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सावधान : हर जगह है ठगों का साया

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

महँगाई और बेरोज़गारी के इस दौर में जिस तरह से ठगी के मामले बढ़ रहे हैं, उससे समाज और भी ज़्यादा असुरक्षित होता जा रहा है। ठग जिस तरह से शातिर तरीक़े से लोगों को शिकार बना रहे हैं, उसमें डॉक्टर से लेकर इंजीनियर तक शामिल हैं। यानी ठग किसी को भी नहीं छोड़ रहे; चाहे वह सेना अधिकारी हों, पुलिसकर्मी हों या फिर जज ही क्यों न हों। कोई भी ठगों से नहीं बच पाया है। 10वीं, 12वीं तक पढ़े-लिखे ठग अच्छे-अच्छों को बड़ी आसानी से ठगी के शिकार बना रहे हैं। देखा जाए, तो जीवन में हर व्यक्ति कहीं-न-कहीं ठगी का शिकार ज़रूर होता है। हम अक्सर कहते हैं कि अरे तुम्हें तो ठग लिया। यह समान इतने का बिक रहा है, तुम इतने में ख़रीद लाये। बात समान तक ही नहीं है, यह धर्म-कर्म से लेकर जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ा है। लेकिन यह सिर्फ़ यहीं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि संचार क्रान्ति के इस दौर में अब यह एक ऐसा रूप ले चुका है, जो हर किसी को डराने वाला है। इस अपराध का नाम है- साइबर क्राइम; क्योंकि इसमें फँसकर लोग हर साल अरबों रुपये गँवा रहे हैं। आने वाले समय में यह कितना व्यापक रूप ले चुका होग? इसका अनुमान भी लगाया जा चुका है।

डेटा के ऊपर काम करने वाली दुनिया की जानी-मानी वेबसाइट स्टेटिस्टा के साइबर सिक्योरिटी आउटलुक ने दुनिया भर में अगले पाँच वर्षों में ठगी के मामले में बेहताशा वृद्धि दर्ज करने का अनुमान लगाया है। आउटलुक के जारी आँकड़ों के मुताबिक, 2022 में 8.44 ट्रिलियन डॉलर की ठगी हुई थी, जो दुनिया के कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्था से ज़्यादा है और यह 2027 तक बढक़र 23.84 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी। यह आँकड़ा इतना बड़ा है कि दुनिया के टॉप-5 अर्थव्यवस्था वाले कई देश इसमें समा जाएँगे। इस वेबसाइट की रिपोर्ट में साइबर अपराध को ‘डेटा की क्षति और विनाश’ के रूप में परिभाषित किया गया है; जिसमें चुराया हुआ पैसा, खोई हुई उत्पादकता, बौद्धिक सम्पदा की चोरी, व्यक्तिगत और वित्तीय डेटा की चोरी, गबन, धोखाधड़ी, व्यवसाय के सामान्य पाठ्यक्रम में हमले के बाद व्यवधान, फोरेंसिक जाँच, हैक किये गये डेटा और सिस्टम की बहाली और विलोपन और प्रतिष्ठा के नुक़सान को दर्शाया गया है। वेबसाइट पर जारी आँकड़ों के मुताबिक, 2017 में सबसे ज़्यादा ठगी बिना-पेमेंट व बिना डिलीवरी के नाम पर हुई है, जिसमें 41 फ़ीसदी लोग ठगे गये। पर्सनल डाटा हैकिंग में 15.3 फ़ीसदी लोग शिकार बने। फ़र्ज़ी ईमेल के ज़रिये 12.5 फ़ीसदी लोग ठगी का शिकार हुए। साइबर अपराधियों ने पहचान चोर कर 8.7 फ़ीसदी लोगों को ठगी का शिकार बनाया।

वहीं क्रेडिट कार्ड के नाम पर 7.5 फ़ीसदी लोग ठगी के शिकार हुए। 7.4 फ़ीसदी सेक्सटॉर्शन केस में तो, 5.4 फ़ीसदी लोग तकनीकी सहायता के नाम पर ठगी का शिकार हुए। निनेश के नाम पर 1.5 फ़ीसदी लोग ठगी का शिकार हुए। वहीं पाँच साल बाद ठगी के तरीक़े में काफ़ी परिवर्तन देखे गये। 2022 में सबसे ज़्यादा ईमेल व अन्य माध्यमों से साइबर अपराधियों ने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट हैकिंग के ज़रिये 53.2 फ़ीसदी लोगों को शिकार बनाया। 10.4 फ़ीसदी लोग पर्सनल डाटा हैंकिग के ज़रिये ठगे गये तो, वहीं बिना पेमेंट व बिना डिलीवरी के माध्यम से 9.2 फ़ीसदी लोग ठगी का शिकार बने। 5.4 फ़ीसदी लोग इनवेस्टमेंट के नाम पर ठगे गये। 5.8 फ़ीसदी लोग तकनीकी सहायता के नाम पर ठगी के शिकार बने तो, वहीं 7 फ़ीसदी लोग सेक्सटॉर्शन (जबरदस्ती वसूली) के शिकार बने व 4.1 फ़ीसदी क्रेडिट कार्ड के नाम पर ठगे गये और पाँच फ़ीसदी पहचान चोर कर ठगी के शिकार बनाये गये।

राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी 2022 के रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आर्थिक अपराध के 1.39 लाख केस दर्ज हुए, जो 2021 के मुक़ाबले 11.1 फ़ीसदी ज़्यादा हैं। इस तरह साइबर क्राइम के मामलों में भारी वृद्धि दर्ज की गयी है। 2022 में कुल 65,893 केस दर्ज हुए, जो 2021 की तुलना में 24.4 फ़ीसदी अधिक हैं। इनमें 64.8 फ़ीसदी धोखाधड़ी से जुड़े थे। देखा जाए, तो ठगी के मामले में दिल्ली तीसरे स्थान पर है। एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 2021 में ठगी के 21,130 मामले व 2022 में कुल 25,484 लोग ठगी का शिकार हुए। महाराष्ट्र में 2021 में 18,560 मामले दर्ज हुए, तो वहीं 2022 में 18,799 लोग ठगी का शिकार हुए। 2021 में दिल्ली में ठगी के 14,550 मामले आयो, तो वहीं 2022 में ठगी के कुल 14,661 मामले दर्ज किये गये। बिहार में 2021 में 8,625 मामले व 2022 में 11,515 लोग ठगी का शिकार हुए। 2021 में हरियाणा में ठगी के 8,514 केस दर्ज हुए, तो वहीं 2022 में 9,371 लोग ठगी के शिकार हुए। देखा जाए, तो टॉप-5 राज्यों में ठगी के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी है।

ठगी के बढ़ते आँकड़ों और दर्ज की गयी एफआईआर में बेतहाशा वृद्धि के अनुमान से यह पता चलता है कि आज के समय में एक आम व्यक्ति कहीं भी सुरक्षित नहीं है। न तो जान सुरक्षित है, न ही रुपये-पैसे और न ही घर-द्वार। हर जगह ठगों और लुटेरों का साया है। घर या बैंक से पैसे लेकर निकलने पर लुटने का ख़तरा और अकाउंट में हो तो ठगों से ख़तरा है। आज हम जिस संचार क्रान्ति के युग में रह रहे हैं, उसमें हम दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से चंद सेकेंड में बड़े आसानी से बात कर सकते हैं। आज हर घर में मोबाइल फोन है। इसी का फ़ायदा साइबर ठग भी उठा रहे हैं। ठगी अब मात्र ठगी नहीं रही, यह एक पेशा बन चुकी है; जिसमें इन्वेस्टमेंट ज़ीरो है और कमायी करोड़ों में है।

अपराधी एक कमरे में बैठे-बैठे बड़े आराम से अच्छे-अच्छों को चूना लगाने में महारत हासिल कर रहे हैं। इसके लिए बाक़ायदा ट्रेनिंग भी दी जाती है। ठगी के लिए कॉल सेंटर खोले जा रहे हैं। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले लडक़े-लड़कियों को नौकरी पर रखा जाता है और वे सब मिलकर ठगी का धंधा करते हैं। हर साल ऐसे कॉल सेंटर खुलते और पकड़े जाने पर बन्द होते हैं। इस पर मूवी की सीरीज भी आ चुकी है, जिसमें यह दिखाया गया है कि किस तरह लोग ठगी को अंजाम देते हैं। ठगी के ऐसे-ऐसे हथकंडे कि कोई सोच भी नहीं सकता। पहले ठगों का केंद्र झारखण्ड का जामताड़ा होता था; लेकिन अब कई राज्यों जैसे राजस्थान, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश, हरियाणा व कई अन्य राज्यों सहित विदेशों से भी तार जुड़े हुए हैं, जहाँ बैठकर ठगों के सरगना गैंग चला रहे हैं।

देखा जाए, तो आजकल अमूमन लोग लालच के कारण ठगी का शिकार बनते हैं। ज़्यादा पैसे कमाने के चक्कर में अपनी गाढ़ी कमायी गँवा देते हैं। लोगों के अंदर इतना लालच बस गया है कि वो किसी-न-किसी तरीक़े से ठगों के जाल में फँस ही जाते हैं। चाहे वो क्रेडिट कार्ड का सुनहरा ऑफर हो या पार्ट टाइम काम का झाँसा या इन्वेस्टमेंट के नाम पर ज़्यादा पैसा कमाने की चाहत या फिर मुफ़्त में गिफ्ट की चाहत या डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड की सर्विस बंद करने या किसी अन्य मामलों में फँसने का डर। ठगी के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार ने संगठित अवैध निवेश और पार्ट टाइम नौकरी के नाम पर ठगी करने वाली 100 से अधिक वेबसाइट्स को बन्द कर दिया है। आजकल न जाने कितने फेक कॉल या फेक ईमेल और मोबाइल पर व्हाट्सएप और मैसेज आते हैं, जिसमें ठग शिकार तलाशते रहते हैं। ज़रा-सी चूक होते ही ठग अकाउंट को ख़ाली कर देते हैं।

कई लोग विभिन्न सेवाओं को लेने के लिए गूगल सर्च का सहारा लेते हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि जिस नंबर को वो डायल कर रहे हैं, वो फ़र्ज़ी है। ऐसे में अपॉइंटमेंट लेने या बुकिंग चार्ज के नाम पर ठगी का शिकार बन जाते हैं। आजकल ठग तमाम सारी कम्पनियों और संस्थानों का फ़र्ज़ी वेबसाइट बनाकर बैठे हैं। जहाँ से ठग आसानी से लोगों को शिकार बना लेते हैं। ऐसे तमाम फ़र्ज़ी ऐप हैं, जिनके ज़रिये लोग ठगे जा रहे। सोशल मीडिया पर तमाम ऐसे विज्ञापन हैं, जहाँ पर कॉल करते ही लोग ठगों के जाल में फँसकर अपनी गाढ़ी कमायी गँवा रहे हैं। कई सोशल मीडिया पर बहुत सस्ते दामों पर ब्रांडेड सामानों को दिखाकर लोगों को ठगी का शिकार बना रहे। मतलब कि सोशल मीडिया या गूगल पर लोगों की हर आम ज़रूरत की चीज़ या ख़ास, ठगों के जाल से दूर नहीं है।

ऐसे कई ठग होते हैं, जो लोगों का सगा-सम्बन्धी बताकर मैसेज करके उधार माँग कर ठगते हैं और कई ठग तो सोशल मीडिया पर अधिकारियों और पुलिस अफ़सरों की फेक आईडी बनाकर लोगों को डरा धमकाकर कर ठगी का शिकार बना रहे हैं और कई सेक्सटॉर्शन गैंग लड़कियों का इस्तेमाल करके भोले-भाले लोगों सहित बुजुर्गों को वीडियो कॉल के ज़रिये या किसी अन्य तरह से अश्लील वीडियो बनाकर फँसाते हैं और वायरल करने की धमकी देकर मोटी रक़म वसूल लेते हैं। ग्रामीण इला$कों में किसानों को टावर लगवाने का झाँसा देकर ठगी का शिकार बना रहे। इस तरह से हर रोज़ ठग बड़ी आसानी से किसी-न-किसी को ठगी का शिकार बना रहे हैं।

आज हम ऐसे संक्रमण-काल में जी रहे हैं, जहाँ चारों तरफ़ ख़तरा-ही-ख़तरा है। सुरक्षा की गारंटी सिर्फ़ का$गज़ों में, पोस्टरों, बैनरों और विज्ञापनों में ही दिखायी देती है। आपकी तिजोरी और अकाउंट कब ख़ाली हो जाए, कोई भरोसा नहीं है। आज जितने ज़्यादा हमारे पास सुख सुविधाएँ हैं उतना ही ज़्यादा ख़तरा भी है। सुविधाओं के अंधाधुंध दोहन की चाह में आज व्यक्ति कहीं खो गया है। यही कारण है कि वह आज ख़ुद से उखड़ गया है। विचार से कट गया है, समाज से कट गया है और शासन और प्रशासन से भी। यही कारण है कि किसी भी समस्या का हल निकलता हुआ दिखायी नहीं पड़ता और समस्याएँ बढ़ती जाती हैं। दुनिया में किसी चीज़ की कमी अगर है, तो वह है एक चरित्रवान लोगों की। एक चरित्रवान समाज की। एक जागरूक और सभ्य समाज की; जहाँ समस्याओं का निदान हो सके।

दलित-आदिवासीविधायकों को मिलनी चाहिए बड़ी ज़िम्मेदारियाँ

देश की राजनीति में दलितों, आदिवासियों को लम्बे समय तक अनदेखा किया जाता रहा है और उनका इस्तेमाल स्वयंभू उच्च वर्ग के जनप्रतिनिधियों ने हमेशा सिर्फ़ वोट बैंक के रूप में किया है। लेकिन 80 के दशक के बाद दलितों-आदिवासियों के बीच से निकले जनप्रतिनिधियों की राजनीति में एकाएक भागीदारी बढऩे लगी और अब दलितों-आदिवासियों को देश की राजनीति से स्वयंभू उच्च वर्ग के जनप्रतिनिधि भी अनदेखा नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन क्या दलितों, आदिवासियों के बीच से चुनकर आ रहे उनके जनप्रतिनिधियों (विधायकों, सांसदों) को सरकारों के गठन में उनकी उपस्थिति के हिसाब से भागीदारी मिल पा रही है? हालाँकि उन्हें सरकारों में इस बार कुछ भागीदारी मिली है; लेकिन वो बहुत कम है। भविष्य में मंत्रालयों के बँटवारे में दलित, आदिवासी विधायकों एवं सांसदों को कितनी प्राथमिकता मिल पाएगी?

हाल ही में हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव में दलित-आदिवासी मतदाताओं की बंपर वोटिंग का फ़ायदा भाजपा को सबसे ज़्यादा मिला है। अकेले मध्य प्रदेश में दलितों-आदिवासियों के लिए आरक्षित 82 सीटों में से भाजपा और कांग्रेस के 81 दलित-आदिवासी प्रत्याशी चुनकर विधानसभा पहुँचे हैं। इसमें से आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा के 24 और कांग्रेस के 22 आदिवासी प्रत्याशी चुनकर विधानसभा पहुँचे हैं। वहीं एक सीट पर आदिवासी पार्टी प्रत्याशी ने जीत हासिल की है। वहीं दलितों के लिए आरक्षित 35 में से भाजपा के 26 प्रत्याशी और कांग्रेस के 9 प्रत्याशी जीतकर विधानसभा पहुँचे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार के गठन में दलित-आदिवासी जनप्रतिनिधियों की भागीदारी के हिसाब से मंत्रालय वितरित किये जाएँगे? यदि देखें, तो भाजपा के शासन वाले राज्यों में दलित-आदिवासी जनप्रतिनिधियों को मंत्रालयों के वितरण में अधिकतर अनदेखा किया जाता रहा है और उनसे भेदभाव भी किया जाता रहा है। लेकिन अब दलित-आदिवासी मतदाताओं की संख्या के अनुमानित आँकड़े सामने हैं और देश की राजनीति में अब इनकी भागीदारी को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इन वर्गों के जनप्रतिनिधियों को मंत्रालयों के वितरण में भाजपा की सरकारों में कितनी हिस्सेदारी दी जाएगी? यह देखना होगा।

देश में कई दलित, आदिवासी संगठन हैं और कई राजनीतिक पार्टियाँ भी हैं, जिनके जनप्रतिनिधि पहले भी चुनकर विधानसभा पहुँचे हैं। अपना अलग अस्तित्व बनाने वाले ये संगठन और इनके समर्थन से इन वर्गों की राजनीतिक पार्टियाँ भी काफ़ी अच्छा प्रदर्शन करती रही हैं। अभी नयी आदिवासी पार्टी ‘भारत आदिवासी पार्टी’ ने मध्य प्रदेश में एक और राजस्थान में तीन सीटें जीती हैं। इनमें भारत आदिवासी पार्टी से राजकुमार रोत ने दूसरी बार राजस्थान की चौरासी विधानसभा से जीत हासिल की है। इस बार उन्होंने इस सीट पर 69,166 मतों से जीत हासिल की है। वहीं आसपुर विधानसभा सीट से इस पार्टी के उमेश मीणा 28,940 मतों से और धरियावद विधानसभा सीट से थावर चंद 6,691 मतों से जीत हासिल की है। वहीं मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले की सैलाना विधानसभा सीट से भारत आदिवासी पार्टी के प्रत्याशी कमलेश्वर डोडियार ने 4,648 मतों से जीत हासिल की है। वहीं पहले से कमज़ोर हुई बहुजन समाज पार्टी को राजस्थान में दो सीटें मिली हैं।

एक समय में बहुजन समाज पार्टी का कोर मतदाता दलित समुदाय रहा है; लेकिन अब इसमें दूसरी दलित पार्टियाँ सेंध लगा रही हैं। इनमें से एक आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) है। मध्य प्रदेश में क़रीब 15 फ़ीसदी दलित मतदाता और 20 फ़ीसदी आदिवासी मतदाता हैं। लेकिन मतदाताओं के बँटवारे के कारण बहुजन समाज पार्टी को एक भी सीट इस बार नहीं मिली, जबकि 2018 में उसे दो विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। वहीं राजस्थान में भी इस बार उसे सिर्फ़ दो सीटें ही मिलीं हैं, जबकि 2018 के विधानसभा चुनाव में उसके हिस्से में छ: सीटें आयी थीं। अगर दलित राजनीति करने वाली आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) की बात करें, तो राजस्थान में इस बार उसे एक भी सीट नहीं मिली है। लेकिन पहले ही प्रयास में उसका प्रदर्शन काफ़ी अच्छा रहा है।

बड़ी पार्टियों में हिस्से में गयी दलित सीटों का कुल अनुपात देखें, तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की 72 फ़ीसदी दलित सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी जीतकर विधानसभा पहुँचे हैं। वहीं आदिवासी सीटों पर इस बड़ी संख्या में भाजपा के प्रत्याशी चुनकर विधानसभा पहुँचे हैं। सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में दलित, आदिवासी जनप्रतिनिधियों के भाजपा के टिकट से जीतकर विधानसभा पहुँचने के बावजूद इस पार्टी की राजनीति का मूल आधार हिन्दुत्व ही क्यों है? यहाँ तक कि कई दलित और पिछड़े वर्ग के जनप्रतिनिधि भाजपा में हिन्दुत्व की राजनीति करके उभरे हैं। इन जनप्रतिनिधियों ने अपने समुदाय के मतदाताओं को हिन्दुत्व के एजेंडे का असली चेहरा कभी नहीं दिखाया, भले ही पार्टी में इनके साथ कितना भी भेदभाव हुआ हो।

मध्य प्रदेश की राजनीति में 80 के दशक से पहले तक कांग्रेस ने भी दलितों, आदिवासियों को नज़रअंदाज़ किया। लेकिन जब 80 के दशक में भाजपा से कांग्रेस को कड़ी चुनौती मिली, तो उसने दलित, आदिवासी प्रतिनिधियों को पार्टी से जोडऩे के प्रयास करने पड़े, जिसके लिए पार्टी हाईकमान ने कई क़दम उठाये। मध्य प्रदेश की राजनीति में भागीदारी के लिए कई दलित संगठनों ने आन्दोलन किये। हालाँकि मध्य प्रदेश में दलित आन्दोलन कभी उभरकर सामने नहीं आ सका। वहीं आदिवासी आन्दोलनों का मध्य प्रदेश में लम्बा इतिहास रहा है। लेकिन इस बार दलित-आदिवासी बहुल इलाक़ों में जितनी बड़ी जीत भाजपा को मिली है, उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। क्योंकि अपनी कई माँगों और महँगाई, बेरोज़गारी, हक़मारी और दलितों, आदिवासियों के ख़िलाफ़ बढ़ते आपराधिक मामलों के चलते मध्य प्रदेश में भाजपा के प्रति जिस तरह की नाराज़गी है, उसके बावजूद इस तरह का चुनाव परिणाम आना बहुत चौंकाने वाला है।

पिछले कुछ वर्षों में शिवराज सिंह चौहान, जो कि एक हिन्दुत्ववादी नेता हैं; के प्रति दलितों-आदिवासियों में नाराज़गी बढ़ी है। शिवराज सिंह चौहान सरकार के पिछले कार्यकालों में जिस प्रकार से दलितों, आदिवासियों पर अत्याचार हुए हैं, उनके चलते दलित-आदिवासी जनता और उनके विभिन्न संगठनों में ख़ासी नाराज़गी बढ़ी है।

हालाँकि हो सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित-आदिवासी मतदाताओं का बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा इन समुदायों के विजेता प्रत्याशियों को सरकार में कुछ महत्त्वपूर्ण पद भी दे दे। केंद्र सरकार द्वारा पहले एक दलित को और अब एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति पद पर नियुक्त करने के पीछे भी भाजपा का यही मक़सद छिपा था। लेकिन क्या इससे पूरे दलित, आदिवासी समुदाय का भला होगा? यह तो रोज़गार, सम्मान और दलितों-आदिवासियों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों से मुक्ति मिलने पर ही सम्भव है, जो कि भाजपा के मुख्य एजेंडे में नहीं है। इसके लिए सरकार में दलित आदिवासी जनप्रतिनिधियों को बड़ी ज़िम्मेदारियाँ मिलनी चाहिए।

महिलाओं को कितना महत्त्व?

हाल ही में हुए पाँचों राज्यों में महिला प्रत्याशी चुनकर विधानसभा पहुँची हैं। भाजपा और कांग्रेस की कई महिला प्रत्याशी चुनाव जीती हैं। लेकिन क्या उनकी दशा में भी सुधार होगा? मध्य प्रदेश में भाजपा की पिछली शिवराज सरकार में दलितों, आदिवासियों की तरह ही महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में बढ़ोतरी देखी गयी। इनमें अपराधियों के निशाने पर सबसे ज़्यादा महिलाएँ भी दलित-आदिवासी समुदायों की ही हैं।

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 में भाजपा और कांग्रेस ने कुल 57 महिलाओं को मैदान में उतारा था। इसमें से 27 महिला प्रत्याशी चुनकर विधानसभा पहुँची हैं। इनमें भाजपा की 28 महिला प्रत्याशियों में से 21 महिलाएँ चुनाव जीतकर विधानसभा पहुँची हैं। वहीं कांग्रेस की 29 महिला प्रत्याशियों में से छ: महिलाएँ चुनाव जीतकर विधानसभा पहुँची हैं। मध्य प्रदेश में महिला मतदाताओं की कुल भागीदारी क़रीब 11.73 फ़ीसदी है। तीन राज्यों में सिर्फ़ राजस्थान में राजघराने से ताल्लुक़ रखने वाली दीया कुमारी को ही भाजपा ने उप मुख्यमंत्री बनाया है; लेकिन बा$की जगह मुख्य पदों पर एक भी महिला नहीं है।

विदित हो कि हाल ही में संसद में पास हुए 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण विधेयक को भाजपा ने अभी तक लागू नहीं किया है, अन्यथा मध्य प्रदेश में उसे क़रीब 74 महिला प्रत्याशियों को टिकट देना पड़ता। लेकिन भाजपा ने इस बार क़रीब 12 फ़ीसदी टिकट ही महिला प्रत्याशियों को दिये। वहीं कांग्रेस ने भी भाजपा से केवल एक टिकट ज़्यादा महिला प्रत्याशियों को दिया। हालाँकि इस बार के विधानसभा में चुनकर पहुँची महिला विधायकों की संख्या छ: ज़्यादा है। पिछली बार 2018 में महिला विधायकों की कुल संख्या 21 थी।

इस बार मध्य प्रदेश में महिलाओं ने रिकॉर्ड 76.03 फ़ीसदी मतदान किया था। वहीं पुरुषों ने 78.21 फ़ीसदी मतदान किया। प्रदेश में हुए इस बार के विधानसभा चुनाव में कुल 77.15 फ़ीसदी मतदान हुआ था। प्रदेश में क़रीब 5,60,60,925 मतदाता हैं। इनमें से क़रीब 2,88,25,607 पुरुष मतदाता हैं। क़रीब 2,72,33,945 महिला मतदाता हैं। वहीं 1,373 थर्ड जेंडर मतदाता हैं। देखते हैं कि महिला आरक्षण पर बात करने वाली भाजपा इस बार महिला विधायकों को सरकार में कितना महत्त्व देगी?

मोदी का महिला संरक्षणवाद और ज़मीनी हक़ीक़त

PM receives warm welcome by people on his arrival at Varanasi, in Uttar Pradesh on September 23, 2023.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नज़र में भारत में चार जातियाँ हैं- ग़रीब, युवा, किसान व महिलाएँ। इन चार जातियों में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक है। संख्या के लिहाज़ से महिलाओं की आबादी क़रीब 60 करोड़ से ज़्यादा है। प्रधानमंत्री बड़े-बड़े मंचों पर अक्सर अपने भाषणों में आधी आबादी का ज़िक्र करते सुनाई पड़ते हैं। उन्होंने अपनी महत्त्वाकांक्षी नारे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के ज़रिये अपने राजनीतिक मंसूबों में महिला हितों का ध्यान रखने वाले संदेश देने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। हाल में ही प्रधानमंत्री मोदी ने विकसित भारत संकल्प यात्रा की महिला लाभार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि सभी महिलाओं को एकजुट रहना चाहिए। आजकल कुछ लोग महिलाओं के बीच दरार पैदा कर रहे हैं। सभी महिलाओं की एक जाति होती है, जो इतनी बड़ी है कि वे किसी भी चुनौती का सामना कर सकती हैं।’

दरअसल मोदी की इस टिप्पणी को कांग्रेस और अन्य दलों पर निशाने के तौर पर देखा जा रहा है, जो जाति आधारित जनगणना पर ज़ोर दे रहे हैं। बहरहाल विभिन्न राजनीतिक दलों में महिला हितैषी होने की होड़ लगी हुई है और चुनावी मौसम में इस होड़ की रफ़्तार बहुत तेज़ हो जाती है। महिलाओं की एक मतदाता के तौर पर राजनीतिक ताक़त को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बहुत अच्छी तरह से समझा और ऐसी योजनाओं के ज़रिये उन्हें अपने साथ जोड़ते चले गये कि बिहार के राजनीतिक परिदृष्य में महिलाओं की गिनती अहम होती चली गयी। बीते कुछ वर्षों से देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा नैरेटिव यानी विमर्श गढ़ा है कि केवल भाजपा को ही महिलाओं के हितों की चिन्ता है। केवल चिन्ता ही नहीं है, बल्कि इसी पार्टी की राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा व कार्यक्रमों में महिला सशक्तिकरण को ज़मीनी स्तर पर उतारने का दमख़म भी है।

मोदी व योगी महिलाओं के संरक्षक के तौर पर ख़ुद को पेश करने में कोई क़सर नहीं रखते। लेकिन बीते तीन वर्षों के सरकारी आँकड़े ही बोलते हैं कि देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध बढ़े हैं। हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इन इंडिया-2022 नामक जारी रिपोर्ट के आँकड़ों के अनुसार, देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 4,45,256 मामले दर्ज किये गये। इस तरह वर्ष 2022 में हर घंटे 51 महिलाएँ अपराध की शिकार हुईं यानी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के सिलसिले में हर 60 मिनट में 51 प्राथमिकी दर्ज की गयीं। इससे पहले वर्ष 2021 में यह आँकड़ा 4,28,278 मामलों का था; जबकि वर्ष 2020 में 3,71,503 प्राथमिकी दर्ज की गयी थीं।

एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 2022 में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामलों में सबसे अधिक 65,743 प्राथमिकी दर्ज की गयीं। इसके बाद महाराष्ट्र में यह आँकड़ा 45,331,राजस्थान में 45,058, पश्चिम बंगाल में 34,738 और मध्य प्रदेश में 32,765 है। राजधानी दिल्ली में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों की दर सबसे अधिक है। वर्ष 2022 में 144.4 प्रति लाख दर दिल्ली में दर्ज की गयी, जो कि राष्ट्रीय औसत दर 66.4 प्रति लाख से काफ़ी अधिक है। ग़ौरतलब है कि एनसीआरबी एजेंसी अपनी रिपोर्ट में यह रेखांकित करती है कि ये आँकड़े दर्ज अपराधों के आँकड़े हैं, न कि वास्तविक संख्या को दर्शाते हैं।

ज़ाहिर है महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की असली संख्या अधिक ही होगी; क्योंकि हज़ारों मामलों में महिलाओं पर उनके ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों को लेकर ख़ामोश रहने के लिए पारिवारिक व सामाजिक दबाव डाला जाता है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा की मानना है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों के मामलों में प्राथमिकी की संख्या में वृद्धि के एनसीआरबी के आँकड़ों से संकेत मिलता है कि अधिक महिलाएँ आगे आ रही हैं और मामले दर्ज करा रही हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है।

वैसे पुलिस अधिकारी भी यही कहते हैं कि अब अधिक महिलाएँ प्राथमिकी दर्ज कराने आती हैं। अपनी-अपनी दलीलें हैं; मगर ज़ोर-शोर से महिलाओं के सशक्तिकरण के नारों से महिला सुरक्षा का जो माहौल बनाने का दावा किया जाता है, उसमें बहुत छेद हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए गठित निर्भया फंड का सही तरह से पूरा इस्तेमाल न होना भी सरकारी अधिकारियों की संवेदनशीलता व क्रियान्वयन पर सवाल खड़ा करता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि मोदी की गांरटी में महिलाओं की सुरक्षा की गांरटी पर बात नहीं होती। महिला सुरक्षा को लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री यदा-कदा कड़े बयान देते ज़रूर नज़र आते हैं; लेकिन ज़मीनी स्तर पर हालात भिन्न हैं।

महाराष्ट्र सरकार बिछा रही चुनाव में जीत के पासे

के.रवि (दादा)

यह साल भी हर साल की तरह गुज़रने वाला है। 2024 चुनावों के नज़रिये से बड़ी हलचल वाला होने वाला है। 2024 में लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने बाद अक्टूबर के आसपास महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव होने हैं। महाराष्ट्र की शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट, भाजपा और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अजित पवार गुट की मिलीजुली सरकार ने इस चुनाव के लिए धन जुटाना शुरू कर दिया है।

एक आरोप हाल ही में संविधान रचयिता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के पोते और वंचित बहुजन आघाड़ी के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने सरकार पर लगाया कि महाराष्ट्र सरकार ने टमाटर घोटाला करके 35,000 करोड़ रुपये कमा लिये हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी सहित भाजपा और आरएसएस पर टमाटर की कालाबाज़ारी करवाकर करोड़ों रुपये की इस लूट का आरोप लगाया। उन्होंने वंचित के सांगली में ‘बिजली अधिग्रहण बैठक’ में खुले मंच से कहा कि हमें आरएसएस-भाजपा शासन के 10 वर्षों का हिसाब-किताब शुरू करना चाहिए। नरेंद्र मोदी एक लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि एक तानाशाह हैं। लोकसभा चुनाव तक वह एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करेंगे। मोदी पत्रकारों के सामने जाकर जवाब देने से डरते हैं, क्योंकि पत्रकार उनसे ज़्यादा होशियार हैं। वह बहुत डरपोक प्रधानमंत्री हैं। प्रकाश अंबेडकर ने कहा कि जब व्यापारियों और सरकार की मिलीभगत हुई, तो टमाटर की कमी हो गयी, दाम बढ़ा दिये गये, चुनाव का ख़र्चा निकाल लिया गया और दाम फिर गिर गये।

प्रकाश अंबेडकर ने जो आरोप महाराष्ट्र की जोड़-तोड़ की सरकार पर आरोप लगाये हैं, वो पिछले महीनों में महँगे हुए टमाटर को लेकर लगाये। जो टमाटर किसानों से 2 से 3 या बहुत हुआ तो 4 रुपये किलो ख़रीदा जाता था और बाज़ार में 10 से 15 रुपये किलो बिकता था, वो अचानक 200 रुपये किलो पहुँच गया था। इसके पीछे की कहानी और घोटाले की योजना कोई नयी या लंबी नहीं है। बस व्यापारियों पर दबाव बनाकर उन्हें टमाटर को होल्ड करने को कहा जाता है और यह खेल बड़े आराम से हो जाता है। जब भी चुनाव पास आते हैं, तो हर सरकार और सरकार में बैठे मंत्री से लेकर संतरी तक $खूब पैसा बटोरते हैं। तो $खाली टमाटर से ही सरकार ने चुनावों के लिए पैसा नहीं जुटाया है, उसके लिए और भी रास्ते ज़रूर निकाले होंगे; क्योंकि आजकल चुनाव जीतने के लिए चुनाव आयोग के नियमों को ध्यान में न रखते हुए करोड़ों से लेकर अरबों रुपये पार्टियाँ ख़र्च करती हैं और हर एक चुनाव में हर पाँच साल में इसी तरह से जनता के सिर पर वो पैसे ख़र्चने का बोझ बढ़ता रहता है और हर साल महँगाई भी कमायी से ज़्यादा बढ़ती रहती है।

मेरे संज्ञान में ऐसे कई मामले हैं, जिनमें पैसे को पार्टियाँ और उनके उम्मीदवार पानी की तरह बहाते हैं और फिर भी वो कभी ग़रीब नहीं होते। सरकार में आते ही वो और अमीर होते चले जाते हैं। यह तो रही पैसा जुटाने के एक तरीक़े की बात। महाराष्ट्र सरकार ने आगामी चुनाव जीतने के लिए दूसरा तरीक़ा निकाला है- मराठों को ओबीसी दर्जे में लाकर आरक्षण देने का।

असल में महाराष्ट्र में सरकार गिरने के बाद भी अभी उद्धव ठाकरे गुट वाली शिवसेना, कांग्रेस और शरद पवार वाली राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी भाजपा के माफिक कमज़ोर नहीं हुई है। इसके लिए एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय को ओबीसी के तहत आरक्षण देने की बात दोहरायी है। अभी इसी महीने महाराष्ट्र सरकार ने सभी प्रमुख मराठी समाचार पत्रों में पहले पन्ने पर विज्ञापन देकर महाराष्ट्र में एक हलचल पैदा कर दी है। मराठा आरक्षण की समय सीमा से ठीक पहले आया यह विज्ञापन महाराष्ट्र में चुनाव जीतने की जमीन तैयार करने के वास्ते है। पड़ इसमें मराठों की अपनी अपनी माँगें भी हैं, जो सरकार के लिए सिरदर्द बन सकती हैं।

एक-दो उदाहरण देखें, मसलन मराठवाड़ा के मराठा कुनबी जाति प्रमाण-पत्र माँग रहे हैं। दूसरी ओर मराठा आरक्षण के लिए क़ानूनी मोर्चे पर महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँच गयी है। इसमें उसने सुप्रीम कोर्ट के 2021 के मराठा आरक्षण को अमान्य करने के फ़ैसले को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई करने को तैयार भी हो गयी है। सुनवाई कब शुरू होगी, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। मुख्यमंत्री शिंदे द्वारा स्थापित समिति ने आरक्षण पर रिपोर्ट सौंपने के लिए जनवरी तक का टाइम माँगा है।

कुछ राजनेता मराठा आरक्षण को ओबीसी के तहत देने के ख़िलाफ़ हैं। महाराष्ट्र में ओबीसी आबादी 52 फ़ीसदी है। यह महाराष्ट्र का प्रमुख बीपी वोट बैंक हैं। इसलिए ओबीसी अपना दम दिखा रहे हैं और मराठों को ओबीसी के तहत आरक्षण देने का विरोध कर रहे हैं।

अब सरकार मराठा आरक्षण का रास्ता निकालना चाह रही है, जिसमें उसकी नस दब भी सकती है। विपक्षी दल ऐसे ही किसी मौक़े की तलाश में है, जिसमें वो सरकार की नाकामी का फ़ायदा उठा सकें। बाकी तस्वीर आने वाले दिनों में सामने आएगी।

मुफ़्त की रेवड़ी

सरकारों द्वारा जनता को मुफ़्त सुविधाएँ देने को लेकर चार साल से छिड़ी राजनीतिक बहस अब ठंडी होती जा रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मुफ़्त की रेवड़ी कहा था और जनता को इससे दूर रहने की सलाह दी थी। उस समय उनका इशारा दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा दिल्ली की जनता को दी जा रही मुफ़्त शिक्षा, मुफ़्त स्वास्थ्य लाभ, हर महीने 200 यूनिट मुफ़्त बिजली, हर महीने 20,000 लीटर मुफ़्त पानी और महिलाओं को दिल्ली में मुफ़्त बस यात्रा की तर$फ था। उन दिनों आम आदमी पार्टी अन्य राज्यों में भी अपने घोषणा-पत्र में दिल्ली जैसे तमाम वादे जनता से कर रही थी और आज भी उसके वही वादे आगे-पीछे होकर चुनावी घोषणा पत्रों में नज़र आते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान इसे मुफ़्त की रेवड़ी कहते हुए इसके मनगढ़ंत नुक़सान तो गिना दिये; लेकिन चुनावों में ख़ुद भी ऐसे वादे करने से बच नहीं सके। उनकी अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में भी कई मुफ़्त की घोषणाएँ तब भी की गयीं और आज भी की जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तो अपने हर वादे को गारंटी से जोड़ दिया है। राजनीति में यह नया प्रयोग है। इससे पहले किसी सामान पर में गारंटी या वारंटी लिखा देखा जाता रहा है। हालाँकि यह बात अलग है कि अब कई राजनीतिक वादे गारंटी के साथ चुनावों में पेश किये जाते हैं और चुनाव होने के बाद उनमें से कई की तो वारंटी भी नहीं रहती। सिर्फ़ विज्ञापनों और काग़ज़ात में उनके पूरे होने के दावे पाँच साल तक ज़रूर किये जाते रहते हैं। चुनावी रैलियों और जनसभाओं में जनता को वादों की पोटली थमाने वाले फिर पाँच साल कहीं नज़र भी नहीं आते।

इस बार ही पाँच राज्यों में से तीन (राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की है। इन राज्यों में भाजपा ने विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान जनता से अनेक वादे किये। भाजपा ने इन घोषणा पत्रों को ‘मोदी की गारंटी’ के नाम से जारी किया। इनमें भाजपा ने राजस्थान में उज्ज्वला योजना वाला गैस सिलेंडर 450 रुपये में देने, किसान सम्मान निधि की राशि 6,000 रुपये वार्षिक से बढ़ाकर 12,000 रुपये करने, अगले पाँच साल तक पाँच किलोग्राम राशन देने, 12वीं पास करने वाली मेधावी छात्राओं को स्कूटी देने और ग़रीब परिवार की बच्चियों की केजी (शिशु मंदिर) से लेकर पीजी (परास्नातक) तक की पढ़ाई मुफ़्त कराने के वादे किये।

भाजपा ने मध्य प्रदेश में उज्ज्वला योजना वाले गैस सिलेंडर 450 रुपये में देने, अगले पाँच साल तक पाँच किलोग्राम राशन मुफ़्त देने, ग़रीब परिवार की बच्चियों की 12वीं तक की पढ़ाई मुफ़्त कराने के अलावा यूनिफॉर्म, किताबें और स्कूल बैग ख़रीदने के लिए 1,200 रुपये वार्षिक देने, लोगों को हर महीने 100 यूनिट बिजली 100 रुपये में देने, 21 वर्ष की होने पर ग़रीब परिवार की बच्चियों को 2,00,000 रुपये देने, लाडली बहना योजना के तहत ग़रीब महिलाओं को हर महीने 1,250 रुपये की जगह 3,000 रुपये देने, किसान सम्मान निधि और किसान कल्याण योजना के दायरे में आने वाले किसानों को 12,000 रुपये वार्षिक देने जैसे वादे किये।

ऐसे ही छत्तीसगढ़ में उसने महतारी वंदन योजना के तहत विवाहित महिलाओं को 12,000 रुपये वार्षिक देने, अगले पाँच साल तक पाँच किलोग्राम राशन मुफ़्त देने, दीनदयाल उपाध्याय कृषि मज़दूर योजना बनाकर उसके तहत कृषि मज़दूरों को 10,000 रुपये वार्षिक देने, ग़रीब परिवार की महिलाओं को 500 रुपये में गैस सिलेंडर देने और छात्रों को हर महीने यात्रा भत्ता देने जैसे वादे किये हैं।

अब तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है और उसे अपने वादे पूरे करने होंगे। हालाँकि इससे पहले भी कई चुनावों में भाजपा द्वारा किये गये वादों के पूरा होने का लोगों को इंतज़ार है। अभी कुछ ही महीनों में लोकसभा के चुनाव भी होने हैं। तय है कि भाजपा की ओर से देश के इस सबसे अहम चुनाव में भी कई वादे किये जाएँगे, जिनमें मुफ़्त की रेवडिय़ाँ भी ज़रूर होंगी। ऐसे में प्रधानमंत्री और दूसरे किसी भी नेता को मुफ़्त की रेवडिय़ों पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि जनता को आवश्यक सुविधाएँ देना मुफ़्त की रेवडिय़ाँ हैं, तो फिर चुने हुए विधायकों, सांसदों और मंत्रियों को मिलने वाली मुफ़्त सुविधाएँ क्या हैं? क्या उन्हें वेतन नहीं मिलता? क्या उन्हें कई-कई पेंशन लेने का अधिकार है? क्या उन्हें चुनाव हारने के बाद भी मुफ़्त की रेवडिय़ाँ लेने का हक़ है? भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरे ये जनप्रतिनिधि कितने नाकारा हैं, इस बात का अंदाज़ा ज़िम्मेदारी वाले कामों में इनकी सुस्ती से लगाया जा सकता है। नये संसद भवन के भीतर घुसकर जिस प्रकार से एक बार फिर हमला हुआ है, वो भी इन जनप्रतिनिधियों की लोकतंत्र को बचाने की सुस्ती को दर्शाता है। फिर भी इन्हें मुफ़्त की रेवडिय़ाँ चाहिए। लेकिन जनता को चंद सुविधाएँ न मिलें।  

संसद में सुरक्षा ब्रीच जरूर हुआ लेकिन इसका कारण मोदी जी की पॉलिसी है, हिंदुस्तान के युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है- राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शनिवार को पत्रकारों से बातचीत करते मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि बेरोजगारी और महंगाई के चलते संसद की सुरक्षा में चूक हुई है।

राहुल गांधी ने कहा कि, “केंद्र सरकार की गलत नीतियों के चलते युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है। सुरक्षा में चूक जरूर हुई है मगर सवाल है कि यह क्यों हुआ? देश में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी का है। यह देश भर में उबल रहा है। मोदी सरकार की नीतियों के कारण हिंदुस्तान में युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा  है। सुरक्षा में चूक जरूर हुई है लेकिन इसके पीछे का कारण बेरोजगारी और महंगाई है।”

आपको बता दें, 13 दिसंबर को संसद की शीतकालीन सत्र में लोकसभा की कार्यवाही के दौरान दो युवक सदन में प्रवेश करके दर्शक दीर्घा से कूद गए थे। युवकों के हाथ में टियर गैस कनस्तर भी था। बताया जा रहा है कि दोनों युवक भाजपा सांसद प्रताप सिम्हा के विजिटर पास से संसद पहुंचे थे।

हालांकि दोनों युवक को सुरक्षाकर्मियों ने गिरफ्तार कर लिया है। और पुलिस को उनकी सात दिन की रिमांड पर भेजा गया है।

अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला परेशान करने वाला – जस्टिस नरीमन

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के उच्च न्यायालय के फैसले पर हमला बोलते हुए कहा कि इस फैसले का संघवाद पर असर पड़ा है।

मुंबर्इ में भारत का संविधान नियंत्रण एवं संतुलन विषय पर व्याख्या देते हुए जस्टिस नरीमन ने आगे कहा कि, “राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने पर निर्णय लेने से इनकार करके शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को अनुच्छेद 356 को दरकिनार करने की अनुमति दी है, जिसके अनुसार किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन केवल एक साल के लिए संभव है।”

उन्होंने कहा कि, “अनुच्छेद 356 संवैधानिक विघटन से संबंधित है, जब केंद्र सत्ता संभालता है। किसी भी परिस्थिति में यह एक साल से अधिक नहीं हो सकता है। जब तक कि राष्ट्रीय आपातकाल न हो या चुनाव आयोग को यह न कहना पड़े कि चुनाव संभव नहीं हैं। तो आप अनुच्छेद 356 को कैसे दरकिनार कर सकते हैं? आप राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के इस सरल तरीके से इसे दरकिनार कर सकते हैं, जहां आपके पास सीधे केंद्रीय नियंत्रण है और समय/सीमा के बारे में कोई समस्या नहीं है।”

पूर्व न्यायाधीश ने आगे कहा कि, “इसमें कहा गया है कि हम फैसला नहीं करेंगे का मतलब है वास्तव में आपने फैसला कर लिया है। आपने इसे असंवैधानिक अधिनियम को अनिश्चित काल के लिए आगे बढ़ाने की अनुमति दी है और आपने अनुच्छेद 356 (5) को नजरअंदाज कर दिया है। ये सभी बहुत हैं परेशान करने वाली बातें।”

विजय दिवस: पीएम मोदी समेत अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं ने 1971 के युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों को दी श्रद्धांजलि

52वें विजय दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह सहित राजनीतिक दलों के कई अन्य नेताओं ने शनिवार को 1971 के युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की है।

जवानों को सम्मानित करते हुए पीएम मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि, “उनका बलिदान हमेशा हमारे दिलों में अंकित रहेगा।”

पीएम मोदी ने एक्स कर कहा कि, “आज, विजय दिवस पर हम उन सभी बहादुर नायकों को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने 1971 में निर्णायक जीत सुनिश्चित करते हुए कर्तव्यनिष्ठा से भारत की सेवा की। उनकी वीरता और समर्पण राष्ट्र के लिए अत्यंत गौरव का स्त्रोत है। उनका बलिदान और अटूट भावना हमेशा लोगों के दिलों और हमेशा देश के इतिहास में अंकित रहेगी। भारत उनके साहस को सलाम करता है और उनकी अदम्य भावना को याद करता है।”

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक्स कर कहा कि, “आज ही के दिन 1971 में दुनिया का भूगोल बदल गया था, जब हमारे बहादुर भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान को हराया और बांग्लादेश को आजाद कराया। श्रीमती के गतिशील और निर्णायक नेतृत्व में यह मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर था। इंदिरा गांधी। हम अपनी सशस्त्र सेनाओं और मुक्ति वाहिनी के अदम्य साहस, वीरता, और दृढ़ संकल्प को नमन करते हैं।”

बता दें, 16 दिसंबर 1971 को लगभग 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी की संयुक्त सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ।

मुंबई इंडियंस के आईपीएल 2024 के लिए हार्दिक पांड्या को होंगे कप्तान

आईपीएल फ्रेंचाइजी मुंबई इंडियंस ने हार्दिक पांड्या को आगामी सीजन के लिए टीम का कप्तान बना दिया है। बता दें पिछले 10 साल से टीम की कमान रोहित शर्मा ने संभाली हुई थी।

आईपीएल मिनी नीलामी से पहले फ्रेंचाइजी ने शुक्रवार को हार्दिक पांड्या को कप्तान बनाने की घोषणा की। आईपीएल नीलामी 19 दिसंबर को होने वाली है।

एक प्रेस रिलीज के जरिए शुक्रवार को मुंबई इंडियंस के ग्लोबल हेड ऑफ परफॉर्मेंस महेला जयवर्धने ने कहा कि, “मुंबई इंडियंस को सचिन से लेकर हरभजन और रिकी से लेकर रोहित तक हमेशा असाधारण नेतृत्व का आशीर्वाद मिला है, जिन्होंने तत्काल सफलता में योगदान देने के साथ-साथ भविष्य के लिए टीम को मजबूत करने पर भी नजर रखी है। यह इस दर्शन के अनुरूप है कि हार्दिक पांड्या आईपीएल 2024 सीजन के लिए मुंबई इंडियंस की कप्तानी संभालेंगे।”

पेशी के लिए जा रहे कैदी की गोली मारकर की हत्या: बिहार

बिहार की राजधानी पटना में शुक्रवार को दिनदहाड़े पुलिस दानापुर कोर्ट परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई है। कोर्ट परिसर में पहुंचे बदमाशों ने लगातार फायरिंग की जिससे परिसर में अफरा तफरी मच गई।

जिस अपराधी पर गोलियां चली उसकी पहचान बिहटा थाना क्षेत्र के सिकंदरपुर निवासी अभिषेक कुमार उर्फ छोटे सरकार के रूप में की गई है। अपराधी की मौके पर ही मौत हो गई।

बता दें, बताया जा रहा है कि कैदी पर हत्या समेत कई संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं वह बेउर जेल में बंद था।

सिटी एसपी राजेश कुमार ने कहा कि, 2 हमलावरों ने गोलियां चलाई। दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है। मौके से चार खोखा बरामद हुआ है। पुलिस आरोपियों से पूछताछ कर रही है। निश्चित तौर पर कोर्ट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था के मामले में लापरवाही हुए हैं। हम लोग इसकी जांच करेंगे। जो भी दोषी पाए जाएंगे उन पर कार्रवाई करेंगे।