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विवेक कटोच को आईडीएसए अध्यक्ष पद की कमान, हरीश पंत-उपाध्यक्ष

नई दिल्ली, 21 सितम्बर,  डायरेक्ट सैलिंग कम्पनी ओरिफ्लेम इंडिया के कार्पोरेट मामलों के निदेशक(एशिया) विवेक कटोच को भारत में डायरेक्ट सेलिंग उद्योग की शीर्ष संस्था इंडियन डायरेक्ट सैलिंग एसोसिएशन (आईडीएसए) का नया अध्यक्ष चुना गया है।

कटोच दूसरी बार इस प्रतिष्ठित पद के लिये चुने गये हैं। वह वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ डायरेक्ट सैलिंग एसोसिएशन्स (डब्ल्यूएफडीएसए) में भी बतौर सदस्य भारतीय डायरेक्ट सेलिंग उद्योग का प्रतिनिधित्च करते हैं।

आईडीएसए की नई कार्यकारिणी का चुनाव वीरवार को यहां हुई 27वीं वार्षिक आम बैठक में हुआ जिसमें हर्बलाइफ इंटरनेशनल के निदेशक एवं सरकारी सम्पर्क प्रमुख हरीश पंत को उपाध्यक्ष, मोदीकेयर लिमिटेड में ग्रोथ प्रमुख अपराजिता सरकार को सचिव और एमवे इंडिया के कार्पोरेट मामलों के उपाध्यक्ष रजत बनर्जी को कोषाध्यक्ष पद के लिये चुना गया है। पंत, उपाध्यक्ष पद के लिये चुने जाने से पूर्व आईडीएसए के कोषाध्यक्ष पद पर थे। आईडीएसए की नई कार्यकारिणी का कार्यकाल दो वर्ष का होगा।

आईडीएसए के अध्यक्ष पद का कार्यभार सम्भालने के अवसर पर कटोच ने कहा “ देश में डायरेक्ट सैलिंग कारोबार सतत गति से आगे बढ़ रहा है। यह उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में अपना अहम योगदान करने के साथ लगभग 90 लाख लोगों को पूर्णकालिक अथवा अंशकालिक तौर पर आजीविका प्रदान करने, चैकल्पिक आय के संसाधन का माध्यम भी साबित हुआ है। अब यह उद्योग देश के ग्रामीण हिस्सों में भी प्रसार कर रहा है और हम इसे देश के कोने कोने तक ले जाने के लिये प्रतिबद्ध हैं।“

उन्होंने कहा “उपभोक्ता संरक्षण हमारे लिए सर्वोपरि है। डायरेक्ट सैलिंग को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-2019 के दायरे में लाने तथा इसके उपरांत इस उद्योग के लिये उपभोक्ता संरक्षण

‘मेरे जीवनसाथी राजीव गांधी का यह बिल सपना था, मेरी जिंदगी का यह बहुत मार्मिक क्षण है’– सोनिया गांधी

संसद के विशेष सत्र का आज (बुधवार) तीसरा दिन है। महिला आरक्षण विधेयक सदन में चर्चा चल रही है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण  ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ का समर्थन करते हुए इसके अंतर्गत एससी/एसटी/ओबीसी के लिए कोटे की मांग की है। साथ ही इसे तुरंत लागू करने की भी मांग की है।  

सोनिया गांधी ने नारी शक्ति बिल का समर्थन करते हुए लोकसभा में कहा कि, “नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के समर्थन में मैं खड़ी हुई हूं। यह बिल मेरे साथी राजीव गांधी का सपना है। भारत के निर्माण के हर मोर्चे पर स्त्री पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी है। नारी ने असीम धीरज के साथ खुद को हारते हुए लेकिन आखिरी बाजी में खुद को जीतते हुए देखा है। स्त्री के हृदय में महासागर जैसा धीरज है उसने खुद के साथ हुई बैईमानी की शिकायत नहीं की और सिर्फ अपने फायदे के बारे में कभी नहीं सोचा। नदियों की तरह सभी की भलाई के लिए काम किया है। और मुश्किल समय में हिमालय की तरह अडिग रही है। आजादी की लड़ाई और नए भारत के निर्माण के हर मोर्चे पर स्त्री पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ी है। सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, अरुणा असफली, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर और उनके साथ लाखों महिलाएं आज की तारीख तक स्त्री ने कठिन समय में महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, बाबा साहब अम्बेडकर और मौलाना आजाद के सपनों को जमीन पर उतार कर दिखाया है।”

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को याद करते हुए आगे कहा कि, “इंदिरा गांधी जी का व्यक्तित्व इस सिलसिले में बहुत ही रौशन और जिंदा मिसाल है। खुद मेरी जिंदगी का यह बहुत मार्मिक क्षण है। पहली दफा स्थानीय निकायों में स्त्री की भागीदारी तय करने वाला संविधान संशोधन मेरे जीवन साथी राजीव गांधी जी ही लाए थे। लेकिन वह राज्यसभा में 7 वोटों से गिर गया था। बाद में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव जी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने ही उसे पारित कराया। आज उसी का नतीजा है कि देश भर के स्थानीय निकायों के जरिये हमारे पास 15 लाख चुनी हुर्इ महिला नेता है। राजीव गांधी जी का सपना अभी तक आधा ही पूरा हुआ है। इस बिल के पारित होने के साथ ही वह पूरा होगा।”

कांग्रेस पार्टी इस बिल का समर्थन करते हुए सोनिया गांधी ने आगे कहा कि, “ हमें इस बिल के पास होने से खुशी है लेकिन एक चिंता भी है। पिछले 13 वर्षों से भारतीय महिला अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का इंतजार कर रही है लेकिन अब भी उन्हें कुछ और वर्ष इंतजार करने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन यह कितने वर्ष करना होगा? दो वर्ष, चार वर्ष, आठ वर्ष क्या? क्या भारत की स्त्रियों के साथ यह बर्ताव उचित है? कांग्रेस की यह मांग है कि यह बिल फौरन अमल में लाया जाए। लेकिन इसके साथ ही जाति सेंसस करा कर एससी/एसटी/ओबीसी की महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था की जाए। सरकार को इसे साकार करने के लिए भी जो भी कदम उठाने की जरूरत है वह उठाने ही चाहिए। स्त्रियों के योगदान को स्वीकार करने और उसके प्रति आभार व्यक्त करने का यह सबसे उचित समय है। इस बिल को लागू करने में और देरी करना भारत की स्त्रियों के साथ घोर नाइंसाफी है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तरफ से मैं आपके द्वारा सरकार ने मांग करती हूं कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को उसके रास्ते की सारी रुकावटों को दूर करते हुए जल्द से जल्द लागू किया जाए।”

प्रेम प्रसंग के दौरान बनाया शारीरिक संबंध बलात्कार नहीं माना जा सकता – इलाहाबाद हाईकोर्ट

बलात्कार के एक मामले पर टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रेस प्रसंग के दौरान बने शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता है भले ही शादी से इनकार किसी भी वजह से किया गया हो।

बता दें कोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी के खिलाफ चल रहे मामले को रद्द कर दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की सिंगल बेंच ने सुनाया है।

आपको बता दें, उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले का यह मामला है जिसमें एक लड़की ने अपने प्रेमी के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था। जिसमें उसने बताया की दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने लेकिन बाद में लड़के ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया।

मामला कोर्ट पहुंचा तो लड़के के वकील ने कहा कि जब दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने उस समय लड़की बालिग थी और यह दोनों की सहमति से हुआ था। कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद पुलिस की चार्जशीट को खारिज कर दिया है।

नई संसद भवन में प्रवेश के साथ ही आज पेश हो सकता है महिला आरक्षण बिल!

संसद के विशेष सत्र में मंगलवार को नए संसद में प्रवेश के साथ ही महिला आरक्षण बिल को भी पेश किया जा सकता है। हालांकि इसे लेकर अभी कोई भी आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है।

सूत्रों के अनुसार सोमवार की शाम हुई कैबिनेट की बैठक ने इस विधेयक पर मुहर लगा दी है। वहीं महिला आरक्षण का श्रेय कांग्रेस लेती हुई नजर आ रही है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसपर कहा कि, “यह बिल अपना है।”

बता दें, महिला आरक्षण बिल संसद में केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की ओर से पेश किया जाएगा। और इस पर बहस के बाद यह पारित किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार यह बिल 21 तारीख को राज्यसभा में पेश किया जाएगा।

महिला आरक्षण बिल करीब 27 सालों से लंबित था और कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने साल 2010 में इसे राज्यसभा में पास करा लिया था। और अब भी कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इसका समर्थन कर रहे है।

इस बिल के तहत महिलाओं को लोकसभा और राज्यसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। साथ ही संभावनाएं यह भी है कि मोदी सरकार इसके दायरे में राज्यसभा और विधान परिषदों को भी ला सकती है।   

भारत ने निकाला कनाडा के राजनयिक को, राजदूत से भी मांगा जवाब

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कनाडा के राजदूत को तलब किया साथ ही सीनियर डिप्लोमैट को अगले पांच दिनों के अंदर देश छोड़ने का आदेश दे दिया है।

कनाडा में पिछले दिनों खालिस्तानी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या कर दी गई थी और कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने इस हत्या का संबंध भारत से बताया था। इसके बाद से ही भारत और कनाडा के बीच तनाव की स्थिति चल रही है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कनाडा के बयानों को खारिज करते हुए सख्त आपत्ति जताई है और कहा कि, “ऐसे आरोप बेहूदा और मनगढ़ंत है।”

कनाडा के पीएम जस्टिस ट्रूडो ने देश की संसद में कहा कि, हम इस मामले को लेकर चिंतित है। हरदीप सिंह की हत्या में भारतीय एजेंसियों का हाथ था। कनाडा की धरती पर ही हमारे नागरिक की हत्या किया जाना स्वीकार्य नहीं है और यह हमारी संप्रभुता के खिलाफ है।

बता दें ऐसा माना जा रहा है कि भारत कनाडा के किसी राजनयिक को जवाबी ऐक्शन के तहत बाहर का रास्ता दिखा सकता है

आपको बता दें, हाल ही में भारत में हुए जी 20 सम्मेलन में शामिल होने कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो दिल्ली आए थे। और उस दौरान पीएम मोदी और ट्रूडो के बीच हुई बातचीत में दो टूक कहा गया था कि आपको खालिस्तानी तत्वों पर लगाम कसनी होगी। साथ ही भारतीय समुदाय के लोगों पर कनाडा में होने वाले हमलों पर एक्शन लेना होगा।

संसद विशेष सत्र: यह सत्र भारत के सपनों को चरितार्थ करने वाला बनेगा- पीएम मोदी

संसद के विशेष सत्र से पहले सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि यह सत्र भारत के सपनों को चरितार्थ करने वाला बनेगा।

पीएम मोदी ने कहा कि, “पूरे देश में एक प्रकार से उत्सव का माहौल है उत्साह का माहौल, उमंग का माहौल और सारे देश में एक नया आत्मविश्वास हम सब अनुभव कर रहे है। उसी समय इस पार्श्वभूमी में संसद का ये सत्र। ये सही है कि ये सत्र छोटा है लेकिन ये समय के हिसाब से बहुत बड़ा है। ऐतिहासिक निर्णयों का ये बहुत बड़ा है ऐतिहासिक निर्णयों का ये सत्य है।”

उन्होंने आगे कहा कि, “इस सत्र की एक विशेषता ये तो है कि आज 75 साल की यात्रा अब नए मुकाम से आरंभ हो रही है। जिस मुकाम पर 75 साल की यात्रा थी वो अत्यंत प्रेरक फल और आप नए स्थान पर उस यात्रा को आगे बढ़ाते समय नए संकल्प, नई ऊर्जा, नया विश्वास और समय सीमा में 2047 में इस देश को डेवलप कंट्री बना कर के रहना है इसके लिए आगे आने वाले दिनों में वे सभी फैसले इस नई संसद भवन में होने वाले हैं।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि, “नए स्थान पर उस यात्रा को आगे बढ़ाते समय, नए संकल्प, नई ऊर्जा और नए विश्वास से काम करना है। 2047 तक देश को विकसित बनाना है। इसके लिए जितने भी निर्णय होने वाले हैं, वो सभी इस नए संसद भवन में होंगे। मैं सभी आदरणीय सांसदों से आग्रह करता हूं कि छोटा सत्र है। वो यहां उमंग और उत्साह के साथ अपना ज्यादा से ज्यादा समय यहां दें।”

आपको बता दें, केंद्र सरकार ने 18 सितंबर से 22 सितंबर 5 दिनों के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया है। इसका आज पहला दिन है।

ड्रग्स की चपेट में मणिपुर

मणिपुर में अनेक आम लोग और कुछ सरकारी कर्मचारी तक ले रहे ड्रग्स

जातीय हिंसा से तबाह हो रहे मणिपुर के शहर इंफाल के आसपास मादक पदार्थों की महामारी चुपचाप अपना शिकंजा कसती जा रही है। ड्रग्स की चपेट में बड़ी संख्या में मणिपुर के युवा तो हैं ही, बहुत-से अन्य उम्र के लोग, महिलाएँ और कई सरकारी कर्मचारी तक ड्रग्स की लत में जकड़े हुए हैं। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-

इंफाल हवाई अड्डे पर पहुँचने पर स्थानीय टैक्सी ड्राइवरों के साथ पूछताछ पर उन क्षेत्रों का पता चलता है, जहाँ नशीले पदार्थों से सम्बन्धित मुद्दे प्रचलित हैं। जब उनसे (ड्रग्स तस्करों से) सम्पर्क किया जाता है, तो वे उत्तरी एओसी, क्षेत्रीगाओ, लिलोंग और टॉप हेखरू मखोंग जैसे इंफाल के इलाक़ों के बारे में बताते हैं। उनके अनुसार, ये इंफाल शहर के कुछ हॉट स्पॉट हैं; जहाँ ड्रग्स आसानी से उपलब्ध हैं।

एक टैक्सी ड्राइवर ने भी हमारे साथ एक और ख़ुलासा करते हुए कहा कि जब आप उपरोक्त स्थानों में से एक जगह भी पहुँचें और हेरोइन नंबर-4 का अनुरोध करें, जो अफ़ीम से निकाले गये चौथे चरण की दवा के लिए लोकप्रिय शब्द है; तो तस्कर आपकी माँग को अनदेखा करने की कोशिश करेंगे। हालाँकि जिस क्षण आप चार उँगलियों से इशारा करते हैं, वे तुरन्त समझ जाते हैं कि आप एक नियमित ग्राहक हैं और आपको तुरन्त ड्रग्स की आपूर्ति करते हैं। मणिपुर में नशीले पदार्थों की तस्करी से परिचित सूत्रों ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि इन दिनों हेरोइन नंबर-4 इंफाल में सबसे अधिक माँग वाली ड्रग है।

हमारे जाँच निष्कर्षों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इस ड्रग्स का आकर्षण मणिपुर की राजधानी इंफाल के युवाओं पर तो है ही, जो पिछले कुछ महीनों के दौरान जातीय हिंसा से प्रभावित हैं। ‘तहलका’ ने एक परेशान करने वाली वास्तविकता का भी ख़ुलासा किया। दरअसल जिनकी ज़िम्मेदारी नशीले पदार्थों के दुरुपयोग के ख़िलाफ़ जागरूकता फैलाने की है, राज्य सरकार के वही कर्मचारी, जिनमें इंजीनियर, ठेकेदार, क्लर्क और शिक्षक भी हैं; ड्रग्स की लत के शिकार हो रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि लगभग 10-15 सरकारी कर्मचारियों ने इंफाल में एक ड्रग पुनर्वास केंद्र में अपना इलाज कराया। सूत्रों ने कहा कि हमारे पास मणिपुर के अन्य पुनर्वास केंद्रों के सटीक आँकड़े नहीं हैं। मणिपुर में चल रहे संकट ने भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण ग़ैर-पारंपरिक ख़तरों में से एक का ख़ुलासा किया है, जो नार्को-आतंकवाद का रूप ले रहा है। मणिपुर सरकार के ड्रग्स के ख़िलाफ़ युद्ध ने एक भयंकर ड्रग कार्टेल की उपस्थिति और मणिपुर के सामाजिक व राजनीतिक ताने-बाने पर उसके व्यापक प्रभाव को उजागर किया है। न केवल युवा, बल्कि निजी फर्मों में काम करने वाले लोग ड्रग्स ख़रीद रहे हैं। उपयोग कर रहे हैं और बेच रहे हैं, बल्कि शिक्षकों सहित राज्य सरकार के अनेक कर्मचारी भी, जो हमारे देश के भविष्य को आकार देने की ज़िम्मेदारी उठाते हैं; नशीले पदार्थों के उपयोग से अछूते नहीं हैं। मणिपुर में क्या ग़लत हुआ? इसकी तह तक जाने के लिए ‘तहलका’ ने इंफाल के एक ड्रग पुनर्वास केंद्र के चिकित्सा अधिकारी डॉ. स्टालिन ओराम (बदला हुआ नाम) से ख़ास बातचीत की।

डॉ. स्टालिन ओराम (बदला हुआ नाम) ने मणिपुर राज्य सरकार के 10-15 कर्मचारियों के इलाज के अपने अनुभवों को साझा किया, जो लम्बे समय से नशे की लत से जूझ रहे थे। यह एक ही पुनर्वास केंद्र का आँकड़ा है। इसके अलावा एक विशेष साक्षात्कार में विज्ञान में स्नातक राजेश राज (बदला हुआ नाम), जो 2016 से पाँच साल तक नशीले पदार्थों की लत से जूझते रहे; ने ठीक होने की अपनी यात्रा का ख़ुलासा किया। उन्होंने बताया कि कैसे एक एनजीओ और एक पुनर्वास केंद्र की सहायता से उन्होंने सफलतापूर्वक अपनी नशीले पदार्थों की निर्भरता पर क़ाबू पा लिया। आज राजेश राज न केवल एक नशा मुक्त जीवन जी रहे हैं, बल्कि एक एनजीओ के सदस्य के रूप में नशीले पदार्थों की रोकथाम के प्रयासों में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। यह बताते हुए कि उन्होंने अपने केंद्र में कई लोगों का इलाज किया है, डॉ. स्टालिन ने इस तथ्य पर चिन्ता व्यक्त की कि मणिपुर राज्य सरकार के कई कर्मचारी भी ड्रग्स के आदी हैं। मणिपुर के बारे में रिपोर्ट पुनर्वास केंद्र के प्रभारी डॉ. स्टालिन ओराम ने राज्य सरकार के कर्मचारियों के ड्रग्स लेने की पुष्टि की है।

रिपोर्टर : ये ड्रग तस्कर किस पृष्ठभूमि से आते हैं?

डॉ. स्टालिन : यह भिन्न होता है। हमने देखा है कि बेहद ग़रीब मज़दूरों से लेकर बहुत शिक्षित व्यक्तियों तक, जिनमें सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं; सभी क्षेत्रों के लोग ड्रग्स की ओर रुख़ कर रहे हैं।

रिपोर्टर : सरकारी कर्मचारी भी ड्रग्स ले रहे हैं?

डॉ. स्टालिन : हाँ, दुर्भाग्य से। ड्रग्स किसी को भी प्रभावित कर सकते हैं, चाहे वह किसी भी उम्र, लिंग या पृष्ठभूमि के हों। वे भेदभाव नहीं करते।

अब डॉ. स्टालिन ने ख़ुलासा किया कि सरकारी ठेकेदार, इंजीनियर, क्लर्क और यहाँ तक कि शिक्षक ख़तरनाक रूप से बड़ी संख्या में नशीले पदार्थों के सेवन में शामिल हैं।

रिपोर्टर : जिन सरकारी कर्मचारियों का आपने ज़िक्र किया, वे केंद्र सरकार के कर्मचारी थे या राज्य सरकार के?

डॉ. स्टालिन : मुख्य रूप से राज्य सरकार के कार्यालयों के।

रिपोर्टर : आपने अब तक अपने पुनर्वास केंद्र में कितने सरकारी कर्मचारियों का इलाज किया है?

डॉ. स्टालिन : पुनर्वास केंद्र में मेरे कार्यकाल के एक साल में मैंने लगभग 10-15 सरकारी कर्मचारियों का इलाज किया है, जिनमें शिक्षक, इंजीनियर, ठेकेदार और क्लर्क शामिल हैं।

रिपोर्टर : ये कर्मचारी किन पदों पर थे?

डॉ. स्टालिन : जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है, उनमें इंजीनियर, ठेकेदार और शिक्षक शामिल हैं; जिनमें से अधिकांश शिक्षण पेशे से हैं।

डॉ. स्टालिन ने मणिपुर के युवाओं के नशे की चपेट में आने पर चिन्ता व्यक्त की। उनका कहना है कि युवा राज्य और देश दोनों का भविष्य हैं।

रिपोर्टर : क्या मणिपुर में सरकारी कर्मचारियों में नशे की लत एक बड़ा मुद्दा है?

डॉ. स्टालिन : बिलकुल। यह न केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए, बल्कि किसी भी व्यक्ति के लिए एक बड़ी समस्या है। नशे में आप अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते हैं। यह (नशा) ख़ुद (नशा करने वाले) को और पूरे समाज को नुक़सान पहुँचाता है। जहाँ एक तरफ़ सरकारी कर्मचारी नशे के लालच में घुटने टेक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ युवा भी मादक पदार्थों के सेवन का शिकार हो रहे हैं। यह एक बड़ी समस्या है। सर! मेरी चिन्ता का विषय युवा हैं; क्योंकि राज्य और देश का भविष्य उन पर निर्भर करता है।

रिपोर्टर : हमने सुना है कि महिलाएँ भी ड्रग्स ले रही हैं?

डॉ. स्टालिन : वास्तव में। मणिपुर में कुछ केंद्र हैं, जहाँ विशेष रूप से महिलाओं को ड्रग्स की पूर्ति की जाती है। मेरे यहाँ नहीं; लेकिन कुछ अन्य केंद्र हैं।

 जैसे-जैसे बात आगे बढ़ी, डॉ. स्टालिन ने हमें बताया कि मणिपुर में जातीय हिंसा भडक़ने के बाद से ड्रग्स की क़ीमतें बढ़ गयी हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिंसा के कारण म्यांमार से मणिपुर में ड्रग्स आसानी से नहीं पहुँच रही है। इससे पहले इंफाल की सडक़ों पर ड्रग्स आसानी से उपलब्ध थी। हालाँकि हिंसा के बाद ड्रग्स मुश्किल से उपलब्ध है और जो उपलब्ध है, उसकी क़ीमत बहुत है।

रिपोर्टर : मणिपुर में ड्रग्स की वर्तमान स्थिति क्या है?

डॉ. स्टालिन : पिछले चार महीनों में जातीय भेदभाव के कारण राज्य में स्थिति अराजक रही है। नतीजतन नशीले पदार्थों की सीमित उपलब्धता के कारण उनकी लागत बढ़ गयी है। नतीजतन ड्रग्स को मुख्य सीमावर्ती क्षेत्रों, जैसे म्यांमार, मोरेह और चुराचांदपुर से आना पड़ता है, जहाँ पहुँचना मुश्किल हो गया है। हालाँकि ड्रग्स उपलब्ध है। लेकिन वह बहुत महँगी है।

रिपोर्टर : ड्रग्स की वर्तमान और पिछली क़ीमतें क्या हैं?

डॉ. स्टालिन : एक ग्राम ड्रग्स की क़ीमत इस समय लगभग 400 से 600 रुपये है, जो पिछली क़ीमत 150 से 200 रुपये से बहुत अधिक है। इंफाल शहर के कुछ हॉटस्पॉट पर पहले ड्रग्स आसानी से उपलब्ध थे; लेकिन अब ऐसा नहीं है।

डॉ. स्टालिन का मानना है कि मणिपुर सरकार का ड्रग्स के ख़िलाफ़ लड़ाई पर्याप्त नहीं है। सरकार नशे के कारोबार पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है; लेकिन मादक पदार्थ अभी भी म्यांमार से असुरक्षित सीमा के माध्यम से राज्य में आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब कोकीन से ज़्यादा हेरोइन की माँग है।

रिपोर्टर : मणिपुर में नशीले पदार्थों के ख़तरे को नियंत्रित करने के लिए पुलिस क्या कर रही है?

डॉ. स्टालिन : वर्तमान सरकार ने इस ख़तरे को रोकने के लिए ड्रग्स के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी है। लेकिन यह एक कठिन काम है। एक तरफ़ पुलिस ड्रग्स की सप्लाई को कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है; लेकिन दूसरी तरफ़ बॉर्डर से ड्रग्स अभी भी आ रही है। सीमा को सील नहीं किया गया है और जो ड्रग्स आ रही है, वह सबसे अच्छी गुणवत्ता की है। हेरोइन अब सबसे लोकप्रिय ड्रग्स है; कोकीन से भी अधिक लोकप्रिय है। हेरोइन भी कोकीन की तुलना में अधिक महँगी है।

डॉ. स्टालिन के अनुसार, लम्बे समय से मणिपुर की पहाडिय़ों में अफ़ीम की खेती का मुद्दा राज्य के युवाओं के भविष्य को ख़तरे में डाल रहा है। उन्होंने नागरिकों की बेबसी पर प्रकाश डाला, जो इन अवैध (अफ़ीम की) फ़सलों को ख़त्म करने के लिए पहाडिय़ों में नहीं जा सकते हैं। उनके अनुसार, यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह कड़े निवारक क़ानूनों को लागू करके इस समस्या का समाधान करे।

रिपोर्टर : मणिपुर में अवैध अफ़ीम की खेती के मुद्दे पर आपकी क्या राय है?

डॉ. स्टालिन : सर! जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मणिपुर में कई वर्षों से अफ़ीम की खेती जारी है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहाँ न तो आप और न ही मैं व्यक्तिगत रूप से इस खेती को रोकने के लिए पहाडिय़ों में जा सकते हैं। इसलिए यह मौज़ूदा सरकार का कर्तव्य है कि वह किसी भी क़ीमत पर इस खेती को ख़त्म करने के लिए प्रभावी क़ानून बनाए; क्योंकि यह हमारे युवाओं के भविष्य के लिए विकट जोखिम पैदा करता है।

अपने नशा पुनर्वास केंद्र के बारे में बात करते हुए डॉ. स्टालिन ने कहा कि पिछले 20 वर्षों में हमारे केंद्र में 11,000 रोगियों (नशा करने वालों) का इलाज किया गया है। इसमें सफलता की दर 41 प्रतिशत है। हालाँकि कुछ मामलों में रोगी ठीक होने के बाद फिर से ड्रग्स लेने लगते हैं।

रिपोर्टर : डॉ. स्टालिन! क्या आप अपने पुनर्वास केंद्र से निकलने के बाद अपने मरीज़ों पर नज़र रखते हैं कि वे सामान्य जीवन जी रहे हैं या फिर से ड्रग लेने लगे हैं?

डॉ. स्टालिन : हाँ, हम करते हैं। हमारे पास एक नियमित अनुवर्ती प्रणाली है। हम या तो उनके घर जाते हैं या वे हमारे पास आते हैं। हम उनके साथ टेलीफोन पर भी बातचीत करते हैं। पिछले 20 वर्षों में हमने जिन 11,000 रोगियों का इलाज किया है, उनमें से हम पिछले दो वर्षों से मूल्यांकन कर रहे हैं। इन 11,000 लोगों के लिए रिकवरी दर 41 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि उनमें से 41 प्रतिशत नशे से मुक्त हो चुके हैं; लेकिन दूसरों के पुन: नशे में जाने की सम्भावना है। हम उन्हें उनके परिवारों के साथ परामर्श सत्र के लिए बुलाते हैं और उन्हें आगे के समर्थन के लिए पुनर्वास केंद्र लौटने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

अब डॉ. स्टालिन अपने पुनर्वसन केंद्र में अलग-अलग समय की अवधि बताते हैं। जैसे- नशे की लत में पड़े नये लोगों के लिए दो महीने। दूसरी बार आने वालों के लिए एक महीना और उनके परिवारों द्वारा छोड़े गये लोगों के लिए तीन-चार महीने।

रिपोर्टर : आपके पुनर्वास केंद्र में प्रवेश की न्यूनतम अवधि क्या है?

डॉ. स्टालिन : यह निर्भर करता है। पहली बार में मरीज़ों के लिए दो महीने हैं। जो मरीज़ पहले केंद्र पर आ चुके हैं, उनके लिए यह एक महीने का समय है। हालाँकि जिन मरीज़ों को उनके परिवारों द्वारा उपेक्षित किया जाता है, वे तीन-चार महीने तक रह सकते हैं।

अब डॉ. स्टालिन ने ख़ुलासा किया कि वह ड्रग एडिक्ट्स का इलाज कैसे करते हैं और उनके बीच वापसी के लक्षणों को कम करने के लिए प्रयास करते हैं।

रिपोर्टर : नशे के आदी लोगों के इलाज का तरीक़ा क्या है?

डॉ. स्टालिन : हम एक विषहरण तरीक़ों का उपयोग करते हैं। हम उन्हें निर्धारित दवाएँ देते हैं, ताकि उन्हें उन ड्रग्स को छोडऩे में मदद मिल सके, जिनके वे आदी हैं।

अब डॉ. स्टालिन ने हमें बताया कि (नशे में) वापसी के दौरान मरीज़ हिंसक और आक्रामक कैसे हो सकते हैं और उन्हें नियंत्रित करना कैसे मुश्किल हो सकता है?

रिपोर्टर : उनका इलाज करना कितना मुश्किल है? मुझे कोई ऐसी घटना बताइए, जब उनका इलाज करते समय आपके साथ दुव्र्यवहार किया गया हो?

डॉ. स्टालिन : मैंने कभी भी इस तरह के दुव्र्यवहार का सामना नहीं किया है। हाँ; लेकिन जब कोई मरीज़ (नशे में) वापसी से पीडि़त होता है, तो यह मुश्किल समय होता है; क्योंकि मरीज़ थोड़ा जंगली और आक्रामक हो जाता है। इसलिए इसे नियंत्रित करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। हमें उसके पैर या हाथ पकडऩे होंगे। लेकिन मेरे साथ दुव्र्यवहार नहीं किया गया है।

इंफाल में अपने पुनर्वास केंद्र के चिकित्सक डॉ. स्टालिन द्वारा अपने अनुभव साझा करने के बाद हमने विज्ञान में स्नातक राजेश राज (बदला हुआ नाम) से मुलाक़ात की, जो सन् 2016 से पाँच साल तक नशीले पदार्थों की लत से जूझते रहे। ठीक होने की अपने अनुभव का ख़ुलासा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे एक एनजीओ और एक पुनर्वास केंद्र की सहायता से उन्होंने ड्रग्स पर अपनी निर्भरता को सफलतापूर्वक ख़त्म किया। आज राजेश राज एक ग़ैर-सरकारी संगठन के सदस्य के रूप में नशीले पदार्थों की रोकथाम के प्रयासों में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं, जबकि ख़ुद एक नशा-मुक्त जीवन जी रहे हैं। नशे की लत के अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए राजेश ने दावा किया कि ड्रग्स लेने के दौरान उन्हें पुलिस ने कई बार पकड़ा था। हालाँकि वह हर बार पुलिस के जाल में फँसने के बाद रिश्वत देकर छूटने में कामयाब रहे।

रिपोर्टर : क्या आपको कभी पुलिस ने पकड़ा है?

राजेश : हाँ; मुझे पुलिस ने दो-तीन बार गिर$फ्तार किया था। लेकिन मैं हर बार रिश्वत देकर छूटने में कामयाब रहा।

रिपोर्टर : आपने कितने पैसे दिये?

राजेश : नारकोटिक्स पुलिस ने मुझे एक बार गिर$फ्तार किया था। मैंने उन्हें 3,000 रुपये दिये और उन्होंने मुझे जाने दिया। मैंने हमेशा पुलिस को रिश्वत दी, इसलिए मेरे ख़िलाफ़ कोई मामला नहीं है।

राजेश ने अब ख़ुलासा किया कि वह कितनी मात्रा में नशीले पदार्थों का सेवन करते थे। उन्होंने कहा कि वह हर दिन दो ग्राम नशीले पदार्थों का सेवन करते थे, जिसकी क़ीमत 1,000 रुपये है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने ड्रग्स के ख़र्चे और स्वास्थ्य पर हो रहे ख़र्च को महसूस करने के बाद इस लत को छोड़ दिया।

रिपोर्टर : आप हर दिन कितनी ड्रग्स का सेवन करते थे?

राजेश : दो ग्राम। इस पर मुझे लगभग 1,000 रुपये ख़र्च करने पड़ते थे।

रिपोर्टर : आपने ड्रग्स क्यों छोड़ी?

राजेश : मुझे एहसास हुआ कि इसमें मेरा बहुत अधिक पैसा ख़र्च हो रहा था। मैं भी बीमार भी होने लगा था। मैंने $फैसला किया कि अब अपने जीवन को वापस पटरी पर लाने का समय है।

रिपोर्टर : आपने ड्रग्स कैसे ख़रीदी?

राजेश : सन् 2016 में मेरी प्राइवेट नौकरी थी, इसलिए मेरे पास ड्रग्स ख़रीदने के लिए पैसे थे।

अब राजेश ने उस ड्रग्स के नाम का ख़ुलासा किया, जिसका वह उपयोग कर रहे थे। साथ ही वो स्रोत भी बताया, जिससे वह इसे प्राप्त कर रहे थे और उस दोस्त का नाम भी, जो उन्हें इसकी आपूर्ति कर रहा था।

रिपोर्टर : आप कौन-सी ड्रग्स ले रहे थे?

राजेश : मैं अफ़ीम ले रहा था। लेकिन अब मैं ड्रग्स से दूर हूँ। …मैंने लगभग चार-पाँच वर्षों तक अफ़ीम का सेवन किया।

रिपोर्टर : तुमने हेरोइन ली?

राजेश : मणिपुर में अफ़ीम ही हेरोइन है। मैं इंफाल के रेड लाइट एरिया, बीओसी एरिया से इसे ख़रीदता था। यह एक बाज़ार है। मेरा दोस्त भी कभी-कभी मुझे ड्रग्स सप्लाई करता था।

राजेश ने कहा कि उसने सन् 2016 में ड्रग्स लेना शुरू कर दिया था, जब उनके पिता ने दूसरी महिला से शादी कर ली और उनके और उनकी माँ के साथ रहना बन्द कर दिया।

रिपोर्टर : आपके ड्रग्स लेने का क्या कारण था?

राजेश : जब मेरे पिता ने दूसरी महिला से शादी कर ली और मेरी माँ और मेरे साथ रहना बन्द कर दिया, तो इसका मुझ पर बुरा असर पड़ा। मेरी माँ मेरे साथ रहती थी, और मेरे पिता कभी-कभी ही घर आते थे।

इस सवाल पर कि राजेश ने अपनी ड्रग्स की लत को कैसे दूर किया? राजेश ने कहा कि उन्होंने एक एनजीओ के सहयोग से नशे की लत का सफलतापूर्वक छुटकारा पाया। एक ड्रग पुनर्वास केंद्र में थेरेपी ली और अब वह पूरी तरह से ड्रग मुक्त हैं। उन्होंने कहा कि वास्तव में वह एक एनजीओ के साथ मिलकर अन्य लोगों की मदद करने के लिए भी काम कर रहे थे, जो नशे की लत से जूझ रहे थे।

रिपोर्टर : आपने ड्रग्स कैसे छोड़ी?

राजेश : मैंने एक एनजीओ से सम्पर्क किया, जो ड्रग्स छोडऩे की इच्छा रखने वाले लोगों की मदद करता है। मुझे ङ्गङ्गङ्गङ्ग सोसायटी में थेरेपी मिली। अब मैं उसी एनजीओ में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। मैं वहाँ पेयर एजुकेटर (शिक्षक जोड़ी) के रूप में काम कर रहा हूँ।

राजेश से बात करने के बाद ‘तहलका’ रिपोर्टर ने मणिपुर के एक अन्य एमबीबीएस डॉक्टर अज़हरुद्दीन शेख़ से मुलाक़ात की। अज़हरुद्दीन ने राजेश की चिन्ताओं का समर्थन करते हुए कहा कि मणिपुर में सरकारी कर्मचारियों की बढ़ती संख्या नशे की लत से जूझ रही है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह (नशा) केवल सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं था, मणिपुर में मुसलमान युवा भी ड्रग्स के शिकार हो रहे हैं।

इस मुद्दे को हल करने के लिए अज़हरुद्दीन ने अंजुमन नामक एक संगठन के प्रयासों पर प्रकाश डाला, जो इंफाल में एक पुनर्वास केंद्र चलाता है और मुस्लिम युवाओं की नशीले पदार्थों की लत छुड़ाने में मदद करता है। अज़हरुद्दीन ने यह भी कहा कि कुछ मौलाना युवाओं को नशे की लत में पडऩे से रोकने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। वह इन युवाओं को जमात (धार्मिक उपदेश) गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, ताकि उनका ध्यान ड्रग्स से हट जाए।

रिपोर्टर : अच्छा, किस लेवल के लोग वहाँ ड्रग अडिक्ट (ड्रग के शिकार) हैं, मणिपुर में?

अज़हर : अडिक्ट वाला तो यूथ ही है। हाँ; बहुत …मुस्लिम में थोड़ा कम हुआ है। मतलब, मौलाना लोग पकड़-पकडक़र एक ऑर्गेनाइजेशन है अंजुमन, मौलाना लोग पकडक़र उनको सही कर रहे हैं।

रिपोर्टर : अच्छा, मुस्लिमों की ऑर्गेनाइजेशन है? ..क्या नाम है?

अज़हर : अंजुमन, वही लोग काम कर रहा है, उसके ऊपर।

रिपोर्टर : मैंने सुना है इंप्लाई भी ड्रग अडिक्ट हैं?

अज़हर : हाँ; बहुत कम परसेंटेज है।

रिपोर्टर : वहाँ ड्रग रिहैब सेंटर (पुनर्वास केंद्र) भी होंगे?

अज़हर : हाँ, वो तो हैं।

रिपोर्टर : कितने होंगे?

अज़हर : मुस्लिम के तो दो-तीन हैं और मैतेइओं के तो अनकाउंटेड (अनगिनत) होगा।

रिपोर्टर : मुस्लिम्स के अपने ड्रग रिहैब

सेंटर्स हैं?

अज़हर : हाँ, लीलौंग के अन्दर हमारा एक है।

रिपोर्टर : वो सेंटर (केंद्र सरकार) का है या स्टेट (राज्य सरकार) का?

अज़हर : वो अंजुमन, मुस्लिम वाला (है); वहाँ सारे मुस्लिम लडक़े आते हैं। वहाँ उनका इलाज होता है। फिर जमात में भेजते हैं।

रिपोर्टर : जमात में क्या सीखते हैं?

अज़हर : मतलब, वो दीन का- नमाज़ पढऩा, ड्रग लेना गुनाह होता है, ये सब बताते हैं।

डॉ. अजहर ने मणिपुर में नशीले पदार्थों की तस्करी की जटिलताओं के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि पहाडिय़ों में अफ़ीम की खेती मुख्य रूप से कुकी समुदाय द्वारा की जाती है। एक बार जब अफ़ीम मैदानी इलाक़ों में पहुँच जाती है, तो अवैध इससे बने नशीले पदार्थों के व्यापार का संयुक्त रूप से मैतेई और मुस्लिम दोनों प्रबंध करते हैं।

रिपोर्टर : अच्छा, अफ़ीम की खेती करते हैं कुकी?

अज़हर : हाँ; ख़तरनाक करते हैं। मतलब डिफोरेस्टेशन (वनों की कटाई) करके। पहाड़ों पे 80 प्रतिशत तो कर दिया वो, …मतलब कुकियों के निवास क्षेत्र में अफ़ीम की खेती कर दिया। प्लेन (मैदान) में मुस्लिम और मैतेई करता है। खेती होती है पहाड़ में, ….हार्वेस्ट (फ़सल) होने के बाद प्लेन (मैदान) में आता है।

रिपोर्टर : प्लेन्स (मैदान) में कौन सँभालता है?

अज़हर : मैतेई और मुसलमान।

इसके बाद ‘तहलका’ रिपोर्टर ने मणिपुर के एक अन्य एमबीबीएस डॉक्टर मोहम्मद वसीम से मुलक़ात की, जिन्होंने राज्य में सरकारी कर्मचारियों के बीच ड्रग्स के उपयोग के बारे में पुष्टि की। उन्होंने ख़ुलासा किया कि यह मुद्दा सरकारी कर्मचारियों से आगे बढ़ गया है, यहाँ तक कि कुछ डॉक्टर ख़ुद भी नशीले पदार्थों के सेवन में शामिल मिले हैं। वसीम ने ज़ोर देकर कहा कि कोई भी अपने पेशे की परवाह किये बिना ड्रग्स के जाल में फँस सकता है।

रिपोर्टर : अच्छा, मुझे कोई बता रहा था मणिपुर में जो गवर्नमेंट सर्वेंट (सरकारी नौकर) हैं, वे भी ड्रग एडिक्ट (नशे के आदी) हैं।

वसीम : हाँ; वो तो है, …हमारा डॉक्टर भी ड्रग एडिक्ट है।

रिपोर्टर : डॉक्टर भी?

वसीम : हाँ, …हर आदमी की आदत होती है। किसी के बारे में कुछ नहीं कह सकते; डॉक्टर भी आदमी होता है।

रिपोर्टर : मणिपुर में डॉक्टर भी हैं ड्रग एडिक्ट?

वसीम : हाँ हैं।

रिपोर्टर : और गवर्नमेंट सर्वेंट (सरकारी कर्मचारी)?

वसीम : हाँ, हाँ; हैं, …बहुत सारा।

वसीम ने तब रिपोर्टर के साथ साझा किया कि वह एमबीबीएस पूरा करने से पहले भी सन् 2013 से मणिपुर में नशीले पदार्थों के दुरुपयोग की स्थिति को देख रहा था।

रिपोर्टर : आप कबसे देख रहे हो ड्रग्स को मणिपुर में, किस एज (उम्र) से?

वसीम : जब हम …2013 से देख रहे हैं। एमबीबीएस कंप्लीट करने से पहले।

इस बीच मणिपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता बिक्रमजीत राजकुमार ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि राज्य सरकार के कर्मचारियों और मणिपुर पुलिसकर्मियों के बीच नशीले पदार्थों का उपयोग व्यापक स्तर पर बढ़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि यहाँ तक कि राज्य पुलिस के कुछ कर्मियों ने भी नशे की लत में डूबे हुए हैं।

बिक्रमजीत के अनुसार, उनके बचपन के कई दोस्त नशीले पदार्थों के उपयोग में शामिल हैं, उनके एक दोस्त ने एक एनजीओ की सहायता से नशे की लत पर सफलतापूर्वक क़ाबू पा लिया है। उन्होंने आगे ख़ुलासा किया कि ड्रग पाउच, जो पहले इंफाल की सडक़ों पर आसानी से उपलब्ध था; अब प्राप्त करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि मणिपुर में जातीय हिंसा भडक़ने के बाद ड्रग्स की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसका नतीजा यह हुआ है कि मादक पदार्थ की थैली ख़रीदने से अब आपकी जेब पर असर पड़ेगा।

डॉ. स्टालिन ओराम के अनुसार, अकेले इंफाल में 20 पुनर्वास केंद्र हैं, जबकि मणिपुर में 100 से अधिक हैं। इससे पता चलता है कि राज्य में नशीले पदार्थों का मुद्दा कितना गम्भीर हो गया है, जो सामान्य लोगों के अलावा सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और अन्य पेशेवरों को प्रभावित कर रहा है। यदि समस्या का समाधान नहीं किया जाता है, तो इसका राज्य के भविष्य पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा।

जी20 के प्रशंसीय क्षण

जी20 शिखर सम्मेलन से पहले जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर मोदी सरकार के रुख़ की प्रशंसा करते हुए कहा कि ‘देश ने शान्ति की वकालत करते हुए अपने संप्रभु और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देकर सही काम किया है;’ तो यह स्पष्ट रूप से यह भारत के लिए गर्व का क्षण रहा। वास्तव में पूर्व प्रधानमंत्री उनकी प्रशंसा में इतने अभिभूत थे कि उन्होंने कहा कि ‘वह चिन्तित होने के बजाय भारत के भविष्य के बारे में अधिक आशावादी थे और बहुत ख़ुश थे कि जी20 की अध्यक्षता के लिए भारत का मौक़ा मेरे जीवन-काल में आया।’

एक अन्य कांग्रेस नेता शशि थरूर ने 18वें जी20 शिखर सम्मेलन में नयी दिल्ली घोषणा-पत्र को ‘निस्संदेह भारत के लिए एक कूटनीतिक जीत’ करार दिया। उन्होंने बदलती भू-राजनीति के बीच नयी दिल्ली घोषणा-पत्र पर सभी सदस्य देशों को आम सहमति पर लाने के लिए सरकार की सराहना की।

यह वास्तव में प्रशंसनीय है कि सरकार ने वास्तव में 58 शहरों में 200 बैठकें आयोजित करके इसे लोगों का जी20 बना दिया। इस तंग रस्सी जैसी कूटनीति पर चलना सबसे कठिन काम था। लेकिन हाल ही में सम्पन्न जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान यह हमारा ट्रंप कार्ड साबित हुआ। भारत के लिए चुनौती न तो अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों को नाराज़ करने की थी और न ही पूर्वी यूरोप में बढ़ते संघर्ष को लेकर पुराने सहयोगी रूस को नाराज़ करने की थी। जैसे ही पर्दा गिरा, रूस और पश्चिमी शक्तियों ने दावा किया कि यूक्रेन संकट पर उनसे सम्बन्धित स्थिति सही साबित हुई थी। यह भारत के सर्वोत्तम हित में था कि वह संघर्षों में न फँसे और राष्ट्रों के बीच संतुलन बनाए रखे। भारत में जी20 घोषणा को आम सहमति से अपनाया गया था और इसमें यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के किसी भी उल्लेख से परहेज़ किया गया था। वास्तव में वैश्विक मंचों पर भारत का बढ़ता दबदबा, जी20 शिखर सम्मेलन और इसकी स्वतंत्र विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण सबक़ है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ‘आज का युग युद्ध का नहीं होना चाहिए।’ वास्तव में उनके ये शब्द जी20 शिखर सम्मेलन में इस जटिल चुनौती से निपटने में कूटनीतिक कौशल को दर्शाने के साथ ही वैश्विक व्यवस्था को फिर से आकार देने के लिए भारत की बढ़ती आर्थिक ताक़त, राजनयिक क्षमताओं और नेतृत्व कौशल को प्रदर्शित करते हैं। भारत के अध्यक्ष पद छोडऩे से पहले नवंबर में डिजिटल समीक्षा बैठक आयोजित करने का प्रधानमंत्री मोदी का फ़ैसला जी20 शिखर सम्मेलन के गौरवशाली क्षणों में लिये गये निर्णयों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करेगा।

भारत अमेरिका के साथ जुडऩे में सक्षम रहा है और राष्ट्रपति जो बाइडन की भारत यात्रा वैश्विक और द्विपक्षीय स्तरों पर विश्वास और सहयोग का प्रतिनिधित्व करती है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारे की घोषणा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। रूस को आश्वस्त करने के लिए भारत ने सुनिश्चित किया कि घोषणा में रूसी आक्रामकता का विशिष्ट संदर्भ हटा दिया जाए। जहाँ तक चीन का सवाल है, तो यह अच्छा हुआ कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के बुलावे पर जी20 शिखर सम्मेलन में नहीं आये। नहीं तो सीमा-विवाद को देखते हुए मोदी-शी के हाथ मिलाने की विपक्ष आलोचना कर सकता था। इसलिए द्विपक्षीय से लेकर वैश्विक स्तर तक भू-राजनीति में भारत के ये सर्वश्रेष्ठ क्षण रहे और इसने वैश्विक व्यवस्था में एक नये अध्याय की शुरुआत की।                 

इंडिया बनाम भारत के बीच उलझे कई मसले

विपक्षी गठबंधन इंडिया में सीटों के बँटवारे को लेकर आड़े आ सकती हैं चुनौतियाँ

देश में चुनावी माहौल के बीच इन दिनों एक नये मुद्दे ‘भारत’ और ‘इंडिया’ को लेकर राजनीतिक पार्टियों में विवाद जारी है। इस विवाद ने मीडिया में उस समय सुर्ख़ियाँ बटोरीं, जब राष्ट्रपति भवन ने 9 सितंबर को जी20 के उपलक्ष्य में रात्रिभोज के लिए सभी नेताओं को निमंत्रण पत्र भेजा। राष्ट्रपति के लेटर हैड पर लिखे इस निमंत्रण पत्र पर ‘द प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ की बजाय ‘द प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ लिखा हुआ था। इस पत्र के सार्वजनिक होने के बाद से ही भारत और इंडिया को लेकर राजनीतिक पार्टियों में तो विवाद छिड़ा ही, मीडिया में भी लगातार विषय बहस का हिस्सा बना।

राष्ट्रपति के लेटर हेड पर लिखे ‘द प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ को लेकर विपक्ष का कहना है कि विपक्षी गठबंधन का नाम इंडिया (I.N.D.I.A.) है, इसलिए सत्ताधारी पार्टी इंडिया शब्द की जगह भारत शब्द को प्रमुखता दे रही है। इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा- ‘तो ये ख़बर वाक़ई सच है। राष्ट्रपति भवन में 9 सितंबर को जी20 प्रतिनिधियों के रात्रिभोज के लिए निमंत्रण पत्र पर प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया की बजाय प्रेसिडेंट ऑफ भारत के नाम पर निमंत्रण भेजा है। संविधान के आर्टिकल-1 में लिखा है कि भारत, जो इंडिया है; राज्यों का एक समूह होगा। लेकिन अब इस राज्यों के समूह पर हमला हो रहा है।’

इस वर्ष देश के पाँच राज्यों- राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव और वर्ष 2024 की शुरुआत में लोकसभा चुनाव होने हैं। वहीं दूसरी तरफ़ राजनीतिक पार्टियों में भारत और इंडिया शब्द के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा 18 से 22 सितंबर तक के लिए संसद के विशेष सत्र का बुलाना राजनीतिक दलों में आशंकाओं के साथ ही आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन गया है। विपक्ष का कहना है कि इस विशेष सत्र में संविधान में संशोधन कर देश का नाम इंडिया से भारत किये जाने की आशंका के अलावा अन्य मुद्दे भी छिड़ सकते हैं। हालाँकि अभी यह साफ़ नहीं हुआ है कि केंद्र सरकार द्वारा संसद के पाँच दिनों के विशेष सत्र में किन मुद्दों पर चर्चा होगी? लेकिन जिस प्रकार सत्ताधारी पक्ष और विपक्ष में घमासान जारी है, उससे एक सवाल यह उठता है कि क्या वाक़ई इंडिया और भारत एक नहीं हैं?

बता दें कि जब विपक्षी गठबंधन इंडिया की तीसरी बैठक मुंबई में हुई, तो दूसरी तरफ़ संसदीय कार्य मंत्री प्रल्हाद जोशी द्वारा एक्स (पूर्व ट्विटर) पर विशेष सत्र की जानकारी दी। ये सब सभी राजनीतिक दलों के बीच तरह-तरह के कयासों को जन्म देने वाला था। राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम जनता में ये भी कयास लगने शुरू हो गये कि क्या एक देश-एक चुनाव के तहत विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ कराये जाएँगे? या महिला आरक्षण बिल, एनजेएसी, काशी और मथुरा विवाद, इंडिया बनाम भारत, यूसीसी और अन्य मुद्दे इस विशेष सत्र में चर्चा का विषय होंगे? इधर नये गठबंधन ‘इंडिया’ में अपनी ही कुछ अलग चुनौतियाँ हैं, जिसमें सर्वप्रथम सीटों के बँटवारे को लेकर मुश्किलें दिख रही हैं। इसी महीने की 13 सितंबर को शरद पवार के आवास पर विपक्षी गठबंधन इंडिया की कोऑर्डिनेशन कमेटी की पहली बैठक हुई। बैठक के बाद कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सीटों के बँटवारे को लेकर अभी कोई फ़ैसला नहीं हुआ है। सभी पार्टियाँ मिलकर इस बारे में जल्द फ़ैसला करेंगी। फ़िलहाल हमने देश के अलग-अलग राज्यों में रैलियाँ करने का फ़ैसला लिया है। पहली रैली अक्टूबर के पहले ह$फ्ते में भोपाल में होगी, जिसमें मोदी सरकार में बढ़ रही बेरोज़गारी, महँगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों की बात होगी। सभी दलों में जाति-जनगणना का मुद्दा उठाने पर भी सहमति बनी है। बैठक के बाद कांग्रेस ने सोशल साइट एक्स पर लिखा- ‘हमने साथ मिलकर लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प लिया है, हम इसे ज़रूर पूरा करेंगे। जुड़ेगा भारत, जीतेगा I.N.D.I.A.’।

पटना और कर्नाटक के बाद मुंबई में तीसरी बैठक के बाद इंडिया गठबंधन के आगे असली चुनौती अब है। दरअसल इंडिया गठबंधन दलों के बीच कई राज्यों में सीटों के बँटवारे को लेकर फॉर्मूला तय किया जाना है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस की भूमिका के अलावा आम आदमी पार्टी को सीट दिये जाने को लेकर अहम चर्चा होगी। इंडिया गठबंधन में किस राज्य को लेकर क्या पेच फँसा है?

उत्तर प्रदेश : सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति का$फी कमज़ोर है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में आगामी लोकसभा चुनाव के लिए 18 से 20 सीटें चाहती है। सम्भवत: समाजवादी पार्टी इस पर आसानी से तैयार नहीं होगी। वहीं दूसरी चंद्रशेखर रावण को लेकर पेच फँसा है। दरअसल चंद्रशेखर नगीना लोकसभा सीट से चुनाव लडऩा चाहते हैं; लेकिन समाजवादी पार्टी यह सीट छोडऩा नहीं चाहती। इसके अलावा राष्ट्रीय लोकदल को कितनी सीटें देनी हैं, इस पर भी अंतिम फ़ैसला होना है। सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी कुछ सीटें माँग सकते हैं।

बिहार : बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। इंडिया गठबंधन को यहाँ सीटों के बँटवारे को लेकर आम सहमति बनाना सबसे मुश्किल हो सकती है। लालू प्रसाद यादव और नीतीश  कुमार की महत्त्वाकांक्षाओं के बीच कांग्रेस 10 सीटों पर दावेदारी ठोक रही है, जबकि लालू और नीतीश कांग्रेस को छ: सीटें देना चाहते हैं। वहीं वाम दल भी अपने लिए सीटें माँग रहे हैं। सम्भवत: बिहार का महागठबंधन लोकसभा में पूर्व समझौते के अनुरूप उतरने की कोशिश करे, ताकि भाजपा को कम-से-कम सीटों पर रोका जा सके।

आम आदमी पार्टी की बढ़ती राजनीतिक इच्छाएँ भी प्रबल हैं। दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच चुनाव लडऩे को लेकर अभी तक फ़ैसला नहीं हो सका है। दरअसल आम आदमी पार्टी दिल्ली-पंजाब में सीटें देने के बदले गुजरात और हरियाणा में सीटें चाहती है। इसके चलते फ़िलहाल बात नहीं बन पा रही है।

महाराष्ट्र को लेकर भी दिक्क़तें हैं। वहाँ एनसीपी और शिवसेना के बा$गी नेताओं के भाजपा से मिलकर सरकार बनाने के बाद कांग्रेस अपनी खोयी ज़मीन वापस पाने की कोशिश में है, जिसके चलते वह इस राज्य में ज़्यादा सीटें लेने का दबाव बना सकती है। दरअसल, पहले एनसीपी, शिवसेना के साथ राज्य गठबंधन में कांग्रेस तीसरे नंबर की पार्टी थी और पहले की एनसीपी, शिवसेना के सामने बैकफुट पर थी।

पश्चिम बंगाल : पश्चिमी बंगाल में लोकसभा की सीटों के बँटवारे को लेकर अलग ही सिरदर्द है। वहाँ तृणमूल कांग्रेस प्रमुखममता बनर्जी और लेफ्ट किसी भी $कीमत पर साथ आने को तैयार नहीं हैं। हाल में हुए त्रिकोणीय मु$काबले के बावजूद उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को हरा दिया। कांग्रेस समर्थित लेफ्ट उम्मीदवार को भी मात मिली। ऐसे में ममता बनर्जी समझौते के लिए क़तई तैयार नहीं होंगी। इसलिए पश्चिम बंगाल में सीटों का बँटवारा एक बड़ी चुनौती है। हालाँकि त्रिपुरा में दोनों सीटों पर भाजपा ने कांग्रेस समर्थित लेफ्ट को हरा दिया।

बीजेपी ज़्यादा खुश न हो। इंडिया गठबंधन में सब बँटवारा हो जाएगा। जिन राज्यों में थोड़ी-बहुत दिक्क़त है, उसी के लिए कमेटी बनी है; जो मामलों को चर्चा करके सुलझा लेगी।’’

तारिक अनवर

कांग्रेस महासचिव

जी20 : भारत ने विश्व को दिखायी चुनौतियों की तस्वीर

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

जी20 की मेज़बानी करना भारत के लिए गर्व की बात है। क्योंकि जी20 के देशों का पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था में 85 प्रतिशत का योगदान है। विश्व की 75 प्रतिशत व्यापार इन देशों के बीच होता है और दो-तिहाई से भी ज़्यादा जनसंख्या इन देशों में निवास करती है। इसलिए जी20 शिखर सम्मेलन भारत ही नहीं, विश्व के लिए अहम है; क्योंकि इसके ज़रिये देश दुनिया में पड़ रहे ख़राब और ख़तरनाक प्रभाव को एक आम सहमति के ज़रिये रोका जा सकता है। इसके लिए भारत ही नहीं, जी20 के सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। वैसे तो जी20 का मुख्य उद्देश्य वैश्विक वित्तीय स्थिरता के ऊपर मिलकर काम करना है; लेकिन बढ़ते वैश्विक चुनौतियों को लेकर अब अन्य मुद्दों को भी अब इसमें शामिल किया गया है। इसलिए अब जलवायु परिवर्तन को क़ाबू करना, वर्तमान माँगों और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सस्टेनेबल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने जैसे विषयों को शामिल किया गया है।

हालाँकि अन्य कई महत्त्वपूर्ण विषयों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए; लेकिन इसके पीछे 20 अलग-अलग देशों की विदेश नीति और सबका अपना-अपना एजेंडा है। यही कारण है कि सभी मुद्दों पर आम सहमति बन पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए कई बार कई देश महज़ खानापूर्ति करते हैं, तो कई बार वो जी20 की बैठक में शामिल नहीं होते; क्योंकि इसके लिए कोई बाध्यता नहीं है। यह किसी भी देश की कूटनीतिक चाल या उसके इच्छा पर निर्भर करता है कि चाहे तो वह बैठक में शामिल हो या उसका बहिष्कार कर सकता है। यही कारण है कि कुछ महीने पहले जब कश्मीर में जी20 की पर्यटन बैठक हुई, तो उसमें चीन और सऊदी अरब शामिल नहीं हुए।

ऐसा ही एक मामला सन् 2016 के जी20 शिखर सम्मेलन दौरान आया था, जब प्रसिद्ध पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते पर उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हस्ताक्षर नहीं किये; क्योंकि जी20 में किसी भी देश को किसी मुद्दे पर सहमति के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालाँकि बाद में जो बाइडेन ने इस पर हस्ताक्षर किये।

भारत में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन में चीन ने अपने प्रधानमंत्री को भेजकर सम्मेलन में महज़ खानापूर्ति की। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के न आने के पीछे कई कारण हैं। इसे हम कूटनीतिक चाल या चीन का तानाशाही रवैया कह सकते हैं। या कहें कि भारत की मेज़बानी चीन को रास नहीं आयी और ईष्र्या या द्वेष वश जिनपिंग ने ऐसा किया। वहीं रूस के शामिल नहीं होने का सबसे बड़ा कारण विभिन्न देशों का दबाव व पुतिन के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा जारी गिरफ़्तारी वारंट है। पुतिन अपनी तमाम चिन्ताओं की वजह से जी20 में शामिल नहीं हुए। वहीं सऊदी अरब के प्रमुख भी शामिल नहीं हुए।

कुल मिलाकर चीन, रूस और सऊदी अरब ने जी20 में कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी। इस प्रकार देखें, तो दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन में इन तीनों देशों के प्रमुखों को छोडक़र सारे देशों के प्रमुख शामिल हुए। हालाँकि जी20 की अध्यक्षता कर रहे भारत की मेज़बानी में सभी सदस्य देशों के अलावा नौ देशों के राष्ट्र प्रमुख जैसे बांग्लादेश, मिस्र, मॉरीशस, नीदरलैंड्स, नाइजीरिया, ओमान, सिंगापुर, स्पेन और संयुक्त अरब अमीरात भी भारत की तरफ़ से आमंत्रित देश के रूप में शामिल हुए। लेकिन जी20 में केंद्र सरकार की तरफ़ से विपक्ष के कई नेताओं को आमंत्रित नहीं किया गया, जिसको लेकर विपक्ष हमलावर दिखा। पक्ष-विपक्ष में इंडिया बनाम भारत को लेकर राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है। ऐसे में एक दूसरे के बीच मनमुटाव होना स्वाभाविक है। कांग्रेस के एक नेता विजय नामदेवराव वडेट्टीवार ने इसे केंद्र की मोदी सरकार को तानाशाही बताया। उन्होंने कहा कि यह सरकार संविधान विरोधी है। ये संविधान के तहत काम नहीं कर सकते। यही कारण है कि विपक्ष को आमंत्रित नहीं किया गया। सही मायने में तो विपक्ष को भी आमंत्रित करके उनका सम्मान किया जाना चाहिए था। यह भारत के लोकतंत्र का हिस्सा है।

जी20 की अध्यक्षता बदलती रहती है। यह नंबर के हिसाब से किसी-न-किसी देश को मिलती रहती है। यह हर साल कहीं-न-कहीं आयोजित होती रहती है। इसका आयोजन करना जी20 देशों का दायित्व है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। वहीं डिनर में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े को शामिल नहीं करने पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और पी. चिदंबरम ने मोदी सरकार पर हमला बोला और उनके इस कृत्य की निंदा की। चिदंबरम ने कहा कि मैं कल्पना नहीं कर सकता कि किसी दूसरे लोकतांत्रिक देश की सरकार विश्व नेताओं के लिए राजकीय रात्रिभोज में विपक्ष के नेता को आमंत्रित नहीं करेगी। चिदंबरम ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि अभी इंडिया यानी भारत उस स्थिति में नहीं पहुँचा है, जहाँ लोकतंत्र और विपक्ष का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा। वहीं शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि अगर लोकतंत्र में विपक्ष के नेता को स्थान नहीं है, तो यह तानाशाही है।

अगर जी20 के आयोजन की सफलता को लेकर बात की जाए, तो हम कह सकते हैं कि भारत इसमें का$फी हद तक सफल रहा है। सफलता इस बात को लेकर नहीं है कि आयोजन भव्य था। पूरा इंतज़ाम सकुशल बीत गया। कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटी, बल्कि सफलता इस बात की है कि नयी दिल्ली घोषणा-पत्र पर जी20 के देशों ने सहमति जतायी और इस पर साथ मिलकर देश दुनिया में उभरी विभिन्न चुनौतियों पर काम करने का रोडमैप तैयार हो सका है। जी20 शिखर सम्मेलन के पहले दिन इंडिया मिडिल ईस्ट ईस्ट यूरोप कनेक्टिविटी कॉरिडोर लॉन्च हुआ, जिससे भारत सहित अन्य देशों को इससे सबसे बड़ा फ़ायदा यह होगा कि इन्फ्रा डील से शिपिंग समय और लागत कम होगी, जिससे व्यापार का सस्ता और तेज़ होगा। वहीं अफ्रीकन यूनियन का जी20 में शामिल होने की मुहर लगना बड़ी बात है। वहीं इन सब के लिए भारत और जी20 के देशों के मेहनत की बात करें, तो जी20 की बैठक पिछले 8 महीने से भारत के विभिन्न राज्यों में आयोजित की गयीं। इस दौरान जी20 के बैनर तले 50 शहरों में क़रीब 200 से ज़्यादा बैठकों का आयोजन किया गया। यही कारण है कि भारत मंडपम् में पेश किये गये दिल्ली घोषणा पत्र पर आम सहमति बन पायी।

जी20 में भारत की तरफ़ से पेश किये गये घोषणा पत्र पर सहमति भारत की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इस घोषणा पत्र में आतंकवाद के सभी स्वरूपों की निंदा की गयी है और भौतिक राजनीतिक समर्थन से वंचित करने के लिए कहा गया है। इसमें आतंकवाद की कोई भी कार्रवाई आपराधिक और अनुचित है, चाहे ऐसी कार्रवाई कहीं भी घटित हुई हो। इस घोषणा पत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे आगे ले जाने के लिए चर्चा पर ज़ोर दिया गया और विश्वसनीय जवाबदेही और समावेशी डिजिटल बुनियादी ढाँचे (डीपी) का आह्वान डीपी की भूमिका को स्वीकार किया गया। साथ ही साथ जी20 समूह ने व्यक्तियों, धार्मिक प्रतीकों, पवित्र पुस्तकों के ख़िलाफ़ धार्मिक घृणा के सभी कृत्यों की निंदा की। इस घोषणा पत्र में उन्होंने धर्म या आस्था की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और शान्तिपूर्ण सभा के अधिकार पर ज़ोर दिया।

जी20 नेताओं ने दुनिया में असमान आर्थिक पुनरुद्धार के लिए एक मज़बूत टिकाऊ और समावेशी वृद्धि का आह्वान किया। साथ ही घोषित रेड ज़ोन की ज़रूरत को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं ने एक दूसरे के साथ साझा जानकारी का आह्वान किया। मुक्त व्यापार के लिए कृषि पर निर्भर उर्वरक के लिए जी20 नेताओं ने वस्तुओं की बढ़ती $कीमतें जीवन-यापन की लागत पर दबाव डाल रही कृषि खाद्य और उर्वरक क्षेत्र में खुले निष्पक्ष नियम आधारित व्यापार को सुविधाजनक बनाने और नियमों के अनुरूप निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाने की प्रतिबद्धता जतायी।

वर्ष 2050 तक उत्सर्जन शून्य हासिल करने के लिए विकासशील देशों ने 2030 से पहले अपनी जलवायु आधारित योजनाओं को लागू करने के लिए 4.9 बिलियन डॉलर की आवश्यकताओं पर बल दिया। इन योजनाओं का लक्ष्य वैश्विक तापमान में हो रही बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस के नीचे 1.5 डिग्री के नीचे रखने की बात कही गयी है। भारत में ग्लोबल साउथ देशों की मदद करने के उद्देश्य से पर्यावरण और जलवायु अवलोकन के लिए जी20 मिशन उपग्रह का प्रस्ताव किया। इसके अलावा कई मुद्दों पर चर्चा और सहमति बनी।

जी20 के आयोजन में ख़र्च की बात करें, तो इसके अलग-अलग दावे पेश किये जा रहे हैं। सरकार ने ख़र्च का पूरा ब्योरा जारी नहीं किया है। महज़ ट्वीट के ज़रिये इसकी जानकारी दी गयी है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जी20 शिखर सम्मेलन पर 10 करोड़ डॉलर से भी अधिक के ख़र्च का अनुमान लगाया। वरिष्ठ कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने एक्स पर पोस्ट किया कि जी20 शिखर सम्मेलन के लिए आवंटित बजट 990 करोड़ रुपये था; लेकिन भाजपा सरकार ने 4,100 करोड़ रुपये ख़र्च किए। वहीं कुछ रिपोट्र्स में दावा किया गया है कि जी20 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4,254 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिये। कोरोना महामारी के बाद से दुनिया भर की सरकारें सार्वजनिक कार्यक्रमों पर कम ख़र्च कर रही हैं; लेकिन भारत में ख़र्चों में बढ़ोतरी चिन्ता का विषय है।

इंडोनेशिया ने बाली शिखर सम्मेलन के लिए भारत से 10 प्रतिशत से भी कम यानी मात्र 364 करोड़ रुपये ख़र्च किये थे। वहीं केंद्र सरकार जब भी कोई सम्मेलन करती है या विदेशी नेताओं को बुलाती है, तो $गरीबी ढकने पर ही करोड़ों रुपये फूँक देती है, जबकि देश में कई तरह की समस्याएँ बढ़ रही हैं। जी20 शिखर सम्मेलन में अपनी धाक जमाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह ख़ज़ाने का मुँह खोलकर पानी की तरह पैसा बहाया, उससे भले ही कुछ लोग गदगद हों; लेकिन देश की आम जनता के लिए इसका इतना ही महत्त्व है कि आने वाले समय में महँगाई और बढ़ सकती है। शायद ही ऐसा आयोजन दुनिया में पहली बार हुआ है, जिसमें सोने और चाँदी के बर्तनों में खाना परोसा गया हो। इस तरह अरबों रुपये ख़र्च करना एक प्रकार से दो-जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करने वाली एक बड़ी आबादी का मखौल उड़ाना ही कहा जाएगा।