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क्या वाक़ई भारतीयों में कौशल की कमी है?

लार्सन एंड टुब्रो ने हाल ही में दावा किया है कि भारतीय मज़दूरों में कौशल की कमी है

आज के भारत में हर 10 में से सात युवाओं के पास काम की कमी है और इनमें से तीन युवा पुरी तरह बेरोज़गार हैं। बेरोज़गारों में सबसे ज़्यादा संख्या पढ़े-लिखे युवाओं की है, जिनके पास कोई अच्छा कौशल यानी हुनर (स्किल) नहीं है। वहीं मज़दूरों के पास भी अच्छा कौशल नहीं होने के कारण वे परम्परागत काम करने तक ही सीमित रह जाते हैं। बेरोज़गारी के इस दौर में भारतीय बहुराष्ट्रीय समूह लार्सन एंड टुब्रो ने हाल ही में 30,000 कुशल मज़दूरों की ज़रूरत को दर्शाते हुए कहा है कि उसके पास काम पर रखने लायक मज़दूर भारत में नहीं हैं।

कम्पनी के सीईओ और एमडी एस.एन. सुब्रमण्यन ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा है कि भारतीय मज़दूरों में कौशल की बहुत कमी है। उन्होंने कहा है कि लार्सन एंड  टुब्रो में कुशल मज़दूरों की कमी है, पर उन्हें भारतीयों में अधिक संख्या में कुशल मज़दूर नहीं मिलते। इसलिए उन्हें कुशल बनाने की आज बहुत ज़रूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि लार्सन एंड  टुब्रो को मॉड्यूलरिटी और ऑटोमेशन का उपयोग करके भारतीय मज़दूरों को प्रशिक्षित करना पड़ता है। लेकिन काम पर रखने की इस प्रक्रिया में कम्पनी को बहुत संघर्ष करना पड़ता है। ट्रेनिंग देने के बाद भी लार्सन एंड  टुब्रो में कुशल मज़दूरों की कमी है। एस.एन. सुब्रमण्यन ने कहा है कि मज़दूरों की कमी के कारण कम्पनी की बैलेंस शीट में 50 अरब डॉलर से अधिक का बैकलॉग है। चूँकि बैकलॉग ईपीसी व्यवसाय से है, इसलिए कम्पनी को प्रशिक्षित श्रमिकों की ज़रूरत है।

लार्सन एंड  टुब्रो के के सीईओ और एमडी एसएन सुब्रमण्यन के बयान के मद्देनज़र सरकारों को यह समझने की ज़रूरत है कि भारत में कुशल मज़दूरों की कमी के कारण क्या हैं? कहते हैं कि भारत में युवा प्रतिभाओं की कमी नहीं है। पर यहाँ बात योग्य और कुशल मज़दूरों की हो रही है। इसलिए देखना होगा कि भारत में कुशल मज़दूरों की कमी के पीछे क्या कारण हैं? क्या कभी केंद्र या किसी राज्य की सरकार ने इसे लेकर कोई चिन्ता जतायी है? क्या कभी इसे लेकर कोई अध्ययन किया गया है?

बुद्धिजीवी कहते हैं कि सरकारों ने मज़दूरों और किसानों को उनके हाल पर ऐसे ही छोड़ दिया है, जैसे कोई ग़ैर किसी को याद नहीं रखता। होना यह चाहिए था कि अनपढ़ों और कम पढ़े-लिखे मज़दूरों के लिए सरकार कोई ट्रेनिंग अभियान चलाती और उन्हें मज़दूरी वर्ग के सभी कौशल सिखाने में सहयोग करती। अगर किसी सरकार ने ऐसा किया होता, तो लार्सन एंड  टुब्रो के एमडी और सीईओ को आज यह नहीं कहना पड़ता कि भारत में कुशल मज़दूरों की कमी है। हाल के एक अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया कि 82 प्रतिशत भारतीय पेशेवरों को लगता है कि प्रासंगिक कार्य अनुभव की कमी वाले काम में उन पेशेवरों को नियुक्त करना अधिक सहज है, जिनके पास प्रासंगिक काम के अनुभव की कमी है। उनके पास सही कौशल है, जिसके परिणामस्वरूप उद्योगों में अपस्किलिंग और रीस्किलिंग पर ज़ोर बढ़ रहा है। 84 प्रतिशत भारतीय पेशेवरों का यह भी मानना है कि आने वाले समय में नियोक्ता ऐसे पेशेवरों की तुलना में विविध कौशल और अनुभव वाले पेशेवरों को महत्त्व देंगे, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं।

सूत्रों के अनुसार, एलएंडटी एनर्जी हाइड्रोकार्बन को पेर्डमैन केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड के लिए 2.3 एमएमटीपीए यूरिया संयंत्र के लिए प्रक्रिया और पाइप रैक मॉड्यूल बनाने और उनकी आपूर्ति करने के लिए सैपेम एंड क्लॉ जेवी (एससीजेवी) ने क़रार किया है। भविष्य में जब संयंत्र पूरा हो जाएगा, तब यह दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया संयंत्र होगा। आस्ट्रेलिया में उच्च गुणवत्ता वाले यूरिया का एक सुरक्षित और विश्वसनीय स्रोत होने के कारण यह संयंत्र पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कर्राथा से लगभग 20 किमी उत्तर में बुरुप प्रायद्वीप पर स्थित होगा। लार्सन एंड टुब्रो के एमडी और सीईओ सुब्रमण्यन ने कहा कि श्रमिकों की कमी के कारण कम्पनी की बैलेंस शीट में 50 अरब डॉलर से अधिक का बैकलॉग है। बैकलॉग ईपीसी व्यवसाय से है, इसलिए कम्पनी को बढ़ईगीरी, चिनाई और भारी मिट्टी के काम के वाले प्रशिक्षित श्रमिकों की ज़रूरत है। कम्पनी मज़दूरों की तकनीकी विशेषज्ञता, गुणवत्ता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण (एचएसई) व परिचालन उत्कृष्टता के आधार पर पैकेज तय करेगी।

हज़ारों कम्पनियों ने छोड़ा भारत

केंद्र सरकार के अपने आँकड़े बताते हैं कि सन् 2014 में मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद से 30 नबंवर, 2021 तक लगभग 2,783 विदेशी कम्पनियाँ भारत से अपना कारोबार समेटकर जा चुकी थीं। ये बात एक सवाल के जबाव में सन् 2021 में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने दी थी। उन्होंने सन् 2021 में संसद में कहा था कि सात वर्षों में 2,783 विदेशी कम्पनियों ने भारत में अपना काम बन्द किया है, पर अभी भारत में क़रीब 12,500 विदेशी कम्पनियाँ सब्सिडियरी (मददगार) के माध्यम से काम कर रही हैं।

हालाँकि केंद्रीय मंत्री ने भारत से बड़ी तादाद में जाने वाली कम्पनियों के जाने के पीछे उनका मक़सद पूरा होना बताते हुए कहा कि ये कम्पनियाँ सम्पर्क ऑफिस, ब्रांच ऑफिस, सब्सिडियरी, प्रोजेक्ट ऑफिस के माध्यम से रजिस्टर्ड थीं और उनका कारोबारी लक्ष्य या परियोजना पूरी होने के चलते उन्होंने भारत में अपना कामकाज बन्द किया या कुछ कम्पनियाँ अपनी पैरेंट कम्पनी में विलय कर दी गयीं। केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया था कि इन सात वर्षों में 10,756 विदेशी कम्पनियों ने भारत में कारोबार शुरू भी किया है।

उल्लेखनीय है कि वल्र्ड बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग-2020 में भारत 63वें पायदान पर था, जबकि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग-2019 में भारत 79 पायदान पर था। सन् 2021 में वल्र्ड बैंक ने कथित अनियमितताओं के आरोपों के बाद इस सर्वे रिपोर्ट का प्रकाशन बन्द कर दिया था।

मंत्रालय के कम्पनी क्षेत्र पर जारी आँकड़ों की मानें, तो जून, 2020 में कारोबारी सेवाओं के तहत 3,399 कम्पनियाँ भारत में पंजीकृत हुईं। विनिर्माण के क्षेत्र की 2,360 कम्पनियाँ पंजीकृत हुईं। व्यापार के लिए 1,499 कम्पनियाँ पंजीकृत हुईं। सामुदायिक, व्यैक्तिक और सामाजिक सेवाओं वाली 1,411 कम्पनियाँ पंजीकृत हुईं; और निर्माण के क्षेत्र में काम करने के लिए 644 कम्पनियाँ पंजीकृत हुईं। इस दौरान कुल 20,14,969 कम्पनियाँ पंजीकृत थीं, जिनमें से 7,46,278 कम्पनियाँ बन्द हो चुकी थीं। वहीं 2,242 कम्पनियों को कम्पनी $कानून-2013 के तहत निष्क्रिय बताया गया था। मोदी सरकार पर आरोप लगा कि उसने अपने शुरू के पाँच वर्षों के कार्यकाल में ही लाखों कम्पनियों को सरकारी रिकॉर्ड से हटा दिया था। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने संसद में कहा था कि अनुपालन में कमी के चलते इन कम्पनियों को बन्द कर दिया गया।

प्रतिभाओं की कमी नहीं

ऐसा कहा जाता है कि भारत में प्रतिभाओं की नहीं, केवल मौकों की कमी है। लार्सन एंड  टुब्रो ने कहा है कि भारत में उसे कुशल मज़दूर नहीं मिल रहे हैं। पर वहीं व्हीबॉक्स इंडिया स्किल्स रिपोर्ट-2023 के मुताबिक, भारत में 22 से 25 साल के आयुवर्ग वाले 56 प्रतिशत युवा नौकरी पाने की योग्यता रखते हैं। यह रिपोर्ट भारत के 3.75 लाख उम्मीदवारों के वीबॉक्स नेशनल एम्प्लॉयबिलिटी टेस्ट (डब्ल्यूनेट) और 15 से ज़्यादा इंडस्ट्रीज की 150 कम्पनियों पर किये गये इंडिया हायरिंग इंटेंट सर्वे के नतीजों के आधार पर पेश की गयी है। इसमें कहा गया है कि भारत के 50.3 प्रतिशत लोग नौकरी पाने के योग्य हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, सन् 2022 के मुकाबले इस साल यानी 2023 में रोज़गार पाने की योग्यता रखने वाले युवाओं में 4.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सन् 2022 में भारत में नौकरी पाने की योग्यता रखने वाले युवा 46.2 प्रतिशत थे। भारत में उत्तर प्रदेश में नौकरी पाने की योग्यता रखने वाले युवाओं की संख्या सबसे अधिक 72.7 प्रतिशत है। इसके बाद महाराष्ट्र में 69.8 प्रतिशत युवा नौकरी पाने के योग्य हैं। दिल्ली के युवा नौकरी पाने की योग्यता में तीसरे स्थान पर हैं। वहीं आंध्र प्रदेश के युवा चौथे, राजस्थान के युवा पाँचवें, कर्नाटक के युवा छठवें, तेलंगाना के युवा सातवें, पंजाब के युवा आठवें, ओडिशा के युवा नौवें और हरियाणा के युवा 10वें स्तर पर नौकरी पाने के योग्य हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 52.8 प्रतिशत महिलाएँ नौकरी पाने के योग्य हैं। वहीं 47.2 प्रतिशत पुरुष नौकरी पाने की योग्यता रखते हैं। पर वर्तमान में कार्यरत महिलाओं की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत है। वहीं कार्यरत पुरुष 67 प्रतिशत हैं। योग्य महिलाओं को नौकरी देने में राजस्थान सबसे ऊपर है, जहाँ 53.5 प्रतिशत महिलाएँ रोज़गार से जुड़ी हैं। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश हैं, जहाँ 46.5 प्रतिशत महिलाएँ रोज़गार पर हैं। भारत में कुशल श्रम की उच्च माँग वाले क्षेत्र फार्मास्युटिकल, बीएफएसआई, आईटी और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्र हैं, जिनमें सन् 2022 की तुलना में 2023 में 20 प्रतिशत का भर्ती उछाल देखा गया है। उल्लेखनीय है कि व्हीबॉक्स इंडिया स्किल्स युवाओं की योग्यता एवं प्रतिभा की जाँच करके यह रिपोर्ट जारी करती है। ऐसे में लार्सन एंड टुबो का यह कहना कि भारत में कुशल मज़दूरों की कमी हैं; सीधे-सीधे स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसे हल्के में लेना भी ठी नहीं है।

स्वच्छ भारत अभियान में भ्रष्टाचार!

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपात्रों को मिला शौचालयों का पैसा, मामला खुलने पर नहीं हो पायी पूरी वसूली

के.पी. मलिक

सन् 2014 में ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ के वादे के साथ नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता सँभाली। लेकिन उनकी सरकार भी दूसरी सरकारों की तरह कई योजनाओं में भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम साबित रही है। दरअसल हिन्दुस्तान में भ्रष्टाचार किसी एक व्यक्ति के संकल्प से नहीं रुकेगा। इसके लिए ऊपर से नीचे तक सबको ईमानदार होना पड़ेगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी कुछ भ्रष्टाचारी अधिकारियों के चलते कई तरह के घोटाले सामने आते रहते हैं। समाजसेवी, आरटीआई एक्टिविस्ट और पेशे से किसान सुमित मलिक ने कड़ी मेहनत करके स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय योजना में इसी तरह का भ्रष्टाचार उजागर किया है।

दरअसल, स्वच्छ भारत अभियान केंद्र सरकार का वो राष्ट्रीय अभियान है, जिसका मक़सद देश को हर तरह से साफ़-सुथरा बनाना है। 2 अक्टूबर, 2014 को ख़ुद प्रधानमंत्री ने झाड़ू लगाकर दिल्ली से इस अभियान की शुरुआत की थी।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का आज़ादी का सपना तो पूरे देश ने मिलकर पूरा किया। लेकिन उनका स्वच्छ भारत का सपना पूरा नहीं हो सका है, जिसकी शुरुआत पूर्व सरकारों से हटकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। प्रधानमत्री मोदी के इसी स्वच्छ भारत अभियान की एक योजना है- ‘खुले में शौच मुक्त भारत’; जिसके तहत केंद्र की मोदी सरकार ने घर-घर शौचालय होने का संकल्प लिया। इस योजना के तहत जिस व्यक्ति के यहाँ शौचालय बनना था, उसके पात्र होने पर, उसके खाते में केंद्र की मोदी सरकार की तरफ़ से 12,000 रुपये भेजे गये।

पूरे देश के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले में भी इस योजना के अंतर्गत स्वच्छ भारत मिशन के तहत लाखों लोगों को शौचालय बनाने के लिए पैसा दिया गया। घरों में शौचालय बनाने के लिए व्यक्ति की पात्रता ग़रीबी रेखा के नीचे आने वाले व्यक्तियों की थी, और उन्हें ही शौचालय के लिए 12,000 रुपये की धनराशि मिलनी थी। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, इस योजना के तहत मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के ग्रामीण इलाक़ों में 53,183 शौचालय बनाये गये। मुज़फ़्फ़रनगर में कुल 498 गाँव हैं, जो कि नौ ब्लॉकों के अंतर्गत आते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता सुमित मलिक के मुताबिक, उन्होंने गाँव-गाँव जाकर पहले शौचालयों के बनने और अपात्रों को पैसा मिलने की जानकारी इकट्ठी की और फिर आरटीआई के ज़रिये भ्रष्टाचार को उजागर किया। सुमित मलिक ने आरटीआई और ख़ुद के सर्वे में पाया कि फ़र्ज़ी तरीक़े से हज़ारों अपात्र लोगों को शौचालय का पैसा मुहैया कराया गया है।

सुमित मलिक के मुताबिक, ज़िला राज पंचायत अधिकारी और कर्मचारियों की मिली भगत से फ़र्ज़ी तरीक़े से कई कर्मचारियों के ही परिवार वालों के बैंक खातों में ही पहली क़िस्त के 6,000 रुपये भेजे गये। सुमित मलिक बताते हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री योगी से भी इस भ्रष्टाचार की शिकायत 25 जून, 2018 में की थी। मुख्यमंत्री योगी के संज्ञान में शौचालय भ्रष्टाचार का मामला आते ही, इसकी जाँच के लिए उत्तर प्रदेश शासन ने एक जाँच दल का गठन करके जाँच के आदेश दिये। जाँच दल ने पाया कि सिर्फ़ मुज़फ़्फ़रनगर के ग्रामीण इलाक़ों में 2,130 अपात्र लोगों को शौचालय का पैसा मिला। जाँच के बात इन अपात्र लोगों के ख़िलाफ़ प्रशासनिक कार्रवाई की गयी और मुज़फ़्फ़रनगर के कई ब्लॉकों में अधिकारियों ने रिकवरी अभियान चलाया गया।

इस रिकवरी अभियान के तहत अभी तक सरकार को तक़रीबन 23,00,00 रुपये वापस मिल चुके हैं, जबकि अभी भी तक़रीबन 1,82,10,000 रुपये की रिकवरी बाक़ी है। रिकवरी राशि तक़रीबन 2,05,10,000 रुपये की है, जो अभी तक अफ़सरों द्वारा अपात्र लोगों से वापस नहीं ली जा सकी है। इस रिकवरी के लिए प्रदेश सरकार का आदेश तो है ही, सुमित मलिक भी अफ़सरों को प्रार्थना-पत्र दे चुके हैं। सुमित ने सन् 2016 से ही इस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए सम्बन्धित अफ़सरों को प्रार्थना-पत्र लिखा; लेकिन इस पर कोई उचित कार्रवाही नहीं हुई।

हैरत की बात है कि प्रदेश सरकार के आदेश के बावजूद क़रीब पाँच साल से अधिक समय में अगस्त, 2023 तक भी 2,05,10,000 रुपये की रिकवरी नहीं हो पायी है, जिससे ज़िला प्रशासन, ख़ासतौर पर ज़िला राज पंचायत अधिकारी की लापरवाही साफ़ झलकती है। ग़लत लोगों से भी इस सरकारी धन की रिकवरी न कर पाने से अफ़सरों के इस भ्रष्टाचार में लिप्त होने की आशंका होती है।

सुमित के मुताबिक, वह कई लगातार इस सरकारी धन की रिकवरी के संदर्भ में बार-बार सम्बन्धित अफ़सरों को प्रार्थना-पत्र देते हैं; लेकिन बक़ाया धन की रिकवरी अपात्र लोगों से नहीं हो पा रही है। ग्रामीण इलाक़ों में बड़े-बड़े घरों में फ़र्ज़ी तरीक़े से एक ही घर दिखाकर छ: शौचालय तक दिये गये। इतना ही नहीं, ज़िला राज पंचायत अधिकारी के कुछ कर्मचारियों के खाते से भी 3,00,000 रुपये की धनराशि बरामद की गयी। यह भ्रष्टाचार संविदा पर रखे हुए कुछ कर्मचारियों को इस्तेमाल करके किया गया। ग़लत खातों में गये पैले की रिकवरी में अड़चन यह भी है कि लगातार नये-नये ज़िला राज पंचायत अधिकारी आते हैं और जब तक कुछ औपचारिकताएँ करते हैं, इतने में उनका ट्रांसफर हो जाता है। मुज़फ़्फ़रनगर के मौज़ूदा ज़िला राज पंचायत अधिकारी ने बताया कि यह पुराना मामला है। मेरे संज्ञान में है। इसकी जाँच चल रही है और रिकवरी भी हो रही है।

बहरहाल, हमने तो सिर्फ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के ग्रामीण इलाक़ों के शौचालयों के भ्रष्टाचार की पोल खोली है। ज़ाहिर है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में इस प्रकार के कितने ही भ्रष्टाचार हुए होंगे। क्योंकि भले ही देश में सभी अफ़सर भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होते; लेकिन भ्रष्ट अफ़सरों की देश में कमी भी नहीं है।

सन् 1985 में देश के तत्कालीन युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने सूखा प्रभावित उड़ीसा के कालाहांडी ज़िले के दौरे के दौरान कहा था कि केंद्र सरकार जब किसी योजना के तहत एक रुपया भेजती है, तो लोगों तक सिर्फ़ 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री के इस बयान को प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही राजनीतिक इस्तेमाल के लिए प्रयोग किया हो; लेकिन उन्होंने इस बयान को भ्रष्टाचार के एक उदाहरण के तौर पर बयान किया है। इसीलिए मेरा मानना है कि दूसरी सरकारों की तरह ही केंद्र की मोदी सरकार भी अपने नौ साल से अधिक के शासन-काल में भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के अपने वादे को पूरा करने में असफल ही दिख रही है।

केंद्र की मोदी सरकार ने 2 अक्टूबर, 2019 तक खुले में शौच मुक्त भारत करने का लक्ष्य रखा था, जिसके तहत हिन्दुस्तान के ग्रामीण इलाक़ों में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 1.2 करोड़ शौचालय बनाये जाने थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसा हो पाया? अगर इस परियोजना की सही से जाँच हो जाए, तो मुझे नहीं लगता कि सरकार अपने इस लक्ष्य को अभी भी हक़ीक़त में छू सकी होगी।

केंद्र की मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान को पूरा करने के लिए सचिन तेंडुलकर, प्रियंका चोपड़ा, बाबा रामदेव, सलमान ख़ान, शशि थरूर, महेंद्र सिंह धोनी, विराट कोहली, मृदुला सिन्हा और कमल हसन जैसे दिग्गजों को इसका ब्रांड एंबेसडर बनाया। लेकिन क्या इतने ब्रांड एंबेसडरों में से किसी ने इस अभियान को सही तरीक़े से ईमानदारी से आगे बढ़ाया?

क्या हर देशवासी को यह मालूम है कि किसी कम्पनी या चीज़ या योजना के एक ब्रांड एंबेसडर को करोड़ों रुपये दिये जाते हैं?

इसके अलावा विज्ञापनों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जाते हैं। इसका मतलब यह है कि जितना पैसा केंद्र सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत लोगों पर ख़र्च करती है, तक़रीबन उतना ही पैसा विज्ञापनों और ब्रांड एंबेसडरों पर ख़र्च हो जाता होगा। इसके अलावा राज्य सरकारें ख़र्च करती हैं, सो अलग। आज भी गाँवों से लेकर शहरों तक में खुले में शौच को जाते हैं। शहरों की अगर हम बात करें, तो वहाँ तो पहले भी वही लोग खुले में शौच को जाते थे, जो रेलवे की पटरियों के किनारे बसे हुए हैं या खुले आसमान के नीचे रहते हैं। आज भी उन्हीं में से काफ़ी लोग खुले में शौच को जाते हैं।

हालाँकि गाँवों में खुले में शौच जाने वालों की संख्या पहले से काफ़ी कम हुई है; लेकिन शून्य नहीं हुई है। अभी भी कई गाँव ऐसे हैं, जहाँ कई लोगों को स्वच्छ भारत अभियान की इस योजना का लाभ नहीं मिल सका है।

हालाँकि केंद्र की मोदी सरकार के स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) चरण-ढ्ढढ्ढ क्रियान्यवयन के दिशा-निर्देश 2020 में कहा गया है कि स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण), जिसे दुनिया का सबसे बड़ा व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रम कहा गया है; के तहत ज़मीनी स्तर पर जन-आन्दोलन पैदा करके इस असम्भव से लगने वाले कार्य को पूरा किया गया। इसके परिणाम स्वरूप ग्रामीण स्वच्छता कवरेज जो सन् 2014 में 39 फ़ीसदी था, सन् 2019 में बढक़र 100 फ़ीसदी हो गया और 36 राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में 10.28 करोड़ से अधिक शौचालय बनाये गये। स्वच्छ भारत का उद्देश्य व्यक्ति, क्लस्टर और सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के माध्यम से खुले में शौच की समस्या को कम करना या समाप्त करना है।

यहाँ बताना ज़रूरी है कि केंद्र की मोदी सरकार के पहले सन् 1999 से सन् 2012 तक केंद्र की सरकारों ने हिन्दुस्तान को साफ़-सुथरा बनाने के लिए निर्मल भारत अभियान चलाया था, जिसका मक़सद भी पूर्ण स्वच्छता अभियान था। लेकिन उस योजना के तहत भी हिन्दुस्तान कितना साफ़-सुथरा हो सका, आकलन करने की ज़रूरत है।

आगामी 2024 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को मज़बूत बनाने के लिए अभी से अपने तीसरे कार्यकाल के वादे कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह तीसरे कार्यकाल में देश के हर सपने को पूरा करेंगे। अब यह निर्णय जनता पर है कि वह प्रधानमंत्री मोदी के इस वादे को कितनी गम्भीरता से लेती है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

अंतरराष्ट्रीय दान दिवस पर विशेष

मानव समाज की बेहतरी के लिए दान ज़रूरी

डॉ. राम प्रताप सिंह

प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व में 5 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय दान दिवस (इंटरनेशनल चैरिटी-डे) के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस मदर टेरेसा की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जिनका सम्पूर्ण जीवन मानव सेवा में गुज़रा।

परोपकारी गतिविधियों को बढ़ाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा सन् 2012 में इस दिवस को घोषित किया गया था। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर व्यक्तियों, संगठनों तथा राष्ट्रों को चैरिटी से सम्बन्धित गतिविधियों के लिए प्रेरित करना, ताकि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके।

समझना होगा दान का महत्त्व

घोर पूँजीवादी एवं व्यक्तिगत स्वार्थ के इस दौर में दान (चैरिटी) की भावना लोगों में कम होती जा रही है। सामुदायिक तथा वैश्विक कल्याण की बजाय आज अधिकतर लोग, विभिन्न संगठन तथा देश केवल अपने हितों के बारे में सोच रहे हैं। आज दुनिया के विभिन्न देशों में लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। वर्तमान समय में कई ऐसे देश हैं, जहाँ लोगों को भरपेट भोजन, शिक्षा तथा रोज़गार जैसी मूलभूत सुविधाएँ नहीं मिल रही हैं। कई देशों के लिए ग़रीबी एक बहुत बड़ी चुनौती है।

आज करोड़ों लोग बेहतर इलाज पाने के लिए तरस रहे हैं। सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में दान बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है। दान के माध्यम से ग़रीबी तथा भुखमरी जैसी कई गम्भीर समस्याओं को ख़त्म किया जा सकता है। इसके अलावा सुविधाहीन लोगों के स्वस्थ करने, उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने, उन्हें रोज़गार प्रदान करने और लोगों के बीच असमानता को ख़त्म करने में भी दान की ख़ास भूमिका हो सकती है। इस तरह से दुनिया को सभी के लिए बेहतर बनाया जा सकता है।

हाल की सतत् विकास और मानव विकास सूचकांक की रिपोट्र्स हमें यह बताती हैं कि विकसित तथा विकासशील देशों के बीच बुनियादी सुविधाओं के स्तर पर आज भी बड़ा अन्तर है, जिसे हर हाल में कम करने की ज़रूरत है। कई अफ्रीकी तथा एशियाई देश ऐसे हैं, जहाँ लोग भुखमरी तथा ग़रीबी के कुचक्र से निकल नहीं पा रहे हैं। ऐसे में अमीर देशों की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे इनकी आर्थिक मदद करें।

पिछले कुछ वर्षों में बिल गेट्स, अज़ीम प्रेमजी, शिव नादर, टाटा कम्पनी इत्यादि ने दान करके कई परिवारों को बेहतर जीवन दिया हैं। भारत के शीर्ष 10 में कुमार मंगलम बिड़ला, रतन टाटा, शिव नादर, सुष्मिता एंड सुब्रतो बागची, अजीम प्रेमजी, राधा एंड एनएस पार्थसारथी, अजय पीरामल, नंदन निलेकणी, अनिल अग्रवाल, मुकेश अंबानी, गौतम अडाणी और ए.एम. नाइक जैसे पूँजीपति हैं। 

महामारी के समय भारत में खेल तथा फ़िल्म क्षेत्र के कई दिग्गजों ने आगे आकर केंद्र और राज्य सरकारों को दान दिया तथा आम जनता की मदद की। कई लोगों ने संगठन बनाकर आम लोगों को खाना खिलाया तथा दवाइयाँ बाँटी, पैसे बाँटे। कई देशों में आज भी समय-समय पर कई तरह के खेल आयोजित किये जाते हैं, जिससे ज़रूरतमंद लोगों की मदद की जा सके।

परोपकार की परम्परा

भारत में प्राचीन समय से ही लोगों में परोपकार की भावना रही है। ज़रूरतमंदों की मदद का इस देश का लम्बा इतिहास रहा है।

आज भी देश में आए दिन परोपकार से जुड़ी ऐसी कई सकारात्मक ख़बरें सुनने को मिलती हैं, जिनसे लगता है कि लोगों के अन्दर इंसानियत आज भी ज़िन्दा है। चार दिन की इस ज़िन्दगी में हमें यह याद रखने की ज़रूरत है कि मानव सेवा से बढक़र यहाँ कोई भी धर्म नहीं। इसलिए इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए हमें यह संकल्प लेना होगा कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, हम हर हाल में स्वहित त्यागकर ग़रीबों तथा ज़रूरतमंदों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे। 

(लेखक मणिपाल यूनिवर्सिटी जयपुर, राजस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

चाँद पर भारत की ऐतिहासिक जीत

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

खगोलीय इतिहास में 23 अगस्त की तारीख़ स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गयी। यह इतिहास भारत ने रचा है। 23 अगस्त की शाम के 6 बजकर 4 मिनट पर विक्रम नामक चंद्रयान-3 का लैंडर चाँद पर जैसे ही उतरा सभी भारतवासियों के हर्ष का ठिकाना न रहा। अभी तक यह उपलब्धि किसी देश को नहीं मिल सकी है। चाँद पर पहुँचे ही लैंडर से मैसेज आया- ‘मैं अपनी मंज़िल पर पहुँच गया हूँ। अब रोवर रैंप से बाहर निकलेगा तथा अपने परीक्षण शुरू करेगा।’

विदित हो कि इसरो के लॉन्चिंग केंद्र श्रीहरिकोटा से 14 जुलाई की शाम को चंद्रयान-3 को लॉन्च किया गया था। इसरो में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों की लगन तथा मेहनत पर खरा उतरते हुए चंद्रयान-3 सभी भारतीयों की प्रार्थनाओं से 41वें दिन चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा। यह सफलता भारत से पहले चाँद पर पहुँचे देशों को भी नहीं मिल सकी है। चंद्रयान-3 मिशन के सफल होने पर साउथ अफ्रीका से वर्चुअली जुडक़र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ताली बजाकर वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ाया। उन्होंने इसरो के सभी वैज्ञानिकों तथा देशवासियों को इस सफलता के लिए बधाई दी। इसरो के निदेशक एस. सोमनाथ ने भी अपने सभी वैज्ञानिक सहयोगियों, इसरो के कर्मचारियों, सुरक्षा गार्डों तथा देशवासियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि अगले 14 दिन हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रज्ञान हमें चाँद के वातावरण के बारे में जानकारी देगा। हमारे कई मिशन कतार में हैं। वास्तव में चंद्रयान-3 को चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर उतारकर भारत ने स्वर्णिम इतिहास रचा है। चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला भारत पहला देश है। इसे पूरी दुनिया ने देखा। दुनिया को इससे यह मैसेज गया है कि भारत के पास प्रतिभाओं का धनी है। भारत की शक्तियों को चुनौती देना आसान नहीं होगा। चाँद पर उतरने के बाद चंद्रयान-3 ने चाँद की तस्वीरें भेजनी शुरू की। चाँद से धरती तक की तस्वीरें सामने आ रही हैं। चंद्रयान-3 के चाँद पर उतरने के कुछ घंटे बाद इसरो के वैज्ञानिकों ने रोवर प्रज्ञान को बाहर निकाला। जब चंद्रयान-3 चाँद पर लैंडिंग करने वाला था तब पूरा देश प्रार्थना कर रहा था। चंद्रयान को धीरे-धीरे उतारा गया, जिसमें 20 मिनट लगे।

अपनी खोज तथा परीक्षण में लगे चंद्रयान-3 का विक्रम संचार कार्य करने लगा। इसके बाद रैंप खुला तथा प्रज्ञान रोवर रैंप से चाँद की सतह पर पहुँचा। चंद्रयान-3 के लैंटर विक्रम के पहियों ने चाँद की मिट्‌टी पर अशोक स्तंभ तथा इसरो के लोगो (प्रतीक चिह्न) के निशान छोडऩे शुरू कर दिये। इसके साथ ही लैंडर विक्रम ने रोवर प्रज्ञान की तस्वीरें खींचनी शुरू कीं और रोवर प्रज्ञान ने लैंडर विक्रम की तस्वीरें खींचनी शुरू कीं। लैंडिग वाले दिन से पहली रात इसरो 50 वैज्ञानिकों तथा उनके कई मददगारों, सेवाकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों ने जागकर काटी। दिन-रात की मेहनत के उपरांत उत्साह-बेचैनी भरा समय आख़िर 23 अगस्त की शाम 6 बजकर 4 मिनट पर ख़ुशी में बदल गया। चंद्रयान-3 की सफलता के बाद इसरो प्रमुख प्रार्थना करने निकल गये। इसरो के बेंगलूरु स्थित टेलीमेट्री एंड कमांड सेंटर (इस्ट्रैक) के मिशन ऑपरेशन कॉम्प्लेक्स (मॉक्स) में हर्ष तथा उल्लास के चलते ढोल-नगाड़े बजे। सफलता मिलते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो प्रमुख को फोन लगाकर कहा-‘आपका नाम सोमनाथ है। आपके नाम में ही चाँद (सोम) है। आपके पूरे परिवार को सफलता की बधाई।’

विदित हो कि भारत से पहले रूस ने अपने लूना-25 नाम के चंद्रयान को चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर उतारने का प्रयास किया था। अगर रूस का चंद्रयान लूना-25 रास्ता नहीं भटका होता, तो वह भारत के चंद्रयान-3 से दो दिन पहले ही 21 अगस्त लैंडिंग कर चुका होता।

भारत की अंतरिक्ष में इस सफलता से दुनिया का भरोसा भारत तथा भारतीय वैज्ञानिकों पर बढ़ेगा। इससे भारत का विज्ञान क्षेत्र का व्यापार बढ़ेगा। भारतीय प्रतिभाओं की माँग भी दुनिया में बढ़ेगी। चाँद की नयी खोजें भारत को हासिल होंगी। अन्य देशों को भी चाँद पर सफलतापूर्वक पहुँचने में मदद मिलेगी। अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, चाँद के कई हिस्सों पर सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुँचती है, जिससे वहाँ का तापमान -200 डिग्री सेल्सियस से नीचे तक चला जाता है। ऐसे स्थानों पर वैज्ञानिक विशेष खोज कर रहे हैं। अनुमान है कि इतनी ठंडी जगहों पर बर्फ जमी हो सकती है, जिसे पानी में बदला जा सकता है। सम्भव है कि पृथ्वी पर चाँद की ठंकक महसूस किये जाने का एक यह भी कारण हो कि चाँद तपता नहीं है। चाँद का एक बड़ा भाग शीतल है। इससे यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि पृथ्वी के निकट की चाँद की कक्षा अत्यधिक ठंडी हो सकती है।

विदित हो कि भारत ने 22 अक्टूबर, 2008 को चंद्रयान-1 भेजा था, जिसने चाँद की सतह पर पानी होने के संकेत दिये थे। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा के चारों ओर 3,400 से अधिक चक्कर लगाये; परन्तु 29 अगस्त को अंतरिक्ष यान के साथ संचार अंतरिक्ष में गुम हो गया। दोबारा इसरो ने सन् 2019 में चंद्रयान-2 लॉन्च किया। यह चाँद के क़रीब पहुँचा; परन्तु लैंड नहीं कर पाया। आख़िर तीसरे प्रयास में कड़ी मेहनत तथा उन्नत तकनीकके चलते चंद्रयान-3 सफल हुआ। चंद्रयान-3 के चारों ओर सुनहरी परत मल्टीलेयर इंसुलेशन है, जिसे एमएलआई भी कहते हैं। यह बहुत हल्की फिल्म है, जिसकी कई परतें लगाने से यान के आवश्यक अंग अंतरिक्ष की विकिरणों से क्षतिग्रस्त होने से बचते हैं। सोने जैसी दिखने वाली यह परत ऊपर से सुनहरी तथा अन्दर से चाँदी के रंग की होती है। इस परत का मुख्य काम सूरज के प्रकाश को परिवर्तित करना भी है। चाँद तथा अंतरिक्ष में ठंडक होने के चलते यह परत चंद्रयान के उपकरणों से उत्पन्न गर्मी को बाहर निकलने से रोकती है। इसके अतिरिक्त यह परत सौर विकिरणों तथा पराबैंगनी किरणों को अंतरिक्ष में मोड़ देती है, जिससे यान सुरक्षित रहता है। यह परत उपकरणों द्वारा की जा रही निगरानी तथा रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव डालने वाले प्रभावों को कम करती है।

चंद्रयान-3 की सफलता के बाद इसरो ने इसे भविष्य के लिए एक अहम बताया है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि भारत के वैज्ञानिकों ने तीसरे प्रयास में ही वह कर दिखाया है, जो अभी तक कोई नहीं कर सका है। इससे इसरो का नाम नासा की तरह ऊँचा होगा। नासा को भी इसरो का लोहा मानना पड़ेगा।

अब चंद्रयान-3 की गतिविधियों की निगरानी कर रहे इसरो के वैज्ञानिक चाँद की मौलिक संरचना की जानकारी हासिल करने में लगे हैं। इसके अतिरिक्त वे चाँद की सतह के प्लाज्मा घनत्व, तापीय गुणों, सतह के नीचे की हलचल, मिट्टी की परतों, हवा-पानी की उपलब्धता एवं जीवन की सम्भावनाओं की खोज करने का प्रयास करेंगे। इन सब खोजों के पीछे का मक़सद जीवन के स्रोत तलाशना है।

इन सब खोजों के लिए प्रज्ञान रोवर के इंड्यूस्ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप तथा अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर नाम के दो प्रमुख उपकरण कार्य कर रहे हैं। एलआईबीएस चाँद की सतह पर मैग्नीशियम, पोटेशियम, कैल्शियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, टाइटेनियम तथा आयरन जैसे रासायनिक तत्त्वों की खोज करेगा। वहीं एपीएक्सएस की मदद से चाँद पर मिट्टी, पत्थरों तथा उनमें पाये जाने वाले रासायनिक यौगिकों का पता लगाएगा। चंद्रयान-3 से निकला 26 किलोग्राम वजनी छ: पहियों वाला प्रज्ञान रोवर चाँद की सतह पर घूम रहा है। इसरो के वैज्ञानिक रोवर प्रज्ञान तथा लैंडर विक्रम की गतिविधियों की निगरानी हर क्षण कर रहे हैं। प्रार्थना है कि यह मिशन सफल हो तथा भारत अंतरिक्ष में भी तिरंगा फहराने में कामयाब हो। चाँद के बाद अब 02 सितंबर को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का पहला अंतरिक्ष यान सूर्य का सर्वेक्षण करेगा। उम्मीद है कि इसरो का यह मिशन भी सफल होगा।

यह क्षण भारत के सामथ्र्य का है। यह क्षण भारत में नयी ऊर्जा, नये विश्वास, नयी चेतना का है। अमृतकाल में अमृतवर्षा हुई है। हमने धरती पर संकल्प लिया और चाँद पर उसे साकार किया। हम अंतरिक्ष में नये भारत की नयी उड़ान के साक्षी बने हैं। अब चंदा मामा दूर के नहीं हैं। अब चंदा मामा एक टूर के रह गये हैं।’’

नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री

यह लोकतंत्र का मंदिर है!

शिवेन्द्र राणा

संसद राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रतीक है। हालाँकि इसकी परिभाषा अधिक विस्तृत है। यह देश की सबसे बड़ा पंचायत केंद्र है, जिसमें पूरे राष्ट्र की संवैधानिक आस्था है। लेकिन क्या संसद जन-भावनाओं की उम्मीदों कसौटी के अनुकूल भी है? यह वर्तमान राजनीतिक परिवेश के अवलोकन पर सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है; जिसका जवाब हर भारतीय को तलाशना चाहिए।

याद करिए, संसद में पिछले कुछ वर्षों में कोई ऐसा विमर्श हुआ हो, जिसकी चेतना राष्ट्रव्यापी हो? जो आम आदमी का समग्र मनोभाव लेकर सदन में उपस्थित हुई हो? आज भारतीय संसद में भाषायी मर्यादा से लेकर विमर्श का स्तर तक देश भर के गली-नुक्कड़ों, चौराहे तथा चाय की दुकानों पर होने वाली बहसों में भिन्न नहीं दिखायी पड़ेगा। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने लिखा है- ‘संसद में शुरुआत के दिनों में जो बहस होती थी, उसमें राष्ट्र और समाज के प्रति सरोकार दिखायी पड़ता था। संसद के सवाल पर गाँव में चर्चा होती थी। आज हालत बदल गयी है। संसद में झगड़ा ज़्यादा होता है। उसी की बाहर चर्चा होती है। संसद में अगर बहस होती है, तो उसमें रस्म-अदायगी ज़्यादा होती है। बहस का स्तर भी गिर गया है। गाँव और संसद की बहस में अब कोई अन्तर नहीं रहा। गाँव में कम-से-कम लोगों की पीड़ा की चर्चा तो होती है! संसद तो उससे भी दूर होती जा रही हैं।’

वह भी एक दौर था, जब संसदीय बहसें इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित होती थीं। आज़ादी के बाद देश के सभी क्षेत्र अंग्रेजी लूट के रिस रहे ज़ख़्मों से उबरने हेतु प्रयासरत थे। ऐसा ही एक क्षेत्र था- उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल। यहाँ ग़रीबी इतनी विकट थी कि लोग बाजरे का भात, कोदो, गोबरा और कोईना की रोटी खाकर पेट भरने को विवश थे। उस समय पिछड़े इला$कों में कृषि कार्यों में मशीनों का प्रचलन नहीं था। अनाज निकालने की प्रक्रिया अर्थात् मड़ाई (भोजपुरी भाषा में देवरी) बैलों से होती थी। उस दौरान बैल अनाज खा लेते थे; लेकिन वो उन्हें पचता नहीं था और गोबर के साथ बाहर आ जाता था। तब ग़रीब तबक़ा उस गोबर को बटोरकर तालाब में धोकर, फिर सुखाकर उसकी रोटी बनाकर खाता था। इस रोटी को भोजपुरी में ‘गोबरा’ कहा जाता है। दूसरा ‘कोईना’ यानी महुए के बीज की रोटी पेट भरने का साधन थी।

गाज़ीपुर से कांग्रेस सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी हुआ करते थे। विचारधारा से समाजवादी थे। संसद में बजट सत्र चल रहा था। विश्वनाथ गहमरी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की ग़रीबी का मार्मिक चित्रण किया। बोलते हुए वह इतने भावुक हो गये कि फफककर रो पड़े और अपने थैले से गोबरा और कोईना की रोटी निकालकर काट-काटकर खाने लगे। पूरी संसद स्तब्ध थी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। स्वयं प्रधानमंत्री नेहरू विचलित हो गये। उन्होंने बुलाकर विश्वनाथ गहमरी को शान्त किया तथा तत्काल योजना आयोग को गाज़ीपुर, बलिया, आजमगढ़ समेत पूर्वांचल के छ: ज़िलों में ग़रीबी, पिछड़ेपन के अध्ययन और निवारण के लिए एक आयोग गठित करने का निर्देश जारी किया। यह पृष्ठभूमि थी- सन् 1963 में गठित पटेल आयोग की।

वर्तमान में संसद में बहसों के नाम पर भौंडापन, गाली-गलौज, अभद्रता, हाथापाई आम बात हो गयी है। राष्ट्रीय हित के मुद्दे तो बिलकुल भूल ही जाइए। हाल ही (2023) की कैग रिपोर्ट के मुताबिक, देश में सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार एवं वित्तीय अनियमितता के कई मामले उजागर हुए। जैसे रेडिको खेतान लिमिटेड द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को 1,000 करोड़ से अधिक की एक्साइज ड्यूटी सहित टैक्स का भुगतान कम किया गया। वहीं बिल्डरों को लाभ पहुँचाने के लिए विकास प्राधिकरणों की मनमानी के कारण सरकारी ख़ज़ाने को 200 करोड़ का नुक़सान हुआ। केंद्र सरकार की बहुप्रचारित उड़ान योजना (2017) के तहत देश भर में चुने गये कुल 774 रूट्स मार्च, 2023 तक सिर्फ़ 54 रूट्स पर संचालित हो रहे हैं। इसी प्रकार आम आदमी के इलाज की सहूलियत के लिए शुरू की गयी आयुष्मान भारत योजना में व्यापक गड़बडिय़ाँ हैं। नौ लाख से ज़्यादा लाभार्थी तो सिर्फ़ एक ही मोबाइल नंबर से जुड़े हुए पाये गये हैं। मृत व्यक्तियों के नाम पर भी लाभार्थियों की सूची लम्बी है। इसी तरह द्वारका एक्सप्रेस-वे में हुए वित्तीय अनियमितता हुई है। यह सूची अभी विस्तृत है। क्या देश को यह जानने का हक़ नहीं है कि हज़ारों करोड़ के सपने दिखाने वाली ‘मेक इन इंडिया’ परियोजना और ऐसी ही दूसरी परियोजनाएँ, जिनके बूते देश को अच्छे दिनों और विश्वगुरु बनाने के ख्वाब दिखाये गये; उनकी अब तक क्या उत्पादकता रही है? यह सारे सन्दर्भ संसद के लिए ज़रूरी हैं। लेकिन निकम्मे विपक्ष को इसकी $िफक्र कहाँ है? ऊपर से संसद के बहिष्कार की एक ‘निंजा तकनीक’ सीख चुके विपक्ष को इसका भान नहीं कि संसदीय बहसों के बजाय सदन से बहिर्गमन जनता की उम्मीदों से पलायन, उन्हें रौंदना और उसकी भावनाओं को अपमानित करने सरीखा होता है। राष्ट्रीय हित के लिए किसी सांसद के निलंबन पर विवाद प्राथमिक था या जन-मुद्दे पर सरकार की जवाबदेही तय करना?

सांसद विश्वनाथ सिंह गाज़ीपुर ज़िले के गहमर गाँव के मूल निवासी थे। गहमर सम्भवत: एशिया का सर्वाधिक आबादी वाला गाँव है। इसकी विशेषता है- पीढिय़ों से चली आ रही सैन्य सेवा की परम्परा। यहाँ प्रत्येक परिवार में न्यूनतम एक व्यक्ति सेना में सेवारत है। गाँव में बच्चे किशोरवय होते ही सेना भर्ती की तैयारी में लग जाते हैं। यूँ कहिए कि सैन्य-सेवा यहाँ के लोगों का दीन-ओ-ईमान है। इनकी अर्थव्यवस्था ही इस पर टिकी है। लेकिन सरकार ने लॉजिस्टिक्स के ख़र्च कम करने एवं सैन्य सेवा में नये विचार के नाम पर अग्निवीर योजना लाद दी। अब गहमर और ऐसे ही हज़ारों गाँवों के युवा सकते में हैं। याद कीजिए अग्निवीर योजना के विरुद्ध हिंसक-प्रदर्शन के दौरान उस रोते हुए बच्चे को, जो प्रशासनिक अधिकारी के समझाने पर उससे अपनी ग़लती पूछ रहा था। क्या सत्ता के दावेदार इन विपक्षी दलों में किसी को याद आयी कि इन बच्चों की रौंदी गयी उम्मीदों पर सरकार से तार्किक जवाब माँगें?

विगत दो दशकों से रिटायर्ड फ़ौजियों के हितार्थ कार्य कर रहे सेवानिवृत सैन्यकर्मी और गहमर के भूतपूर्व सैनिक संगठन के महामंत्री शिवानन्द सिंह कहते हैं- ‘जब कोई सैनिक अपने राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में सीमा पर जान हथेली पर लेकर खड़ा होता है, तो उसे अपनी सरकार पर यह विश्वास होता है कि उसकी मौत के बाद उसका परिवार निराश्रित नहीं होगा। उसकी पेंशन परिवार को दुर्दिनों से बचाएगी। अत: वह निजी हितों से चिन्तामुक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन करता है। अग्निवीर योजना ने तो वह भावना ही संकट में डाल दी। सैन्य सेवा कोई कॉर्पोरेट जॉब नहीं है। यह जूनून है। हम जैसे फ़ौजियों की कमायी पर पूरे परिवार का जीवन टिका होता है। फ़ौजियों का वेतन और पेंशन तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार ही है। सरकार तो यह आधार ही मिटाने पर तुली है।’

यदि सरकार इतना ही पेंशन के बोझ का राजस्व बचाना चाहती है, तो इसकी शुरुआत सांसद-विधायकों को मिलने वाली पेंशन को ख़त्म करके की जानी चाहिए। ‘सैन्य सेवा कोई आर्थिक लाभ का अवसर नहीं’, कहने वाले निर्लज्जों को राजनीति क्या जीवन बीमा का कोई कार्यक्रम दिखता है? ट्रेनों में वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली सुविधा बन्द कर दी गयी; क्योंकि इससे रेलवे राजस्व बचाना था। लेकिन जनप्रतिनिधियों के लिए यह अब भी है। सार्वजनिक जीवन में त्याग की क़समें खाने वाले इन कपटियों को जनता के धन के अनैतिक उपभोग में ज़रा भी शर्म नहीं आती। साथ ही बेरोज़गारी पर सरकार से सवाल क्यूँ नहीं? सार्वजनिक क्षेत्र में रोज़गार के अवसर सिमट रहे हैं और निजी क्षेत्र छँटनी में लगे हैं। टेक कम्पनियों से ही अगस्त माह में लगभग ढाई लाख कर्मचारियों को निकाल दिया गया।

इस बार विपक्ष के लिए ऐसे बहुत-से मुद्दे थे, जिन पर वह सरकार को घेर सकता था। लेकिन छप्पन भोगों से भरी थाली को थूककर कैसे ख़राब किया जाता है; यह राहुल गाँधी को देखकर समझ लीजिए। संसद सदस्यता बहाल होने के बाद राहुल गाँधी आये। हल्की-सी ही सही; लेकिन उम्मीद थी कि संसद में इस बार एक ज़ोरदार निर्णायक बहस होगी। सरकार से इस सदस्यता हरण की कुप्रथा के संचालन पर सवाल किया जाएगा। ग़रीबी, बेरोज़गारी भ्रष्टाचार पर तीखे हमले होंगे। विपक्ष के पास मुद्दों का अभाव नहीं था; लेकिन पीएम इन वेटिंग और अपने यात्रा वृतांत में सबको भटका दिया गया और असल मुद्दे दबा दिये गये।

ऐसी कमज़ोर ज़ेहनियत के व्यक्ति का नेतृत्व कांग्रेस की मजबूरी तो हो सकती है, किन्तु विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को इनके पीछे खड़ा होने का औचित्य समझ पाना कठिन है। ऊपर से विपक्षियों के ज्ञान और समझदारी का स्तर देखिए कि राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने अपनी पार्टी को आप ‘फास्टेस्ट ग्रोइंग पॉलिटिकल स्टार्ट अप’ कहा। ये राजनीतिक दल व्यवसायी कबसे होने लगे? और राजनीति जब व्यावसाय बन जाए, तो नेताओं को दलाल बनते ज़्यादा समय नहीं लगता।

महात्मा गाँधी ने कभी संसद को बाँझ और वेश्या कहा था। यह तो फिर भी ठीक विश्लेषण है। अगर आज वह जीवित होते, तो इस संसद को ‘चकला’ और ‘कोठा’ कहते; क्योंकि यहाँ रोज़ लोकतान्त्रिक उम्मीदों, जनाकांक्षाओं, संवैधानिक मर्यादाओं की, तो कभी-कभी जनप्रतिनिधियों के ईमान की नीलामी होती है। डॉ. आंबेडकर ने ब्रिटिश तर्ज पर संसदीय प्रणाली अपनाये जाने का बचाव करते हुए संविधान सभा में कहा था- ‘स्थायित्व के स्थान पर उत्तरदायित्व को मान्यता दी गयी।’

लेकिन अब भी प्रश्न यही है कि कौन-सा उत्तरदायित्व? देश के विधानमंडलों में न सिर्फ़ अयोग्य, बल्कि ज़ाहिलों की पूरी फ़ौज इकट्ठी हो गयी है। महाराष्ट्र का एक मंत्री सार्वजनिक रूप से कहता है कि मछली खाने से औरतें चिकनी दिखती हैं। तो राजस्थान के एक मंत्री का विधानसभा में बयान था कि यह मर्दों का प्रदेश है, इसलिए बलात्कार का आँकड़ा भी ज़्यादा है। अब ऐसे लम्पटों से कोई मूर्ख ही सामाजिक परिवर्तन और नारी सुरक्षा की उम्मीद कर सकता है। असल में भारतीय जनतंत्र की व्यवस्था इतनी गलीज़ हो चुकी है कि यहाँ जन तो कहीं है ही नहीं। सिर्फ़ तंत्र बचा है, जो सत्तावाद, भ्रष्टाचार, परिवारवाद, जातीयता आदि से आक्रांत है एवं पथभ्रष्ट हो चला है।

वैचारिक धुंध के दौर में डॉ. लोहिया याद आते हैं। वह कहते थे- ‘जब सडक़ें सूनी हो जाएँ, तो संसद आवारा हो जाती है।’ वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिवेश का यथार्थ यह है कि जनता के समक्ष विकल्पहीनता ही नहीं, बल्कि नैराश्य की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। जनता सिर्फ़ सत्तापक्ष से ही नहीं, बल्कि विपक्ष से भी उतनी ही निराश है। क्योंकि राजनीतिक निकृष्टता इस समय दलगत प्रभाव से परे सर्वव्यापी है। ऐसी ही विकल्पहीनता की स्थिति जनविद्रोह को जन्म देती है। आवश्यकता उस जनचेतना के उभार की है, जो इस निकम्मी व निर्लज्ज जनप्रतिनिधियों की जमात को उखाड़ फेंके। 

(लेखक पत्रकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

हीरा कारोबार को बचाने की ज़रूरत

पिछले चार-पाँच वर्षों से भारत का हीरा कारोबार लगातार संकट में है। रूस-यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध और कोरोना-काल के बाद से यह संकट और बढ़ गया है। इससे सूरत, राजस्थान और मध्य प्रदेश का हीरा कारोबार क़रीब 38 से 40 प्रतिशत घट गया है और क़रीब 12 लाख ज़्यादा हीरा कारोबार से जुड़े लोगों पर रोज़गार का संकट मंडराया है। यह सब रूस पर प्रतिबंध के चलते हुआ है।

सिर्फ़ सूरत का सालाना हीरा कारोबार 3.5 लाख करोड़ से ज़्यादा का था, जो अब 30 से 35 प्रतिशत कम हो गया है। कई हीरा कम्पनियाँ बन्द हो चुकी हैं और ज़्यादातर की कमायी घट चुकी है। सूत्रों और बयानों की मानें तो गुजरात में हीरों की कटिंग और पॉलिश करने वाले 10 से 12 लाख कारीगर बेरोज़गार हुए हैं। अभी भी हीरा कारोबार से जुड़े कर्मचारियों की छँटनी का सिलसिला रुक नहीं रहा है। गुजरात में सूरत हीरा कारोबार का केंद्र है, जहाँ दुनिया के 90 प्रतिशत रफ हीरों की कटिंग और पॉलिश का काम होता है। रूस में हीरा कारोबार सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहाँ की अलरोसा कम्पनी दुनिया के 30 प्रतिशत रफ हीरों का उत्पादन करती है, जिसके 40 प्रतिशत हीरे सूरत में कटिंग और पॉलिश के लिए आते थे। जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के मुताबिक, साल 2022-23 में भारत के ज्वेलरी निर्यात में 33.2 प्रतिशत गिरावट रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने के चलते आयी है, जिससे सूरत में रूसी हीरों के कारोबार का सबसे बड़ा बाज़ार बन्द हो गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 की पिछली तिमाही में भारत से महज़ 36,723 करोड़ रुपये के कटिंग और पॉलिश किये हुए हीरों का ही निर्यात हुआ, जो बीते साल की अप्रैल से जून की एक-तिमाही की अपेक्षा 29.37 प्रतिशत कम रहा। रूस पर अमेरिका के प्रतिबंध के चलते खाली हीरा कारोबार को ही नहीं, बल्कि भारत का जेम्स एंड ज्वेलरी कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का जेम्स एंड ज्वेलरी निर्यात 28 प्रतिशत से ज़्यादा घटा है। दरअसल अप्रैल, 2023 में अमेरिका समेत यूरोपीय संघ के देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके चलते कच्चे हीरों के आयात पर बुरा असर पड़ा है। कच्चे माल की कमी के चलते सूरत का हीरा कारोबार चौपट हो रहा है।

हीरा कारोबार कम होने और कुछ कम्पनियों के बन्द होने से इस कारोबार से जुड़े व्यापारी, कम्पनी मालिक, कर्मचारी और हीरा कारीगर सब परेशान हैं। पिछले तीन महीनों में हीरा कारोबार से जुड़े क़रीब 10 लोग आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें से अधिकांश कई पीढिय़ों से हीरा कारोबार से जुड़े थे। ये सभी श्रमिक श्रेणी के थे, जो ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। इन्हें हीरों की कटिंग और पॉलिश का काम आता था, इसके अलावा कुछ नहीं। हज़ारों से लाखों रुपये में बिकने वाले एक हीर की कटिंग और पॉलिश करके एक श्रमिक 600 से 2000 रुपये तक कमाता है। हीरा कारोबार से जुड़े ऐसे श्रमिकों की एक दिन की औसत आय 500 से 700 रुपये होती है। दो महीने पहले जी-7 देशों की बैठक में रूसी जहाज़ों, विमानों और हीरों पर लगायी गयी पाबंदी से सबसे ज़्यादा काम इन्हीं श्रमिकों के हाथों से छिना है। इससे क़रीब 12 लाख से ज़्यादा कर्मचारी परेशान तो हुए ही हैं, क़रीब 20,000 कर्मचारियों की छँटनी भी हो चुकी है, जो अभी जारी है। इन कर्मचारियों में सबसे ज़्यादा कटिंग और पॉलिश करने वाले कारीगर हैं।

गुजरात डायमंड वर्कर यूनियन की तर$फ से मिली जानकारी मुताबिक, रूस पर प्रतिबंध के चलते हीरा कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिससे इस कारोबार से जुड़े रहे बेरोज़गार लोग आत्महत्या का रास्ता अपना रहे हैं। आर्थिक तंगी और काम न मिलने के चलते इस कारोबार से जुड़े श्रमिकों, कारीगरों और कर्मचारियों से लेकर व्यापारी तक आत्महत्या कर रहे हैं। पिछले दो-तीन महीने में कुल 4 ज्वेलर्स की मौत हो चुकी है। हीरा श्रमिक संघ ने इस मंदी और हीरा कारोबार से जुड़े लोगों की समस्याओं को लेकर गुजरात सरकार और इस कारोबार से जुड़े विभिन्न विभागों को कई बार ज्ञापन सौंपे; लेकिन सरकार इस कारोबार से जुड़े लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं निकाल पायी है। हीरा श्रमिक संघ ने गुजरात सरकार से हीरा कारोबार से जुड़े श्रमिकों और कारीगरों के लिए आर्थिक पैकेज देने के साथ-साथ बेरोज़गार श्रमिकों और कारीगरों के लिए रत्नदीप योजना के तहत आर्थिक सहायता देने की माँग की है। संघ ने आत्महत्या करने वाले श्रमिकों, कारीगरों, कर्मचारियों और ज्वेलरों के परिवारों को भी सहायता देने की माँग सरकार से की है। इस दिशा में सरकार क्या क़दम उठाती है, यह अभी तक सामने नहीं आया है।

हीरा कारोबार का काम घटने से श्रमिकों और कारीगरों की आय भी घटी है। एक तरफ बचे हुए लोगों को काम कम मिल रहा है, तो दूसरी तरफ बाज़ार में कटिंग और पॉलिश करने का भाव कम मिलने लगा है। कर्मचारियों की तनख्वाह भी घटी है। आमदनी कम होने से श्रमिक, कारीगर और कर्मचारी आर्थिक तौर पर कमज़ोर हुए हैं। कुछ हीरा कम्पनियाँ और फैक्ट्रियाँ मंदी के चलते बन्द होने के कगार पर हैं, तो कुछ बन्द हो चुकी हैं।

गुजरात के अलावा मध्य प्रदेश में भी हीरा कारोबार प्रभावित हुआ है। इसी साल जनवरी में मध्य प्रदेश के एक पन्ना व्यापारी ने अपनी पत्नी की हत्या करके खुद भी आत्महत्या कर ली थी। रात में अपनी फेसबुक आईडी पर व्यापारी और उसकी पत्नी लाइव आकर रोते हुए अपनी परेशानी बता रहे थे। इस व्यापारी दम्पति ने कुछ लोगों पर अपना पैसा फँसे होने का आरोप लगाया था। व्यापारी ने रोते हुए कहा था कि ‘अब जीने की इच्छा नहीं है, मेरा पैसा बच्चों के खातिर वापिस कर दें।’ इससे पहले फरवरी, 2020 में मुम्बई के एक कारोबारी ने 15वीं मंज़िल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इस व्यक्ति का नाम धीरेन शाह था, जो हीरा पॉलिश करने वाली एक निर्यात कम्पनी का मालिक था। सूरत में आत्महत्या करने वालों की संख्या सबसे ज़्यादा है।

हीरों की कटिंग और पॉलिश के दुनिया भर में मशहूर सूरत को रूस पर प्रतिबंध के चलते अनुमानित 10,000 करोड़ से ज़्यादा का घाटा हो चुका है। इससे पहले कोरोना के चलते भी सूरत के हीरा कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ा था; लेकिन तब लोगों को उम्मीद थी कि महामारी के कम होते ही यह कारोबार दोबारा चमक उठेगा। लेकिन अब रूस पर प्रतिबंध के बाद यह उम्मीद नहीं बची है। सूरत के हीरा कारोबार के चलते हीरा कटिंग और पॉलिश में भारत का पूरी दुनिया में दूसरा स्थान आता है। हीरा कारोबार पर मंदी की मार से पहले भारत का हीरा कारोबार 23 अरब डॉलर से ज़्यादा का था, जिसमें 80 प्रतिशत हिस्सेदारी सूरत की है। अब सूरत में हीरे की चमक खो रही है, जिसके चलते इस कारोबार से जुड़े लोगों पर संकट मँडराने के साथ-साथ सरकार को भी घाटा हो रहा है। रूस के अलावा हॉन्गकॉन्ग सूरत के लिए बड़ा हीरा बाज़ार है, जहाँ हीरों की बड़ी खपत होती है। हालाँकि सूरत में कटिंग और पॉलिश किये गये हीरों की माँग पूरी दुनिया में है; लेकिन रूस और हॉन्गकॉन्ग में ही 60 प्रतिशत से ज़्यादा कारोबार सूरत से जुड़ा है। सितंबर, 2019 में गुजरात में हीरा कारोबार से जुड़े क़रीब 60 हज़ार लोग बेरोज़गार हुए थे। इनमें से कई लोगों ने आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद कोरोना महामारी ने इस उद्योग को चौपट करके रखा था और अब रूस पर जी-7 देशों के प्रतिबंध ने इस कारोबार की कमर तोडक़र रख दी है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के क़रीब 95 प्रतिशत हीरो की कटिंग और पॉलिश भारत में होती है। भारत में जितने हीरों की कटिंग और पॉलिश का काम होता है, उसका 80 प्रतिशत गुजरात के सूरत में होता है। फरवरी, 2021 तक देश की जीडीपी में यहाँ के हीरा और सोना कारोबार की हिस्सेदारी 7.5 प्रतिशत थी, जबकि सभी चीज़ों के कुल निर्यात में यह हिस्सेदारी 14 प्रतिशत थी। सन् 2018 में ही सरकार के सामने यह रिपोर्ट आ गयी थी कि गुजरात का हीरा कारोबार अपनी चमक खोता जा रहा है। बावजूद इसके सरकार ने इस बड़ी कमायी वाले $खास कारोबार को बचाने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया।

सरकार ने इस महँगे और सबसे ज़्यादा कमायी वाले कारोबार को भी उसी के हाल पर छोड़ दिया है, जिससे कई हीरा कारोबारी विदेशों में जाकर शिफ्ट हो चुके हैं। वित्त वर्ष 2023-24 के आम बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री सीतारमण ने हीरा बनाने में इस्तेमाल होने वाले बीजों पर आयात शुल्क पाँच प्रतिशत घटाने की घोषणा की थी; लेकिन इससे हीरा कारोबार की चमक नहीं बढ़ सकी। उस समय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि भारत प्राकृतिक हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग में एक वैश्विक लीडर के रूप में काम करता है, जो मूल्य के वैश्विक कारोबार में लगभग तीन-चौथाई योगदान देता है। गुजरात सरकार को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान पर ध्यान देना चाहिए और हीरा कारोबार को बचाना चाहिए।

न्याय संहिता, केंद्र की मंशा पर उठ रहे सवाल

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

केंद्र सरकार आपराधिक न्याय प्रणाली को बदलना चाहती है। गृह मंत्री अमित शाह ने इसके लिए 11 अगस्त को लोकसभा में तीन नये विधेयक पेश किये। ये विधेयक भारतीय दंड संहिता (आईपीसी)-1860, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी)-1973 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872 में बदलाव के लिए हैं। इनकी जगह भारतीय न्याय संहिता (विधेयक)-2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (विधेयक)-2023 तथा भारतीय साक्षी विधेयक-2023 का प्रस्ताव है। ये विधेयक भारत के लिए प्रस्तावित एक नयी न्याय संहिता हैं। इन्हें एक व्यापक न्याय संहिता के रूप में देखा जा रहा है। इन तीनों विधेयकों के क़ानून बनने से देश की न्याय व्यवस्था पूरी तरह से बदल जाएगी।

केंद्र सरकार इस विधेयक के कई फ़ायदे गिना रही है। सरकार का कहना है कि इस अधिनियम के क़ानून बनने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता सशक्त होगी। राजद्रोह क़ानून निरस्त हो जाएगा। महिलाओं तथा बच्चों को हिंसा से बचाया जा सकेगा। अपराध पीडि़तों को न्याय मिलने में आसानी होगी। इसके अतिरिक्त इस विधेयक में भारतीय दंड संहिता की धारा-377 को पूर्ण रूप से हटाने की बात कही गयी है। ऐसा होने से समलैंगिकता, पुरुषों तथा महिलाओं के बीच सहमित, असहमति से हुए किसी भी तरह के प्राकृतिक तथा अप्राकृतिक सम्बन्धों को भी वैध माना जाएगा। आईपीसी को प्रतिस्थापित करने के लिए को एक स्थायी समिति को भेजा जा चुका है। विदित हो कि गृह मंत्रालय ने सन् 2020 में आपराधिक क़ानून की तीनों संहिताओं की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय क़ानून विश्वविद्यालय, दिल्ली के पूर्व कुलपति डॉ. रणबीर सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस समिति को देश के आपराधिक क़ानूनों में सैद्धांतिक, प्रभावी तथा कुशल सुधार की सिफ़ारिश करने को कहा गया था। इसमें न्याय, गरिमा तथा व्यक्ति के अंतर्निहित संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देने की बात कही गयी है। समिति ने फरवरी, 2023 में आपराधिक क़ानून में संशोधन के साथ अपनी सिफ़ारिशें प्रस्तुत कीं। इन सिफ़ारिशों को विधेयक के रूप में केंद्र सरकार ने लोकसभा में पेश किया।

पूर्व क़ानून मंत्री कपिल सिब्बल ने भारतीय न्याय संहिता विधेयक-2023 को असंवैधानिक बताया है। कपिल सिब्बल का आरोप है कि केंद्र सरकार औपनिवेशिक युग के क़ानूनों को ख़त्म करने के बहाने ऐसे क़ानूनों के माध्यम से न्यायपालिका पर तानाशाही थोपना चाहती है। कपिल सिब्बल ने राज्यसभा में तीनों विधेयकों वापस लेने का आह्वान किया। कपिल सिब्बल का आरोप है कि ये क़ानून देश का भविष्य ख़तरे में डाल देंगे। केंद्र सरकार ऐसे क़ानून बनाना चाहती है, जिनके तहत सर्वोच्च न्यायालय के साथ ही उच्च न्यायालयों तथा अन्य न्यायालयों के न्यायाधीशों के अतिरिक्त मजिस्ट्रेट, लोक सेवकों, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) तथा अन्य सरकारी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सके। कपिल सिब्बल ने इन विधेयकों को लेकर न्यायाधीशों से सतर्क होने को कहा है। कपिल सिब्बल ने कहा है कि भारतीय न्याय संहिता (विधेयक)-2023 सबसे अधिक ख़तरनाक है। संसद के दोनों सदनों में इसके पास होने से सभी न्यायिक संस्थानों पर केवल सरकार का आदेश चलेगा। इससे सरकार मनमानी तथा तानाशाही करेगी। ये (तीनों) विधेयक पूरी तरह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता के विपरीत हैं। असंवैधानिक हैं तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की जड़ पर प्रहार करने वाले हैं।

वास्तव में भारतीय न्याय संहिता विधेयक की धारा-254, धारा-255 तथा धारा-257 में बदलाव से न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों तथा सरकारी अधिकारियों को काम करने में समस्या आएगी। इससे उनको न्यायिक फ़ैसले सुनाने में परेशानी होगी। ग़लत फ़ैसला देने पर उन्हें जेल हो सकती है। फ़ैसला ग़लत है या सही यह केंद्र सरकार तय करेगी। कपिल सिब्बल ने कहा है कि सरकार का यह रुख़ एक तरह से न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों तथा सरकारी अधिकारियों को धमकाना है। पूर्व क़ानून मंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने संस्थानों को ख़त्म कर दिया है। जो कुछ बचा है, वह प्रस्तावित क़ानूनों से नष्ट हो जाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि फिर आप ख़ुद को लोकतंत्र की जननी क्यों कहते हैं? आपको कहना होगा कि मैं तानाशाही का जनक हूँ। आप किस तरह के लोकतंत्र की बात करते हैं? क्या दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में ऐसे क़ानून हैं? विदित हो कि समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल अन्याय से लडऩे के उद्देश्य से एक ग़ैर-चुनावी मंच इंसाफ़ बना चुके हैं।

भारतीय न्याय संहिता विधेयक-2023 आईपीसी की वर्तमान में लागू धाराओं को निरस्त करके नये तरीक़े से प्रस्तावित करता है। वर्तमान भारतीय दण्ड संहिता को सन् 1860 में अंग्रेजों की सरकार ने क़ानून बनाया था। इसका मसौदा-1834 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता वाले पहले क़ानून आयोग ने तैयार किया गया। इस क़ानून में आईपीसी की 511 धाराएँ हैं, जबकि विधेयक में 356 प्रावधान हैं। इस विधेयक में मानहानि, महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध तथा आत्महत्या के प्रयास सहित मौज़ूदा प्रावधानों में कई बदलाव किये गये हैं।

इसमें आईपीसी की धारा-124(ए) राजद्रोह के अपराध से सम्बन्धित है। आजीवन कारावास का प्रावधान करती है। अब इसमें तीन साल तक की सज़ा बढ़ाने के साथ ज़ुर्माना जोडऩे का प्रस्ताव है। इस विधेयक में राज्य के ख़िलाफ़ अपराध से सम्बन्धित अध्याय है। इसके प्रावधान 150 में भारत की संप्रभुता, एकता तथा अखंडता को ख़तरे में डालने वाले कृत्यों के बारे में नया क़ानून बनाना है। इसके अतिरिक्त आतंकवाद को पहली बार इस विधेयक में परिभाषित किया गया है। परन्तु इस विधेयक में एक ऐसे व्यक्ति को आतंकवादी के रूप में परिभाषित किया गया है, जो भारत की एकता, अखंडता तथा सुरक्षा को ख़तरे में डालता है। आम जनता, जनता के किसी वर्ग को डराने या सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाडऩे के इरादे से भारत या विदेश में कोई कार्य करता है। यह सरकार तय करेगी कि कौन देश के ख़िलाफ़ काम कर रहा है। अभी तक देखा गया है कि सरकार ने उन लोगों को देशद्रोही माना है, जिन्होंने सरकार की निंदा की है तथा जिन्होंने लोगों से सरकार के ख़िलाफ़ कुछ बोला है। इस आधार पर सरकार की कमियाँ उजागर करने वाले तथा निंदा करने वाले मीडिया चैनल, सामाजिक कार्यकर्ता तथा लोग सरकार के निशाने पर होंगे। इस विधेयक में मानहानि मामले में दो साल तक की साधारण क़ैद या ज़ुर्माना या दोनों या सामुदायिक सेवा का प्रावधान है।

इस विधेयक में पहली बार मॉब लिंचिंग करने वालों के लिए मृत्युदंड की सज़ा का प्रावधान किया गया है। इसमें कम-से-कम सज़ा के रूप में 7 साल की क़ैद या आजीवन कारावास का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त शादी, नौकरी, प्रमोशन का लालच देकर या अपनी पहचान छिपाकर किसी महिलाओं का यौन शोषण भी इस विधेयक में अपराध माना गया है। इस विधेयक में व्यभिचार के अपराध का प्रावधान हटाया गया है। प्रस्तावित विधेयक में किसी मामले में 90 दिनों के भीतर आरोप-पत्र दाख़िल करना होगा। न्यायालय 90 दिनों के लिए अनुमति दे सकता है। 180 दिनों के भीतर जाँच पूरी कर ट्रायल के लिए भेजना आवश्यक होगा। न्यायाधीशों को सुनवाई प्रक्रिया शुरू होने के 30 दिन में फ़ैसला सुनाना होगा। गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से तीनों विधेयकों को पड़ताल के लिए गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति को भेजने का आग्रह किया है। प्रश्न उठते हैं कि क्या इन विधेयकों के क़ानून बनने पर देश में निष्पक्ष रूप से न्याय की आशा की जा सकेगी? क्या न्यायाधीश स्वतंत्र रूप से बिना किसी दबाव के न्याय कर सकेंगे? वर्तमान सरकार पर न्यायाधीशों पर दबाव बनाने के पहले ही आरोप हैं। ऐसे में क्या सरकार न्यायिक संस्थानों पर अपनी मर्ज़ी नहीं थोपेगी? जिस सरकार को अपनी निंदा बर्दाश्त नहीं होती हो, उसकी नीयत साफ़ कैसे हो सकती है? हाल ही में एक अध्यापक को केवल इसलिए नौकरी से हटा दिया गया कि उसने यह कहा कि अनपढ़ों को वोट न दें।

इन विधेयकों के क़ानून बनने पर क्या ऐसे लोगों को सज़ा नहीं होगी? इसके अतिरिक्त कई न्यायाधीशों को जेल की सज़ा होगी। इसके अतिरिक्त जिन नेताओं, मंत्रियों पर आपराधिक मुक़दमे चल रहे हैं; उन्हें सरकार चाहेगी, तो समाप्त करा देगी। वहीं विपक्षी नेताओं को आसानी से जेल भिजवा देगी। यह अभी भी हो रहा है, परन्तु उतनी आसानी से नहीं हो पा रहा है, जितनी आसानी से इन विधेयकों के क़ानून बनने से होगा। ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका की सभी कार्रवाइयाँ पूरी तरह निष्पक्ष हैं, परन्तु सरकार के दबाव से मुक्त अधिकतर फ़ैसले सही होते हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने एक बयान में कहा था कि किसी मामले में ट्रायल में 15 से 20 साल लगते हैं। इस दौरान व्यक्ति न्यायिक हिरासत में रहता है। बाद में निर्दोष साबित हो जाता है। ऐसे में क्या उसके जीवन का कोई हर्ज़ाना तय हो सकता है? इसी 15 अगस्त को उन्होंने अपने एक भाषण में वर्तमान भारत में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को लेकर कहा कि विध्वंस की धमकी के मामले में मनमानी गिरफ़्तारी के मामलों में न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए।

न्यायपालिका के सामने न्याय तक पहुँच में आने वाली बाधाओं को दूर करने की चुनौती है तथा इसके लिए एक रोडमैप मौज़ूद है। किसी व्यक्ति में मनमाने ढंग से गिरफ़्तारी, विध्वंस की धमकी, अगर उनकी सम्पत्तियों को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से कुर्क किया जाता है, तो इस विश्वास की भावना को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में सांत्वना और आवाज़ मिलनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ का बयान ऐसे समय में आया है, जब भाजपा के शासन-काल में न्यायाधीशों पर दबाव तथा शत्रुओं या विरोधियों की सम्पत्तियों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें ध्वस्त करने के आरोप हैं। विदित हो कि मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ को सही फ़ैसले करने वाला माना जाता है। क्या इन क़ानूनों के बनने से देश में चंद्रचूड़ जैसे न्यायाधीश पैदा हो सकेंगे?

मैं जजों से सतर्क रहने का अनुरोध करना चाहता हूँ। अगर ऐसे क़ानून पारित किये गये, तो देश का भविष्य ख़तरे में पड़ जाएगा। हम देश का दौरा करेंगे तथा लोगों को बताएँगे कि आप किस तरह का लोकतंत्र चाहते हैं, जो क़ानूनों के माध्यम से लोगों का गला घोंट दे तथा उनका मुँह बन्द कर दे। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से पूछना चाहता हूँ कि किस इरादे से इन क़ानूनों को लोकसभा में विचार के लिए पेश किया गया है। क्या आप लोक-सेवकों को डराना चाहते हैं? मैं आपसे इन्हें वापस लेने का अनुरोध करता हूँ। मैं लोगों को बताना चाहता हूँ कि औपनिवेशिक युग के क़ानूनों को हटाया जा रहा है, परन्तु आप औपनिवेशिक-काल की तुलना में अधिक कठोर क़ानून ला रहे हैं।’’

कपिल सिब्बल

राज्यसभा सदस्य एवं पूर्व क़ानून मंत्री

कौन समझेगा छात्र-छात्राओं की पीड़ा?

देश में लगातार आत्महत्या कर रहे छात्र-छात्राएँ 7 गहलोत ने कोटा के कोचिंग मालिकों को लताड़ा

आज़ादी की 77वीं वर्षगाँठ के मौके पर 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले की प्राचीर से देश के नाम अपने सम्बोधन में कहा- ‘हम सौभाग्यशाली हैं कि हम अमृत-काल में प्रवेश कर रहे हैं। इस कालखण्ड में हम जितना काम करेंगे, जो फ़ैसले लेंगे, आने वाले 1,000 साल का देश का स्वर्णिम इतिहास उससे अंकुरित होने वाला है। इस कालखण्ड में होने वाली घटनाएँ 1,000 साल तक प्रभाव पैदा करने वाली हैं। यह नया भारत है। आत्मविश्वास से भरा हुआ भारत है। संकल्पों को चरितार्थ करने के लिए जी-जान से जुटा हुआ भारत है। इसलिए यह भारत न रुकता है। न थकता है। न हाँफता है; और न ही यह भारत हारता है।’

राजस्थान के कोटा में दो छात्रों- आविष्कार शंबाज़ी कासले (17) और आदर्श राज (18) ने आत्महत्या कर ली। इससे पहले इंजीनियरिंग में दाख़िला लेने के लिए ज्वांइट एट्रेंस एग्जाम की तैयारी कर रहे वाल्मीकि जांगिड़ नामक एक छात्र ने 15 अगस्त की शाम को आत्महत्या कर ली। बिहार से कोटा अपना भविष्य गढऩे आये इस 18 वर्ष के छात्र को प्रधानमंत्री का भाषण कोरी शब्दावली लगा होगा। उसे नहीं लग रहा होगा कि वह अमृत-काल में प्रवेश कर रहा है। अगर उसे ऐसा लगता, तो वह ऐसा आत्मघाती क़दम क्यों उठाता?

ग़ौर करने वाली बात यह है कि कोटा में इस साल 15 अगस्त तक यानी साढ़े सात महीनों में अब तक 21 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। गत वर्ष यह संख्या 15 थी। कोचिंग सेंटर के नाम से भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले इस कोटा में फैले कोचिंग के इस धन्धे को जानना ज़रूरी है। कोटा भारत में संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के अभ्यर्थियों का हब है, जिससे अनुमानित रूप से सालाना 5,000 करोड़ रुपये का राजस्व आता है। कोटा आने वाले छात्र-छात्राएँ मुख्य रूप से अपनी 12वीं की परीक्षा, नीट और जेईई जैसी महत्त्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों में पढ़ते हैं। एक अनुमान है कि कोटा अब देश भर में क़रीब तीन लाख नीट और जेईई छात्र-छात्राओं का केंद्र है। अगर आत्महत्या के आँकड़ों पर नज़र डालें, तो पता चलता है कि सन् 2015 में 18, सन् 2016 में 17, सन् 2017 में सात, सन् 2018 में 20, सन् 2019 में 18 छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की थी। सन् 2020 और सन् 2021 में कोरोना महामारी के कारण कोटा के कोचिंग संस्थानों कक्षाएँ नहीं लगीं। इन दो वर्षों में वहाँ से किसी छात्र के आत्महत्या के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

तमिलनाडु की एक दु:खद ख़बर बताती है कि किस तरह देश के युवा देश की शिक्षा प्रणाली, अन्य ख़ामियों और मनोवैज्ञानिक सपोर्ट की ग़ैर-हाज़िरी में फाँसी लगाने का विकल्प चुन रहे हैं। दरअसल, तमिलनाडु में नीट की परीक्षा देने और सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट न मिलने पर आत्महत्या करने वाले छात्रों की सूची बहुत लम्बी है। लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि एक छात्र के साथ-साथ उसके पिता ने भी आत्महत्या कर ली। 19 वर्षीय जगदीश्वरन ने बीते दो वर्षों में दो बार नीट की परीक्षा दी; लेकिन दोनों बार उसका स्कोर ऐसा नहीं था कि उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिल पाता। दूसरे प्रयास में भी सफलता न मिलने पर उसने फाँसी लगा ली। वह जानता था कि उसके पिता सेल्वसेकर की आर्थिक हालत उतनी अच्छी नहीं है कि वह उसे किसी निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ा सकें।

जगदीश्वरन के एक दोस्त का कहना है कि वह पढ़ाई में बहुत अच्छा था। बेटे के अन्तिम संस्कार के बाद पिता सेल्वसेकर ने कहा था कि नीट की वजह से मैंने अपने बेटे को खो दिया। मेरे जैसा हाल किसी का न हो। और बेटे के दु:ख में उन्होंने भी आत्महत्या कर ली।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि छात्र-छात्राएँ केवल नीट और जेईई की परीक्षाओं में फेल होने पर ही आत्महत्याएँ नहीं करते, बल्कि इन परीक्षाओं में सफल होने के बाद जब आईईटी, आईआईटी, एनआईटी, आईआईएएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढऩे के लिए जाते हैं, तो वहाँ भी कई छात्र-छात्राएँ आत्महत्या कर लेते हैं। आईआईटी अपनी प्रवेश प्रक्रिया, प्लेसमेंट, शोध आदि के लिए प्रसिद्ध है। पर आत्महत्याओं के मामले वहाँ भी सामने आते हैं। सरकार ख़ुद इस तथ्य को स्वीकारती है। बीते दिनों राज्यसभा में शिक्षा मंत्रालय ने संसद में बताया कि सन् 2018 से मार्च, 2023 तक के आँकड़ों के मुताबिक, भारत के शीर्ष उच्च शिक्षा संस्थानों में आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों की संख्या 98 है। इनमें से कम-से-कम 39 आत्महत्याएँ आईआईटी में हुईं। इसके बाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (एनआईटी) और केंद्र वित्त पोषित विश्वविद्यालयों में 25-25 ने मौत को गले लगाया। वहीं सन् 2019 से अब तक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में 13 मौतें दर्ज की गयीं।

मुख्य सवाल यह है कि आख़िर कई छात्र आत्महत्या का रास्ता क्यों चुनते हैं? इसके पीछे कोई एक नहीं, बल्कि कई कारण हो सकते हैं। मसलन, पढ़ाई का तनाव, अभिभावक का प्रतिष्ठित सस्ंथान में पढऩे का दबाव, निजी करियर व अच्छा पैकेज पाने की प्रबल चाह, भाई-बहन के साथ तुलनात्मक दबाव, सामाजिक दबाव आदि। कई बार जातिगत टिप्पणियाँ व इस कारण सामाजिक-सांस्कृतिक समावेशी माहौल नहीं मिलना भी अपना असर डालता है और ऐसा सामना करने वाले छात्र-छात्राएँ अलग तरह की प्रताडऩा सहते हैं, जिससे कई छात्र-छात्राएँ अपनी ज़िन्दगी का ही अन्त कर लेते हैं। सवाल उठता है कि जब छात्र कई तरह के तनाव से गुज़र रहे होते हैं, तो शैक्षणिक संस्थानों, सरकार के सम्बन्धित विभागों, अभिभावकों और समाज की भूमिका क्या होनी चाहिए? आख़िर बच्चे, किशोर, युवा किसी भी राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण पूँजी हैं।

ग़ौरतलब है कि भारत इस समय आबादी में ही दुनिया में पहले नंबर पर नहीं है, बल्कि 15 से 30 वर्ष की आबादी में भी यह देश पहले नंबर पर है। देश की 52 प्रतिशत आबादी इसी आयु-वर्ग की है। शैक्षिक संस्थान ऐसे दर्दनाक हादसे होने पर कई बार जाँच समितियों का गठन कर देते हैं और कुछ ऐसे क़दम उठाने का ऐलान कर देते हैं, जिससे छात्र-छात्राएँ तनावमुक्त होकर ज़िन्दगी में आगे बढ़ सकें। लेकिन इसका बहुत असर नहीं होता। अधिकतर अभिभावक आत्महत्या की ख़बरें पढऩे-सुनने के बाद भी अपना नज़रिया नहीं बदलते। दरअसल वे ऐसी ख़बरों को दूर-दराज़ की ख़बर समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। ऐसे में सामाजिक नज़रिये को बदलना एक बहुत बड़ी चुनौती है। पर कई अपवाद वाली आवाज़ें भी सुनायी पड़ती हैं।

हैदराबाद में रहने वाली डॉ. शुभ्रा, जिन्होंने ख़ुद कोटा में एक साल की मेडिकल परीक्षा की कोचिंग ली और उसी साल अच्छी रैंक आने पर सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया। उसके बाद दिल्ली एम्स से एमडी की। वह कहती हैं कि वह अपने बेटे पर किसी भी तरह का दबाव नहीं डालेंगी। इसी तरह आईआईटी बॉम्बे से इंजीनियरिंग करने वाले मरीन का भी कहना है कि वह अपनी बेटी पर अपने सपने पूरे करने का दबाव नहीं डालेंगे। उसकी रुचि ही उनकी प्राथमिकता होगी। पर ऐसी सोच बहुत कम माता-पिता की होती है। शिक्षा मंत्रालयों, चाहे वो राज्यों के हों या केंद्र का; सभी का अहम दायित्व है कि वो बच्चों को ऐसा माहौल मुहैया कराएँ, जिसमें बच्चे किसी भी प्रकार का तनाव और दबाव महसूस न करें। अगर तनाव और दबाव में हैं, तो उन्हें समय पर सहायता उपलब्ध करायी जानी चाहिए।

 रोपड़ आईआईटी में मैकिनकल इंजीनियरिंग के दूसरे साल की छात्रा वैष्णवी बताती हैं- ‘यह सच है कि यहाँ पहले साल बहुत-से छात्र-छात्राएँ तनाव महसूस करते हैं; क्योंकि उनका सामना कई मेधावी छात्रों से होता है। मैं भी तनाव से गुज़री हूँ। पर धीरे-धीरे ताना-बाना समझ में आने लगता है। और दूसरे साल तक धुन्ध साफ़ होने लगती है।’

इधर बॉम्बे, दिल्ली और मद्रास आईआईटी ने इस साल अगस्त में शुरू हुए नये शैक्षणिक सत्र से आत्महत्या रोकने सम्बन्धी नयी पहल की है। बॉम्बे आईआईटी ने एक अधिसूचना जारी करके कहा है कि अन्य छात्रों से उनके जेईई या गेट के स्कोर के बारे में पूछना अनुचित है। क्योंकि इससे उसकी जाति का भी पता चल सकता है। इधर तनावग्रस्त छात्र-छात्राओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोकने और तनाव कम करने के लिए दिल्ली आईआईटी ने मिड सेमेस्टर परीक्षा का एक सेट ड्रॉप करने का फ़ैसला लिया है। वहीं आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि ने बताया कि एक ऐसा ऐप तैयार किया गया है, जो छात्रों के व्यवहार को ट्रैक करेगा और सप्ताह में दो बार अभिभावकों को रिमाइंडर भेजेगा कि वे अपने बच्चों से बात करें। बातचीत की रिकॉर्डिंग भी करनी होगी। निदेशक कामकोटि के अनुसार, घर से दूर रहकर पढ़ाई करने वाले बच्चों की परिजनों से बात होने पर उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होता। अब देखना यह है कि ऐसी कोशिशें कितनी कारगार होती हैं। दरअसल इस बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए सभी हितधारकों को मिलकर व्यापक स्तर पर बड़े फैसले लेने की दरकार है।

मैं कोटा में बच्चों को अब मरते हुए नहीं देख सकता। सिस्टम सुधारिए अब। एक भी बच्चे की मौत माता-पिता के लिए बहुत बड़ी क्षति है। कोचिंग संस्थानों में कक्षा-9 और 10 के छात्रों का नामांकन करने से उन पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। मैंने इस मामले को लेकर एक कमेटी बनाने की घोषणा की है। यह कमेटी 15 दिनों में अपनी रिपोर्ट देगी। यह माता-पिता की भी ग़लती है कि छात्रों पर बोर्ड परीक्षाओं को पास करने और प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने का बोझ है। यह सुधार का समय है।’’

अशोक गहलोत

मुख्यमंत्री, राजस्थान

बदल रहा देश का राजनीतिक नैरेटिव

हमेशा आक्रामक रहने वाली भाजपा और केंद्र सरकार अब बचाव की मुद्रा में हैं

सुशील मानव

क्या देश का राजनीतिक नैरेटिव बदल रहा है? पिछले डेढ़ महीने के तमाम घटनाक्रम और सरकार की प्रतिक्रिया पर नज़र डालें, तो बहुत-सी चीज़ें बदलती और हिलती हुई दिखती हैं। बीते 10-12 वर्षों में देश का नैरेटिव भाजपा-आरएसएस ने सेट किया है। पर आज अचानक लगता है कि देश का राजनीतिक नैरेटिव सत्ताधारी दल से छूट रहा है। नेताओं की शिक्षा, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, बेरोज़गारी, महँगाई आदि तमाम मुद्दों पर देश का नैरेटिव बदल रहा है। आलम यह है कि मेनस्ट्रीम मीडिया इसे 10 वर्षों की एंटी-इनकम्बेंसी बताने लगा है। सत्ता का जहाज़ डूबने की आशंका के साथ ही मीडिया के सुर भी बदलने लगे हैं।

हमेशा आक्रामक रहने वाली भाजपा और सरकार अब बचाव की मुद्रा में है। आक्रामकता की कोशिश के बावजूद भाषा और हाव-भाव उनका साथ नहीं दे रहे हैं। एडटेक प्लेटफॉर्म ‘अनएकेडमी’ के शिक्षक करण सांगवान मामला इसकी पुष्टि करता है। नैरेटिव अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें क़ानूनों में बदलाव करना पड़ रहा है। भारतीय दंड संहिता के कई क़ानूनों में भारी फेरबदल के बाद प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे बच्चों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। उन्हें सारे नोट्स दोबारा से बनाने पड़ रहे हैं। इसी को लेकर शिक्षक करण सांगवान का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ, जिसमें वह छात्रों से अपनी एक सामान्य राय साझा करते हुए कहते हैं- ‘मुझे भी ऐसा ही लगा था कि रोऊँ या हँसूँ; क्योंकि मेरे पास भी बहुत-से पैरेंट्स हैं। बहुत सारे नोट्स हमने भी बनाये थे। हर किसी के लिए बहुत मेहनत है। आपको भी काम मिल गया। लेकिन एक चीज़ याद रखना, अगली बार जब भी अपना वोट दो, तो किसी पढ़े-लिखे इंसान को अपना वोट देना।…’

इस पर करण सांगवान को नौकरी से निकालते हुए अनएकेडमी के सह-संस्थापक रोमन सैनी ने ट्वीटर पर लिखा- ‘हम एक शैक्षिक प्लेटफॉर्म हैं; जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसा करने के लिए हमने सभी शिक्षकों के लिए सख़्त आचार संहिता लागू की है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हमारे शिक्षार्थियों को निष्पक्ष ज्ञान तक पहुँच प्राप्त हो। हम जो कुछ भी करते हैं उसके केंद्र में हमारे शिक्षार्थी होते हैं। क्लासरूम व्यक्तिगत राय और विचार साझा करने की जगह नहीं है; क्योंकि वे उनको ग़लत तरीक़े से प्रभावित कर सकते हैं। वर्तमान स्थिति में हमें करण सांगवान से अलग होने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है; क्योंकि वह आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं।’

करण सांगवान अपनी टिप्पणी और बर्ख़ास्त होने के सवाल पर जवाब दिया कि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। किसी पार्टी का ज़िक्र नहीं किया। हो सकता है उन्होंने किसी राजनीतिक दबाव के कारण मुझे नौकरी से निकाल दिया हो। अनएकेडमी के कोड ऑफ कंडक्ट में लिखा हुआ है कि आप कोई भी राजनीतिक टिप्पणी नहीं करेंगे। लेकिन उन्होंने राजनीतिक टिप्पणी को भी स्पेसिफाइड नहीं किया है। आप किस बयान को कहेंगे कि यह बयान राजनीतिक प्रकृति का है?

दरअसल, सांगवान का वीडियो वायरल होते ही भाजपा की ट्रोल आर्मी ने अनएकेडमी को ट्रोल करना शुरू कर दिया था। शायद किसी ख़तरे की आशंका से अनएकेडमी ने करण सांगवान को नौकरी से निकाल दिया। लेकिन उनका नौकरी से निकाला जाना बैकफॉयर कर गया। विपक्ष और अन्य लोगों ने मुद्दे को उठा लिया और दलील दी जाने लगी कि करण संगवान ने तो किसी का नाम नहीं लिया था फिर ‘अनपढ़ नेता’ को भाजपा ने प्रधानमंत्री से क्यों जोड़ लिया? कार्टून और मीम्स की बाढ़ आ गयी। मीडिया में अनपढ़ नेता चर्चा का विषय बन गया। भाजपा प्रवक्ताओं को इसका जवाब देते नहीं बना। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इसे चोर की दाढ़ी में तिनका बताया। इस बीच प्रधानमंत्री के वो तमाम वीडियो सोशल मीडिया में तैरने लगे, जिनमें वह अंग्रेजी शब्दों का उच्चारण करते हुए अटके हैं। जिनमें वह ग़लत बोले हैं या फिर जिनमें उन्होंने तर्क और विज्ञान की धजिज्याँ उड़ायी हैं; जैसे कि नाले की गैस से चाय बनाना, ट्रैक्टर के ट्यूब में गैस भरकर खेत ले जाकर पम्प सेट चलाने वाला वीडियो, बालाकोट एयर स्ट्राइक के समय बादलों में रडार के लड़ाकू विमानों को न पकड़ पाने जैसी बातें, आदि।

ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री और भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की शिक्षा और उनकी डिग्री सर्टिफिकेट और उसकी प्रिंटिंग त्रुटियाँ पहले भी लगातार चर्चा के केंद्र में रही हैं।

करण सांगवान का मुद्दा ख़त्म भी नहीं हुआ था कि आईसीएस कोचिंग की बबिता मैम का एक पुराना वीडियो वायरल हो गया। वह भी क्लास में बच्चों से कह रही हैं कि जब तुम वोट डालने जाओ, तो यह सोचा करो कि तुम्हारे पाँच साल की जितनी नौकरियाँ निकलेंगी, जिस हिसाब से भर्ती होंगी, स्कूल का स्टैंडर्ड है। कॉलेज का; वो सब हमने इनके हाथ में दे दिया। क्योंकि यही नौकरी निकालने वाले हैं। यही रोज़गार देने वाले हैं। यही स्कूलों के स्तर पर कमांड कसने वाले हैं। इसलिए बेटा पढ़े-लिखे लोगों को राजनीति में आने की बहुत ज़रूरत है इंडिया में।’

इससे पहले नेताओं की शिक्षा को लेकर अभिनेत्री काजोल का बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। बयान के बाद वह भी भाजपा आईटी सेल और दक्षिणपंथी समूहों के ट्रोलर्स के निशाने पर आ गयी थीं। अब मणिपुर में दो कुकी स्त्रियों के साथ बर्बरता और यौन हिंसा का वीडियो 19 जुलाई को वायरल होने के बाद महिला सुरक्षा के मुद्दे पर पूरे देश में केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठने लगी है। लोगों में एक स्पष्ट संदेश गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा वीडियो पर स्वत:संज्ञान लेने के बाद ही मणिपुर मसले पर प्रधानमंत्री ने 80 दिनों की चुप्पी तोड़ी। सबसे बड़ी बात मीडिया का मिज़ाज बदल गया है। जो एंकर कल तक रीढ़विहीन नज़र आते थे, वे सरकार से सवाल पूछने लगे हैं।

10 साल से विपक्ष पर चीख़ते चले आ रहे अर्णव गोस्वामी पहली बार मणिपुर की घटना पर भाजपा और केंद्र सरकार पर चीख़ते सवाल उठाते नज़र आये। उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह चीख़कर कह रहे हैं- ‘कोई भी देश में सवालों से परे नहीं होना चाहिए। सरकार को मणिपुर पर बहानेबाज़ी बन्द करनी चाहिए। केंद्र सरकार से जब मणिपुर पर सवाल पूछे जाते हैं, तो राजनीतिक स्कोर सेटल करने के लिए और बैलेंस करने के लिए बताया जाता है कि राजस्थान में क्या हो रहा है? यह बिलकुल ग़लत है और ग़लत को ग़लत कहना चाहिए। हक़ीक़त यह है कि सरकार ग़लतियों पर ग़लतियाँ कर रही है। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को अब तक बर्ख़ास्त न करना बहुत बड़ी ग़लती है। मुझे ये सच बोलना पड़ेगा कि अगर मणिपुर में किसी विपक्षी दल की सरकार होती, तो अब तक केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लगा देती। ध्यान भटकाने का काम नहीं चलेगा, हमें समाधान चाहिए। केंद्र सरकार और मणिपुर की राज्य सरकार ने ग़लतियों की पूरी सीरीज बना दी है और इसे रोकना होगा।

इधर, ख़ुदरा महँगाई दर 15 महीने के उच्चतम पर है। महँगाई पर सरकार के पास यूक्रेन युद्ध के अलावा और कोई बहाना नहीं है। अब महँगाई के मुद्दे पर सवाल इस सरकार से पूछना पत्रकारों के लिए आफ़त को न्यौतना है। 19 अगस्त को एक न्यूज चैनल के जी-20 शिखर सम्मेलन में एक लाइव शो के दौरान एंकर सुधीर चौधरी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से पूछा- ‘जब टमाटर 250-300 रुपये हुआ, तो क्या आपके भी घर में बात होती थी टमाटर के बारे में? कि थोड़े दिन कम कर दिया जाए।’ इस सवाल पर केंद्रीय मंत्री बौखलाकर बोलीं- ‘मैं सुधीर जी से पूछ सकती हूँ कि सुधीर जी क्या हुआ, जब आप जेल में थे?’

इसके बाद केंद्रीय मंत्री एंकर नविका कुमार से भिड़ गयीं। दरअसल नविका कुमार ने पूछा कि अगर ‘इंडिया’ एलायंस की सारी पार्टियाँ मिलकर बीजेपी या एनडीए के ख़िलाफ़ एक सिंगल कैंडिडेट खड़ा करें और विपक्ष के वोटों का बिखराव न हो, तो क्या यह बीजेपी के लिए चुनौती नहीं है? इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री मीडिया को टारगेट करके कहती हैं- ‘उत्सुकता मीडिया के कई लोगों में है। मैं गोदी मीडिया शब्द का इस्तेमाल नहीं करती।’

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी देश का नैरेटिव बहुत तेज़ी से बदल रहा है। वहीं मानसून सत्र से ठीक पहले 4 अगस्त को भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजरात की निचली अदालत द्वारा राहुल गाँधी की दो साल की सज़ा पर रोक लगाने और उनकी संसद सदस्यता बहाल होने से सरकार को ज़ोर का झटका लगा। इसे मोदी की नैतिक हार के तौर पर देखा गया। इधर, 18 जुलाई को इंडिया गठबंधन बनाकर तमाम विपक्षी दलों के एक साथ आने से भाजपा विरोध की कमज़ोर आवाज़ को नयी ताक़त मिली है। प्रधानमंत्री इंडिया गठबंधन को ‘घमंडिया गठबंधन’ कहते हैं। सांप्रदायिकता के मुद्दे पर भी जनता ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। 30 जुलाई को उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में बिना अनुमति नये रास्ते से मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से कांवड़ का जत्था डीजे के साथ निकालने की ज़िद पर हंगामा करने वाले कांवडिय़ों को एसएसपी प्रभाकर चौधरी ने शान्ति व्यवस्था नहीं बिगाडऩे दी, तो उनका सरकार ने तीन घंटे में ही तबादला कर दिया। यानी एसएसपी ने वो नहीं होने दिया, जो सरकार चाहती थी।

नूंह और गुडग़ाँव में इसी उपद्रव के चलते साम्प्रदायिक हिंसा भडक़ी। भाजपा सरकारों की मानसिकता देखिए, हिसार निवासी बिल्डर और भाजपाई रविंदर फोगाट समेत तीन लोगों की जान बचाने वाले अनीश का नूह स्थित घर सरकार ने बुलडोजर से तोड़ दिया। जबकि ख़ुद रविंदर फोगाट ने पुलिस से कहा कि अनीश हिंसा में शामिल नहीं था। हालाँकि हरियाणा के लोग समझ रहे हैं कि चुनाव आ रहे हैं, तो उन्हें कौन इस्तेमाल करना चाहते हैं? हरियाणा ही क्यों? पूरा देश समझ रहा है। देश के मूड को सरकार भी समझ रही है। लेकिन ख़ुद की नीतियाँ बदलने को राज़ी नहीं दिखती।

यगी और अखिलेश में छिड़ा घमासान

ऐसा माना जाता है कि जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझ लिया, वह कहीं पर मात नहीं खाता। यह वो प्रदेश है, जिसने कई बड़े नेता देश को दिये हैं। माना जाता है कि जिस किसी को केंद्र का सिंहासन चाहिए, उत्तर प्रदेश को जीतना उसकी पहली प्राथमिकता होती है। यह भी देखा गया है कि जिसे भी उत्तर प्रदेश का सिंहासन मिला, वह केंद्र के सिंहासन की ओर एक विश्वास के साथ देखने लगता है कि उसे कभी-न-कभी केंद्र का सिंहासन मिलेगा-ही-मिलेगा।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उत्तर प्रदेश के सिंहासन पर बैठने के बाद से यह सपना देख रहे हैं। मगर उत्तर प्रदेश के सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी अभी हार नहीं मानी है। वह भी अपने पिता मुलायम सिंह यादव की तरह केंद्र के सिंहासन के सपने अवश्य देखते होंगे। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह इस बार लोकसभा चुनाव में पूरी सामथ्र्य झोंकने वाले हैं। अखिलेश यादव की इस तैयारी से भारतीय जनता पार्टी के धुरंधर अभी से सचेत हैं। लोकसभा की सभी 80 सीटों पर जीत का सपना देख रहे भारतीय जनता पार्टी के धुरंधर एक भी सीट गँवाने को तैयार नहीं हैं। इसके लिए केंद्र के बड़े भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं स्वयं योगी आदित्यनाथ अभी से तैयारियों में लगे हैं। केंद्र के निर्देशों पर उत्तर प्रदेश में रणनीति तैयार की जा रही है।

तय है कि उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटें जीतने का सबसे अधिक दबाव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ही होगा। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस विश्वास के साथ चुनावी तैयारियों में लगे हैं कि वह इस बार उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को धूल चटा देंगे। इसके चलते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं पूर्व मुख्यमंत्री समाजवादी प्रमुख अखिलेश यादव में दिनोंदिन राजनीतिक टकराव बढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच टकराव वैसे तो पुराना है; मगर जैसे-जैसे चुनाव निकट आ रहे हैं, वैसे-वैसे छींटाकशी एवं आरोप प्रत्यारोप की राजनीति तीव्र होती जा रही है।

योगी को क्या नहीं आता रास?

उत्तर प्रदेश में सरकार किसी की रही हो अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग सका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राम राज्य की कल्पना एवं दावों के उपरांत भी उत्तर प्रदेश अपराध मुक्त नहीं हो सका है। उत्तर प्रदेश में कई ऐसे बड़े अपराध मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में ही हुए हैं, जिन्हें याद करके आत्मा तक काँप जाती है। अपराध अथवा किसी को पीड़ा होने की कोई घटना हो, विपक्षी पार्टियों ने उसे राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनाने का प्रयास किया है। अखिलेश भी इसमें पीछे नहीं रहे हैं।

हाल ही में बुलंदशहर की आवास विकास कॉलोनी में नगर पालिका द्वारा अतिक्रमण की कार्रवाई में रोहताश लोधी की मौत को भी अखिलेश यादव ने मुद्दा बनाया। उन्होंने पीडि़त परिवार से भेंट की एवं पीडि़त परिवार के साथ हुई घटना को अन्याय बताते हुए इस प्रकरण की निष्पक्ष जाँच की माँग की। अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ सरकार से ज़िलाधिकारी एवं एसएसपी पर हत्या की धारा-302 के तहत एफआईआर दर्ज कर उन्हें जेल भेजने की माँग भी की। कहा जा रहा है कि कोतवाली देहात में आरोपी ठेकेदार समेत चार लोगों पर ग़ैर-इरादतन हत्या का मुक़दमा दर्ज कराने के उपरांत भी पुलिस ने आरोपियों को गिर$फ्तार नहीं किया।

इससे दु:खी पीडि़त परिवार समाजवादी प्रमुख अखिलेश यादव से मिला जहाँ उनको न्याय दिलाने का आश्वासन तो मिला ही, एक लाख रुपये की मदद भी की गयी। सरकार की बुलडोजर कार्रवाई को लेकर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को घेरा है। समाजवादी पार्टी प्रमुख की ऐसी गतिविधियाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को रास नहीं आती हैं। लखीमपुर खीरी एवं हाथरस जैसी घटनाओं में विपक्षी पार्टियों के नेताओं को जाने से रोकने के योगी आदित्यनाथ सरकार के प्रयास तो यही बताते हैं।

विधानसभा में तकरार

किसी भी विधानसभा में सरकार एवं विपक्ष के बीच मुद्दों को लेकर तकरार होना आम बात है; मगर उत्तर प्रदेश की विधानसभा में इस तकरार के दृश्य ही अलग होते हैं। यहाँ पर तू-तड़ाक से लेकर बाप तक जाने से कोई नहीं चूकता। पिछले दिनों जब प्रदेश के उप मुख्यमंत्री विकास की बात कर रहे थे; तब अखिलेश यादव ने कहा था कि तुम अपने पिताजी के पैसे से काम करा रहे हो। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अभद्रता में पीछे नहीं रहते उन्होंने कितनी ही बार घटिया भाषा का प्रयोग विधानसभा में किया है। बीते दिनों बेरोज़गारी के मुद्दे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं विपक्ष के नेता अखिलेश यादव के बीच तीखी बहस हुई।

तकरार इतनी बढ़ी कि दोनों ने एक-दूसरे पर विकट आरोप लगाये। बात यह थी कि प्रश्नकाल के समय समाजवादी पार्टी के एक सदस्य संग्राम यादव ने पूछा कि क्या सरकार प्रदेश में बढ़ती बेरोज़गारी के मद्देनज़र रोज़गारपरक शिक्षा को इंटर कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करेगी? इस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हमारे माननीय सदस्य अगर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का अध्ययन करके आये होते, तो यह प्रश्न नहीं पूछते। उन्होंने ने नक़ल एवं रोज़गार देने को लेकर अपनी पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार पर ताने कसे। इसके उपरांत विपक्ष के नेता अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी से बेरोज़गारी को लेकर प्रश्न कर दिये। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की डबल इंजन की सरकार क्या कर रही है? सरकार बेरोज़गारी दर के बारे में तो बता रही है; मगर रोज़गार दर के विषय में नहीं बता रही है। अखिलेश यादव ने महँगाई को लेकर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि साढ़े छ: साल में एक भी नयी मंडी नहीं बनी। आज किसानों को फ़सलों के सही दाम नहीं मिल रहे हैं। किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही गयी थी; मगर हुआ कुछ नहीं। सरकार ने मक्का नहीं $खरीदी।

अखिलेश यादव ने आलू एवं अंडे से लेकर डेयरी क्षेत्र पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि मेरठ के लोग जानते हैं 236 करोड़ रुपये दिये गये थे। क्या डेरी प्लांट आज चल रहे हैं? अब सुनने में आ रहा है कि डेयरी प्लांट को प्राइवेट कम्पनियों को देने की तैयारी की जा रही है। आलू कोल्ड स्टोर से नहीं निकलेगा, तो उसके भाव कहाँ जाएँगे? इस तरह आप कैसे किसानों की मदद करेंगे? अखिलेश यादव ने विधानसभा में किसानों पर गुलदार एवं चीते के हमलों का मुद्दा उठाया। अखिलेश ने कहा कि गुलदारों एवं चीतों ने कम-से-कम 40 लोगों की जान ली। अभी तो मैं सांड की बात नहीं कर रहा। अगर किसान डर के कारण खेत में नहीं जा पा रहे हैं तो सरकार कर क्या रही है? सम्बन्धित विभाग कर क्या रहा है?

अखिलेश यादव ने कहा कि समाजवादी सरकार में जंगली जानवरों के हमले में मारे गये लोगों के परिवार को 10 से 15 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाता था। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई जनपद नहीं बचा है, जहाँ पर सांड ने किसी की जान न ली हो। इसके उपरांत अखिलेश यादव ने युवाओं को नौकरियाँ देने की सरकार से विनती करते हुए किसानों की आत्महत्या का मुद्दा उठाते हुए पूछा कि आप पीडि़त परिवारों की आर्थिक मदद क्यों नहीं करते? अखिलेश यादव ने कहा कि आप हमें सपना दिखा रहे हैं कि हम बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं; मगर एक ओर आपने बासमती चावल पर प्रतिबंध लगा दिया है।

शिवपाल का सुझाव

उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव के बीच भी जमकर तकरार हुई। मगर इस तकरार पर सदन में ठहाके लगते रहे। हँसी-ठिठोली के बीच सदन में समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख ओम प्रकाश राजभर को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने का सुझाव दे डाला। शिवपाल यादव ने कहा कि माननीय मुख्यमंत्री जी! कृपया जल्दी से राजभर जी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दीजिए; नहीं तो वह फिर से हमारे पक्ष में आ जाएँगे। इस पर विधानसभा में उपस्थित सभी नेता ठहाके लगाकर हँस पड़े।

शिवपाल यादव की इस टिप्पणी पर योगी आदित्यनाथ भी हँसी नहीं रोक सके। मुख्यमंत्री भी पीछे कहाँ रहने वाले थे। उन्होंने भी तड़ाक से कहा कि अगर आपने सत्ता में रहते हुए अपने भतीजे (अखिलेश यादव) को कुछ सिखाया होता, तो किसानों को बड़ा फ़ायदा होता। मगर भतीजा आपकी बात सुनने को तैयार ही नहीं है। इस पर शिवपाल ने कहा कि हमने तो भतीजे को $खूब पढ़ाया, तभी तो इंजीनियर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये। इस पर अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री को भी कुछ शिक्षा देनी चाहिए। कृपया उससे ट्यूशन ले लें। शिवपाल यादव एवं अखिलेश यादव के शिक्षा पर तंज से योगी आदित्यनाथ का चेहरा उतरा हुआ दिखायी दिया। चेहरा उतरने के पीछे के कारण को सभी जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ उतने शिक्षित नहीं हैं, तो उन्हें इन टिप्पणियों पर कितनी खीझ हुई होगी। सम्भवत: इसी खीझ के चलते योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में भाषण में यहाँ तक कह दिया कि छ: बार के विधायक चाचा के लिए अगली बार सदन में लौटना मुश्किल होगा। 2012 से 2017 के बीच राज्य की जनता चाचा-भतीजे की शत्रुता का शिकार हुई; क्योंकि भतीजे को डर था कि चाचा हावी हो जाएँगे, इसलिए उन्होंने चाचा की वित्तीय सहायता रोक दी।

मायावती से दूरी

लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटें जीतने का सपना पाले बैठी भारतीय जनता पार्टी को अखिलेश यादव हराने की रणनीति बना रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए विपक्ष की तमाम पार्टियाँ एकजुट हो रही हैं, जिसमें विपक्षी गठबंधन इंडिया प्रमुख है। भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए इंडिया गठबंधन के लिए उत्तर प्रदेश में सबसे ठोस कड़ी समाजवादी पार्टी है। विपक्षी गठबंधन इंडिया में समाजवादी पार्टी है; मगर पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी नहीं है।

मायावती पर कयास लगने लगे हैं कि वह पिछले द्वार से भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ी हैं; मगर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की घोर प्रतिद्वंद्वी पार्टी है। विपक्षी गठबंधन इंडिया के साथ भी है एवं जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल से भी गठबंधन में है। लोकसभा चुनाव को लेकर अखिलेश यादव ने स्पष्ट कहा है कि समाजवादी पार्टी दोबारा कभी मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। विपक्षी गठबंधन में सीटों को बँटवारे को लेकर अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी प्राथमिकता भारतीय जनता पार्टी को हराना है। इसके लिए नेतृत्व कौन करेगा? यह बाद में तय हो जाएगा।