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अयोग्य जनप्रतिनिधि और संघर्षरत जनतंत्र

शिवेंद्र राणा

जनवरी, 1963 में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में इंदिरा गाँधी लिखती हैं- ‘लोकतंत्र किसी औसत आदमी को सिर्फ़ ऊँचाई पर ही नहीं पहुँचाता, बल्कि सबसे ज़्यादा चीखने-चिल्लाने वाले आदमी को भी ताक़तवर बना देता है, भले ही मुद्दों के बारे में उसकी समझ शून्य हो।’

लेकिन क्या होता है, जब वही औसत व्यक्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जनप्रतिनिधि एवं नीति निर्माता बन जाए। उस पर लोकतांत्रिक मूल्यों के संवाहन एवं उसके रक्षा का दायित्व आ पड़े, तो परिणाम यह होगा कि वह राष्ट्रीय हितों के लिए एक दु:स्वप्न साबित होगा। ऐसी कल्पना भी एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए वीभत्स ही सकती है। परन्तु पिछले दिनों ऐसा विद्रूप दृश्य बिहार विधानसभा में प्रदर्शित हुआ।

महागठबंधन सरकार में परिवहन मंत्री शीला मंडल सदन में पूछे गये एक प्रश्न का उत्तर देने के लिए जब खड़ी हुईं, तब विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी ने कहा- ‘ये उत्तर नहीं दे पाएँगी।’ असल में पहली बार विधायक और मंत्री बनी शीला मंडल की स्थिति यह है कि सदस्यों की बात तो छोड़ ही दीजिए, उनके विभाग से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर देने की स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष अवध चौधरी तक चिन्तित हो जाते हैं। यह स्थिति अकेले शीला मंडल की नहीं है। लालू के लाल और मीडिया में बहुत-ही मुखर दिखने वाले उनके बड़े पुत्र तेज़ प्रताप यादव महागठबंधन की सरकार में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का प्रभारी हैं। लेकिन अपने विभाग से सम्बन्धित प्रश्नों के सम्बन्ध में सदन में वह सरकार के लिए अकसर असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। आलम यह है कि विधानमंडल के दोनों सदनों में उनके मंत्रालय से सम्बन्धित अधिकांश प्रश्नों का उत्तर राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री आलोक मेहता को देना पड़ता है।

इसी प्रकार भाकपा माले के विधायक महानंद सिंह द्वारा बालू अवैध बालू खनन के विषय में सदन में पूछे गये प्रश्न के जवाब में मंत्री रामानंद यादव जब उत्तर देने में असमर्थ महसूस करने लगे, तो उन्होंने विधायक को अलग से आकर मिलने के लिए कहा। समान रूप से एक सदस्य द्वारा किये गये प्रश्न के जवाब में सहकारिता मंत्री सुरेंद्र यादव ने भी प्रश्नकर्ता विधायक को अपने कक्ष में आकार बात करने के लिए आमंत्रित किया। इस सूची में बिहार के शिक्षा मंत्री प्रो. चंद्रशेखर भी शामिल हैं, जो आये दिन मनुस्मृति और रामचरितमानस को लेकर नये-नये बखेड़े खड़े करते रहते हैं। धार्मिक विषयों पर निरंतर गाल बजाकर चर्चा में रहने वाले चंद्रशेखर सदन में अपने विभाग से सम्बन्धित प्रश्नों के जवाब में गड़बड़ा जाते हैं।

लोकतंत्र के मन्दिर में ऐसे विद्रूप दृश्य बड़े अरुचिकर लगते हैं। ऐसे सदस्यों को एक राज्य की सबसे बड़ी पंचायत में देखना कष्टकर है। किन्तु इसकी वजह क्या है? प्रथमत: इस अयोग्य राजनीतिक जमात के निर्वाचन का कारण जातिवाद एवं धार्मिक ध्रुवीकरण है। जातिवाद और सांप्रदायिकता का सबसे विघटनकारी स्वरूप इन पर आधारित जनप्रतिनिधित्व है। सन् 1995 में कांग्रेस नेता वी.एन. गाडगिल ने कहा था- ‘भारत में आप मत नहीं डालते, बल्कि अपनी जाति को चुनते हैं।’ अगर हम थोड़ी देर के लिए पिछड़ावाद-दलितवाद के आन्दोलन को स्वीकार भी लें, तो क्या बिहार की 10 करोड़ से अधिक की आबादी में एक ऐसा व्यक्ति महागठबंधन के घटक दलों को नहीं मिला, जो जनप्रतिनिधित्व की प्रतिष्ठा के अनुकूल हो? वास्तव में यह न सिर्फ़ लोकतांत्रिक भ्रष्टाचार है, बल्कि एक तरह की अनैतिक हिंसा भी है। सहज ही एक प्रश्न ध्यान में आता है कि ऐसे अयोग्य लोग नीति निर्णायन में किस प्रकार योगदान देते होंगे?

ऐसे कुपात्र न सिर्फ़ प्रशासनिक भ्रष्टाचार में सहयोगी होते हैं, बल्कि भ्रष्टाचार का कारक और अवलंबन भी होते हैं। भ्रष्टाचार के घुन से खोखली हो चुकी नौकरशाही के लिए मंत्रालयों में आसीन ऐसे जनप्रतिनिधि स्वार्थपूर्ति और अराजकता फैलाने के लिए सर्वाधिक सुभेद्य होते हैं। इस दुरावस्था हेतु जनता को आलोचना का अधिकार नहीं है, क्योंकि सर्वप्रथम उसे ख़ुद के गिरेबान में झाँकना चाहिए। आज सुशासन और सहभागी लोकतंत्र की उम्मीद में निराश जनता ने क्या अपना मूल्यांकन किया है कि इस भ्रष्ट राजनीतिक वातावरण के लिए वह ख़ुद कितनी बड़ी ज़िम्मेदार है। ऐसे अयोग्य लोग जो जननिर्वाचन के माध्यम से संसद और विधानसभाओं में पहुँचते हैं, उसकी वजह आम जनता ही है। न बूथ की लूट हुई, न कोई हिंसा और न ही ज़ोर-जबरदस्ती। क्योंकि मीडिया की अतिसक्रियता के इस दौर में और मोबाइल में मौज़ूद कैमरे की वजह से ऐसी चीज़ें तो बिलकुल ही सम्भव नहीं हो पाती हैं। परन्तु फिर भी लोकतंत्र अपमानित हुआ। इसका अर्थ यह है कि ऐसे लोग जनता के मत-पत्र से चुनकर आते हैं और इन्हें चुनने वाली जनता का नैतिक स्तर स्वयं छिछला है। आज देश में शिक्षा और जागरूकता के निम्न स्तर होने का भी आरोप नहीं लगाया जा सकता। सत्य तो यह है कि जातिवाद एवं सांप्रदायिकता के दुर्दम्य रोग से पीडि़त समाज का मानसिक स्तर निम्न श्रेणी तक जा पहुँचा है, जो जाति-मज़हब की विकृत सोच से ऊपर ही नहीं उठ पा रहा है। ऐसे अयोग्य जनप्रतिनिधियों के चयन की जवाबदेही तो जनता को उठानी ही पड़ेगी।

इस देश में चपरासी से लेकर सफ़ाईकर्मी तक के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है, बस नीति-नियंता जनप्रतिनिधि ही इसके अपवाद हैं। कम-से-कम स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त, सार्वजनिक जीवन का अनुभव, समाज सेवा, नीति-नियमन, प्रशासनिक कार्यानुभव जैसे मानकों के न्यूनतम आधार निर्वाचित जनप्रतिनिधित्व के लिए तो आवश्यक होने ही चाहिए। देश की दुर्दशा में यह क़ानूनन संरक्षित अयोग्यता की स्थिति बदलनी चाहिए। लेकिन यदि जनता भी इस चलायमान विनाश पर्व में आनंदित है, तो फिर उसकी मर्ज़ी।

इन अयोग्य जनप्रतिनिधियों के चयन का दूसरा प्रमुख कारण वंशवाद एवं परिवारवाद है। ये परिवारवाद एवं जातिवाद का सामूहिक दुष्कृत्य हैं, जिनके विषैले प्रहारों से लोकतंत्र की आत्मा घायल है। स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास पर $गौर करें, तो यह दुर्गुण किसी दल या व्यक्ति विशेष से ही सम्बन्धित नहीं है, बल्कि देश की पूरी राजनीतिक व्यवस्था ही इसी कीचड़ में सनी है। विपक्षी राजनीतिक दल चाहते हैं कि लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत पूरी जनता सत्ता के ख़िलाफ़ उसका मोर्चा सँभाल ले। लेकिन उसे अपने सुरक्षित आवरण से न निकलना पड़े। जनता विकल्प के रूप में किसे अपनाये? इस सम्बन्ध में विपक्ष जनता को विकल्पहीन रखना चाहता है। उसका पक्ष बस वंशवाद की उपज यह अकर्मण्य वर्ग है। वह चाहता है कि बस एंटी-इनकम्बेंसी से प्रेरित जनता किसी दिन सत्ता उसे सौंप दें।

वास्तव में जनतंत्र में ज़िम्मेदारी तय करना और ज़िम्मेदारी स्वीकार करना दोनों कठिन होते हैं। राजनीतिक वर्ग को निरंतर कोसने वाली जनता कभी भी आत्म साक्षात्कार का जोखिम नहीं उठाती, ताकि ज़िम्मेदारी को स्वीकार करने और उसके निर्वहन दोनों से बची रहे। ख़ैर इस मुद्दे पर तब तक सार्थक बहस नहीं हो सकती, जब तक आम जनता इसके विरोध में लामबंद नहीं होती। क्योंकि उसकी चुप्पी राजनीतिक वर्ग को ऐसे कुकृत्यों के लिए प्रोत्साहित करती रहेगी। वैसे भी ये मसला सिर्फ़ परिवारवाद-वंशवाद से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों एवं मर्यादाओं के हनन का भी है।

काडर आधारित राजनीतिक दलों या संगठनों में सर्वोच्च पद पर पहुँचने की एक सोपान-कृमिक प्रक्रिया है। भारत के राजनीतिक परिदृश्य में मात्र वामपंथी दल और भाजपा ही इस परम्परा के संवाहक रहे हैं। लेकिन अब भाजपा में भी यह परम्परा मृतप्राय है। उसका यह दुर्गुण सत्ता जनित अहंमन्यता का परिणाम है। जैसे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के सुपुत्र पंकज सिंह, वेद प्रकाश गोयल के सुपुत्र पीयूष गोयल, देवेंद्र प्रधान के सुपुत्र धर्मेंद्र प्रधान, प्रेम कुमार धूमल के सुपुत्र अनुराग ठाकुर, नारायणन सीतारमण की सुपुत्री निर्मला सीतारमण, रिंचिन खारू रिजिजू के सुपुत्र किरेन रिजिजू की का$फी पहले ही राजनीति में एंट्री हो चुकी है। निकट में ही पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज की पुत्री को दिल्ली भाजपा के विधि प्रकोष्ठ का सह-संयोजक नियुक्त किया गया है। यह तो बड़े उदाहरण हैं। राज्यों में भाजपा में परिवारवाद और वंशवाद की भरमार है। यह तो भाजपा में राजनीति के स्थापित करने की शुरुआत है। देखते जाइए, तथाकथित संस्कारी पार्टी वंशवाद को कोसते-कोसते ख़ुद इसे कैसे स्थापित करती है। किन्तु इसका विद्रूप पक्ष यह है कि सबसे ज़्यादा परिवारवादी तो समाजवादी हैं। वे समाजवादी, जिनका सैद्धांतिक आधार ही न्याय, समता और समष्टिवाद आदि पर आधारित है; परिवारवाद और वंशवाद की दलदल में फँसे हैं। लेकिन यथार्थ यह है कि आज यही वर्ग सबसे बड़ा व्यक्तिवादी, परिवारवादी और सत्तालोभी है। अगर वास्तव में ऐसे वर्ग द्वारा कभी भारत में वास्तविक समता और सामाजिक न्याय की स्थापना हुई, तो इस राजनीतिक वंशवाद का औचित्य स्वयंसिद्ध होना, वर्ना इतिहास देखेगा कि निजी हितों की $खातिर परिवारवाद के नाम पर किस तरह लोकतांत्रिक मूल्यों की बलि चढ़ा दी गयी।

अमेरिकी चिंतक हेनरी डेविड थोरो कहते हैं- ‘हर व्यक्ति यह बताये कि किस तरह की सरकार का वह सम्मान करेगा, और यह उसे पाने की दिशा में एक $कदम होगा।’ यह विचार जनता और विपक्ष दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। आज आम बिहार में सत्तासीन और केंद्र में विपक्ष में बैठे वर्ग को उनकी विफलताओं के लिए कोसने से पूर्व जनमानस को आत्म मूल्यांकन की ज़रूरत है। उसे स्वयं से यह प्रश्न पूछने की ज़रूरत है कि क्या वास्तव में वह वर्तमान सत्ताधारी दल का विकल्प बनने के योग्य है?

जनता के लिए यह दौर बड़ी दुविधा भरी स्थिति का मुज़ाहिरा करा रहा है। एक तरफ़ सत्ता में पिछले एक दशक से वह वर्ग क़ाबिज़ है, जिनमें संवेदनहीनता एवं सर्वसत्तावाद की भावना इस तरह घर कर चुकी है, जहाँ उन्हें अपने अहंकार के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखता और दूसरी तरफ़ वे लोग हैं, जो विकल्प बनने की योग्यता प्रदर्शित नहीं कर रहे हैं। कम-से-कम इस उत्साहहीन, पराजित एवं स्वार्थी दशा में तो बिलकुल ही नहीं। विपक्ष को यह समझना ही होगा कि जनता परिवर्तन को उद्यत हो सकती है, बशर्ते वह उसके समक्ष नेतृत्व की योग्यता प्रदर्शित करे। अन्यथा यह सर्वसत्तावाद का दौर अभी लम्बा खिंचने के आसार हैं।

(लेखक पत्रकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं।)

कर्नाटक में द्विध्रुवीय सीटों से होगा फ़ैसला

राज्य के विधानसभा चुनाव में तीन प्रमुख दलों- भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस ने झोंकी पूरी ताक़त

क्या कर्नाटक में बड़े पैमाने पर बड़े भाजपा नेताओं का कांग्रेस में शामिल होना 10 मई को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उसकी हार का संकेत है? हाल के वर्षों में यह पहली बार हुआ है कि भाजपा से इस तरह चुनाव से पहले नेताओं का दल-बदल हुआ है। अन्यथा होता तो यह था कि कांग्रेस के लोग भाजपा में जाने लगते थे। इस बार लगता है कि कर्नाटक के चुनाव ने यह फ़िज़ा बदल दी।

कुछ महीने पहले गुजरात चुनाव में भाजपा के बड़े नेताओं ने जिस तरह 150 सीटें जीतने का मज़बूत दावा किया था, भाजपा वैसा कोई दावा कर्नाटक में नहीं कर रही है। और उसके जो नेता कर भी रहे हैं, उनके दावों में दम नहीं दिख रहा। इसके विपरीत कांग्रेस ख़ेमा उत्साह में है। इस चुनाव के नतीजे दो चीज़ों से तय होंगे। एक कर्नाटक में तिकोने मुक़ाबले में कौन दूसरे के वोटों में सेंध मारता है और दूसरा यह कि देवेगौड़ा के जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) की क्या स्थिति रहती है।

कांग्रेस ने अंतिम क्षणों में कुछ सीटें देकर वामपंथी दल भाकपा को अपने साथ गठबंधन में जोड़ा है। उसकी रणनीति अधिक से अधिक सीटों पर बिना वोटों के बिखराव के भाजपा के साथ मुक़ाबला करने की है।

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, भाजपा ने देवेगौड़ा के जेडीएस के साथ अंदरख़ाने समझौते की कोशिश की थी। भाजपा के थिंक टैंक का मानना है कि जेडीएस के साथ गुपचुप समझौता करके कांग्रेस को घेरा जा सकता है। हालाँकि इस कथित गठबंधन की ज़मीनी हक़ीक़त साफ़ नहीं है। भाजपा नेताओं का तो कहना है कि पार्टी को किसी से समझौता करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वह अपने बूते जीतने की क्षमता रखती है।

इस चुनाव के अभियान में भाजपा की सबसे कमज़ोर कड़ी बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली उसकी प्रदेश सरकार है। पार्टी के नेता प्रचार के दौरान सरकार की उपलब्धियों पर ज़्यादा बात करते नहीं दिख रहे, जबकि हरेक नेता प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे पर निर्भर है।

इसके विपरीत कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान में क्षेत्रीय मुद्दों पर ज़्यादा फोकस रखा है भले पार्टी के स्टार प्रचारक राहुल गाँधी ने अपने दौरों में राष्ट्रीय मुद्दों पर बात की है। उनकी रैलियों और रोड शो में भीड़ भी काफ़ी दिखी है, जिससे संकेत मिलता है कि यदि यह भीड़ वोट में तब्दील होती है, तो कांग्रेस के इस चुनाव में बारे-न्यारे हो सकते हैं।

इस चुनाव में कांग्रेस रणनीतिकार की भी मदद ले रही है। सुनील कानूनगोलू कर्नाटक के चुनाव में कांग्रेस के रणनीतिकार की भूमिका में हैं। प्रशांत किशोर के सहयोगी रहे कानूनगोलू कभी भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के साथ काम कर चुके हैं। कांग्रेस ने कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश में साल के आख़िर में होने वाले विधानसभा चुनाव का ज़िम्मा भी कानूनगोलू को सौंप रखा है। कानूनगोलू कांग्रेस से जुडऩे के बाद राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी रणनीतिकार के रूप में शामिल रहे हैं। उनके अलावा प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया रणनीति के मुख्य किरदार हैं।

उधर भाजपा के चुनाव का ज़िम्मा स्थानीय नेताओं ने सँभाल रखा है; लेकिन वरिष्ठ नेता अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ही पूरी रणनीति का ज़िम्मा निभा रहे हैं। दोनों नेता कर्नाटक से कई दौरे कर चुके हैं और शाह ने दावा भी किया है कि कर्नाटक में भाजपा फिर सरकार बनाएगी। पार्टी की सबसे बड़ी दिक़्क़त कई बड़े नेताओं का पार्टी से बग़ावत करके कांग्रेस में चले जाना है। स्थिति ऐसी हुई है कि प्रधानमंत्री मोदी को पूर्व मुख्यमंत्री के.एस. ईश्वरप्पा को मनाने के लिए फोन करना पड़ा जिनके बेटे केई कांतेश को पार्टी ने शिमोगा से टिकट नहीं दिया। ईश्वरप्पा बेटे के लिए टिकट चाहते थे, जो ख़ुद पाँच बार वहाँ से जीत चुके हैं। ऐसा ही हिमाचल विधानसभा के चुनाव में दिखा था, जब मोदी ने वहाँ नाराज़ नेता कृपाल परमार को फोन किया था। हालाँकि हिमाचल में भाजपा को कांग्रेस झेलनी पड़ी थी।

रिकॉर्ड देखें, तो सन् 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 77 फ़ीसदी सीटों पर द्विध्रुवीय मुक़ाबले हुए, जिसका मतलब था कि केवल दो पार्टियाँ उन निर्वाचन क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से चुनाव लड़ रही थीं। पहले यह प्रतिशत 2013 और 2008 के चुनाव में महज़ 50 फ़ीसदी था। ऐसे में जेडीएस यदि प्रभावशाली प्रदर्शन नहीं करता है, तो भाजपा और कांग्रेस में ज़्यादातर सीटों पर सीधे टक्कर होगी। इसमें जो बाज़ी मारेगा, उसकी सरकार बनेगी।

जातियों का गुणा-भाग

इस बार कर्नाटक चुनाव में जातियों का रोल बड़ा रहने की सम्भावना है। कांग्रेस चुनाव प्रचार के बीच एक से ज़्यादा बार जातिगत गणना की माँग कर चुकी है। देखा जाए, तो कर्नाटक में सबसे ज़्यादा आबादी दलितों की है, जो क़रीब 19.5 फ़ीसदी (संख्या में 1.08 करोड़) हैं। उनके बाद मुस्लिम आते हैं, जो प्रदेश की आबादी का क़रीब 16 फ़ीसदी हैं (70 लाख) हैं। तीसरे नंबर पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) है, जो 16 फ़ीसदी के क़रीब हैं। कर्नाटक में कहा जाता है कि सत्ता में आने के लिए लिंगायत वोट पाना बहुत ज़रूरी है।

कर्नाटक में लिंगायतों की संख्या क़रीब 14 फ़ीसदी (65 लाख) है। दूसरी महत्त्वपूर्व जाति वोक्कालिंगा है, जिनकी कुल आबादी का फ़ीसदी 11 अर्थात् संख्या में क़रीब 60 लाख है। राज्य में कुरुवा ओबीसी भी मज़बूत वर्ग है और चुनाव में हार-जीत में उसका बड़ा रोल रहता है। कुरुवा प्रदेश में सात फ़ीसदी अर्थात् क़रीब 45 लाख हैं। इन जातियों के अलावा अजजा पाँच फ़ीसदी, ईसाई तीन फ़ीसदी, जैन-बौद्ध दो फ़ीसदी और अन्य चार फ़ीसदी के क़रीब हैं। प्रदेश भर में ब्राह्मणों की संख्या 14 लाख है।

इस बार भाजपा को लिंगायत समुदाय के नाराज़ होने का ख़तरा सता रहा है। उसके लिंगायत समुदाय में सबसे बड़ा चेहरा बी.एस. येदियुरप्पा को जिस तरह पार्टी ने मुख्यमंत्री पद से हटाया था, उसके बाद से समुदाय में नाराज़गी उभरी थी, जो हाल कांग्रेस में जाने वाले नेताओं तक में दिखी। कांग्रेस लिंगायत समुदाय से इस बार बड़े समर्थन की उम्मीद कर रही है, जबकि भाजपा येदियुरप्पा के प्रति पूरा सम्मान दिखाकर यह सन्देश देने की कोशिश कर रही है कि लिंगायत नेता पार्टी से नाराज़ नहीं हैं।

भाजपा को लगे झटके

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा को उसके असन्तुष्टों ने जबरदस्त झटके दिये। कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी कांग्रेस में चले गये, जबकि कुछ ने जेडीएस को चुना। भाजपा को पहले से डर था कि कर्नाटक में टिकटों को लेकर बग़ावत हो सकती है। इसलिए उसने बहुत आख़िर में अपनी तीन सूचियाँ जारी कीं। इनमें कई दिग्गजों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पार्टी ने भले लिंगायत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र को उनकी सीट से टिकट दे दिया; लेकिन अन्य को यह सौभाग्य नहीं मिला।

कर्नाटक में भाजपा छोडऩे वाले नेताओं में सबसे बड़ा नाम पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार का था, जो प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रहे थे। हुबली-धारवाड़ केंद्रीय निर्वाचन क्षेत्र से उन्हें अब कांग्रेस में मैदान में उतार दिया है। राहुल गाँधी जब प्रचार के लिए 23 अप्रैल को कर्नाटक गये थे, तो वहाँ पहुँचने पर हुबली एयरपोर्ट पर सबसे पहले भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्‌टार राहुल से मिले। उनके अलावा लक्ष्मण सावदी दूसरे बड़े नेता हैं, जो उप मुख्यमंत्री रहे हैं। सावदी अथानी निर्वाचन क्षेत्र के टिकट से चुनाव लडऩे की उम्मीद कर रहे थे; लेकिन टिकट न मिलने के बाद उन्होंने भाजपा के विधान परिषद् सदस्य के रूप में इस्तीफ़ा दे दिया और कांग्रेस में चले गये।

पूर्व मंत्री एस. अंगारा तीसरे बड़े नेता हैं, जो अंगारा दक्षिण कन्नड़ ज़िले के सुलिया निर्वाचन क्षेत्र से छ: बार जीते हैं। उन्होंने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की। हालाँकि समझा जाता है कि वह चुनाव में अंदरख़ाने सक्रिय हैं। एक और बड़े नेता आर. शंकर हैं, जो एमएलसी थे। उन्हें दलबदल के लिए जाना जाता है और विधान परिषद् से इस्तीफ़ा देने के बाद उन्होंने एनसीपी में जाने की बात कही। शंकर उन 17 विपक्षी विधायकों में एक थे, जिन्होंने 2019 में कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन सरकार गिराने में भाजपा का साथ दिया था।

एम.पी. कुमारस्वामी मुदिगेरे से भाजपा विधायक थे और जेडीएस में शामिल हो गये। उन्हें भी टिकट नहीं मिला था। विश्वनाथ पाटिल हेब्बल्ला चित्तपुर निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार के विधायक थे और टिकट न मिलने के बाद कांग्रेस में शामिल हो गये। उनके अलावा गौरक्षा अभियान में शामिल रहे रघुपति भट, जो उडुपी से विधायक थे टिकट न मिलने के बाद आरोप लगाया कि भाजपा ने उनकी जाति के कारण उनका टिकट काटा। एमएलसी अयनुर मंजूनाथ शिवमोग्गा ज़िले के एक वरिष्ठ लिंगायत नेता थे, जिन्होंने टिकट न मिलने के बाद एमएलसी और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्हें जेडीएस ने टिकट दिया है।

भाजपा का गढ़ माने जाने वाले उत्तरी कर्नाटक में भाजपा का इस बार सख़्त इम्तिहान होगा। क्षेत्र के वोटर पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के कट्टर समर्थक रहे हैं। हालाँकि जबसे येदियुरप्पा से मुख्यमंत्री का पद भाजपा ने वापस लेकर बोम्मई को दिया है, तबसे लोगों के तेवर बदल गये हैं। ऊपर से मज़बूत लिंगायत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और पूर्व उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी भाजपा छोडक़र कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं और भाजपा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं।

ऐसे में भाजपा की मुश्किलें बढ़ी हुई दिखती हैं। बता दें उत्तर कर्नाटक में कित्तूर और कल्याण जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जिनमें 13 ज़िलों की 90 विधानसभा सीटें शामिल हैं। क्षेत्र का गणित देखें, तो पिछले चुनाव में यहाँ भाजपा ने 52, जबकि कांग्रेस ने 32 सीटें जीती थीं। जेडीएस के हिस्से मात्र छ: सीटें आयी थीं। क्षेत्र में बेलगावी, बागलकोट, बीजापुर, कलबुर्गी, यादगीर, गदग, धारवाड़, हावेरी, बीदर, रायचूर, कोप्पल, विजयनगर और बेल्लारी ज़िले शामिल हैं। हमेशा की तरह इस बार भी यहाँ कांग्रेस-भाजपा में सीधी टक्कर है। कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि उसे यहाँ इस बार बढ़त मिलेगी।

क्षेत्रीय दल कल्याण कर्नाटक राज्य पक्ष (केकेआरपी) भाजपा का नुक़सान कर सकती है। यह पार्टी खनन के सरताज जनार्दन रेड्डी का संगठन है। रेड्डी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप हैं। सुषमा स्वराज के समय से रेड्डी भाजपा के साथ रहे हैं; लेकिन इस बार भाजपा ने उनसे किनारा कर लिया है। केकेआरपी हैदराबाद कर्नाटक (कल्याण कर्नाटक) क्षेत्र में भाजपा को नुक़सान पहुँचाने की क्षमता रखती है। बेल्लारी, रायचूर, कोप्पल, यादगीर और विजयनगर ज़िलों में इसका प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। रेड्डी ही नहीं श्रीराम सेना के संस्थापक प्रमोद मुतालिक भी भाजपा के ख़िलाफ़ हो गये हैं। उत्तर कर्नाटक क्षेत्र के हिंदू मतदाताओं में उनका प्रभाव माना जाता है।

कांग्रेस इस बार वहाँ अपनी नफ़री 32 से बढऩे की उम्मीद कर रही है। इलाक़े में पंचमसाली आन्दोलन ने भी हवा बदली है। ऊपर से दो बड़े लिंगायत नेता जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी उससे जुड़ चुके हैं। यदि इस बार कांग्रेस यहाँ अपनी सीटों का आँकड़ा 60 तक पहुँचा पाती है, तो राज्य में उसके लिए सरकार बनाना बहुत आसान हो जाएगा।

जातिगत समीकरण के हिसाब से कांग्रेस को यहाँ अपने अध्यक्ष मल्लिकार्जुन ख़डग़े, जो दलित समुदाय के नेता हैं; से लाभ मिल सकता है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी दावा कर चुके हैं कि कांग्रेस कर्नाटक में 150 सीटों को पार कर जाएगी। दोनों बड़े दलों के लिए बेलागवी ज़िला सबसे ज़्यादा अहम है, जहाँ 18 सीटें हैं। भाजपा 2018 में यहाँ 13 सीटें जीत गयी थी, जबकि कांग्रेस को पाँच ही मिली थीं। कांग्रेस इस बार 12-13 सीट जीतने की उम्मीद लगाये है।

जानकारों का कहना है कि भाजपा ने जो व्यवहार लिंगायत नेताओं जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी के साथ किया है, उसकी उसे बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। लिंगायत वोट 30 फ़ीसदी भी छिटका, तो भाजपा को लेने-के-देने पड़ जाएँगे।

कांग्रेस वैसे भी इस कर्नाटक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। स्थानीय लिंगायत नेता आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा लिंगायत नेताओं का इस्तेमाल करती है और फिर उन्हें अपमानित कर किनारे कर देती है। उन्हें यह भी लगता है कि भाजपा का असली एजेंडा हिंदुत्व का है और समुदायों को वह सिर्फ़ इस्तेमाल भर करती है। उनके मुताबिक, ग्रामीण इलाक़ों में भाजपा के ख़िलाफ़ माहौल है और भाजपा की सिर्फ़ मोदी की छवि के सहारे वोट लेने की कोशिश सफल नहीं होगी।

क्या कहते हैं सर्वे?

अगर चुनावी सर्वे देखें, तो लोक पोल के ओपिनियन पोल के मुताबिक, कर्नाटक के कित्तूर क्षेत्र में भाजपा 21-23, कांग्रेस 26-28 और जेडीएस को 0-1 सीटों पर मज़बूत उपस्थिति बनाये रखने की उम्मीद है। यह सर्वे कल्याण कर्नाटक क्षेत्र में कांग्रेस को 27-30 जबकि भाजपा को 8-11 और जेडीएस को को 0-2 सीटें दे रहे हैं। उधर बेंगलूरु में कांग्रेस को 22-24, भाजपा को 9-11 और जेडीएस को 1-4 वोट मिलने का अनुमान सर्वे में जताया गया है। उधर तटीय कर्नाटक में भाजपा 14-16 सीटों, जबकि कांग्रेस 8-10, जबकि जेडीएस को 0-1 सीटों पर मज़बूत बतायी जा रही है। मध्य कर्नाटक में भाजपा 10-12, कांग्रेस 9-11 और जेडीएस 0-1 सीट पर सर्वे के मुताबिक मज़बूत है।

इस सर्वे के मुताबिक, ओल्ड मैसूर क्षेत्र में भाजपा को 9-11 सीटें जीत सकती है, जबकि कांग्रेस को अधिकतम 27-30 सीटें और जेडीएस को 20-22 सीटें मिलने का अनुमान है। मध्य कर्नाटक को इस सर्वे में भाजपा की कमज़ोर कड़ी बताया गया है, जहाँ 2018 के चुनाव में जेडीएस ने 27, जबकि कांग्रेस ने 17 और भाजपा ने 11 सीटें जीती थीं। इस सर्वे में दावा किया गया है कि कांग्रेस राज्य में बहुमत पा लेगी। हालाँकि एक और सर्वे, जिसे ‘एशियानेट न्यूज नेटवर्क’ और ‘जन की बात’ ने किया; के मुताबिक भाजपा तटीय कर्नाटक में मज़बूत है।

हालाँकि मध्य कर्नाटक में वोटों का एक बड़ा हिस्सा वह गँवा सकती है। उसके मुताबिक, पुराना मैसूर क्षेत्र में 12 भाजपा, 23 कांग्रेस, 22 जेडीएस जीतेगी। बेंगलूरु में भाजपा 15, कांग्रेस 14 और जेडीएस 4, मध्य कर्नाटक में भाजपा 13, कांग्रेस 12, जेडीएस 1, हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र में भाजपा 16, कांग्रेस 23, जेडीएस एक, मुंबई-कर्नाटक में भाजपा 31, कांग्रेस 19, जेडीएस 0, जबकि तटीय कर्नाटक में भाजपा 16, कांग्रेस 3 सीटें जीतेगी, जबकि जेडीएस 0 पर रहेगी। इस सर्वे के मुताबिक, राज्य में भाजपा सबसे बड़ा दल रहेगी और कांग्रेस दूसरे नंबर पर रहेगी।

प्रमुख उम्मीदवार

भाजपा : कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई शिगगांव सीट, दिग्गज नेता बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे बी.वाई. विजयेंद्र शिकारीपुरा, जर्नादन रेड्डी के भाई सोमशेखर रेड्डी और करुणाकर रेड्डी बेल्लारी और हरपनहल्ली, दिवंगत लिंगायत नेता उमेश कट्टी के  बेटे निखिल कट्टी हुक्केरी और भाई रमेश कट्टी चिक्कोड़ी-सादलगा, सांसद संगमा की बहू मंजुला अमरीष कोप्पल, मंत्री शशिकला जॉली, जिनके पति सांसद हैं; निप्पणी सीट से मैदान में हैं। वहीं मंत्री आनंद सिंह और उनके भतीजे टी.एच. सुरेश बाबू भी प्रमुख उम्मीदवारों में शामिल हैं।

कांग्रेस : पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र वरुणा, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन ख़डग़े के बेटे प्रियांक ख़डग़े चित्तपुर (एससी), कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार के भाई डी.के. सुरेश बेंगलूरु ग्रामीण, लिंगायतों के लोकप्रिय नेता शामनुरु शिवशंकरप्पा दावणगेरे दक्षिण, शामनुरु शिवशंकरप्पा के बेटे एसएस मल्लिकार्जुन दावणगेरे उत्तर, देवनहल्ली (एससी) सीट से उम्मीदवार के.एच. मुनियप्पपा की बेटी रूपकला एम. कोलार गोल्ड फील्ड (एससी) सीट से टिकट दिया गया है, वहीं पूर्व मंत्री रामलिंगा रेड्डी और उनकी विधायक बेटी सौम्या रेड्डी भी मैदान में हैं, जबकि एम. कृष्णप्पा को विजयनगर और उनके बेटे प्रियकृष्ण को गोविंदराज नगर सीट से मैदान में उतारा है। भाजपा से आये पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार को कांग्रेस ने हुबली-धारवाड़ केंद्रीय, जबकि लक्ष्मण सावदी को उनकी अथानी सीट से टिकट दिया है।

जेडीएस : पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के बेटे पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी चन्नापटना, कुमारस्वामी के बेटे निखिल देवगौड़ा, एच.डी. देवेगौड़ा के दूसरे बेटे एच.डी. रेवन्ना, हासन सीट से स्वरूप प्रकाश, जीटी देवगौड़ा को चामुंडेश्वरी सीट और उनके बेटे हरीश गौड़ा को पार्टी ने मैदान में उतारा है। जेडीएस के बड़े उम्मीदवारों में ज़्यादातर देवेगौड़ा परिवार के सदस्य ही हैं।

“प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनते ही जो वादे पार्टी ने किये हैं, उनको पूरा करने के लिए क़दम उठाये जाएँगे। भाजपा की सरकार हिंदुस्तान में सबसे भ्रष्ट सरकार है, जो हर काम का 40 फ़ीसदी कमीशन लेती है। सवाल पूछने पर मेरी सांसदी छीन ली गयी। लेकिन मैं अब भी पूछ रहा हूँ कि प्रधानमंत्री मोदी और अडानी का क्या रिश्ता है?”

राहुल गाँधी

(एक चुनावी सभा में)

“कांग्रेस सत्ता में आयी तो दंगे होंगे। कांग्रेस को वोट देना बेकार होगा। इससे पूरे राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा और दंगे होंगे। इससे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होगा और कोई विकास नहीं होगा।’’

अमित शाह

(एक चुनावी रैली में)

घातक सिद्ध होगा क़ानून का दुरुपयोग

हाल ही में जब राहुल गाँधी की संसद सदस्यता गयी, तो ख़ूब हंगामा हुआ। अभी तक राहुल गाँधी की संसद सदस्यता रद्द किये जाने को लेकर बहस का बाज़ार गर्म है। सवाल यही है कि इस प्रकार एक बयान को लेकर चार साल बाद किसी सांसद की सदस्यता को इतनी तत्परता से रद्द क्यों किया गया? सेशन कोर्ट ने जिस मामले में राहुल गाँधी को जिस मामले में अधिकतम सज़ा सुनायी, उसका फ़ायदा उठाते हुए केंद्र की मोदी सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-102(1) और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के तहत देर न लगाते हुए उनकी सदस्या रद्द कर दी और बहुत जल्द उन्हें सरकारी आवास ख़ाली करने का नोटिस भी थमा दिया। सारे सवाल इसी वजह से उठे कि केंद्र की मोदी सरकार ने यह सब कुछ किसलिए इतनी जल्दबाज़ी में किया।

राहुल गाँधी को 2019 में कर्नाटक के कोलार में दिये जिस कथित बयान- ‘इन सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों है?’ के लिए गुजरात के सूरत के जिस सेशन कोर्ट ने दो साल की सज़ा सुनायी, उसी के आधार पर अगले ही दिन उनकी संसदीय सदस्यता को रद्द किये जाना और एक सप्ताह के अंदर ही सरकारी आवास ख़ाली करने का नोटिस जारी होना कई सवाल खड़े करता है। राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ सूरत के पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा नेता पूर्णेश मोदी ने मानहानि का मुक़दमा दर्ज कराया था, जो कि पेशे से वकील हैं। इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए सूरत के सेशन कोर्ट में राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा-499, 500 के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया था। सेशन कोर्ट ने धारा-499 के तहत आपराधिक मानहानि के मामले में दो साल की सज़ा सुना दी, जो कि अधिकतम है। सज़ा के तुरन्त बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद-102(1) और 191(1) के तहत राहुल गाँधी की सदस्यता चली गयी।

इस अनुच्छेद के मुताबिक, अगर सांसद-विधायक अथवा संसद या विधानसभा का अन्य सदस्य लाभ के कोई पद लेता है अथवा दिमाग़ी रूप से अस्वस्थ है अथवा दिवालिया है अथवा भारत का वैध नागरिक नहीं है, अथवा किसी अपराध में अधिकतम सज़ा पाता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी। इसकी प्रकार से संविधान की 10वीं अनुसूची में सांसद अथवा विधायक को अयोग्य क़रार दिये जाने का दूसरा प्रावधान लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा-8(1) में है, जिसके तहत दो समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने, रिश्वत लेने अथवा चुनाव में अपने प्रभाव का $गलत इस्तेमाल करने पर सांसद-विधायक की सदस्यता जा सकती है।

राहुल गाँधी की सदस्यता अनुच्छेद-8(3) के तहत रद्द की गई है। अब अगर हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट में से कोई उनकी सज़ा को रद्द कर दे, तो उनकी सदस्यता वापस मिल सकती है। अन्यथा अगर सज़ा बरक़रार रही,त वह छ: साल तक न तो चुनाव लड़ सकेंगे और न ही संसद में प्रवेश कर सकेंगे।

क़ानून बचाकर फँसे राहुल

सितंबर, 2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार एक अध्यादेश लेकर आयी थी, जिसमें कुछ शर्तों के तहत अदालत में दोषी पाये जाने के बाद भी सांसदों और विधायकों को अयोग्य क़रार न दिये जाने का प्रस्ताव था; लेकिन उस समय राहुल गाँधी कांग्रेस उपाध्यक्ष थे और उन्होंने दाग़ी सांसदों और विधायकों पर लाये गये यूपीए सरकार के अध्यादेश को बेतुका कहते हुए कहा था कि ‘ऐसे अध्यादेश की कॉपी फाडक़र फेंक देनी चाहिए। इस देश में लोग अगर वास्तव में भ्रष्टाचार से लडऩा चाहते हैं, तो हम ऐसे छोटे समझौते नहीं कर सकते हैं।’ आज इसी क़ानून के तहत राहुल गाँधी की सदस्या चली गयी।

एक और सांसद की सदस्यता रद्द

राहुल गाँधी के बाद उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर से बसपा सांसद अफ़ज़ाल अंसारी की लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गयी है। अफ़ज़ाल अंसारी को गैंगस्टर मामले में ग़ाज़ीपुर की एमपी / एमएलए कोर्ट ने चार साल की जेल और एक लाख रुपये के ज़ुर्माने की सज़ा सुनायी है, जिसके 56 घंटे बाद दोषी सांसद की संसदीय सदस्यता रद्द कर दी गयी है। बता दें कि अफ़ज़ाल अंसारी मुख़तार अंसारी का भाई है, जो इन दिनों बांदा जेल में है। अंसारी भाइयों पर 2007 में कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप है। 23 सितंबर, 2022 को दोनों भाई पर गैंगस्टर एक्ट के तहत आरोप तय हुए थे। राहुल गाँधी से पहले लक्षद्वीप सांसद मोहम्मद फ़ैजल की भी एक स्थानीय कोर्ट द्वारा 10 साल की सज़ा सुनाये जाने पर संसद सदस्यता से हाथ धोने पड़े थे; लेकिन बाद में केरल हाईकोर्ट ने सज़ा पर रोक लगा दी। अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है।

लालू प्रसाद यादव को भी 2013 में चारा घोटाले में दोषी ठहराये जाने के बाद अपनी लोकसभा की सदस्यता गँवानी पड़ी थी। समाजवादी पार्टी के क़द्दावर नेता और पूर्व सांसद, पूर्व विधायक आज़म ख़ान की सदस्यता भी रद्द हो चुकी है। आज़म ख़ान रामपुर से लगातार 10 बार विधायक चुने जाने के अलावा सांसद भी रहे हैं। आज़म ख़ान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अभद्र टिप्पणी की थी, जिसके बाद तीन साल कोर्ट में केस चला और कोर्ट ने उन्हें तीन साल की सज़ा सुनायी। सज़ा के बाद आज़म को ज़मानत भले मिल गयी; लेकिन विधानसभा की सदस्यता चली गयी। आज़म ख़ान के बाद उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म की भी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गयी। अब्दुल्ला आज़म को मुरादाबाद के एक सेशन कोर्ट ने 15 साल पुराने मामले में दो साल की सज़ा सुनायी थी, जिसके बाद उनकी भी सदस्यता चली गयी।

इसके अलावा मुज़फ़्फ़रनगर की खतौली सीट से भाजपा विधायक रहे विक्रम सैनी की भी सदस्यता जा चुकी है, जो कि मुज़फ़्फ़रनगर में हुए 2013 के दंगों के दोषी पाये गये। अन्नाद्रमुक प्रमुख रहीं तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता भी 2014 में अयोग्य क़रार दिये जाने के बाद अपनी सदस्यता गँवा चुकी थीं। उन्हें आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में चार साल की सज़ा हुई थी, जिसके चलते उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था। अब जयललिता इस दुनिया में नहीं हैं।

आरजेडी के कुरहनी विधानसभा से विधायक अनिल कुमार सहनी को भी धोखाधड़ी के मामले में तीन साल की सज़ा मिलने के बाद पिछले साल अक्टूबर में विधानसभा सदस्यता गँवानी पड़ी। आरजेडी के ही नेता और पटना ज़िले की मोकामा सीट से विधायक अनंत सिंह को जुलाई, 2020 में हथियारों की रिकवरी से जुड़े मामले में दोषी पाये जाने के बाद सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। हरियाणा की काल्का सीट से कांग्रेस विधायक प्रदीप चौधरी को असॉल्ट मामले में तीन साल की सज़ा मिलने के बाद जनवरी, 2021 में अपनी सदस्यता गँवानी पड़ी। फरवरी, 2020 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव की बांगरमउ सीट से भाजपा विधायक रहे कुलदीप सिंह सेंगर को दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि के बाद अपनी सदस्यता गँवानी पड़ी।

इसी तरह अन्नाद्रमुक के विधायक रहे टी.एम. सेल्वागणपति को 2014 में, ऑल झारखण्ड स्टूडेंट यूनियन के विधायक के.के. भगत को 2015 में, झारखण्ड मुक्ति मोर्टा के विधायक अमित महतो को 2018 में, इसी पार्टी के योगेंद्र महतो को 2018 में, झारखण्ड पार्टी के विधायक एनोस एक्का को 2018 में, कांग्रेस विधायक बंधु टिर्की को 2022 में, कांग्रेस की ही विधायक ममता देवी को 2022 में, भाजपा विधायक सुभाष कल्लर को 2002 में, भाजपा विधायक पी. बालाकृष्णा रेड्डी को 2019 में, आरजेडी विधायक राज बल्लभ यादव को 2018 में, आरजेडी के ही विधायक इलयास हुसैन को 2018 में, अन्नाद्रमुक के विधायक टीएम सेल्वागणपति को 2014 में, मुस्लिम लीग के विधायक के.एम. शाजी को 2016 में, सीपीएम के विधायक ए. राजा को 2023 में, कांग्रेस विधायक रहे रशीद मसूद को 2013 में, जेडीयू के सांसद रहे जगदीश शर्मा को 2013 में सदस्यता गँवानी पड़ी।

भाजपा का मिशन जेल!

क्या केंद्र की मोदी सरकार विपक्ष के ताक़तवर नेताओं को जेल भेज देना चाहती है? अगर अभी तक मोदी सरकार की जेल भेजने की कार्रवाई को देखें, तो पता चलता है कि कई क़द्दावर नेता जेल भेजे जा चुके हैं और कई को जेल भेजने की तैयारी है। लालू प्रसाद यादव जेल की लम्बी सज़ा काट चुके हैं। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता (तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री) सत्येंद्र जैन और उसके बाद दिल्ली के शिक्षा, वित्त और आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया को जेल भेजा जा चुका है। इसी तरह आज़म ख़ान, उनका बेटा अब्दुल्ला आज़म, मुख़तार अंसारी जेल में हैं। अतीक अहमद (जिसकी हत्या हो गयी) को भी सलाख़ों के पीछे भेज दिया था। केसीआर की बहिन वाईएस शर्मिला भी न्यायिक हिरासत में हैं। केसीआर की बेटी निशाने पर हैं। लालू प्रसाद यादव के बेटे और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव निशाने पर हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल निशाने पर हैं। झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके कई विधायक निशाने पर हैं। झारखण्ड में अभी तक कुछ अधिकारी और विधायकों पर कार्रवाई हो चुकी है। कहा जा रहा है कि कई बड़े नेताओं की फाइल तैयार हो चुकी है, जिनके ख़िलाफ़ जल्द ही जेल भेजो कार्रवाई हो सकती है, जिसके लिए ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल केंद्र की मोदी सरकार कर रही है। इस तरह सत्ता के लिए क़ानून का दुरुपयोग देश के लिए बेहद घातक सिद्ध होगा। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह स्पष्ट कह चुके हैं कि ‘भाजपा का एक ही मिशन है- सारे विपक्ष को ख़त्म करो। सारे विपक्षी नेताओं को सज़ा दिलाकर जेल में डाल दो। उनको चुनाव लडऩे से अयोग्य घोषित कराओ। वे (मोदी-शाह) 24 घंटे इसी काम में लगे हुए हैं।’

क्या यह क़ानून का दुरुपयोग है? अगर यह सच है, तो यह घातक साबित होगा। जबसे राहुल गाँधी की सदस्यता गयी है, विपक्ष ने कुछ हद तक एकजुटता तो दिखायी है। जो नेता कांग्रेस के पक्ष में बोलने को तैयार नहीं थे, वे भी केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बोले हैं; पर अभी उनमें मोदी सरकार को घेरने के लिए उतनी एकता नहीं दिख रही, जिसकी इस समय ज़रूरत है।

ट्रेनों में रिजर्वेशन के लिए मारामारी

रेलवे की सख़्ती के बावजूद स्टेशनों पर रहता है दलालों का जमावड़ा

महँगाई के इस दौर में अब ट्रेन से सफ़र करना आसान नहीं रह गया है। हर ट्रेन में बहुत भीड़ तो रहती है; लेकिन अब टिकट कराना भी आसान नहीं रह गया है। किसी भी स्टेशन पर जाइए, दलाल खुलेआम टिकट कराने का ऑफर देते नज़र आते हैं। लेकिन अगर टिकट खिडक़ी पर जाओ, तो अमूमन एक ही जवाब मिलता है- सीट ख़ाली नहीं है।

हाल ही में 9 अप्रैल को जब पूजा नाम की एक युवती, जो कि मेरे आगे ही टिकट के लिए एक रेलवे स्टेशन पर लगी थी, उसने 17 मई के लिए बिहार के लिए रिजर्वेशन का फॉर्म टिकट कलेक्टर को बढ़ाया, तो उसने यह कहते हुए फॉर्म लौटा दिया कि ‘सीट ख़ाली नहीं है, चार महीने पहले ही बुकिंग करा लिया करो।’ वहीं स्टेशन परिसर में घूम रहे दलाल ने उस लडक़ी से कहा कि टिकट हो जाएगा, मगर हर टिकट पर 800 रुपये एक्स्ट्रा लगेंगे।

जब उस दलाल से मैंने बात की, तो पहले तो उसने नाराज़गी जतायी और आनाकानी करते हुए कहने लगा कि आपको टिकट कराना है, तो कराओ; नहीं तो रास्ता नापो। लेकिन तरीक़े से बात करने पर धीरे-धीरे उसने एक-एक करके कई राज़ उगले। लेकिन जब उसे पता चला कि मैं मीडिया से हूँ, तब। इस दलाल ने अपना नाम उजागर न छापने की शर्त पर बताया कि मैडम हमारे सेंटर बने होते हैं, जहाँ से टिकट की ब्लैकमेलिंग का धंधा चलता है। जो पैसा टिकट कराने का हम एक्स्ट्रा लेते हैं, उस पैसे में हमारा हिस्सा सिर्फ़ 20 से 25 टका होता है।

यह पूछे जाने पर कि जब सीट ही नहीं है, टिकट कलेक्टर भी मना कर रहा है, तो आप टिकट कैसे करा पाते हैं? उसने कहा कि ये जो खिडक़ी पर आदमी बैठा है, इसकी तरह कोई भी हो, किसी भी खिडक़ी पर हो, उसे पता है कि ब्लैक टिकट बेचने हैं, इसलिए रेलवे के चार्ट में सीट फुल दिखता है; लेकिन सीट होती हैं।

इस चौंकाने वाले ख़ुलासे के अलावा एक व्यापारी यात्री ने मुझे बताया कि वो सफ़र करते रहते हैं। उनका काम हर तीसरे-चौथे दिन कभी दिल्ली, तो कभी सूरत जाना होता है। ऐसे में उन्हें क़रीब-क़रीब सभी टीटी और कोच सर्विस वाले लडक़े जानते हैं। उन्हें सीट से कुछ कम पैसे देने होते हैं और टीटी, कोच सर्विस स्टाफ उन्हें सीट दे देते हैं। लेकिन हम रात को ही सफ़र करते हैं। दिन में यह सुविधा बहुत कम मिलती है। अगर कहीं मजिस्ट्रेट चेकिंग होनी होती है, तो टीटी, कोच सर्विस वाले लडक़े हमें इधर-उधर कर देते हैं या फिर टिकट काट देते हैं। जैसे हम दो-दो चलते हैं और दिल्ली से सूरत के लिए बैठे, तो हम टिकट लिये बिना सीधे ट्रेन के एसी कोच के पास चले जाएँगे। उन लोगों के नंबर हमारे पास होते हैं, उन्हें फोन कर लेंगे। वो हमारा सामान अपनी रैक में रखवा देंगे। उसके बाद जब ट्रेन चलेगी, तो अंदर ले लेंगे। उसके बाद एक-दो घंटे इधर-उधर रखेंगे और फिर ख़ाली पड़ी सीट पर सोने के लिए कहेंगे। इस तरह हम लोग आराम से सफ़र करते हैं।

अगर कहीं कोई बड़ी चेकिंग होने वाली होगी, तो टीटी या कोच सर्विस करने वाला कोई लडक़ा आकर टिकट फाडक़र दे देगा। लेकिन वो (टीटी) टिकट वहीं से बनाएगा, जहाँ से चेकर ट्रेन में चढ़ेंगे। उन्हें पहले से पता होता है कि ट्रेन में मजिस्ट्रेट चेकिंग होने वाली है या नहीं। यह पूछे जाने पर कि टीटी की ड्यूटी चेंज होने पर क्या होता है? उस आदमी ने बताया कि टीटी जितने भी रूट पर होते हैं, उन्हें सब पता होता है। जितने भी कोच एसी के होते हैं, सबके टीटी और कोच सर्विस वाले लडक़े मिले होते हैं। सबको पता होता है कि कोच में कितने पैसेंजर सेटिंग से यात्रा कर रहे हैं। तत्काल टिकट लेने वाले भी परेशान दिखे। एक यात्री ने कहा कि चार-पाँच घंटे पहले भी तत्काल में टिकट बुकिंग की सुविधा नहीं मिल रही है। दलाल दोगुने से ढाई गुने रेट माँग रहे हैं।

इसी तरह टिकट चेकिंग कराने वालों की अलग समस्याएँ देखने को मिल रही हैं। सबसे पहली समस्या तो यही है कि टिकट चेकिंग करने पर चार्ज बहुत कटता है। अगर ट्रेन छूटने के कुछ समय पहले टिकट चेकिंग करना चाहो, तो रिफंड की गारंटी नहीं है। इसके अलावा बुकिंग अवधि समाप्त होने के बाद टिकट निरस्त कराने के लिए लोगों को दूसरे स्टेशनों के चक्कर काटने भी पड़ जाते हैं। अगर किसी को टिकट चेकिंग कराना हो, तो कम-से-कम 48 घंटे पहले टिकट चेकिंग कराने पर रिटर्न ठीकठाक मिल पाता है; लेकिन इसमें भी अच्छे-ख़ासे चार्ज कट जाते हैं।

इसमें जनरल टिकट के चेकिंग कराने पर 60 रुपये, स्लीपर टिकट चेकिंग कराने पर 120 रुपये, थर्ड एसी का टिकट चेकिंग कराने पर 180 रुपये, सेकेंड एसी का टिकट चेकिंग कराने पर 200 रुपये और फस्र्ट एसी का टिकट चेकिंग कराने पर 240 रुपये की कटौती के अलावा एसी क्लास के सभी टिकटों के चेकिंग कराने पर जीएसटी भी लगता है। यानी टिकट बुक कराते समय भी यात्रियों को जीएसटी देना है, जो कि रिफंडेबल नहीं होती। इसके अलावा अगर 48 घंटे से बाद 12 घंटे से पहले तक टिकट चेकिंग कराने पर 25 प्रतिशत की कटौती की जाती है। वहीं 12 घंटे से कम समय बचने पर और ट्रेन छूटने के 4 घंटे पहले तक टिकट चेकिंग कराने पर 50 प्रतिशत की कटौती होती है।

रेलवे स्टेशन पर जाओ, तो यात्रियों की सैकड़ों समस्याएँ यात्रा सम्बन्धी हैं और कोई सुनने वाला नहीं है। अगर आप पूछताछ खिडक़ी पर जाते हैं, तो ट्रेनों की जानकारी भले ही मिल जाए; लेकिन आपकी अन्य समस्याओं का समाधान यहाँ से नहीं हो पाता, उसके लिए पूछताछ पर बैठा व्यक्ति बोलता है, रेलवे के कस्टमर केयर नंबर 139 पर फोन कीजिए। आईआरसीटीसी पर चार महीने तक भी मुश्किल से सीटें ख़ाली हैं। आईआरसीटीसी की वेबसाइट इतनी हैंग होती है कि कोई भी ऊब जाए। वहीं एक टिकट बुक करने में जितना समय लगता है, उतनी देर में 10 से 15 टिकट बुक हो जाते हैं। मतलब, अगर आपको (उपलब्ध) अवेलेबल दिख रही सीटों में भी कन्फर्म मिल जाए, तो ग़नीमत समझिए। कई बार आईआरसीटीसी का मोबाइल ऐप भी काम नहीं करता है। रेलवे ने स्पेशल ट्रेनों की जानकारी आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर अपलोड की हुई है, जिसके चलते ऑनलाइन टिकट बुक कराने वालों की संख्या में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।

इतना ही नहीं, टिकट काफ़ी महँगे हो चुके हैं। स्लीपर सीटों पर तो इतनी मारामारी है कि कन्फर्म टिकट मिलना तो जैसे बीरबल की खिचड़ी पकाने के बराबर है। इसके अलावा जितनी कम सीटें बचेंगी, टिकट उतना ही महँगा हो जाता है। एसी कोच में यह मुश्किल हमेशा सामने आती है। अगर कोई वेटिंग में रिजर्वेशन करा लेता है, तो उसका टिकट कन्फर्म होना मुश्किल होता है।

ऐसे में रेलवे में यह सुविधा तक नहीं है कि उसे सीट मिल जाए, जबकि यात्री के पैसे उतने ही लगते हैं, जितने कि सीट मिलने वाले के होते हैं। कोच के अंदर सीट देने का एक धंधा सा टीटी चलाते हैं। एक-एक टीटी के पीछे दो-चार लोग हमेशा सीट के लिए घूमते दिखते हैं, और टीटी भी उन्हें किसी भी तरह सीट दिलाने में ही लगे रहते हैं, जिसके लिए बा$कायदा रेट तय होते हैं। प्लेटफॉर्म टिकट महँगा हो ही चुका है।

कई तरह के आरक्षित टिकट बुकिंग में मिलने वाली छूट को भी रेलवे बट्टा लगा चुका है। टिकट चेकिंगेशन से ही रेलवे हर साल करोड़ों रुपये कमा लेता है। साल 2017 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि महज़ तीन वर्षों में आरक्षण रद्द करने, ज़्यादा कन्फर्म टिकट और विंडो वेटिंग टिकटों की बुकिंग से रेलवे ने 2,500 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमायी की थी।

सोचने वाली बात है कि जब जून 2017 तक महज़ तीन साल में इतना मोटा पैसा कमाया, तो फिर उसके बाद तो किराया भी बढ़ा है, चेकिंगेशन चार्ज भी बढ़े हैं, तो रेलवे ने कितना मोटा पैसा कमाया होगा। इसके बावजूद रेलवे का घाटे में होना किसी भी प्रकार से हजम नहीं होता। इसमें कोई दो-राय नहीं कि रेलवे में पहले से कई सुविधाएँ भी बढ़ी हैं; लेकिन रेलवे की यात्रा जिस प्रकार महँगी और दुश्वार होती जा रही, उससे यात्रियों की समस्याएँ घटने की जगह लगातार बढ़ रही हैं। रेलवे को इस ओर ध्यान देना चाहिए। वर्तमान केंद्र सरकार ने बुलेट ट्रेन से लेकर न जाने क्या-क्या सपने रेल यात्रियों को दिखा रखे हैं; लेकिन अभी तक न तो बुलेट ट्रेन आयी है और न ही सभी सरकारी वादे पूरे हुए हैं। वंदे भारत ट्रेनों की संख्या ज़रूर बढ़ रही है; लेकिन उनमें यात्रा करना काफ़ी महँगा है।

आज अगर कोई ग़रीब आदमी रेलवे से सफ़र करना चाहे, तो उसके पास एक ही ऑप्शन बचा है, और वो है जनरल डिब्बे में मुर्ग़े-मुर्ग़ियों की तरह खचाखच भरे डिब्बे में यात्रा का। स्लीपर डिब्बों में भी इतनी भीड़ होने लगी है कि सफ़र करने का मन नहीं होता। एसी फस्र्ट क्लास का सफ़र तो हवाई जहाज़ के सफ़र जितना महँगा हो चुका है। ऐसे में आम आदमी क्या करे? इसका जवाब केंद्र सरकार और रेलवे विभाग को ही तलाशना होगा।

दलालों द्वारा कन्फर्म टिकट दिये जाने का सवाल एक रेलवे अधिकारी से पूछा, तो उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। यह ग़लत आरोप है। रेलवे एक भी सीट ख़ाली रहने तक कन्फर्म टिकट देता है। यह लोगों की ग़लती है कि वे रेलवे स्टेशन से टिकट कराने की बजाय दलालों के पास चले जाते हैं। रेलवे स्टेशन पर कोई दलाल नहीं रहने दिया जाता। अगर कोई दलाल किसी को कहीं दिखता है, तो उसकी शिकायत रेलवे विभाग के किसी भी अधिकारी से करे, दलाल के ख़िलाफ़ तुरन्त कार्रवाई की जाएगी।

इसी तरह पैसे लेकर सीट देने के सवाल पर रवि नाम के एक टीटी ने कहा कि वह ऐसा नहीं करते। अगर कोई बिना टिकट पकड़ा जाता है, तो उस पर रेलवे द्वारा तय नियमों के आधार पर फाइन लगाते हैं या उसे रेलवे पुलिस के हवाले करते हैं।

राजनीति के शिकार खिलाड़ी

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’   

खिलाडिय़ों पर इन दिनों राजनीति भी हो रही है और खिलाड़ी राजनीति का शिकार भी हैं। महिला खिलाडिय़ों की दशा पर कोई आँसू बहा रहा है, तो कोई उनके ख़िलाफ़ अनर्गल भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। परन्तु खिलाडिय़ों को न्याय दिलाने के लिए न तो हरियाणा सरकार ने अभी तक कोई क़दम उठाया है तथा न ही केंद्र सरकार ने अभी तक खिलाडिय़ों को न्याय दिलाने की कोई बात कही है। यह भाजपा की ढीठता का एक और ऐसा प्रमाण है, जिस पर उसे लोगों की निंदा को बिना तिलमिलाये स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बृजभूषण शरण सिंह पर एफआईआर तो हो गयी; परन्तु जाँच में क्या होगा? इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इसकी वजह दिल्ली पुलिस पर कोई शक नहीं, बल्कि भाजपा नेताओं के ख़िलाफ़ अब तक कार्रवाइयाँ न होना है। अपने लोगों के ख़िलाफ़ अपराध के तमाम आरोप और सुबूत होने के बावजूद ज़िन्दा मक्खी निगल जाना भाजापा का चरित्र रहा है। इसके कई उदाहरण हैं, जिसमें ताज़ा उदाहरण है- लखीमपुर खीरी में अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा के द्वारा किसानों की हत्या, जिसमें दोषसिद्धि के बावजूद उसे ज़मानत मिल गयी और आज भी वह आज़ाद घूम रहा है।

इस बार मामला महिला खिलाडिय़ों से दुष्कर्म का है। सोचिए, इन महिला खिलाडिय़ों को न्याय दिलाने के लिए जिस तरह संघर्ष करना पड़ रहा है, जिस तरह इनके पक्ष में लोगों को खड़ा होना पड़ रहा है, न्याय माँगने के लिए इसकी ज़रूरत ही क्यों पड़ी? इसका अर्थ तो यह हुआ कि अगर सुप्रीम कोर्ट दख़ल नहीं देता, तो आरोपी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं होता। अब जिस प्रकार बृजभूषण सिंह की तिलमिलाहट दिख रही है, वह पहले क्यों नहीं दिखी? क्योंकि आरोपी को पता था कि उसका कुछ नहीं होगा। वास्तव में भाजपा अपने आपराधिक प्रवृत्ति के क़द्दावर नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में जिस तरह बचती है, उसे कौन उचित कहेगा? बात सिर्फ़ उन महिला खिलाडिय़ों के शारीरिक शोषण की ही नहीं है, जो कि अब भाजपा के सांसद के ख़िलाफ़ जंतर-मंतर पर बैठी हैं, बल्कि भारत के उन सभी खिलाडिय़ों के शोषण, विशेषकर महिला खिलाडिय़ों के शारीरिक शोषण की भी है, जो जिनका शिकार राजनीतिक लोग कर रहे हैं। इस राजनीति का शिकार होकर न जाने कितनी ही भारतीय प्रतिभाएँ मर जाती हैं।

आज भारत में ऐसी खिलाडिय़ों की कोई कमी नहीं है, जो खेल प्रदर्शन से अपनी प्रतिभा का लोहा विश्व भर में मनवा सकते हैं, परन्तु उन्हें जातिवाद, धर्मवाद, अवसरवाद, धन का अभाव तथा संसाधनों की कमी पीछे धकेल देती है। जो आगे निकलना चाहते हैं, उनमें से अधिकतर को अपमान या शोषण का शिकार होना पड़ता है। अधिकतर महिला खिलाडिय़ों को शारीरिक शोषण का शिकार बना दिया जाता है। महिला खिलाडिय़ों के साथ हुए शोषण के ऐसे बहुत से मामले सामने आये हैं, जिन्हें या तो दबा दिया गया या फिर उनमें ठीक से न्याय नहीं मिला। कुश्ती महिला खिलाडिय़ों की ही एफआईआर कितनी मुश्किल से सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दर्ज हुई है?

क्रिकेट की महिला खिलाडिय़ों के मामले में भी शोषण की ख़बरें पहले भी आती रही हैं। आरोप रहे हैं कि बड़ी प्रतिभा के होते हुए भी शारीरिक शोषण न कराने पर कई महिला खिलाड़ी पदक जीतकर भी आगे नहीं बढ़ सकीं; क्योंकि ऐसी महिलाओं को मौक़े ही नहीं मिलते। अगर भारत की सभी खेल प्रतिभाओं को सही और बिना भेदभाव के मौक़े दिए जाएँ, तो भारत से हर खेल क्षेत्र में स्वर्ण से लेकर अन्य पदक लाने वाली प्रतिभाओं की कमी न हो; परन्तु भेदभाव, ग़रीबी, खेल संसाधनों की कमी तथा राजनीति लोगों और पूँजीपतियों का हस्तक्षेप के चलते भारतीय खेल प्रतिभाएँ आगे नहीं बढ़ पातीं। भारत खेल प्रतिभा में पूरे विश्व से आगे हो सकता है; परन्तु राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले तथा पैसा कमाने के लालची लोग अपने ही देश के युवाओं की प्रतिभा को दबाकर देश का बड़ा भारी नुक़सान करने में लगे हैं।

ये भारत का दुर्भाग्य ही है कि आज हर ऐसे क्षेत्र में राजनीतिक और पूँजीपति लोग कुंडली मारकर बैठे हैं, जिस क्षेत्र में पैसा है। खेल में अथाह पैसे की बरसात के चलते राजनीतिक लोग तथा चंद पूँजीपति इस क्षेत्र में दख़लंदाज़ी करने को आतुर हैं। ये लोग केवल खेल क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि दूसरे ऐसे सभी क्षेत्रों पर कुंडली मारे बैठे हैं, जिनमें विकट कमायी है। इसलिए खेल, फ़िल्म, कला और राजनीति जैसे क्षेत्रों को पूरी तरह प्रतिभा प्रदर्शन के आधार पर चयन के लिए स्वतंत्र कर देना चाहिए, जिसमें किसी भी तरह के भेदभाव और भाई-भतीजावाद के लिए कोई जगह न हो। जब तक ऐसा नहीं होगा, भारत में न तो इन क्षेत्रों में सबसे बेहतरीन प्रतिभाएँ अपनी पहचान बना पाएँगी तथा न निष्पक्ष रूप से बेहतरीन प्रतिभाओं को मौक़े मिल सकेंगे।

यह सीख हमें इंडियन आइडल और डांस इंडिया डांस जैसे टीवी कार्यक्रमों से लेनी चाहिए, जहाँ ग़रीब-अमीर, सभी को बिना किसी की जाति या धर्म देखे मौक़ा दिया जाता है। भारत में ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें किसी कला में महारत हासिल है, परन्तु उन्हें मौक़े नहीं मिलते। उनमें कमी है, तो फ़क़त इतनी कि वे किसी ऐसी आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाते, जो इन क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा जमाये बैठे हैं। अर्थात् या तो ग़रीब हैं या उनकी पहुँच ऊपर तक नहीं है या जातिगत-धर्मगत आधार पर फिट नहीं बैठते या समझौता नहीं करते या किसी को गिराकर आगे नहीं निकलना चाहते। इसके साथ ही जो भी खिलाड़ी पदक जीतकर आएँ, तो बिना किसी भेदभाव के सभी को एक समान सम्मान एवं पुरस्कार प्रदान किये जाने चाहिए। अब तक देखा जाता है कि जब कोई सवर्ण खिलाड़ी कोई पदक जीतकर लाता है, तो उसे करोड़ों रुपये पुरस्कार स्वरूप दिये जाते हैं, परन्तु जब कोई निम्न या ग़रीब वर्ग का खिलाड़ी वही पदक जीतकर लाता है, तो उसे न तो उतनी पुरस्कार राशि दी जाती है, जितनी सवर्ण खिलाड़ी को मिलती है तथा न ही वो सम्मान दिया जाता है, जो सवर्ण खिलाड़ी को दिया जाता है। यह भेदभाव खिलाडिय़ों के ही नहीं, बल्कि देशवासियों के बीच भी भेदभाव की एक और खाई बना रहा है।

आज खेल जगत में ताक़तवर लोग कितने हावी हो चुके हैं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि जो खिलाड़ी जंतर-मंतर पर न्याय के लिए बैठे हैं, उनके घरों की बिजली और पानी की सप्लाई रोक दी गयी। जबकि होना तो यह उसके साथ चाहिए था, जो आरोपी है। इससे पता चलता है कि आज के दौर में हम भारतीय सत्ताओं से तब तक नहीं लड़ सकते, जब तक अधिकतर लोग एकजुट होकर इनके विरोध में खड़े न हो जाएँ। हरियाणा की महिला पहलवानों के साथ जिस प्रकार का कथित शोषण का मामला सामने आया है, उसे लेकर सत्ता पक्ष के एक भी नेता ने यह नहीं कहा है कि यह ग़लत है और इसमें निष्पक्ष जाँच होगी। बृजभूषण सिंह ने भी चुप्पी तब तोड़ी है, जब उनके सामने एफआईआर और जाँच की प्रक्रिया दिखायी दे रही है। महिला खिलाडिय़ों का आरोप है कि उन्हें धमकियाँ दी जी रही हैं।

अब दिल्ली पुलिस की जाँच टीम की जाँच सामने आने पर पता चलेगा कि सच्चाई क्या है? बशर्ते जाँच टीम पर किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए। परन्तु सवाल यह है कि क्या यह मुमकिन है? जिस पार्टी का रिकॉर्ड हमेशा अपने नेताओं को बचाने का रहा है, उस पार्टी के बड़े नेता अपने मातहतों को न बचाएँ, इस पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता, जब तक अब तक दा$गी इस पार्टी के सभी नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई न हो। रही बृजभूषण सिंह की बात, तो इस मामले में भी खिलाडिय़ों को अभी पूरा भरोसा नहीं है कि उन्हें न्याय मिल सकेगा, यही वजह है कि महिला खिलाड़ी खाप पंचायतों से अपने साथ आने की गुज़ारिश कर रही हैं।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट की वजह से खिलाडिय़ों को भरोसा है कि उन्हें न्याय मिल सकता है। देश की माँग है कि राजनीतिक ताक़त की शिकार हो चुकी महिला खिलाड़ी अब राजनीति की शिकार नहीं होनी चाहिए। अब उन्हें न्याय मिलने में राजनीति हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। क्योंकि अभी तक पार्टी द्वारा अपनी ओर से न भारतीय कुश्ती संग के अध्यक्ष पद से बृजभूषण सिंह का इस्ती$फा माँगा गया है तथा न ही अपने इस नेता की संसदीय सदस्या छीनी है। अपने पार्टी नेता के ख़िलाफ़ कोई क़दम न उठाना आरोपी के बचाव की तस्वीर को साफ़-साफ़ दर्शा रहा है। अगर नहीं, तो सवाल उठता है कि आख़िर अभी तक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने आरोपी नेता को अभी तक पार्टी से क्यों नहीं निकाला। जबकि इसी पार्टी के नेता तथा कार्यकर्ता किसी दूसरी पार्टी के नेता पर मामूली-सा आरोप लगने पर उसका इस्ती$फा माँगने लगते हैं, हंगामा खड़ा कर देते हैं तथा उसे जेल भेजने की माँग करने लगते हैं। फिर अब इतनी $खामोशी किसलिए? जबकि बृजभूषण शरण सिंह के दाऊद से रिश्तों की चर्चा भी है। आरोपी नेता की हिम्मत देखिए कि वह उन नेताओं पर भडक़ रहा है, जो खिलाडिय़ों के साथ खड़े हो रहे हैं। यह वही बृजभूषण सिंह हैं, जिन्होंने अपनी परेशानी बताने पर एक किशोर कुश्ती खिलाड़ी पर थप्पड़ों की बरसात कर दी थी।

खिलाडिय़ों के पक्ष में उतरे लोगों का कहना है कि ईमानदारी और इंसाफ़ की त$ख्ती गले में लटकाकर घूमने वाले बृजभूषण सिंह की पार्टी के नेता ऐसे मामलों पर कभी नहीं बोलते, जो उनकी पार्टी के किसी नेता के ख़िलाफ़ हों। ऐसे में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जनता के सामने आना चाहिए तथा कहना चाहिए कि बृजभूषण सिंह को कम-से-कम तब तक पार्टी से निष्कासित किया जाता है, जब तक कि वह निर्दोष साबित नहीं हो जाते। पार्टी को यह भी सार्वजनिक रूप से कहना चाहिए कि पुलिस निष्पक्ष जाँच करे, उसमें सत्ता या पार्टी की कोई दख़लंदाज़ी नहीं होगी। इसके अतिरिक्त पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को नैतिकता दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट के $फैसले की सराहना भी करनी चाहिए। साथ ही ऐलान कर देना चाहिए कि जो भी भाजपा या कार्यकर्ता बृजभूषण सिंह का साथ देगा, उसे भी पार्टी से बाहर कर दिया जाएगा। क्या भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ऐसा करने की हिम्मत दिखाएगा? इसके लिए उसे निष्पक्ष तथा ईमानदार होना पड़ेगा।

फ़सलों के भाव ने किसानों को रुलाया

कृषि प्रधान देश होने के नाते भारत की 70 फ़ीसदी आबादी रोज़गार के लिए कृषि और कृषि कार्यों पर निर्भर है। यही वजह है कि कृषि क्षेत्र सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। इसके बावजूद सरकारों पर देश के किसानों की अनदेखी का आरोप लगते रहे हैं। यह आरोप यूँ ही नहीं लगते, उसके तमाम कारण हैं। अगर देखा जाए, तो किसानों पर पड़ती चौतरफ़ा मार न उन्हें चैन से जीने देती है और न ही मरने देती है।

पिछले दिनों प्राकृतिक आपदा यानी बेमौसम की घनघोर बारिश और बेतादाद ओले पडऩे की घटना ने किसानों को ख़ून के आँसू रुलाया। इस बारिश और ओलों ने उनकी गेहूँ, सरसों व रबी की अन्य फ़सलों को बर्बाद कर दिया; लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें मुआवज़ा देने तक पर ध्यान नहीं दिया। सरकार आज तक उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी तक फ़सलों को देने के लिए कोई नियम क़ानून बनाने को तैयार नहीं है। क्या सरकार की इस ढुलमुल नीति के पीछे किसानों की फ़सलों को मुफ़्त में लूटने जैसी कोई चाल या मंशा है? यह बात मैं ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ, बल्कि इसके पीछे तथ्य हैं।

बहरहाल, केंद्र सरकार 2022 में किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा भी नहीं निभा सकी। किसानों को इस बार सरसों के उचित दाम तक नहीं मिल पा रहे हैं, जबकि केंद्र की मोदी सरकार ने ख़ुद ही पिछले साल 2021-22 में देश में सरसों का भाव 7,444 रुपये प्रति कुंतल तय किया था। लेकिन इस बार किसानों को सरसों का बढ़ोतरी के साथ यह भाव तो छोडि़ए, पुराना भाव भी नहीं मिल रहा है। इस साल किसानों को सरसों का बाज़ार भाव महज़ 4,500 रुपये प्रति कुंतल तक ही मिल पा रहा है। इस प्रकार से एक ही वर्ष में एक कुंतल पर सीधे-सीधे क़रीब 3,000 रुपये का घाटा किसानों को हो रहा है। पहले से ही बेमौसम भारी बारिश और ओले पडऩे से तबाह किसान अब अगली फ़सल बोने की तैयारी को लेकर सरसों सस्ते भाव में बेचने को विवश हैं। देखने वाली बात है कि पिछले 10 वर्षों में एक कुंतल सरसों के घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य में महज़ 2,410 रुपये की बढ़ोतरी है, जो कि बहुत कम है। दूसरी ओर जिस अनुपात में सरसों के दाम गिरे हैं, उस अनुपात में सरसों के तेल के भाव कम नहीं हुए हैं, बल्कि तेल के भाव एक बार आसमान पर जाने के बाद लगभग स्थिर बने हुए हैं। सरसों का भाव गिरने से मोटा लाभ तो बिचौलियों और व्यापारियों को ही मिल रहा है, जो कि देश के ईमानदार और मेहनती किसानों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं के साथ भी बड़ी लूट की तरह है।

साल 2017-18 में अपरिष्कृत एवं परिष्कृत पाम आयल पर आयात शुल्क 45 फ़ीसदी था तथा परिष्कृत पाम आयल पर अतिरिक्त 5 फ़ीसदी सुरक्षा शुल्क भी था, जबकि पूर्व में अधिकतम आयात शुल्क 80 फ़ीसदी तक था। इससे किसानों को पिछले वर्षों की अपेक्षा कुछ सही दाम मिले। लेकिन धीरे-धीरे घटाते हुए आयात शुल्क अक्टूबर, 2021 में शून्य कर दिया। इससे विदेशों से आने वाले पाम आयल की मात्रा बढ़ गयी। ऊपर से सरसों का तेल आयात भी 2021-22 के उपरांत बढऩा शुरू हो गया। परिणाम स्वरूप किसानों को एक कुंतल सरसों पर क़रीब 3,000 रुपये कम प्राप्त हो रहे हैं। सरसों के दाम कम होने के मुख्य कारणों में जहाँ आयात-निर्यात नीति है, वहीं केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीद न देने और कुल उत्पादन की 75 फ़ीसदी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य की ख़रीद की परिधि से बाहर करने की नीति है। सरकार ने अन्य कई प्रकार के अवरोध ख़रीद पर लगाये हुए हैं, जिनमें एक दिन में एक किसान से 25 क्विंटल से अधिक ख़रीद नहीं करना तथा वर्ष भर में ख़रीद की अवधि अधिकतम 90 दिन रखना है। इस अवधि में आने वाली छुट्टियाँ, बारदाना न होने, ख़रीद केंद्र पर सही व्यवस्था न होने, कर्मचारी आदि की हड़ताल होने के कारण ख़रीद की वास्तविक अवधि 60 से 70 दिन ही रह जाती है।

इधर, केंद्र की मोदी सरकार ने ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान’ के अंतर्गत आने वाली दलहन में से अरहर (तूर), उड़द एवं मसूर दालों की ख़रीद नीति में 31 अगस्त, 2022 को 25 फ़ीसदी की सीमा को बढ़ाकर 40 फ़ीसदी तक कर दिया; लेकिन भारी भरकम आयात ख़र्च को रोकने के लिए तिलहन में इस प्रकार की छूट नहीं दी गयी। अन्य फ़सलों की भी यही हालत है। सच तो यह है कि मोदी सरकार ने किसानों की आय पर कुल्हाड़ी चलाकर उन्हें प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान योजना से भ्रम में रखा हुआ है। इस योजना में ‘मूल्य कमी भुगतान’ का उल्लेख है, जिसके अनुसार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम प्राप्त होने पर अन्तर राशि (भावांतर भुगतान) किसानों के बैंक खातों में भेजना अपेक्षित है। इसी प्रकार इस योजना में निजी ख़रीद एवं भण्डारण की दिशा में भी पाँच वर्ष उपरांत भी कोई प्रगति नहीं है, जिसके चलते किसी भी किसान को तिलहन उपजों में घाटा होने पर उसकी भरपाई के लिए अन्तर राशि प्राप्त नहीं हुई। कहने का मतलब यह है कि यह योजना का$गज़ों की शोभा ही बनी हुई है, धरातल पर इसका कोई अस्तित्व नहीं है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा वर्ष 2015-16 में तिलहन के न्यूनतम समर्थन मूल्यों का संयोजन तेल अंश के साथ करने की अनुशंसा की थी, जिसमें सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 35 फ़ीसदी के मूल अंश के आधार पर निर्धारित किया जाना एवं 35 फ़ीसदी के तेल अंश से ऊपर प्रत्येक 0.25 फ़ीसदी बिंदु की दर पर 12.87 रुपये प्रति कुंतल जोडऩे का उल्लेख है। इसके मुताबिक, 35 फ़ीसदी तेल अंश की सरसों का वर्ष 2022-23 में न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,500 रुपये घोषित था, जबकि 48 फ़ीसदी तेल अंश की सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6,118 रुपये प्रति कुंतल घोषित किया जाना चाहिए था। इस अनुशंसा का पालन न होने से एक कुंतल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,068 रुपये कम था। इस अनुशंसा के लगने से सरसों उत्पादक किसान को प्रोत्साहन की प्रबल सम्भावना थी। लेकिन इसके विपरीत इसी आयोग द्वारा 2014-15 में तिलहन विकास के लिए पाम आयल को उच्च प्राथमिकता देते हुए वर्ष 2012 में तैयार किये गये प्रतिवेदन की आधार पर राष्ट्रीय पाम मिशन के लिए 11,040 करोड़ रुपये स्वीकृत किये गये हैं।

केंद्र सरकार का यह आचरण देश को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की घोषणा के विपरीत है। इसी का परिणाम है कि भारत में खाद्य तेलों के आयात में एक दशक में 7,60,500 करोड़ रुपये ख़र्च किये जा चुके हैं। 20 वर्षों में आयात पर ख़र्च होने वाली राशि 8,780 करोड़ रुपये से बढक़र 1,41,500 करोड़ रुपये पहुँच गयी। यह बढ़ोतरी 16.11 गुना है। वर्ष 2021-22 में दूसरे देशों को खाद्य तेल मँगाने पर 1,41,500 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इसके बाद भी केंद्र सरकार देश में उत्पादित परम्परागत खाद्य तेलों को बढ़ावा देने की बजाय पाम आयल का बाज़ार बढ़ाने में लगी है। 2022-23 में भारत सरकार की वित्त मंत्री ने तिलहन के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने एवं आयात पर निर्भरता कम करने हेतु युक्तिसंगत एवं व्यापक योजना के तहत 2025-26 तक 1.676 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बढ़ाकर 54.1 मिलियन टन उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने की चर्चा तो की; लेकिन इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किया।

किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने माँग की है कि पाम आयल को खाद्य तेलों की श्रेणी से हटाकर उसके खाद्य तेल के रूप में उपयोग करने पर प्रतिबंध लगाया जाए। आयातित खाद्य तेलों पर तत्काल रोक लगायी जाए और पाम ऑयल के आयात को सदा सर्वदा के लिए प्रतिबंधित किया जाए। देश को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में राष्ट्रीय पाम मिशन को बंद कर देश के परम्परागत खाद्य तेलों के विकास की योजना आरम्भ करे। आयात शुल्क को बढ़ाकर 300 फ़ीसदी करने की तैयारी रखी जाए, जो 100 फ़ीसदी से कम किसी भी स्थिति में न हो। प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान में 25 फ़ीसदी तक ही ख़रीद करने सहित एक दिन में एक किसान से अधिकतम 25 कुंतल तक की ही ख़रीद जैसे अवरोधों को समाप्त किया जाए। दाने-दाने की ख़रीद की नीति बनने तक तूर, उड़द एवं मसूर की 40 फ़ीसदी ख़रीद की छूट सभी दलहन एवं तिलहन फ़सलों के लिए की जाए। ख़रीद वर्ष भर चालू रखी जाए, जिससे दाने-दाने की ख़रीद हो सके। सरसों सहित सभी तिलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों का निर्धारण तेल अंश के आधार पर किया जाए। आदर्श कृषि उपज एवं पशुपालन (सुविधा एवं संवर्धन) अधिनियम-2017 के प्रारूप के अनुसार पूरे देश में आरक्षित मूल्य घोषित हो, जिससे किसानों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त हो सके। बता दें कि सरकार से सरसों का सही भाव दिलाने को लेकर उत्तर भारत के कई राज्यों के किसानों ने जंतर मंतर पर 6 अप्रैल, 2023 को सरसों सत्याग्रह किया, जिसका नेतृत्व स्वयं रामपाल जाट ने किया था।

इधर, टोंक ज़िले में एक और गाँव भी सरसों के दाम ठीक न मिलने पर आन्दोलन की राह पर है। किसान रामेश्वर प्रसाद चौधरी कहते हैं कि हमने विदेशों से खाद्य तेलों का आयात शुल्क को 100 फ़ीसदी तक करने की माँग को लेकर क्षेत्र के सांसद और विधायकों के साथ-साथ सरकारों को भी पत्र लिखने की ठानी है। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य न तो सरसों का मिल रहा है, न गेहूँ, चने और दूसरी फ़सलों का ही मिल रहा है। व्यापारी कम दाम में इन फ़सलों, ख़ासतौर पर सरसों को ख़रीदा जा रहा है, क्योंकि विदेशों से पाम ऑयल तेल मँगवाकर तिलहन किसानों की कमर तोडऩे में सरकारें ही लगी हुई हैं।

बहरहाल, सरकार ने कृषि सुधारों के अंतर्गत आदर्श कृषि उपज एवं पशुपालन (सुविधा एवं संवर्धन) अधिनियम-2017 का प्रारूप तैयार कर सन् 2018 में ही राज्यों को प्रेषित करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली। राज्यों ने आज तक इस दिशा में कोई सार्थक क़दम नहीं उठाया। अगर राज्य सरकारें इसे अमल में लातीं, तो भी शायद किसानों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाता। इससे सरसों के 5,450 रुपये प्रति कुंतल भाव मिलने के साथ-साथ दूसरी फ़सलों का भी उचित मूल्य मिलने की संभावना बनी रहती। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों की आनाकानी से ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि किसानों को अपनी उपजों को घाटे में बेचने के लिए विवश किया हुआ है। यह तो तब है, जब भारत सरकार ने संसद में निरंतर यह घोषणा की हुई है कि किसी भी किसान को उनकी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों में बेचने को विवश नहीं होने दिया जाएगा। केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को गारंटीड मूल्य बताते हुए भी नहीं थकती है। अगर सरकार वास्तव में इस व्यवस्था को सुधारकर या बदलकर वास्तव में देश के अन्नदाता के लिए कुछ करना चाहती है, तो न खाने योग्य पाम ऑयल पर तत्काल रोक लगाये। पाम आयल के प्रयोग पर रोक लगते ही स्वत: सरसों और अन्य कच्चे खाद्य तेलों के दाम बढ़ जाएँगे, जिससे किसानों को उचित व लाभकारी मूल्य मिल पाएगा। सरकार को याद रखना होगा कि हमारी कृषि अर्थव्यवस्था बढ़ाने में किसानों का बड़ा योगदान है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

बच्चों का नहीं हो रहा पूर्ण टीकाकरण

बच्चे भविष्य हैं। भविष्य उज्ज्वल हो,  परिवार, समाज, देश, दुनिया प्रगति करे, इसके लिए बच्चों का स्वस्थ रहना बहुत महत्त्व रखता है। बच्चों को स्वस्थ रखने में टीकाकरण की भूमिका अहम पायी गयी है। बच्चों के शरीर में रोग प्रतिरक्षण के वास्ते टीके लगाये जाते हैं, जिससे बच्चों के शरीर की रोग से लडऩे की शक्ति बढ़ती है। टीकाकरण से बच्चों में कई संक्रामक बीमारियों की रोकथाम होती है तथा समुदाय के स्वास्थ्य के स्तर में सुधार होता है। अध्ययन यह भी बताते हैं कि स्वस्थ बच्चा पढ़ाई में भी अच्छा करता है व बीमार बच्चों की तुलना में वह रोज़गार में भी बेहतर प्रदर्शन करता है। टीकाकरण के महत्त्व के मद्देनज़र बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ ने हाल ही में अपनी वार्षिक रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द वल्ड्र्स चिल्ड्रन’ 2023 में टीकाकरण पर फोकस किया है।

‘द स्टेट ऑफ द वल्ड्र्स चिल्ड्रन 2023 : फॉर एवरी चाइल्ड, वैक्सीनेशन’ में बाल टीकाकरण पर रोशनी डाली है। यह रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2019-2021 के दरमियान दुनिया भर में 6 करोड़ 70 लाख बच्चे टीका लगवाने से चूक गये। अध्ययन किये गये देशों में से एक-तिहाई में टीकाकरण के प्रति भरोसे में कमी पायी गयी। लेकिन भारत, चीन और मैक्सिको ऐसे देश हैं, जहाँ टीके के प्रति भरोसे बना रहा व इसमें सुधार हुआ। यह रिपोर्ट आगाह करती है कि विश्व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक चेतावनी का सामना कर रहा है। कोरोना महामारी के दौरान टीकाकरण की कवरेज में तेज़ी से गिरावट आयी, कई लाखों बच्चों को असुरक्षित स्थिति में छोड़ दिया।

कोरोना महामारी के मद्देनज़र वैश्विक स्तर पर बाल टीकाकरण की प्रगति को धक्का लगा। ग़ौरतलब है कि जो बच्चे टीकाकरण से छूट जाते हैं, वे अक्सर ग़रीब परिवारों, निम्न आय वाले देशों व दूर-दराज़ इलाक़ों और हाशिये के समुदायों से ताल्लुक़ रखते हैं। और कोरोना महामारी ने उन्हें और भी पीछे धकेल दिया। दुनिया भर में हर पाँचवाँ बच्चा ऐसा है, जिसे टीका नहीं लगा है। यानी ज़ीरो डोज या उसका पूर्ण टीकाकरण नहीं हुआ है। यानी उसकी आयु के अनुसार उसे जो-जो टीके लगने चाहिए थे, वे सभी उसे नहीं लगे हैं। हर पाँच में से एक बच्चा खसरे के प्रति असुरक्षित है, खसरा बच्चों के लिए जानलेवा है। क़रीब 8 में से 7 लड़कियों को एचपीवी नहीं लगा है, यह टीका सर्वाइकल कैंसर से बचाव करता है।

टीके हर साल 44 लाख ज़िन्दगियाँ बचाते हैं, यह आँकड़ा वर्ष 2030 तक 58 लाख तक जा सकता है, यदि टीकाकरण एंजेडा 2030 को हासिल कर लिया जाएगा। सतत विकास लक्ष्यों की सूची में यह भी शामिल है। पर इसके साथ ही यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बीते कुछ दशकों में टीकाकरण के प्रति बढ़ते प्रयासों के बावजूद ज़ीरो डोज वाले बच्चों की संख्या कम करने में बहुत कम प्रगति हुई है। प्रत्येक बच्चे तक पहुँचना एक चुनौती बनी हुई है। डॉक्टरों की राय में जब हम बच्चों को टीका नहीं लगवाते हैं, तो हम उनके जीवन और स्वास्थ्य को जोखिम में डालते हैं; साथ ही समाज की वृद्धि और विकास को भी। टीकाकरण बच्चों को बीमारियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा प्रदान करता है, वह बच्चों की स्कूल में ग़ैर-हाज़िरी को कम करता है, जिससे उसके सीखने के नतीजे भी सुधरते हैं।

यही नहीं, जब बच्चे रोगों के ख़िलाफ़ सुरक्षित रहते हैं तो उनके अभिभावकों व देखभाल करने वालों को अपना अधिक वक़्त उनकी देखभाल में नहीं व्यतीत करना पड़ता। इससे उन्हें अपने काम से बार-बार अवकाश नहीं लेना पड़ता। ख़ासकर माँओं को। परिवारों को कम भावात्मक पीड़ा का सामना करने की संभावना रहती है और कई बार बीमार बच्चे की देखभाल की भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है। बहुत-से बच्चे जो ज़ीरो डोज वाले और जिनका पूर्ण टीकाकरण नहीं हुआ है, वे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में रहते हैं। जैसे कि दुर्गम स्थनों पर, शहरी बस्तियों में जहाँ निर्माण कार्य चल रहा होता है, ग्रामीण इलाक़े ऐसे इलाक़े जो सघर्ष व संकटग्रस्त की श्रेणी में आते हो। विश्व में पाँच में से दो बच्चे, जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है; वे संघर्ष प्रभावित या कमज़ोर हालात वाले स्थानों में रहते हैं।

ये हालात टीकों को लेकर उपलब्धता, पहुँच व वहनीय क्षमता वाली चुनौतियाँ पैदा करते हैं। चुनौतियाँ निम्न व मध्य आय वाले देशों में अधिक हैं, जहाँ शहरी इलाक़ों में प्रत्येक 10 में से एक बच्चा ज़ीरो डोज वाले वर्ग में आता है, ग्रामीण इलाक़ों में यह आँकड़ा प्रति छ: बच्चों में एक है। उच्च-मध्यम आय वाले देशों में, शहरों व ग्रामीणों बच्चों में कोई अन्तर नहीं है। सबसे ग़रीब घरों में पाँच बच्चों में से एक बच्चा ज़ीरो डोज वाली श्रेणी में आता है, जबकि अमीर देशों में यह आँकड़ा 20 बच्चों में से एक का है। इस पर भी ग़ौर फ़रमाया गया कि उन बच्चों की माँएँ, जो बिलकुल पढ़ी-लिखी नहीं या कम शिक्षित हैं; उनके टीकाकृत होने की संभावना बहुत कम होती है।

यही नहीं, बहुत-से बच्चे टीकाकरण से इसलिए भी छूट जाते हैं, क्योंकि वे उन स्थानों पर रहते हैं, जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की सेवाएँ बहुत सीमित हैं या नहीं हैं। जहाँ तक भारत का सवाल है, यह रिपोर्ट कहती है कि महामारी के दौरान ज़ीरो डोज वाले बच्चों की संख्या 30 लाख होने के बावजूद भारत ने 2020 ओर 2021 के बीच इस दिशा में अच्छा काम किया और ऐसे बच्चों की संख्या 30 लाख से घटकर 27 लाख रह गयी। यह अटूट राजनीतिक प्रतिबद्धता और सरकार द्वारा शुरू किये गये साक्ष्य आधारित निरंतर कैच-अप अभियानों के कारण सम्भव हो सका है।

द स्टेट ऑफ द वल्ड्र्स चिल्ड्रन 2023 रिपोर्ट इस बात को भी रेखांकित करती है कि भारत में हर पाँचवाँ बच्चा टीकाकरण से चूका हुआ है, उस तक पहुँचने के लिए भारत को प्राथमिक स्वास्थ्य देखरेख में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी। यह रिपोर्ट स्वीकार करती है कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहाँ टीकों के प्रति सबसे अधिक विश्वास है। यह भारत के टीकों के महत्त्व को बताने व संदेह को संबोधित करने वाले प्रयासों की प्रभावशीलता को प्रदर्षित करता है। देश के टीकाकरण पर नज़र डालें, तो पता चलता है कि टीकाकरण पर विस्तारित कार्यक्रम सन् 1978 में शुरू किया गया था। इसका लक्ष्य शैश्वावस्था में कम-से-कम 80 प्रतिशत कवरेज था। टीकाकरण की सुविधा प्रमुख अस्पतालों में दी जाती थी और यह सुविधा बड़े पैमाने पर शहरी इलाक़ों तक ही सीमित थी।

सन् 1985 में इसका नाम बदलकर सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम कर दिया गया और इसका दायरा शहरों से बढ़ाकर गाँवों तक कर दिया गया। सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत हर साल देश में 2.67 करोड़ नवजात शिशुओं व तीन करोड़ गर्भवती महिलाओं को टीके लगाये जाते हैं। इस कार्यक्रम के तहत बच्चों को राष्ट्रीय स्तर पर इन बीमारियों के ख़िलाफ़ टीके लगाये जाते हैं- डिप्थीरिया, काली खाँसी, टिटनेस, खसरा-रूबेला, बचपन में तपेदिक के गम्भीर रूप से बचाव के लिए हेपेटाइटिस-बी और मेनिनजाइटिस और निमोनिया हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप-बी, रोटावायरस। पोलियो से बचाव के लिए ड्रॉप्स दिये जाते हैं। इसके अलावा जापानी इन्सेफेलाइटिस वैक्सीन भी दी जाती है; लेकिन यह उन्हीं इलाक़ों में दी जाती है, जहाँ जापानी बुख़ार बच्चों को अपना निशाना बनाता है। सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के दो प्रमुख उपलब्धियाँ 2014 में देश से पोलियो का उन्मूलन और 2015 में मातृ और नवजात टिटनेस उन्‍मूलन है। भारत के लिए पोलियो मुक्त होना एक बहुत बड़ी चुनौती थी; लेकिन राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण भारत ने यह सम्भव कर दिखाया और दूसरे देश यह देख हैरान रह गये। भारत ने बाल टीकाकरण की दर को बढ़ाने के लिए दिसंबर, 2014 में मिशन इंद्रधनुश अभियान शुरू किया और इसका उद्देश्य बच्चों की पूर्ण टीकाकरण कवरेज को 90 $फीसदी तक बढ़ाना है।

इस अभियान के तहत कम टीकाकरण कवरेज वाले क्षेत्रों और दुर्गम क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जहाँ ग़ैर-टीकाकृत और आंशिक रूप से टीकाकृत बच्चों का अनुपात सबसे अधिक है। भारत ने बाल टीकाकरण को मज़बूत करने के लिए कोल्ड चेन की क्षमता को भी सुदृढ़ किया। कोल्ड चैन उपकरणों की मरम्मत और रख-रखाव में कोल्ड चैन तकनीशियनों को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए नेशनल कोल्ड चेन ट्रेनिंग सेंटर पुणे और नेशनल कोल्ड चेन एंड वैक्सीन मैनेजमेंट रिसोर्स सेंटर नई दिल्ली में स्थापित किया गया है। इसके अलावा भारत सरकार ने यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि देश के हर सेंटर में टीके बराबर उपलब्ध रहे।

भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलिजेंस नेटवर्क प्रणाली  शुरू की है, जो संपूर्ण वैक्सीन स्टॉक प्रबंधन, उनके लॉजिस्टिक्स और तापमान ट्रेकिंग सरीखे वैक्सीन भंडारण के सभी स्तरों पर राष्ट्रीय से लेकर उप ज़िला तक डिजिटाइज करती है। देश भर में 27,000 से अधिक कोल्ड चैन हैं। टीकाकरण में भरोसा तो बना हुआ है; लेकिन इसे बनाये रखना और इस भरोसे के स्तर में वृद्धि करने के लिए प्रयासों में निरंतरता बनाये रखना ज़रूरी है।

आदिवासियों की ज़मीन पर जबरन क़ब्ज़ा

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों कहा था कि वे भू-माफ़ियाओं के लिए वज्र से भी ज़्यादा कठोर हैं। भू-माफ़ियाओं को वे ज़मीन में गाड़ देंगे। बीते नवंबर खंडवा ज़िले के पंधाना में आयोजित पेसा जागरूकता सम्मेलन में भी कहा था कि आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) की ज़मीन में गड़बड़ करने वाले और भटकाने वालों को मैं लटका दूँगा और नौकरी खा लूँगा। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ये बातें सिर्फ़ बातें हैं, इसका सच्चाई से कोई वास्ता प्रतीत नहीं होता है। क्योंकि पूरे मध्य प्रदेश के साथ-साथ ख़ुद शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र में ही आदिवासियों की ज़मीन भूमाफ़ियाओं द्वारा हड़प ली गयी है, जबकि कई आदिवासियों को अपनी ज़मीन पर आज तक क़ब्ज़ा प्राप्त नहीं हो सका है।

शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी के ग्राम पिपलिया में केशव प्रसाद गोंड की छ: एकड़ ज़मीन पर भूमाफ़ियाओं ने विगत 20 वर्षों से क़ब्ज़ा कर लिया है। केशव प्रसाद गोंड शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी के ग्राम पिपलिया के निवासी हैं तथा गोंड आदिवासी समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं। केशव प्रसाद गोंड का कहना है कि ‘बुधनी के ग्राम पिपलिया में पटवारी-हलक़ा-नंबर 19 भूमि-खसरा-नंबर 51/2, 52/2, 53, 54, 55/2, 55/4, 55/6 कुल रक़बा छ: एकड़ मेरी कृषि भूमि है। मेरे पिता शंकरलाल, जो भूमि के मूल रैयत हैं, अशिक्षित एवं किसान हैं। उन्हें क़ानूनी दाँव-पेंच की जानकारी नहीं है। इसी बात का $फायदा उठाकर सुदामा शिवहरे नामक भूमाफ़िया ने 20 वर्ष पूर्व मेरी ज़मीन हड़प ली, और उस ज़मीन पर स्कूल खोल दिया। जबकि आदिवासी की ज़मीन ग़ैर-आदिवासी नहीं ख़रीद सकता है, फिर भी सुदामा शिवहरे ने फ़र्ज़ीवाड़ा कर मेरी ज़मीन हड़प ली है। मैं अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए दर-दर की ठोकरे खा रहा हूँ। एसडीएम बुधनी ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) के तहत सुदामा शिवहरे के विरुद्ध प्रकरण पंजीबद्ध कर मेरी ज़मीन वापस दिलाने का वादा किया है; लेकिन पिछले 14 वर्षों से अभी तक मेरी ज़मीन पर मुझे क़ब्ज़ा नहीं मिला है।’

केशव प्रसाद गोंड कहते हैं कि उन्होंने अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए मध्य प्रदेश के आदिवासी विधायक डॉ. हिरालाल अलावा से विधानसभा में प्रश्न भी लगवाया; लेकिन मामला कोर्ट में लंबित बताकर कोई कार्यवाही करने से मना कर दिया गया। बुधनी विधानसभा क्षेत्र के तहसील नसरुल्लागंज के ग्राम बालागाँव, तहसील रेहटी के ग्राम नीनोर और तहसील बुधनी के ग्राम जहानपुर के कई आदिवासियों का कहना है कि उन्हें पट्टे में प्राप्त ज़मीनों पर, जिसका भू-स्वामी हक़ पट्टेधारकों के पास है, आज तक क़ब्ज़ा नहीं मिला है। जबकि पट्टेधारकों द्वारा भूमि पर क़ब्ज़ा दिलाने के लिए बार-बार आवेदन दिया जा रहा है।

रीवा ज़िले के हुजुर तहसील के ग्राम समान के वार्ड 14 की निवासी विमला कोल पत्नी स्व. जगदीश कोल जो कोल आदिवासी समुदाय से हैं; का कहना है कि ‘तहसील-हुजुर अंतर्गत ग्राम-समान में हमारी 15.39 एकड़ भूमि हमारे पूर्वज वंशा कोल एवं लुशुरु कोल पिता दमड़ी कोल के नाम पर पूर्व में दर्ज था; लेकिन कामता प्रसाद शुक्ल पिता नन्दलाल ने अधिकारियों से मिलीभगत कर उक्त ज़मीन से हमारे पूर्वजों का नाम विलोपित कर अपने नाम करवा कर क़ब्ज़ा कर लिया, जिसका पुराना ख़सरा नंबर 146, 149, 160, 161, 162, 58, 902, 170, 175 और नया ख़सरा नंबर 146, 337, 338, 339, 149, 344, 345, 347, 160, 356, 358, 359, 360, 161, 361, 362, 363, 58, 902, 107, 108, 109, 177, 400, 401, 175, 393, 394, 395, 396, 397 है।’

विमला कोल ने बताया कि यह मामला सिविल न्यायालय में एवं राजस्व न्यायालय में अपील प्रकरण क्रमांक 414 अपील/2017-18 विचाराधीन है एवं कमिश्नर महोदय ने आश्वासन दिया है कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा-170(ख) के तहत यह ज़मीन मिल जाएगी। किन्तु कामता प्रसाद शुक्ल आये दिन धमकी दे रहे हैं कि उक्त ज़मीन उनके नाम हो गयी है और मेरा घर गिरवा देंगे। जान से मारने की भी धमकी देते हैं।’

विमला कोल का कहना है कि ‘शासन प्रशासन भी भू-माफ़ियाओं के साथ मिला हुआ है। उन्होंने कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक रीवा से सुरक्षा माँगी, तो कोई सुरक्षा नहीं मिली। हमेशा हमले का ख़तरा रहता है। विधानसभा में 15 सितंबर, 2022 को राजस्व मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने उक्त ज़मीन के सम्बन्ध में ज़िला अभिलेखागार और तहसील में पुराने ख़सरा सम्बन्धी कोई डाटा उपलब्ध नहीं होना बताकर पल्ला झाड़ लिया।’

आगर मालवा ज़िले के तहसील नलखेड़ा के ग्राम गोठड़ा निवासी रामसिंह, जो भील आदिवासी समुदाय से हैं; कहते हैं कि ‘उनकी 55 बीघा ज़मीन पर गाँव के ही दबंग मगन लाल पाटीदार द्वारा जबरन क़ब्ज़ा कर अपने पुत्र कुँवर लाल, जानकी लाल, विष्णुलाल को बाँट दी गयी है। कोर्ट द्वारा आदेश दिये जाने के बावजूद भी आज तक उक्त ज़मीन को आरोपियों से क़ब्ज़ा मुक्त नहीं कराया गया है।’

फ़र्ज़ीवाड़े के अन्य मामले

जबलपुर ज़िले के चरगवां के ग्राम डोंगरझांसी में राजनीतिक प्रभाव वाले भू-माफ़ियाओं ने कई आदिवासियों की सैकड़ों एकड़ ज़मीन नक़ली आईडी बनवाकर अपने परिजनों एवं मृत व्यक्तियों के नाम पर करवा लिया है। इस मामले में एडिशनल एसपी ने जाँच के आदेश दिये हैं।

रायसेन ज़िले के ग्राम गुन्दरई नीमढाना में जीवन मुल्ला नामक एक आदिवासी व्यक्ति की मेन रोड पर चार एकड़ ज़मीन को भू-माफ़ियाओं ने जीवन मुल्ला के नाम पर फ़र्ज़ी आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज़ जैसे पैन कार्ड, बैंक पासबुक आदि बनवाकर भोपाल के एक दम्पति को ओने-पौने दामों बेंच दी। एक वायरल वीडियों द्वारा पूरे मामले का ख़ुलासा होने के बाद बीते जनवरी में रायसेन एडीएम कोर्ट ने पटवारी को सस्पेंड करने और फ़र्ज़ी दस्तावेज़ तैयार कर ज़मीन का फ़र्ज़ीवाड़ा करने मामले में संलिप्त सभी लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिये।

सागर ज़िले के बसा गाँव के निवासी वीरसींग गोंड, जो गोंड आदिवासी समुदाय से हैं, की 40 एकड़ ज़मीन कंप्यूटरीकरण मुहिम के दौरान किसी अन्य के नाम दर्ज हो गयी। ज़िले में ऐसे दर्ज़नों मामले सामने आये हैं जिसमें ज़मीन कंप्यूटरीकरण मुहिम के तहत अनुचित व्यक्तियों को कई आदिवासियों की ज़मीनों का नामांतरण हो गया, जिससे ज़मीन पर क़ब्ज़ा और मालिकाना हक़ असली मालिकों के बजाय अनुचित व्यक्तियों का हो गया है। वीरसींग गोंड समेत कई आदिवासी इस मामले की शिकायत तहसीलदार, कलेक्टर और सीएम हेल्पलाइन में कर चुके हैं; लेकिन अभी तक सुनवाई नहीं हुई।

बालाघाट ज़िले के ग्राम टेमनी निवासी हरे सिंह बैगा दिव्यांग हैं और विशेष संरक्षित बैगा आदिवासी समुदाय से हैं। बैगा आदिवासी समुदाय की ज़मीन के क्रय-विक्रय तथा भूमि अधिग्रहण पर प्रतिबंध है। लेकिन टेमनी में हरेसिंह बैगा के ज़मीन पर पुलिस विभाग जबरन क़ब्ज़ा कर पुलिस चौकी का निर्माण कर लिया है। सीधी ज़िले के तहसील गोपद बनास, ग्राम करवाही निवासी 72 वर्षीय बांकेलाल, जो मारिया आदिवासी समुदाय से हैं, का कहना है कि उन्होंने अपनी पत्नी के बीमार होने पर ग्राम-तहसील मझौली ज़िला सीधी निवासी राहुल सिंह से 50,000 रुपये उधार लिये; लेकिन राहुल सिंह ने कूटरचित कर बांकेलाल को हरिजन बताकर धोखाधड़ी से वर्ष 2012 में ग्राम करवाही में उनके स्वामित्व की भूमि ख़सरा नंबर 1055 रक़बा 0.50 हेक्टेयर ज़मीन को अपने नाम रजिस्ट्री करा ली।

आदिवासी समुदाय सबसे अधिक हाशिये पर ही नहीं, बल्कि अलग-थलग और वंचित आबादी रही है। आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से $गलत ढंग से बेदख़ल करने से रोकने एवं उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए मध्य प्रदेश के कई क़ानूनों में स्पेशल प्रावधान किये गये हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के तहत अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को उनकी भूमि से $गलत तरी$के से बेदख़ल करना अत्याचार का अपराध घोषित किया गया है। फिर भी मध्य प्रदेश में आदिवासियों को उनकी ज़मीनों अवैध ढंग बेदख़ल करने, फ़र्ज़ी नामांतरण और अवैध क़ब्ज़ा के मामले अनवरत जारी हैं।

ज़मीनों के फ़र्ज़ी नामांतरण, अवैध क़ब्ज़ा जिन मामलों में पीडि़तों ने शिकायत की है, वे मामले भी वर्षों से या तो विचाराधीन हैं या कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। कई मामलों में क़ानूनी दाँव-पेंच की जानकारी नहीं होने और अशिक्षा के कारण आदिवासी समुदाय के व्यक्ति प्रशासन तक अपनी शिकायत पहुँचाने में भी असमर्थ हैं। ऐसे में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के दावे सिर्फ़ हवा-हवाई ही प्रतीत हो रहे हैं।

झारखण्ड में चल रहा ज़मीन के फ़र्ज़ीवाड़े का खेल

एक कहावत है ‘चोर के लिए ताला क्या, बेईमान के लिए केवाला (काग़ज़ात) क्या?’ झारखण्ड में यह कहावत यथार्थ में बदल गया है। ज़मीन की हेराफेरी में मालिकाना हक़ रखने वाले को केवाला भी काम नहीं आ रहा है। राज्य के दबंग व दलाल और रिश्वतख़ोर अधिकारियों व कर्मियों की मिलीभगत से ज़मीन का फ़र्ज़ीवाड़ा सातवें आसमान पर है। ज़मीन के काग़ज़ात भी बदल जाते हैं और ख़रीद-फ़रोख़्त भी हो जाती है। ख़ास बात यह है कि इन सबको कुछ बेईमान राजनेताओं का छत्रछाया भी प्राप्त है, जिसकी वजह से कार्रवाई नहीं हो पाती।

रसूख़ इतना है कि राज्य स्तर पर जाँच के बाद मामला फाइलों में दम तोड़ देती है। इन दिनों ज़मीन के फ़र्ज़ीवाड़े की चर्चा राज्य में गर्म है। क्योंकि इसके ज़रिये मनी लॉन्ड्रिंग होने के शक में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एक केस को अपने हाथों में ले लिया। ईडी ने कार्रवाई शुरू की तो राज्य के एक आईएएस अधिकारी से लेकर अंचल कर्मचारी, बड़े-बड़े कारोबारी और ज़मीन के दलाल तक गिरफ़्त में आ रहे हैं। रांची के एक ज़मीन को लेकर शुरू की गयी कार्रवाई दूर तलक जाने की उम्मीद है। छापेमारी के बाद यहाँ केवल एक ही नहीं कई ज़मीनों का फ़र्ज़ीवाड़ा सामने आने लगा है। चर्चा है कि केवल रांची में 10,000 करोड़ रुपये के ज़मीन की फ़र्ज़ीवाड़ा के सुबूत मिले हैं। राज्य के अन्य शहरों की तो अभी चर्चा ही नहीं है।

सेना की ज़मीन भी नहीं छोड़ी

ईडी ने 13 अप्रैल को ज़मीन फ़र्ज़ीवाड़ा मामले में बड़ी कार्रवाई की। खनन घोटाले मामले के बाद इडी की यह दूसरी बड़ी कार्रवाई थी। इस कार्रवाई में रांची के पूर्व उपायुक्त (डीसी) छवि रंजन शिकंजे में आ गये हैं। वर्तमान में छवि रंजन समाज कल्याण विभाग में निदेशक के पद पर हैं। इडी ने आईएएस छवि रंजन, अंचलकर्मी भानू प्रताप, रिम्स अस्पताल कर्मी अफ़सर अली ख़ान समेत ज़मीन के दलाली करने वालों के झारखण्ड, बिहार और पश्चिम बंगाल में 22 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की।

इन जगहों से ज़मीन से जुड़े ऐसे काग़ज़ात मिले जिन्हें देख कर अधिकारी भी चौंक गये। केवल अंचलकर्मी के घर से ही बड़े-बड़े बक्सों में ज़मीन से जुड़े दस्तावेज़ मिले। इडी ने रांची के बरियातू स्थित सेना के क़ब्ज़े वाली 4.55 एकड़ ज़मीन की ख़रीद-बिक्री मामले में यह कार्रवाई की थी, पर छापेमारी में कई ऐसे दस्तावेज़ मिले जो फ़र्ज़ीवाड़ा की जड़ कितनी गहरी है, इसकी जाँच में इडी को सम्भवत: महीनों लगे।

रंजन से पूछताछ, सात गिरफ़्ता

ईडी ने छापेमारी के बाद अंचलकर्मी भानु प्रताप, रिम्सकर्मी अफ़सर अली ख़ान समेत सात लोगों को गिरफ़्तार किया। इन लोगों से पूछताछ हुई। अफ़सर अली ख़ान रिम्स का एक मामूली कर्मचारी है। जानकारी के अनुसार, ज़मीन के फ़र्ज़ी काग़ज़ात बनाना अफ़सर अली के बाएँ हाथ का खेल है। उसकी ज़िला प्रशासन और अंचल कार्यालय में गहरी पैठ है। उसने इसके ज़रिये अकूत संपत्ति कमायी है।

इन सात लोगों से पूछताछ और ज़ब्त काग़ज़ात की जाँच हुई तो रांची ज़िला प्रशासन की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गयी। ईडी ने तत्कालीन डीसी छवि रंजन को पूछताछ के लिए तलब किया। उनसे 24 अप्रैल को 10 घंटे पूछताछ हुई। छवि रंजन को अपने और परिवार के अन्य सदस्यों का ब्योरा लेकर 01 मई को फिर ईडी कार्यालय बुलाया गया है। उनसे फिर पूछताछ होगी। चर्चा है कि उनकी अगर गिरफ़्तारी होती है, तो आश्चर्य की बात नहीं होगी।

एक टिप्पणी से फँसे पूर्व डीसी

सूत्रों के मुताबिक, तत्कालीन डीसी छवि रंजन ने प्रदीप बागची नामक व्यक्ति द्वारा दिये गये आवेदन को पर सेना की ज़मीन सम्बन्धित रिपोर्ट सर्किल ऑफिसर (सीओ) से माँगी थी। सीओ ने सीआई भानू को जाँच कर रिपोर्ट देने को कहा। सीआई की रिपोर्ट के आधार पर छवि रंजन ने मौखिक रूप से तत्कालीन सब रजिस्ट्रार घासीराम पिंगुवा को उस ज़मीन की रजिस्ट्री कोलकाता के जगतबंधु टी एस्टेट प्रा. लि. के निदेशक दिलीप कुमार घोष के नाम करने का निर्देश दिया। सब रजिस्ट्रार ने ख़ुद को बचाने के लिए निबंधन के दौरान सेल डीड पर लिख दिया कि उपायुक्त सह ज़िला दंडाधिकारी को संबोधित अंचल अधिकारी बडग़ाईं, रांची के ज्ञापांक 847, दिनांक 25 सितंबर, 2021 के आलोक में निबंधन की स्वीकृति दी जाती है। यही टिप्पणी छवि रंजन के लिए काल बन गयी।

दूसरे राज्य में बनते थे काग़ज़

सूत्रों की मानें, तो ईडी को रांची में अरबों की ज़मीन की ख़रीद बिक्री में गड़बड़ी और उससे मनी लांड्रिंग के साक्ष्य मिले हैं। अधिकतर काग़ज़ात कोलकाता से बनवाये जाते थे। अंचलकर्मी के यहाँ छापामारी में कोलकाता रजिस्ट्री ऑफिस के दो फ़र्ज़ी स्टांप भी मिले। वहीं, इस मामले में गिरफ़्तार प्रदीप बागची द्वारा पेश दस्तावेज़ में बताया गया है कि 4.55 एकड़ ज़मीन को उसके पिता ने 1932 में ख़रीदी थी और इसकी रजिस्ट्री कोलकाता में हुई थी। इस दस्तावेज़ में राज्य का उल्लेख पश्चिम बंगाल के रूप में है, जबकि 1932 में राज्य का नाम बंगाल था।

पश्चिम बंगाल 1947 में अस्तित्व में आया। इसी तरह दस्तावेज़ में कई जगहों पर गवाहों, विक्रेता और क्रेता के पते के साथ पिन कोड का उल्लेख किया गया है। उस समय पिन कोड का अस्तित्व ही नहीं था। पोस्टल इंडेक्स नंबर (पिन) की शुरुआत 15 अगस्त, 1972 को हुई थी। दस्तावेज़ में एक गवाह का स्थायी पता भोजपुर ज़िला बताया गया है, जबकि बिहार के इस ज़िले की स्थापना 1972 में हुई। ईडी इन दस्तावेज़ों का फोरेंसिक जाँच भी करवा रही है।

खुलेंगे फ़र्ज़ीवाड़े के और मामले

ईडी ज़ब्त काग़ज़ात को देख रही है। आईएएस छवि रंजन से पूछताछ की गयी। अन्य छ: आरोपियों को रिमांड पर लेकर पूछताछ चल रही है। सूत्रों की मानें, तो रांची में केवल सेना की 4.55 एकड़ ज़मीन ही नहीं, कई अन्य ज़मीनों के फ़र्ज़ीवाड़े के सुबूत मिले हैं, जिनमें ओरमांझी के मनातू का वाटर पार्क, हेहल अंचल के बग़ल में बड़ा भूखंड, चेशायर होम रोड स्थित भूखंड समेत कई अन्य जगहों के बड़े भूखंड शामिल हैं। ईडी की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, इनका ख़ुलासा होगा। इसमें झारखण्ड के ही नहीं बिहार और बंगाल तक के बड़े व्यवसायी, बिल्डर और सफ़ेदपोश ज़द में आएँगे।

दूसरे शहरों में भी चल रहा खेल

झारखण्ड बनने के बाद यहाँ ज़मीन का कारोबार सबसे अधिक फला-फूला। मोहल्ले के बेरोज़गार युवा से लेकर प्रशासन और सरकार के ऊँचे स्तर तक के लोग और बड़े व्यवसायी तक इस कारोबार में शामिल हो गये। पहले यह कारोबार लुके-छिपे तरीक़े से चलता था; लेकिन जब प्रभावशाली लोग इसमें शरीक़ होने लगे, तो फिर यह पूरा खेल बेपर्दा हो गया। हालत यह हो गयी कि पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और जवान भी इस कारोबार से जुड़ कर अंधाधुंध कमायी करने लगे। बाक़ायदा पुलिस बल की मदद से ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है। प्रभावशाली और पैसे वाले लोग फ़र्ज़ी दस्तावेज़ तैयार कर ज़मीन ख़रीदने-बेचने लगे। जिन पर काग़ज़ात तैयार करने की तैयारी थी, उन्हीं की मदद से फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनने लगे। कारोबारियों-दलालों की नज़र सरकारी ज़मीन पर भी पड़ी। देखते-ही-देखते सरकारी ज़मीन का भी सौदा बे-रोकटोक चलने लगा।

राज्य सरकार के आँकड़े बताते हैं कि झारखण्ड में अब तक क़रीब 20,000 एकड़ सरकारी ज़मीन बेची जा चुकी है और इन पर कंक्रीट की इमारतें खड़ी हो गयी हैं। इस 20,000 एकड़ में जंगल भी थे, नदियाँ और तालाब भी थे और पहाड़ भी थे। इन प्राकृतिक संपदाओं का अस्तित्व ही ख़त्म हो गया। रांची, देवघर, हज़ारीबाग़, गिरिडीह, कोडरमा, लोहरदगा, गुमला और बोकारो जैसे ज़िलों में तो इस कारोबार में रसूखदार लोगों ने सक्रिय भूमिका निभायी। ऐसा नहीं है कि यह सारा धंधा चोरी-छिपे हुआ। चूँकि इस कारोबार में पहुँच वाले लोग शामिल थे, इसलिए गड़बडिय़ों की जाँच के आदेश दिये गये; लेकिन वास्तविक जाँच नहीं हुई। यदि हुई भी, तो फिर रिपोर्ट को ही कहीं दबा दिया गया। सेना की ज़मीन के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इस मामले में नगर निगम द्वारा थाने में एफआईआर कराया गया था। आयुक्त ने अपनी रिपोर्ट में फ़र्ज़ीवाड़े की बात लिखी। इसके बावजूद बे-रोकटोक सेना की ज़मीन का कारोबार चलता रहा।

जाँच से लोगों को उम्मीद

द्वापर से कलयुग तक भारतीय जन मानस में ज़मीन का बहुत महत्त्व रहा है। महाभारत का युद्ध ज़मीन को लेकर हुआ। आधुनिक युग में भारत का अपने पड़ोसियों से सीमा विवाद भी ज़मीन को लेकर ही है। काली कमायी का एक बड़ा हस्सा प्रापर्टी पर ही लगाते हैं। आम लोग ज़मीन को मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा से जुड़ा मानते हैं। नतीजतन ईडी की जाँच से लोगों में एक नयी उम्मीद जगी है।

जमीन फ़र्ज़ीवाड़ा के ख़ुलासे के बाद भारी संख्या में लोग आवेदन देने ईडी कार्यालय पहुँच रहे हैं। कई लोगों ने अलग-अलग ज़मीनों के फ़र्ज़ीवाड़ा का आवेदन दिया है। अब देखना है कि ईडी की जाँच किस दिशा में और कितनी दूर तक जाती है। ज़मीन के फ़र्ज़ीवाड़े की ज़द में कौन-कौन से नेता, अधिकारी और कारोबारी आते हैं। इस कारोबार में किन बड़े रसूखदार लोगों का पर्दे के पीछे का खेल है। अगर इन सब का ख़ुलासा हुआ, तो निश्चय ही लोगों को राहत महसूस होगी।

क्या भारतीय संस्कृति के लिए ख़तरा है समलैंगिक विवाह?

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

क्या समलैंगिक विवाह उचित है? कहीं यह सभ्य समाज के लिए अभिशाप तो नहीं? समाज में कुरीतियों से बिगाड़ ही होता है। इससे भावी पीढ़ी के भटकने का डर रहता है। भारतीय संस्कृति समलैंगिक विवाह के विपरीत है। यहाँ मनुष्यता की परिभाषा सामाजिक तथा प्रकृति के अनुरूप है। परन्तु जो लोग समलैंगिक विवाह तथा समलैंगिक सम्बन्धों की वकालत कर रहे हैं, उनका क्या? उन्हें कौन और कैसे समझाए? न तो समलैंगिक विवाह से वैवाहिक जीवन का सही निर्वाह हो सकता है और न ही इससे जीवन भर के रिश्ते को वह आनंद तथा सन्तुष्टि हासिल हो सकती है, जिसकी इच्छा से विवाह किया जाता है। समलैंगिक विवाह में अभी तक देखा गया है कि प्रेम विवाह का विरोध करने वाले लोग भी इसके विरोध में नहीं बोल रहे हैं। वेलेंटाइन-डे पर पार्कों में प्रेमी जोड़ों से अभद्रता करने वाले संगठन समलैंगिक विवाह तथा समलैंगिक सम्बन्धों पर शुरू से ही $खामोश हैं। कुछेक ने इसका विरोध किया है, परन्तु दबी ज़ुबान से। सही में तो सामाजिक संगठनों को किसी सामाजिक मामले में क़ानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, परन्तु ऐसा खुलकर होता है, जिस पर कोई नहीं बोलता।

इन दिनों विवाह को क़ानूनी मान्यता देने की माँग वाली याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। इससे पहले समलैंगिक सम्बन्धों के लिए बाक़ायदा कई बार सोशल मीडिया पर एक मुहिम चल चुकी है। कई जगह इसके समर्थन और विरोध में प्रदर्शन हुए हैं। अब मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ समलैंगिक विवाह वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इस पीठ में पाँच न्यायाधीश हैं- मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायाधीश संजय किशन कौल, न्यायाधीश एस. रवींद्र भट, न्यायाधीश पी.एस. नरसिम्हा तथा महिला न्यायाधीश हिमा कोहली।

समलैंगिक विवाह की पहली सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन याचिकाओं पर कई प्रश्न खड़े किये हैं। तुषार मेहता ने कहा कि पहले तो यही तय किया जाना चाहिए की इन याचिकाओं पर सुनवाई करनी चाहिए अथवा नहीं? सॉलिसिटर की इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पहले इस मामले को समझने के लिए वह याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनकर ही फ़ैसला लेंगे। इस पर सॉलिसिटर तुषार मेहता ने कहा कि यह मामला पूरी तरह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। सरकार ने इस पर एक आपत्ति-आवेदन दिया है कि क्या इस मामले में न्यायालय दख़ल दे सकते हैं या यह केवल संसद का एकाधिकार है? इसलिए समलैंगिक विवाह पर संसद को फ़ैसला लेने दीजिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हम इंचार्ज हैं तथा हम तय करेंगे कि किस मामले पर सुनवाई करनी है और किस तरह करनी है। पहले याचिकाकर्ताओं की बात सुनी जाएगी।

केंद्र सरकार को जब जवाब देने का मौक़ा मिलेगा, तब वह अपनी बात रखे। इस पर केंद्र सरकार के सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह कोई ऐसा विषय नहीं है जिस पर पाँच विद्वान बैठकर कुछ लोगों की माँग पर पूरे समाज के बारे में फ़ैसला कर दें। सर्वोच्च न्यायालय विवाह की नयी संस्था नहीं बना सकता। यहाँ मौज़ूद कुछ विद्वान वकील और न्यायाधीश पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करते। हम नहीं जानते हैं कि दक्षिण भारत का एक किसान या पूर्वी भारत का एक व्यापारी इस पर क्या सोच रहा है? परन्तु इस सवाल पर अगर विचार करने के लिए संसद ही सही जगह है।

स्पष्ट तौर पर केंद्र सरकार की ओर से पाँच विद्वानों वाली यह टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर थी, जिसका एक अर्थ यह भी है कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को भी मामले पर सुनवाई करने से सीधे-सीधे मना तो किया ही है, यह भी कहने का प्रयास किया है कि सर्वोच्च न्यायालय को हर मामले में फ़ैसला देने का अधिकार नहीं है, जो कि न्यायपालिका के हनन की ओर इशारा करता है।

विदित हो कि समलैंगिक विवाह के समर्थक याचिकाकर्ताओं ने समानता और सम्मान से जीवन जीने के अधिकार का हवाला देते हुए देश के सर्वोच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने की माँग की है। परन्तु केंद्र सरकार ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद भी समलैंगिक विवाह वाली याचिका के विरोध में है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के वकील कपिल सिब्बल की दलील है कि विवाह से जुड़े क़ानून संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं। इसलिए इस मामले में राज्य सरकारों को भी सुना जाना चाहिए। वहीं समलैंगिक विवाह के पक्ष में याचिका दाख़िल करने वाले लोगों की तरफ़ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी, अभिषेक मनु सिंघवी, मेनका गुरुस्वामी और के.वी. विश्वनाथन मुक़दमा लड़ रहे हैं। समलैंगिक विवाह के समर्थकों के मुख्य वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में दो लोगों के बीच विवाह की बात कहीं गयी है, जिसे स्त्री या पुरुष की ही शादी के तौर पर देखना ज़रूरी नहीं है। क़ानून की हल्की व्याख्या से समलैंगिक जोड़ों को राहत मिल जाएगी। पिछले सौ वर्षों में विवाह की व्यवस्था में बहुत बदलाव आया है। बाल विवाह, बहु-विवाह बंद हुआ है। रोहतगी ने दलील दी कि 31 देशों ने समलैंगिक विवाह को मान्यता दे रखी है। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत में भी प्रगतिशील नज़रिये को बढ़ावा दिया जाए।

वहीं वकील मेनका गुरुस्वामी की दलील है कि समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता न मिलने से समलैंगिक जोड़े अनेक क़ानूनी अधिकारों से वंचित हैं। जैसे कि वे जिस पार्टनर के साथ ज़िन्दगी बिता रहे हैं, उसके नाम वसीयत नहीं कर सकते। उसे अपने बैंक अकाउंट में नॉमिनी नहीं बना सकते। उसका जीवन बीमा नहीं करा सकते। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से निवेदन किया कि माननीय न्यायालय को इन बातों पर विचार करना चाहिए। इस पर पीठ के सदस्य न्यायाधीश संजय किशन कौल ने कहा कि मामले में स्पेशल मैरिज एक्ट के दायरे में ही बहस करना सही होगा। धर्मों के निजी क़ानून समलैंगिकता को ग़लत मानते हैं। इसलिए स्पेशल मैरिज एक्ट के ज़रिये समाधान निकालने की कोशिश बेहतर रहेगी।

विदित हो अब तक कुल 34 देशों में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने पर सुनवाई हो चुकी है, परन्तु इनमें से 23 देशों ने समलैंगिक विवाह पर क़ानून बनाकर इसे वैध क़रार दिया है। सन् 2001 में नीदरलैंड ने दुनिया में पहली बार समलैंगिक विवाह को वैध क़रार दिया। इसके बाद एशियाई देशों में ताइवान ऐसा पहला देश है, जिसने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता दे रखी है। वहीं जापान ने इसे मान्यता नहीं दी है। कुछ देशों में समलैंगिक रिश्ते बनाने पर ही भयंकर सज़ा का प्रावधान है।

इन देशों में भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, मॉरिटानिया में शरिया क़ानून के तहत और अफ्रीकी देश युगांडा में वहाँ के क़ानून के तहत समलैंगिक सम्बन्ध बनाने वालों को सज़ा-ए-मौत की सज़ा देने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त 29 अन्य देशों में भी समलैंगिक रिश्तों पर प्रतिबंध है। ईरान, सोमालिया और उत्तरी नाइजीरिया के कुछ हिस्सों में भी समलैंगिक सम्बन्धों पर यही सज़ा है। इसके अलावा 71 अन्य देशों में समलैंगिक तथा अप्राकृतिक सम्बन्धों के ख़िलाफ़ क़ानून बने हुए हैं। ऐसा करने पर इन देशों में जेल की सज़ा का प्रावधान है। वहीं कुछ देशों में जेल या मौत की सज़ा में कोई भी सज़ा दी जा सकने वाले क़ानून हैं।

सन् 2018 से पहले आईपीसी की धारा-377 के तहत भारत में भी समलैंगिक सम्बन्ध अपराध था। इस पर याचिका डाली गयी और सितंबर, 2018 में सर्वोच्च न्यायालय की पाँच न्यायालयों की पीठ ने इस क़ानून को ख़त्म कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने इसमें फ़ैसला सुनाया कि अब कोई भी भारत में समलैंगिक सम्बन्धों के ख़िलाफ़ थाने में अथवा किसी न्यायालय में मुक़दमा दर्ज नहीं करा सकता, क्योंकि अगर दो बालिग़ लोग आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाते हैं, तो यह अपराध नहीं माना जाएगा। समलैंगिक रिश्तों को मान्यता मिलने के बाद अब इसका समर्थक समुदाय समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता दिलाने की कोशिश कर रहा है, जिसकी मुखालिफ़त सीधे-सीधे केंद्र सरकार कर रही है। अभी समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता नहीं है, परन्तु इससे पहले ही समलैंगिक रिश्तों के अनेक पक्षधरों ने भारत में समलैंगिक विवाह कर लिये हैं। इनमें से कई विवाहों में तो परिवार तथा समाज के लोग ख़ुशी-ख़ुशी शामिल हो चुके हैं।

देखना होगा कि समाज में इन अप्राकृतिक विवाहों को किस नज़रिये से देखा जाएगा तथा सर्वोच्च न्यायालय इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है। मनुष्य मनोविज्ञान की अगर बात करें, तो इस पर पक्ष-विपक्ष दोनों पर विचार रखने वाले मिल जाएँगे, सबकी अपनी-अपनी दलीलें भी हैं। परन्तु अगर भारतीय समाज, संस्कृति तथा मनुष्यता की दृष्टि से देखें, तो यह अजीब और ग़लत ही है। क्योंकि अगर इस तरह किसी भी काम में सही-ग़लत का फ़र्क़ ही ख़त्म कर दिया जाएगा, तो फिर सब कुछ जायज़ ही हो जाएगा। फिर वैध तथा अवैध क्या रह जाएगा?