अनुच्छेद-370 एक अस्थायी प्रावधान था और राष्ट्रपति को इसे रद्द करने का अधिकार था। न्यायालय ने सरकार को अगले साल 30 सितंबर तक विधानसभा चुनाव कराने का निर्देश दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फ़ैसले को ‘आशा, प्रगति और एकता की शानदार घोषणा’ क़रार दिया। लेकिन क़रीब पाँच महीने पहले अस्तित्व में आये इंडिया (ढ्ढ.हृ.ष्ठ.ढ्ढ.्र.) गठबंधन के लिए चुनौतियाँ दोहरी हो गयी हैं। पहली चुनौती अपनी प्रतिक्रिया तैयार करना है; क्योंकि कई नेताओं का मानना है कि लोकप्रिय भावना हमेशा अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के पक्ष में रही है। दूसरी चुनौती लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनाव में मिली हार के रूप में सामने आये झटके को सहना है। ये नतीजे न केवल कांग्रेस के लिए, बल्कि इंडिया गठबंधन के सभी 28 दलों वाले समूह के लिए भी झटका हैं; जिन्होंने निकट भविष्य में आती दिख रही समस्याओं पर मंधन के लिए 19 दिसंबर को एक बैठक बुलायी है।

ऐसे परिदृश्य में जब मीडिया का ध्यान केवल राजनीति पर था, ‘तहलका’ ने यह पता लगाने के लिए अपने विशेष जाँच दल (एसआईटी) को भेजा कि क्या उत्तरकाशी में सिल्क्यारा सुरंग की घटना से कोई सबक़ सीखा गया है? और क्या पारिस्थितिकीय चिन्ताओं का निवारण किया गया है? विडंबना यह है कि ‘तहलका’ एसआईटी ने पाया कि उत्तरकाशी में इस सुरंग में 41 श्रमिकों के 17 दिन तक तक फँसे रहने के बावजूद पर्यावरण की दृष्टि से नाज़ुक इस पहाड़ी क्षेत्र में सब कुछ (निर्माण कार्य) सामान्य रूप से चल रहा है; क्योंकि भवन निर्माण नियमों का उल्लंघन करने वालों की भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलीभगत होती है। जोशीमठ और नैनीताल के मकानों में दरारें, केदारनाथ में 2013 की त्रासदी या हाल ही में सिल्क्यारा सुरंग ढहने जैसी घटनाएँ इस बात पर ज़ोर देती हैं कि हिमालय के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण के ख़तरों को उजागर किया जाए।

‘तहलका’ की आवरण कथा ‘अवैध निर्माण से त्रस्त उत्तराखण्ड’ में एसआईटी ने अपने कैमरे में अवैध निर्माण कराने वाले दलालों को रिकॉर्ड किया है, जो भवन निर्माण के नियमों का उल्लंघन करते हुए उत्तराखण्ड में हमारे रिपोर्टर को (एक काल्पनिक) भवन निर्माण कराने की पेशकश करता है। ‘तहलका’ ने इससे पहले ‘रिश्वत दो, नक़्शा पास’ और ‘क्या इतिहास बन जाएगा जोशीमठ?’ जैसी ख़बरें प्रकाशित की थीं, ताकि यह रेखांकित किया जा सके कि कैसे दलाल और कुछ अधिकारी मिलीभगत से भवन उपनियमों का उल्लंघन करके निर्माण करा रहे हैं। इससे पता चलता है कि हाल की घटनाएँ पर्यावरणीय मानदंडों को लागू कर ख़ामियों को दूर करने के बजाय ख़तरे की घंटी के रूप में काम कर रही हैं और किसी भी फुलप्रूफ रोडमैप को लाने में विफल रही हैं। दलालों द्वारा पहाड़ों पर चलायी जा रही गतिविधियाँ आपदाओं को निमंत्रण देने के अलावा कुछ भी नहीं हैं। ऐसी घटनाओं को उजागर करने के ‘तहलका’ के प्रयास का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब सुनियोजित सुरंग बचाव अभियान को लेकर राष्ट्रव्यापी उत्साह के बीच यह सवाल उठाये जाने चाहिए कि क्या सिल्क्यारा अग्निपरीक्षा से सबक़ लिया गया है? और क्या अवैध निर्माण रोकने के लिए कारगर उपाय शुरू किये गये हैं?                                                     

प्रताडि़त पुरुषत्व

हरिशंकर परसाई लिखते हैं- ‘दिवस कमज़ोर का मनाया जाता है। जैसे महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवस। कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता।’ इस अद्र्धसत्य से सहमत होना कठिन है। यदि परसाई आज होते, तो वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल पुरुष दिवस की बात करते और आधुनिक नारियों को कमज़ोर लिखने से पहले कई दफ़ा मनन करते।

आधुनिक सत्य यह है कि सार्वभौमिक रूप से न सही पर आधुनिक नारियों से पुरुष समाज प्रताडि़त-पीडि़त है और इस प्रताडऩा के नित नये स्वरूप परिलक्षित हो रहे हैं। इनमें से ही एक है विवाह सम्बन्ध-विच्छेद, जैसे पिछले दिनों देश के बड़े उद्योगपति रेमंड ग्रुप के चेयरमैन गौतम सिंघानिया के तलाक़ की ख़बर आयी। उनकी पत्नी ने तलाक़ के निपटान के लिए उनके नेटवर्थ का 75 प्रतिशत यानी तक़रीबन 11,660 करोड़ रुपये की माँग की है। प्रतीत होता है कि तलाक़ का इस्तेमाल अब आर्थिक लाभ अर्जित करने एवं पुरुषों से प्रतिशोध का साधन हो गया है।

कभी माक्र्स ने पुरुष को दुनिया का सबसे पहला शोषक एवं नारी को पहली शोषित माना था। अब परिस्थितियाँ उलट हैं। तलाक़ के मुक़दमे शामिल गुज़ारा-भत्ता पुरुषों के शोषण का सबसे बड़ा अस्त्र बन गया है। विवाह को महिला-पुरुष का सामाजिक बंधन मानने वाले, दोनों के बीच योग्यता और लैंगिक समानता की तक़रीर करने वाले महिला गुज़ारा भत्ते के पुरुष विरोधी दुराचार पर मौन क्यों हो जाते हैं? यह कहना पड़ेगा कि भारतीय दण्ड संहिता और क़ानून लैंगिक भेदभाव पर आधारित है। यदि अदालतें पुरुष को महिला की आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाने के लिए बाध्य कर सकती हैं, तो वही अदालतें महिलाओं को पुरुषों के प्रति सामाजिक कर्तव्यों के पालन के लिए क्यों नहीं बाध्य करती हैं? कहने को तो संविधान का अनुच्छेद-14 लैंगिक समानता का दावा करता है; लेकिन क्या वास्तविकता में ऐसा ही है? जैसे अनुच्छेद-9 आरसीआर में पति के पक्ष में निर्णय आने के बाद भी यदि महिला ससुराल न जाए, तो अदालत बेबस हो जाती है; किन्तु सीआरपीसी-125 के तहत वसूली के मामले अदालत असीमित शक्तियाँ प्रदर्शित करती है।

कहने को संतान पति-पत्नी की साझी ज़िम्मेदारी है और इसे जाने भी दें, तो पुरुष अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाने से पीछे नहीं हटते। लेकिन फिर भी कई पढ़ी-लिखी सक्षम महिलाएँ भी बच्चों की परवरिश के नाम पर पुरुषों का आर्थिक शोषण करने पर उतारू हो जाती हैं। यदि महिला बच्चे की परवरिश करने में असमर्थ है, तो उसकी कस्टडी पिता को दे देनी चाहिए। वास्तव में यह एक सामाजिक-क़ानूनी परंपरा बन गयी है कि पारिवारिक विवादों में सक्षम, सुशिक्षित एवं संसाधनयुक्त महिलाएँ भी सदैव बेचारी और पीडि़त समझी जाती हैं और कितना भी सुसभ्य, संसाधनहीन, भावनात्मक रूप से प्रताडि़त पुरुष हो; दोषी माना जाता है।

अब तलाक़ आधुनिक नारियों के लिए उत्सवपूर्ण जीवन व्यतीत करने का अवसर बन चुका है। बस पुरुष को घरेलू हिंसा, दहेज़ के मुक़दमे में परिवार सहित निपटने की धमकी दीजिए और फिर सामाजिक अपमान से आक्रांत ससुरालियों पर दबाव बनाते हुए अधिक-से-अधिक रक़म निर्वाह-व्यय (एलिमनी) के रूप में प्राप्त कीजिए और फिर स्वच्छंद जीवन जीने का मार्ग खुला ही है। ध्यातव्य है कि लगभग मामलों में इस तलाक़ की कमोबेश वजहें समान ही होती हैं यानी प्रोग्रेसिव, माई बॉडी, माई च्वॉइस वाली नारियों की रिश्तों को त्यागकर स्वकेंद्रण, सामाजिक प्रतिबन्ध रहित स्वच्छंद जीवन और भौतिक सुखों की अतिरेक पूर्ण चाह। आधुनिक, शिक्षित कन्याओं के साथ ये अजीब विडंबना है कि उन्हें जेंटलमैन लडक़े चाहिए, न्यूनतम छ: अंकों में लडक़े की तनख़्वाह हो, बड़े शहर में अपना घर, बैंक बैलेंस, गाड़ी सब चाहिए; लेकिन उसके माँ-बाप नहीं चाहिए। पति अपने भाई-बहन की ज़िम्मेदारी न ले और जल्द-से-जल्द परिवार का त्यागकर अपना पृथक जीवन जीये। अपनी आय का इस्तेमाल केवल पत्नी के सुख भोग में करे। लेकिन जब पति ये मानसिक संकीर्णता स्वीकार नहीं करता, तो इसका नतीजा होता है- घरेलू कलह, लड़ाई-झगड़े, मारपीट, थाना, पुलिस, दहेज़ और घरेलू हिंसा के मुक़दमे, अदालत-कचहरी, परिवार समेत कारावास, सामाजिक-आर्थिक-मानसिक प्रताडऩा, पत्नी को गुज़ारा भत्ता समेत सेटलमेंट हेतु भारी-भरक़म रक़म जो चाहे अपनी या माँ-बाप की किडनी बेचकर ही जुटानी पड़े और अंतत: तलाक़ के साथ एक पराजित-अपमानित शेष जीवन।

हालाँकि सितंबर, 2023 में दिल्ली उच्च अदालत के एक निर्णय ने परंपरागत फ़ैसलों को नयी दिशा दिखायी। अदालत ने एक सुशिक्षित नौकरीपेशा महिला द्वारा 35,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण ख़र्च के अतिरिक्त 55 हज़ार रुपये के मुक़दमेबाज़ी ख़र्च की माँग वाली याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा कि जीवनसाथी को भरण-पोषण प्रदान करने का क़ानून अलग हुए साथी द्वारा $खैरात की प्रतीक्षा कर रहे बेकार लोगों की फ़ौज बनाने के लिए नहीं है। यहाँ विचार का मुद्दा नारीवादियों चरित्र हनन नहीं है, बल्कि उस विद्रूप स्थिति का विश्लेषण है, जहाँ चारित्रिक अतिवाद की वजह से परिवार नामक संस्था नष्टप्राय अवस्था को प्राप्त होने के क़रार पर है। वैसे भी कुँवर नारायण ठीक ही लिखते हैं- ‘कोई भी बहस जब चरित्रों पर उतर आती है, तो उसमें केवल चरित्रों का हनन होता है, विषयों पर मनन नहीं।’

आधुनिक वैवाहिक सम्बन्धों की नियति में हमेशा पुरुष ही हाशिये पर होता है। हॉलीवुड अभिनेता जॉनी डेप तथा भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन के अदालती मामलों ने दिखाया कि सशक्त पुरुष भी किस क़दर महिलाओं द्वारा शोषित एवं प्रताडि़त हैं। याद करिए जब पारिवारिक कलह से त्रस्त होकर बक्सर के डीएम ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी और एक आईपीएस ने $खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। ज़रा सोचिए, कि ऐसे उच्च शिक्षित एवं विशिष्ट प्रशिक्षित लोग यदि आत्मघातक बन जाएँ, तो उनके मानसिक प्रताडऩा एवं आतंरिक पीड़ा का स्तर क्या होगा?

परसाई के अनुसार पुरुष सदैव ताक़तवर ही होता है। लेकिन वास्तव में ‘मैस्कूलीन फीचर’, ‘जेंटलमैन’, ‘बी रियल मैन’ और ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ के पीछे समाज यह नहीं देख रहा है कि पुरुष किस सामाजिक प्रताडऩा और मानसिक पीड़ा से गुज़र रहें हैं। चूँकि हमारे समाज ने मर्दों के आँसुओं को उनकी कायरता का प्रतीक बना दिया है, इसलिए पत्नी एवं घरेलू कलह से प्रताडि़त पुरुष न बाहर अपना दु:ख कह सकते हैं और न ही किसी संस्था से मदद माँग सकते हैं। अभी भी इस तथ्य को सरकार एवं अन्य सत्ता प्रतिष्ठान स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। महेश कुमार तिवारी बनाम भारत संघ (2023) मामले में दायर याचिका में विवाहित पुरुषों के बीच आत्महत्या के मुद्दे पर शोध हेतु विधि आयोग को निर्देश देने तथा इस मुद्दे से निपटने के लिए ‘राष्ट्रीय पुरुष आयोग’ की स्थापना का सुझाव दिया गया था। परन्तु इस मौलिक माँग को शीर्ष अदालत द्वारा एकतरफ़ा बताते हुए अस्वीकृत कर दिया गया। 2021 में प्रकाशित एनसीआरबी डेटा का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया कि वर्ष 2021 में लगभग 33.2 प्रतिशत पुरुषों ने पारिवारिक समस्याओं के कारण और 4.8 प्रतिशत ने विवाह सम्बन्धी मुद्दों के कारण अपना जीवन समाप्त कर लिया। याचिका के अनुसार, 18,979 यानी लगभग 72 प्रतिशत पुरुषों ने आत्महत्या की।

नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष 18 से 30 साल के 56,543 पुरुषों ने, 30 से 45 साल के 52,054 पुरुषों ने 45 से 60 साल के 30,163 पुरुषों ने आत्महत्या की। रिपोर्ट के मुताबिक, आत्महत्या करने वालों में अधिकतर शादीशुदा थे। कहने को विवाह संस्था प्रेमाश्रय है और साथी प्रेम का स्रोत। ओशो कहते हैं- ‘जिससे मिलने के बाद जीने की उम्मीद बढ़ जाएगी, समझना वो ही प्रेम है।’ लेकिन यह कैसा प्रेम है? जहाँ पुरुष जीवन के बजाय मृत्यु चुनने को बाध्य हो रहे हैं।

एक समय दहेज़ के विरोध में बारात लौटाकर रातोंरात चर्चा में आयी निशा शर्मा के पूरे प्रकरण को अदालत ने ख़ारिज कर दिया। क़रीब नौ साल तक सुनवाई करने के बाद ज़िला अदालत ने 2012 को इस पूरे प्रकरण को सुनियोजित षड्यंत्र क़रार देते हुए एक लडक़े और भरे-पूरे परिवार की ज़िन्दगी बर्बाद करने के लिए निशा शर्मा के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणियाँ की थीं। लेकिन क्या इससे आरोपी बनाये गये मुनीष दलाल और उनके परिवार को इंसाफ़ मिला? उस लम्बे समय तक झेले गये सामाजिक अपमान और आर्थिक संकटों का क्या? लेकिन यह जानने में न उसे खलनायक बनाने वाले मीडिया को रुचि है और न समाज को; क्योंकि वे एक पुरुष है, इसलिए उसके मान-सम्मान की फ़िक़्र करने की ज़रूरत नहीं है।

यह इकलौता मामला नहीं है, बल्कि देश भर में ऐसे फ़र्ज़ी मामलों की शृंखला-सी बन गयी है। उदाहरणस्वरूप वैवाहिक विवादों के सम्बन्ध में हरियाणा के पानीपत के आँकड़ों को देखिए। वहाँ पिछले तीन साल में झूठे मामले दर्ज कराने वाली औरतों के ख़िलाफ़ 50 से ज़्यादा केस दर्ज हुए हैं। 2021 में जहाँ महिलाओं द्वारा दर्ज कराये गये 220 मुक़दमों में 87 को जाँच में झूठा पाकर निरस्त किया गया। वहीं 2022 में दर्ज 178 मामलों में से 67 को फ़र्ज़ी पाकर रद्द किया गया। यह मात्र एक उदाहरण भर है। सर्वविदित है कि वैवाहिक विवाद में दर्ज कराये जाने वाले दहेज़ प्रताडऩा के अधिकांश मामले फ़र्ज़ी और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होते हैं। हालाँकि दहेज़ को सामाजिक दृष्टि से भीख मानने वाले सुधारवाद के ठेकेदारों में से किसी को भी सरकारी नौकरी, बिना सास-ससुर का परिवार, अच्छा बैंक-बैलेंस, ज़मीन-जायदाद वाले लडक़ों से ही अपनी बेटी ब्याहने की ज़िद वैचारिक नीचता तथा घटिया स्वार्थ क्यों नहीं प्रतीत होती? दहेज़ पीडि़ताओं के लिए बड़ी-बड़ी रैलियाँ निकालने वाले ऐसे फ़र्ज़ी मुक़दमों में बर्बाद होने वाले लडक़ों और उनके परिवार पर कोई रुदाली क्यों नहीं करते?

समाज को क्या हो गया है? अक्सर देखा गया है कि महिलाओं को रिश्तों की मर्यादा समझाकर घर जोडऩे के बजाय उन्हें ससुराल पक्ष को प्रताडि़त करने जैसे कुकृत्यों के लिए भडक़ाने हेतु क़रीबी रिश्तेदारों और मित्रों के अतिरिक्त कभी-कभी माँ-बाप भी तत्पर होते हैं। लेकिन स्वयं की कुंठा और स्वार्थ से प्रेरित ये वर्ग है, जो यह नहीं समझता कि किसी परिवार का विघटन अंतत: समाज को चोट पहुँचाता है। जैसा कि रघुवीर सहाय कहते हैं- ‘जब समाज टूट रहा होगा, तो कुछ लोग उसे बचाने नहीं उसमें अपना हिस्सा लेने आएँगे।’

सामाजिक दृष्टि से एक लम्बे समय तक पुरुषवादी मानसिकता का अतिवाद रहा है। आज परिस्थितियाँ उलटी, किन्तु उसी परिवेश में हैं। यानी अब नारीवादी अतिवाद चरम की ओर है। साहित्यकारों ने नारी की वेदना और पीड़ा पर जाने कितने महाकाव्य और ग्रन्थ रच डाले हैं। लेकिन किसी रचनाकार ने अब तक पुरुष के अंतर्मन की वेदना को कागज़ पर उकेरने का प्रयास नहीं किया। पुरुषों के वर्तमान हालात पर मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी का एक शे’र बिलकुल मौजूँ हैं :-

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है।

रोने को नहीं कोई, हँसने को ज़माना है।।’

और यह कोई फ़साना भी नहीं, बल्कि कठोर यथार्थ है। तो क्या कोई संस्था या कोई सरकार है, जो पुरुषों के इस मौन रुदन, मौन दु:खाभिव्यक्ति को सुन और समझ सके?

नष्ट न होने दें मिट्टी की उर्वरा शक्ति

उर्वरक खादों और कीटनाशकों के ज़्यादा उपयोग से बंजर और कमज़ोर हो रही है कृषि भूमि

योगेश

जिस तरह से ग़लत खाना खाने से हमारा पेट ख़राब हो जाता है और पेट ख़राब व कमज़ोर होने पर पूरे शरीर में रोग लगने लगते हैं, उसी तरह से कृषि योग्य भूमि की ताक़त यानी मृदा उर्वरता कम होने पर फ़सलें ख़राब व कमज़ोर पैदा होती हैं। हमारे देश में जबसे यूरिया, डीएपी, फास्फोरस, जिंक, पोटाश, कीटनाशक, फर्टिलाइजर बीज खेती का हिस्सा बने हैं, हमारी कृषि भूमि कमज़ोर होने लगी है। आज देश में मृदा उर्वरता में गिरावट और कृषि भूमि में बढ़ती बंजरता किसानों के सामने एक बड़ी चुनौती है।

समस्या यह खड़ी हो गयी है कि किसान अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, फर्टिलाइजर बीजों और शाकनाशियों का उपयोग बढ़ाते जा रहे हैं। अब हमारे किसानों के पास जैविक खाद नहीं हैं और न ही उनके पास देसी बीजों का भंडार है। मुश्किल से देश के 5-6 प्रतिशत किसानों के पास देसी बीज सुरक्षित हैं और जितनी जैविक खाद देश में होगी, उससे 10 प्रतिशत खेती भी नहीं हो सकेगी। उर्वरक खादों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की गुणवत्ता को ख़राब किया है। खरपतवारनाशी दवाओं और कीटनाशकों के चलते खेती में उगने वाले खरपतवारों से मिलने वाली उर्वरता भी कृषि भूमि को नहीं मिल पा रही है। इससे पशुओं का चारा भी कम हुआ है। मृदा की उर्वरता कम होने से फ़सलों की उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों कम हुई हैं। इससे हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। मिट्टी का स्वास्थ्य का ख़राब होने से कृषि और लोगों का सतत् विकास प्रभावित हुआ है।

हमारे देश में कृषि आजीविका का मुख्य स्रोत है। देश में जनसंख्या बढऩे के हिसाब से हमारी कृषि पैदावार वैश्विक औसत पैदावार की तुलना में बेहद कम है। फ़सलों की पैदावार और मृदा उर्वरता के कम होने के मुख्य कारण ख़राब कृषि पद्धति, ख़राब उर्वरक, ख़राब कीटनाशक और ख़राब बीज हैं। इसके साथ ही कृषि भूमि पर कार्बन की जमती परत, प्रौद्योगिकी और सूचना तक किसानों की अपर्याप्त पहुँच, बुनियादी ढाँचे का कमज़ोर होना भी इसके कारण हैं। सूखा, बाढ़ और चक्रवात जैसी अत्यधिक मौसमी आपदाएँ भी मृदा उर्वरता को कम कर रही हैं।

मृदा की उर्वरता कम होने से ज़्यादा चिन्ता की बात यह है कि देश भर में कृषि क्षेत्र का बड़ा भूभाग अनुपजाऊ या बंजर हो रहा है। बंजर भूमि बढऩे के भी कई कारण हैं। बढ़ते शहरीकरण, भूमि में पानी की कमी, भूजल में बढ़ती क्षारीयता, सिंचाई के पानी की कमी, नहरों नदियों का सूखना और उनमें गंदगी बढऩा इसके मुख्य कारण हैं। मृदा की उर्वरता कम होने और कृषि भूमि को बंजर होने से बचाने के लिए सबसे पहले किसानों को आगे आना होगा। हमने कई किसानों से मृदा में कम होती उर्वरता को लेकर सवाल पूछे। लेकिन ज़्यादातर किसानों को तो मृदा उर्वरता का नाम ही नहीं पता, उन्हें इस बारे में बिलकुल भी जानकारी नहीं है। कई किसानों ने सवाल का अर्थ कुछ और ही समझते हुए अपनी समस्याएँ बतानी शुरू कर दीं।

साफ़ पता चलता है कि किसानों में जागरूकता और समझ की बहुत कमी है। जागरूकता की कमी और संसाधनों के अभाव के कारण किसान अपने खेतों की मिट्टी के कमज़ोर होने को नहीं समझ पा रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे खाद की कमी से अच्छी फ़सल नहीं ले पा रहे हैं। इसलिए अच्छी फ़सल लेने के लिए वे कभी अपने खेतों में उर्वरक, डीएपी, जिंक, फास्फोरस, पोटाश डालते रहते हैं। किसानों में जागरूरता लाने और उनकी कृषि भूमि को बचाने के लिए कृषि मंत्रालय, कृषि विभागों और कृषि वैज्ञानिकों को उनकी मदद करनी चहिए। अगर इसी तरह से मृदा की उर्वरता गिरती रही, तो कृषि क्षेत्र और बुरी दशा में पहुँच जाएगा।

हमारे देश में भूमि के बंजर होने को लेकर हमारे शोधकर्ताओं ने दक्षिण भारत की उपजाऊ भूमि को लेकर 2011 से 2013 के बीच किये अपने अध्ययन के $खुलासे में सबको चौंका दिया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, आंध्र प्रदेश में 14.35 प्रतिशत, कर्नाटक में 36.24 प्रतिशत और तेलंगाना में 31.40 प्रतिशत भूमि बंजर होती जा रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, पेड़-पौधों और जंगली वनस्पतियों का कम होना, भूक्षरण, कहीं पानी का अभाव, कहीं पानी की कमी आंध्र प्रदेश में भूमि के बंजर होने के कारण हैं। भूक्षरण, पेड़-पौधों और वनस्पतियों का कम होना और भूमि में लवणीकरण कर्नाटक में भूमि को बंजर बनाने के कारण निकले। यही सब कारण तेलंगाना की भूमि को बंजर बनाने के रहे। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान रिमोट सेंसिंग से मिले आँकड़ों के आधार पर इन तीनों प्रदेशों में बंजर होती जा रही भूमि की स्थिति दर्शाने के लिए कई मानचित्र तैयार किये। उन्होंने इन प्रदेशों की कृषि भूमि को बंजर होने से बचाने के लिए सुझाव भी दिये। लोगों को सलाह दी कि वे प्राकृतिक संसाधनों के साथ खिलवाड़ न करें और उन्हें बढ़ावा दें। भूमि का अत्यधिक दोहन न करें और मिट्टी के गुण-धर्म के अनुसार खेती करें। औद्योगीकरण और शहरीकरण को बढ़ावा न दें, पर्यावरण को सुधारने के लिए पेड़-पौधे लगाएँ और भूजल को दूषित न करें।

हमें सोचना होगा कि मृदा की उर्वरता लगातार घटते रहने से कृषि भूमि बंजर हो जाएगी। ऐसा होने से हमारे परिस्थितिकी तंत्र और आजीविका पर बुरा असर पड़ेगा, जिससे हमारा जीवन संकट में पड़ेगा। इसलिए जितनी जल्दी हो सके, हमें कृषि भूमि को उपजाऊ बनाने का प्रयास करना होगा। कृषि भूमि कहाँ पर सही है और कहाँ पर उसमें उर्वरता की कमी हो रही है, कहाँ पर कृषि भूमि बंजर हो चुकी है, यह जाँचने के लिए हमें पूरे देश में कृषि भूमि की समय-समय पर जाँच करनी होगी। मृदा की उर्वरता के मूल्यांकन के आधार पर उसमें सुधार के रास्ते अपनाने होंगे। किसानों को उचित कृषि शिक्षा देनी होगी कि वे अपने क्षेत्र की जलवायु, सिंचाई की उपलब्धता और फ़सलों की माँगों के हिसाब से खेती करें। इसके साथ ही किसानों के पास जिन संसाधनों की कमी है, उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए कृषि मंत्रालय, कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विभागों को आगे आना होगा।

किसानों में मृदा की उर्वरता घटने की जानकारी के अभाव के चलते वे इसे नहीं समझते हैं। अब किसान अपने खेतों की मिट्टी की जाँच भी नहीं कराते हैं। जाँच करने पर उन्हें सलाह देने वाले कृषि जानकार उन उर्वरक खादों को खेतों में डालने की सलाह देते हैं, जो कृषि भूमि के लिए हानिकारक हैं। उत्तर भारत की कृषि भूमि अनाजों, फलों सब्ज़ियों, शर्करा फ़सलों, तिलहनों, दालों और औषधियों के लिए बहुत उपयोगी है। दक्षिण भरत की कृषि भूमि अनाजों, मसालों, फलों के लिए बहुत उपयोगी है। पश्चिम भारत की कृषि भूमि अनाजों, सब्ज़ियों, शर्करा फ़सलों और औषधियों के लिए बहुत उपयोगी है। पूर्व भारत की कृषि भूमि फलों, मेवों, औषधियों, सब्ज़ियों और जलस्रोतों के लिए बहुत उपयोगी है। हमारे पूरे देश में जितने खाद्यान्न पैदा होते हैं, उतने दुनिया में कहीं पैदा नहीं होते। लेकिन किसानों के पास कृषि ज्ञान की कमी और कृषि सम्बन्धी विभागों की नीरसता ने हमारी कृषि भूमि को ख़राब करने का काम किया है। हमारे देश में कहीं सिंचाई के पानी की अधिकता है। कहीं बाढ़ आती है, तो कहीं लगातार सूखा पड़ता है। सिंचाई के लिए देश के ज़्यादातर किसान आज भी मानसून पर निर्भर हैं। वर्षा, नदियों और नहरों के अलावा अन्य संसाधनों से सिंचाई करना किसानों के लिए बहुत महँगा पड़ता है। कृषि में बढ़ती लागत से भी किसानों का मनोबल टूटा रहता है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का लाभ भी किसानों को नहीं मिल पा रहा है। इसी की तरह देश में कई सरकारी कृषि योजनाएँ ठंडे बस्ते में पड़ी रहती है। कृषि मंत्रालय का यह कर्तव्य है कि अपने अधीन विभागों को हमारे कृषि क्षेत्र को बचने के लिए आदेश दे और समय-समय पर उनसे रिपोर्ट की माँग करे। कृषि भूमि को बचाने के लिए केंद्र सरकार को एक उचित बजट पास करना चाहिए। राष्ट्रीय कृषि बाज़ारों और कृषि मेलों को बढ़ावा देना चाहिए। इन बाज़ारों और मेलों में किसानों को प्रशिक्षित करने वाले शिविर लगाने चाहिए। हमारे देश में फ़सलों की गिरती गुणवत्ता के चलते हमारे खाद्यान्नों की माँग कई देशों में नहीं है। इन देशों में जैविक खाद्यान्नों की माँग ही रहती है। मिलावटी और उर्वरक खाद्यान्न इन देशों में प्रतिबंधित है।

हमारे किसानों के पास यह एक अवसर है कि वे अपनी खेती को उर्वरक खादों, ख़तरनाक कीटनाशकों और फर्टिलाइजर बीजों से बचाएँ। इससे उनकी फ़सलों की माँग बढ़ेगी और उनके खेतों की मृदा उर्वरता भी बढ़ेगी। इसके लिए किसानों को फ़सल चक्र भी अपनाना होगा और पौधे भी लगाने होंगे। हमारे किसान सबसे बड़े पर्यावरण संरक्षक हैं; इसलिए सरकार को उनके हित में काम करना चहिए।

वोटर ही गारंटी

पाँच राज्यों के अहम चुनाव हो गये और भाजपा तीन राज्यों में अच्छी बढ़त के साथ जीत गयी। दक्षिण में अपनी पकड़ मज़बूत करते हुए कांग्रेस ने कर्नाटक के बाद तेलंगाना में भी अपना झंडा फहरा दिया और पूर्वोत्तर के मिजोरम में कांग्रेस और भाजपा दोनों की ही नहीं चली, जहाँ जनता ने क्षेत्रीय दल जेडपीएम पर भरोसा जताया। देश के लिहाज़ से देखें, तो यह चुनाव 60-40 से भाजपा के पक्ष में रहा। कह सकते हैं कि देश ने मिला-जुला जनादेश दिया है। इन चुनाव नतीजों से जो लोग यह संकेत निकाल रहे हैं कि 2024 का चुनाव दक्षिण और उत्तर भारत के बीच होगा, वे ग़लत साबित हो सकते हैं। पूरे देश के राजनीतिक परिदृश्य को गहराई से देखें, तो हाल के वर्षों में मोदी-शाह की जोड़ी ने अपनी राजनीति का एक ख़ास तरह का अपना इलाक़ा विकसित किया है, जहाँ भाजपा बहुत ताक़तवर है। लेकिन इसके बावजूद ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि इस ख़ास इलाक़े के बाहर भाजपा भी अनगिनत चुनौतियाँ झेल रही है, जिनमें दक्षिण (तामिलनाडु आदि), पूर्वी तटीय क्षेत्र (आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा) के साथ-साथ पश्चिमी तटीय क्षेत्र (कर्नाटक, केरल) में वह हाशिये पर है। ऐसे में एक बहुत संगठित और रणनीति से बनाया विपक्षी गठबंधन भाजपा के लिए गम्भीर चुनौती पेश कर सकता है।

भाजपा का थिंक टैंक जानता है कि तीन राज्यों में उसकी बड़ी जीत 2024 में उसके पूरा लोकसभा चुनाव जीतने की गारंटी नहीं देती। इन तीन राज्यों की कमोवेश सभी सीटें तो उसने 2019 में भी जीती थीं। ऐसे में अधिकतम वह 2019 का नतीजा ही इन तीन राज्यों में दोहरा सकती है। अपनी मज़बूत भाषा और राजनीतिक चतुराई से हार को भी जीत जैसा बताने में माहिर प्रधानमंत्री मोदी ने इसलिए नतीजों की शाम अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बार-बार यह कहा- ‘इन नतीजों से साफ़ हो गया है कि देश की जनता भाजपा को चाहती है।’ मोदी का यह भाषण अपने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने और विपक्ष, ख़ासकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं, का हौसला तोडऩे की एक मनोवैज्ञानिक कोशिश थी। कांग्रेस के कार्यकर्ता उनके इस जाल में फँसे होंगे, तो ज़रूर गहरी निराशा में गये होंगे; क्योंकि ख़ुद उसके नेतृत्व ने इस तरह का मनोवैज्ञानिक जवाबी हमला भाजपा पर नहीं किया।

देखें, तो सच यह है कि कुल पाँच राज्यों में से दो में भाजपा हारी है। इसलिए देश भर का जनादेश उसको नहीं मिला है; जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में दावा किया था। हक़ीक़त यह है कि भाजपा के वर्चस्व को कांग्रेस ने अब दक्षिण में मज़बूत चुनौती दे दी है। आज दक्षिण भारत में भाजपा कहीं भी सत्ता में नहीं। लेकिन सिर्फ़ दक्षिण ही भाजपा की राजनीतिक चिन्ता में नहीं है। देश का राजनीतिक नक़्शा बताता है कि भाजपा आज भी 1980 के दशक वाली कांग्रेस की तरह पैन-इंडिया जनाधार वाली पार्टी नहीं बन पायी है। कुछ राज्य ऐसे हैं, जहाँ भाजपा का एक भी विधायक नहीं है। नहीं भूलना चाहिए कि देश में आज की तारीख़ में सिर्फ़ नौ राज्य ऐसे हैं, जहाँ भाजपा की अपने बहुमत वाली सरकार है। बाक़ी नौ राज्यों में उसकी सरकारें अन्य दलों के गठबंधनों के सहयोग से हैं। इनमें भी कुछ जगह उसकी अपनी सीटें नाममात्र की ही हैं।

तीन राज्यों में हार के बाद कांग्रेस के नेताओं ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये; लेकिन इसके लिए गम्भीर देशव्यापी मुहिम चलाने या क़ानून के दरवाज़े पर दस्तक देने जैसी कोई बात नहीं की। विरोध यदि दिखावे भर का हो, तो जनता उस पर विश्वास नहीं करती। ईवीएम एक ऐसी मशीन है, जिसकी विश्वसनीयता पर सत्ता में आने से पहले सबसे ज़्यादा विरोध भाजपा का रहा है। पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने तो ईवीएम के इस्तेमाल को लोकतंत्र के लिए ख़तरा तक कहा था और बैलट पेपर से ही चुनाव की मज़बूत वकालत की थी। बहुत-से लोग अमेरिका जैसे आधुनिक तकनीक वाले देश का उदाहरण देते हैं, जहाँ आज भी ईवीएम से नहीं, बैलट पेपर से राष्ट्रपति का चुनाव होता है। देश में कई बड़े लोग मानते हैं कि यदि संदेह है, तो ईवीएम की जगह बैलट पेपर से चुनाव करवाने में क्या दिक़्क़त है? 

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जनवरी में अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन होने के बाद भाजपा उसके असर को बनाये रखने के लिए अंतरिम बजट लाकर तय समय से एकाध महीने पहले चुनाव करवाने की कोशिश कर सकती है। अनुच्छेद-370 ख़त्म करने के मोदी सरकार के फ़ैसले पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर भी भाजपा को देश में राजनीतिक लाभ दे सकती है। ऐसे में 2024 में प्रधानमंत्री मोदी यह नारा दे सकते हैं कि यह उनका आख़िरी चुनाव है। लिहाज़ा जनता उन्हें एक और मौक़ा दे। राजनीतिक रूप से यह एक मज़बूत रणनीति होगी, जिसका सामना कांग्रेस के लिए सरल नहीं होगा। इसकी काट के लिए कांग्रेस को भी अपनी तरफ़ से जनता को कोई गारंटी देनी होगी। इंडिया गठबंधन का चेहरा अभी अस्पष्ट है। यदि यह गाठबंधन गति पकड़ता है, तो भाजपा को एक संगठित चुनौती दी जा सकती है। अन्यथा कांग्रेस के पास अकेले चुनाव में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। ऐसा करके वह दक्षिण के राज्यों में तो कमाल कर सकती है; लेकिन हिन्दुत्व की पकड़ वाली मोदी-शाह की मज़बूत पट्टी में उसे दिक़्क़त आएगी।

इस परिदृश्य में भाजपा से मुक़ाबला करने के लिए विपक्ष को अब अपने इंडिया गठबंधन पर जल्दी और गहराई से काम करने की ज़रूरत है। निश्चित ही कांग्रेस उसकी अगुआ होगी और सभी दलों को अपने अहम छोडक़र सीटों का तालमेल करना होगा। इंडिया गठबंधन की 19 दिसंबर को दिल्ली में होने वाली बैठक में इस दिशा में काम हो सकता है। कांग्रेस के पास अवसर है कि वह हिम्मत दिखाए और कुछ बड़े फ़ैसले करे। उसके सभी सांसद चार महीने फील्ड में जाकर पार्टी को ज़मीन पर मज़बूत करने का काम करें। राहुल गाँधी के पास भी अवसर है कि वह ‘भारत जोड़ो’ की एक और यात्रा शुरू करके अधिकतर राज्यों में पार्टी कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दें। चार महीने चीज़ें बदलने के लिए कम नहीं होते। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि तीन राज्यों में हार की उसकी निराशा भी ख़त्म होगी और नयी ऊर्जा से पार्टी कार्यकर्ता आगे बढ़ पाएँगे।

यह चुनाव अपने आपमें काफ़ी विविधता लिये था। कांग्रेस ने सभी राज्यों- ख़ासकर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पूरी तरह अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों अशोक गहलोत, कमलनाथ और भूपेश बघेल को आगे करके उन्हें पूरी छूट दी हुई थी। ये तीन नेता अपने हिसाब से सब चीज़ें तय कर रहे थे। मल्लिकार्जुन खडग़े, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने तीनों राज्यों में चुनाव सभाएँ भले कीं; लेकिन उनका रोल यहीं तक सीमित रहा। कहा जा सकता है कि इन तीन राज्यों में कांग्रेस की हार दरअसल राहुल गाँधी या खडग़े की नहीं, इन तीन नेताओं की हार ज़्यादा है। वैसे ही, जैसे तेलंगाना में रेवंथ रेड्डी की कड़ी मेहनत कांग्रेस की बड़ी जीत का आधार है। भाजपा ने सिर्फ़ प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा आगे रखा था और अपनी रणनीति के मुताबिक उसने बहुत चतुराई से जहाँ-जहाँ भी हो सकता था, धार्मिक ध्रुवीकरण का कार्ड भी खेला। भाजपा इस रणनीति में इन तीन राज्यों में विजयी रही। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा आगे रखना भाजपा की एक और रणनीति का बड़ा हिस्सा था। इस रणनीति को अपनाकर भाजपा ने चुनाव के बाद अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए मुख्यमंत्री पद की किसी भी दावेदारी का रास्ता भी बंद कर दिया। अर्थात् जीत के बाद मुख्यमंत्री तय करने की सारी ताक़त भाजपा नेतृत्व ने अपने हाथ में ले ली।

पाँच राज्यों के नतीजे ज़ाहिर करते हैं कि कांग्रेस ने कुल मिलाकर भाजपा से 10.5 लाख  से ज़्यादा वोट लिये। पार्टी ने छत्तीसगढ़ में 42.23, मध्य प्रदेश में 40.40 और राजस्थान में 39.53 फ़ीसदी वोट लिये, जो उसकी हार के बावजूद उसके जनाधार को दर्शाता है। लेकिन कांग्रेस को भाजपा के मुक़ाबले सिर्फ़ तेलंगाना में ही 59,78,281 वोट ज़्यादा मिले, जो दोनों दलों के बीच 10 लाख के अंतर का बड़ा कारण रहा। मध्य प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस से 35,44,615 वोट ज़्यादा लिये। छत्तीसगढ़ में भाजपा को कांग्रेस से सिर्फ़ 6,32,382 वोट ही ज़्यादा मिले, जो बड़ा अंतर नहीं है। राजस्थान में भी दोनों दलों के बीच सिर्फ़ 8,56,840 का ही अंतर है, जो पूरे राज्य के लिहाज़ से ज़्यादा नहीं है। मिजोरम में भाजपा से दो सीटें कम जीतने के बावजूद कांग्रेस ने उससे 1,10,589 वोट ज़्यादा लिये।

वोटों के इस गणित और विधानसभा बार कांग्रेस की बढ़त वाली लोकसभा सीटों को देखें, तो आज की तारीख़ में कांग्रेस के नेतृत्व वाले पुराने यूपीए को देश भर में 225 सीटों पर बढ़त है। ऐसे में कांग्रेस के लिए यह नतीजे उतने निराशा वाले नहीं हैं। लोकसभा में बेहतर रणनीति और जीत सकने वाली सीटों पर पूरी ताक़त झोंककर वह भाजपा को रक्षात्मक कर सकती है। यह चुनाव गारंटी वाले नेता के नारों से भरा रहा। मोदी की गारंटी, गहलोत और कांग्रेस की गारंटी आदि। लेकिन नेता की गारंटी राजनीतिक है। यह एक नारा हो सकता है। वोटर की गारंटी अपनी ज़रूरतों की पूर्ति और सत्ता के कामकाज पर हाँ या न की मुहर लगाने के लिए है। नेता अपनी तरफ़ से वोट की गारंटी भले मान ले; लेकिन वोटर की कोई गारंटी नहीं है कि वह किसके नाम पर मुहर लगाएगा। अंतिम फ़ैसला वोटर का है। क्योंकि वोटर लोकतंत्र का भगवान है!

उत्तर प्रदेश : विदेशी फंडिंग मामले में निशाने पर मदरसे

उप्रदेश में मदरसों को लेकर फिर नया विवाद सामने आ गया है। इसी वर्ष अवैध मदरसों को बंद करने की उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की मुहिम के बाद अब प्रदेश के 80 मदरसों को लगभग 100 करोड़ रुपये की अज्ञात मदद का मामला सामने आया है। यह मदद फंडिंग के रूप में बीते दो वर्षों से प्रदेश के मदरसों को मिल रही थी। कुछ समाचारों में दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश में 108 मदरसों को बीते दो वर्षों में 150 करोड़ रुपये से अधिक की अज्ञात मदद प्राप्त हुई है।

मदरसों को मिलने वाली इस मदद के समाचार ने मदरसों को मिलने वाली मदद की जाँच के रास्ते खोल दिये हैं। सम्बन्धित कार्यालयों के अधिकारी इसकी जाँच में लग गये हैं कि इतनी बड़ी संख्या में मदरसों को यह मदद कहाँ से हो रही है। मुस्लिम समाज में उत्तर प्रदेश सरकार के प्रति आक्रोश व्याप्त है।

एक मस्जिद के मौलवी इफ़्तिख़ार कहते हैं कि मदरसे मुस्लिम बच्चों को इस्लाम की तालीम देने के लिए हैं। उनमें मुस्लिम बच्चों को मुफ़्त में दीन की तालीम दी जाती है, जिसके लिए हर मुस्लिम अपनी हैसियत के मुताबिक दान देता है। इसमें सरकार को क्यों तकलीफ़ हो रही है? मैं मस्जिद में बच्चों को कुरान की तालीम देता हूँ। मस्जिद में पाँच वक़्त की नमाज़ अता कराता हूँ। अगर मेरे मज़हब के लोग मुझे कुछ नहीं देंगे, तो मेरा घर कहाँ से चलेगा? दीन की किताबें और दूसरे ख़र्चे कहाँ से होंगे? सरकार को इसमें टाँग नहीं अड़ानी चाहिए।

एक अन्य मुस्लिम मोहम्मद फ़रीद कहते हैं कि बात फंडिंग की नहीं है, असल में उत्तर प्रदेश सरकार को मदरसों से तकलीफ़ है। पहले भी सरकार मदरसों पर ताले लगवाने की कोशिशें कर चुकी है। जब कोई तरीक़ा नहीं मिला, तो सरकार फंडिंग का मामला उठाकर मदरसों पर हमला कर रही है।

विदेशी मदद की हो रही जाँच

मदरसों को मिलने वाली अज्ञात मदद की जाँच में लगे विशेष जाँच दलों को मदरसों को बड़े पैमाने पर विदेशी मदद के प्रमाण मिले हैं। विशेष जाँच दलों ने पाया है कि उत्तर प्रदेश में चल रहे मदरसों को खाड़ी देशों से गुपचुप रूप से पैसा आता रहा है। जब इस अज्ञात मदद के बारे में सरकार को पता चला, तो जाँच दल सक्रिय हो गये। अभी इस मामले में जाँच जारी है।

जाँच में पाया गया है कि बाहरी देशों से छोटे से बड़े अधिकतर मदरसों को अज्ञात मदद मिली है। इसमें कुछ मान्यता प्राप्त मदरसे भी हैं। विशेष जाँच दलों ने अज्ञात मदद की सही जानकारी जुटाने के लिए मदरसों के खाते एवं अन्य दस्तावेज़ ज़ब्त किये हैं, जिससे यह पता चल सके कि कहाँ से कितनी मदद कब आयी। उस पैसे का कहाँ उपयोग किया गया? इसके लिए मदरसों के प्रबंधकों से भी पूछताछ की जा रही है। विशेष जाँच दल इतनी बड़ी अज्ञात मदद के पीछे की योजना के बारे में पता लगाने के प्रयास में हैं। जाँच दल पैसे का सही स्रोत ज्ञात करने का प्रयास कर रहे हैं।

मदरसों की बढ़ रही संख्या

उत्तर प्रदेश में लगभग 24,000 मदरसे चल रहे हैं। इतने मदरसों की गिनती तो सरकार की जानकारी में है; मगर अनुमानित रूप से इनकी संख्या अधिक भी हो सकती है। इन मदरसों में से 16,500 से अधिक मदरसे उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त हैं। इन मदरसों को वक़्फ़ बोर्ड से मदद प्राप्त होती है। उत्तर प्रदेश सरकार प्रदेश में स्थापित 560 मदरसों को अनुदान देती है। इसके अतिरिक्त भारतीय मुस्लिमों से भी मदरसों को मदद प्राप्त होती है। प्रश्न यह है कि इसके उपरांत भी विदेशों से इन मदरसों को मिलने वाली अज्ञात मदद का प्रयोजन क्या है? उत्तर प्रदेश में लगभग 8,500 मदरसे बिना मान्यता के चल रहे हैं। प्राप्त समाचारों की मानें तो नेपाल सीमा से सटे क्षेत्रों में 1,000 से अधिक मदरसे चल रहे हैं। सूत्र कहते हैं कि बीते कुछ वर्षों में इन क्षेत्रों में मदरसों की संख्या तीव्रता से बढ़ी है।

इस बारे में भारतीय जनता पार्टी के एक स्थानीय नेता ने नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए कहा कि देश में गुरुकुल समाप्त कर दिये गये मगर मदरसे आज भी चल रहे हैं। मुस्लिम एवं अन्य अनेक लोग आरोप लगाते हैं कि भाजपा की सरकारें मुस्लिम विरोधी हैं; मगर आप देखेंगे कि अच्छे मुसलमानों को कहीं कोई समस्या नहीं है। न ही सरकार उन्हें कभी कुछ कहती है। मगर जब कोई अपराधी होता है अथवा अन्य प्रकार से क़ानून को ताक पर रखकर अवैध गतिविधियाँ चलाता है, तो उस पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। इस पर इन लोगों को आपत्ति होती है, क्यों? जब बिना मान्यता के विद्यालय नहीं चलते, तो मदरसे बिना मान्यता के क्यों चल रहे हैं? इसके अतिरिक्त अगर मदरसों को कहीं से मदद मिल भी रही है, तो उसे छुपाया क्यों जा रहा है? उसका ब्यौरा सरकार के सामने पेश किया जाना चाहिए। अगर केवल शिक्षा के लिए ये पैसा कोई दान कर रहा है, तो इसमें छुपाने वाली बात क्या है? मदरसों को खाड़ी देशों से चोरी-छिपे कई वर्षों से बड़ी मदद प्राप्त हो रही है। क्या सरकार को ये जानने का अधिकार नहीं है कि यह मदद कहाँ से की? किसने की? क्यों की? उस पैसे का उपयोग कहाँ किया गया? कितना पैसा विदेशों से आया? अगर सरकार यह जानना चाहती है, तो इसमें मुस्लिम समाज को आपत्ति क्या है? देश के हर नागरिक की आय के बारे में सरकार जानती है, तो मदरसों की आय के बारे में जानकारी होनी ही चाहिए। इसमें ग़लत क्या है?

लम्बी चल सकती है जाँच

जाँच दलों की ओर से अभी तक मदरसों को मिलने वाली अज्ञात मदद को लेकर चल रही इस जाँच बारे में कुछ अधिक नहीं बोला गया है। अनुमानित रूप से माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में चलने वाले सभी मदरसों की अथवा अधिकतर मदरसों की जाँच

अलग-अलग समय में कई चरणों में हो सकती है। अभी विशेष जाँच दलों को मदरसों को मिलने वाली अज्ञात मदद की जाँच 30 दिसंबर तक पूरी करके इसकी पहली रिपोर्ट मदरसा बोर्ड के रजिस्ट्रार को देनी होगी। दूसरे चरण में 3,834 मान्यता प्राप्त मदरसों की जाँच होगी। विशेष जाँच दल यह जाँच अभियान 15 जनवरी से 30 मार्च तक चलाएँगे एवं अपनी रिपोर्ट मदरसा बोर्ड के रजिस्ट्रार को सौंपेंगे। संभव है कि इसके उपरांत अन्य मदरसों को मिलने वाली विदेशी मदद की भी जाँच हो।

विदित हो कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पिछले वर्ष प्रदेश के सभी ज़िलाधिकारियों को अवैध रूप से चल रहे ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की जानकारी जुटाने के निर्देश दिये थे। दो महीने तक चले सर्वे में पता चला कि उत्तर प्रदेश में 8,449 मदरसे ऐसे हैं, जिन्हें उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त नहीं है। ऐसे मदरसों के विरुद्ध अभी तक उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड ने कोई कार्रवाई नहीं की है।

घुसपैठ की आशंका

कुछ दिनों पहले विशेष जाँच दल ने तीन संदिग्ध लोगों को गिरफ़्तार किया था। जाँच सूत्र कहते हैं कि ये लोग देश में बांग्लादेशी नागरिकों एवं रोहिंग्या मुसलमानों की अवैध घुसपैठ कराने वाले गिरोह के सदस्य हैं। जाँच आगे बढ़ी, तो पता चला कि अवैध घुसपैठ में दिल्ली में स्थापित एक एनजीओ का हाथ है। इस एनजीओ को बीते तीन वर्षों में लगभग 20 करोड़ रुपये की विदेशी मदद हुई थी। देश में बांग्लादेशी नागरिकों एवं रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ कराने के लिए इस पैसे का उपयोग घुसपैठ कराने वाला गिरोह करता है।

मदरसा शिक्षा बोर्ड का अनुरोध

अवैध मदरसों की जाँच कराने के उपरांत अनुदान प्राप्त एवं वैध मदरसों की जाँच को लेकर उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. इफ़्तिख़ार अहमद जावेद ने आपत्ति जतायी है एवं जाँच रोकने का अनुरोध किया है। उन्होंने इसके लिए अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री धर्मपाल सिंह को एक पत्र सौंपकर मदरसों की बोर्ड परीक्षा के बाद जाँच कराने का अनुरोध किया है।

अवैध मदरसों की जाँच पर तो कोई कुछ नहीं बोल रहा है; मगर वैध एवं अनुदान प्राप्त मदरसों की जाँच को लेकर उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष ने कहा है कि अभी बोर्ड परीक्षा के फार्म भरे जा रहे हैं एवं मदरसों में कंपार्टमेंट का परीक्षा फल घोषित किया जाना है। ऐसे में मदरसों में चल रही जाँच से महत्त्वपूर्ण कार्य एवं पढ़ाई प्रभावित होगी। मदरसा बोर्ड की वार्षिक परीक्षाओं में भी विलंब होगा। इसलिए जाँच प्रक्रिया स्थगित कराते हुए परीक्षा कार्य को सर्वोत्तम वरीयता दिलायी जाए, ताकि छात्र-छात्राओं का भविष्य सुरक्षित किया जा सके।

विदित हो कि उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में ज़िला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों एवं ज़िलाधिकारियों ने नामित खंड शिक्षा अधिकारियों की समितियाँ बनी दी हैं। मदरसों को विदेशी अज्ञात मदद की जाँच के लिए तीन विशेष जाँच दल तैनात हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उनकी सरकार की ओर से मदरसों की जाँच के मामले में अभी कुछ भी ऐसा क़दम नहीं उठाया गया है, जो मदरसों की निजता के लिए हानिकारक हो। मगर विदेशी अज्ञात मदद की जाँच घुसपैठ एवं देशविरोधी अनैतिक गतिविधियों को रोकने के लिए आवश्यक है।

ग्रामीण समाज में बढ़ रहा पाखंडवाद

हिन्दुस्तान में ग्रामीण परिवेश बहुत तेज़ी बदलता जा रहा है। नयी ग्रामीण पीढ़ी में शहरीकरण और पाखंडवाद का असर तेज़ी से हो रहा है। पिछले आठ-नौ वर्षों में जिस प्रकार से ग्रामीण समाज, ख़ासतौर पर ग्रामीण युवा पीढ़ी के ज़ेहन से खेती-किसानी का रंग उतरता और भगवा रंग का ख़ुमार चढ़ता जा रहा है, उससे इस ग्रामीण युवा पीढ़ी का भविष्य ख़तरे में नज़र आ रहा है।

दरअसल ग्रामीण युवा पीढ़ी इतनी तेज़ी से पाखंडवाद के रास्ते पर जा रही है कि उसके संस्कारों और शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। उसे अब सब कुछ इतना आसान लगने लगा है कि वह मेहनत करने से कतराने लगी है। इसकी कई वजह हैं, जिनमें से एक प्रमुख वजह है- उसके हाथ में एंड्रायड फोन और दूसरी वजह है- राजनीति और पाखंडी बाबाओं का धर्म के नाम पर बढ़ता पाखंडवाद। मैं इसमें राजनीति और पाखंडवाद को ज़िम्मेदार इसलिए मानता हूँ। क्योंकि आज की तारीख़ में अगर युवाओं को मोबाइल से भी ज़्यादा कोई बर्बाद कर रहा है, तो वो आज की देशद्रोह के रास्ते पर चलने वाली राजनीति और अधर्म के रास्ते पर चलने वाला पाखंडवाद ही हैं। ये दोनों ही पेशे आजकल इतने धनवर्षा वाले हैं कि हमारे ज़्यादातर युवा इन्हीं पेशों से प्रभावित हैं।

देश-भक्ति और ईश्वर-भक्ति के नाम पर हमारी युवा पीढ़ी को भटकाने वाले ये दो पेशों से जुड़े चालाक लोग हमारे युवाओं का दुरुपयोग हिंसक और नारे लगाने वाली भीड़ के रूप में कर रहे हैं। और इन सब चक्करों में फँसने वाले युवाओं में सबसे ज़्यादा ग्रामीण युवा हैं, जो कि किसान पुत्र हैं। इस ग्रामीण युवा पीढ़ी का बाक़ी समय मोबाइल पर जाता है, जहाँ इन युवाओं को बर्बाद करने के लिए कई ऐप मौज़ूद हैं। इन ऐप पर वे कुछ लिखकर, मीम्स डालकर और वीडियोग्राफी करके रातोंरात अमीर होने का सपना मन में पाले बैठे हैं। मुझे यह देखकर दु:ख होता है कि युवा अपने संस्कार, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। और दु:ख सिर्फ़ इसी बात का नहीं है, बल्कि इस बात का और भी ज़्यादा है कि वे संस्कारों के नाम पर गालियाँ देना, अभद्रता करना, बदतमीजी करना, बड़ों की बेइज़्ज़ती करना सीखकर ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ समझने की ग़लती कर रहे हैं। अपनी संस्कृति के बारे में उन्हें कुछ अता-पता नहीं है। अपने धर्म और परंपराओं के नाम पर वो सिर्फ़ और सिर्फ़ भोंडापन, पागलपन, पाखंडवाद और हुड़दंग करने लगे हैं। उन पर पढ़ाई-लिखाई से ज़्यादा कुसंगति और बुरे कर्मों का असर पड़ रहा है। वे कम उम्र में ही नशे में उतर रहे हैं। अपने चरित्र का पतन कर रहे हैं। रातोंरात अमीर होने के चक्कर में कुछ भी करने पर आमादा हैं। अगर कोई उन्हें समझाने की कोशिश करे, तो वे उसे मूर्ख समझते हैं।

दरअसल हमें और हमारे समाज के हर तबक़े की अगुवाई करने वाले लोगों को समझने की ज़रूरत है कि आख़िर चूक कहाँ हो रही है? हमारे बच्चों में ये बुराइयाँ क्यों आ रही हैं और उनका समाधान क्या है? हालाँकि मेरा मानना है कि अपने बच्चों को सुधारने के लिए उनकी ग़लतियाँ देखने से पहले हमें अपनी ग़लतियाँ सुधारनी होंगी। जब तक हम अपनी ग़लतियाँ नहीं सुधारेंगे, तब तक हम बच्चों की ग़लतियाँ करने से रोकने में सफल नहीं हो सकेंगे।

आजकल हम देखते हैं कि राजनीतिक लोगों की भाषा, व्यवहार निचले स्तर के हो चुके हैं। जिन नेताओं से देश के लाखों-करोड़ों युवा प्रभावित हैं, वही नेता मंचों से लेकर संसद तक में अपनी भाषा की मर्यादा को भुलाकर गली के गुंडों वाली सडक़छाप भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। युवाओं का उचित मार्गदर्शन करने की बजाय उन्हें ग़लत रास्ते पर ले जा रहे हैं। उन्हें झूठे और दिखावे के राष्ट्रवाद, नक़ली राष्ट्रभक्ति और आडंबर भरी धर्मांधता के कुएँ में धकेल रहे हैं। और ये सब वे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी सत्ता बचाने के लिए कर रहे हैं। सत्ता बचाने के लिए यही नेता अपनी रैलियों और जनसभाओं में शराब और मांस आदि परोसने से परहेज़ नहीं करते। युवाओं को रैलियों में ले जाने के लिए अपने कुछ पाले हुए गुंडों की शह लेते हैं और युवाओं को हज़ार-पाँच सौ रुपये का लालच देकर उनसे हुड़दंग करवाते हैं। नारे लगवाते हैं और रात को उन्हें शराब आदि परोसकर उनके अश्लील मनोरंजन का इंतज़ाम कराते हैं। लेकिन जब सत्ता में आते हैं और युवाओं को पेट की भूख सताती है और रोज़गार की ज़रूरत महसूस होती है, तब उनके काम नहीं आते। और जब वे रोज़गार की माँग करते हैं, तो उन पर लाठियाँ बरसवाते हैं और पिटने वालों में सबसे ज़्यादा ग्रामीण युवा ही होते हैं।

इसी प्रकार से तमाम धर्मों के ज़्यादातर बाबा, फ़क़ीर और पंडे-पुजारियों से लेकर मौलवी और पादरी आदि हैं; जो कि लोगों को धर्म का सही पाठ पढ़ाने की बजाय उन्हें अंधविश्वास, आडंबर, पाखंड और तरह-तरह की मूढ़ताओं में धकेलते जा रहे हैं। आजकल तो एक-से-एक नये-नये बाबाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। अब तो ऐसे बाबाओं की एक लम्बी फ़हरिस्त है, जो बिना किसी क़ानून के डर के लगातार भोले-भाले ग्रामीणों को दिन-रात बेवक़ूफ़ बनाकर पैसा ऐंठ रहे हैं। ऐसे बाबाओं पर अब कोई प्रतिबंध भी नहीं लगाता और न ही उनकी करोड़ों की कमायी पर कोई कर (टैक्स) आदि लगता है। परिणाम यह होता है कि एक सडक़छाप अनपढ़ और धर्म के बारे में कुछ भी न जानने वाला भी अगर बाबा बनकर एक-दो साल प्रवचन देने का काम करने लगता है, तो अगले-दो तीन साल में उसके पास आलीशान बंगला, आलीशान लग्जरी कारें और 10-20 चेले चपाटे, सिक्योरिटी सब कुछ होता है। जैसे ही ऐसे बाबाओं के पास चार-छ: हज़ार भक्त पहुँचा शुरू हो जाते हैं, उनके आगे नेता भी माथा टेकने लगते हैं और उनकी सिक्योरिटी को और टाइट करने का हुक्म पुलिस को देकर उसे अलग परेशान करते हैं। जिस पुलिस का गठन समाज की व्यवस्था सुधारने के लिए किया गया है, उस पुलिस के जवान बड़ी संख्या में ऐसे बाबाओं और अपराधियों की सुरक्षा में लगा दिये जाते हैं। और धर्म को धंधा बनाने वाले ये लोग पूरी ज़िन्दगी ऐश करते हैं। कई तो धर्म की आड़ में अपराध भी करते हैं। कई पकड़े भी गये हैं। लेकिन इन्हें पकडऩा आसान नहीं होता। क्योंकि जिस प्रकार से ग़लत नेताओं की सुरक्षा गुप्त तरीक़े से कुछ गुंडे करते हैं, उसी प्रकार से ऐसे बाबाओं की सुरक्षा भी गुप्त तरीक़े से कुछ गुंडे ही करते हैं। और उन गुंडों की सुरक्षा नेता और बाबा करते हैं।

इस प्रकार से ये तीन ग़लत लोग एक-दूसरे की सुरक्षा करते हैं और समाज को न सिर्फ़ भटकाते हैं, बल्कि डरा-धमकाकर उसे कमज़ोर भी बनाये रखते हैं। कोई क़ानून से डराता है। कोई धर्म और भगवानों से डराता है, तो कोई ख़तरनाक हथियारों से डराता है। इसलिए बहुत चालाक लोग, जो कि न कभी ठीक से पढ़ते-लिखते हैं और न ही किसी काम के लायक होते हैं, ऐसे लोग तीन ही प्रकार के धंधों में उतरते हैं। पहला धंधा राजनीति है, दूसरा धर्म का धंधा और तीसरा बदमाशी। ग्रामीण युवाओं को भटकाने में इन तीनों का बहुत बड़ा हाथ है, क्योंकि वो इनसे सीख रहे हैं।  भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद् भागवतगीता के कर्मयोग अध्याय में कहते हैं- ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। स यत्प्रमाणम् कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।’ यानी श्रेष्ठ मनुष्य जैसा आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी का अनुशरण करते हैं। आज जिस प्रकार का आरचण समाज को आईना दिखाने वाले लोग कर रहे हैं; आम लोग, ख़ासतौर पर युवा उसी प्रकार का आचरण कर रहे हैं। जिन लोगों को समाज को बचाने का काम करना चाहिए और युवाओं को रास्ता दिखाना चाहिए, वे उन्हें भटका रहे हैं।

बहरहाल हमारे युवाओं के भटकने से समाज तेज़ी से पिछड़ रहा है और गर्त में जा रहा है। हमारी युवा पीढ़ी भ्रमित है और अपने गौरवपूर्ण इतिहास को भूल बैठी है। आज समाज के सियासी दलों के नुमाइंदों ने गाँवों, क़स्बों में मेले बंद करवाकर नौटंकियाँ शुरू करवा दी हैं। गौशालाओं, मंदिरों, धार्मिक ट्रस्टों में बढ़-चढक़र अथाह दान के रूप में सोने के अंडे रखने और रखवाने शुरू किया है। हिन्दू धर्म के नाम पर गाँव-गाँव में भजन, कीर्तन और कथावाचन के नाम पर पाखंडवाद किया जा रहा है। समाज के युवाओं को कावड़ लाने और अन्य धार्मिक आयोजनों की ओर आकर्षित करने का एक अभियान-सा चलाया जा रहा है। धार्मिक आयोजनों और कथावाचकों को लाखों रुपये दान दिये जा रहे हैं। ‘एक रात, गोमाता के नाम’ जैसे शीर्षक पर नक़दी, ज़मीन और सोना दिया जा रहा है। अयोध्या में बन रहे राममंदिर के लिए भी सबसे ज़्यादा दान इसी ग्रामीण वर्ग ने दिया है। तमाम सियासी पार्टियाँ अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए ‘80 बनाम 20’ और ‘35 बनाम एक’ जैसे जबरदस्त नारे बुलंद करके ग्रामीण इलाक़ों में सियासत करते हैं, जिसमें मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। छिपी हुई सियासी पार्टियों की राजनीतिक आईटी सेल की भी मूल भूमिका रहती है।

गाँव के किसान और कामगार वर्ग में जातीय एकता की कमी इसका सबसे बड़ा मूल कारण है। एक तरफ़ गाँव में शिक्षण संस्थानों, स्वास्थ्य सेवाओं और इस आधुनिक युग में कम्प्यूटर और दूसरे संस्थानों का टोटा साफ़ दिखायी देता है, जिस पर न किसी राजनीतिक दल का ध्यान है और न ही किसी सामाजिक-धार्मिक ठेकेदार का। ग्रामीण समाज के युवा इन सब चीज़ों की कमी होने के चलते ग़रीबी, बेरोज़गारी, नशाख़ोंरी और आपराधिक गतिविधियों की तरफ़ तेज़ी से अग्रसर हो रहे हैं, जिसका लाभ सियासी दलों के प्रतिनिधि अपने चुनाव जीतने के समय बख़ूबी लेते रहते हैं।

दरअसल पहले गाँव-समाज के सभी जातियों के बड़े-बूढ़े और मुखिया अपने छोटे-मोटे झगड़े-फ़साद आपसी मतभेद आदि आपस में ही पंचायत में बैठकर सुलझा लेते थे। इसीलिए गाँव-देहात में पंचायतों का ख़ास महत्त्व होता था, जो धीरे-धीरे समाप्त होता दिखायी दे रहा है। आजकल गाँव समाज के किसी भी सामाजिक संगठन, ख़ास या किसान संघ का मुखिया हमेशा राजनीतिक दलीय व्यक्ति होता है। जबकि जाति संगठन या ख़ास का मुखिया ग़ैर-राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से मज़बूत, शक्तिशाली और विद्वान होना चाहिए; जो सभी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नेताओं को एक मंच पर ला सके। गाँव-देहात में आ रही परेशानियों का निराकरण करवा सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

स्वास्थ्यवर्धक चीज़ें से महँगे पान मसाले!

सड़कों पर पड़ी पान मसाले की लाल पीक पर कब पैर पड़ जाए, नहीं कहा जा सकता। यह गंदगी हर जगह बहुतायत में देखने को मिल जाती है। लेकिन यह गंदगी अलग-अलग नामों से बाज़ार में मौज़ूद पान मसाला खाने वालों को हैरान-परेशान नहीं करती है। इसके बावजूद कि पान मसाला और तंबाकू से कैंसर से लेकर कई गम्भीर बीमारियाँ होती हैं। पान मसाला और धुआँ रहित अन्य तंबाकू आदि से होने वाले घातक नुक़सान के बारे में जानते हुए भी इनके खाने वालों की संख्या भारत में तेज़ी से बढ़ रही है। पान मसाला खाने वालों में एशियाई लोगों की संख्या ज़्यादा है; लेकिन धुआँ रहित तंबाकू उत्पादों से नशा लेने वाले अब सिर्फ़ एशिया में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं।

पिछले कई वर्षों से पान मसाला की विषाक्तता को निर्धारित करने के लिए दुनिया भर में कई रिसर्च की गयी हैं। वयस्क नर चूहों पर क़रीब तीन सप्ताह तक की गयी एक रिसर्च में पता चला कि उन्हें रोज़ाना निकोटीन घोल और मौखिक म्यूकोसा के माध्यम से लियोफिलाइज्ड पान मसाले का घोल देने पर उनका वज़न, उनके लीवर और दिल का वज़न घट गया है। इसके साथ ही उनका सीरम टेस्टोस्टेरोन का स्तर भी कम हो गया। इससे पता चला कि पान मसाला और तंबाकू खाना शारीरिक विकास और टेस्टोस्टेरोन का स्तर ख़राब करता है।

क़रीब-क़रीब सभी लोग जानते हैं कि पान मसाला कैंसर पैदा करता है और पान मसाले के पैकेटों पर साफ़-साफ़ चेतावनी लिखी होती है कि पान मसाला स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। तंबाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लेकिन इसके बावजूद लोग पान मसाला और तंबाकू खाते हैं। हालाँकि पान मसाला और तंबाकू खाने से सिर्फ़ कैंसर ही नहीं होता, बल्कि इससे मुँह छोटा होता है। पेट में कई गड़बडिय़ाँ आती हैं। साँस के रोग हो सकते हैं। मुँह सिकुडऩे लगता है। पथरी होने का ख़तरा बढ़ जाता है। लेकिन इसकी लत जिन्हें लग जाती है, वे फिर इसे छोडऩा नहीं चाहते। लोगों की यह बुरी लत छुड़ाने के लिए और उनमें जागरूकता लाने के लिए केंद्र सरकार और कई एनजीओ पूरे देश में काम कर रहे हैं; लेकिन फिर भी पान मसाला और तंबाकू खाने वालों की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है।

पान मसाला और तंबाकू खाने वाले कभी नहीं सोचते कि वे जिन पान मसाले और तंबाकू के पाउच को फाडक़र उसमें उस नशीली तंबाकू और पान मसाला आदि को कितना महँगा ख़रीद रहे हैं। एक पाँच से 20 रुपये या उससे भी महँगे पाउच में तीन से 10 ग्राम पान मसाला भी नहीं होता है, जो कि क़रीब 4,000 रुपये से 10,000 रुपये किलो या इससे भी ज़्यादा कीमत पर बिक रहा है। पान मसाला और तंबाकू खाने के आदी लोग इसे चबाते हैं और अपना स्वास्थ्य ख़राब करते रहते हैं।

पान मसाला चबाने वालों की दीवानगी पान मसाला और तंबाकू के प्रति इतनी ज़्यादा है कि जब देश में कोरोना महामारी में तालाबंदी हुई, तो उस समय पान मसाला और तंबाकू के शौक़ीनों ने इनके पाउच ख़रीदने के लिए कई गुना पैसे दिये। उस समय पाँच रुपये का पान मसाला 15 से 25 रुपये तक में ब्लैक में बिका। इसी तरह तंबाकू का पाउच भी कई गुना महँगा बिका। इस आधार पर देखा जाए, तो स्वास्थ्यवर्धक चीज़ें पर भारी पान मसाला महँगा है। पाँच रुपये का बीड़ी का बंडल 15 से 20 रुपये में बिकने लगा था। यही हाल तब होता है, जब पान मसाले की बिक्री पर रोक लगती है। इसे खाने के शौक़ीन लोग इसे ब्लैक में ख़रीदने के लिए तक तैयार रहते हैं और वे पान मसाले के एक के पाउच को 3 से 10 गुना महँगा ख़रीदने तक को तैयार रहते हैं। पान मसाला खाने वालों की इस दीवानगी की कई वजह हैं, जिनमें से फ़िल्मी हस्तियों द्वारा पान मसाले का विज्ञापन करना भी एक बड़ी वजह है। हालाँकि पान मसाले का विज्ञापन करने वाली फ़िल्मी हस्तियों को इसके लिए एक वर्ग का ग़ुस्सा भी झेलना पड़ता है।

भारत में तंबाकू, पान मसाला का क़रीब 42,000 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होता है। साल 2027 में यह कारोबार बढक़र 53,000 करोड़ रुपये से ऊपर जा सकता है। मार्केट रिसर्च फर्म की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 में भारत में पान मसाला और पान मसाले का कारोबार 41,82 करोड़ रुपये से ज़्यादा का रहा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, भारत में 27 करोड़ से ज़्यादा लोग पान मसाला और तंबाकू चबाते हैं। चिन्ता की बात यह है कि यह संख्या हर साल बढ़ती जा रही है। गुज़रात जैसे राज्य में पुरुष ही नहीं, बड़ी संख्या में महिलाएँ भी पान मसाला और तंबाकू चबाती हैं, जिनमें ज़्यादातर फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाएँ शामिल हैं। दुनिया में पान मसाला और तंबाकू खाने वालों के लिहाज़ से भारत दूसरे नंबर का देश है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर दिन तंबाकू और सिगरेट की वजह से 3,500 लोगों की मौत होती है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (एनएफएचएस-5) के मुताबिक, भारत में ग्रामीण इलाक़ों में 11 प्रतिशत महिलाएँ और 43 प्रतिशत पुरुष तंबाकू या पान मसाला या दोनों चबाते हैं, तो वहीं शहरी इलाक़ों में पाँच प्रतिशत महिलाएँ और 29 प्रतिशत पुरुष इसके आदी हैं। डब्ल्यूएचओ के ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में पान मसाला या तंबाकू चबाने वालों में ज़्यादातर लोग 17 साल की उम्र तक पान मसाला और तंबाकू चबाना शुरू कर देते हैं। भारत में हर साल 10 लाख लोगों की मौत मुँह के कैंसर से होती है, जिनमें एक बड़ी संख्या पान मसाला चबाने वालों की है।

दरअसल पहले गुटखा चला करता था, जिसमें सुपारी, मसाले, तम्बाकू, चूना, केमिकल और पिसा हुआ शीशा होता था। जब गुटखे पर प्रतिबंध लगा, तो कम्पनियों ने उसकी जगह पान मसाला बनाना शुरू कर दिया और तंबाकू के अलग से पाउच बना दिये। इस प्रकार तंबाकू प्रतिबंधित नहीं था और पान मसाला प्रतिबंध से बाहर हो गया। गुटखा खाने वाले इन दोनों को मिलाकर खाने लगे, जो एक तरह से गुटखे का ही रूप है। पान मसाला और तंबाकू खाने से बना यह कसैले स्वाद वाला मिश्रण कैंसर को बढ़ावा देता है। यह मिश्रण मुँह में जाते ही एक अजीब-से स्वाद के साथ भभका मारता है, जिससे इसे चबाने वाले के दिमाग़ में एक तरह का नशा और झटका क्रिएट होता है।

इसके अलावा पान मसाला और तंबाकू चबाने वालों का मुँह कट जाता है, जिसकी वजह से उन्हें इस अजीब और कसैले स्वाद की लत लग जाती है। पान मसाला और तंबाकू चबाते-चबाते वे इसकी लत के शिकार हो जाते हैं और जब वे इस आदत से बाहर आना चाहते हैं, तो भी आसानी से नहीं आ पाते हैं। भारत में पान मसाले और तंबाकू के अलग-अलग नामों से पाउच बनाने वाली कम्पनियों की भरमार है। दुनिया के 30 से ज़्यादा देशों में भारत से पान मसाला और तंबाकू की सप्लाई होती है। पान मसाले और तंबाकू का कारोबार इतने मुनाफ़े का है कि इसके कारोबार से बड़े-बड़े रसूख़दार परिवार जुड़े हुए हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कानपुर के पीयूष जैन नाम के जिस इत्र कारोबारी के यहाँ छापेमारी करके 177 करोड़ रुपये की नक़दी बरामद की थी, उस पीयूष जैन का इत्र (परफ्यूम) के अलावा पान मसाला और तंबाकू का कारोबार भी था। पान मसाला बनाने वाले जेएमजे ग्रुप के प्रमोटर जेएम जोशी के बेटे अभिनेता और निर्माता सचिन जोशी की 410 करोड़ रुपये की सम्पत्ति साल 2022 में ज़ब्त की गयी थी। साल 2021 में शिखर पान मसाला बनाने वाली कानपुर की कम्पनी त्रिमूर्ति फ्रेगरेंस में छापेमारी में 150 करोड़ रुपये की नक़दी ज़ब्त की गयी थी। पान मसाला और तंबाकू कारोबार से कितनी कमायी होती है? इस बात का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का इस कारोबार से गहरा नाता रहा है। इससे सम्बन्धित एक मामला सीबीआई कोर्ट में भी कई साल चला था।

खाद्य सुरक्षा और मानक (बिक्री पर निषेध और प्रतिबंध) विनियमन-2, 3 और 4 के मुताबिक, पान मसाला और चबाने वाले दूसरे तंबाकू उत्पादों को राज्य सरकारों द्वारा प्रतिबंधित किया जाना अनिवार्य है। कई बार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पान मसाला और तंबाकू की बिक्री पर रोक लगी है; लेकिन यह रोक आज तक स्थायी नहीं हो सकी है। इसके पीछे पान मसाला और तंबाकू कम्पनियों के पास करोड़ों की सालाना कमायी है, जिसके चलते कम्पनी मालिक रोक लगाने वाली सरकारों और अफ़सरों को इस कारोबार को चलने देने के लिए मजबूर कर देते हैं। कई बार पान मसाला और तंबाकू उत्पादों पर प्रतिबंध का मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा है; लेकिन इस कैंसर पैदा करने वाले इन नशीले पदार्थों पर आज तक रोक नहीं लग सकी है।

सार्वजनिक इलाक़ों में तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए साल 2003 में केंद्र सरकार सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (विज्ञापन का निषेध और व्यापार और वाणिज्य उत्पादन, आपूर्ति और वितरण का विनियमन) अधिनियम लायी थी, जिसे कोटपा कहा गया। लेकिन यह अधिनियम आज ठंडे बस्ते में पड़ा है। देश के हर शहर में कई तंबाकू फ्री जोन बने हुए हैं। सरकारी दफ़्तरों में भी कई जगह पर तंबाकू फ्री जोन बने हुए होते हैं; लेकिन इसके बावजूद लोग इन तंबाकू निषेध वाली जगहों पर बेधडक़ पान मसाला खाकर थूकते हैं और सिगरेट-बीड़ी का धुआँ उड़ाते हैं।

भारत में पान मसाला पर पूरी तरह से रोक न लग पाने की वजह यह भी है कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (एफएसएसए) में पान मसाला उत्पादन और उसकी बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान ही नहीं है। कुछ आपात स्थितियों में ही पान मसाले पर यह अधिनियम अस्थायी प्रतिबंध लगाने के लिए अधिकारियों और सरकारों को एक सीमित शक्ति प्रदान करता है। इसके अलावा पान मसाला और अन्य तंबाकू उत्पादों पर रोक न लगने की वजह इस कारोबार से जुड़ी कम्पनियों के ज़रिये करोड़ों रुपये का टैक्स मिलना भी है। दावे तो यहाँ तक किये जाते हैं कि इस कारोबार से जुड़े लोग रिश्वत और फंडिंग के रूप में करोड़ों रुपये अपना कारोबार बचाये रखने के लिए ख़र्च करते हैं।

इस कारोबार में कमायी का अंदाज़ा विज्ञापन पर ख़र्च होने वाले करोड़ों रुपये के सालाना ख़र्च से भी लगाया जा सकता है। लेकिन दूसरी ओर पान मसाला, जर्दा और तंबाकू के चलते देश के युवाओं की ज़िन्दगी बर्बाद हो रही है, जिस तरफ़ सरकारों का ध्यान नहीं है। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों और ज़िम्मेदार संस्थाओं को ऐसी चीज़ें पर प्रतिबंध के लिए बिना किसी लालच के पूरी ईमानदारी से आगे आना चाहिए; क्योंकि ज़रूरत कमायी से ज़्यादा युवा पीढ़ी को बचाने की है।