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इमरान पर बँटी पाकिस्तानी सेना

मुनीर-इमरान में छिड़ी जंग पाकिस्तान सरकार पर भी पड़ सकती है भारी

पाकिस्तान में किसी बड़े घटनाक्रम की आहट मिल रही है। अगले वित्त वर्ष के लिए देश के रक्षा बजट में 10 जून को सीधे 15.5 फीसदी की बढ़ोतरी कर इसे 1.8 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव किया गया, जबकि पाकिस्तान ढेरों आर्थिक संकटों से दो-चार है। देश के रक्षा बजट में यह बढ़ोतरी इन रिपोट्र्स के बीच की गयी है कि पाकिस्तान में सेना पुराने दौर की तरह ताक़तवर हो रही है।

विपक्षी नेता पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को राजनीतिक रूप से ख़त्म करने के लिए सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर समर्थक अफ़ीसर जी-जान से जुट गये हैं, जबकि सेना के भीतर अन्य अफ़ीसर इमरान ख़ान का समर्थन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ी ने आसिम मुनीर को सेना प्रमुख इसलिए बनाया था कि वे उनके ज़रिये इमरान ख़ान को सबक़ सिखा सकेंगे। लेकिन जिस तरह हाल के दिनों में जनरल मुनीर ताक़तवर हुए हैं, उससे अब ख़ुद शहबाज़ शरीफ़ी अपनी सरकार को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं।

मुनीर का हाल में दिया यह बयान ग़ौर करने लायक है, जिसमें उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान में सेना से बड़ा कोई नहीं। उनके कहने का मतलब यह भी निकलता है कि शहबाज़ सरकार भी उनके सामने छोटी अर्थात् उनके रहम-ओ-क़रम पर है। लेकिन इसके बावजूद एक सच यह भी है कि सेना के भीतर भी उठापटक है। सेना इमरान ख़ान और आसिम मुनीर समर्थक हिस्सों में बँटी हुई है।

पाकिस्तान के अख़बार ‘द फ्राइडे टाइम्स’ में हाल में यह रिपोर्ट छपी थी कि एक वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार सईद इमरान सफ़ाक़त ने ख़ुलासा किया है कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को बताया गया है कि अगले कुछ दिन में पाकिस्तानी सेना के भीतर विद्रोह हो सकता है और सेना के कुछ अधिकारी जनरल असीम मुनीर का ‘कोर्ट मार्शल’ कर सकते हैं।

इससे पहले यह रिपोर्ट आयी थी कि सेना में विद्रोह दबाने के लिए 160 से ज़्यादा अफ़ीसरों-छोटे अधिकारियों को बर्ख़ास्त कर दिया गया है। इसका ख़ुलासा भी पत्रकार सईद इमरान सफ़ाक़त ने ही किया है। पाकिस्तान की सेना में विद्रोह कोई नयी बात नहीं है। वहाँ सेना राजनीतिक बँटी रहती है। यह दशकों से हो रहा है। हालाँकि कहा जा रहा है कि इस बार मामला गंभीर क़िस्म का है। पाकिस्तानी पत्रकार का दावा है कि दो हफ्ते के बीच पाकिस्तानी सेना में ‘कुछ बड़ा’ हो सकता है। भीतरी विद्रोह की स्थिति बनती है, तो मार्शल लॉ लगाए जाने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

पाकिस्तान सेना में जनरल आसिफ़ी मुनीर के नेतृत्व वाले अफ़ीसर इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई को ख़त्म करने में जुट गये हैं। पाकिस्‍तान में 9 मई को जब पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी हुई थी, तो पूरे देश में उनके समर्थकों में $गुस्सा फैल गया। बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन और सेना और सरकार की अन्य इमारतों में तोड़-फोड़ हुई। बेशक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इमरान को रिहा कर दिया गया; लेकिन उसके बाद की घटनाओं से ज़ाहिर होता है कि सेना ने ठान लिया है कि वह इमरान ख़ान को राजनीतिक रूप से कमज़ोर कर देगी। इमरान ख़ान नाम लेकर सेना के बड़े अफ़ीसरों पर लगातार निशाना साध रहे हैं।

इमरान ख़ान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ी (पीटीआई) पार्टी बहुत कुछ इमरान ख़ान के करिश्मे पर निर्भर है। उनकी लोकप्रियता भी हाल के महीनों में चरम पर दिखी है। इमरान लगातार सेना के कुछ अधिकारियों को उन्हें सत्‍ता से बेदख़ल करने का आरोप लगाते रहे हैं। कई जानकारों कहना है कि बेशक इमरान सेना के एक मज़बूत गुट पर हमले कर रहे हों, वह फ़िलहाल बैकफुट पर जाने को मजबूर किये गये हैं। इसके लिए विरोधियों, जिनमें सत्तारूढ़ शरीफ़ी सरकार और सेना दोनों शामिल हैं, उनके नेताओं को उनसे तोडक़र पीटीआई छोडऩे के लिए मजबूर कर रहे हैं। हाल में उनके बेहद नज़दीकी नेताओं, जिनमें उनके सबसे चहेते फ़ीवाद चौधरी भी शामिल हैं; सहित क़रीब 80 बड़े नेता इमरान ख़ान की पार्टी को छोड़ चुके हैं।

अमेरिका स्थित मिडिल ईस्‍ट इंस्‍टीट्यूट से जुड़े आरिफ़ी र$फीक़ ने हाल में कहा था कि जब साल 2018 में इमरान ख़ान को सत्ता से बाहर होना पड़ा था, जनता के लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ी थी। यह सिलसिला हाल के महीनों तक जारी रहा। लेकिन अब सना ने जो रुख़ अ$िख्तयार किया है, उससे इमरान मुश्किल स्थिति में दिखते हैं। उनके मुताबिक, जिस तेज़ी से इमरान ख़ान के साथी नेता उन्हें छोडक़र जा रहे हैं, उससे साफ़ी है कि उनकी पार्टी को नेस्तनाबूद करने की कोशिश है। आरिफ़ी भी मानते हैं कि ऐसी स्थिति देश को $फौजी हुकूमत की तरफ़ी ले जा सकती है।

इमरान ख़ान और उनके लोगों, जिन पर 9 मई की हिंसा में शामिल होने के इल्ज़ाम हैं; के ख़िलाफ़ी मिलिट्री कोर्ट में केस चलने की बात सेना कह चुकी है। इमरान पर सार्वजनिक सभाएँ करने की पाबन्दी लगा दी गयी है। पाकिस्तान की राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि अब इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई के ख़िलाफ़ी और उसे बदनाम करने के लिए ऐसे कट्टरपंथी और आतंकी धड़ों को रैलियाँ करने के लिए आगे किया जा सकता है, जो सेना के समर्थक हैं। बीच में पाकिस्तान का जो मीडिया एस्टैब्लिशमेंट (सेना) और शरीफ़ी सरकार के ख़िलाफ़ी थोड़ा बहुत बोल भी लेता था, वह भी डरकर चुप बैठ गया है।

हमलों के पीछे कौन?

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की 9 मई को गिरफ़्तारी और उसके बाद हुए उपद्रव और सेना और सरकारी भवनों पर हुए हमलों के लिए अभी तक इमरान की पार्टी के लोगों को ज़िम्मेदार माना जाता रहा है। लेकिन रिपोट्र्स के मुताबिक, सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को एक रिपोर्ट सौंपी गयी है, जिसमें इन हमलों में शरीफ़ी सरकार के इशारे पर देश के ख़ुफ़िया ब्यूरो ने रोल अदा किया था। यह रिपोर्ट किसी और नहीं, मिलिट्री इंटेलिजेंस (एमआई) ने तैयारी की। इससे शरीफ़ी सरकार के लिए मुसीबत पैदा हो सकती है। हालाँकि यह भी हो सकता है कि सरकार और जनरल मुनीर की सेना ने मिलकर यह करवाया हो।

रिपोर्ट में इमरान की गिरफ़्तारी के बाद कुछ सैन्य ठिकानों पर हमले सरकार के इशारे पर करने की बात कही गयी है। रिपोर्ट के मुताबिक, गृह मंत्रालय के निर्देश पर सेना की सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाने के लिए ख़ुफ़िया ब्यूरो ने सरकार समर्थकों को उकसाया था। रिपोर्ट के दावे को सही माना जाए, तो निष्कर्ष यह निकलता है कि ऐसा करके सरकार इमरान की पार्टी को सीधे सेना के सामने खड़ा कर देना चाहती थी। इमरान के ख़िलाफ़ी पाकिस्तान में 150 से ज़्यादा केस दर्ज हो चुके हैं। यह माना जाता है कि शरीफ़ी सरकार की नीति ज़्यादातर लन्दन में बैठे पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ी के इशारे पर तय होती है। शरीफ़ी को इमरान ख़ान का कट्टर विरोधी माना जाता है। वह चाहते हैं कि इमरान ख़ान पर पाबंदी लग जाए। पाकिस्तान के जानकारों के मुताबिक, इमरान ख़ान को सत्ता से बाहर करने के पीछे भी नवाज़ शरीफ़ी की रणनीति थी। अब वह इमरान ख़ान पर पाबंदी का अवसर तलाश रहे हैं। हाल में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (एनएससी) की बैठक में भी इमरान की पार्टी पीटीआई पर पाबंदी के लिए सहमति की कोशिश की आयी थी; लेकिन सरकार में ही गठबन्धन सहयोगी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने इसका विरोध कर नवाज़ की योजना पर पानी फेर दिया था। नवाज़ शरीफ़ी के क़रीबी गृह मंत्री राणा सनाउल्ला तो यह तक कह चुके हैं कि ‘इमरान देश की सियासत को आज ऐसे मोड़ पर ले आये हैं, जहाँ हममें से केवल एक ही अस्तित्व में रह सकता है। अगर बात हमारे अस्तित्व पर आयी, तो ऐसा कोई भी क़दम उठाने से नहीं चूकेंगे, जो चाहे लोकतांत्रिक हो या न हो।’

समझा जा सकता है कि नवाज़ और इमरान के बीच राजनीतिक कटुता किस हद तक पहुँच चुकी है। इमरान तमाम दि$क्क़तों में फँसे होने के बावजूद देश में जल्द चुनाव कराने पर ज़ोर दे रहे हैं। फ़िलहाल तो शरीफ़ी बंधु सेना को इमरान ख़ान ख़िलाफ़ी खड़ा करने में सफल रहे हैं, जिसके जनरल आशिम मुनीर ख़ुद इमरान ख़ान को सख्त नापसन्द करते हैं।

“मैंने सेना प्रमुख से मुझसे बात करने के लिए कहा; लेकिन वो बात करना ही नहीं चाहते। मुझे लग रहा है कि मेरा कोर्ट मार्शल कराने की तैयारी हैं। मुझे 9 मई की हिंसा का मास्टरमाइंड और योजनाकार बताकर मिलिट्री कोर्ट में पेश किया जाएगा। मैंने हत्या के दो प्रयास झेले हैं और अब मेरे लिए मिलिट्री कोर्ट बनायी जा रही हैं। मैं अपने मुल्क के लिए लड़ रहा हूँ और आगे भी लड़ता रहूँगा।’’

इमरान ख़ा

पूर्व प्रधानमंत्री, पाकिस्तान

मुनीर की चुनौतियाँ

सेना प्रमुख आसिम मुनीर भी जानते हैं कि उनके लिए इमरान ख़ान को किनारे लगाना उतना आसान नहीं है। सेना में काफी लोग मुनीर के ख़िलाफ़ी हैं। इनमें से एक लेफ्टिनेंट जनरल गनी हैं, जिन्हें जनरल मुनीर ने हाल में अनधिकृत रूप से बर्ख़ास्त कर दिया था। गनी अब मुनीर के ख़िलाफ़ी आवाज़ उठा रहे हैं और माना जाता है कि मिलिटरी एस्टेब्लिशमेंट में उन्हें कई अफ़ीसरों का समर्थन हासिल है। ऐसे में इमरान को संकट में डालने के बावजूद पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख के लिए सेना के भीतर ही चुनौती है।

हरियाणा सरकार पर ख़तरे के बादल

हरियाणा में इन दिनों भाजपा-जननायक जनता पार्टी (जजपा) गठबंधन सरकार में कुछ खटास पैदा हो गयी है। अटकलें गठबंधन टूटने और सरकार को ख़तरे जैसी पेश की जा रही है, पर धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं है। खटास, तकरार, मतभेद और विवाद शुरू से होते रहे हैं; पर यह तूफ़ान भी शान्ति से गुज़र जाएगा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ, बल्कि कई मौक़े ऐसे आये, जिसमें लगा गठबंधन सरकार ज़्यादा समय तक नहीं चलेगी। आपसी मतभेदों के बावजूद सरकार बदस्तूर चल रही है और उम्मीद के मुताबिक पाँच साल तक चलेगी।

पिछले दिनों ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ ने स्पष्ट कहा कि गठबंधन सरकार अच्छी तरह से चल रही है और आगे भी चलेगी, कहीं कोई दिक़्क़त नहीं है। गठबंधन टूटने के फ़ायदे और नुक़सान भाजपा और जजपा दोनों के नेता बख़ूबी समझते हैं। यह सही है कि भाजपा बिना जजपा के भी निर्दलीय विधायकों के बूते सरकार चला सकती है; लेकिन वह ऐसा ख़तरा भला क्यों उठाना चाहेगी। समय से पहले गठबंधन टूटने का सबसे ज़्यादा नुक़सान तो भाजपा को ही होगा; क्योंकि जजपा के पास अब खोने को बहुत कुछ नहीं है।

भ्रष्टाचार और बेक़ायदगी के कुछ मामलों के अलावा किसान आन्दोलन के बाद जजपा अपने ही कोर मतदाताओं के निशाने पर है। सरकार में रहने के बावजूद जजपा का ग्राफ गिरा है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) से अलग हुई जजपा को परंपरागत मतदाताओं ने अच्छी जीत दिलायी और इसके दस प्रत्याशी जीते, जबकि मूल इनेलो से एक ही प्रत्याशी जीत सका। इसके अलावा जजपा विधायकों में एकजुटता भी नहीं है। भाजपा पर गठबंधन तोडऩे का आरोप लगता है, तो इसका उसे बड़ा नुक़सान होगा।

अहम बात यह कि जजपा कभी भी गठबंधन तोडक़र नहीं जाने वाली। कारण कोई भी हो गठबंधन टूटने का सीधा और बड़ा फ़ायदा कांग्रेस को मिल सकता है। इसलिए गठबंधन मजबूरी में ही सही मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को किसी भी तरह से चलाते ही रहना होगा। उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला तो कोई ऐसा मौक़ा नहीं आने देना चाहेंगे, जिसमें वह गठबंधन को कमज़ोर करते नज़र आएँ। जजपा चाहती है कि आगामी लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन बन जाए ऐसा नहीं, तो कम-से-कम चुनावी समझौता ही क़ायम हो जाए।

भाजपा अपने बूते ही चुनाव मैदान में उतरेगी, क्योंकि उसे पता है कि जजपा के साथ उसे नुक़सान उठाना पड़ सकता है। भाजपा और जजपा दोनों ही 10 लोकसभा और 90 विधानसभा सीटों पर अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे। इसकी तैयारी भी चल रही है, राज्य में ताज़ा विवाद भी इसी के मद्देनज़र हुआ, जब उचाना कलां सीट पर बीरेंद्र सिंह ने पत्नी प्रेमलता के लिए दावेदारी पेश की है। जब दोनों दल चुनाव अलग-अलग लड़ेंगे, तो फिर दावेदारी भाजपा की भी बनती भी है।

राजनीति में कुछ भी सम्भव है। अगर समीकरण बदलते हैं और सीटों पर समझौता होता है, तब देखा जाएगा कि उचाना कलां या अन्य सीटों पर किसकी दावेदारी बनेगी। सन् 2019 के विधानसभा चुनाव दोनों पार्टियों ने अलग-अलग लड़ा था। बहुमत जुटाने के लिए सरकारें लोकतंत्र की मजबूरी होती हैं। पूर्ण बहुमत के अभाव में गठबंधन सरकारें बनती रही हैं और भविष्य में भी बनती रहेंगी।

अभी विधानसभा चुनाव में डेढ़ साल से ज़्यादा का समय है; लेकिन उचाना कलां सीट पर अपने-अपने दावे शुरू हो गये हैं और विवाद की वजह भी फ़िलहाल यही है। उचाना कलां से मौज़ूदा उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला यहाँ से जजपा के विधायक हैं; लेकिन भाजपा से केंद्रीय मंत्री रहे बीरेद्र सिंह इस सीट पर अभी से अपनी पत्नी प्रेमलता का दावा पेश कर रहे हैं। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में दुष्यंत ने इन्हीं प्रेमलता को लगभग 48,000 मतों से हराया था। बीरेंद्र सिंह ख़ुद उचाना से पाँच बार विधायक रह चुके हैं। काफ़ी समय से बीरेंद्र सिंह और दुष्यंत चौटाला के परिवार में इस सीट को लेकर कमोबेश ठनी हुई है। इसकी शुरुआत बीरेंद्र सिंह और उनकी पत्नी प्रेमलता से होती है। चूँकि प्रदेश में जजपा सरकार में भागीदार है; लेकिन बीरेंद्र सिंह और प्रेमलता अक्सर उचाना कलां में विकास कार्य न होने जैसे आरोप लगाते रहे हैं। यह एक तरह से गठबंधन धर्म के ख़िलाफ़ हैं।

विवाद में दुष्यंत चौटाला के उस बयान ने भी आग में घी का काम किया, जिसमें उन्होंने क्षेत्र की रैली में कहा कि उनकी (दुष्यंत) की जीत से बीरेंद्र सिंह के परिवार के लोगों के पेट में दर्द हो रहा है; लेकिन उनके पास इसका कोई इलाज नहीं है। इसकी प्रतिक्रिया में राज्य के दौरे पर आये त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके पार्टी प्रभारी बिप्लब कुमार देब ने इस बयान को अपने ऊपर ले लिया। देब ने कहा कि उनके पेट में दर्द जैसी कोई बात नहीं है। जजपा ने भाजपा को समर्थन देकर कोई एहसान नहीं किया, बदले में बहुत कुछ मिला है। वह भाजपा के राज्य प्रभारी होने के नाते पार्टी को मज़बूती देने का काम कर रहे हैं। अगर उचाना कलां से बीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेमलता की दावेदारी बनती है, तो इसमें किसी को क्या दिक़्क़त हो सकती है।

जजपा ने देब के बयान के बाद स्थिति सँभालने की कोशिश करते हुए कहा कि पेट में दर्द की बात उन्होंने (दुष्यंत) ने बीरेंद्र सिंह के परिवार के संदर्भ में कही थी। जजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय चौटाला ने कहा कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में क्या समीकरण बनेंगे, इसे भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तय करेगा। बीरेंद्र सिंह अब भाजपा के सदस्य हैं, इसलिए उन्हें किस सीट पर किसकी दावेदारी होगी? कहना उचित नहीं है। ताज़ा विवाद में गठबंधन में दरार पर अजय चौटाला कहते हैं कि उनकी पार्टी सहयोगी दल है, इसके नाते उनसे जो कुछ भी बनेगा, वह करेंगे और गठबंधन धर्म को पूरी तरह से निभाएँगे।

यह सच है कि गठबधन सरकार में जजपा का प्रदर्शन ज़्यादा अच्छा नहीं रहा है; बावजूद इसके पार्टी ने गठबंधन धर्म को बख़ूबी निभाया है। किसान आंदोलन से लेकर पहलवानों के आंदोलन में पार्टी का रुख़ सरकार के साथ ही रहा। जजपा को पता है कि किसी भी मुद्दे पर सरकार के ख़िलाफ़ जाने का मतलब जान बूझकर मुसीबत मोल लेना है, जबकि बिना सरकार उसका अब ज़्यादा वजूद नहीं रह गया है। चुनाव में अभी क़रीब डेढ़ साल बा$की है, इस दौरान गठबंधन पर कई बार आँच आने वाली है। जैसे-जैसे समय गुज़रता जाएगा, गठबंधन को लेकर विवाद खड़े होते रहेंगे। सब कुछ होने के बावजूद सरकार पाँच साल का कार्यकाल आसानी से पूरा कर लेगी, इसमें ज़्यादा संदेह नज़र नहीं आता।

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद हरियाणा कांग्रेस में जबरदस्त उत्साह नज़र आ रहा है। गठबंधन में कोई विवाद, तकरार या कोई तल्$खी कांग्रेस के लिए सबसे अच्छी ख़ुराक कही जा सकती है; लेकिन गठबंधन सरकार ऐसा कोई मौक़ा देना नहीं चाहती। भाजपा सन् 2019 के मुक़ाबले अब ज़्यादा अच्छी स्थिति में नहीं है। पार्टी अपने बूते तब पूर्ण बहुमत नहीं जुटा सकी थी, तो आगामी विधानसभा चुनाव में क्या कोई चमत्कार करके दिखाएगी?

जजपा को भाजपा के साथ लाने और सरकार बनाने का सबसे ज़्यादा श्रेय अमित शाह को जाता है। तब उन्होंने कहा था कि हरियाणा में जनादेश किसी एक पार्टी को नहीं मिला है; लेकिन सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा जजपा के साथ मिलकर सरकार बनाएगी और यह गठबंधन सरकार पूर पाँच साल तक काम करेगी। हरियाणा भाजपा प्रभारी बिप्लब देब या बीरेंद्र सिंह चाहे कुछ टिप्पणी करे; लेकिन भाजपा का शीर्ष नेतृत्व गठबंधन को जारी रखने के पक्ष में है। यही वजह है कि कई अवसरों पर गम्भीर वैचारिक मतभेदों के बावजूद यह चल रहा है। साढ़े तीन साल तो किसी तरह गुज़र गये; लेकिन अब जैसे-जैसे चुनाव का समय क़रीब आता जाएगा, नये-नये विवाद पैदा होते रहेंगे। मुख्यमंत्री मनोहर लाल और उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला मंच साझा करते रहे हैं और कहीं कोई मतभेद की बात नज़र नहीं आता।

नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत स्तर के चुनाव में जजपा-भाजपा के बीच गम्भीर मतभेद पैदा हो गये थे। तब लगने लगा था कि यही मुद्दा गठबंधन को दरकाने के लिए काफ़ी है। लेकिन वह दौर भी किसी तरह गुज़र गया। किसी विधानसभा सीट पर दावेदारी को लेकर गठबंधन टूट जाए, ऐसा सम्भव नहीं जान पड़ता।

“हरियाणा में भाजपा-जजपा गठबंधन सरकार अच्छा काम कर रही है और सरकार अपने पाँच साल का कार्यकाल अच्छी तरह से पूरा करेगी।“

ओमप्रकाश धनखड़

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष

उचाना कलां में उनकी जीत से अगर किसी के पेट में दर्द हो रहा है, तो उनके पास इसका कोई इलाज नहीं है। हलक़े के लोगों ने उन्हें अच्छे-खासे अंतर से जीत दिलायी है। गठबंधन सरकार ने हलक़े में बहुत विकास कार्य कराएँ हैं। उपेक्षा के आरोप बेबुनियाद है।’’

दुष्यंत चौटाला

उप मुख्यमंत्री, हरियाणा

न उनके पेट में दर्द है और न वह कोई डॉक्टर है। जजपा ने भाजपा को समर्थन देकर कोई एहसान नहीं किया, बदले में उसे बहुत कुछ मिला है। प्रभारी होने के नाते वह भाजपा संगठन को मज़बूत कर रहे हैं। अगर किसी सीट पर पार्टी कार्यकर्ता की दावेदारी बनती है, तो कहने में क्या हर्ज है?’’

बिप्लब देब

भाजपा के हरियाणा प्रभारी

गुजरात में कांग्रेस की परीक्षा बाक़ी

गुजरात के सूरत कोर्ट से सज़ा पा चुके कांग्रेस नेता राहुल गाँधी अमेरिका दौरे पर हैं। भाजपा नेता राहुल गाँधी को उनके बयानों को लेकर घेरे हुए हैं। उनका आरोप है कि राहुल गाँधी देश की अस्मिता से खिलवाड़ कर रहे हैं। दरअसल भाजपा नेता राहुल गाँधी पर एक ऐसी लगाम कसना चाहते हैं, जिससे वह भारत की राजनीति से बाहर हो जाएँ। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। सूरत के सेशन कोर्ट से सज़ा पाने और सज़ा में इसी कोर्ट से राहत न मिलने के बावजूद राहुल गाँधी की विदेश यात्रा भाजपाइयों की आँख की किरकिरी बनी हुई है और वे अब राहुल गाँधी पर गुजरात हाई कोर्ट का फ़ैसले के इंतज़ार में हैं। कांग्रेस के नेताओं को भी गुजरात हाई कोर्ट के फ़ैसले का बेसब्री से इंतज़ार है।

बता दें कि राहुल गाँधी ने सूरत कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाने के लिए गुजरात हाई कोर्ट में अर्जी लगायी थी, जिस पर बीती 2 मई को सुनवाई तो पूरी हो गयी; लेकिन कोर्ट की गर्मी की छुट्टियों की वजह से फ़ैसला नहीं आ पाया है। अन्तिम सुनवाई में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एच.एम. प्राच्छक ने अंतरिम ऑर्डर देने से मना कर दिया था और कहा था कि इस मामले में 4 जून के बाद फ़ैसला सुनाया जाएगा। अब राहुल गाँधी वाले मामले के साथ-साथ कई अन्य महत्त्वपूर्ण मामलों की सुनवाई जारी है।

बता दें कि राहुल गाँधी के मोदी सरनेम वाले 2019 के बयान को लेकर उन पर मानहानि मामले की हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी होने के बाद कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल गाँधी की सज़ा ख़ारिज हो जाएगी। जबकि भाजपा नेता इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि सज़ा माफ़ नहीं होगी। दरअसल भाजपा नेताओं को राहुल की सज़ा से मतलब नहीं है, बल्कि इस बात से ज़्यादा मतलब है कि किस तरह से राहुल गाँधी को राजनीति से बाहर किया जाए। भाजपा नेता अच्छी तरह जानते हैं कि राहुल गाँधी कांग्रेस का प्रमुख चेहरा हैं और कांग्रेस का भविष्य उन पर बहुत हद तक निर्भर करता है। जबसे राहुल गाँधी भाजपा की केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले करने लगे हैं, तबसे वह भाजपा नेताओं को और भी चुभने लगे हैं।

सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना राहुल गाँधी के राजनीति में सक्रिय रहते कभी पूरा नहीं होगा। सोनिया गाँधी भी भाजपा के इस सपने में रोड़ा हैं; लेकिन वह उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहाँ से अब उनका राजनीतिक सफ़र बहुत लम्बा नहीं है। वैसे भी वह बीमार रहती हैं। लेकिन राहुल गाँधी और उनकी बहन प्रियंका गाँधी राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हैं, जिसमें राहुल गाँधी केंद्र हैं। कांग्रेस के नेताओं और राहुल गाँधी की वकीलों को भी यह उम्मीद है कि फ़ैसला राहुल गाँधी के पक्ष में होगा; लेकिन कब यह अभी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि अभी इस मामले हाई कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार सभी को है कि वो कब फ़ैसला सुनाएगा? भाजपा नहीं चाहती कि राहुल गाँधी के हक़ में फ़ैसला हो, साथ ही वह राहुल के संसदीय क्षेत्र वायनाड लोकसभा के उप चुनाव से भी राहुल गाँधी को दूर देखना चाहती है।

इस लड़ाई में दिलचस्प मोड़ यही है कि एक तरफ़ राहुल गाँधी पर गुजरात हाई कोर्ट में फ़ैसला नहीं आया है, तो दूसरी तरफ़ राहुल गाँधी की सांसदी छिन जाने के बाद ख़ाली हुई वायनाड सीट पर उप चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। कांग्रेस इस मामले में चुनाव आयोग पर आरोप लगा रही है कि आयोग ने यह क़दम उठाकर भाजपा के पक्ष में एक चाल चली है, ताकि राहुल गाँधी चुनाव में हिस्सा न ले सकें। क्योंकि जब तक राहुल गाँधी सज़ा से मुक्त नहीं हो जाते, उनकी संसद सदस्यता बहाल नहीं हो सकेगी। अगर इस बीच उनकी सीट पर उपचुनाव हो जाते हैं और भाजपा जीत हासिल कर लेती है, तो राहुल गाँधी की सांसदी, जिसकी उम्मीद अभी तक कोर्ट के फ़ैसले पर टिकी है, ख़त्म हो जाएगी। इसमें भी दिक्क़त यह है कि अगर राहुल गाँधी की सज़ा बरक़रार रहती है, तो फिर वो 2024 के लोकसभा चुनाव में भी मैदान में नहीं उतर सकेंगे। लेकिन राहुल गाँधी के पास हाई कोर्ट से नाउम्मीद होने पर सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता बचा रहेगा।

कांग्रेस का कहना है कि चुनाव आयोग ने गुजरात हाई कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार किये बग़ैर वायनाड लोकसभा क्षेत्र में उप चुनाव की तैयारी करके यह बता दिया है कि वह एक रहस्यमय और संदिग्ध भूमिका में भाजपा के साथ है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग से पूछा है कि उसने वायनाड लोकसभा क्षेत्र में उप चुनाव के लिए किस प्राधिकरण के निर्देश पर काम करना शुरू किया है? कांग्रेस ने अडानी समूह के साथ केंद्र सरकार के संदिग्ध रिश्ते पर भी उँगलियाँ उठायी हैं। कांग्रेस ने कहा है कि भाजपा को राहुल गाँधी से डर है, इसलिए वह किसी भी हाल में वायनाड लोकसभा क्षेत्र में 2019 के राहुल गाँधी के भाषण के बाद उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जल्दबाज़ी करती रही है।

वायनाड सीट पर उप चुनाव की हलचल ने कांग्रेस और भाजपा के बीच नोंकझोंक का एक और रास्ता ऐसे समय में खोला है, जब राहुल गाँधी विदेश में हैं और प्रधानमंत्री मोदी पर निरंकुशता का आरोप लगा रहे हैं। इधर देश में साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर भाजपा सबसे ज़्यादा सक्रिय है। गुजरात में भाजपा 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में सभी 26 सीटें जीती थी, लेकिन इस बार उसे कुछ ख़तरा नज़र आ रहा है, जिसके लिए उसने यहाँ चुनावी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के लिए गुजरात में मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। क्योंकि गुजरात में कांग्रेस कमज़ोर है और राहुल गाँधी को सज़ा भी गुजरात से ही मिली है, इसलिए कांग्रेस के पैर उखाडऩे की आख़िरी कोशिश भाजपा गुजरात से ही कर रही है। लेकिन उसकी मुश्किल यह है कि इस बीच कांग्रेस ने कर्नाटक जीतकर भाजपा को एक बड़ी पछाड़ मार दी है।

गुजरात की बात करें, तो विधानसभा चुनावों में भाजपा को रिकॉर्ड जीत दिलाने वाले भाजपा गुजरात अध्यक्ष सीआर पाटिल कांग्रेस के सभी नेताओं पर ख़ुद को भारी मान रहे हैं। पाटिल ने गुजरात की सभी लोकसभा सीटों को पाँच लाख वोटों के अंतर से जीतने की योजना बनायी है, जिसके लिए भाजपा मिशन हैवीवेट हंट शुरू कर चुकी है। इसके तहत भाजपा नेता दूसरे दलों में शामिल अच्छे जनाधार वाले पूर्व भाजपा नेताओं को अपने साथ शामिल करने की कोशिश में लगे हैं। यह काम भाजपा उन क्षेत्रों में ख़ासतौर पर कर रही है, जहाँ कांग्रेस मज़बूत है। भाजपा के निशाने पर दूसरे नंबर की पार्टी आम आदमी पार्टी है, जिसे वो मज़बूत नहीं होने देना चाहती। कांग्रेस से 35 साल से जुड़े और सात बार के विधायक गोवाभाई रबारी की भाजपा में जाने की चर्चा है, क्योंकि उनकी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल से दो मीटिंग हो चुकी हैं। अगर गोवाभाई भाजपा में जाते हैं, तो बनासकांठा सीट पर कांग्रेस की हार तय है। हालाँकि बनासकांठा की विधानसभा सीट इस समय भाजपा के क़ब्ज़ें में है, क्योंकि यहाँ से गोवा भाई के बेटे संजय रबारी इस बार मैदान में थे और हार गये थे।

दूसरी ओर कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व अध्यक्ष दिवंगत अहमद पटेल के बेटे फ़ैज़ल पटेल द्वारा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल से मुलाक़ात की तस्वीरें जारी करना भी कांग्रेस के लिए एक झटका है। हालाँकि अहमद पटेल की बेटी मुमताज पटेल कांग्रेस में ही हैं। कांग्रेस के विधायक दल के नेता अमित चावड़ा पूरी कोशिश में हैं कि गुजरात में लोकसभा चुनावों में पार्टी किसी तरह अपनी इज़्ज़त बचा सके। विधानसभा चुनावों में हार की वजह जानने के लिए कांग्रेस ने फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन भी किया था; लेकिन उसे अभी तक सही कारणों का पता नहीं चल सका है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी राजस्थान के आगामी विधानसभा चुनावों में उलझे हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के अध्यक्ष पद सँभालने के बाद कांग्रेस में का$फी ऊर्जा आयी है, कर्नाटक चुनाव जीतने के बाद और भी। लेकिन गुजरात में कांग्रेस की मुश्किलें अभी कम नहीं हो रही हैं, जिससे दूसरे चुनावों में उस पर दबाव बनेगा। दिलचस्प यह है कि गुजरात और राजस्थान दोनों पड़ोसी राज्य हैं। एक तरफ़ गुजरात में कांग्रेस के पैर उखड़े हुए हैं, तो दूसरी तरफ़ राजस्थान में भाजपा के पैर उखड़े हुए हैं। राजस्थान में लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा के चुनाव हैं।

भाजपा चाहती है कि राजस्थान पर किसी भी तरह से उसका क़ब्ज़ा हो, ताकि गुजरात के साथ-साथ वह लोक सभा मे राजस्थान से भी कांग्रेस को पूरी तरह उखाडक़र फेंक सके। भाजपा इसके लिए हर एंगल से रणनीति बनाकर काम कर रही है। इसलिए कांग्रेस नेताओं को बहुत सावधान और सक्रिय होने की ज़रूरत है।

रेल दुर्घटना : पत्रपर नहीं लिया गया संज्ञान

एडवोकेट मनन बत्रा ने पहले ही ईमेल के ज़रिये रेलवे को किया था आगाह

ओडिशा के बालासोर में 2 जून को शाम क़रीब 6:51 बजे बहनागा स्टेशन के पास कोरोमंडल एक्सप्रेस (12841) और मालगाड़ी समेत तीन ट्रेनों के बीच हुई दुर्घटना से रेलवे और केंद्र सरकार कई सवालों के घेरे में हैं। इस दुर्घटना में पौने तीन सौ से ज़्यादा यात्रियों की मौत और साढ़े ग्यारह सौ से ज़्यादा लोगों के घायल होने की बात सरकार ने स्वीकार की है। इस हादसे की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस रेल दुर्घटना में 40 लोगों की मौत दुर्घटना की वजह से नहीं, बल्कि कथित रूप से करंट लगने की वजह से हुई है। यह दावा यूँ ही नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसकी वजह ये है कि बचाव में लगी टीमों को 40 ऐसे शव मिले हैं, जिनके शरीर पर किसी प्रकार के चोट के निशान नहीं हैं।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि हर ट्रेन को हरी झंडी दिखाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर क्या कहेंगे? ऐसा नहीं है कि इस घटना से सरकार में खलबली नहीं मची। ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस घटना की जानकारी ली, और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी बालासोर का दौरा किया। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि अब तक रेल की छोटी से छोटी दुर्घटना पर मंत्री घटनास्थल पर पहुँचते थे और नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा दे देते थे, और यहाँ पर रेल मंत्री के घटनास्थल पर पहुँचने को चाटुकार मीडिया उछल-उछलकर ऐसे महिमामंडित कर रहा है, जैसे इससे पहले रेल दुर्घटना पर किसी मंत्री ने ऐसी नैतिकता दिखायी ही नहीं हो। जबकि ड्रामेबाज़ी किसी से छिपी नहीं है। बहरहाल, इस दुर्घटना में एक जो सबसे बड़ी बात सामने आ रही है, वो यह है कि उत्तर प्रदेश के एडवोकेट मनन बत्रा ने घटना से का$फी पहले अपने पूरे परिचय और पते के साथ प्रमोद कुमार (महाप्रबंधक/कोर, प्रयागराज) को एक ईमेल के ज़रिये अलर्ट लेटर लिखकर रेल व्यवस्था और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिन्ता ज़ाहिर की थी। उन्होंने ‘भारत के निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा और जीवन के लिए गंभीर ख़तरा’ विषय से प्रमोद कुमार को ईमेल भेजी, जिसमें उनके अलावा रेलवे के अन्य कई अधिकारियों- राकेश कुमार गुप्ता (पीसीईई/डब्ल्यूसीआर/मुख्यालय), रंजन श्रीवास्तव (पीसीईई/ईसीआर/मुख्यालय), सुरेश कुमार (सीपीएम/इलेक्ट./डब्ल्यूसीआर/कोटा) को अटैच किया गया था।

इस ईमेल में एडवोकेट मनन बत्रा ने लिखा कि भारत के निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा और जीवन के लिए गंभीर ख़तरों को लापरवाही पूर्ण कार्यों और आईईसी मानकों की बेतुकी व्याख्याओं के कारण होने वाले गंभीर ख़तरों को महसूस करने के बाद आवेदक उक्त पत्र लिखने के लिए विवश हैं। उन्होंने लिखा कि रेलवे में ऐसे उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है, जो आईईसी मानकों और आरडीएसओ विनिर्देशों जैसे वैक्यूम सर्किट ब्रेकर और वैक्यूम इंटरप्टर के अनुरूप नहीं हैं। पश्चिम रेलवे, पश्चिम मध्य रेलवे, पूर्व रेलवे और उत्तर मध्य रेलवे के अनुभागों में सब-सेक्शनिंग पोस्ट (एसएसपी) (2&25 केवी सिस्टम स्कॉट कनेक्टेड ट्रांसफार्मर), जो 132/55 केवी ट्रैक्शन सब स्टेशन, सेक्शनिंग पोस्ट (एसपी) के इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (ईपीसी) अनुबंध में पेश किये गये हैं। ईमेल में बिजली से ख़तरे को भी लिखा गया है। एडवोकेट बत्रा ने कहा है कि भारत सरकार ने एकीकृत कर्षण की नीति के रूप में अपने पूरे नेटवर्क का विद्युतीकरण करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा भारतीय रेलवे के ट्रैक्शन पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को बढ़ाने के लिए बड़े निवेश की योजना बनायी गयी है, ताकि वंदे भारत जैसे उच्च हॉर्स पॉवर वाले लोकोमोटिव और ट्रेन सेट को सपोर्ट किया जा सके। रोलिंग स्टॉक प्लेटफॉर्म को उच्च शक्ति की आवश्यकता होती है, जिसे केवल 2&25 एटी सिस्टम नामक प्रणाली के माध्यम से वितरित किया जा सकता है। डीएफसीसीआईएल के दोनों कॉरिडोर इस सिस्टम पर हैं और गोल्डन क्वाड्रिलेटरल्स को अब इस इलेक्ट्रिफिकेशन सिस्टम में अपग्रेड किया जा रहा है। विद्युत सुरक्षा और नियामक कोणों से विद्युतीकरण की दो प्रणालियों (25 केवी पारंपरिक और 2&25 केवी एटी सिस्टम) में अंतर का अध्ययन करते समय मुझे कुछ परेशान करने वाले तथ्य मिले हैं। भारतीय नागरिक और भारतीय रेलवे के उपयोगकर्ताओं के रूप में मैं आपको उन तथ्यों से अवगत कराने के लिए अपना नैतिक दायित्व मानता हूँ, जो ईआईजी (सरकार के विद्युत निरीक्षक) प्रमाणन के अनुदान / प्रासंगिकता को प्रभावित करेंगे। यदि ईआईजी अनुदान रोक दिया जाता है, तो यह निवेश को ख़तरे में डाल देगा। यदि भारतीय रेलवे सामान्य रूप से व्यवसाय जारी रखने का निर्णय लेता है, तो यह गम्भीर रूप से यात्रियों और उन लोगों के जीवन और अंगों को ख़तरे में डाल देगा जो विद्युतीकृत पटरियों के आस-पास रहते हैं, जिससे ईआईजी प्रमाणीकरण निष्फल हो जाता है।

माना जाता है कि ओवर हेड उपकरणों (ओएचई) की बेहतर सुरक्षा और उप स्टेशनों में उपयोग किये जाने वाले विभिन्न घटकों की सुरक्षा के लिए आरडीएसओ ने विशिष्टता सं. डबल पोल वैक्यूम सर्किट ब्रेकर और वैक्यूम इंटरप्टर के लिए सी स्लिप नंबर-1, जो आईईसी 62271-1 और आईईसी 62505 के मानकों को पूरा कर रहा है। विनिर्देश कुछ विशेष विद्युत परीक्षणों को संदर्भित करते हैं, जो 2&25 केवी सिस्टम में उपयोग किये जाने वाले उपकरणों के जीवन चक्र, विश्वसनीयता और सुरक्षा को परिभाषित करते हैं।

बत्रा ने लिखा है कि ट्रैक्शन पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की व्यवहार्यता के केंद्र में लाइनों को बिजली की आपूर्ति को डिस्कनेक्ट करने की क्षमता है। पर्याप्त सुरक्षा मार्जिन रखना विद्युत प्रणालियों का आदर्श रहा है। मुझे यह बताया गया है कि भारतीय रेलवे के अधिकारी और ईपीसी ठेकेदार उन वेंडरों का उपयोग करने पर ज़ोर दे रहे हैं, जिन्होंने ये परीक्षण नहीं किये हैं। साल 2013 में आरडीएसओ की विक्रेता निर्देशिका में 1&25 केवी एटी सिस्टम के लिए स्वीकृत स्रोत डिफॉल्ट रूप से 2&25 केवी एटी सिस्टम के लिए स्वीकृत स्रोत की स्थिति के साथ उन सभी महत्त्वपूर्ण परीक्षणों के ‘वेवर-ऑफ’ देने के बाद दिये गये थे, जिन्हें एक स्विचगियर से गुज़रना पड़ता है। भारतीय रेलवे विद्युतीकरण नेटवर्क में कम माँग के बहाने ओएचई की सुरक्षा को अधिकतम करने के लिए। यहाँ यह उल्लेख करना अनावश्यक है कि स्विचगियर के प्रोटोटाइप परीक्षण विद्युत क्षेत्र में उपलब्ध व्यापक डेटा से बहुत अच्छी तरह से निर्धारित किये गये हैं। ये परीक्षण, जिनमें सहनशक्ति शामिल है, विशेष परीक्षण जो लीडिंग पॉवर फैक्टर पर रुकावट का प्रदर्शन करते हैं, जिसमें एक ब्रेकर के सामने आने वाली परिचालन स्थितियों के पूरे सरगम को शामिल किया जा सकता है।

एडवोकेट बत्रा ने अपनी ईमेल में ख़ास तौर पर इसका ज़िक्र किया है कि इससे भविष्य में करंट दुर्घटना का ख़तरा है। उन्होंने लिखा है कि यहाँ आउट ऑफ फेज टेस्ट पर टिप्पणी करना महत्त्वपूर्ण है। आरडीएसओ विशिष्टता में निर्दिष्ट कारक 1.5 है, जबकि नवीनतम में आईईसी मानक इसे बढ़ा दिया गया है। 120 डिग्री एंगल फैक्टर 1.73 है (जो ओपन डेल्टा फीड को कवर करता है) और 180 डिग्री एंगल फैक्टर के लिए 02 (स्कॉट-कनेक्टेड फीड के लिए) है। हम समझते हैं कि संवर्धित टीआरडी नेटवर्क पर प्रमुख फीड स्कॉट-कनेक्टेड ट्रांसफॉर्मर का उपयोग करेगा, इस प्रकार आउट ऑफ फेज टेस्ट को कारकों के साथ आयोजित करने की आवश्यकता है।

एडवोकेट मनन बत्रा ने अपने शोध के दौरान मैंने भारतीय रेलवे के तकनीकी विंग द्वारा जाँच की गयी विद्युत दुर्घटनाओं की तस्वीरें देखीं, जहाँ अतीत में कोचों की छत पिघल गयी थी, क्योंकि बिजली नहीं काटी जा सकती थी। इस प्रकार, लाखों लोगों के जीवन की चिन्ता के कारण नागरिकों के और बड़े पैमाने पर जनता के हित में अधोहस्ताक्षरी एक अधिवक्ता और क़ानूनी बिरादरी का एक हिस्सा होने के कारण 2&25 केवी में उपयोग किये जाने वाले महत्त्वपूर्ण उपकरणों में आरडीएसओ विनिर्देशों और आईईसी मानकों की धज्जियाँ उड़ाने के शत्रुतापूर्ण कृत्यों को उजागर करने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। एडवोकेट बत्रा ने अधिकारियों को लिखा था कि आशा है कि आपके कार्यालय द्वारा पिछले पैराग्राफों में माँगी गयी आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किये जाएँगे, जो यात्रियों की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धताओं और दायित्वों को पूरा करेंगे। इस ईमेल को भेजने के बावजूद रेलवे की ओर से इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया और आख़िरकार इतनी बड़ी दुर्घटना हुई, जिसमें कथित रूप से 40 लोगों की करंट लगने से मौत हो गयी।

जैसा कि विदित है कि भारतीय रेलवे, दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है, लम्बे समय से रेलवे की बुनियादी सुविधाएँ ख़राब रही हैं, जो पिछले कई वर्षों से रेल दुर्घटनाओं का कारण रही हैं। भारतीय ट्रेनों में प्रतिदिन क़रीब एक-सवा करोड़ लोग हर दिन सफ़र करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, हिन्दुस्तान में हर साल क़रीब 300 रेल दुर्घटनाएँ होती हैं। रेलवे के आँकड़े बताते हैं कि पिछले पाँच वर्षों में 586 रेल दुर्घटनाएँ हो देश में हो चुकी हैं, जिनमें अधिकांश दुर्घटनाएँ पटरियों के क्षतिग्रस्त होने के चलते हुई हैं। सवाल यह है कि जिन ट्रेनों में जानवरों की तरह लोगों को ढोया जाता है, वो रेलवे घाटे में किस प्रकार से चलता है? दूसरा सवाल यह है कि आधुनिकता की बातें तो होती हैं; लेकिन हमारी रेल व्यवस्था आज भी आधुनिक नहीं हो सकी है। भले ही सरकार ने कुछ वंदे भारत जैसी तेज़ स्पीड वाली ट्रेनें पटरियों पर उतार रखी हों।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

योगी की चेतावनी पर अपराधी भारी

राम राज्य के दावों के उपरांत भी उत्तर प्रदेश अपराधों से मुक्त नहीं हो सका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अपराधियों एवं माफ़ियाओं को चेतावनी के उपरांत भी उत्तर प्रदेश में अपराधी निडर हैं। एक ओर मुस्लिम अपराधी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चेतावनी से घबराये हुए हैं, मगर दूसरी ओर अन्य अपराधियों ने आतंक मचाकर रखा हुआ है। इन अपराधियों का भय इतना है कि पुलिस भी इनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने से डर रही है।

अतीक-अशरफ़ हत्याकांड, उसके उपरांत एक अन्य अपराधी की न्यायालय में गोली मारकर हत्या के बाद मुख़्तार अंसारी के क़रीबी संजीव जीवा की भी न्यायालय में न्यायाधीश के सामने हत्या हुई। तीनों ही मामलों में मारे गये अपराधी पुलिस हिरासत में थे। हरदोई में डिप्टी कमिश्नर के ही पिता की पीट-पीटकर हत्या हुई। कोसीकलां में महंत हरिदास की हत्या हुई। जालौन में सिपाही की हत्या हुई। ये घटनाएँ बताती है कि उत्तर प्रदेश में अपराध नहीं घटा है, वरन् अपराधी बदल गये हैं। अपराधी मुख्यमंत्री योगी के अपराध के ज़ीरो टॉलरेंस दावे को सरेआम धता बता रहे हैं। पुलिस की भूमिका कहीं संदिग्ध दिखती है, तो कहीं लीपापोती वाली। समाजवादी पार्टी के एक नेता कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ से अपराधी नहीं, वरन् पुलिस डरी हुई है। पुलिस को डर है कि उसने सभी तरह की आपराधिक घटनाओं पर एफआईआर की, तो योगी आदित्यनाथ का कहर अपराधियों पर टूटे-न-टूटे पुलिस पर अवश्य टूटेगा। क्योंकि उसे मुख्यमंत्री योगी की छवि को देवता की तरह दिखाना है, जो कि वास्तव में है नहीं। प्रदेश में एक लाख जनसंख्या के सापेक्ष 154.4 अपराध दर है।

अपराध जारी

हर दिन समाचार पत्रों के पन्ने जब पलटो, तो दो-चार आपराधिक घटनाओं से सामना होना आम बात होती है। शायद ऐसा कोई ही जनपद होगा, जहाँ कोई छोटी बड़ी घटना हर दिन न होती हो। कुछ बड़ी आपराधिक घटनाएँ बीते दिनों ऐसी हुईं, जो मन को झकझोर गयीं। पीलीभीत में एक किशोरी से सामूहिक बलात्कार करने वालों के विरुद्ध पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की, जिसके चलते किशोरी के पिता ने आत्महत्या कर ली। पुलिस एफआईआर दर्ज करने की जगह उलटे किशोरी एवं उसके परिजनों पर समझौते की दबाव बनाती रही। कहा जा रहा है कि किशोरी दलित थी एवं बलात्कारी सवर्ण यही वजह रही कि पुलिस अपराधियों को पकडऩे की जगह पीडि़तों को प्रताडि़त करती रही।

कुछ दिन पूर्व प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लूटपाट की घटना की एफआईआर दर्ज कराने के लिए पीडि़त तीन दिन तक थाने के चक्कर लगाते रहे। कुछ दिन पहले सरकारी अधिकारी के घर में घुसकर उनकी पत्नी की हत्या भी लखनऊ में ही हुई। पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं कर रही थी। अत्यधिक दबाव के उपरांत पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।

मुरादनगर में पुलिस चौकी के पास एक शोरूम संचालक की अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। रामपुर जनपद में माँ-बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। घर में डकैती भी हुई। इस मामले में पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली, मगर घटना को संग्दिध बताने में जुट गयी। जब पुलिस पर राजनीतिक दबाव पड़ा, तब उसने तीन में से एक आरोपी को पकड़ा। लखनऊ में ही 10वीं की बच्ची से गैंगरेप करके अपराधियों ने उसे तीसरी मंज़िल से फेंक दिया।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस मामले में पुलिस पर दबाव बनाया। तब पुलिस ने एक को पकड़ा। ग़ाज़ियाबाद में अचल संपत्ति विवाद को लेकर अपराधियों ने दुकान में घुसकर एक व्यापारी की हत्या कर दी।

निशाने पर दलित और व्यापारी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में दलितों एवं व्यापारियों पर अत्याचारों की बड़ी सूची है, जो लगातार विस्तार पाती जा रही है। अपराधियों को चेतावनी देने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में अपराधी तो नहीं डरे, दलित एवं व्यापारी अवश्य डरे हुए हैं। दलितों एवं व्यापारियों से अपराधियों की कौन-सी शत्रुता है, इसका जवाब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को देना चाहिए। योगी आदित्यनाथ के पहले शासन से लेकर दूसरे शासन के अब तक के समय में दलितों पर अत्याचार के मामले सबसे अधिक दिखते हैं।

महिलाएँ असुरक्षित

अपने पहले कार्यकाल में महिला हेल्पलाइन फोन नंबर शुरू करने वाली योगी आदित्यनाथ सरकार महिला सुरक्षा में फेल होती नज़र आयी। योगी आदित्यनाथ सरकार एक ने मिशन शक्ति अभियान एवं एंटी रोमियो अभियान चलाये, मगर महिलाओं पर अत्याचार नहीं रुके। अपराधियों की हिम्मत इतनी बढ़ी हुई है कि वे इन सब अभियानों की परवाह किये बिना ही हर दिन अपराध करते रहे एवं आज भी कर रहे हैं। यहाँ तक कि योगी राज में अपराधों में साधुओं, नेताओं तक के नाम आये हैं।

वर्ष 2022 में उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोबारा कई वादे किये, जिनमें महिला पुलिसकर्मियों को 10,417 स्कूटी देने का वादा, प्रदेश के हर जनपद में 40 पुलिस पिंक बूथ खोलने का वादा। योगी आदित्यनाथ ने अभी तक यह वादा पूरा किया या नहीं? इसका उत्तर उन्हीं के पास होगा; मगर यह बात किसी से नहीं छिपी है कि उत्तर प्रदेश में अपराधियों के लिए महिलाओं, बच्चियों से बलात्कार करना, लूटपाट करना एवं किसी की हत्या करना कोई बड़ी बात नहीं। ऊपर से धन्य है योगी आदित्यनाथ के राम राज्य के समय की यह पुलिस, जो पीडि़तों पर समझौते का दबाव बनाती है, तो कभी एफआईआर दर्ज ही नहीं करती।

सरकार के दावों की स्थिति

उत्तर प्रदेश में अपराधी थर-थर काँप रहे हैं। अपराधी पहली बार इतने भयभीत हैं। प्रदेश में छिपे हैं अन्यथा भाग गये हैं। कुख्यातों पर ज़ीरो टालरेंस प्रहार से क़ानून व्यवस्था चकाचक है। प्रदेश में शान्ति व्यवस्था स्थापित हो चुकी है। कोई भी आधी रात को अपने घर जा सकता है। महिला सुरक्षा को नयी ऊँचाइयाँ मिल रही हैं। ऐसे दावे हर एक-दो महीने के अंतराल से तो कभी महीने में एक-दो बार समाचार पत्रों में पढऩे एवं टीवी चैनलों पर सुनने को मिल जाते हैं। मगर ऐसे समाचरों के समक्ष ही दूसरे समाचार पढऩे एवं सुनने को मिलते हैं कि उक्त स्थान पर बलात्कार हो गया। उक्त स्थान पर सामूहिक बलात्कार हो गया। उक्त जनपद में बलात्कार के उपरांत हत्या कर दी गयी। उक्त जनपद में लूटपाट हो गयी। उक्त जनपद में दलितों की सवर्णों ने पिटायी कर दी। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ इन घटनाओं पर संज्ञान लेने की जगह अपनी प्रशंसा के पुल बाँधे रहते हैं एवं दावा करते हैं कि उनकी सरकार में माफ़िया, अपराधी सब डरे हुए हैं। अपराधियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज न होना, यदि किसी अपराधी को पुलिस ने पकड़ भी लिया हो, तो उसकी जाति एवं धर्म के आधार पर दण्ड मिलना एवं बरी होना यह दर्शाता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ प्रदेश में अपराधियों के मामले में पक्षपाती हैं। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती कि राजा भैया एवं बृजभूषण सिंह जैसे आपराधिक आरोपों से घिरे नेता उनके राम राज्य में खुले घूम रहे हैं। इससे पहले हाथरस कांड के आरोपी बरी हुए। उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराधों को लेकर न्यायालय भी अनेक बार कटु टिप्पणी कर चुके हैं, मगर योगी आदित्यनाथ सरकार पर इसका कोई असर दिखायी नहीं दिया।

मुठभेड़ में अव्वल प्रदेश पुलिस

उत्तर प्रदेश में अपराधों पर भले ही अंकुश न लगा हो मगर मुठभेड़ अत्यधिक हुई हैं। आँकड़ों की मानें, तो 20 मार्च, 2017 से मार्च, 2023 के बीच पुलिस और अपराधियों के बीच 10,713 मुठभेड़ हुईं, जिनमें 184 अपराधियों को पुलिस ने मार गिराया है। इसका अर्थ यह है कि योगी सरकार के शासन में उत्तर प्रदेश पुलिस अपराधियों को बिना न्यायालय से सज़ा दिलाये स्वयं सज़ा दे रही है। सत्य यह भी है मार्च, 2017 से लेकर मार्च, 2023 तक उत्तर प्रदेश पुलिस ने 23,069 अपराधियों को गिरफ़्तार किया है; मगर अपराध रोकने में प्रदेश पुलिस नाकाम ही रही है।

सरकार को घेरते रहे हैं अखिलेश

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हर दिन प्रदेश में घटने वाली आपराधिक घटनाओं को लेकर घेरते रहे हैं। बीते दिनों उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चियों पर अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश देश में शीर्ष पर है। भाजपा सरकार में क़ानून व्यवस्था पूरी तरह से फेल हो चुकी है। दिन-दिहाड़े सडक़ों पर हत्याएँ हो रही हैं; मगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस सच को नकारने में लगे हैं। योगी सरकार क़ानून व्यवस्था सँभालने में पूरी तरह से विफल है।

लोगों ने न्याय की उम्मीद छोड़ दी है। संविधान एवं लोकतंत्र को बचाने के लिए जनता को एकजुट होकर भाजपा को हराना होगा, तभी प्रदेश में दोबारा से लोकतंत्र, संविधान, न्याय और क़ानून व्यवस्था की पुनस्र्थापना हो सकती है। मगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी पूर्ववर्ती अखिलेश यादव की सरकार पर अपराधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहते हैं। अतीक अहमद एवं अशरफ़ को लेकर योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव पर ही तंज कसा था। उन्होंने अखिलेश पर माफ़िया एवं अपराधियों को पालने तक का आरोप लगाया था। मगर सच यह है कि उत्तर प्रदेश में योगी राज में भी अपराधी पनप रहे हैं।

जनता का मत

उत्तर प्रदेश में लगातार घटित हो रही आपराधिक घटनाओं को लेकर जनता का मत भिन्न-भिन्न है। भाजपा कार्यकर्ता देवेंद्र कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में न्याय व्यवस्था अत्यधिक सही है। पीडि़तों को न्याय मिल रहा है एवं अपराधी डरे हुए हैं।

नारायण सिंह का कहना है कि योगी आदित्यनाथ की नाक के नीचे हर दिन अपराध होते हैं मगर उनकी पुलिस अपराधियों के साथ अपने एवं पराये वाले व्यवहार के आधार पर कार्रवाई कर रही है। नरेश चौहान का कहना है कि अपराध तो नहीं रुके हैं, मगर सरकार का प्रयास है कि प्रदेश अपराधमुक्त रहे। अगर अपराधों से उत्तर प्रदेश को मुक्ति नहीं मिल रही है, तो इसमें कहीं-न-कहीं क़ानून व्यवस्था चरमराई हुई है, जिस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ध्यान देने की आवश्यकता है।

सत्ता संग्राम और दिल्ली का विकास

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

देश की राजधानी दिल्ली में सत्ता संग्राम जारी है। इस बीच दिल्ली का विकास भी जारी है। हालाँकि जिस गति से दिल्ली के विकास का सपना मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जनता को दिखाना चाहते हैं, सत्ता की इस लड़ाई में दिल्ली के विकास को वह गति नहीं मिल पा रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री विकास की जिस ज़िद पर अड़े हैं, उसका नमूना कई क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है।

कुछ लोगों को भले ही लगता है कि केजरीवाल ड्रामा करते हैं, परन्तु काम देखकर ऐसा नहीं लगता। मुफ़्त शिक्षा शिक्षा, मुफ़्त इलाज, डीटीसी तथा मेट्रो की बसों महिलाओं की मुफ़्त यात्रा के अतिरिक्त पानी के लिए होने वाली मारामारी आज दिल्ली में बिलकुल ख़त्म हो गयी है। टैंकरों के मारामारी की ख़बरें अब अख़बारों की सुर्ख़ियाँ नहीं बन पातीं। क्योंकि वैसे दृश्य ही नहीं दिखते। बिजली की समस्या भी नहीं रहती। लगातार बिना कट के हो रही बिजली आपूर्ति इसका सुबूत है। इन दिनों दिल्ली के कई क्षेत्रों में सडक़ों की ख़ुदाई चल रही है। इस ख़ुदाई से भले ही कुछ लोग अभी परेशान दिख रहे हैं,परन्तु इसका नतीजा बहुत बेहतर होने वाला है। इस ख़ुदाई के माध्यम से दिल्ली विकास प्राधिकरण ज़मीन में कई तरह की वायरिंग करके सीवरेज की व्यवस्था को दुरुस्त कर रहा है।

मंडावली निवासी आप कार्यकर्ता दीपक सिंह का दावा है कि फुटपाथ चौड़े हो रहे हैं, उनके किनारे आगे बढ़ाये हुए मकानों और दुकानों को तोड़ा जा रहा है। कई तरह के पत्थरों से फुटपाथों को सजाया जा रहा है और हरियाली के लिए पौधरोपण भी किया जा रहा है। हर सडक़ पर पानी के फव्वारे वाले टैंकर से छिडक़ाव किया जा रहा है, जिससे दिल्ली में प्रदूषण कम हुआ है। डीटीसी बसों की सेवा को भी दुरुस्त किया जा रहा है। जहाँ-जहाँ जाम लगता है, वहाँ जाम से मुक्ति के लिए काम चल रहा है। पैदल यात्रियों के लिए कई ओवरपास बन चुके हैं। दिल्ली की सडक़ों पर रोशनी, गलियों में रोशनी के लिए स्ट्रीट लाइट और सीसीटीवी कैमरे का$फी समय पहले ही लग चुके हैं। जहाँ अभी तक पाइपलाइन से जल बोर्ड का पानी नहीं पहुँच रहा है, वहाँ पानी को टैंकर सुबह-शाम पहुँच रहा है। केंद्र सरकार और उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना की विकास गति को रोकने की लाख कोशिशों के बाद भी दिल्ली में विकास का काम हो रहा है। कई मंत्रियों के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार साज़िश कर रही है, इसके बाद भी न तो मुख्यमंत्री केजरीवाल डरे हैं और न ही आम आदमी पार्टी का कोई मंत्री, विधायक तथा कार्यकर्ता डरा है। यह निडरता ईमानदारी तथा जनता के समर्थन की देन है।

अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री दिल्ली

दिल्ली सरकार की आगे की योजना है कि देश की इस राजधानी के भीड़ भरे बाज़ारों में लोगों को ख़रीदारी में सहूलियत हो। अभी तक 10 बजे तक दुकानें बन्द होने लगती हैं। परन्तु अब अगर उपराज्यपाल ने मंज़ूरी दी, तो दिल्ली में लगभग 155 दुकानें रात को भी खुलेंगी। इन दुकानों को 24 घंटे खुले रखने की अनुमति दिल्ली सरकार की ओर से मिल गयी है, जो कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दे दी है। 155 दुकानों तथा वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को रात में खुले रहने की मुख्यमंत्री की अनुमति के बाद फाइल को उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना के पास निर्णय के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से भेजी जा चुकी है। उपराज्यपाल की अनुमति मिलते ही सभी 155 दुकानें 24 घंटे खुली रहेंगी।

अगर इन दुकानों को 24 घंटे खुलने का अवसर मिला, तो इससे रोज़गार बढ़ेगा। इन दुकानों को 24 घंटे खुला रखने की अनुमति के बाद अन्य बाज़ारों में यह व्यवस्था लागू हो सकती है, जिससे दिल्ली में रोज़गार बढ़ेगा। अभी तक दिल्ली में मेडिकल सेवा क्षेत्रों को 24 घंटे खुला रखने की अनुमति ही है। इस छूट के दायरे में रखी गयी दुकानों को दिल्ली दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम-1954 की धारा-14, 15 एवं 16 के तहत राहत दी गयी है। इन धाराओं में रात्रि पाली के लिए कर्मचारियों को काम पर रखने और दुकानों के खुलने एवं बन्द होने से सम्बन्धित प्रावधान हैं। इससे पहले सन् 1954 से लेकर सन् 2022 तक दिल्ली में केवल 269 दुकानों को ही इन धाराओं के तहत कुछ विशेष छूटें हासिल थीं। कहा जा रहा है कि दिल्ली सरकार 24 घंटे दुकानों तथा अन्य प्रतिष्ठानों को इस प्रक्रिया के माध्यम से इंस्पेक्टर राज से मुक्त करने की योजना बना रही है। परन्तु जिस तरह दिल्ली सरकार तथा उपराज्यपाल के बीच तनाव चल रहा है, उससे यह नहीं कहा जा सकता कि उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना दिल्ली सरकार की इस पहल से सहमत हैं या नहीं।

सन् 2021 में दिल्ली सरकार ने दिल्ली को विदेशी शहरों की तर्ज पर विकसित करने के लिए मास्टर प्लान-2041 बनाया था। इस प्लान के तहत कहा गया था कि अगले 20 वर्षों में राजधानी की दुनिया भर में एक अलग पहचान होगी। सरकार के पास अभी लगभग 18 साल विकास के लिए बचे हुए हैं। अगर पिछले दो वर्षों में हुए विकास को देखें तथा उससे पहले के आम आदमी के कार्यकाल की विकास गति को देखें, तो इसे कोई चुनौती नहीं दे सकता कि दिल्ली में विकास के कई काम उच्च स्तर के हुए हैं। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने इसमें अहम भूमिका निभायी है। दिल्ली को हरा-भरा पर्यावरण, मज़बूत अर्थव्यवस्था, स्वच्छ ईंधन, साफ़ तथा जाम मुक्त सडक़ें, साफ़ गलियाँ, कूड़े का निस्तारण, बायोडायवर्सिटी पार्क, फ्लडप्लेन प्लानिंग, बावली और झीलों और तालाबों को पुनर्जीवित करना, नालों के किनारे को सुंदर बनाकर वहाँ साइकलिंग और पैदल चलने वालों के लिए जगह बनाना दिल्ली मास्टर प्लान-2041 के अहम बिन्दु हैं। इस प्लान को साकार करने के लिए दिल्ली सरकार ने दिल्ली वासियों से सुझाव भी माँगे थे।

अब डीडीए नयी बिल्डिंग बनाने में ब्लू-ग्रीन संपत्ति पर $खास ध्यान देगा। केजरीवाल सरकार के कई कामों की केंद्र सरकार भी दबी ज़ुबान से तारीफ़ कर चुकी है और अब एक नयी बहस इस बात की भी छिड़ी है कि जो विकास के काम दिल्ली सरकार कर रही है, केंद्र सरकार उनका श्रेय लेने की कोशिश भी कर रही है। इसका एक उदाहरण इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी के हाल ही में एक कैम्पस के उद्घाटन के दौरान देखने को मिला, जहाँ दिल्ली के मुख्यमंत्री को उद्घाटन समारोह में उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना को शामिल करना पड़ा। वहाँ भी भाजपा तथा आम आदमी पार्टी के समर्थकों के बीच नोंकझोंक हुई, परन्तु मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सभी से हाथ जोडक़र पाँच मिनट माँगे और अपनी बातों से सभी को संतुष्ट किया।

लोग सवाल उठा कि जब केंद्र सरकार ने इस कैम्पस को बनाने में कोई योगदान नहीं दिया, तो उपराज्यपाल वहाँ क्रेडिट लेने क्यों पहुँच गये? इसी के चलते उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी हुई। बिलकुल निष्पक्षता से आकलन किया जाए, तो देखने में आता है कि आम आदमी पार्टी के शासन में यमुना साफ़ हुई है। बाढ़ क्षेत्रों को बाढ़ से बचाने के लिए काम किया गया है। यमुना नदी के लिए रिवर डेवलपमेंट प्लान के तहत कई काम हुए हैं, जिसके तहत यमुना में गन्दगी डालने वालों को रोकना प्रमुख है। दिल्ली के इतिहास तथा यहाँ की मिली-जुली राज्यों की संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।

अगर अभी आवश्यक कार्यों पर ध्यान दें, जो बहुत कम हुए हैं अथवा हुए ही नहीं हैं, तो कई काम हैं। उदाहरण के लिए अभी शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में और काम करने की आवश्यकता है। 21.5 मिलियन दिल्ली की आबादी के लिए प्रतिदिन 1290 मिलियन गैलन पानी की प्रतिदिन आवश्यकता है, जबकि आपूर्ति 990 मिलियन गैलन प्रतिदिन है। हालाँकि यह आपूर्ति पिछले आठ वर्षों में बहुत तेज़ी से बढ़ी है तथा अभी जलापूर्ति की दिशा में $कदम उठाये जा रहे हैं। पार्किंग व्यवस्था सुधारने की दिशा में अभी बहुत कम काम हुआ है। अतिक्रमण हटाने में सरकार ने पाँच प्रतिशत काम ही किया होगा। 24 घंटे पानी की सप्लाई दिल्ली के अधिकतर क्षेत्रों में नहीं हुई है। सडक़ें अभी पूरी तरह ठीक नहीं हैं। हालाँकि काम चल रहा है। सडक़ों के टूटने का एक बड़ा कारण यह है कि जब कहीं सडक़ बनकर तैयार हो जाती है, तो उसे कभी सीवर के नाम पर, कभी पानी कनेक्शन के नाम पर, कभी दूसरी वजह से तोड़ दिया जाता है। जहाँ ख़ुदाई हो जाती है, वहाँ सडक़ जल्दी नहीं बन पाती, जिससे धूल उड़ती है। हालाँकि यह बात सही है कि केंद्र सरकार के हाथ में दिल्ली का शासन ज़्यादा पहुँच गया है, जो कि केंद्र सरकार ज़िद करके छीन रही है। उसने मुख्यमंत्री की कई शक्तियाँ इस केंद्र शासित प्रदेश से छीन ली हैं, जो केंद्र की निरंकुशता दिखाता है।

देश की शीर्ष अदालत तक के फ़ैसले को नकारना इसका एक बड़ा उदाहरण है। दिल्ली की न्यायिक व्यवस्था तथा पुलिस केंद्र सरकार के अधिकार में हैं। ऐसे में दिल्ली में कई मामलों में केंद्र सरकार भी विफल है। इनमें पार्कों में अराजक तत्त्वों का जमावड़ा, अपराधियों की मनमानी दिल्ली में बढ़ी है। नशे का कारोबार दिल्ली में चलता है। महिलाओं के प्रति अपराध, लूट, हत्या, रंगदारी मामले में दिल्ली का रिकॉर्ड ख़राब हो रखा है। हाल ही में कुछ आपराधिक घटनाएँ दिल्ली की क़ानून व्यवस्था की पोल खोलती हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार की कोशिशों पर पानी फेरने की जगह केंद्र सरकार तथा उपराज्यपाल को भी काम करना चाहिए, जिससे दिल्ली का अच्छी तरह विकास हो सके। आज जिस दशा में दिल्ली की राजधानी है, वह भारत का सिर ऊँचा नहीं, वरन् नीचा किये हुए है। इसलिए राजधानी दिल्ली का विकास दोनों सरकारों को मिलकर करना चाहिए।

आस्था के नाम पर घोटाला!

PM performs Darshan and Pooja at Shree Mahakaleshwar Temple, in Ujjain, Madhya Pradesh on October 11, 2022.

मध्य प्रदेश में व्यापमं घोटाले के बाद अब महाकालेश्वर कॉरिडोर में भी उजागर हुआ शिवराज सरकार का घपला

आस्था के नाम पर महाकालेश्वर कॉरिडोर में हुआ कथित घोटाला हिन्दुत्व की अगुवा पार्टी भारतीय जनता पार्टी का हिन्दुओं से एक बड़ा छल है। मध्य प्रदेश के उज्जैन में जब श्री महाकालेश्वर लोक का लोकार्पण हुआ, तब भारतीय जनता पार्टी ने इसे हिन्दुओं के वोट बैंक पाने के लिए खुलकर प्रचार का ज़रिया बनाया और वर्षों से महाकालेश्वर में आस्था रखने वालों से छल किया। ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर, 2022 को इसका लोकार्पण किया।

856 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाले इस कॉरिडोर का महिमामंडन करने वाले भाजपाई अब ख़ामोश हैं, क्योंकि बीती 28 मई को हल्की-सी आँधी ने इस कॉरिडोर में हुए कथित घोटाले की पोल खोल दी। व्यापमं घोटाले में सने शिवराज सिंह के चेहरे पर महाकालेश्वर कॉरिडोर के कथित घोटाले की सियाही आ गिरी है।

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की एक ख़ासियत है कि जब उनकी सरकारों में कुछ ग़लत होता है, तो उस पर चुप्पी साध लेते हैं। यहाँ शिवराज सिंह सरकार की जब विधानसभा से लेकर आम जनता तक में इस कथित घोटाले पर उँगलियाँ उठीं, तो मध्य प्रदेश के लोकायुक्त ने उज्जैन कलेक्टर और दो आईएएस समेत 15 लोगों- उज्जैन कलेक्टर और स्मार्ट सिटी के अध्यक्ष आशीष सिंह, उज्जैन स्मार्ट सिटी के तत्कालीन सीईओ क्षितिज सिंह और तत्कालीन आयुक्त अंशुल गुप्ता, उज्जैन स्मार्ट सिटी के नामित निदेशक सोजन सिंह रावत, दीपक रत्नावत, स्वतंत्र निदेशक श्रीनिवास नरसिम्हा राव पांडुरंगी, स्मार्ट उज्जैन के मुख्य परिचालन अधिकारी आशीष पाठक, तत्कालीन मुख्य परिचालन अधिकारी जितेंद्र सिंह चौहान एवं अन्य अधिकारियों समेत कुछ इंजीनियरों को नोटिस जारी करके इतिश्री कर ली।

इस घपले की जाँच तो होनी ही चाहिए। 10 से 25 फुट ऊँची मूर्तियाँ एक हल्की आँधी में चकनाचूर क्यों हो गयीं? यह ख़ुलासा अब हुआ। दरअसल फाइबर रेनफोर्स प्लास्टिक इन मूर्तियों को बनाया गया था। इन मूर्तियों को बनाने का ज़िम्मा गुजरात की एमपी बाबरिया फर्म को मिला था, पर शिवराज सिंह सरकार इस फर्म के नाम कार्रवाई करने के बजाय आँधी को ही दोष देने की कोशिश कर रही है।

भारतीय जनता पार्टी हर काम में किस तरह घपले करती है, यह महाकालेश्वर कॉरिडोर में मूर्तियों के क्षतिग्रस्त होने ने ही नहीं बता दिया, बल्कि नये संसद भवन के उद्घाटन वाले दिन वहाँ भी मूर्तियों के गिरना भी इसका एक अनोखा उदाहरण है। पहले तो संसद भवन में मूर्ति लगाने का कोई औचित्य एक लोकतांत्रिक देश में है ही नहीं। पर ऐसा किया भी, तो उसमें भी घपले से न चूकना यह बताता है कि भारतीय जनता पार्टी ने हर जगह लूट मचा रखी है।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने ट्वीट में लिखा कि ‘भगवान महाकाल समस्त हिन्दू समाज की आस्था का केंद्र हैं। जिस तरह से महाकालेश्व लोक में सप्त ऋषि की मूर्तियाँ गिरीं और अब अन्य देव प्रतिमाओं को नुक़सान पहुँचने के समाचार भी सामने आ रहे हैं, वैसे में शिवराज सरकार का रवैया पूरी तरह मामले की लीपापोती करने का नज़र आ रहा है। मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच कराने के बजाय शिवराज सरकार के मंत्री बिना जाँच के ही अपनी सरकार को क्लीन चिट दे रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने पहले ही अपना रुख़ स्पष्ट कर दिया है कि महाकालेश्वर लोक घोटाले की जाँच हाईकोर्ट के किसी वर्तमान न्यायाधीश से करायी जाए। अगर सरकार कांग्रेस की यह माँग स्वीकार नहीं करती, तो जनता में स्पष्ट संदेश जाएगा कि शिवराज सरकार की मानसिकता हिन्दुओं की आस्था पर चोट करने की और घोटालेबाज़ों को पूर्ण संरक्षण देने की है।’

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट में लिखा कि ‘ऐसी कोई योजना नहीं है, जिसमें भाजपा ने भ्रष्टाचार न किया हो। उज्जैन के महाकुंभ में घटिया निर्माण किया और अब 750 करोड़ रुपये से बना महाकालेश्वर लोक कॉरिडोर, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री ने किया, उसकी मूर्तियाँ तेज़ हवा में ही गिर गयीं। अब इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है? क्या मोदी जी प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह से घटना का स्पष्टीकरण लेंगे? मध्य प्रदेश में कोई भी योजना नहीं है, जिसमें भ्रष्टाचार न हुआ हो। अब महाकालेश्वर के नाम पर भी भाजपा पैसे खा गयी।’ इस घटना के बाद में महाकालेश्वर कॉरिडोर का एक कलश गिरने के बाद दिग्विजय सिंह ने एक दूसरे ट्वीट में लिखा- ‘अब महाकाल मंदिर का कलश भी अपने आप गिर गया!! बिना हवा के झोके के!! और कितना प्रमाण दें ञ्चक्कड्ड4ष्टरू रूह्म् ८०त्न के भ्रष्टाचार के? हमारी माँग है ठेकेदार को गिरफ़्तार करो।’

पर्दा डालने की कोशिश

महाकालेश्वर कॉरिडोर में मूर्तियाँ टूटने पर यह प्रचार किया जा रहा है कि इन मूर्तियों को गुजरात, ओडिशा तथा राजस्थान के कलाकारों ने बनाया था। पर न तो उस फर्म का नाम लिया जा रहा है, जो गुजरात की थी और न यह कहा जा रहा है कि कारीगर इसमें क्या कर सकते हैं। उन्हें जो प्लास्टिक मैटेरियल उपलब्ध कराया गया, उन्होंने उस मैटेरियल की मूर्तियाँ तैयार कर दीं। कार्रवाई तो मूर्तियों को बनाने के लिए ज़िम्मेदार एमपी बावरिया फर्म और शिवराज सिंह सरकार पर होनी चाहिए।

कुल 856 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले श्री महाकालेश्वर लोक में लगभग 160 मूर्तियाँ लगायी गयीं, जिनमें प्रांगण में लगी सात ऋषियों की मूर्तियों में से छ: गिरकर टूट गयीं। मूर्तियाँ इतनी हल्की हैं कि इतनी बड़ी मूर्तियों को कोई भी उठा सकता है। यही नहीं महाकालेश्वर कॉरिडोर में घटिया गुणवत्ता की एक पार्किंग भी बनी है। इस पार्किंग को जाँच अधिकारियों ने जाँच के बिना ही मंज़ूरी दे दी।

हास्यास्पद यह है कि लोकायुक्त ने जिन लोगों को नोटिस जारी किया है, उनसे 28 अक्टूबर तक जवाब देने को कहा गया है। इसका अर्थ है कि इस घपले से बचने के लिए नोटिस पाने वालों के पास कहानी गढऩे के लिए पर्याप्त समय है और शिवराज सिंह सरकार को घपले के सुबूत मिटाने का मौक़ा मिल गया है।

डबल इंजन सरकार की हक़ीक़

भारतीय जनता पार्टी के लोग अक्सर राज्यों में जाकर कहते हैं कि डबल इंजन की सरकार दोगुना विकास करेगी। बड़े-बड़े होर्डिंग और हर रोज़ अख़बारों में छपने वाले मध्य प्रदेश सरकार के विज्ञापन भी प्रदेश में विकास के अनेक दावे करते हैं, पर सच्चाई यह है कि शिवराज सरकार से प्रदेश की जनता ख़ुश नहीं है। एक महीने पहले तक जिस महाकालेश्वर कॉरिडोर को देख देखकर हिन्दू ख़ुश हो रहे थे, वहाँ अपनी आस्था के फूल अर्पित कर रहे थे, शिवराज सिंह सरकार ने हिन्दुओं की उसी आस्था से छल किया है।

देश के सबसे बड़े कॉरिडोर में से एक 900 मीटर (लगभग एक किलोमीटर) लम्बे श्री महाकालेश्वर लोक का निर्माण इतनी जल्दबाज़ी में हुआ कि यहाँ लगे कई बिजली के खम्भे भी इस हल्की-सी आँधी में उखड़ गये थे। मुख्य द्वार भी क्षतिग्रस्त हुआ। नक़्क़ाशीदार कमूरे टूटकर गिर गये। डबल इंजन की शिवराज सरकार के विकास का हाल यह है कि जिस नल से जल योजना के प्रचार-प्रसार में सरकार ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये, उस योजना के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। दर्ज़नों गाँवों के लोगों को पीने का पानी तक ठीक से नहीं मिल रहा है।

कथित घोटालों की लम्बी फ़ेहरिस्त

शिवराज सरकार पर दो-चार नहीं, बल्कि दर्ज़नों घोटालों के आरोप हैं। शिवराज सिंह पर आरोप है कि उन्होंने अपने कुल 18 साल के कार्यकाल में जमकर घोटाले किये हैं। इन घोटालों में महिला एवं बाल विकास विभाग में हुआ पोषण आहार घोटाला शामिल है, जिसमें 2,8,39,68,000 (2 अरब, 8 करोड़, 29 लाख, 68 हजार) रुपये का ख़र्च किया गया।

इसी तरह टेक होम राशन वितरण में भी शिवराज सरकार पर घोटाले का आरोप है। इसके अलावा व्यापमं घोटाला, डंपर घोटाला, सिंहस्थ घोटाला, गृह निर्माण समिति घोटाला, ई-टेंडर घोटाला, रेत घोटाला, नर्मदा परिक्रमा घोटाला, प्याज घोटाला, बुंदेलखंड पैकेज घोटाला, उद्यानिकी घोटाला, प्लांटेशन घोटाला, चावल घोटाला, आटा घोटाला, त्रिकूट चूर्ण घोटाला, खासगी होलकर ट्रस्ट घोटाला, बिजली ख़रीदी घोटाला, फ़र्ज़ी बिजली बिल घोटाला, ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाला, शराब घोटाला, शासकीय ख़रीदी में घोटाला, पीपीई किट घोटाला, मध्याह्न भोपाल घोटाला, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि घोटाला, सौभाग्य योजना घोटाला, प्रधानमंत्री कृषि विकास योजना घोटाला, बायो-फर्टिलाईजर घोटाला, किसानों की सब्सिडी हड़पने का घोटाला और प्रवासी मज़दूर खाना घोटाला जैसे अनेक घोटालों के कथित आरोप भी शिवराज सिंह सरकार पर लग चुके हैं। कांग्रेस विधायक और पूर्व वित्त मंत्री तरुण भनोट ने पिछले दिनों कहा था कि उन्होंने शिवराज सरकार के लगभग 400 घोटालों की सूची बनायी है, इस फ़ेहरिस्त को विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस जनता तक पहुँचाएगी।

देश में विकास के लिए हो मज़बूत पहल

डॉ. राम प्रताप सिंह

पिछले कुछ वर्षों से भारत समेत पूरे विश्व में सतत् विकास लक्ष्यों के बारे में लगातार बातें हो रही हैं। सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों की समयावधि (2000-2015) पूरी होने के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 वर्षों के लिए सतत् विकास लक्ष्य तय किये थे। इन लक्ष्यों को वैश्विक लक्ष्यों के तौर पर भी जाना जाता है। इसमें 17 लक्ष्य और 169 उपलक्ष्य शामिल हैं, जिन्हें 2030 की अवधि तक हासिल करना है, जो 2016 से लक्षित हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक महत्त्वपूर्ण बैठक में भारत समेत 193 देशों ने इसे अपनाया था और यह एजेंडा 01 जनवरी, 2016 से प्रभावी है। ग़रीबी तथा भुखमरी को समाप्त करने, बेहतर स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ पर्यावरण तथा सबके लिए शान्ति एवंसमृद्ध जीवन सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक कार्यवाही का आह्वान करता है। आज इन वैश्विक लक्ष्यों को प्रभाव में आये सात वर्ष से भी अधिक का समय हो चुका है और दुनिया के बहुत सारे देशों, ख़ासकर, विकासशील तथा निम्न आय वर्ग वाले देशों का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक है।

दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे सैन्य युद्ध, आंतरिक संघर्ष, ग़रीबी, खाद्य संकट, जलवायु परिवर्तन तथा राष्ट्रों के समावेशी नीतियों के अभाव के कारण इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में लगातार मुश्किलें आ रही हैं। कोरोना महामारी ने इन वैश्विक लक्ष्यों की प्रगति में बड़ी बाधा उत्पन्न की है, जिससे उबरने में कई देशों को अब अतिरिक्त समय लगेगा।

क्या कहती है वैश्विक रिपोर्ट?

पिछले वर्ष जारी वैश्विक सतत् विकास रिपोर्ट-2022 के अनुसार, 163 देशों की सूची में भारत 121वें स्थान पर है। ध्यातव्य रहे कि वर्ष 2021 में इसकी रैंकिंग 120 थी और 2020 में यह 117वें पायदान पर था। यह वार्षिक रिपोर्ट किसी भी देश में एक वर्ष के अंदर विकास लक्ष्यों में हुई प्रगति का मूल्यांकन करता है। वर्ष 2022 का यह रिपोर्ट बताता है कि भारत वैश्विक सतत् विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में अच्छी स्थिति में नहीं है।

पिछली कुछ रिपोट्र्स से यह स्पष्ट है कि भारत इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना कर रहा है। 17 सतत् विकास लक्ष्यों में भूख समाप्ति, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन स्तर, लैंगिक समानता, स्वच्छ पानी और स्वच्छता, उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि, उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढाँचे का विकास, संवहनीय शहर और समुदाय, जलीय जीवों की सुरक्षा, थलीय जीवों की सुरक्षा, शान्ति, न्याय और सशक्त संस्थाएँ तथा लक्ष्यों के लिए भागीदारी जैसे 11 ऐसे लक्ष्य हैं, जिन्हें हासिल करने में देश बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है और इनसे वैश्विक रैंकिंग में गिरावट आ रही है। लक्ष्य 12 और 13, जो कि क्रमश: ज़िम्मेदारी के साथ उपभोग और उत्पादन तथा जलवायु कार्यवाही से सम्बन्धित है।

इस रिपोर्ट के अनुसार देश इसको प्राप्त करने की राह पर है। ग़रीबी की समाप्ति, किफ़ायती और स्वच्छ ऊर्जा तथा असमानताओं में कमी। ये तीन ऐसे लक्ष्य हैं, जिनको देश को प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण चुनौतियों को झेलना पड़ रहा है। वहीं बात अगर गुणवत्तापरक शिक्षा (लक्ष्य-4) की करें, तो सुधार के बावजूद यह एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य देश के समक्ष बना हुआ है।

समावेशी विकास की ज़रूरत

देश में बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, असम, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। ये वो राज्य हैं, जिनका प्रदर्शन नीति आयोग द्वारा जारी सतत् विकास लक्ष्य (एसडीजी) इंडिया इंडेक्स और डैशबोर्ड के रैंकिंग्स में बेहद ही ख़राब रहा है। बिहार तथा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में ग़रीबी तथा बेरोज़गारी को ख़त्म करने, शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर करने, उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढाँचे के विकास करने, सभी के लिए न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करना तथा लैंगिक भेदभाव को मिटाने के लिए विशेष कार्य करने होंगे।

इन राज्यों में युवा पीढ़ी ज़रूरी स्किल्स की कमी से जूझ रही हैं, ऐसे में इनका अलग-अलग क्षेत्रों में स्किल्स डेवलप करना बेहद आवश्यक है। पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को भी विकास के विभिन्न क्षेत्रों में ठोस कार्य करने होंगे। देश के कई राज्यों में न्याय के क्षेत्र में बेहतर करने की ज़रूरत है। हालाँकि नीति आयोग द्वारा जारी एसडीजी इंडिया इंडेक्स रैंकिंग्स राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े हैं; लेकिन इन्हें बनाने के पीछे एजेंडा 2030 के तहत वैश्विक सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में देश के प्रदर्शन के स्तर को बेहतर करना है। राज्य सरकारों को समावेशी विकास पर ध्यान देना चाहिए, ताकि विकास की प्रक्रिया में हर कोई भागीदारी कर सकें और ख़ुद को सशक्त बना सकें।

मणिपाल यूनिवर्सिटी जयपुर, राजस्थान के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की प्रमुख डॉ. वैशाली कपूर का कहना है कि ‘वैश्विक स्तर पर भारत के सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए लगातार किये जाने वाले संघर्ष को सराहा जा रहा है। कोरोना महामारी ने विकासशील तथा निम्न आय वर्ग वाले देशों के समक्ष सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में नयी मुश्किलें पैदा कर दी हैं, जिनके चलते वे अभी भी संघर्ष कर रहे हैं।

भारत जैसे बड़े तथा विकासशील देश को सभी लक्ष्यों में बेहतर करने के लिए आगे ठोस $कदम उठाने होंगे। हमें मीडिया के अलग-अलग माध्यमों का प्रयोग करके स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा लैंगिक असमानता जैसे प्रमुख मुद्दों पर समाज के हर वर्ग को जागरूककरना होगा। यह समझना बेहद ज़रूरी है कि इन वैश्विक लक्ष्यों में देश आगे तभी बेहतर प्रदर्शन करेगा, जब विकास के विभिन्न क्षेत्रों में सभी सरकारी संस्थाएँ, निजी संस्थाएँ, तथा ग़ैर-सरकारी संगठन लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सुनियोजित ढंग से लगातार अच्छा कार्य करेंगे।’

आबादी बढ़ाएगी समस्याएँ

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की नयी रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आबादी 142.86 करोड़ हो गयी है, जो कि दुनिया की कुल आबादी का लगभग 18 प्रतिशत है। चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत जनसंख्या के आधार पर दुनिया का अब सबसे बड़ा देश बन गया है। बढ़ती आबादी की वजह से स्वास्थ्य, शिक्षा एवं आवास जैसी सुविधाओं का ख़याल रखना होगा तथा खाद्य सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। ग़रीबी तथा बेरोज़गारी जैसे मुद्दे बढ़ती आबादी के साथ और विकराल होंगे। जनसंख्या बढऩे से प्राकृतिक संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा, जिससे पर्यावरण को स्वच्छ रखने में काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ेगी। देश पहले ही कई समस्याओं से जूझ रहा है और बढ़ती जनसंख्या विकास के विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन को काफ़ी मुश्किल बना देंगी। वैश्विक सतत् विकास रिपोर्ट-2022 के आँकड़ों को ध्यान से देखने पर हमें पता चलता है कि आबादी के मामलों में विश्व के 10 सबसे बड़े देशों में से एक भी देश टॉप-40 में शामिल नहीं है। अमेरिका इस सूची में 41वें स्थान पर है। धीरे-धीरे ही सही दुनिया के बाक़ी देशों को भी अब यह बात समझ में आ रही है कि गुणवत्तापूर्ण मानव जीवन स्तर को बनाये रखने में बढ़ती आबादी बहुत बड़ी बाधा है।

विश्व की पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था होते हुए भी वैश्विक स्तर की ज़्यादातर रैंकिंग्स में हमारा प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है। वैश्विक सतत् विकास रिपोर्ट के अलावा, मानव विकास सूचकांक, वैश्विक भुखमरी सूचकांक तथा वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक के पिछली रिपोट्र्स हमें यह बताती हैं कि कुछ क्षेत्रों में सुधार के बावजूद इनमें भारत का प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक रहा है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक हमने विकास के विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है और विश्व समुदाय द्वारा कई मंचों पर इसकी प्रशंसा भी की गयी है। लेकिन कुछ क्षेत्रों में हमें बेहतर रणनीति और सुनियोजित योजना के तहत अच्छा करने की ज़रूरत है।

आने वाले समय में हमें विकास से सम्बन्धित ग्रामीण भारत की विभिन्न समस्याओं पर विशेष ध्यान देने चाहिए, क्योंकि देश की बड़ी आबादी आज भी गाँवों में ही बसती है। सरकारी योजनाओं का लाभ सम्बन्धित व्यक्ति तक समय से पहुँचाना तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखना, ग्रामीण क्षेत्रों की ये बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिन पर गंभीरता से कार्य किया जाना चाहिए। हमें यह स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि ग्रामीण भारत के समग्र विकास से ही देश आगे बढ़ेगा तथा सभी वैश्विक रैंकिंग्स में बेहतर प्रदर्शन करेगा।

(लेखक एक निजी विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

बढ़ते लव जिहाद की वजह तलाशने की ज़रूरत

लव जिहाद शब्द इन दिनों राष्ट्रीय स्तर से लेकर झारखण्ड तक चर्चा में है। इस शब्द की उत्पत्ति भले ही पुरानी हो; लेकिन प्रचलन में पिछले कुछ वर्षों से आया है। हर दिन देश के किसी-न-किसी हिस्से से लव जिहाद का मामला देखने-सुनने को मिलता है।

झारखण्ड भी इससे अछूता नहीं है। राज्य के किसी-न-किसी ज़िले से महीने में एक-दो लव जिहाद के मामले उभरकर सामने आ जाते हैं। हालिया घटना में बिहार के भागलपुर ज़िले से लेकर झारखण्ड के रांची और महाराष्ट्र के मुंबई तक का लिंक सामने आया है। सवाल यह है कि आख़िर लव जिहाद के मामले बढ़ क्यों रहे हैं? अंतरजातीय विवाह कोई नया नहीं है। निश्छल प्रेम सम्बन्धों में धर्म का प्रवेश कहाँ से हो रहा है? क्या वास्तव में लव जिहाद जैसा मामला है, या फिर इस्लामोफोबिया और राजनीतिक जनित मामला है? ऐसे तमाम सवालों का जवाब तलाशते हुए लव जिहाद के बढ़ते मामलों के कारणों की तह तक पहुँचने की ज़रूरत है। इसके निदान की ज़रूरत है।

क्या है लव जिहाद?

लव जिहाद दो शब्दों से मिलकर बना है। अंग्रेजी भाषा का शब्द लव और अरबी भाषा का जिहाद। लव यानी प्यार, मोहब्बत, इश्क और जिहाद का मतलब किसी मक़सद को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा देना। यानी जब एक धर्म विशेष को मानने वाले दूसरे धर्म की लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फँसाकर उस लडक़ी का धर्म परिवर्तन करवाने का प्रयास करते हैं, तो इस प्रक्रिया को लव जिहाद कहा जाता है।

आख़िर यह है कि यह शब्द आया कहाँ से? क्योंकि प्रेम विवाह या अंतरजातीय विवाह कोई नया नहीं है। मैं वर्ष 1998 में एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक अख़बार में था। हमारे दो सहयोगी (मुस्लिम लडक़े और हिन्दू लडक़ी) ने प्रेम विवाह किया। कार्यालय के मित्रों ने ही मिल कर हिन्दू रीति-रिवाज़ से शादी करायी, बाद में कोर्ट से मुहर लगी। आज भी मित्र एक राष्ट्रीय टीवी चैनल में बड़े पद पर कार्यरत हैं। पत्नी कॉलेज में पत्रकारिता पढ़ाती हैं। उनकी एक बेटी भी है। सुखपूर्वक दिल्ली में ही परिवार रह रहा है। उस व$क्त कहीं जेहन में या आपसी बातचीत में लव जिहाद जैसे शब्द नहीं आये।  ऐसे सैकड़ों उदाहरण लोगों के पास होंगे। विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में ‘रोमियो जिहाद’ जैसे शब्द सुने गये थे। बाद में यह लव जिहाद बन गया। इसकी शुरुआत केरल और बेंगलूरु से हुई। जहाँ बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन की बात सामने आयी। धीरे-धीरे यह देश के अन्य हिस्सों तक पहुँच गया। यानी लव जिहाद शब्द बहुत पुराना नहीं है।

झारखण्ड में कब हुई चर्चा?

झारखण्ड की बात करें, तो पहली दफ़ा लव जिहाद शब्द संभवत: वर्ष 2014 में लोगों की ज़ुबान पर चढ़ी, जब नेशनल शूटर तारा शहदेव का मामला खुलकर सामने आया। तारा ने रंजीत कोहली उर्फ़ रक़ीबुल से प्रेम विवाह किया और कुछ दिनों बाद ही उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाने लगा।

इसके लिए मारपीट और कुत्ते से कटवाने का मामला भी सामने आया। इसके बाद राज्य में कई मामलों को लव जिहाद का नाम दिया गया। इन दिनों राज्य में एक बार फिर लव जिहाद शब्द चर्चा में है, क्योंकि इस बार फिर मामला हाई प्रोफाइल है। यह मामला मॉडल मानवी राज का है।

मानवी बिहार की भागलपुर की रहने वाली हैं। आरोपी तनवीर अख़्तर रांची का रहने वाला है। मानवी ने 30 मई को मुंबई में तनवीर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया। मुंबई पुलिस ने मामले को रांची ट्रांसफर कर दिया। अब रांची पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

मॉडल से हुआ धोखा

मानवी राज एक मॉडल है। तनवीर अख़्तर रांची में यश मॉडलिंग एजेंसी चलाता था। मानवी ने आरोप लगाया है कि तनवीर ने यश नाम बताकर धोखा दिया। वह धर्म बदलवाकर शादी करना चाहता है और उसने मुंबई आकर जान लेने की कोशिश भी की। मामले की जाँच के क्रम में मानवी 7 जून को रांची आयी।

रांची के गोंदा थाने में अपना बयान दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस ने उसका मेडिकल टेस्ट भी कराया। उसने तनवीर पर ब्लैकमेल करने, यौनशोषण, धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने आदि आरोप लगाये हैं। उसका कोर्ट में भी बयान दर्ज कराया गया।

उधर तनवीर ने कहा है कि मानवी ने व्यापार में मेरा नुक़सान किया है। वह ब्लैकमेल कर रही है। वह लव जिहाद का सहारा ले रही है। मैं मुस्लिम हूँ, इसलिए मुझ पर इस तरह का आरोप लगाकर फँसाया जा रहा है। इसके बाद एक वीडियो जारी कर तनवीर ने अपनी ग़लती मानते हुए माफ़ी भी माँगी है। हालाँकि बयान के बाद से तनवीर फ़रार है। उसके नेपाल भाग जाने की सूचना सामने आ रही है। पुलिस उसे पकडऩे के लिए प्रयासरत है।

झारखण्ड में ही कई मामले

राज्य में नेशनल शूटर तारा शाहदेव या मॉडल मानवी का ही एक लव जिहाद का मामला है, ऐसा नहीं है। चुंकी ये मामले हाई प्रोफाइल हैं, इसलिए लोगों के ज़ुबान पर हैं और मीडिया में छाया। राज्य में इस तरह के कई मामले हर कुछ दिन पर सामने आ रहे हैं, जिन्हें लव जिहाद का संज्ञान दिया गया है।

रांची के खेलाड़ी क्षेत्र में एक लडक़ी की आत्महत्या, दुमका में रूबी पहाडिऩ नामक लडक़ी की हत्या, दुमका में लडक़ी को पेट्रोल छिडक़कर मारने का प्रयास, खूँटी में यौन शोषण, चक्रधरपुर में पहचान छुपाकर नाबालिग़ लडक़ी से शादी और फिर गर्भपात कराना, गढ़वा में मुस्लिम युवक द्वारा पहचान छिपाकर शादी करना समेत कई मामलों को लव जिहाद शब्द से ही जोडक़र देखा गया है।

धर्म परिवर्तन के लिए दबाव, धोखाधड़ी, मारपीट, रेप आदि अलग-अलग धाराओं के तहत ये मामले दर्ज किये जाते हैं। इसलिए राज्य में लव जिहाद का कोई सटीक आँकड़ा सरकारी स्तर पर उपलब्ध नहीं है। मामलों को देखकर ही उन्हें लव-जिहाद का नामाकरण कर दिया जाता है। यह सच्चाई है कि आदिवासी बहुल राज्य झारखण्ड में इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं और तथाकथित या हक़ीक़त में लव जिहाद का केंद्र बनने की बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

सवाल यह है कि आख़िर झारखण्ड में मामला क्यों बढ़ रहा? एक ख़ास समुदाय का व्यक्ति दूसरे समुदाय से अंतरजातीय विवाह करता है, या विवाह की बात होती है तो अचानक लव जिहाद का मामला क्यों निकल आता है? इस पर सोचने की ज़रूरत है।

चर्चा का विषय

फ्रांसीसी विद्वान फिलिप फग्र्यूस, इस्लामी शोधार्थी हसाम मुनीर, इस्लामी इतिहासकार क्रिश्चियन सी. साहनर जैसे कई लेखकों ने लव जिहाद के पीछे के कारणों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि कैसे प्रेम और विवाह के माध्यम से इस्लामीकरण किया जा रहा है। अब प्रेम-विवाह इस्लामीकरण की सतत प्रक्रिया में वही भूमिका निभा रहा है, जो काम अतीत में बलपूर्वक किया जाता था।

ऐसे तमाम उदहारणों से स्पष्ट है कि ग़ैर-मुस्लिम महिलाओं से मुस्लिम पुरुषों का विवाह विशुद्ध मज़हबी एजेंडा है और यह केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के अन्य हिस्सों में भी इसकी चर्चा है।

मज़हबी एजेंडा

विद्वानों की बात को सिरे से नकारा भी नहीं जा सकता है। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि हत्या, यौनशोषण, फ़रेब देकर शादी, धर्मांतरण आदि अपराधिक मामले जब मुस्लिम लडक़े और हिन्दू लडक़ी के बीच सामने आते हैं, तो उसका केवल नामाकरण लव जिहाद कर दिया जाता है। क्योंकि झारखण्ड में जो दिख रहा, वह मज़हबी एजेंडा की तरफ़ थोड़ा इशारा तो कर ही रहा है।

राज्य की डेमोग्राफी बदलने की चर्चा अक्सर सामने आती है। ख़ासकर संथाल क्षेत्र में बदलाव की बात सडक़ से विधानसभा और लोकसभा सदन तक समय-समय पर उठता रहता है। राजनीतिक दल के नेता और आम लोग कहते हैं कि संथाल क्षेत्र की डेमोग्राफी तेज़ी से बदल रही है। इस क्षेत्र में पिछले तीन दशकों में बांग्लादेश से लाखों की तादाद में घुसपैठिए साहिबगंज, पाकुड़, दुमका, गोड्डा, जामताड़ा आदि इलाक़ों में आकर बसे हैं।

इन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है। इसका असर देखने को भी मिल रहा है। लव जिहाद के ज़्यादातर मामले इन्हीं इलाक़ों से उभर कर सामने आते हैं। धीरे-धीरे यह आबादी राज्य के अन्य हिस्सों में फैल रही है और लव जिहाद का मामला वहाँ तक पहुँच रहा।

गंभीरता से हो विचार

झारखण्ड में पिछले एक साल में दो दर्ज़न आपराधिक मामले ऐसे आए जिन्हें लव जिहाद कहा गया। यह किसी एक राज्य, देश या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व व्यापी समस्या बनती जा रही है। इस कुचक्र की शिकार बनती है मासूम लड़कियाँ, जिन्हें बहला-फुसलाकर या फिर ज़ोर-जबरदस्ती से शादी के नाम पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाया जाता है।

कभी किसी ने शायद ही यह सुना होगा कि किसी लडक़ी ने जबरन शादी करके किसी लडक़े पर धर्म परिवर्तन का दवाब बनाया है। ऐसा न ही कभी हुआ है और शायद होगा भी नहीं। क्योंकि धर्म के ठेकेदार हमेशा कमज़ोर वर्ग को ही अपना शिकार बनाते हैं। समानता की बात करने वाला समाज आज भी पुरुष प्रधान ही बनाने के प्रयास में है। जब कोई महिला इस कट्टरपंथी सोच का विरोध करती है, तो उसका दुमका की रूबिका या दुमका की ही अंकिता जैसा हश्र होता है। इसलिए लव जिहाद समान्य अपराध नहीं है। इस पर गंभीरता से विचार करने, कारणों के तह तक पहुँचने और और हल ढूँढने के लिए हर स्तर प्रयास की ज़रूरत है। नहीं तो दो समुदायों के बीच प्रेम सम्बन्ध नफ़रत को और बढ़ावा ही देता रहेगा।

कांग्रेस दिल्ली-पंजाब में न लड़े चुनाव तो आप भी राजस्थान-एमपी से रहेगी दूर– सौरभ भारद्वाज

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ देश में विपक्षी एकता की चर्चा जोरों पर है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी पार्टियों को एक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। और 23 जून को विपक्षी नेताओं की बैठक भी होने वाली है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से भी इस सिलसिले में दो बार मुलाकात हुर्इ है। आप नेता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि दिल्ली में वर्ष 2015 और 2020 में कांग्रेस को 0 सीट मिली थी लेकिन उसके बावजूद वे चुनाव लड़ते है। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि कांग्रेस पार्टी कह दे कि वह पंजाब और दिल्ली में चुनाव नहीं लड़ेंगे तो हम भी राजस्थान और मध्य में चुनाव नहीं लडेंगे।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि, “जब आप पहली बार बोली कि दिल्ली में हम 200 यूनिट बिजली मुफ्त देंगे तो कांग्रेस ने सबसे ज्यादा हमारा दिल्ली में विरोध किया और मजाक उड़ाया। लेकिन हम पूछते हैं कि पहले मजाक उड़ाया तो फिर हमारा आइडिया कॉपी क्यों किया? हिमाचल में कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल के आइडिया को कॉपी किया और सरकार बनार्इ।“

आप नेता ने आगे कहा कि, “देश की सबसे पुरानी पार्टी अब सबसे नई पार्टी का आइडिया और मैनिफेस्टो तक चुराने लगी है। अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि सारे घोषणापत्र झूठे होते है, इसलिए हमने इसे गारंटी नाम दिया। लेकिन अब कांग्रेस ने इस शब्द को भी चुरा लिया है। इससे पता चलता है कि कांग्रेस में न सिर्फ लीडरशिप क्राइसिस है बल्कि आइडिया का भी क्राइसिस है।”