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पतंजलि फूड्स ने अपने प्रीमियमाइजेशन ड्राइव के अंतर्गत 14 नए उत्पाद किए पेश, 2023 में 31 हजार करोड़ तक पहुंचा राजस्व

पतंजलि  ने फूड्स लिमिटेड अपने प्रीमियमाइजेशन ड्राइव के अंतर्गत उपभोक्ताओं के लिए न्यूट्रास्यूटिकल्स, हेल्थ बिस्कुट, न्यूट्रेला के बाजरे से बने उत्पाद और प्रीमियम सूखे मेवों में नए उत्पादों का लॉन्च किया। बाबा रामदेव के मार्गदर्शन वाली कंपनी पतंजलि ने हर्बल उत्पादों में अपनी विशेषज्ञता और भारतीय उपभोक्ता बाजार की गहरी समझ के आधार पर विभिन्न उपभोक्ता क्षेत्रों के लिए कुल 14 नए उत्पाद पेश किए हैं। प्रीमियमाइजेशन ड्राइव के हिस्से के रूप मं तीन नए बिस्कुट लॉन्च किए हैं इनमें रागी बिस्कुट, 7-ग्रेन बिस्कुट और डाइजेस्टिव बिस्कुट इत्यादि शामिल है।

दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के स्पीकर हॉल में शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए बाबा रामदेव ने कहा कि, “योग धर्म के माध्यम से आज सनातन धर्म को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली है। स्वावलंबन आत्मनिर्भरता के लिए हेल्थ में भी स्वावलंबी बने, वेल्थ में स्वावलंबी बने और ब्रांड्स में भी स्वावलंबी बने हैं। क्योंकि कब तक विदेशियों की जूठन चाटते रहेंगे और उनसे लूटते रहेंगे। और विज्ञान की सदी में इतना गहरा अज्ञान फैल सकता है चलाया जा सकता है। यह मॉडर्न मेडिकल साइंस ने करके दिखाया है। माने पूरा डब्ल्यूएचओ से लेकर मेडिकल सिस्टम तक सारे साइंटिस्ट मॉडर्न वर्ल्ड के ये मानते हैं कि लिवर, किडनी, हार्ट, लंग्स, स्किन और सेल्स को आप रिजूवनेट नहीं कर सकते। रिसर्च और एविडेंस बेस्ड मेडिसिन बना करके योग और पंचकर्म, सत्कर्म,सात और ज्ञाप परंपरा के आधार पर आर्थिक और राजनीतिक साम्राज्य ध्वस्त तो रोज होते रहते है। लेकिन बड़ा साम्राज्य आर्थिक और राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक होता है। हमने अपने पूर्वजों से जो योग, आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान पाया है उसके बल पर ये करके दिखाया है। जो डब्ल्यूएचओ नही कर पाया हमने वो करके दिखाया है। तो रिजुविनेशन के लिए योग आया।“

बाबा रामदेव ने कहा कि, “लगभग दो दशकों से आप सभी साक्षी हैं जब एक दशक पहले मैंने यहीं से कहा था कि हम पतंजलि का 10 हजार करोड़ का टर्नओवर करेंगे तब कई लोगों ने यह सोचा होगा कि बाबा कुछ ज्यादा ही बढ़ बोला है। जब मैंने कहा कि हम 20000 करोड़ का टर्नओवर करेंगे और यूनीलीवर को भी टक्कर देंगे और 1 दिन यूनिलीवर से भी बड़ी कंपनी होंगे तब कई लोगों ने हमें हमारी हैसियत में रहने के लिए कहा था। लेकिन आज मुझे यह कहते हुए फक्र है कि हम पतंजलि का ग्रुप टर्नओवर लगभग 45000 करोड़ रुपए के आसपास पहुंच चुका है यह एक सन्यासी ने आर्थिक साम्राज्य को उपयुक्त प्रयोग करके समृद्धि को सेवा के लिए खड़ा किया जा सकता है इसका विश्व कीर्तिमान पतंजलि ने किया है आज 31000 करोड़ रुपए से ज्यादा का टर्नओवर है। आज पतंजलि फूड पूरे विश्व की फूड, एग्रीकल्चर और एफएमसीजी की एक सबसे बड़ी कंपनी बनने की ओर अग्रसर हैं। विदेशी कंपनियों में केवल यूनीलीवर हमसे आगे है बाकी सबका हमने बड़े प्यार से सिरसासन कराया है बहुतों का तो मोक्ष भी हो चुका है। लेकिन हम सबका कल्याण चाहते है और अब नए संकल्पों के साथ सबको स्वास्थ्य और समृद्धि मिले सब रोग मुक्त और नशा मुक्त हो सब खुशहाल हो ये हमने करके दिखाया है। आप पतंजलि से पांच लाख लोगों की रोजी रोटी चल रही है। आज दुनिया में दोसो करोड़ लोगो तक हमारी रीच है। और भारत में आधे से ज्यादा आबादी को हमने कस्टमाइज किया है।“

उन्होंने आगे कहा कि, “हमने गुरुकुल में पढ़ करके सनातन संस्कृति के बल पर, सत्य, सात्विक, के बल पर जो काम किया है आज पूरी दुनिया में उदाहरण बना है। इससे आगे हमारा लक्ष्य है की अभी हम सत्तर करोड़ भारतीयों तक पहुंच चुके है और सौ करोड़ से ज्यादा भारतीयों तक पहुंचने का हमारा लक्ष्य है।”

विश्व में बढ़ रही बुजुर्गों की संख्या

विश्व की आबादी 8 अरब है। आबादी के संदर्भ में भारत 1.4 अरब से अधिक आँकड़ों के साथ विश्व में पहले नंबर पर पहुँच चुका है। उसके बाद चीन और फिर अमेरिका का नंबर आबादी के मामले में आता है। दुनिया भर में लोग अब पहले की तुलना में अधिक जी रहे हैं। आज अधिकांश लोग 60 या इससे अधिक जीने की अपेक्षा कर सकते हैं। दुनिया में प्रत्येक देश अपने-अपने यहाँ आबादी में बुजुर्ग लोगों की संख्या में बढ़ोतरी का अनुभव कर रहा है।

दुनिया में 2030 तक हर छठा व्यक्ति 60 साल या इससे अधिक आयु का होगा। 2050 तक ऐसे लोगों की संख्या 2.1 अरब होगी। और 80 साल या इससे अधिक आयु के लोगों की संख्या 2020 से 2050 के दरमियान 426 मिलियन तक होने की उम्मीद है। कहने का तात्पर्य है कि विश्व में जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है। जीवन प्रत्याशा एक व्यक्ति के औसत जीवन-काल का अनुमान है। जीवन प्रत्याशा भौगोलिक क्षेत्र और युग के अनुसार भिन्न होती है। किसी विशेष व्यक्ति या जनसंख्या समूह के लिए जीवन प्रत्याशा उनकी जीवन शैली, स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच, आहार, आर्थिक स्थिति और प्राकृतिक मृत्यु-दर जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।

ग़ौरतलब है कि बूढ़ी होती जनसंख्या विश्व के देशों के लिए एक चुनौती भी है। ऐसी आबादी के स्वास्थ्य सम्बन्धित समस्याओं को लेकर सभी देश चिन्तित हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट इस बाबत जारी की गयी है। मैकेंजी हेल्थ इंस्टीट्यूट ने भारत समेत 21 देशों में 55 साल से ऊपर के 21,000 लोगों पर दिसंबर, 2022 से फरवरी, 2023 के बीच एक सर्वे कराया। इस सर्वे में इस आयु वर्ग के लोगों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आध्यात्मिक सेहत पर अधिक फोकस किया गया। इस सर्वे के नतीजों के अनुसार, भारत बेशक एक विकासशील देश है; लेकिन यहाँ के बुजुर्ग अमीर देशों के मुक़ाबले सबसे अधिक सेहतमंद हैं। इस संदर्भ में भारत के बुजुर्ग अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान से बेहतर हैं। भारत में 55 साल से ऊपर के 57 प्रतिशत लोग शारीरिक स्तर पर, 66 प्रतिशत लोग मानसिक स्तर पर, 63 प्रतिशत लोग सामाजिक स्तर पर और 69 प्रतिशत लोग आध्यात्मिक रूप से ख़ुद को स्वस्थ मानते हैं।

आँकड़े बताते हैं कि भारत में 55 साल से ऊपर के लोग शारीरिक से अधिक मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सेहत को तरजीह देते हैं। अमेरिका में 40-52 प्रतिशत और चीन में 44-51 प्रतिशत बुजुर्गों ने ही माना ही कि वे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हैं। यह सर्वे इस बात को भी सामने रखता है कि उम्र बढऩे के साथ-साथ स्वास्थ्य के सभी पैमानों पर ध्यान देना कम होता जाता है। उदाहरण के तौर पर 38 प्रतिशत लोग शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति अधिक लापरवाह हो जाते हैं। 55 से 64 की उम्र वाले मानसिक स्वास्थ्य और 65 से ऊपर की आयु वाले आध्यात्मिक स्वास्थ्य का अधिक ध्यान रखते हैं।

इस सर्वे के अनुसार, भारत जैसे देशों में बच्चों के साथ रहने वाले बुजुर्गों की सेहत 19 प्रतिशत तक बेहतर रहती है। वहीं चीन और अमेरिका में ऐसे बुजुर्गों के स्वास्थ्य में 2-5 प्रतिशत तक की वृद्धि दिखी। इस सर्वे में शामिल 80 प्रतिशत बुजुर्ग बढ़ती उम्र के साथ ही अपने घरों में रहना चाहते हैं। लेकिन इसके साथ ही उन्हें यह भी लगता है कि इससे उनकी आज़ादी छिन जाएगी। उच्च आय वाले देशों में 80 से ऊपर की आयु वाले 88 प्रतिशत बुजुर्ग अपनी ज़िन्दगी में कोई दख़लंदाज़ी नहीं चाहते। उच्च-मध्यम आय वाले देशों में यह संख्या 73 प्रतिशत तो निम्न-मध्यम आय वाले देशों में इनकी संख्या 63 प्रतिशत तक है। सर्वे में शामिल सभी देशों में बुजुर्गों की नौकरी करने की चाह को लेकर लगभग एक जैसी स्थिति ही सामने आती है। 55 से 64 साल के दो-तिहाई लोग काम करना चाहते हैं। विश्व में बूढ़ी होती आबादी को लेकर नीति-निर्माता भी फ़िक्रमंद हैं। मानव ज़िन्दगी में यह गंभीर जनसांख्यिकीय बदलाव है। एक तरफ़ इंसान को ख़ुश होना चाहिए कि उसकी जीवन-प्रत्याशा सन् 1960 से बढ़ रही है; लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी अहम है कि उसकी ज़िन्दगी की गुणवत्ता कैसी होगी।

राष्ट्र सरकारों, समाज के समक्ष इस संदर्भ में कई चुनौतियाँ खड़ी हैं। अगर कोई भी राष्ट्र, समाज व परिवार चाहता है कि उसके यहाँ के बुजुर्ग स्वस्थ रहें, अर्थव्यवस्था पर बोझ नहीं बनें, समाज बीमार लोगों का समाज नहीं बने, तो कई पहलुओं पर एक साथ काम करने की ज़रूरत है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बुजुर्ग आबादी के लिए विशेष निवेश करना होगा। लोग स्वस्थ तरी$के से बूढ़े होने की प्रक्रिया में प्रवेश करें, इस बाबत जागरूकता अभियान चलाना। जिस तरह से बूढ़े लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, उस अनुपात में उनकी देखभाल की ज़रूरतों के लिए सरकारी व सामाजिक ढाँचे को विकसित करना होगा। सन् 1950 में 65 साल से अधिक उम्र के प्रति इंसान पर कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या 11.7 थी। आज यह संख्या सिकुडक़र 8 हो गयी है और 2040 तक 4.4 रह जाएगी।

इटली, जापान व दक्षिण कोरिया ऐसे देश हैं, जहाँ तेज़ी से जनसंख्या बूढ़ी हो रही है। कामकाजी उम्र के लोगों की कम होती तादाद के मद्देनज़र जापान में बुजुर्ग लोगों को फिर से श्रमबल का हिस्सा बनाने के लिए ख़ास योजनाएँ शुरू की गयी हैं। 65 साल से अधिक आयु के स्वस्थ व किसी-न-किसी तरह से जुड़ी पीढ़ी में दुनिया भर में व्यापक स्तर पर योगदान देने की क्षमता है, चाहे वह पेशे से सम्बन्धित क्षेत्र हो या निजी या सामुदायिक स्तर पर कोई काम हो। उदाहरण के लिए अमेरिका में 50 साल से अधिक आयु वर्ग के लोग 2030 तक देश की अर्थव्यवस्था में क़रीब 12.6 ख़रब डॉलर का योगदान करेंगे। ऐसा अनुमान है कि ब्रिटेन में अगर कामकाजी ज़िन्दगी में एक साल और जोड़ दिया जाए, तो जीडीपी में क़रीब एक प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। एक पहलू यह भी है कि बुजुर्गों को आर्थिक व सामाजिक गतिविधियों में सम्मिलित करने से बाज़ार में उनकी ज़रूरतों और आराम व मनोरंजन के लिए नये उपकरण तैयार होंगे। ऐसे उपकरणों के समांतर ही विश्व में बुजुर्ग सम्बन्धित बीमारियों पर क़ाबू पाना भी एक बड़ी चुनौती है। न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों का समस्या बढ़ सकती है।

ऐसा अनुमान है कि 2050 तक विश्व में 15 करोड़ लोग डिमेंशिया से पीडि़त होंगे। डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश रोग दिमाग़ की क्षमता का निरंतर कम होना है। यह दिमाग़ की बनावट में शारीरिक बदलावों के कारण होता है। ये बदलाव सोच, स्मृति, आचरण तथा मनोभाव को प्रभावित करते हैं। अल्जाइमर रोग डिमेंशिया की सबसे सामान्य क़िस्म है। माइक्रोसॉफ्ट के को-फाउंडर बिल गेट्स के पिता बिल गेट्स सीनियर की 94 साल की उम्र में कुछ साल पहले मृत्यु हो गयी थी। वे अल्जाइमर से पीडि़त थे। उनकी मौत पर बिल गेट्स ने कहा था कि अल्जाइमर अधिकतर वृद्धावस्था सम्बन्धित रोग है। उन्होंने बहुत क़रीब से अपने पिता को इस कष्ट से गुज़रते देखा है। बिल गेट्स ने कहा कि वह इस रोग के बेहतर इलाज व ऐसे रोगियों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए की जाने वाली शोध में फंड देंगे।

दुनिया की सबसे अधिक आबादी भारत में है और यहाँ 60 व इससे अधिक आयु के 13.8 करोड़ लोग हैं। आठ साल बाद 2031 में यह संख्या 19.4 करोड़ हो जाएगी। एक दशक में 41 प्रतिशत की वृद्धि होगी। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की एल्डरी इन इंडिया 2021 की रिपोर्ट में यह ख़ुलासा किया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2031 में 9.3 करोड़ बुजुर्ग पुरुष और 10.1 करोड़ बुजुर्ग महिलाएँ होंगी। 2021 में यह संख्या क्रमवार 6.7 करोड़ पुरुष व 7.1 करोड़ महिलाएँ थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में सबसे अधिक बुजुर्ग आबादी केरल में है, यहाँ यह कुल आबादी की 16.5 प्रतिशत है। उसके बाद तमिलनाडु (13.6 प्रतिशत) और हिमाचल प्रदेश (13.1 प्रतिशत) का नंबर आता है। एक दशक बाद यानी 2031 में भी इन तीनों राज्यों में ही बुजुर्गों की संख्या सबसे अधिक रहेगी। 2021 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार, देश में 13.8 करोड़ लोग 60 व इससे अधिक आयु के हैं और 2031 में यह संख्या 19.4 करोड़ हो जाएगी। अब सवाल यह है कि विश्व में पाँचवीं अर्थव्यवस्था वाला देश भारत क्या अपने वरिष्ठ नागरिकों की कुशलता के लिए ज़मीनी स्तर पर बदलाव करता नज़र आता है। उनके कल्याण के लिए कई सरकारी योजनाएँ हैं। मसलन राष्ट्रीय वयोश्री योजना, अटल वयो अभ्युदय योजना, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना आदि।

भारत सरकार का कहना है कि वह बुजुर्ग लोगों की समस्याओं से परिचित हैं। उनकी वित्तीय समस्याओं को हल करने के लिए मदद करती है। प्रधानमंत्री मौक़ा मिलते ही दावा करते हैं कि डबल इंजन की सरकार होने से राज्य के लोगों को फ़ायदा होता है। हरियाणा में बीते नौ वर्षों से डबल इंजन यानी भाजपा की सरकार सत्ता में है और वहाँ ज़रूरतमंद जिन वरिष्ठ नागरिकों को सरकारी पेंशन हरियाणा सरकार देती है, वह पेंशन महीने के आख़िरी दिनों में उनके बैंक खाते में आती है।

जीर्णोद्धार से चमकीं कोटा की मेहराबें

राजस्थान में पर्यटकों के रुझान की बात करें, तो यहाँ की सांस्कृतिक सम्पदा, वन्य जीव, स्थापत्य कला, अर्वाचीन काल के महल क़िले और लोक तत्त्व तथा लोक कलाएँ है। इन्हें आर्थिक विकास का वट वृक्ष कहा जाए, तो ज़्यादा तर्कसंगत होगा। पर्यटन नगरी के रूप में विकसित हो रहे कोटा के ऐतिहासिक दरवाज़ें को नया रूप देकर सहेजने-सँवारने में भी कोई कोताही नहीं बरती गयी। निकास के सभी दरवाज़ें पर उत्कीर्ण किये गये मांडणे पूरी तरह लोक कलाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। हाथी-घोड़ों के कलाकृतियों से सुसज्जित दरवाज़ें पर्यटकों को किस क़दर सम्मोहित करेंगे, कहने की ज़रूरत नहीं है। कोटा में शहरी पर्यटन से जुड़े हुए कार्यों की तादाद अपार है, तो ग्रामीण पर्यटन भी पीछे नहीं छूटा है। देशी, विदेशी पर्यटकों की ग्रामीण संस्कृति के पीछे दीवानगी देखते हुए रथकांकरा, कैथून, धर्मपुरा, दरा, धाकडख़ेड़ी पर्यटकों की अगवानी और मेहमानवाज़ी में अव्वल बन गये हैं। पिछले एक साल में अमेरिका, वर्जीनिया, अलास्का और दक्षिण भारत से आने वाले सैलानियों की कतार लगी रही।

इन गाँवों में ग्रामीण संस्कृति की तरह जीवंत हो चुकी है। पर्यटकों को टापरी के नीचे पारम्परिक चूल्हों के पास खाट और बाजोट पर बैठाकर बाजरे की रोटी, लाल मिर्च लहसुन के साथ पसंदीदा चटनी परोसी जा रही है। कोटा के आस-पास बसी हुई छोटी-छोटी टापरियाँ लालटेन के उजालों में खाटों और चौकों पर बैठकर ज्वार-बाजरे की रेाटियाँ, हाँडियों में हींग-जीरे की महक में पकते पालक, कुल्फों की सब्ज़ियों के प्रति सैलानियों में रुझान बढ़ा है। उसने चोखी ढाणी सरीखे अनेक गँवई झोकों की कतार बढ़ा दी है। शहरी चकाचौंध से ऊबे हुए सैलानियों का इनमें बढ़ता जमावड़ा इस बात की तस्दीक़ करता है कि लोग भूले हुए रहन-सहन और भोजन का असली स्वाद पाने की ललक में ढाणियों की तरफ़ दौड़ रहे हैं।

धारीवाल ने ग्राम्य पर्यटन के प्रति सैलानियों के रुझान को कोताही नहीं बरती। नतीजतन गाँवों की तरफ़ एक उन्मुक्त बदलाव स्पष्ट नज़र आने लगा है। सैलानियों की सौम्य भाषा धारीवाल के नज़रिये की पुष्टि करती नज़र आती है कि ‘यहाँ न मॉल है। न मॉल रोड है। न ही भीड़-भाड़ और गाडिय़ों की शोर-शराबा। उस गीत की पंक्तियों की तरह कि ये रातें, ये नदिया, ये मौसम और तुम। सैलानी इन गाँवों के खेतों में जा सकते हैं। अमराइयों में जा सकते हैं और खाटों पर बैठकर मोटे अनाजों की रोटी का स्वाद ले सकते हैं। यानी पारम्परिक पर्यटन से दिल भर गया हो, तो ग्रामीणों के साथ बैठकर देसी स्वाद के चटखारे ले सकते हैं। ठंडे मौसम में ग्रामीण पर्यटन कुछ और आनंद देता है। सौन्दर्य नहीं होगा, तो आकर्षण कैसे होगा?’

हालाँकि रियासत काल में भी कोटा की विशिष्ट पहचान रही है। इतिहासकार कर्नल टॉड ने एक शताब्दी पहले अपने ग्रंथ ‘एमल्स एंड एंटीविटिंज’ में कोटा के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। लेकिन नवीनीकरण के बाद तो इसका कलात्मक वैभव चमक उठा है। किशोर सागर जलाशय में नौकायन शुरू होने के बाद वाटर टूरिज्म कोटा की ख़ास पहचान बन चुका है। उल्लेखनीय है कि कोटा का क़लम भी अपने आप में अनमोल है और वैश्विक स्तर पर प्रख्यात हो चुका है। धीरे-धीरे विलुप्त होने की स्थिति में भी स्मार्ट शहरीकरण ने इनको नये सिरे से संरक्षण दिया है। किशोर सागर तालाब की पाल पर बना लक्खी बुर्ज 18वीं शताब्दी की विरासतों में गिनी जाती है। इसे कोटा के तत्कालीन दीवान जालिम सिंह ने बनवाया था। इसकी निर्माण कथा भी दिलचस्प है। कहा जाता है कि इसके निर्माण में 1,00,000 रुपये ख़र्च हुए थे। इसके लिए इसका नाम लक्खी बुर्ज रखा गया। यह बुर्ज उस कालावधि में इतना मज़बूत था कि तोप का गोला भी उस पर असर नहीं कर सकता था। अब लगभग 2.0 लाख कीलागत से इसका जीर्णोद्धार करवाया गया है।

आज जिस तरह ‘पधारों महारो देस’ की तर्ज पर पावणों की अगवानी के लिए दरवाज़ें और द्वार अपने विरासत चरित्र से अभिन्न रूप से जोड़े गये हैं। स्पष्ट लगता है कि गम्भीर परामर्श दृष्टि के साथ ही इन पर पेशेवर हाथ आजमाये गये हैं। हवेलियों और दरवाज़ें पर लोक कला का प्रतिनिधित्व करने वाले चित्र दिखायी देते हैं। अगर शेखावाटी विश्व की सबसे बड़ी मुक्ताकाशी के रूप मे चर्चित है, तो इसकी बड़ी वजह यही है रियासतकालीन दरवाज़ें का पुराना वैभव लौटाने के लिए 11 करोड़ ख़र्च किये गये हैं। इसका मुख्य उद्देश्य पुराने कोटा में बने दरवाज़ें का हेरिटेज लुक बरक़रार रखते हुए पर्यटकों को शहर के गौरवशाली इतिहास से रू-ब-रू कराना। हालाँकि प्राचीनकाल में परकोटे के 11 दरवाज़ें थे; लेकिन जब समय के साथ कोटा ने परकोटे के बाहर पैर पसारे, तो ज़रूरत के हिसाब से दरवाज़ें हटाकर रास्ते बना दिये गये अब पुरातत्त्व विभाग के मशविरे के साथ ही दरवाज़ें का नवनिर्माण उदयपुर और जयपुर के दरवाज़ें की सार-सँभाल कर चुके कारीगरों ने ही किया है। पावणों की अगवानी की की दृष्टि से दरवाज़ें के बाहर प्रतीकात्मक मूर्तियाँ भी लगायी गयी हैं। पावणों के स्वागत के लिए ऐतिहासिक दरवाज़ें के जीर्णोद्धार के साथ जिस तरह लोकशैली के मांडणे उकेरते हुए इनका ऐतिहासिक वैभव निखारा गया है; संस्कृति की अंतर्यात्रा का आभास कराते हैं।

कला समीक्षक डॉ. राजेश कुमार व्यास कहते हैं कि, ‘कोई भी सार्वजनिक इमारत अपनी सार्थकता तभी बनाये रख सकती है, जब वहाँ संस्कृति के मूल्यों का पोषण हो। जयपुर का जवाहर कला केंद्र अपनी कला सम्पन्नता से इस बात की पुष्टि करता है। दरवाज़ें के जीवंत चित्रण के बारे में धारीवाल की मान्यता है कि कोई भी ऐतिहासिक इमारत साँस लेती भी तभी प्रतीत होती है, जब वहाँ संस्कृति से जुड़ी हमारी परम्पराओं को आधुनिक संदर्भों में गवाही देती हो।’

धारीवाल जयपुर में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की तर्ज पर इस तरह प्रयोग कर चुके हैं। धारीवाल की सौन्दर्य परिपक्वता तो उनके प्रत्येक निर्माण में झिलमिलाती है। उनका कहना है कि अनुभूति में सौन्दर्य का समावेश तभी होता है। जब कला सम्पन्न दृष्टि के साथ निर्माण करवाया जाए। धारीवाल ने कोटा में विकास का जो दृष्टिकोण अपनाया है, उसमें सौन्दर्य नवनिर्माण की अपेक्षा कला सम्पन्नता को ज़्यादा महत्त्व दिया है। उनका मानना है कि जब तक सौन्दर्यानुभूति नहीं होगी, धन का अर्जन कैसे होगा? जब तक आकृति को आँखों को सुहाने वाली नहीं होगी, सैलानियों का रुझान कैसे सम्पन्न होगा। सृजन नहीं होगा, तो अर्जन कैसे होगा?

विरासतों को सँजोते हुए नगरीय विकास का ख़ूबसूरत महल बनाना कोई आसान काम नहीं था, जबकि क़दम-क़दम पर विराटता और अहमियत को नज़र आना था। समन्वित संस्कृतियों केा गढऩे वाले धारीवाल को इस मुक़ाम पर हर क़िस्म की पाबंदियों को तोडक़र बाहर निकलना था। ख़ासकर तब, जब उन्होंने ख़ालीपन और बातों के नुकीलेपन की बदौलत यह दावा किया था। ज़ाहिर है लोगों को संशय तो था; लेकिन उनकी मशक़्क़त को लोगों नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। हालाँकि धारीवाल के शुरुआती लफ़्ज़ काँच को तोड़ती ईंट की तरह थे। लेकिन उनमें साफ़गोई और बेतकल्लुफ़ी भी थी। कहने की ज़रूरत नहीं जब आख्यान पूरे बाँकपन के साथ ज़मीन पर उतरा, तो बेहिसाब तरीक़े से वक़्त की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरा। जन कला में लोगों को झकझोरने और संवाद पैदा करने की ताक़त होती है। जिस तरह लोक कला को प्रश्रय देते हुए दरवाज़ें की सुध ली गयी है। उसने कलाकारों की शिकायतों का लहज़ा भी बदल दिया है। जो कहते थे कि अब हमारा कोई मोल नहीं रहा। निश्चित रूप से इस नव संयोजन में स्पिक मैके जैसी संस्था की पूछ-परख हुई होगी। यद्यपि दरवाज़ें की नव सज्जा में उदयपुर तथा शेखावाटी के कलाकारों का सहयोग लिया गया है। लेकिन इन सद्प्रयासों को चित्रकला के विभिन्न रूप में सम्मिलित लोक कला को नये सिरे से परिचित करवाया है। धारीवाल ने दरवाज़ें को एक हसीन क़सीदाकारी से समृद्ध कर दिया है।

निर्मला सीतारमण की बैठक में गौतम गंभीर और एमएलए ओपी शर्मा भिड़े

आईपीएल के दौरान वरिष्ठ खिलाड़ी विराट कोहली से तीखी तकरार के कारण काफी दिन तक चर्चा में रहे पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी गौतम गंभीर की केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की उपस्थिति में दिल्ली के विश्वास नगर से विधायक ओपी शर्मा के बीच जबरदस्त कहा सुनी हो गयी। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह कहा सुनी इतनी जबरदस्त थी कि दोनों पक्षों ने एक दूसरे को ‘देख लेने’ तक की धमकी भी दी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह तकरार केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने हुई। दोनों एक दूसरे से भिड़ गए और एक-दूसरे को देख लेने तक की धमकी दी गई। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने दोनों को समझाया।

इसके बाद कुछ देर तक शांति रही, लेकिन जैसे ही सीतारमण बैठक से निकलीं, दोनों फिर आमने-सामने हो गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक बात धक्का-मुक्की तक पहुंच गई। इस घटना के बाद अब नेता अनुशासन तोड़ने वाले नेताओं पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। कहा जा रहा है बड़े नेताओं को भी इसकी जानकारी दे दी गयी है।  

घटना तब हुई जब ईस्ट आजाद नगर में एक जगह भाजपा के सर्व समाज सम्मेलन में  निर्मला सीतारमण आई थीं। कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह बैंक्वेट हाल के ऊपर कक्ष में पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों के साथ विचार विमर्श करने गईं। वहां सांसद गौतम गंभीर भी थे। तभी विधायक ओपी शर्मा गांधी चार व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारियों को लेकर केंद्रीय मंत्री से मिलने ऊपर जाने लगे लेकिन गंभीर के पीए गौरव अरोड़ा ने उनको रोका लिया।

इसके बाद विधायक के एतराज जताने पर तकरार शुरू हो गयी। आवाजें सुनकर गौतम गंभीर और अन्य बाहर आ गए। अब सांसद और विधायक के बीच नोकझोंक शुरू हो गई। इसपर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने हस्तक्षेप कर दोनों को समझाया लेकिन झगड़ा जारी रहा। कहा जा रहा है कि एक-दूसरे को देख लेने की धमकी देने से लेकर कई कड़वी बातें दोनों ने कहीं। उनके बीच धक्का-मुक्की होने पर लोगों ने भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों के साथ मिलकर स्थिति को संभाला। 

मणिपुर में हिंसा जारी; अब केंद्रीय मंत्री का घर फूंका, दो खाली घर भी जलाये

मणिपुर में हिंसा विकराल रूप लेती जा रही है। राज्य की एक महिला मंत्री नेमचा किप्जेन का घर फूंकने की घटना के बाद अब उग्रवादियों ने कोंगवा बाज़ार इलाके में केंद्रीय मंत्री आरके रंजन सिंह का घर फूंक दिया। राज्य में हिंसा लगातार जारी है जातीय संघर्ष से प्रभावित राज्य में भीड़, जिसमें ज्यादातर महिलाएं थीं, ने दो खाली घरों को भी आग के हवाले कर दिया। हिंसा में अब तक 125 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 350 से ज्यादा घायल हैं। सैकड़ों लोग राहत शिवरों में रह रहे हैं।

 सुरक्षा बलों को इंफाल के न्यू चेकॉन में भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। उसने भीड़ पर आंसू गैस के गोले छोड़े। उधर केंद्रीय मंत्री आरके रंजन सिंह, जो केरल की आधिकारिक यात्रा पर हैं, के इंफाल स्थित घर पर आग लगा दी गयी। मंत्री के मुताबिक इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ है। उपद्रवी पेट्रोल बम लेकर आए थे। आगे से मंत्री के घर के भूतल और पहली मंजिल को नुकसान पहुंचा है।

सेना और असम राइफल्स के जवानों ने राज्य में हिंसा बढ़ने के बाद अपना अभियान तेज कर दिया है। सेना की टुकड़ियों ने गश्त बढ़ा दी हैं और जहां भी अवरोध लगाए गए थे, उन्हें हटा दिया गया है। सेना ने कहा कि हाल में हिंसा में वृद्धि के बाद सेना और असम राइफल्स के अभियान में तेजी लाई जा रही है।

याद रहे दो दिन पहले खमेनलोक इलाके के एक गांव में उपद्रवियों के हमले में नौ लोगों की मौत हो गई थी और 10 घायल हो गए थे। मणिपुर में मेइती और कुकी समुदाय के लोगों के बीच जारी हिंसा में अब तक 125 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 350 से ज्यादा घायल हैं। शांति बहाल करने के लिए मणिपुर के 11 जिलों में अभी भी कर्फ्यू जारी है, जबकि इंटरनेट सेवाएं बंद पड़ी हैं।

धर्मों का कोढ़

क्या यह सम्भव है कि लोगों के बीच के झगड़े रुक जाएँ? नहीं, यह तब तक शायद सम्भव नहीं, जब तक धर्मों में भरे आडम्बरों और कु-प्रथाओं को लोग ढोते रहेंगे। आजकल हर धर्म के अड्डे बने हुए हैं। ये अड्डे एक तरफ़ अपने-अपने ढंग से उपासना का केंद्र और आस्था का प्रतीक हैं, तो दूसरी तरफ़ लोगों को आपस में बाँटने और लड़ाने की वजह बन चुके हैं। क्योंकि इन अड्डों से ही षड्यंत्र रचे जाते हैं। इन अड्डों में धर्म के ठेकेदार बनकर बैठे कुछ पाखण्डी अपने फ़ायदे के लिए लोगों को भडक़ाकर उनमें झगड़ा कराने का काम करते हैं।

इसलिए अगर धर्मों को लेकर झगड़े कम करने हैं, तो लोगों को अपने-अपने उन धर्मों की जड़ों से जुडऩा होगा, जिन्हें वे मानते हैं। उन्हें अपने-अपने धर्मों में धार्मिकता के नाम पर घर कर चुके आडम्बरों और उनमें बसी कु-प्रथाओं, बुराइयों को निकालकर बाहर फेंकना होगा। और यह काम लोगों को उसी तरह करना होगा, जिस तरह किसी कोढ़ी को ठीक करने के लिए जबरन उसके सड़े-गले अंगों को काटकर फेंकना पड़ता है। हालाँकि जिस तरह कोई कोढ़ी अपने शरीर के सड़े-गले अंगों से परेशान भले ही रहे; लेकिन वह उन्हें काटकर नहीं फेंकना चाहता। ठीक उसी तरह धर्मों में जो कोढ़ ढो रहे हैं, वे भी इस कोढ़ को जानते हुए भी काटकर नहीं फेंकना चाहते। ऐसे दो तरह के लोग होते हैं। एक वे, जो इस आडम्बर और कु-प्रथा रूपी कोढ़ से लाभ कमा रहे हैं, और दूसरे वे जो इसे धर्म मानकर ढो रहे हैं।

जो लोग धर्मों में रचे-बसे कोढ़ को धार्मिकता बताकर लाभ कमा रहे हैं, वे तो क़तई यह नहीं चाहेंगे कि धर्मों से यह कोढ़ कभी ख़त्म हो। क्योंकि उनकी दुकानें बन्द हो जाएँगी। और उन्हें ऐसा करने पर यक़ीनन थोड़ी तकलीफ़ उन लोगों को होगी, जो धर्मों में कोढ़ बन चुके आडम्बरों को आस्था और विश्वास के रूप में देखते हैं। सम्भव है कि आँख बन्द करके इस कोढ़ को धर्म समझकर ढो रहे लोग भडक़ भी जाएँ, उपद्रव करें। लेकिन जब यह कोढ़ पूरी तरह ठीक हो जाएगा, तब उन्हें भी एहसास होगा कि यह ठीक ही हुआ। लेकिन यह आसान नहीं होगा। इसलिए धर्मों के कोढ़ को दूर करने के लिए हर धर्म के जागरूक लोगों एक निर्दयी दिखने वाले सर्जन डॉक्टर की तरह काम करना होगा, जो धर्मों में रच-बस चुकी हर बुराई को निकालकर बाहर कर सकें।

आज हर धर्म में इनती गन्दगी मौज़ूद है कि लोग ग़लत और सही का फ़$र्क ही भूल गये हैं। उन्हें हर वो बात सही लगती है, जो उन्हें उनके धर्म के नाम पर परोसी जा रही है। फिर चाहे वो आडम्बर हो या कोई कु-प्रथा। सबको अपने-अपने धर्मों की हर बात, हर प्रक्रिया, हर क्रिया अच्छी लगती है, जिसके चलते धर्मों में सुधार के रास्ते बन्द हो चुके हैं, और बिगाड़ की स्थितियाँ पैदा होती जा रही हैं। लेकिन विचारणीय यह है कि जिस तरह किसी जंग लगे बर्तन अथवा किसी धूल से भरी जगह को साफ़ करना आवश्यक होता है। जिस तरह शरीर को हर रोज़ अन्दर और बाहर से साफ़ करना होता है। जिस तरह पुरानी इमारतों की देख-रेख और मरम्मत होती है। उसी तरह सभी धर्मों में सदियों से जमा होती आ रही आडम्बरों और कु-प्रथाओं की गन्दगी को समय-समय पर साफ़ करने की आवश्यकता होती है। भले ही यह काम आज तक नहीं हुआ, और जिन लोगों ने करना चाहा, धार्मिकता का अन्धानुकरण करने वालों ने उनकी नहीं सुनी; लेकिन आज इस सफ़ाई की ज़रूरत है। अन्यथा यह गन्दगी आने वाली पीढिय़ों को हमसे भी ज़्यादा भटकाने का काम करेगी। यह गन्दगी ठीक उसी तरह साफ़ करनी होगी, जिस तरह हम अपनी और अपनी वस्तुओं की नियमित सफ़ाई करते हैं।

कुछ लोग सवाल कर सकते हैं कि धर्मों में कौन-सी गन्दगी हो सकती है? सच तो यह है कि धर्मों में कई तरह की गन्दगी है। धर्मों में यह गन्दगी भेदभाव, ईष्र्या, वैमनस्य, आडम्बर और कु-प्रथाओं के रूप में भरी पड़ी है, जो धर्मों के ठेकेदारों को ढोंगी, अपराधी, लालची, ठग, बहरूपिया, महत्त्वाकांक्षी, ऐशपरस्त, निकम्मा, आलसी, परजीवी और झूठा बना चुकी है। यह वह समय है, जब यह गन्दगी चरम पर है। इसलिए इस गन्दगी को जड़ से साफ़ करने की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी आवश्यकता जीवन के लिए साँसों की है। आज इस गन्दगी के चलते धर्मों की असली आत्मा मर चुकी है। सत्य दब चुका है। मानवता चमक खो चुकी है। ज़्यादातर लोगों के मन से उदारता का भाव ख़त्म हो चुका है। इसकी एक बड़ी वजह यही है कि धर्मों में आस्था रखने वालों ने भी धर्मों को पढऩे के बजाय आडम्बरों और कु-प्रथाओं में आस्था बना लिया है। इसके लिए हमें तार्किक होना पड़ेगा। धर्मों को पढऩा पड़ेगा। तर्कसंगत और सही बात करने वालों को मित्र बनाना होगा। ऐसे सन्तों का अनुयायी होना होगा, जो बिना भेदभाव के सभी को एक मानते हैं। सभी को सही रास्ता दिखाते हैं। लेकिन देखा जाता है कि लोग उन्हीं तथाकथित धर्मगुरुओं के पास ही जाते हैं, जो उनके धर्म से जुड़े हों; भले ही वे भटका रहे हों।

कश्मीर के कुपवाड़ा में बड़े अभियान में सुरक्षाबलों ने 5 आतंकी मार गिराए

आतंकवादियों पर एक बड़ी कार्रवाई में जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में सुरक्षा बालों ने 5 विदेशी आतंकियों को मार गिराया है। यह आतंकी कुपवाड़ा इलाके में एक मुठभेड़ में मारे गए।

जानकारी के मुताबिक कश्मीर के कुपवाड़ा में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास सुरक्षाबलों ने घुसपैठ-विरोधी ऑपरेशन चला रखा है। इसी दौरान एक मुठभेड़ में यह आतंकी मारे गए।

यह घटना उत्तरी कश्मीर में एलओसी के जुमागुंड इलाके की है। सुरक्षा बलों को जानकारी मिली थी कि इलाके में आतंकवादी हैं और उनके पास हथियार भी हैं। इसके बाद सुरक्षाबलों ने उन्हें खोजने का अभियान शुरू किया।

ऑपरेशन के दौरान शुक्रवार सुबह आतंकवादियों की तरफ से जब गोलीबारी शुरू हो गयी तो सुरक्षा बालों ने जवाबी कार्रवाई की। इस मुठभेड़ में पांच आतंकियों को मार गिराया गया। यह सभी विदेशी बताये गए हैं। सुरक्षा बल अभी भी इलाके में डटे हुए हैं।

बिपरजॉय से गुजरात के 900 गाँव अंधेरे में; 2 की मौत, तूफ़ान अब राजस्थान में

गुजरात में तबाही मचाने के बाद चक्रवात बिपरजॉय अब राजस्थान की तरफ बढ़ गया है। गुजरात में चक्रवात से 900 से ज्यादा गाँव अँधेरे में डूब गए हैं जबकि असंख्य पेड़ उखड गए हैं। संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा है। दो लोगों और 23 मवेशियों की मौत के अलावा करीब एक लाख लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक चक्रवात से गुजरात के कच्छ जिले में तेज हवा चली और भारी बारिश हुई। इससे सामान्य जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। बड़ी संख्या में पेड़ उखड़ गए, कई इलाकों में बिजली गुल हो गई और समुद्र के पास निचले इलाकों में पानी भर गया। करीब 900 से ज्‍यादा गांव अंधेरे में डूब गए हैं। मांडवी (कच्छ जिले) में तूफान के असर के कारण कई इलाकों में पेड़ उखड़ गए तो कई इलाकों की बिजली चली गई।

उधर भावनगर इलाके में बारिश के बाद सीहोर शहर के पास भंडार गांव से गुजरने वाले एक नाले के ऊपर से पानी बहने लगा। अचानक पानी आने से बकरियों का झुंड नाले में फंस गया। जानवरों को बचाने के लिए रामजी परमार और उनका बेटा राकेश परमार नाले में घुस गए लेकिन दोनों तेज बहाव में बह गए। उनके शव कुछ दूर जाकर मिले। इसके अलावा  अलग-अलग जगह 22 लोग घायल भी हुए हैं।

चक्रवात के कारण 23 मवेशियों की मौत की भी जानकारी है। अब यह तूफान राजस्थान की ओर बढ़ रहा है। इससे पहले चक्रवात से गुरुवार कच्छ के तट से टकराने के बाद तेज हवाएं चलने के कारण देवभूमि द्वारका जिले में कई पेड़ उखड़ गए। तीन लोग घायल हुए हैं। जिले के जखौ और मांडवी कस्बों के पास कई पेड़ और बिजली के खंभे उखड़ गए, जबकि घर के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली टिन की चादर उड़ गईं।

पीएम मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री से हालत की जानकारी ली है। उधर राजस्थान सरकार भी बिपरजॉय को लेकर अलर्ट है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि बिपरजॉय चक्रवाती तूफान के प्रभाव के कारण राज्य में भारी बारिश की चेतावनी को देखते हुए सभी इंतजाम कर लिए गए हैं। सीएम ने मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, मौसम विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक कर जरूरी निर्देश दे दिये हैं।

चक्रवात के कारण जोधपुर और उदयपुर संभाग में आज और कल  भारी बारिश की संभावना जताई गयी है। मौसम विभाग के अनुसार, 16 जून को जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर और जोधपुर के आसपास के इलाकों में और 17 जून को जोधपुर, उदयपुर और अजमेर संभाग के आसपास के इलाकों में 60 से 70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभावना है। 

बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने 1000 पन्नों की चार्जशीट की दायर

दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को राउस एवेन्यू कोर्ट में रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (डब्ल्यूएफआई) के निर्वतमान अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ 1000 पन्नों की चार्जशीट दायर की है।

चार्जशीट अपर मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में दायर की गई है। महिला पहलवानों की यौन शोषण के आरोप में बृजभूषण के खिलाफ 2 एफआईआर दर्ज है, इनमें एक पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज है।

सूत्रों के अनुसार पुलिस की रिपोर्ट पर 1 जुलाई को सुनवाई होगी। पॉक्सो मामले में दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण को क्लीन चिट दे दी है। नाबालिग मामले में पुलिस ने 550 से ज्यादा पन्नों की कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की है।

बता दें महिला पहलवानों ने एक हफ्ते पहले खेल मंत्री अनुराग ठाकुर से इस मामले को लेकर बैठक मुलाकात की थी। सरकार से बृजभूषण के खिलाफ 15 जून तक आरोप पत्र दायर करने का आश्वासन मिला था। इसके बाद ही पहलवानों ने धरना प्रदर्शन स्थगित कर दिया था। और दिल्ली पुलिस ने यह पहले ही साफ कर दिया था कि बृजभूषण के खिलाफ गुरुवार को चार्जशीट दायर कर दी जाएगी।

नीतीश ने कहा कि या हम उनसे विलय करें या गठबंधन से बाहर जायें : मांझी

भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकता की मजबूत तैयारियों और गठबंधन बनाने की उज्ज्वल संभावना से उत्साहित बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महागठबंधन सहयोगी जीतनराम मांझी के बेटे संतोष के उनके मंत्रिमंडल से इस्तीफे को ज्यादा भाव नहीं देते हुए उन्हें साफ़ कह दिया है कि या तो वे अपनी पार्टी का विलय करें या बाहर चले जाएँ।

हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के संस्थापक जीतनराम मांझी ने एक दिन पहले नीतीश पर  अपने पुत्र संतोष सुमन के राज्य मंत्रिमंडल से बाहर हो जाने का ठीकरा फोड़ा था।  सुमन के केबिनेट से इस्तीफा देने के एक दिन बाद मांझी ने आठ साल से अधिक समय पहले उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किये जाने का भी जिक्र किया। मांझी के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद ही नीतीश सत्ता में लौटे थे।

हालांकि, नीतीश कुमार ने माझी की बातों के जवाब में कहा है कि मांझी या तो अपनी पार्टी का विलय करें या बाहर चले जाएँ। मांझी एक महीने पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले थे और उनकी राजग में वापसी की अटकलें लग रही हैं।

माझीं ने अब कहा है कि वे 18 जून को पार्टी की कार्यकारिणी बैठक के बाद भविष्य की कार्रवाई तय करेंगे। उन्होंने कहा – ‘मैं इस महीने की शुरुआत में नीतीश कुमार से मिला था। मेरे साथ मेरी पार्टी के विधायक थे जो अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के बारे में कुछ चिंताओं को साझा करना चाहते थे। बैठक 45 मिनट तक चली और उस दौरान हमारी पार्टी का जदयू में विलय पर मुख्यमंत्री जोर देते रहे।’

उन्होंने कहा – ‘मैंने उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की, यहां तक कि उन्हें मजाक में कहा कि उम्र उनके ऊपर हावी होती दिख रही है। जब नीतीश विलय की बात पर अड़े रहे, तो मैंने कहा कि यह संभव नहीं है। तब कहा गया कि तो बेहतर होगा कि आप बाहर चले जाएं।’