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समलैंगिक विवाह : जारी है हंगामा

बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा पारित एक प्रस्ताव में सर्वोच्च न्यायालय से समान-लिंग विवाह के लिए क़ानूनी मान्यता प्राप्त करने वाली याचिकाओं पर निर्णय लेने से बचने का आग्रह किया गया है, जिसमें कहा गया है कि ऐसे मामलों से निपटना विधायिका की ज़िम्मेदारी है। संकल्प का दावा है कि देश के 99.9 फ़ीसद से अधिक लोग ‘समान सेक्स विवाह के विचार’ के विरोध में हैं।

हालाँकि इसके विपरीत विचार यह है कि समान-लिंग विवाह को वैध करके भारत उन 30-विषम देशों में शामिल हो सकता है, जो इसे अनुमति देते हैं, और एशिया में नेतृत्व कर सकते हैं; जहाँ केवल ताइवान ने इसे वैध बनाया है। वास्तव में रुत्रक्चञ्जक्तढ्ढ्र+ (अर्थात लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीर/और क्वेस्चनिंग, इंटरसेक्स, असेक्सुअल, टू-स्पिरिट) समुदाय सर्वोच्च न्यायालय से इस पर एक निश्चित निर्देश की तलाश करेगा।

इससे पहले केंद्र ने सुनवाई के दौरान कहा था कि न्यायालय के समक्ष याचिकाएँ सामाजिक स्वीकृति के उद्देश्य से शहरी अभिजात्य विचारों को दर्शाती हैं। केंद्र ने अपनी अर्ज़ी में कहा- ‘समान लिंग विवाह के अधिकार को मान्यता देने के न्यायालय के एक निर्णय का मतलब क़ानून की एक पूरी शाखा का एक आभासी न्यायिक पुनर्लेखन होगा। न्यायालय को इस तरह के सर्वव्यापी आदेश पारित करने से बचना चाहिए। इसका अधिकार विधायिका को है। इन क़ानूनों की मौलिक सामाजिक उत्पत्ति को देखते हुए इनके वैध होने के लिए किसी भी बदलाव को निचले स्तर से ऊपर आना होगा और क़ानून के माध्यम से एक बदलाव को न्यायिक व्यवस्था पत्र से मजबूर नहीं किया जा सकता है और परिवर्तन का सबसे अच्छा न्यायाधीश स्वयं विधायिका है।’

आवेदन में आगे कहा गया है कि ‘चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए पूरी तरह से आरक्षित विधायी शक्तियों पर कोई भी अतिक्रमण शक्तियों के पृथक्करण के सुस्थापित सिद्धांतों के ख़िलाफ़ होगा, जिसे संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा माना जाता है। शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा से इस तरह का कोई भी विचलन संवैधानिक नैतिकता के विपरीत होगा।’

केंद्र की याचिका के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया का एक प्रस्ताव आया, जिसमें कहा गया है कि ‘समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने का मुद्दा बार के लिए गम्भीर चिन्ता का विषय है और ऐसे संवेदनशील मामले में शीर्ष न्यायालय का कोई भी फ़ैसला आने वाले दिनों में देश के सामाजिक ढाँचे को अस्थिर कर सकता है। संकल्प न्यायालय से आग्रह करता है कि वह समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के सवाल को विधायिका पर छोड़ दे; क्योंकि यह देश के लोगों के सामाजिक विवेक और जनादेश के अनुसार उचित निर्णय पर पहुँच सकता है।’

समलैंगिक शादियों को क़ानूनी मान्यता देने की माँग वाली 15 याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने साथ जोड़ दिया है। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और जे.बी. पार्दीवाला की पीठ ने केंद्र से सभी याचिकाओं पर अपना जवाब दाख़िल करने को कहा। याचिकाकर्ता समान-लिंग विवाह को वैध बनाने के लिए एक आधिकारिक निर्णय की तलाश कर रहे हैं, विशेष रूप से इस सवाल पर कि क्या इसे 1954 के विशेष विवाह अधिनियम के दायरे में लाया जाएगा, जो उन जोड़ों के लिए नागरिक विवाह की अनुमति देता है, जो अपने व्यक्तिगत क़ानून के तहत शादी नहीं कर सकते।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि समुदाय को विषमलैंगिक जोड़ों के समान अधिकारों से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद-14, 19 और 21 और मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 16 सहित जीवन और स्वतंत्रता पर मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, जिसका भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है।

शीर्ष न्यायालय को पहले केंद्र और अब बार काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा, जिसने यह कहते हुए कि न्यायिक हस्तक्षेप व्यक्तिगत क़ानूनों के नाज़ुक संतुलन के साथ पूर्ण विनाश का कारण बनेगा, समान-लिंग विवाह का विरोध किया है।

पंजाब की राजनीति के किंग थे बादल

प्रकाश सिंह बादल के निधन से पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा चला गया है। विवादों और उपलब्धियों के साथ प्रकाश सिंह बादल से जुड़ा एक तथ्य यह है कि वह पंजाब, ख़ासकर देहाती राजनीति की नब्ज़ गहराई से पहचानने वाले नेता थे। आम लोगों में उनका सम्मान था, भले उनकी कई नीतियों को लेकर उनके विरोधियों की एक लम्बी कतार भी हमेशा रही, जिनमें सिख भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। पंजाब में हिन्दू-सिख एकता के वह हिमायती रहे। पंथक राजनीति से होने के बावजूद हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा उनके जीवन के दूसरे उत्तरार्ध की सहयोगी रही। उन्होंने राजनीतिक जीवन की शुरुआत एक कांग्रेसी के रूप में की और एक ऐसा अवसर भी उनके जीवन में रहा, जब विवादित सिख धार्मिक नेता जनरैल सिंह भिंडरावाले के साथ उनकी तस्वीर पर ख़ूब बवाल हुआ।

किसान परिवार से ताल्लुक़ रखने वाले प्रकाश सिंह का बादल सरनेम उनके गाँव के नाम पर था, अन्यथा वह ढिल्लों जाट सिख थे। सन् 1970 में 43 साल की उम्र में पंजाब का मुख्यमंत्री बनने पर वह उस समय देश में सबसे कम उम्र में मुख्यमंत्री बनने वाले नेता थे, जबकि साल 2017 में जब वे पंजाब के पाँचवीं बार मुख्यमंत्री बने, तो उस समय देश में इस पद पर बैठने वाले सबसे बड़ी उम्र (85 साल) के मुख्यमंत्री थे।

राजनीतिक सफ़र

बादल का जन्म 8 दिसंबर, 1927 को बठिंडा ज़िले के अबुल-खुराना गाँव में हुआ। माता सुंदरी कौर और पिता रघुराज सिंह के यहाँ जन्म लेने वाले प्रकाश सिंह जब लम्बी के स्कूल में पढ़ते थे, तो गाँव से घोड़े पर सवार होकर जाया करते थे। ग्रेजुएशन के बाद अकाली नेता ज्ञानी करतार सिंह के प्रभाव में आकर उन्होंने 1947 में राजनीति शुरू की। पिता रघुराज सिंह की तरह प्रकाश सिंह भी बादल गाँव के सरपंच और बाद में लम्बी ब्लॉक समिति के अध्यक्ष बने।

सन् 1956 में पेप्सू राज्य के पंजाब में शामिल होने के बाद कांग्रेस-अकाली दल मिलकर चुनाव में उतरे। साथियों की तरह प्रकाश सिंह ने भी सन् 1957 का पंजाब विधानसभा चुनाव कांग्रेस टिकट पर लड़ा और जीते। सन् 1996 में केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से एचडी देवेगौड़ा की क्षेत्रीय दलों की सरकार बनी। यही समय था, जब प्रकाश सिंह बादल भाजपा के नेतृत्व में गठित एनडीए से जुड़ गये। इसके बाद वह कांग्रेस के कट्टर विरोधी रहे।

गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन से 1920 में बनी देश की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी शिरोमणि अकाली दल में बादल अपनी चतुराई से शीर्ष पर पहुँचे। यह वह दौर था, जब पार्टी का नेतृत्व हरचंद सिंह लोंगोवाल, गुरचरण सिंह टोहरा, जगदेव सिंह तलवंडी और सुरजीत सिंह बरनाला जैसे दिग्गज नेता कर रहे थे। इसका कारण बादल का मज़बूत वक्ता होना और जनता के साथ संवाद करने में उनकी महारत होना था। बादल 1970 से 1971 और फिर 1977 से 1980 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। पंजाब में आतंकवाद के दौर में सन् 1995 में लम्बे समय के बाद प्रकाश सिंह बादल राजनीति में फिर सक्रिय हुए। भाजपा का सहयोगी बनकर बादल ने पंजाब में तीन बार सरकार बनायीं। दोनों में मतभेद भी उपजे; लेकिन बादल ने अपनी समझ से इन्हें बढऩे नहीं दिया। इस दौरान 1997 से 2002 तक और 2007 से 2017 तक वे फिर पंजाब के मुख्यमंत्री रहे।

वह 1995 से 2008 तक अकाली दल के अध्यक्ष रहे। बादल ने विपक्ष में भी अहम भूमिका निभायी। वह 1972, 1980 और 2002 में पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। बादल की पत्नी सुरिंदर कौर का 2011 में कैंसर से निधन हो गया। प्रकाश सिंह बादल को 2015 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, पद्म विभूषण से सम्मानित किया। उनकी बेटी परनीत कौर के पति आदेश प्रताप सिंह कैरों पंजाब में मंत्री रहे।

यह आरोप हमेशा रहे कि अकाली दल का गठन सिख समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए किया गया था; लेकिन प्रकाश सिंह बादल ने इसे परिवार और पंजाब की पार्टी बना दिया। बादल के मुख्यमंत्री रहते ही श्रीगुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटना से उनके राजनीतिक क़द को गहरी चोट पहुँची। उन पर परिवारवाद और ‘लि$फा$फा संस्कृति’ के भी आरोप लगे। बादल 2022 में ज़िन्दगी का आख़िरी चुनाव हार गये।

बादल की मौत से अकाली दल के भीतर बादल के पुत्र और पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह के सामने चुनौतियाँ आ सकती हैं। कई वरिष्ठ अकाली नेता हैं, जो सुखबीर की नीतियों से अलग राय रखते हैं। पिता की अनुपस्थिति में आने वाली संभावित परिस्थितियाँ सुखबीर सिंह को फिर से भाजपा के ख़ेमे में जाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। सन् 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजे इस बात के गवाह हैं कि अकाली दल को पंजाब की राजनीति में फिर खड़ा करने के लिए सुखबीर को बहुत मेहनत की दरकार रहेगी।

सैनिकों में उग्रता क्यों?

सेना के जवान ने अपने चार साथी जवानों को ही सुला दिया मौत की नींद!

देश की सबसे बारी सेना छावनी बठिंडा में अप्रैल के पहले पखवाड़े में चार सैनिकों की हत्या से न केवल पंजाब, बल्कि देश भर में हडक़ंप-सा मच गया। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को तुरन्त जानकारी की गयी। केंद्र सरकार में पूरी खलबली मच गयी कि कहीं सेना पर आतंकवादी हमला तो नहीं हो गया। रात के समय हत्याकांड होना और हमलावर के बारे में कोई सुराग़ का न लग पाना कई कारण रहे, जिससे यही लगा कि यह आंतकवादी वारदात है। सम्भव है हमलावर छावनी के अंदर और ज़्यादा नुक़सान कर सकते हैं।

घटना के कुछ ही समय में पुलिस ने छावनी के आसपास के हिस्से को सील कर दिया था, ज़िले की सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गयी। चूँकि सेना के मेजर आशुतोष शुक्ल ने घटना की छावनी थाने में प्राथमिकी दर्ज करा दी थी; लेकिन अंदर की जाँच सेना के लोग ही कर रहे थे। पुलिस बाहर के घटनाक्रम को ही देख रही थी। छावनी 45 किलोमीटर के दायरे में है और बीच में बठिंडा-चंडीगढ़ राष्ट्रीय राज मार्ग है। बठिंडा छावनी इसके दोनों हिस्से में है। यह भाग काफ़ी संवदेनशील है। यह देश की सबसे बारी छावनी भी मानी जाती है।

पंजाब के अभी के माहौल को देखते हुए छावनी के हिस्से में और भी ध्यान रखा जा रहा था; लेकिन घटना ने कई सवाल उठा दिये थे। घटना के कुछ ही घंटों में यह काफ़ी कुछ साफ़ हो गया कि यह आतंकवादी घटना नहीं थी, तब कहीं जाकर बठिंडा विशेषकर पंजाब के लोगों ने राहत की साँस ली। लेकिन भारी चाक-चौबंद वाली छावनी के अंदर इतनी बड़ी घटना कैसे हो गयी? कहीं यह सुरक्षा की भारी चूक तो नहीं। अगर यह है, तो किसी भी वारदात को कभी भी अंजाम दिया जा सकता है।

पंजाब चूँकि सीमावर्ती राज्य है, इसलिए यह गम्भीर मामला बनता है। गुरदासपुर में सेना छावनी पर हमला हो चुका है। लिहाज़ा सेना जाँच में हर बिन्दु देख रही थी। घटना को अंजाम देने के बाद हत्यारे बचकर कैसे निकल गये, जबकि 45 किलोमीटर के दायरे में फैली छावनी के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के पुख़्ता प्रबंध हैं। छावनी का एक बड़ा हिस्सा जंगल है। सेना की टीम ने पूरा जंगल देख लिया; लेकिन कोई सुराग़ नहीं मिला। 12 अप्रैल की इस घटना से तीन दिन पहले वारदात सथल के पास से एक एक इंसास राइफल और 28 कारतूस चोरी हुए थे। सेना की टीम उसकी जाँच कर ही रही थे; लेकिन कुछ पता नहीं चल रहा था। वारदात में इंसास राइफल और उसके कारतूस का इस्तेमाल हुआ था। सेना की टीम को पहली बार लगा यह आतंकवादी वारदात नहीं, बल्कि कोई अंदर का ही आदमी हो सकता है; लेकिन उसका पता नहीं चल पा रहा था।

उधर बठिंडा ज़िला पुलिस के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गुलनीत सिंह खुराना ने कहा की शुरुआती पुलिस की जाँच में साफ़ हो गया है कि सेना से जुड़े हत्याकांड को किसी ने अंजाम दिया है। चूँकि घटना के लिए एक ही चश्मदीद गनर देसाई मोहन था, सारी जाँच उसके बयान पर ही चल रही थी। उसने कहा था कि दो लोगों में एक के पास राइफल और दूसरे के पास कुल्हाड़ी थी। चारों जवानों की मौत गोली लगने से हुई उनके शरीर पर चोट आदि के निशान नहीं मिले। इससे यह साफ़ हुआ कि कहीं गनर मोहन देसाई झूठ तो नहीं बोल रहा है। आख़िर देसाई ज़्यादा समय तक सेना की जाँच टीम को भ्रम में नहीं रख सका। उसने जो बताया, उस पर आसानी से भरोसा करना मुश्किल हो रहा था। उसका आरोप था कि वह काफ़ी समय से अपने साथ हो रही गंदी हरकतों से तंग आ गया था। वह इस घटना के बारे में किसी को क्या बताता?

आख़िर उसे यह क़दम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। यह तो पूरी जाँच के बाद साफ़ होगा कि देसाई कितना सच बोल रहा है। अगर उसकी बात सच है, तो मामला बेहद गम्भीर है। देसाई की निशानदेही पर इंसास राइफल और कुछ कारतूस सेना जाँच टीम ने बरामद कर लिये हैं, उसने गुनाह भी कुबूल कर लिया है। हत्याकांड की गुत्थी काफ़ी हद तक सुलझ गयी है; लेकिन सेना अर्ध सैनिक बलों में फिर एसा न हो इसके लिए गम्भीरता से विचार करना होगा। आरोपी देसाई के बयान पर अभी तो भरोसा किया जा सकता है; लेकिन कारण कुछ और भी हो सकते हैं। मरने वाले सैनिकों की उम्र 24 से 25 साल थी। सभी क़रीब तीन साल पहले सेना में भर्ती हुए थे। जिन सैनिकों का देश के लिए बहुत कुछ करना था, उन्हें बेमौत मरना पड़ा।

जब जब देश में सेना अर्धसनिक बलों पर हमले हुए उन्हें आतंकवादी घटनाएँ ही माना गया। बठिंडा की वारदात को भी शुरू में यही माना और समझा गया; लेकिन पुलिस जाँच में बिलकुल साफ़ हो गया था कि यह आतंकवादी घटना नहीं, बल्कि छावनी के अंदर से ही किसी ने वारदात अंजाम दी है। उधर सिख फॉर जस्टिस की ओर से घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए कहा गया कि यह उसका काम है। जब तक पंजाब को सिखों का राज्य नहीं बना दिया जाता, ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी। यह संगठन देश विरोधी काम करता रहा है, इसलिए सेना और पुलिस की जाँच में इसे रखा गया। देश विरोधी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने झूठी वाहवाही के लिए ज़िम्मेदारी ले ली, जबकि उसका इससे कोई सरोकार ही नहीं था।

सेना की जाँच से पहले पुलिस ने साफ़ कर दिया कि घटना में छावनी से बाहर का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता। जिस किसी ने वारदात को अंजाम दिया है, वह अभी अंदर ही है। 12 अप्रैल की इस वारदात से कुछ समय पहले और बाद में न कोई छावनी के अंदर आया और न ही मुख्य दरवाज़े से बाहर गया है। सीसीटीवी फुटेज से यह सब साफ़ हो गया था। वारदात का एक मात्र चश्मदीद देसाई मोहन ही था, जो मरने वालों का साथी था। उसने बताया था कि उसने दो लोगों को देखा, जिन्होंने मुँह को ढक रखा था, और वे सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने हुए थे। यहीं से जाँच की गुत्थी, जो उलझी वो सेना और पुलिस के लिए पहेली बनी रही। हत्याकांड की जाँच सेना कर रही है। बठिंडा में 80 मीडियम रेजिमेंट के सागर, कमलेश, योगेश कुमार और संतोष कुमार की मौत के लिए तो देसाई मोहन ज़िम्मेदार है; लेकिन उच्च अधिकारी इससे अनजान रहे।

जाँच में पता लगाया जाना चाहिए कि क्या देसाई ने ऊपर के अधिकारी या किसी को इस बारे में कुछ बताया था। कुछ तो बात रही होगी, वरना चार लोगों को वह इस क़दर कभी नहीं मारता। वह उनके साथ ही ड्यूटी करता था। सेना और अर्ध सैनिक बलों में अपने ही साथियों पर गोलीबारी की बहुत-सी घटनाएँ हो चुकी हैं। हथियारबंद ये लोग मरने या मारने का जज़्बा लिये होते हैं। कोई बात होने पर सीधे गोलीबारी करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं होती।

कुछ साल पहले जम्मू-कश्मीर में एक घटना में जवान ने अपने पाँच साथियों को रात में सोते हुए गोलियों से मार दिया था। बाद में जवान ने ख़ुद को भी गोली मार ली थी। राष्ट्रीय राइफल पैरा मिलिट्री फोर्स की यह घटना बठिंडा छावनी की वारदात से काफ़ी मिलती-जुलती है। यहाँ भी रात को सोते हुए जवानों को मार दिया गया था। अन्तर यह कि यहाँ हत्याकांड को अंजाम देने वाला ख़ुद को बचाने में लगा रहा। बठिंडा की इस घटना से रक्षा मंत्रालय को गम्भीरता से लेना होगा, वर्ना इस तरह की घटनाएँ होती रहेंगी। यह हो सकता है कि उसके कारण अलग-अलग हों।

मामले और भी हैं

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में जानकारी दी कि वर्ष 2018 से 2022 तक अर्ध सैनिक बलों के 29 जवानों को उनके ही साथ ड्यूटी करने वालों ने मार डाला। उन्होंने जानकारी दी कि वर्ष 2014 से 2021 तक थल सेना में 18 घटनाएँ हुई, जबकि वायु सेना मई में दो वारदात हुईं। रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने जानकारी दी कि इस तरह की घटनाएँ किसी भी सरकार के लिए गम्भीर मामले होते हैं। उनकी सरकार इनमें कमी लाने के लिए कई ठोस प्रयास कर रही है। काफ़ी घटनाओं के पीछे निजी, घरेलू, पारिवारिक, काम का दवाब, डिप्रेशन प्रमुख कारणों में से है। सरकार ने मनोरोग सहायकों के साथ-साथ सैनिकों के कपड़ों और खाने में सुधार, तनाव कम करने, छुट्टी में कुछ ढील देने, अपने उच्च अधिकारियों तक आसानी से पहुँच के साथ ही शिकायत निवारण केंद्र बनाने को लेकर काफ़ी काम किया है।

क्रिकेट में परिवारवाद

अर्जुन तेंदुलकर को जब उनकी फ्रैंचाइजी मुम्बई इंडियंस ने आईपीएल में पहली बार केकेआर के ख़िलाफ़ अपनी इलेवन में शामिल किया, तो हर किसी की निगाह स्टैंड्स में बैठे उनके पिता और क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर पर थी। पिता के अपने बेटे के लिए इमोशंस दर्शकों से अलग रहे होंगे; लेकिन दर्शकों के लिए यह उत्सुकता के क्षण थे और वह निश्चित ही अर्जुन में उनके पिता सचिन की छवि देख रहे होंगे। समाज में परिवार फ़िल्मों से लेकर राजनीति और खेल तक में दख़ल रखते हैं।

यह दख़ल डॉक्टरी, सेना, क़ानून, व्यापार और इंजीनियरिंग के पेशे में भी दिखता है, जहाँ परिवार-दर-परिवार एक ही पेशे में लोग होते हैं। हर माता-पिता अपने बच्चों को उसी लाइन में भेजने की कल्पना करते हैं, जिसमें वह ख़ुद होते हैं, क्योंकि उन्हें यह ज़्यादा सुविधाजनक लगता है।

यह सहज मानव स्वभाव है कि माता-पिता अपने बच्चों को ख़ुद से बेहतर करते देखना चाहते हैं। इसमें वह गर्व महसूस करते हैं। क्रिकेट इससे जुदा नहीं। और ऐसा सिर्फ़ भारत में ही नहीं होता। दुनिया के कई देशों में होता है। क्रिकेट से लेकर राजनीति में एक ही परिवार के लोग दिखते हैं। अमेरिका में 10 ऐसे राष्ट्रपति हुए जो दादा-पोता, पिता-पुत्र या चचेरे भाई के रिश्ते में थे। इनमें से 32वें राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डेलानो रूजवेल्ट तो ऐसे राष्ट्रपति थे जो 11 राष्ट्रपतियों के नज़दीक या दूर के रिश्तेदार थे।

क्रिकेट और भारत की बात करें, तो अर्जुन तेंदुलकर की हर जगह चर्चा है। पिता सचिन 15 साल की उम्र में राष्ट्रीय टीम में आ गये थे, जबकि 23 साल के अर्जुन को मुम्बई इंडियंस की इलेवन में आने के लिए ही दो साल का इंतज़ार करना पड़ा। भारत ही नहीं, विदेशी खिलाडिय़ों ने भी अर्जुन को लेकर सोशल मीडिया पर कमेंट लिखे। दिग्गज पिता का पुत्र होने का यह लाभ मिलता है; लेकिन ख़ुद की जगह बनाने के लिए अर्जुन को मैदान में प्रतिभा दिखानी होगी। वैसे एक रिकॉर्ड इन दोनों ने यह ज़रूर बनाया है कि आईपीएल में खेलने वाली पिता-पुत्र की यह पहली जोड़ी है।

भारत की टी-20 टीम के कप्तान हार्दिक पंड्या और भाई कुणाल पंड्या दोनों सक्रिय क्रिकेटर हैं। इरफ़ान पठान और यूसुफ़ पठान दर्शकों के वर्षों तक चहेते रहे। यह सभी भाई एक ही समय में भारत के लिए खेले हैं। मोहिंदर अमरनाथ और सुरेंद्र अमरनाथ तीन मैचों में भारत के लिए साथ खेले, जबकि इनके पिता लाला अमरनाथ भारत के कप्तान भी रहे। इनमें मोहिंदर अमरनाथ सबसे सफल कहे जाएँगे, जिन्होंने अपने ऑलराउंड खेल से दशक से भी ज़्यादा समय तक क्रिकेट प्रेमियों के बीच लोकप्रियता हासिल की। लाला अमरनाथ टेस्ट क्रिकेट में भारत के लिए पहला शतक लगाने वाले खिलाड़ी थे। वहीं मोहिंदर अमरनाथ सन् 1983 की विश्व विजेता भारतीय टीम के सदस्य थे।

विजय मांजरेकर और संजय मांजरेकर को कौन भूल सकता है। पिता-पुत्र विजय और संजय ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन किया। संजय को अब कमेंट्री करते हुए देखा जा सकता है। इफ़्तिख़ार और मंसूर अली ख़ान पटौदी (शर्मिला टैगोर के पति) भी भारत के लिए खेले। इफ़्तिख़ार तो भारत और इंग्लैंड दोनों के लिए टेस्ट खेलने वाले इकलौते क्रिकेटर हैं। मंसूर अली ख़ान ‘टाइगर’ के नाम से मशहूर थे और कार हादसे में दाहिनी आँख गँवाने के बावजूद वह क्रिकेट खेले और 21 साल की उम्र में भारत के कप्तान बन गये थे।

सुनील गावस्कर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ों में रहे। उन्होंने जेफ़ थामसन और डेनिस लिल्ली जैसे तेज़ गोलंदाज़ों के सामने भी हेलमेट नहीं पहना। अनेक रिकॉर्ड बनाने वाले सुनील गावस्कर के बेटे रोहन गावस्कर ने भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालाँकि उन्हें ज़्यादा सफलता नहीं मिली। वर्तमान में बीसीसीआई के अध्यक्ष रोजर बिन्नी अपने समय में शानदार ऑलराउंडर रहे और सन् 1983 में विश्व विजेता भारतीय टीम के अहम सदस्य थे। उनके बेटे स्टुअर्ट बिन्नी ने भी भारत के लिए छ: टेस्ट, 14 वनडे और 3 टी20 मैच खेले।

दूसरे देशों की बात करें, तो ऑस्ट्रेलिया के इयान और ग्रेग चैपल बंधुओं का नाम सबसे पहले याद आता है। इनके एक भाई ट्रेवर चैपल भी थे, जिन्होंने मैच में हार से बचने के लिए मेलबोर्न में फरवरी, 1981 के दिन अपने कप्तान और बड़े भाई ग्रेग चैपल के निर्देश पर न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ वल्र्ड सीरीज ओडीआई फाइनल में दुनिया के इतिहास की पहली और आख़िरी अंडरआर्म बाल फेंकी थी, ताकि न्यूजीलैंड जीत न सके, जिसे जीतने के लिए इस आख़िरी बाल पर छ: रन की ज़रूरत थी।

इस पर काफ़ी विवाद भी हुआ। हालाँकि इयान और ग्रेग काफ़ी सफल खिलाड़ी रहे और दोनों ने ऑस्ट्रेलिया की कप्तानी की। ग्रेग चैपल भारतीय टीम के कोच भी रहे और उस समय के कप्तान सौरव गांगुली के साथ उनका विवाद कड़बड़ाहट के साथ याद किया जाता है।

मार्क और स्टीव वॉ का नाम काफ़ी इज़्ज़त के साथ लिया जाता है। ऑस्ट्रेलिया के यह जुड़वाँ भाई क़रीब 14 साल तक साथ खेले। ऑलराउंडर मार्क वॉ सलामी बल्लेबाज़ थे, जबकि स्टीव वॉ कंगारू टीम के कप्तान भी रहे। वह भी ऑलराउंडर थे। इन्हें लेकर एक दिलचस्प क़िस्सा था कि क़द-काठी और चाल-ढाल में दोनों में इतनी समानता थी कि सिर्फ़ उनकी माता ही उन्हें आसानी से पहचान पाती थीं। ब्रेंडन और नाथन मैकुलम भी दोनों भाई थे और न्यूजीलैंड के लिए खेले। दोनों भाइयों ने अपने देश के लिए ख़ूब क्रिकेट खेली। ब्रैंडन मैकुलम तो कप्तान भी रहे।

आईपीएल इतिहास का पहला शतक इनके ही नाम है, जो उन्होंने सौरव गांगुली की कप्तानी में खेलते हुए केकेआर के लिए सन् 2008 में बनाया था। दिलचस्प यह है कि वो 2जी का ज़माना था और इंटरनेट बहुत धीमा था; लेकिन मैकलम ने आरसीबी के ख़िलाफ़ महज़ 73 गेंदों में तूफ़ानी 158 रन ठोक दिये थे, जिनमें 13 छक्के थे। यह वही साल था, जब विराट कोहली की कप्तानी में भारत ने अंडर-19 विश्व क्रिकेट कप जीता था और आरसीबी ने राहुल द्रविड़ की कप्तानी वाली टीम में कोहली को भी शामिल किया था।

इन खिलाडिय़ों के अलावा प्रमुख जोडिय़ों में हम दक्षिण अफ्रीकी भाइयों मोर्ने और एल्बी मोर्कल को याद कर सकते हैं। दिलचस्प यह है कि इनके पिता अल्बर्ट मोर्कल भी क्रिकेटर रहे। ऑस्ट्रेलिया के शॉन और मिशेल मार्श बंधुओं को एक साथ अंतरराष्ट्रीय मैचों में देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। जिम्बाब्वे के भाई एंडी और ग्रांट फ्लावर भी एक साथ अपने देश के खेले और नाम कमाया। ऐसे ही आयरलैंड के लिए दो सगे भाइयों नील जॉन और केविन ओ ब्रायन ने क्रिकेट खेली। अपने देश के लिए दोनों ने यादगार पारियाँ खेलीं। पाकिस्तान के बंधुओं कामरान और उमर अकमल ने भी भाइयों के रूप में काफ़ी नाम कमाया। दोनों ने देश के लिए टेस्ट, वनडे और टी-20 के अंतरराष्ट्रीय मैच खेले।

अर्जुन तेंदुलकर परिवार की इस कड़ी में नवीनतम खिलाड़ी हैं। देखें तो दुनिया में भाइयों की जोडिय़ों ने ज़्यादा कमाल किया है। पिता-पुत्र के उदाहरण कम ही हैं। भारत में तो पिता-पुत्र लाला-मोहिंदर अमरनाथ के अलावा अन्य ज़्यादा कमाल नहीं दिखा पाये, जबकि भाइयों ने कमाल दिखाया है। साफ़ है कि पिता की प्रतिभा अपनी जगह और बेटे तो वैसा ही नाम कमाने के लिए मैदान में कमाल दिखा होगा। अर्जुन के लिए भी यह ज़रूरी है। उनके पिता मैदान के बाहर उन्हें गाइड कर सकते हैं; लेकिन मैदान के भीतर बेटे को अपनी जगह ख़ुद बनानी होगी। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के तीनों फार्मेट में 100 शतक बनाने वाले इकलौते खिलाड़ी हैं और उनके बेटे को अभी अंतरराष्ट्रीय पदार्पण के लिए ख़ूब पसीना बहाना है।

अर्जुन तेंदुलकर ने केकेआर के ख़िलाफ़ मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में जब आईपीएल डेब्यू किया, तो उसके बाद स्टार स्पोट्र्स के कमेंटेटर इयान बिशप ने एक ख़ुलासा किया। उन्होंने कहा कि फ्लोर मैनेजर ने सचिन से बात की थी, जिन्हें सचिन ने कहा कि उन्हें इसकी बहुत ख़ुशी है कि अर्जुन अब आईपीएल में खेल रहा है। उनके मुताबिक, सचिन की आँखों में आँसू थे। सचिन ने यह भी कहा कि अपने पहले आईपीएल मैच के पहले ओवर में उन्होंने 5 रन दिये थे और अर्जुन के पहले ओवर में भी 5 ही रन बने। यदि पाँच रन का यह संयोग अर्जुन को भी अपने पिता की तरह महान् खिलाड़ी बनाने की राह खोलता है, तो सबको ख़ुशी ही होगी।

जीने के रास्ते

संसार में दो तरह के लोग हैं। एक वे, जो जीओ और जीने दो की राह पर चलते हैं; और दूसरे वे, जो ख़ुद तो ऐश-ओ-आराम से जीना चाहते हैं; लेकिन दूसरों को नहीं जीने देना चाहते। ये वे लोग हैं, जो अपने दु:ख से नहीं, बल्कि दूसरों के सुख से दु:खी होते हैं। ऐसे लोग दूसरों को तभी महत्त्व देते हैं, जब दूसरा उनसे हर तरह से प्रबल हो। ये वे लोग हैं, जो ईश्वर प्रदत्त चीज़ें का भी स्वामी ख़ुद को समझते हैं और अपने से कमज़ोर लोगों से इन्हें भी छीन लेना चाहते हैं। इस तरह के आततायी लोग ख़ुद से कमज़ोर लोगों को अपना ग़ुलाम समझते हैं और उनके साथ दुव्र्यवहार करते हैं। लेकिन इन लोगों का अमानवीय व्यवहार इन्हें इतना निकृष्ट और तुच्छ बना देता है, जिससे ये ख़ुद समाज की नज़रों में घृणा का पात्र बन जाते हैं।

अभी एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें एक युवक कुर्सी पर बैठा है और दूसरे किशोर से अपने पैर चटवा रहा है। उसे गालियाँ दे रहा है। उसके पैर पकड़वा रहा है। उसे पैरों में सिर रखने को कह रहा है। इस आपराधिक प्रवृत्ति के युवक का जब इतने से भी जी नहीं भर रहा है, तो उसे पीट रहा है। यहाँ पीडि़त और अत्याचारी, दोनों एक ही धर्म के हैं। फ़र्क़ है, तो इंसानों के मन में पल रहे सबसे बड़े कोढ़ जाति का। फ़िज़ूल की दिमाग़ी ख़ुराफ़ात- ऊँच-नीच का। इसके चलते एक ख़ुद को स्वयंभू उच्च मानता है, और इसी वजह से वह अत्याचारी हो चुका है। वहीं दूसरा ख़ुद को उससे कमज़ोर और नीचा मानता है, और इसी के चलते अत्याचार सह रहा है। उसे डर भी है; इसलिए, क्योंकि उसे सामाजिक और न्यायिक संरक्षण नहीं मिल रहा है। इसके अतिरिक्त वह अत्याचारी प्रवृत्ति का भी नहीं है। आर्थिक रूप से भी कमज़ोर है।

क्या विडम्बना है? दोनों ही मनुष्य हैं। लेकिन यह इस देश में न्यायिक व्यवस्था के रखवालों का खोंट है, जिनकी शह के चलते तथाकथित स्वयंभू लोगों ने ख़ुद को उच्च मान रखा है। इन्हीं न्यायिक संरक्षणवादियों के चलते ऐसे तथाकथित स्वयंभू उच्च लोग अपने से कमज़ोर लोगों पर अत्याचार करते हैं। वास्तव में ये लोग अपनी तथाकथित उच्च सत्ता को बनाये रखना चाहते हैं। न्यायिक पदाधिकारियों और सुशासन के लिए लगी पुलिस को ऐसे कमज़ोर लोगों को संरक्षण देने के साथ-साथ अत्याचारी लोगों को सज़ा देनी चाहिए। क्योंकि ऐसे लोग हर धर्म में हैं और इन्होंने समाज में अपराध के बीज बो रहे हैं, जिसके चलते अच्छे लोगों को हमेशा एक भय बना रहता है।

दूसरी ओर वे लोग हैं, जो जीओ और जीने दो को ही अपना कर्तव्य या ईश्वर का आदेश मानते हैं। ऐसे लोगों के चलते इंसान और इंसानियत दोनों ही ज़िन्दा हैं। ऐसा ही इंसानियत का एक उदाहरण लगभग दो-ढाई माह पहले सीहोर के कुबेश्वर धाम के निकट गोकुलपुरा निवासी शेरू ख़ाँ ने दिया। शेरू ने अपना सारा काम छोडक़र कुबेश्वर धाम मंदिर पर रुद्राक्ष के लिए कई किलोमीटर तक लगी लम्बी लाइन में लगे प्यास से तड़प रहे लोगों को सेवा भाव से श्रम और पैसा ख़र्च करके पानी पिलाया।

कुबेश्वर धाम पर रुद्राक्ष लेने इतने लोग पहुँच गये कि उनकी भूख और प्यास देखकर कुबेश्वर धाम पर बैठे व्यापारियों ने खाने-पीने की चीज़ें के दाम कई-कई गुना बढ़ा दिये। इंसानियत के दुश्मन, धर्म के नाम पर पाखण्ड करने वाले इन अधर्मी और व्यापारिक प्रवृत्ति के लोगों ने पानी की 10 रुपये की बोतल के भी 50 रुपये से लेकर 100 रुपये वसूलने शुरू कर दिये। लेकिन वहीं प्यास से धर्मार्थियों को तड़पता देख गोकुलपुरा निवासी शेरू ख़ाँ ने अपने कुछ दोस्तों की मदद से एक लम्बा पाइप इकट्ठा किया और अपने एक दोस्त के खेत में लगी पानी की मोटर को चालू करके रुद्राक्ष लेने दूर-दराज़ से आये श्रद्धालुओं को पानी पिलाया। यह कैंसर की तरह बन चुके धर्म-कलह और कोढ़ की तरह पनप चुके जातिवाद के मुँह पर एक ऐसा तमाचा है, जो पाखण्डियों और इंसानियत के दुश्मनों के मुँह पर पड़ा है।

लोगों को समझना होगा कि अगर सब एक-दूसरे से सिर्फ़ लूट मचाने वाला व्यापार ही करने लगेंगे। लोगों से दुश्मनी ही करने लगेंगे। अपने से हर कमज़ोर को जाति और धर्म के नाम पर प्रताडि़त करेंगे। इंसानियत, प्यार, भाईचारा और व्यवहार जैसे मूल मानवीय उद्देश्यों को नकारकर जीवित रहने की कोशिश करेंगे, तो सुरक्षित कौन बचेगा? अच्छे लोग कैसे जीवित रहेंगे? सब एक-दूसरे को प्रताडि़त ही नहीं करने लगेंगे? सब एक-दूसरे को मारकर नष्ट नहीं करने लगेंगे? धीरे-धीरे पीडि़त भी एक दिन हथियार नहीं उठा लेंगे?

एक कहावत है कि अच्छा आदमी जब अच्छाई छोड़ता है, तो वह बुरे से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो जाता है। इसलिए अत्याचारी प्रवृत्ति के आततायियों को भी अब इंसानियत से रहना चाहिए, अन्यथा एक दिन उन पर भी अत्याचार होंगे, यह तय है। यह मानवीय ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक स्वभाव भी है कि इनमें हर कोई एक-न-एक दिन पलटकर जवाब ज़रूर देते हैं।

अखिलेश यादव सच्चाई जानते हैं इसलिए पहलवानों के साथ नहीं… – बृजभूषण शरण सिंह

कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के साथ यौन शोषण के आरोप लगे है। इसी बीच बृजभूषण शरण सिंह ने समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव की तारीफ कर कहा कि, “अखिलेश यादव सच्चाई के साथ खड़े हैं।“

स्टार पहलवान लगातार जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन कर बृजभूषण शरण सिंह को कुश्ती महासंघ व संसद की सदस्यता से बेदखल की मांग कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत कर्इ विपक्षी दलों ने पहलवानों का समर्थन किया है।  

उत्तर प्रदेश के कैसरगंज से भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने एक न्यूज एजेंसी से बात करते हुए कहा कि, “मैं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को धन्यवाद देना चाहता हूं। मैं उन्हें बचपन से जानता हूं। मैं उनसे बड़ा हूं। हालांकि हमारे बीच राजनीतिक मतभेद हैं, लेकिन अखिलेश सच्चाई जानते हैं। अगर यूपी में 10 हजार पहलवान हैं, इनमें से 8 हजार यादव समुदाय के हैं और समाजवादी परिवार के हैं इसलिए वे सच्चाई जानते हैं।”

बृजभूषण शरण सिंह ने डब्ल्यूएफआई चीफ के पद से इस्तीफे देने की बात पर कहा कि, “अगर मेरे इस्तीफे से प्रदर्शन कर रहे पहलवानों को शांति मिलेगी और वे घर वापस जाने के लिए तैयार हैं, तो मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं। प्रदर्शन कर रहे पहलवान कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के हाथ का खिलौना बन गए हैं। उनका मकसद मेरा इस्तीफा नहीं बल्कि राजनीतिक हैं।“

कर्नाटक के लिए भाजपा ने घोषणा पत्र में कई लोकलुभावन वादे किए

भाजपा ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए सोमवार को अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया। कांग्रेस से कड़ा मुकाबला झेल रही भाजपा ने जनता से कई लोकलुभावन वादे किये हैं। इनमें बीपीएल परिवार को हर साल तीन गैस सिलिंडर फ्री देने की घोषणा भी है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बड़े  उपस्थिति में घोषणापत्र जारी किया।

पार्टी ने उगाड़ी, गणेश चतुर्थी और दीपावली पर हर नगर निगम के प्रत्येक वार्ड में किफायती, गुणवत्ता वाला और स्वस्थ भोजन देने के लिए अटल आचार केंद्र पोषाण योजना के तहत हर बीपीएल परिवार को हर दिन आधा किलो नंदिनी दूध और हर महीने पांच किलो श्री अन्न, श्री धन्य राशन किट देने का वादा किया है।

इसके अलावा भाजपा ने कहा है कि राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाई जाएगी। राज्य के दस लाख बेघर लोगों को रहने के लिए मकान दिए जाएंगे।  

पार्टी ने महिला, एससी एसटी घरों के लिए पांच साल का दस हज़ार रु फिक्सड डिपॉजिट कराने, सरकारी स्कूलों को विश्व स्तरीय मानदंडों के अनुसार अपग्रेड करने, सीनियर सिटीजन के लिए हर साल मुफ्त हेल्थ चेकअप की देने की बात भई कही है।

भाजपा ने कहा कि सत्ता कल्याण सर्किट, बनवासी सर्किट, परशुराम सर्किट, कावेरी सर्किट, गंगापुरा सर्किट के विकास के लिए 1500 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।

ठाणे के भिवंडी में इमारत के मलवे से 8 शव मिले, 18 लोग बचाए गए

ठाणे के भिवंडी में इमारत ढहने की घटना में अब तक 8 लोगों की मौत हुई है।  अब तक 18 लोगों को मलबे से निकाला गया है। एनडीआरएफ के मुताबिक मलबे में फंसे या दबे सभी को निकाल लिए जाने की संभावना है।

राहत और बचाव कार्य पूरा मलबा हटाने तक जारी रखने का फैसला किया गया है।  
मनकोली के वलपाड़ा स्थित वर्धमान कंपाउंड में दो मंजिला इमारत शनिवार को ढह गई। इमारत के भूतल और पहली मंजिल पर गोदाम थे, जबकि ऊपरी मंजिल पर चार परिवार रहते थे।

आरडीएमसी के मुताबिक कई लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका है। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) की टीम और दमकलकर्मियों समेत विभिन्न एजेंसी के कर्मी बचाव अभियान में जुटे हैं।

उधर सीएम एकनाथ शिंदे ने शनिवार को दुर्घटना स्थल का दौरा किया था और आईजीएम अस्पताल में इलाज करवा रहे घायलों से मुलाकात की थी। पुलिस के मुताबिक इमारत के मालिक इंद्रपाल पाटिल के खिलाफ भादंसं की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

कोविड -19 के मामले में अब कमी, एक दिन में आये 4,282 नए मामले

देश में कोविड-19 के नए मामलों का आंकड़ा काफी ऊपर जाने के बाद अब उतार पर दिख रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक पिछले 24 घंटे में कोरोना के 4,282 नए मामले आये हैं।

एक हफ्ता पहले यह मामले 12 हज़ार के आंकड़े तक पहुंच गए थे। एक दिन पहले  कोरोना के 5,874 नए मामले दर्ज किए गये थे, हालांकि अब यह कम हुए हैं। राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत अब तक कुल 220.66 करोड़ टीके की खुराक (95.21 करोड़ दूसरी खुराक और 22.87 करोड़ एहतियाती खुराक) दी जा चुकी है।

भारत का सक्रिय केसलोड वर्तमान में 47,246 है, वहीं सक्रिय मामले 0.11 फीसदी हैं।  जबकि कोरोना से ठीक होने की दर वर्तमान में 98.71 फीसदी है। पिछले 24 घंटे में 6,037 लोग ठीक हुए हैं। इसके बाद कुल ठीक होने वालों की संख्या बढ़कर 4,43,70,878 तक पहुंच गई।

देश में दैनिक सकारात्मकता दर 4.92 फीसदी है जबकि साप्ताहिक सकारात्मकता दर 4 फीसदी है। अब तक कुल 92.67 करोड़ परीक्षण किए गए हैं। पिछले 24 घंटों के दौरान कोरोना के 87,038 टेस्ट किए गए।

अमेरिका के टेक्सास में गोलीबारी की घटना में पांच लोगों की मौत

अमेरिका में गोलीबारी की घटनाएं रुक नहीं रहीं। अब टेक्सास के क्लीवलैंड में हुई गोलीबारी की एक घटना में 5 लोगों की मौत हो गयी। रविवार को हुई इस घटना में आठ साल के एक बच्चे की जान गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक एक व्यक्ति ने अपने पांच पड़ोसियों की गोली मारकर हत्या कर दी। टेक्सास के क्लीवलैंड में सेमी ऑटोमेटिक राइफल से फायरिंग करने के दौरान शुक्रवार को व्यक्ति को पुलिस ने गोलीबारी रोकने के लिए कहा था। लेकिन उसपर बाद में पड़ोसियों पर गोलियां चलाने का आरोप है।

इस घटना में जान गंवाने वालों में 8 साल का एक बालक भी शामिल है। पुलिस ने रविवार को मीडिया को बताया – ‘हमारे पास कोई सुराग नहीं है।’ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कानून कर्मी घर-घर जाकर संदिग्ध की तलाश कर रहे हैं और खोजने में मदद की अपील जनता से कर रहे हैं।

आरोपी को खोजने वाले को 80,000 डॉलर का इनाम घोषित किया गया है। पीड़ितों की पहचान कर ली गयी है और उन सबकी उम्र 31 साल से कम है। पुलिस ने कहा कि सभी एक ही परिवार के सदस्‍य नहीं हैं।