बदल रहा देश का राजनीतिक नैरेटिव

हमेशा आक्रामक रहने वाली भाजपा और केंद्र सरकार अब बचाव की मुद्रा में हैं

सुशील मानव

क्या देश का राजनीतिक नैरेटिव बदल रहा है? पिछले डेढ़ महीने के तमाम घटनाक्रम और सरकार की प्रतिक्रिया पर नज़र डालें, तो बहुत-सी चीज़ें बदलती और हिलती हुई दिखती हैं। बीते 10-12 वर्षों में देश का नैरेटिव भाजपा-आरएसएस ने सेट किया है। पर आज अचानक लगता है कि देश का राजनीतिक नैरेटिव सत्ताधारी दल से छूट रहा है। नेताओं की शिक्षा, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, बेरोज़गारी, महँगाई आदि तमाम मुद्दों पर देश का नैरेटिव बदल रहा है। आलम यह है कि मेनस्ट्रीम मीडिया इसे 10 वर्षों की एंटी-इनकम्बेंसी बताने लगा है। सत्ता का जहाज़ डूबने की आशंका के साथ ही मीडिया के सुर भी बदलने लगे हैं।

हमेशा आक्रामक रहने वाली भाजपा और सरकार अब बचाव की मुद्रा में है। आक्रामकता की कोशिश के बावजूद भाषा और हाव-भाव उनका साथ नहीं दे रहे हैं। एडटेक प्लेटफॉर्म ‘अनएकेडमी’ के शिक्षक करण सांगवान मामला इसकी पुष्टि करता है। नैरेटिव अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें क़ानूनों में बदलाव करना पड़ रहा है। भारतीय दंड संहिता के कई क़ानूनों में भारी फेरबदल के बाद प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे बच्चों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। उन्हें सारे नोट्स दोबारा से बनाने पड़ रहे हैं। इसी को लेकर शिक्षक करण सांगवान का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ, जिसमें वह छात्रों से अपनी एक सामान्य राय साझा करते हुए कहते हैं- ‘मुझे भी ऐसा ही लगा था कि रोऊँ या हँसूँ; क्योंकि मेरे पास भी बहुत-से पैरेंट्स हैं। बहुत सारे नोट्स हमने भी बनाये थे। हर किसी के लिए बहुत मेहनत है। आपको भी काम मिल गया। लेकिन एक चीज़ याद रखना, अगली बार जब भी अपना वोट दो, तो किसी पढ़े-लिखे इंसान को अपना वोट देना।…’

इस पर करण सांगवान को नौकरी से निकालते हुए अनएकेडमी के सह-संस्थापक रोमन सैनी ने ट्वीटर पर लिखा- ‘हम एक शैक्षिक प्लेटफॉर्म हैं; जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसा करने के लिए हमने सभी शिक्षकों के लिए सख़्त आचार संहिता लागू की है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हमारे शिक्षार्थियों को निष्पक्ष ज्ञान तक पहुँच प्राप्त हो। हम जो कुछ भी करते हैं उसके केंद्र में हमारे शिक्षार्थी होते हैं। क्लासरूम व्यक्तिगत राय और विचार साझा करने की जगह नहीं है; क्योंकि वे उनको ग़लत तरीक़े से प्रभावित कर सकते हैं। वर्तमान स्थिति में हमें करण सांगवान से अलग होने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है; क्योंकि वह आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं।’

करण सांगवान अपनी टिप्पणी और बर्ख़ास्त होने के सवाल पर जवाब दिया कि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। किसी पार्टी का ज़िक्र नहीं किया। हो सकता है उन्होंने किसी राजनीतिक दबाव के कारण मुझे नौकरी से निकाल दिया हो। अनएकेडमी के कोड ऑफ कंडक्ट में लिखा हुआ है कि आप कोई भी राजनीतिक टिप्पणी नहीं करेंगे। लेकिन उन्होंने राजनीतिक टिप्पणी को भी स्पेसिफाइड नहीं किया है। आप किस बयान को कहेंगे कि यह बयान राजनीतिक प्रकृति का है?

दरअसल, सांगवान का वीडियो वायरल होते ही भाजपा की ट्रोल आर्मी ने अनएकेडमी को ट्रोल करना शुरू कर दिया था। शायद किसी ख़तरे की आशंका से अनएकेडमी ने करण सांगवान को नौकरी से निकाल दिया। लेकिन उनका नौकरी से निकाला जाना बैकफॉयर कर गया। विपक्ष और अन्य लोगों ने मुद्दे को उठा लिया और दलील दी जाने लगी कि करण संगवान ने तो किसी का नाम नहीं लिया था फिर ‘अनपढ़ नेता’ को भाजपा ने प्रधानमंत्री से क्यों जोड़ लिया? कार्टून और मीम्स की बाढ़ आ गयी। मीडिया में अनपढ़ नेता चर्चा का विषय बन गया। भाजपा प्रवक्ताओं को इसका जवाब देते नहीं बना। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इसे चोर की दाढ़ी में तिनका बताया। इस बीच प्रधानमंत्री के वो तमाम वीडियो सोशल मीडिया में तैरने लगे, जिनमें वह अंग्रेजी शब्दों का उच्चारण करते हुए अटके हैं। जिनमें वह ग़लत बोले हैं या फिर जिनमें उन्होंने तर्क और विज्ञान की धजिज्याँ उड़ायी हैं; जैसे कि नाले की गैस से चाय बनाना, ट्रैक्टर के ट्यूब में गैस भरकर खेत ले जाकर पम्प सेट चलाने वाला वीडियो, बालाकोट एयर स्ट्राइक के समय बादलों में रडार के लड़ाकू विमानों को न पकड़ पाने जैसी बातें, आदि।

ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री और भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की शिक्षा और उनकी डिग्री सर्टिफिकेट और उसकी प्रिंटिंग त्रुटियाँ पहले भी लगातार चर्चा के केंद्र में रही हैं।

करण सांगवान का मुद्दा ख़त्म भी नहीं हुआ था कि आईसीएस कोचिंग की बबिता मैम का एक पुराना वीडियो वायरल हो गया। वह भी क्लास में बच्चों से कह रही हैं कि जब तुम वोट डालने जाओ, तो यह सोचा करो कि तुम्हारे पाँच साल की जितनी नौकरियाँ निकलेंगी, जिस हिसाब से भर्ती होंगी, स्कूल का स्टैंडर्ड है। कॉलेज का; वो सब हमने इनके हाथ में दे दिया। क्योंकि यही नौकरी निकालने वाले हैं। यही रोज़गार देने वाले हैं। यही स्कूलों के स्तर पर कमांड कसने वाले हैं। इसलिए बेटा पढ़े-लिखे लोगों को राजनीति में आने की बहुत ज़रूरत है इंडिया में।’

इससे पहले नेताओं की शिक्षा को लेकर अभिनेत्री काजोल का बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। बयान के बाद वह भी भाजपा आईटी सेल और दक्षिणपंथी समूहों के ट्रोलर्स के निशाने पर आ गयी थीं। अब मणिपुर में दो कुकी स्त्रियों के साथ बर्बरता और यौन हिंसा का वीडियो 19 जुलाई को वायरल होने के बाद महिला सुरक्षा के मुद्दे पर पूरे देश में केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठने लगी है। लोगों में एक स्पष्ट संदेश गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा वीडियो पर स्वत:संज्ञान लेने के बाद ही मणिपुर मसले पर प्रधानमंत्री ने 80 दिनों की चुप्पी तोड़ी। सबसे बड़ी बात मीडिया का मिज़ाज बदल गया है। जो एंकर कल तक रीढ़विहीन नज़र आते थे, वे सरकार से सवाल पूछने लगे हैं।

10 साल से विपक्ष पर चीख़ते चले आ रहे अर्णव गोस्वामी पहली बार मणिपुर की घटना पर भाजपा और केंद्र सरकार पर चीख़ते सवाल उठाते नज़र आये। उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह चीख़कर कह रहे हैं- ‘कोई भी देश में सवालों से परे नहीं होना चाहिए। सरकार को मणिपुर पर बहानेबाज़ी बन्द करनी चाहिए। केंद्र सरकार से जब मणिपुर पर सवाल पूछे जाते हैं, तो राजनीतिक स्कोर सेटल करने के लिए और बैलेंस करने के लिए बताया जाता है कि राजस्थान में क्या हो रहा है? यह बिलकुल ग़लत है और ग़लत को ग़लत कहना चाहिए। हक़ीक़त यह है कि सरकार ग़लतियों पर ग़लतियाँ कर रही है। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को अब तक बर्ख़ास्त न करना बहुत बड़ी ग़लती है। मुझे ये सच बोलना पड़ेगा कि अगर मणिपुर में किसी विपक्षी दल की सरकार होती, तो अब तक केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लगा देती। ध्यान भटकाने का काम नहीं चलेगा, हमें समाधान चाहिए। केंद्र सरकार और मणिपुर की राज्य सरकार ने ग़लतियों की पूरी सीरीज बना दी है और इसे रोकना होगा।

इधर, ख़ुदरा महँगाई दर 15 महीने के उच्चतम पर है। महँगाई पर सरकार के पास यूक्रेन युद्ध के अलावा और कोई बहाना नहीं है। अब महँगाई के मुद्दे पर सवाल इस सरकार से पूछना पत्रकारों के लिए आफ़त को न्यौतना है। 19 अगस्त को एक न्यूज चैनल के जी-20 शिखर सम्मेलन में एक लाइव शो के दौरान एंकर सुधीर चौधरी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से पूछा- ‘जब टमाटर 250-300 रुपये हुआ, तो क्या आपके भी घर में बात होती थी टमाटर के बारे में? कि थोड़े दिन कम कर दिया जाए।’ इस सवाल पर केंद्रीय मंत्री बौखलाकर बोलीं- ‘मैं सुधीर जी से पूछ सकती हूँ कि सुधीर जी क्या हुआ, जब आप जेल में थे?’

इसके बाद केंद्रीय मंत्री एंकर नविका कुमार से भिड़ गयीं। दरअसल नविका कुमार ने पूछा कि अगर ‘इंडिया’ एलायंस की सारी पार्टियाँ मिलकर बीजेपी या एनडीए के ख़िलाफ़ एक सिंगल कैंडिडेट खड़ा करें और विपक्ष के वोटों का बिखराव न हो, तो क्या यह बीजेपी के लिए चुनौती नहीं है? इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री मीडिया को टारगेट करके कहती हैं- ‘उत्सुकता मीडिया के कई लोगों में है। मैं गोदी मीडिया शब्द का इस्तेमाल नहीं करती।’

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी देश का नैरेटिव बहुत तेज़ी से बदल रहा है। वहीं मानसून सत्र से ठीक पहले 4 अगस्त को भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजरात की निचली अदालत द्वारा राहुल गाँधी की दो साल की सज़ा पर रोक लगाने और उनकी संसद सदस्यता बहाल होने से सरकार को ज़ोर का झटका लगा। इसे मोदी की नैतिक हार के तौर पर देखा गया। इधर, 18 जुलाई को इंडिया गठबंधन बनाकर तमाम विपक्षी दलों के एक साथ आने से भाजपा विरोध की कमज़ोर आवाज़ को नयी ताक़त मिली है। प्रधानमंत्री इंडिया गठबंधन को ‘घमंडिया गठबंधन’ कहते हैं। सांप्रदायिकता के मुद्दे पर भी जनता ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। 30 जुलाई को उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में बिना अनुमति नये रास्ते से मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से कांवड़ का जत्था डीजे के साथ निकालने की ज़िद पर हंगामा करने वाले कांवडिय़ों को एसएसपी प्रभाकर चौधरी ने शान्ति व्यवस्था नहीं बिगाडऩे दी, तो उनका सरकार ने तीन घंटे में ही तबादला कर दिया। यानी एसएसपी ने वो नहीं होने दिया, जो सरकार चाहती थी।

नूंह और गुडग़ाँव में इसी उपद्रव के चलते साम्प्रदायिक हिंसा भडक़ी। भाजपा सरकारों की मानसिकता देखिए, हिसार निवासी बिल्डर और भाजपाई रविंदर फोगाट समेत तीन लोगों की जान बचाने वाले अनीश का नूह स्थित घर सरकार ने बुलडोजर से तोड़ दिया। जबकि ख़ुद रविंदर फोगाट ने पुलिस से कहा कि अनीश हिंसा में शामिल नहीं था। हालाँकि हरियाणा के लोग समझ रहे हैं कि चुनाव आ रहे हैं, तो उन्हें कौन इस्तेमाल करना चाहते हैं? हरियाणा ही क्यों? पूरा देश समझ रहा है। देश के मूड को सरकार भी समझ रही है। लेकिन ख़ुद की नीतियाँ बदलने को राज़ी नहीं दिखती।