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एक देश एक उर्वरक योजना, क्या किसानों के हित में है यह फ़ैसला?

योगेश

कृषि से पैदा होने वाली चीज़ें शाकाहारियों का भोजन हैं। कह सकते हैं कि शाकाहारियों के जीने का साधन यही चीज़ें होती हैं। इसीलिए पुराने समय में ही मानव की जीवन शैली में कृषि का विकास कर लिया था। बढ़ती जनसंख्या से कृषि भूमि हर दिन कम होती जा रही है, जिसके लिए कृषि उपज बढ़ाने की कोशिश होती रही है। हमारे कृषि प्रधान देश में किसानों की यही कोशिश रहती है कि वे अपने खेतों में ख़ूब सारा अनाज और ख़ूब सारी सब्ज़ियाँ उपजाएँ। उनकी यह कोशिश तो इसलिए होती है कि उनकी आय बढ़े। लेकिन कृषि उपज बढ़ती है, तो उन सबका पेट भी भरता है, जो कृषि नहीं करते और जिनके पास खेत नहीं हैं।

कृषि उपज बढ़ाने को सबसे ज़रूरी है- खेत की मिट्टी का उपजाऊ होना। इसके लिए किसान अपने खेतों में खाद लगाते हैं। किसानों को गुणवत्ता वाली फ़सल उगाने के लिए अच्छी खादों, अच्छे बीजों और अच्छी मेहनत की ज़रूरतें होती है। केंद्र सरकार ने कृषि उपज को बढ़ाने को एक देश एक उर्वरक योजना शुरू की है। केंद्र सरकार की मंशा है कि किसानों को बिना किसी मिलावट के अच्छी उर्वरक और खादें मिल सकें और फ़सलों के लिए ज़रूरी खादों में मिलावट न हो। खादों की कालाबाज़ारी न हो सके। खादों के भाव अलग अलग होते हैं।

केंद्र सरकार यह चाहती है कि किसानों को इन सब समस्याओं से छुटकारा मिले और उनको खेती के लिए आसानी से कम और एक क़ीमत पर सभी प्रकार की खादें और उर्वरक मिल सकें। इस योजना के अंतर्गत अब तक देश में बिकने वाली अलग-अलग कम्पनियों की खादें अब एक ही पैकिंग में उर्वरक-खाद भारत ब्रांड के नाम से पूरे देश में हर राज्य के किसानों को केवल भारत ब्रांड के नाम से ही बेची जाएँगी। इससे पूरे देश के किसानों को एक ही दाम में एक ही पैकिंग में सभी खादें और उर्वरक मिल सकेंगी।

केंद्र सरकार ने इसके लिए प्रधानमंत्री जन उर्वरक परियोजना के अंतर्गत एक देश एक उर्वरक योजना-2023 (वन नेशन वन फर्टिलाइजर स्कीम-2023) की शुरुआत की है। इस योजना के तहत यूरिया, डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी), म्यूररेट ऑफ पोटाश (एमओपी), नाइट्रोजन फास्फोरस पोटेशियम (एनपीके) अगले समय में भारत यूरिया, भारत डीएपी, भारत एमओपी और भारत एनपीके के नाम से ही बाज़ार में बिकेंगी। केंद्र सरकार में केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री मनसुख मांडविया ने सभी उर्वरक (फर्टिलाइजर) कारख़ानों को सरकारी बोरों के नमूने भेजे हैं, जिनमें अब सभी खादों की पैकिंग की जाएगी।

अब इन उर्वरक कारख़ानों, स्टेट ट्रेडिंग कम्पनियों और उर्वरकों की विपणन कम्पनियों को केंद्र सरकार द्वारा सभी सब्सिडी वाली खादों और उर्वरकों को उन्हीं बोरियों में भरकर बेचना होगा, जिन पर सिंगल ब्रांड नाम होगा और प्रधानमंत्री भारतीय जन उर्वरक परियोजना का लोगो लगा होगा। इससे पूरे देश के किसानों को अब एक ही जैसी पैकिंग में एक ही भाव में सभी उर्वरकों, खादों को उपलब्ध कराया जा सकेगा।‌

एक देश एक उर्वरक योजना के तहत एक ही वज़न की बोरियों में एक ही तरह की लिखावट में सभी खादों को उनके नाम से बेचा जाएगा, तो इससे यह तय हो जाएगा कि ये केंद्र सरकार की सब्सिडी वाली खादें हैं, जिससे किसानों को कोई दुकानदार नक़ली खादें ऊँचे भाव में नहीं बेच सकेगा। किसान दूसरी ब्रांड की उर्वरक भी नहीं ख़रीदेंगे; क्योंकि उनको दूसरी ब्रांड की उर्वरक और खादों पर सब्सिडी नहीं मिलेगी। इससे सरकारी खादों के अलग-अलग ब्रांडों की खादों के बीच की असमानता भी ख़त्म होगी और सरकारी ब्रांडों की नक़ल बाज़ारों में नहीं मिल सकेगी।

केंद्र सरकार की योजना के अनुरूप सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने इसी साल की 24 अगस्त को एक अधिसूचना जारी करके बताया है कि एक देश एक उर्वरक योजना के अंतर्गत नये उर्वरक बैगों में खादों को भरकर आगामी महीने 2 अक्टूबर से प्रचलन में लाया जाएगा, जो कि किसानों को मिल सकेंगे। एक देश एक उर्वरक योजना के तहत उर्वरक कम्पनियाँ इन उर्वरक खादों की बोरियों के एक-तहाई हिस्से पर अपना नाम, ब्रांड का नाम, अपना लोगो और अन्य आवश्यक सूचनाएँ अंकित करेंगी, जो कि ज़रूरी है। इन खादों की बोरियों के दो-तिहाई हिस्सों पर भारत ब्रांड और प्रधानमंत्री भारतीय जन उर्वरक परियोजना का लोगो होगा, जिसे संक्षेप में पीएमबीजेपी कहा जाएगा। कुछ लोग इस नाम को पीएम और बीजेपी का प्रचार बता रहे हैं, तो कुछ इसे केंद्र सरकार की किसान हितैषी योजना बता रहे हैं।

माना जा रहा है कि पूरे देश में यह व्यवस्था होने से देश के किसानों को सहूलियत हो जाएगी और निर्माता कम्पनियों को नुक़सान नहीं होगा। पुराने बोरों की खादों के उपयोग करने के लिए सरकार ने कम्पनियों और वितरकों को 31 दिसंबर, 2023 तक का समय दिया है। इसके बाद से सभी कम्पनियों द्वारा प्रमाणिक खादों और उर्वरकों को केंद्र सरकार के द्वारा जारी बोरियों में ही बेचा जाएगा।

देश के रसायन और उर्वरक मंत्री डॉक्टर मनसुख मांडविया ने कहा है कि केंद्र सरकार किसानों को यूरिया के ख़ुदरा मूल्य के 80 प्रतिशत की सब्सिडी देती है। इसी प्रकार से डीएपी के ख़ुदरा मूल्य पर 65 प्रतिशत, एमपीके के ख़ुदरा मूल्य पर 55 प्रतिशत और पोटाश के ख़ुदरा मूल्य पर 31 प्रतिशत सब्सिडी देती है। इसके अतिरिक्त उर्वरकों की ढुलाई पर भी केंद्र सरकार के एक साल के 6,000 से 9,000 करोड़ रुपये देती है। मनसुख मांडविया ने यह भी कहा है कि इस समय कई कम्पनियाँ अलग-अलग नामों से उर्वरक खादों को बेचती हैं। इन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य तक भेजने में ढुलाई की लागत बढ़ जाती है, जिससे किसानों को उचित समय पर उर्वरक-खादों उपलब्ध कराने में भी समस्या पैदा होती है। इसलिए अब केंद्र सरकार एक देश एक उर्वरक योजना के द्वारा सब्सिडी देने वाले उर्वरक एक ही ब्रांड के नाम से किसानों को मुहैया कराने के लिए खादों की दुकानों पर पहुँचाने का काम करेगी। भारत ब्रांड के नाम से केंद्र सरकार के द्वारा सब्सिडी वाले उर्वरक खादों को उपलब्ध कराने का मक़सद उर्वरक खादों की बढ़ती हुई क़ीमतों, उनकी कालाबाज़ारी और उनकी धाँधली रोकने का एक प्रयास है, जिससे किसानों को सही भाव में सही समय पर कम भाव की सब्सिडी वाली उर्वरक-खादों मिल सकें।

एक देश एक उर्वरक योजना को लागू करने का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार के द्वारा सब्सिडी वाली उर्वरक खादों को किसानों तक कम भाव में उपलब्ध कराने के अतिरिक्त असली उर्वरक खादों को उपलब्ध कराना भी है। सरकार के निर्देशों में कहा गया है कि उर्वरक खादों की नयी बोरियों के दो-तिहाई हिस्सों पर भारत ब्रांड और प्रधानमंत्री भारतीय जन उर्वरक परियोजना लिखा होने के अतिरिक्त बोरियों के एक-तिहाई हिस्से पर कम्पनी का नाम उसका पता और उसका फोन नंबर पिन कोड लिखा जाएगा। इस उर्वरक खाद को केंद्रीय खाद माना जाएगा और किसान किसी कम्पनी के पूरे प्रचार वाली निजी उर्वरक खादों को ब्रांड के चक्कर में नहीं ख़रीदेंगे, जिससे वे ठगी के शिकार होने से बच सकेंगे। इस योजना के माध्यम से सभी निजी और सार्वजनिक कम्पनियाँ भी अब अपनी उर्वरक खादों को भारत ब्रांड बेच नाम से बेच सकेंगी। सरकार के द्वारा बनायी जाने वाली इन बोरियों का डिजाइन छपने के बाद भी अगर कोई उर्वरक खादों की ख़रीद और बिक्री में कालाबाज़ारी या फिर धोखाधड़ी करता पाया जाता है, तो उसके लिए सज़ा और ज़ुर्माने का प्रावधान होगा। इस योजना के माध्यम से केंद्र सरकार का मक़सद किसानों का हित करके उनकी आय बढ़ाना है।

अभी तक देश में 45.6 प्रतिशत किसान कृषि करते हैं। इन किसान के कल्याण के लिए सरकार ने एक देश एक उर्वरक योजना के माध्यम से उनको एक ही छत के नीचे उर्वरक खादों को सुलभता से उपलब्ध कराने का निर्णय लेकर कृषि उपज बढ़ाने का सपना देखा है। इस योजना की सफलता के सूत्रधार प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र बनेंगे। इस योजना के सफल होने पर पूरे देश में 3,00,000 से अधिक प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र खोले जाएँगे, जिनके माध्यम से एक छत के नीचे देश के किसानों को उचित मूल्य पर उर्वरकों-खादों, सभी प्रकार के बीजों, खरपतवारों और कीटों को नष्ट करने वाली सभी गुणवत्तापूर्ण दवाओं और कृषि यंत्रों, छोटे उपकरणों को भी उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र ग्राम स्तर पर, तहसील स्तर पर और ज़िला स्तर पर खोले जाएँगे।

अभी तक उर्वरक खादों के नाम पर किसान एक बोरे में कम उर्वरक खाद ही मिल पाती है। बीच में होने वाली उर्वरक खादों की चोरी रोकने के लिए सरकार नयी योजना लेकर आयी है। इन नयी बोरियों में उन्हें उर्वरक खाद पूरी मिलेगी। इससे किसानों की एक ही छत के नीचे कृषि की ज़रूरतें पूरी हो जाएँगी और वे ठगी का शिकार होने से भी बच जाएँगे।

हरियाणा सिविल जज परीक्षा

उच्च न्यायालय और सरकार आमने-सामने

हरियाणा में 241 सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती परीक्षा आयोजन का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच गया है। इसी वजह से अभी तक इन पदों की अधिसूचना जारी नहीं हो सकी है। क़ानूनी प्रक्रिया की वजह से अभी इसमें और भी समय लग सकता है। देरी की वजह से अभ्यर्थियों की चिन्ता बढ़ रही है। चयन प्रक्रिया काफ़ी लम्बी होती है। परीक्षा से चयन सूची जारी होने में एक वर्ष तक लग जाता है। कभी-कभार इससे भी ज़्यादा। वह भी तब, जब उसे न्यायालय में कोई चुनौती न दे।

न्यायिक परीक्षा कौन कराये? इसे लेकर अब अपरोक्ष तौर पर पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय और हरियाणा सरकार आमने-सामने है। हरियाणा सरकार हरियाणा लोक सेवा के माध्यम से चयन प्रक्रिया को पूरा करने की इच्छुक है; वहीं पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय पूरी चयन प्रक्रिया को कराना चाहता है। अब सर्वोच्च न्यायालय को चयन प्रक्रिया का दायत्वि किसे सौंपना है? यह फ़ैसला करना है। हरियाणा सरकार इस बात पर राज़ी है कि सिविल जज (जूनियर) की प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षा हरियाणा लोक सेवा आयोग कराये। इसके बाद साक्षात्कार की प्रक्रिया का दायत्वि उच्च न्यायालय का हो।

सर्वोच्च न्यायालय में राज्य सरकार पंजाब सिविल सर्विस ( न्यायिक शाखा) रुल्स-1951 पार्ट-सी के तहत गयी है। ये रुल्स हरियाणा में भी लागू होते हैं। राज्य सरकार के सर्वोच्च न्यायालय में न जाने से सरकार और हरियाणा लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठा को धक्का लगता। इसे बहाल रखने के लिए सरकार को यह क़दम उठाना ही था। हरियाणा में कर्मचारी चयन आयोग और लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठा कितनी है, यह किसी से छिपा नहीं है। बावजूद इसके अगर सरकार ऐसा चाहती है, तो कोई क़ानूनी अड़चन तो नहीं है।

हरियाणा लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा जैसी अहम परीक्षा में व्यापक स्तर पर धाँधली का पर्दाफ़ाश हुआ है। भाई भतीजावाद से लेकर पैसों के लेन-देन ने पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़ा कर दिया। परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाओं में सही जवाब लिखने, नंबर बढ़ाने और सूची में शामिल अभ्यथियों को किसी तरह साक्षात्कार तक पहुँचाने जैसे काले कारनामे हुए हैं। साक्षात्कार के नंबर लिखित परीक्षा में ज़्यादा अंक लाने वालों से ज़्यादा मिलना और अन्तिम रूप से चयन सूची में आने जैसे खेल यहाँ होते रहे हैं।

चयन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और योग्य अभ्यर्थी के चुने जाने की होनी चाहिए। लेकिन विडंबना यह कि यह केवल इसी राज्य में नहीं, बल्कि और राज्यों में भी होती है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय भी शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर पूरा दायत्वि निभाना चाहता है। वैसे न्यायालयों में चयन प्रक्रिया पूरी तरह से इनके ही हाथ में होती है।

राज्यों में न्यायिक अधिकारियों की चयन प्रक्रिया में सम्बन्धित लोक सेवा आयोग की भूमिका ज़रूर रहती है; लेकिन यह सब उच्च न्यायालय की निगरानी में ही होता है। बाक़ायदा स्पेशल रिक्रूटमेंट कमेटी गठित की जाती है, जिसमें जजों के अलावा राज्य की भी भागीदारी रहती है। साक्षात्कार की पूरी प्रक्रिया उच्च न्यायालय ही करता है। इसमें अन्य किसी का कोई दख़ल नहीं होता।

देश के अन्य राज्यों की तरह हरियाणा के न्यायालयों में भी स्वीकृत पदों के मुक़ाबले काफ़ी पद ख़ाली है। इनके ख़ाली रहने से न्याय प्रक्रिया में और भी देरी है। फिर तारीख़ पर तारीख़ का सिलसिला शुरू होता है और लम्बे समय तक चलता है। न्याय में देरी की एक बड़ी वजह न्यायालयों में ख़ाली पड़े पद हैं, जो विभिन्न कारणों की वजह से भरे नहीं जा पा रहे हैं। देश के न्यायालयों में इस समय साढ़े पाँच हजार से ज़्यादा पद ख़ाली हैं। नतीजतन लंबित मामलों की संख्या पाँच करोड़ तक पहुँच गयी है। लाखों मामले एक दशक से ज़्यादा समय से लंबित चल रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने पद सँभालने के बाद लंबित मामलों के निपटारे को प्राथमिकता से पूरा करने की बात कही थी। आँकड़ों की मानें, तो बैक लॉग में आंशिक कमी आयी है; लेकिन लक्ष्य के क़रीब तक पहुँचना इतना आसान नहीं है। न्यायालयों में ख़ाली पदों के रहने से लंबित मामले बढ़ते हैं; लेकिन इसके अलावा भी ऐसे बहुत-से कारक हैं। उदाहरण के तौर पर चंडीगढ़, हरियाणा और पंजाब में जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों की जाँच ही पुलिस पूरी नहीं कर पा रही है। बिना पूरी जाँच के चालान पेश होने में देरी और फिर ऐेसे मामलों में सवाल किये जाते हैं और जवाब माँगा जाता है। नोटिस जारी करने और जवाब माँगने का अंतहीन सिलसिला चलता रहता है।

हरियाणा में 14,58,000 मामले लंबित पड़े हैं। यहाँ के विभिन्न न्यायालयों में 308 पद ख़ाली हैं। यह कुल 778 स्वीकृत पदों का क़रीब 40 प्रतिशत होता है। जिस अनुपात में मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में पद भरे नहीं जा पा रहे हैं। पड़ोसी राज्य पंजाब की स्थिति कुछ बेहतर नज़र आती है। यहाँ कुल स्वीकृत पद 797 हैं। राज्य में 208 पद अभी भरे जाने हैं। यह भी स्वीकृत पदों का 26 प्रतिशत है। यहाँ लंबित मामलों की संख्या साढ़े नौ लाख के क़रीब है।

हिमाचल में साढ़े चार लाख से ज़्यादा मामले लंबित है और 16 पद रिक्त पड़े हैं। केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में कोई पद ख़ाली नहीं है। बढ़ते मामलों की वजह से यहाँ 80,000 से ज़्यादा लंबित चल रहे हैं। लंबित मामलों का बैक लॉग कम करने के लिए पहले भी इसे प्राथमिकता दी जाती रही है। इसके लिए गम्भीर प्रयास भी होते रहे हैं। लोक अदालत प्रणाली इसी प्रयास की एक कड़ी है, जिसमें बिना ज़्यादा ख़र्च के आपसी सहमति से मामले निपटाये जाते हैं। जितनी संख्या में इन अदालतों में मामलों का निपटारा होता है और नये मामले जुड़ते जाते हैं।

किसी भी मामले की पुलिस जाँच और अदालत में आरोप-पत्र दायर की समय अवधि होती है। विशेष मामलों में इसके लिए अतिरिक्त समय का प्रावधान भी होता है। जब मामला न्यायालय में चल जाता है, तो उसके बाद उसके निपटारे की समय अवधि तय नहीं होती है। कम-से-कम और ज़्यादा-से-ज़्यादा समय की अवधि तय हो सकती है। फास्ट ट्रैक अदालतों में ऐसा होता है और यही वजह है कि वहाँ लंबित मामलों की संख्या अन्य अदालतों के मुक़ाबले नगण्य होती है। विशेष मामलों को ही फास्ट ट्रैक अदालतों में चलाने की अनुमति मिलती है।

न्याय के लिए बरसों इंतज़ार न करना पड़े, इसके लिए गम्भीर विमर्श और ठोस व्यवस्था बनाने की ज़रूरत है। देश की आबादी के हिसाब से मामलों की संख्या तो निश्चित रूप से बढ़ेगी ही। जाँच एजेंसियों और पुलिस का काम भी पहले के मुक़ाबले ज़्यादा हो गया है। ऐसे में सारा बोझ न्यायालयों पर ही तो आएगा। उच्च न्यायालय बढ़ते लंबित मामलों के निपटारे के लिए स्वीकृत पदों को भरने के लिए राज्य सरकार से माँग कर सकता है। उसके बाद राज्य सरकार उसे बजट के हिसाब से मंज़ूर कर आगामी प्रक्रिया पूरी करती है।

अगर न्यायालयों में स्वीकृत पद रिक्त पड़े हैं, तो ज़िम्मेदार सरकार ही है। लेकिन सरकारों के भी अपने-अपने तर्क होते हैं। इसमें प्रमुख तौर पर कारण बजट ही होता है। न केवल न्यायिक अधिकारी, बल्कि सहायक स्टाफ की भी कमी रहती है। इनकी कमी से भी कामकाज प्रभावित होता ही है। यही वजह है कि तारीख़ पर तारीख़ का क्रम बना रहता है। समय पर न्याय बहुत बड़ी बात होती है; लेकिन इसके लिए सरकारों को बजट में पहले से ज़्यादा वृद्धि करनी होगी, वरना लंबित मामलों की संख्या इसी तरह से बढ़ती रहेगी।

लंबित मामलों के आँकड़े

नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के आँकड़ों के मुताबिक, न्यायालयों में एक साल से लेकर 30 साल तक के मामलों पर नज़र डालें, तो सुखद यह कि शून्य से एक (0-1) साल के लंबित मामलों की संख्या सबसे ज़्यादा 36 प्रतिशत है। यानी एक-तिहाई लंबित मामले छोटी अवधि के ही हैं। इसके अलावा एक से तीन (1-3) साल तक के 21 प्रतिशत मामले, तीन से पाँच (3-5) साल के 16 प्रतिशत मामले, पाँच से 10 (5-10) साल के 16 प्रतिशत मामले, 10 से 20 साल के 8 प्रतिशत मामले, 20 से 30 साल के 1.15 प्रतिशत मामले और 30 साल से अधिक अवधि के 0.02 प्रतिशत मामले लंबित हैं।

सिविल और आपराधिक मामलों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। साइबर ठगी के मामले भी एक दशक के दौरान काफ़ी बढ़े हैं। देश में सैकड़ों करोड़ों की साइबर ठगी के मामले हो रहे हैं। इनमें से काफ़ी संख्या में लोग ठगी का शिकार होने के बाद भी पुलिस के पास नहीं जाते। उन्हें लगता है कि ठगों को पकडऩा ही मुश्किल है। अगर सफलता मिल भी गयी, तो रक़म के लिए उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़ेंगे।

बचाव की तलाश में हेमंत

झारखण्ड की अजीब विडंबना है। राज्य गठन के 22 साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान पूर्ण बहुमत की सरकार केवल एक बार बनी। भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली रघुवर सरकार ने बग़ैर विघ्न-बाधा के पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया। मौज़ूदा गठबंधन की हेमंत सरकार के साढ़े तीन साल हो चुके हैं। लेकिन हेमंत सरकार गठन (दिसंबर, 2019) के बाद से ही अस्थिरता का दंश झेल रही। सरकार के मुखिया हेमंत सोरेन जहाँ एक के बाद एक आरोपों में घिरते जा रहे हैं, वहीं विपक्षी भाजपा उनको सत्ता से हटाने का रास्ता अख़्तियार कर रही है। हेमंत इनसे उबरने का रास्ता तलाश रहे हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि वह विकास का प्रयास नहीं कर रहे; लेकिन उसमें रफ़्तार की कमी है।

इसे लेकर सरकार शकंकित है। बढ़े हुए मनोबल वाले अधिकारी निरंकुश हैं और मनमानी कर रहे हैं। जिस राज्य में अकूत खनिज सम्पदा हो, जहाँ पर्यटन की असीम संभावनाएँ हों, वहाँ ख़ुशहाली की चमक होनी चाहिए। इसके उलट जनता का मनोबल टूट रहा है। जनता की परेशानी बढ़ रही है। लोगों के चेहरों पर में ख़ुशहाली की जगह आशंका और परेशानी की लकीरें ज़्यादा दिख रही हैं।

मुख्यमंत्री का संकट

मुख्यमंत्री हेमंत सोरने की खनन पट्टा लीज मामले में बीते वर्ष उनकी सदस्यता पर संकट गहराया था। इस पर राज्यपाल ने क़ानूनविदों और चुनाव आयोग से मंतव्य लिया। सदस्यता जाने और सरकार गिरने की चर्चा होने लगी। हेमंत ने भी अपने सहयोगी दलों के विधायकों को लेकर रांची से छत्तीसगढ़ तक ले जाकर एकजुट रखा। विधानसभा में एक बार फिर फ्लोर टेस्ट दिखाया। हालाँकि राज्यपाल ने अभी तक मामले का ख़ुलासा नहीं किया है; लेकिन तलवार लटकी हुई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बीते वर्ष नवंबर में साहिबगंज में अवैध खनन मामले में हेमंत सोरेन को पूछताछ के लिए बुलाया था। ईडी के अधिकारियों ने उनसे 8 घंटे पूछताछ की थी। इस मामले में हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा जेल में हैं। मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार अभिषेक कुमार समेत कई लोगों से पूछताछ हो चुकी है।

इस दौरान अवैध खनन के साथ-साथ सेना की ज़मीन सहित रांची में अन्य ज़मीन फ़ज़ीवाड़ा का मामला सामने आ गया। रांची के पूर्व उपायुक्त छवि रंजन, राज्य के प्रतिष्ठित कारोबारी विष्णु अग्रवाल समेत कई लोगों पर ईडी ने शिकंजा कसा है। इस मामले में छवि रंजन और विष्णु अग्रवाल समेत आधा दर्ज़न लोग जेल में हैं। अब ईडी ने इसी मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पूछताछ के लिए समन भेजा था।

ईडी के ख़िलाफ़ पहुँचे कोर्ट

ईडी ने भूमि फ़ज़ीवाड़ा मामले और उनकी सम्पत्ति को लेकर पूछताछ के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को तलब किया था। उन्हें 14 अगस्त को ईडी के रांची स्थित जोनल कार्यालय बुलाया गया था। वह समन पर हाज़िर नहीं हुए। सूत्रों के मुताबिक, हेमंत ने ईडी को पत्र लिखा, जिसमें समन को राजनीति से प्रेरित और ग़ैर-क़ानूनी बताया था। उन्होंने ईडी के सहायक निदेशक को लिखे पत्र में कहा था कि समन में ऐसी किसी बात का ज़िक्र नहीं है, जिससे सम्पत्ति को लेकर मेरे ख़िलाफ़ जाँच की सम्भावना हो। जहाँ तक सम्पत्ति की बात है, तो इससे जुड़ी सारी जानकारी समय-समय पर आयकर रिटर्न में दी जाती रही है।

अगर ईडी को ऐसे किसी दस्तावेज़ की ज़रूरत है, जिसका उल्लेख पहले नहीं किया गया है; तो वह उन्हें उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं। हेमंत ने ईडी से कहा कि वह समन वापस ले, अन्यथा वह क़ानून का सहारा लेने को बाध्य होंगे। हेमंत के पत्र को नज़रअंदाज़ करते हुए ईडी ने उन्हें फिर 24 अगस्त को पेश होने के दूसरा समन जारी कर दिया। हेमंत सोरेन 24 अगस्त को ईडी के सामने पेश नहीं हुए। वह समन के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुँच गये। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की।

याचिका दायर करने के बाद 24 अगस्त की शाम को हेमंत ने मैसेंजर से ईडी को सीलबंद पत्र भेजा। पत्र में क्या है? इस पर हेमंत सोरेन ने कोई बयान नहीं दिया। ईडी भी अधिकारिक रूप से अभी तक कुछ नहीं कहा है। सूत्रों के मुताबिक, हेमंत सोरेन ने पत्र में समन को राजनीति से प्रेरित क़रार देते हुए ग़ैर-क़ानूनी बताया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के बारे में ईडी को सूचित किया है। जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने फ़िलहाल कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है। इसलिए ईडी फिर समन भेज सकती है। सूत्रों के मुताबिक, ईडी क़ानूनी पहलू को देख रही है।

राजनीतिक दाँव-पेंच

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन एक ओर जहाँ आरोपों के कारण जाँच एजेंसियों में फँस रहे, वहीं राजनीतिक दाँव-पेंच में भी उलझ रहे हैं। जैसे-जैसे उन पर ईडी का दबाव बढ़ता है, वह राजनीतिक रूप से ख़ुद को मज़बूत करने का प्रयास करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने 1932 खतियान आधारित स्थानीयता, ओबीसी के 27 फ़ीसदी आरक्षण सम्बन्धित अन्य मुद्दों को हवा दे दी। विधानसभा से विधेयक पारित कर राज्यपाल को भेज दिया। हालाँकि राज्यपाल ने दोनों विधेयकों में ख़ामी बताते हुए सरकार को लौटा दिया है। अब हेमंत सोरेन इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर प्रहार कर रहे हैं। जनता की सहानुभूति लेने का प्रयास कर रहे। उन्होंने दोनों मुद्दों से सम्बन्धित विधेयक को फिर से विधानसभा से पारित कर राज्यपाल के पास भेजने का आश्वासन दिया है। इसका कितना लाभ मिलेगा? यह तो वक़्त बताएगा। फ़िलहाल भाजपा उन्हें हर तरफ़ से घेरने में लगी है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इन दिनों आदिवासी और ओबीसी कार्ड खेल रहे हैं। भाजपा ने इसका काट निकाल लिया है। ग़ैर-आदिवासी नेताओं के कुछ ज़्यादा बोलने पर आदिवासियों की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती थी। इसलिए भाजपा ने पिछले महीने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया।

नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी आदिवासी नेता हैं। उन्होंने संथाल क्षेत्र ख़ासकर हेमंत सोरेन के विधानसभा क्षेत्र से संकल्प यात्रा शुरू की है। वह राज्य के सभी 81 विधानसभा क्षेत्रों में जाएँगे और सभा को सम्बोधित करेंगे। बाबूलाल खुलकर मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे हैं। हेमंत सोरेन पर आदिवासियों की ज़मीन लूटने समेत अन्य बातों लेकर प्रहार कर रहे। आदिवासियों को छलने का आरोप लगा रहे।

उपचुनाव पर नज़र

राज्य में डुमरी विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव हो रहा है। यहाँ 5 सितंबर को मतदान होगा। झामुमो नेता शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो के जुलाई में निधन के कारण यह सीट ख़ाली हुई थी। गठबंधन सरकार ने झामुमो प्रत्याशी बेबी देवी को मैदान में उतारा है। वह स्व. जगरनाथ महतो की पत्नी हैं। वहीं एनडीए ने आजसू के यशोदा देवी को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा और आजसू ने पूरी ताक़त झोंक रखी है। लेकिन हेमंत सोरेन ने बेबी देवी को पहले ही कैबिनेट मंत्री बनाकर सहानुभूति का दाँव चल दिया है। झामुमो, कांग्रेस और राजद तीनों पार्टियाँ बेबी देवी को जिताने के लिए पूरे दम$खम के साथ मैदान में दिख रही हैं। इस सीट की जीत-हार और वोटों का प्रतिशत अगले वर्ष होने वाले चुनाव के लिए संकेत तो देगा ही, साथ ही इससे मुख्यमंत्री के साढ़े तीन साल के कार्यकाल और आरोपों के असर का भी आकलन करने का मौक़ा मिलेगा।

भविष्य की बातें

अगले वर्ष देश में आम चुनाव है। झारखण्ड में भी अगले वर्ष नवंबर-दिसंबर में विधानसभा चुनाव होना है। हालाँकि लोकसभा के साथ ही विधानसभा का चुनाव कराने की चर्चा है। वर्तमान में राज्य मुश्किल दौर से गुज़र रहा। राज्य में विकास की गति धीमी है। पलायान जारी है। अपराध का ग्राफ बढ़ा है। रोज़गार की कमी है। स्वास्थ्य, शिक्षा आदि जितनी मूलभूत सेवाओं की बात की जा रही, वह धरातल पर कम उतरे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 1932 खतियान आधारित स्थानीयता, ओबीसी आरक्षण आदि के साथ आदिवासी कार्ड खेला है, इसका कितना $फायदा उन्हें मिलेगा? यह अभी भविष्य के गर्भ में छिपा है। हेमंत जाँच एजेंसियों और विपक्ष के दाँव-पेंच से ख़ुद को निकाल ले जाते हैं या इसमें फँस जाते हैं? यह भी आने वाला वक़्त ही बताएगा। लेकिन इस वक़्त जनता को इनसे विषयों से हटकर सोचने की ज़रूरत है।

बीते 22 साल में गठबंधन की सरकार को जनता देख चुकी है। जनता को अगर राज्य का विकास चाहिए, तो पूर्ण बहुमत की सरकार बनानी होगी। चाहे वह झामुमो की हो, कांग्रेस की हो या भाजपा की हो; लेकिन एक पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार हो। तभी विकास की उम्मीद की जा सकती है। वर्ना ऐसे ही जोड़-तोड़ की हिलती-डुलती सरकार चलती रहेगी और ख़ामियाज़ा जनता भुगतती रहेगी।

अमेठी में गरमाया चुनावी माहौल

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से पुल बनवाने की माँग करने वाला ग्राम प्रधान गिरफ़्तार

केंद्र सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री एवं अमेठी की सांसद स्मृति ईरानी के क्रोध के चर्चे आजकल हर ओर हो रहे हैं। बीते दिनों अमेठी दौरे के समय उनका क्रोध एक पत्रकार की नौकरी खा गया, तो उनके दूसरे दौरे ने एक ग्राम प्रधान को हथकडिय़ाँ लगवा दीं।

कांग्रेस के एक स्थानीय नेता ने कहा कि महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी का क्रोध एवं घमंड दोनों ही चौथे आसमान पर रहते हैं। केंद्रीय मंत्री कभी राहुल गाँधी जी पर झूठे आरोप लगाती हैं, तो कभी किसी के साथ स्वयं अभद्रता करते हुए डराती हैं। वह जब सरकार में नहीं थीं, तब तो 350 रुपये के गैस सिलेंडर को लेकर धरने पर बैठती थीं; मगर जब वही गैस का सिलेंडर 1140 रुपये से अधिक में भरा जाने लगा, तब उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई। अब हार के डर से बार बार अमेठी आ रही हैं।

ग्राम प्रधान पर आरोप

महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी 24 अगस्त को दो दिवसीय दौरे पर अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पहुँची थीं। अमेठी पहुँचकर उन्होंने सबसे पहले रंजीत सिंह नामक एक ब्लॉक प्रमुख की मृत्यु पर उनके घर जाकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किये एवं उनके परिजनों को सांत्वना दी। मगर दूसरी ओर उन्होंने अमेठी के जगदीशपुर के बहादुरपुर गाँव में जन सुनवाई सभा की, जिसमें मंगरा गाँव के ग्राम प्रधान इमरान ख़ान द्वारा लैटर पैड पर चमरोरा नदी पर पुल बनवाने की माँग करते ही केंद्रीय मंत्री ने प्रधान इमरान ख़ान को पुलिस से तत्काल गिरफ़्तार करवा दिया।

स्थानीय लोगों से प्राप्त जानकारी बताती है कि मंगरा के ग्राम प्रधान इमरान ने महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी से जनसुनवाई सभा में जब कहा कि मैडम पुल बनवा दीजिए; वैसे ही उन्होंने कहा कि इमरान प्रधान तुम्हीं हो? प्रधान बनने के बाद देश-विरोधी गानों के साथ रैली निकालते हो? वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। देश विरोधी व्यक्ति कैसे यहाँ आ गया? यह कहते हुए केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी पुलिस से कहती हैं कि इसे अंदर कीजिए। स्मृति ईरानी ने यह भी कहा कि अभी तो कार्यक्रम में हूँ। फ़ुरसत मिलेगी, तो इन पर विधिक कार्यवाही करवाएँगे।

केंद्रीय मंत्री के प्रति आक्रोश

ग्राम प्रधान को हथकड़ी लगवाने के मामले में अमेठी के लोगों ने केंद्रीय मंत्री स्मृति के प्रति आक्रोश है। केंद्रीय मंत्री के विरोध में सामने आए एक वीडियो में अमेठी के अधिकतर लोग महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी पर क्रोधित होते दिख रहे हैं। लोग महँगाई के साथ स्मृति के क्रोध एवं उनकी आदतों के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे हैं। कहने वाले कहते हैं कि उन्हें अमेठी में आगामी चुनाव हारने का भय सता रहा है। इसलिए वह बार-बार अमेठी पहुँच रही हैं। मगर उनके बार-बार अमेठी पहुँचने से कोई लाभ होने के आसार नहीं हैं; क्योंकि स्मृति ईरानी स्वयं अपनी छवि को क्रोध की आग में जला रही हैं। पिछले दौरे के दौरान एक पत्रकार के प्रश्न पूछने पर केंद्रीय मंत्री इतनी क्रोधित हुईं कि उसकी नौकरी चली गयी।

अमेठी का चुनावी महत्त्व

अमेठी उत्तर प्रदेश का 72वाँ ज़िला है, जो कि कांग्रेस पार्टी के परिवार के उन नेताओं का गढ़ रहा है; जो केंद्र की सत्ता में रहे हैं। कहने वाले कहते हैं कि अमेठी कांग्रेस का दूसरा घर है, जहाँ से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चुनाव लडऩे के लिए कांग्रेस परिवार का कोई-न-कोई सदस्य मैदान में उतरता है। इसे जनपद बनाने वाली उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती हैं। उन्होंने 2010 में अमेठी में सुल्तानपुर की तीन तहसीलों एवं रायबरेली की दो तहसीलों को मिलाकर इसे जनपद बनाया। इस जनपद का क्षेत्रफल 2,329.11 वर्ग किलोमीटर है, जहाँ वर्तमान में अनुमानित जनसंख्या 5,90,400 से अधिक बतायी जाती है। गाँधी परिवार की कर्मभूमि अमेठी से भारतीय जनता पार्टी की नेत्री स्मृति ईरानी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी को हरा दिया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी की जनता का रुख़ किधर रहता है, यह अभी से कहना आसान नहीं मगर इतना अवश्य है कि यहाँ लोग केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी एवं उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के विरोध में खुलकर मुखर हो रहे हैं।

चुनावों से पहले सीडब्ल्यूसी का विस्तार

इस वर्ष पाँच राज्यों- छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और मिजोरम में विधानसभा चुनावों के बाद अगले वर्ष 2024 की शुरुआत में लोकसभा चुनाव होने हैं। चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गये हैं। इसी के मद्देनज़र कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की जयंती पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) का विस्तार करते हुए अपनी नयी टीम का ऐलान कर दिया है। अक्टूबर 2022 में मल्लिकार्जुन खडग़े कांग्रेस अध्यक्ष बने थे और उस वक़्त की 23 सदस्यीय सीडब्ल्यूसी को उन्होंने भंग कर दिया था। अब उन्होंने सीडब्ल्यूसी में 84 सदस्यीय टीम का गठन किया है। इनमें 39 सदस्य, 18 स्थायी आमंत्रित सदस्य, 14 प्रभारी, 9 विशेष आमंत्रित सदस्य और 4 पदेन सदस्य शामिल हैं। सीडब्ल्यूसी के 39 सदस्यों में सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और शशि थरूर को भी शामिल किया गया है।

किसी जानकार ने बताया कि कांग्रेस के बाग़ी नेताओं के ग्रुप जी-23 से कांग्रेस नेतृत्व ने एक बात ज़रूर समझी है कि किसी भी नेता को ख़ाली मत छोड़ो; ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। सीडब्ल्यूसी की संख्या को बढ़ा दिया गया और लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं को इसमें शामिल कर लिया गया है। दरअसल इतनी बड़ी संख्या में सीडब्ल्यूसी अब अघोषित मार्गदर्शन मंडल है। आप इस महत्त्वपूर्ण कमेटी के सदस्य हैं। आपको अपनी इच्छा के अनुसार यहीं से रिटायर होना है। कांग्रेस कार्य समिति के गठन के बाद अब जल्द ही चुनावी राज्यों को छोडक़र प्रभारियों और महासचिवों की ज़िम्मेदारियों में भी बदलाव किया जाएगा। इसके अंतर्गत कई प्रभारियों को उनके वर्तमान प्रदेश से हटाकर किसी दूसरे प्रदेश की ज़िम्मेदारी सौंपी जाएगी। साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन किया जाएगा। इससे जिन लोगों के नाम सीडब्ल्यूसी में नहीं आये हैं, उनके लिए अभी उम्मीद बाक़ी है।

सीडब्ल्यूसी का गणित

आगामी विधानसभा-लोकसभा के चुनावों के मद्देनज़र कांग्रेस अध्यक्ष ने नयी कार्यसमिति बनाकर चुनावी रणनीति को धार देनी शुरू कर दी है। कांग्रेस के लिए राजस्थान के विधानसभा चुनाव बेहद अहम हैं, क्योंकि वहाँ लम्बे समय से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट में कलह चल रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए खडग़े ने टीम में राजस्थान की भागीदारी 4 से बढ़ाकर 7 कर दी है। संख्या बढ़ाने का मक़सद यह है कि यहाँ ज़मीनी स्तर लोगों तक पहुँच बनी रहे।

अगले चुनावी राज्य छत्तीसगढ़ की बात करें, तो खडग़े ने सीडब्ल्यूसी में केवल ताम्रध्वज साहू को तेइसवें नंबर पर जगह दी है। मध्य प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र 39 सदस्यों की टीम में वहाँ से पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह को नौवें नंबर पर जगह दी गयी है। टीम में कमलेश्वर पटेल और मीनाक्षी नटराजन भी हैं। तेलंगाना से स्थायी आमंत्रित सदस्यों में पूर्व मंत्री दामोदर राजा नरसिम्हा को और विशेष आमंत्रित सदस्यों में पूर्व विधायक वामशी चंद रेड्डी को शामिल किया गया है।

कांग्रेस के बाग़ी नेताओं के पहले के ग्रुप जी-23 में कुल 23 नेता शामिल थे। किन्तु कांग्रेस अध्यक्ष खडग़े ने वृद्ध नेताओं, यंग जनरेशन, एससी / एसटी / ओबीसी और बाग़ी सुर दिखा चुके जी-23 ग्रुप के नेताओं को भी टीम में जगह दी है। खडग़े ने सफलतापूर्वक जी-23 ग्रुप के फैक्टर को काउंटर किया है। जी-23 ग्रुप के नेताओं में से $गुलाम नबी आज़ाद और कपिल सिब्बल कांग्रेस छोड़ चुके हैं।

संकल्प से शुरुआत

आगामी विधानसभा और लोकसभा के चुनावों को देखते हुए कांग्रेस पार्टी के छत्तीसगढ़ के रायपुर में इसी वर्ष फरवरी माह में हुए तीन दिवसीय महाधिवेशन में यह संकल्प लिया गया था कि संगठन और सीडब्ल्यूसी में सभी वर्गों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को क़रीब 50 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। अब इस पर अमल करते हुए सीडब्ल्यूसी के सभी तरह के 84 सदस्यों में से ओबीसी के 16, अनुसूचित जाति के 12, अनुसूचित जनजाति के 4 और अल्पसंख्यक वर्ग के 9 नेताओं को जगह दी गयी है। इसके अलावा सभी वर्ग की 15 महिलाओं को सीडब्ल्यूसी का सदस्य बनाया गया है। वहीं सामान्य वर्ग के 43 नेताओं को जगह दी गयी है।

कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यालय के प्रभारी व सीडब्ल्यूसी सदस्य गुरदीप सिंह सप्पल ने बताया है कि 50 साल के आसपास के 21 नेताओं को सीडब्ल्यूसी में जगह दी गयी है, जो कुल सदस्यों के क़रीब 25 फ़ीसदी हैं। सीडब्ल्यूसी में आमंत्रित और पदेन सदस्यों सहित सभी की औसत आयु 62 वर्ष है। वहीं 39 सदस्यों की औसत आयु 66 वर्ष है। इन आँकड़ों में पाँच सदस्यों की सटीक उम्र सार्वजनिक न होने के कारण उन्हें इस औसत में शामिल नहीं किया गया है। सीडब्ल्यूसी को सन् 1920 में गठित किया गया था। कांग्रेस के नागपुर सेशन में इसका ऐलान किया गया था और इसकी अध्यक्षता सी. विजयराघवाचार्य ने की थी। इसके चुनाव दो बार हो चुके हैं।

आक्रोश में मध्य प्रदेश के आदिवासी

मध्य प्रदेश में विगत 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस की छुट्टी ख़त्म कर दी गयी, जिससे राज्य के आदिवासी समुदाय में काफ़ी आक्रोश देखने को मिला। वहीं मध्य प्रदेश सरकार में शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने विश्व आदिवासी दिवस के सम्बन्ध में विवादास्पद बयानबाज़ी कर इस मामले में आग में घी डालने का काम किया। राज्य के आदिवासी संगठनों के कार्यकर्ताओं एवं बुद्धिजीवियों ने कहा कि इससे भाजपा की सरकार को चुनाव में काफ़ी नुक़सान होगा; क्योंकि आदिवासी समुदाय में आक्रोश व्याप्त होने के कारण आदिवासी भाजपा को शायद ही वोट करेंगे।

दरअसल मणिपुर हिंसा सहित देश के अन्य आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर देश भर के तमाम आदिवासी समुदायों में पहले से ही ग़ुस्सा व्याप्त है, जिसके विरोध में विश्व आदिवासी दिवस के मौक़े पर मध्य प्रदेश सहित अन्य आदिवासी बहुल राज्यों- छत्तीसगढ़, झारखण्ड, राजस्थान, ओडि़शा, महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों के आदिवासियों ने हिंसा के विरोध में रैली निकालकर प्रदर्शन किया। लेकिन मध्य प्रदेश सरकार द्वारा इस बार विश्व आदिवासी दिवस का राजकीय छुट्टी को समाप्त करने पर आदिवासियों का ग़ुस्सा और बढ़ गया। इस आक्रोश को ज़ाहिर करते हुए आदिवासियों ने मध्य प्रदेश के सभी आदिवासी विकासखंडों एवं ज़िला स्तर पर ज्ञापन सौंपा और रैली निकालकर मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की।

विदित हो कि मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकर ने विश्व आदिवासी दिवस के मौक़े पर ऐच्छिक अवकाश को समाप्त कर दिया है। बताते चलें कि सन् 2019 में कमलनाथ सरकार द्वारा विश्व आदिवासी दिवस पर अनिवार्य अवकाश घोषित किया गया था; लेकिन उसके अगले साल कांग्रेस सरकार को गिराकर अस्तित्व में आयी भाजपा सरकार ने इसे अनिवार्य से ऐच्छिक अवकाश में तब्दील कर दिया। यह स्थिति सन् 2022 तक बनी रही। यह भी उल्लेखनीय है कि इस सम्बन्ध में राज्य के अनेक आदिवासी जनप्रतिनिधियों एवं बुद्धिजीवियों ने इस बार भी अवकाश घोषित करने की माँग की थी; लेकिन मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने उनकी माँग को नज़रअंदाज़ कर दिया।

वहीं शिवराज सिंह चौहान सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल इंदर सिंह परमार ने विश्व आदिवासी दिवस का विरोध करते हुए इसे विदेशी संस्कृति बता दिया। मंत्री के इस बयान से राज्य के आदिवासी समुदाय का आक्रोश और भडक़ गया और राज्य की सियासत गरमा गयी। कई जनप्रतिनिधियों ने इस बयान को आदिवासी विरोधी बताया, जबकि कई आदिवासी बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि भाजपा सरकार को इसका परिणाम आनेवाले नवंबर-दिसंबर के विधानसभा चुनाव में भुगतने पड़ेंगे। आदिवासी समाज उनके ख़िलाफ़ वोट करेगा।

विगत दिनों मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा था- ‘भारत में विश्व आदिवासी दिवस मनाना विदेशी संस्कृति है। इंग्लैंड ने अमेरिका के आदिवासियों पर अत्याचार किया, जिसके प्रायश्चित स्वरूप संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस की शुरुआत की। भारत में इसे मनाने का कोई औचित्य नहीं है।’

मंत्री के इस बयान पर जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन के राष्ट्रीय संरक्षक एवं मध्य प्रदेश के मनावर विधानसभा क्षेत्र से विधायक डॉ. हिरालाल अलावा ने अफ़सोस जताया और कहा कि विश्व आदिवासी दिवस और संयुक्त राष्ट्र के बारे मे मंत्री महोदय को कुछ भी ज्ञान नहीं है। डॉ. अलावा ने आगे कहा- ‘संयुक्त राष्ट्र ने विश्व आदिवासी दिवस की घोषणा की है और विश्व योग दिवस की भी। जब मंत्री महोदय विश्व योग दिवस में बढ़-चढक़र भाग लेते हैं और वह दिवस उनके लिए विदेश संस्कृति नहीं है, तो विश्व आदिवासी दिवस कैसे विदेशी संस्कृति है? दरअसल मंत्री महोदय आदिवासी विरोधी हैं।’

डॉ. अलावा ने कहा- ‘मध्य प्रदेश देश का सर्वाधिक आदिवासी जनसंख्या बहुल प्रदेश है। प्रदेश के अलग-अलग आदिवासी समुदाय अपनी विशेष संस्कृति, अनूठी परम्पराओं एवं रीति-रिवाज़ों के कारण अपनी एक विशिष्ट संवैधानिक पहचान रखते हैं, जिसे संरक्षित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा दिसंबर, 1994 में प्रतिवर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गयी। तबसे ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में निवासरत आदिवासी समाज 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में वृहद् स्तर पर हर्षोल्लास के साथ मनाता आ रहा है। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर पूर्व में ख़ुद मुख्यमंत्री एवं कई मंत्री भी इस कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। इस प्रकार स्कूल शिक्षा मंत्री ने न सिर्फ़ अपने सरकार पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं, बल्कि देश-प्रदेश के सभी आदिवासी समुदाय का अपमान किये हैं। उन्हें देश-प्रदेश के समस्त आदिवासी समुदाय से माफ़ी माँगना चाहिए। मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान सरकार आदिवासी विरोधी है। शिवराज सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस के सार्वजनिक अवकाश को ख़त्म कर दिया और अब उनके मंत्री आदिवासियों के बारे में अपमानजनक बयानबाज़ी कर रहे हैं।’

वहीं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा- ‘आदिवासियों को विदेशी बताना आदिवासियों का अपमान है। केंद्र सरकार के आँकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर सबसे ज़्यादा अत्याचार हो रहा है। आदिवासी हमारे मध्य प्रदेश के मूल निवासी हैं। उन्हें विदेशी या अलग-अलग नाम से पुकारना आदिवासियों का अपमान है। आज विश्व आदिवासी दिवस है; लेकिन ये दु:ख की बात है कि देश में सबसे ज़्यादा अत्याचार मध्य प्रदेश के आदिवासियों पर हो रहे हैं। ये हालत किसी से भी छुपे हुए नहीं हैं।’

युवा आदिवासी नेता एवं जयस संगठन भोपाल संभाग के अध्यक्ष बंटी उईके ने कहा- ‘विश्व आदिवासी दिवस को शिक्षा मंत्री द्वारा विदेशी संस्कृति या ईसाइयों का त्योहार कहने वाले बयानों से लगता है कि उन्हें इतिहास का कोई ज्ञान नहीं है। अगर यह इतिहास पढ़ लेते, तो इनको पता चलता कि आदिवासी कौन हैं? और आदिवासी दिवस क्यों मनाया जाता है? ऐसे लोग शिक्षा के नाम पर कलंक हैं। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि 8 प्रतिशत आदिवासी ही इस देश के मूल-निवासी हैं, तो शिक्षा मंत्री परमार किस आधार पर आदिवासियों से भी पहले आर्यों के इस भूमि पर रहने की बात कर रहे हैं? आर्य तो बाहर से आये हैं। यह बात तो ख़ुद सुप्रीम कोर्ट कहता है। इतिहासकार भी यही बात कहते हैं।’

बंटी उईके ने कहा- ‘भाजपा और आरएसएस के लोग आदिवासियों को वनवासी कहकर उनका अपमान करते हैं। मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर सबसे ज़्यादा अत्याचार करने वाले यही लोग हैं। विश्व आदिवासी दिवस की छुट्टी भी समाप्त कर दी और अब आदिवासियों पर अपमानजनक टिप्पणी कर रहे हैं। यह आदिवासी विरोधी सरकार है। इसका ख़ामियाज़ा सरकार को विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा। आदिवासी समाज अब इनको वोट नहीं देगा। इसके लिए गाँव-गाँव में जागरूकता फैलायी जा रही है। मैं ख़ुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी से हूँ। और अगले महीने से हर गाँव-गाँव आदिवासी अधिकार यात्रा निकाली जाएगी, जिसमें भाजपा सरकार के आदिवासी विरोधी नीतियों का पर्दाफाश किया जाएगा। बुधनी में 50 प्रतिशत से ज़्यादा आदिवासी हैं। आदिवासियों के अपमान करने के कारण इस बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।’

मध्य प्रदेश के धार ज़िले के आदिवासी कार्यकर्ता देवेंद्र सिंह बबलू दरबार ने कहा- ‘भाजपा के लोगों द्वारा आर्यों को मूलनिवासी कहना और आदिवासियों को वनवासी कहना आदिवासी समुदाय का अपमान है। आने वाले विधानसभा चुनाव में इसका ख़ामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ेगा। आदिवासी समाज के लोग उनका विरोध करेंगे।’

मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार का सोशल मीडिया में भी काफ़ी विरोध देखने को मिला। धन सिंह गोंड नामक एक यूजर ने सोशल मीडिया में लिखा- ‘स्कूल शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने विश्व आदिवासी दिवस पर जो ग़लत बयान दिया, उसका मैं पुरज़ोर विरोध करता हूँ। भाजपा नेताओं की हमेशा से आदिवासियों के प्रति घटिया सोच रही है।’

घनश्याम मरकाम नामक एक यूजर ने लिखा- ‘भाजपा के लोगों को न आदिवासियों का अधिकार पसंद है और न उनका विश्व आदिवासी दिवस। ऐसा प्रतीत होता है कि आदिवासियों के असली दुश्मन यहीं लोग हैं।’ अरविंद मुझाल्दा नामक एक अन्य यूजर ने लिखा कि यूएनओ द्वारा घोषित दूसरे दिवसों का ये लोग विरोध नहीं करते हैं, सिर्फ़ विश्व आदिवासी दिवस से दिक़्क़त है। आदिवासियों की एकता देखकर इनकी हवा निकल गयी है।’

विश्व आदिवासी दिवस पर कमलनाथ ने अपने संदेश में कहा- ‘कांग्रेस पार्टी आदिवासी हितैषी पार्टी है और विश्व आदिवासी दिवस और भारत छोड़ो आन्दोलन दिवस मना रही है। पार्टी पूरे प्रदेश में कई बड़े कार्यक्रम आयोजित कर रही है। भोपाल के साथ-साथ इंदौर में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग एकजुट हुए हैं। समुदाय के लोग महारैली निकाल रहे हैं। इंदौर के लाल बाग़ से शुरू हुई रैली 2:00 बजे राजीव गाँधी चौराहे पर समाप्त होगी। राजीव गाँधी चौराहा स्थित गार्डन में सामाजिक विषय और मुद्दों पर समुदाय चर्चा करेगा। यहाँ क्रान्ति सूर्य जननायक टंट्या भील मामा की प्रतिमा पर माल्यार्पण भी किया जाएगा।

सही रास्ता

जीवन के जितने भी मसले हैं, सभी सही और ग़लत की वजह से ही हैं। सवाल यही है कि सही क्या है? ग़लत क्या है? उलझन यह है कि सही और ग़लत की परिभाषा तो है; लेकिन निश्चित मापदण्ड नहीं है। लेकिन परिभाषा भी हर जगह खरी नहीं उतरती है। इसमें भी विचारों का घालमेल है। यही वजह है कि संसार में एक धर्म, एक पंथ, एक मत के अनुगामी कई लोग भी कई मामलों में एकमत नहीं हैं। हो भी नहीं सकते; और कभी हुए भी नहीं। धर्म के नाम पर इसी बात की लड़ाई है। यह लड़ाई कभी ख़त्म भी नहीं हो सकती। इसी मतभेद के चलते धर्म के नाम पर अलग-अलग रास्ते बने। अलग-अलग किताबों की रचना हुई। धर्मों के नाम पर लोग बँटते गये। बँट रहे हैं। और जब तक मूर्खता सब पर हावी रहेगी, बँटते ही रहेंगे। अगर अब कोई नया रास्ता लोगों के लिए निकालेगा, तो वह एक अलग धर्म बन जाएगा। जैसा पहले भी होता रहा है।

धर्मों के बारे में एक ग़लत धारणा सबके मन में एक विश्वास के रूप में बैठा दी गयी है। धारणा यह है कि इन धार्मिक किताबों को ईश्वर ने स्वयं रचा है। एक भी धर्म का अनुयायी इससे अलग मत को नहीं मानता। जिसने यह नहीं माना कि उसके धर्म की किताबें ईश्वर ने रची हैं, तो उसने उसे भगवान मान लिया, जिसने धर्म का नया रास्ता दिखाया। बात एक ही है। चाहे नाक सीधे पकड़ी, चाहे हाथ घुमाकर; लेकिन पकड़ी सबने नाक ही है।

ऐसा भी नहीं है कि विभिन्न धर्मों पर लिखी गयी सभी किताबें ग़लत हैं। लेकिन सभी पूरी तरह सही भी नहीं हैं। यह अलग बात है कि इस सच को कोई स्वीकार नहीं करता। जिसने जिस धर्म को पकड़ा, उसने उसके कथ्य को ही आँख बन्द करके सही मान लिया। सवाल नहीं पूछे। किसी के मन में न सवाल उठे, न ही उठते हैं; क्योंकि सबको लगता है कि यह ईश्वर के ख़िलाफ़ है। धर्म के ठेकेदारों ने सिखाया भी यही है। जबकि ऐसा नहीं है। ईश्वर के ख़िलाफ़ तो वह है, जो धर्म का चोला पहनकर भी अधर्म कर रहा है। यह अनैतिक है। लेकिन कट्टरपंथी तथाकथित ठेकेदारों और अंध-कट्टरपंथी धार्मिकों के डर से सब ख़ामोश हैं। सब अपने-अपने पाप-कर्मों को छिपाने में लगे हैं। धर्म के नाम पर चंद किताबों का झूठा स्तुतिगान करने में लगे हैं। किसी ने असली धर्म को नहीं जाना। न जानने की कभी कोशिश की। जिसने जाना, उसने स्वयं को सभी कथित धर्मों और उनकी किताबों से अलग कर लिया। क्योंकि धर्म तो यह कहता है कि भलाई और पुण्य के अलावा कुछ मत करो। अपने मन, कर्म और वचन से कुछ भी अनर्थ मत करो। एक फल-फूल वाले छायादार वृक्ष की तरह बनो। चाहे कोई अच्छा आये, चाहे बुरा; कोई भी पत्थर फेंक दे, सबको फल दो। कोई भी डाली तोड़ दे; कुछ मत कहो। सबको छाया दो। अगर कोई काट भी डाले, तो भी ख़ामोश रहकर सब सह लो। कौन-से धर्म के लोग इतने सहनशील हैं?

सवाल यह है कि यह सहनशीलता किसी में क्यों नहीं है? लाखों वर्षों से लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी धर्म का पालन कर रहे हैं। लेकिन निष्पाप रहकर पुण्य-ही-पुण्य करने वाले संसार में कितने लोग हुए? जो हुए, सो सताये गये। कई तो मार भी दिये गये। इसलिए लोग डर के मारे किताबों को छोड़ ही नहीं पाये। एक तो लोगों के बहिष्कार और हत्या का डर। ऊपर से उन्हें स्वर्ग और नरक के नाम पर भी ख़ूब डराया गया। डराने के लिए कोरी काल्पनिक कथाएँ लिखी गयीं। सस्ते और सुलभ स्तुतिगान गढ़े गये। आडम्बर और प्रथाओं को रचा गया। इसलिए किताबों को छोडक़र असली धर्म का पालन करने वाले संसार में बिरले ही हुए हैं। इसकी असली वजह यह भी है कि धर्म को सही मायने में सब लोग समझ ही नहीं पाये। तो फिर उस ईश्वर को क्या समझेंगे? जिसने रहस्यमयी विराट ब्रह्मांड की रचना की है।

धर्म की सभी किताबें कहती हैं कि जो धर्म पर नहीं चलेगा, वह नरक को जाएगा। लेकिन लोग बड़े चालाक हैं। जो धर्मों के ठेकेदार बने हुए हैं, वे और चालाक हैं। उन्होंने अपने पापों को छिपाने और संसारियों की सज़ा से बचने के लिए गढ़ दिया कि किताबें ही धर्म हैं। कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया कि धारणा ही धर्म है। जबकि ऐसा नहीं है। अगर ऐसा होता, तो जिसने अपराध धारण किया, उसके लिए वह धर्म होना चाहिए। फिर उसके ख़िलाफ़ कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। क्योंकि जिसने जो धारण कर लिया, उसे ही धर्म समझा जाना चाहिए। फिर किसी को किसी दायरे में बाँधने की आवश्यकता क्या है? फिर किताबी धर्मों को भी क्यों मानना? पाप और पुण्य की परिभाषा गढऩे की ज़रूरत ही क्या थी? नरक का डर दिखाने और स्वर्ग का लालच देने की भी क्या ज़रूरत थी? फिर तो सभी लोग धर्म पर ही माने जाने चाहिए। सभी को स्वर्ग ही मिलना है। फिर चिन्ता किस बात की? और ईश्वर को भी क्यों मानना? उसका डर भी कैसा?

धर्म को सभी इसलिए पकड़ते हैं, ताकि उन्हें ईश्वर तक पहुँचने का सही रास्ता मिल सके। लेकिन ज़्यादातर को नहीं मिलता। 

‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर बनाई गई विशेष समिति की अध्यक्षता करेंगे पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ‘एक देश, एक चुनाव’ पर गंभीरता से विचार कर रही है और इसके चलते सरकार ने एक समिति का गठन भी किया है, जिसका अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बनाया गया है।

‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर बनाई गई समिति 15 दिनों में ही अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिस पर संसद में चर्चा होगी।

केंद्र सरकार ने 18 से 22 सितंबर तक संसद का विशेष सत्र भी बुलाया है किंतु इस सत्र को बुलाने का एजेंडा अभी तक बताया नहीं गया है। किंतु कयास यही लगाए जा रहे है कि इस विशेष सत्र में ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर ही यह सत्र बुलाया गया है।

बता दें, संसदीय कार्य मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि जी-20 देशों की मीटिंग के बाद ही विशेष सत्र का एजेंडा तय किया जाएगा। दरअसल इस वर्ष पांच राज्यों- छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव और अगले वर्ष की शुरुआत में लोकसभा चुनाव होने है।

केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर के बेटे के घर भाजपा कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या

केंद्रीय राज्य मंत्री और सांसद कौशल किशोर के लखनऊ में दुबग्गा के बेगरिया स्थित नए मकान में शुक्रवार को भाजपा कार्यकर्ता 24 वर्षीय विनय श्रीवास्तव के सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई है।

जिस पिस्टल से विनय श्रीवास्तव की हत्या की गई है वह पिस्टल सांसद के बेटे विकास किशोर की बताई जा रही हैं। मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। साथ ही तीन आरोपियों को हिरासत में लिया गया है और पूछताछ जारी है।

बताया जा रहा है कि विनय केंद्रीय राज्य मंत्री के बेटे विकास किशोर के साथ ही रहा करता था। शुक्रवार की सुबह उसकी गोली मारकर हत्या कर दी गई और मौके पर मौजूद अजय रावत, अंकित वर्मा, शमीम बाबा, बंटी सहित दो अन्य अज्ञात लोग भी मौजूद थे।

विनय के परिवारजनों ने अजय, अंकित और शमीम पर हत्या करने का आरोप लगाया है। और तीनों नामजद आरोपियों को पुलिस ने हिरासत में भी ले लिया है। बताया जा रहा है कि जिस समय यह घटना हुई उस समय सांसद का बेटा विकास मौजूद नहीं था, वह अपनी मां जो कि दिल्ली में भर्ती थी उन्हें देखने चला गया था।

हिंडनबर्ग के बाद अडानी ग्रुप पर अब शेयरों में गड़बड़ी के लगे आरोप

नई दिल्ली : अडानी ग्रुप की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद अब ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की रिपोर्ट ने अडानी की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। इस रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि गौतम अडानी ने शेयरों के साथ गड़बड़ी की है। OCCRP की रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी ग्रुप ने गुपचुप तरीको से खुद अपने शेयर्स खरीद कर के स्टॉक एक्सचेंज में करोड़ों डॉलर का निवेश कर रखा है।

OCCRP ने रिपोर्ट में कहा कि इसकी जांच में कम से कम दो मामले पाए गए जहां “गुमनाम” निवेशकों ने ऐसी ऑफश्योर स्ट्रक्चर के माध्यम से अडानी ग्रुप के स्टॉक खरीदा और बेचा। हालांकि, अडानी समूह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। आपको बता दें कि OCCRP को अरबपति जॉर्ज सोरोस और रॉकफेलर ब्रदर्स फंड जैसे संस्थाओं द्वारा फंडिंग मिलती है। जॉर्ज सोरोस वही अरबपति हैं, जो समय-समय पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करते रहते हैं।

बता दें, जनवरी महीने में अमेरिका की शॉर्ट सेलर फर्म हिंडनबर्ग ने भी ऐसे ही आरोप लगाए थे। हिंडनबर्ग ने कहा था कि अडानी ग्रुप ने शेल कंपनियों के जरिए शेयरों में गड़बड़ी की है। इसके अलावा ऑडिट और कर्ज समेत कई अन्य मुद्दों पर भी समूह को घेरा था। अडानी समूह ने हिंडनबर्ग के दावों को भ्रामक और बिना सबूत वाला बताया और कहा कि उसने हमेशा कानूनों का अनुपालन किया है।