Home Blog Page 256

लिट्टे आतंकवाद में तबाह हुई महिलाएँ कैसे बनीं स्वावलंबी?

नीलम गुप्ता

पहले यूक्रेन और अब इजरायल ने एक बार फिर हमें बता दिया है कि युद्ध की विभीषिका कैसे लोगों व इलाक़ों को अपनी आग में झुलसा हमेशा-हमेशा के लिए तबाह कर देती है। इनसे पहले अफ़ग़ानिस्तान का हाल हम देख ही चुके हैं। पर जैसे भी हो, लोगों को तो फिर से उठना ही होता है। पिछले दिनों श्रीलंका की ऐसी दो महिलाओं से मुलाक़ात हुई, जो तमिल ईलम के मुक्ति चीतों (एलईटीटीई) के संघर्ष व हिंसा का शिकार हुई थीं और आज न केवल अपने, बल्कि अपने आसपास के कई गाँवों की महिलाओं को रोज़गार के लिए हुनरमंद बना उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने में लगी हुई हैं।

संद्रासेग्राम कलेवाणी और शिवारास स्वरांजलि दोनों पूर्वी श्रीलंका से हैं और सेवा, अहमदाबाद द्धारा आयोजित किसान महिलाओं के प्रति भेदभाव और जलवायु परिवर्तन से बढ़ती उनकी समस्याओं के सम्बन्ध में हुए तीन दिन के एक सम्मेलन में भाग लेने आयी थीं। अलग से हुई बातचीत में कलेवाणी बताती हैं कि ‘पूर्वी श्रीलंका में लिट्टे का संघर्ष 1989 से पहले ही शुरू हो गया था और यह क़रीब 20 साल चला। जब वह ठंडा पड़ा, तो हमारे गाँव विधवाओं, बेसहारा औरतों व अनाथ बच्चों से भरे हुए थे। छोटे-छोटे स्थानीय उद्योग धंधे पूरी तरह बर्बाद हो चुके थे और खेती भी लगभग नहीं ही थी। हर तरफ़ भूख और बेबसी का आलम था। लोग घोर निराशा में डूबे हुए थे। मानसिक रोगों का शिकार हो चुके थे। इलाज की कोई व्यवस्था थी ही नहीं। अस्पतालों में दवाइयों व स्टाफ, दोनों का ही अभाव था। आदमी लोग रोज़गार के लिए गाँवों से बाहर व मिडिल-ईस्ट देशों में चले गये थे। पर महिलाओं का तो कहीं ठौर नहीं था। गाँवों में हमारा समाज पुरुष प्रधान है। उसमें औरतें गाँव से बाहर कम ही निकलती हैं। मैं पहले तो अपने पति के साथ खेत (बटाई) पर काम करती थी। फिर एक एनजीओं ने मुझे अपने साथ जोड़ लिया। उसका प्रोजेक्ट ख़त्म हो गया, तो सब्ज़ी बेचने का काम करने लगी।’

आज कलेवाणी तीन ज़िलों में चल रही महिलाओं की सहकारिताओं के बोर्ड की उपाध्यक्ष हैं। अपने ज़िले बट्टीकलोआ में उसके रोज़गार प्रशिक्षण के 20 सेंटर चल रहे हैं। 2011 से लेकर अब तक वह 5,000 से भी ज़्यादा ज़रूरतमंद महिलाओं को सिलाई व व्यवसाय प्रबंधन का प्रशिक्षण दे चुकी है। यह कैसे हुआ?

सेवा से मिला प्रशिक्षण

कलेवाणी कहती हैं- ‘मुझे सरकार के डीएस ऑफिस (डिवीजनल सेक्रेटेरिएट) ने बुलाया और पूछा कि क्या मैं काम की ट्रेनिंग लेना चाहूँगी। मैंने हाँ कर दिया। दो बहनों ने मेरा इंटरव्यू लिया मास्टर ट्रेनर के लिए। गारमेंट्स बनाने की ट्रेनिंग देने के लिए। उसके बाद मुझे भारत में अहमदाबाद में सेवा (स्वाश्रयी महिला सेवा संघ) के ऑफिस भेजा गया। वहाँ तीन महीने मेरी ट्रेनिंग हुई। वापस लौटकर मैंने अपने गाँव वालचिन में सेवा फैसिलिटी सेंटर स्थापित किया। शुरुआत गाँव की ही चार विधवाओं से की। यह 2011 की बात है। तबसे अब तक मैं 5,000 से भी ज़्यादा महिलाओं को कपड़े सिलने की ट्रेनिंग दे चुकी हूँ। और यह ट्रेनिंग मात्र सिलाई की ही नहीं है। इसमें सिलाई के लिए कपड़ा ख़रीदने से लेकर उत्पादन व मार्केटिंग, सभी कुछ शामिल है। शुरू में प्रशिक्षण के लिए कपड़ा सेवा देती थी। उत्पादन के लिए हम दुकानदारों से लेकर उन्हें तैयार कपड़े दे देते थे। जो मज़दूरी मिलती, उसमें से 10 प्रतिशत सेंटर के लिए रखकर बाक़ी बहनों को दे देती। बाद में तो कई अन्य गाँवों में भी ऐसे ही सेंटर शुरू किये और व्यवसाय का सेवा का सहकारिता का मॉडल अपनाया।’

10वीं पास शिवराज स्वरांजलि पूर्वी श्रीलंका के ही अंपारा ज़िले के तिरूकोविल गाँव में रहती हैं। वह बताती हैं- ‘मैं कभी अपने घर से बाहर नहीं निकली थी। मेरा ज़िला लिट्टे के आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित हुआ था। उसके ख़त्म हो जाने के 10 साल बाद भी हमारे गाँवों में उसका असर साफ़ दिखायी देता था। बची-खुची कसर सुनामी ने पूरी कर दी थी। मेरा गाँव तो पूरी तरह उससे नष्ट हो गया था। ऐसे में ग़रीबी, भूख से हम लोग बुरी तरह जूझ रहे थे। 2014 में मेरे ज़िले के डीएस ऑफिस अधिकारी ने मुझे बुलाया और फूड प्रोसेसिंग ट्रेनिंग का प्रस्ताव रखा। मेरे साथ 19 और महिलाओं का चयन किया गया। हमें जो प्रशिक्षण दिया गया, उसमें बताया गया कि कैसे हमें अपने क्षेत्र में जाकर गाँवों की महिलाओं, युवतियों को फूड प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग देनी है और कैसे वे अपना कारोबार शुरू कर सकती हैं।’

रोज़गार की स्थिरता

प्रशिक्षण कार्यक्रम की सेवा समन्वयक मेघा देसाई बताती हैं- ‘2008 में भारत सरकार ने हमें श्रीलंका के पूर्वी प्रांत में महिलाओं को प्रशिक्षण देने के लिए आमंत्रित किया। उसके बाद श्रीलंका के एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल ने अहमदाबाद में सेवा कार्यालय का दौरा कर हमारे काम का अवलोकन किया। उन्हें लगा कि सेवा यहाँ जो काम कर रही हैं, वह उनके देश में भी महिलाएँ कर सकती हैं। इसके बाद सेवा की एक टीम श्रीलंका गयी। वहाँ महिला एवं बाल विकास मंत्री ने पूर्वी प्रांत के आतंकवाद प्रभावित तीन ज़िलों बट्टिकलोआ, अंपारा व त्रिंकोमाली में विधवाओं और अपने परिवारों का ज़िम्मा सँभाल रही एकल महिलाओं के पुनर्वास के लिए उन्हें रोज़गारोन्मुखी प्रशिक्षण देने के लिए कहा। हमारी टीम ने तीनों ज़िलों का जायज़ा लिया। इनके दूरस्थ इलाक़ों में बिजली, पानी, व यातायात कुछ भी नहीं था। खेती तो छोडि़ए, पीने तक के लिए पानी नहीं था। हमारे सामने सबसे ज़रूरी बात यह थी कि हम जो भी काम करें, वह महिलाओं की ज़रूरत को पूरा करता हो। दूसरा, जिस भी काम का प्रशिक्षण देकर उसे वे अपनी क्षमता से आगे भी बढ़ा सकें। उसे पूर्ण रोज़गार में तब्दील कर सकें। इसलिए हमने प्रशिक्षण के तीन स्तर बनाये- कौशल्य प्रशिक्षण, उत्पादन प्रशिक्षण और मार्केटिंग। प्रशिक्षण के तीन क्षेत्र चुने- गारमेंट, फूड प्रोसेसिंग और सामाजिक सुरक्षा। इन तीनों व्यवसायों का चयन पूरे क्षेत्र में घूमकर और स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर लिया गया। बाज़ार कहाँ-कहाँ हो सकता है? इसका पता लगाने के लिए कोलंबो तक हम गयीं। इसके अलावा सोलर लाइट, वर्षा जल संचयन और आईटी। 10,000 महिलाओं को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया। गारमेंट, सोलर लाइट, वर्षा जल संचयन और आईटी में प्रशिक्षण के लिए 40 महिलाओं को मास्टर ट्रेनर का प्रशिक्षण देने के लिए चुना। अहमदाबाद में उन्हें काम की ही ट्रेनिग नहीं दी, बल्कि आजीविका के प्रति इंटिग्रेटड तरीक़े से कैसे काम करते हुए अपने परिवार व रोज़गार को आगे बढ़ाया जा सकता है; यह भी बताया गया।’

वह आगे बताती हैं कि वापसी पर यहाँ से चार महिलाएँ सेवा की भी उनके साथ श्रीलंका गयीं। इस बीच श्रीलंका सरकार ने उन्हें एक इमारत दे दी। उसी में उन्होंने अपने उपकरण स्थापित किये। ये उन्हें भारत सरकार ने दिये थे। जो वे यहाँ सीखकर गयी थीं, उसके आधार पर उन्होंने अपने बाज़ार विकसित किये। इसके बाद प्रांतीय स्तर पर उनकी सहकारिता का पंजीकरण करवाया गया। सहकारिता बोर्ड में तीनों ज़िलों के सभी ट्रेंड्स व सभी धर्मों के प्रतिनिधि शामिल किये गये। इसके बाद तो डीएस ऑफिस से भी उन्हें प्रोजेक्ट मिलने लगे।’

कठिन था महिलाओं को मनाना

सेवा ने इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान में भी आतंकवाद से प्रभावित महिलाओं को प्रशिक्षण दिया था। मेघा के अनुसार, ‘उन्हें वहाँ महिलाओं को तैयार करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। क्योंकि काम उनकी ज़रूरत था। हमें लगा था, वही अनुभव यहाँ भी काम आएगा। पर नहीं। यहाँ हालात एकदम अलग थे। यहाँ सरकार आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को राशन दे रही थी। इसलिए भूख उन्हें सालती नहीं थी। पर आतंकवाद का रूहानी व जिस्मानी असर बहुत गहरा था। दूसरा, यहाँ की महिलाएँ घर से कम ही बाहर निकलती थीं। ऐसे में पहले तो उन्हें उनकी हताशा-निराशा से बाहर लाना पड़ा। वे सब अपना आत्मविश्वास बुरी तरह खो चुकी थीं। उन्हें भरोसा नहीं था कि वे फिर से सिर उठाकर पहले की तरह एक अच्छा पारिवारिक व सामाजिक जीवन जी सकती हैं। क्योंकि पहले वे घर से बाहर निकलकर काम नहीं करती थीं, इसलिए उन्हें काम के लिए सेंटर पर जाकर प्रशिक्षण के लिए तैयार करना भी आसान नहीं था। बाज़ार की समझ देने के लिए कोलंबो जाना पड़ता था। उन्हें यह भी समझाना पड़ा कि सतत व स्थायी रोज़गार क्यों ज़रूरी है और सेंटर में उनका आना किस तरह से उन्हें मदद करता है। क़रीब एक साल तो उन्हें काम के लिए तैयार करने और पूर्ण रोज़गार की ज़मीन तैयार करने में ही लग गया। आज सेवा की बहने 11 ज़िलों के 52 गाँवों में काम कर रही हैं। 2021 आते-आते श्रीलंका सरकार ने बहनों को पाँच बिल्डिंग अपने काम के लिए दे दी थीं। उनकी अपनी ‘वूमन सेल्फ एंप्लायमेंट को-ऑपरेटिव सोसायटी’ है। 670 बहने इसकी सदस्य हैं। कलेवाणी इसी की उपाध्यक्ष है। सेवा ने हमें स्वावलंबी बनाया। उसका प्रोजेक्ट सरकार के साथ ख़त्म हो गया। पर हम आज भी सेवा के साथ जुड़ी हुई हैं। हमारा मार्गदर्शन वह करती रहती है। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए कैसे हमें अपनी क्षमताएँ बढ़ानी हैं, यह अब हम सेवा से सीख रही हैं। यह उसी के प्रशिक्षण का नतीजा है कि चीन की वजह से श्रीलंका में इतना बड़ा आर्थिक संकट आया, पर हमारा रोज़गार बचा रहा। आर्थिक संकट ने हमें प्रभावित किया, पर हम उसके सामने टिकी रह सकीं।’

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

मूर्ख और चालाक

प्रदूषण को लेकर हाय-तौबा  मची है। लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और प्रधानमंत्री की अपील को अनदेखा कर पटाखे फोडऩे से बाज़ न आने वाले लोग मूर्ख हैं। उन्हें पर्यावरण और अपने स्वास्थ्य से कोई लेना-देना नहीं। बस मूर्खता ज़ाहिर करने के लिए सिर्फ़ धाँय-धाँय करने से मतलब। लोगों की मूर्खता यहीं तक सीमित नहीं है। दीपावली से पहले दशहरा पर प्रदूषण बढ़ाने वाले रावण, मेघनाथ और कुम्भकरण के पुतले फूँकने से भी वे बाज़ नहीं आते।

यह एक ऐसा सच है, जिसे मानने के बजाय लोग इसे धार्मिक भावना पर आघात समझ लेते हैं। ऐसे लोगों को दीपावली और दशहरे का इतिहास जानने की ज़रूरत है। उन्हें भारत में बारूद के आयात का इतिहास भी पढऩा चाहिए। उन्हें यह भी जानना चाहिए कि दीपावली का सही अर्थ क्या है? प्रदूषण को लेकर हर साल हाय-तौबा मचती है। लेकिन लोग प्रदूषण फैलाने से बाज़ नहीं आते। शासक इसमें हस्तक्षेप नहीं करते। वे प्रशासन के हाथ भी बाँध देते हैं। उनका सिंहासन-मोह इसके लिए उन्हें बाध्य करता है। पूँजीपतियों से याराना और उनसे चंदे का लालच उनका ज़मीर बेच देता है। पैसे और ताक़त से उनकी आत्मा मर जाती है। ऊपर से ऐसे शासकों के आगे दिन-रात दण्डवत् होते लोग उनके अहंकार को चरम पर पहुँचा देते हैं। इसलिए उन्हें एक अपराधी की भाँति किसी के दु:ख का एहसास तक नहीं होता। इन शासकों का ज़मीर किस हद तक मर जाता है, इसका सबसे ताज़ा उदाहरण अयोध्या में मनाया गया दीपोत्सव है। इस दीपोत्सव में 22.23 लाख दीये जलाये गये, जिनमें जलाने के लिए लगभग 1,00,000 लीटर सरसों का तेल ख़र्च किया गया। दीप जलाकर प्रशासन की आँख फिरी, तो ग़रीब बस्तियों के छोटे-छोटे बच्चे प्लास्टिक की बोतलें और डिब्बे लेकर दीपों की ओर लपके और बुझ चुके दीपों में बचा हुआ तेल अपने-अपने प्लास्टिक के पात्रों में इकट्ठा करने लगे। ज़रूरत और अभाव के इस दृश्य को सरकारी ख़ज़ाने से करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने वाले नये-नये लंबरदारों ने ज़रूर देखा होगा। अलग बात है कि वे दीपोत्सव की ख़ुशी में चूर थे। इस ख़ुशी में किसी ने कोई सवाल भी नहीं उठाया। सब विश्व रिकॉर्ड की वाहवाही में मस्त हैं। एक तरफ़ चमक दिखाकर दूसरी तरफ़ बड़े-बड़े घपले ऐसे ही तो होते हैं।

वास्तव में आजकल के ज़्यादातर राजनीतिक लोग, विशेषकर शासक बहुत चालाक होते हैं। उन्हें सामान्य लोगों को धार्मिक भावनाओं में उलझाना आता है। वैसे भी सामान्य लोगों पर धार्मिक ख़ुराक जीने-मरने की हद तक असर करती है। वे धर्म के नाम पर आसानी से मूर्ख बन जाते हैं। इसलिए वे इसके लिए कुछ भी करने पर आमादा रहते हैं। दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बहुत है, जो ज़िन्दगी से ज़्यादा धर्म को महत्त्व देते हैं। ऐसे ही लोगों के बूते पर धार्मिकता की आड़ लेकर कोई कुछ भी कर लेता है। वैसे यह टिप्पणी अयोध्या में हुए दीपोत्सव को लेकर नहीं है। यह टिप्पणी इस दीपोत्सव में हुए बड़े ख़र्च पर है, जो एक दीये की क़ीमत को बहुत ज़्यादा बताता है। यह टिप्पणी उन पैसों के चलते करनी पड़ रही है, जो धर्म के नाम पर गमन किये जाते हैं। यह टिप्पणी उन ग़रीबों की हालत के चलते करनी पड़ी है, जिनके बच्चे डर-डरकर तेल के लिए एक-एक बुझा हुआ दीया निचोड़ते हैं। दीपोत्सव तो ख़ुशी की बात है। लेकिन ख़ुशी तभी ख़ुशी लगती है, जब सब ख़ुशहाल हों।

आश्चर्य है कि सर्दियों में हर साल प्रदूषण पर तो हाय-तौबा मचती है; लेकिन पटाखों पर नहीं। सर्दियाँ ख़त्म होती हैं। गुनगुनी धूप निकलने लगती है। प्रदूषण पर मची हाय-तौबा भी ख़त्म हो जाती है। प्रदूषण को लेकर छाती पीटने वाले शान्त हो जाते हैं। प्रदूषण की रोकथाम की नाकाम कोशिशें करने वाले अधिकारी चैन की साँस लेते हैं। अगले वर्ष फिर वही तमाशा। फिर वही हाय-तौबा। लेकिन क्या प्रदूषण को लेकर हाय-तौबा करने वाले लोग सही में इससे निपटने के कारगर उपाय करते हैं? क्या समाज में सभी लोग प्रदूषण के प्रति सजग हैं? प्रदूषण बढ़ाता कौन है? ऐसे सवालों के जवाब पूरे देश को मिलकर ढूँढने चाहिए। लेकिन इससे पहले ग़लतियाँ देखनी चाहिए। कुछ भी ठीक तभी किया जा सकता है, जब उसकी ग़लतियाँ या कमियाँ मालूम हों। प्रदूषण मनुष्यों द्वारा पैदा किया गया वह ज़हर है, जो ऑक्सीजन में घुलकर हर साल लाखों ज़िन्दगियाँ निगल रहा है। जो लोग प्रदूषण रोकने के प्रयास न करके इस पर राजनीति कर रहे हैं, वही इस ज़हर का सबसे बड़ा निमित्त हैं। दर्ज़नों गाडिय़ाँ उनके पास हैं। केमिकल उत्पादन वाले धन्धे उनके चल रहे हैं। प्रदूषण को कम करने के नाम पर करोड़ों रुपये डकारने का काम यही लोग करते हैं। वनों को उजड़वाने और फिर पोधरोपण के नाम पर मोटी रक़म डकार लेते हैं। लेकिन जब प्रदूषण पर रिपोर्ट तैयार होती है, तो उसमें किसानों पर सारा दोष मढ़ दिया जाता है। 

विराट कोहली ने सचिन तेंदुलकर का तोड़ा रिकॉर्ड, वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में जड़ा 50वा शतक

भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली ने आज वनडे वर्ल्ड कप 2023 के सेमीफाइनल मुकाबले में न्यूजीलैंड के खिलाफ अपने वनडे क्रिकेट करियर का 50 वा शतक पूरा कर लिया है और इसी के साथ विराट कोहली सबसे ज्यादा शतक लगाने वाले बल्लेबाज बन गए है।

बता दें, विराट कोहली ने 49 वनडे शतक लगाने वाले टीम इंडिया के पूर्व दिग्गज सचिन तेंदुलकर का रिकॉर्ड आज तोड़कर इतिहास रचा है। कोहली ने तेंदुलकर का 20 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर आगे निकल गए है। 

विराट कोहली ने आज के इस मैच में 113 गेंदों पर 2 छक्के और 9 चौके की मदद से 117 रन की पारी खेलने के बाद आउट हो गए। कोहली अब सौरव गांगुली के बाद वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में भारत के लिए शतक बनाने वाले भारत के दूसरे बल्लेबाज बन गए है। 

पीएम मोदी ने भगवान बिरसा मुंडा को दी श्रद्धांजलि और ‘पीएम जनमन’ योजना का किया ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को झारखंड में पीएम जनमन अभियान का ऐलान किया है। साथ ही पीएम मोदी ने जनजाति गौरव के प्रतीक भगवान बिरसा मुंडा को उनके जन्म स्थान पर जाकर श्रद्धांजलि भी अर्पित करने के बाद इस नई योजना की घोषणा की और बताया कि भारत सरकार इस महाअभियान पर 24 हजार करोड़ रूपये खर्च करने जा रही है।

इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि, “पीएम जनमन के तहत सबसे पिछड़े आदिवासियों तक सरकार पहुंचने वाली है, जिन्हें अब तक नजर अंदाज किया गया। विकसित भारत का संकल्प का एक प्रमुख आधार है पीएम जनमन यानी पीएम जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान, सामाजिक न्याय जनरल, मोदी हिम्मत करके निकला है आदिवासी न्याय अभियान लेकर।”

पीएम मोदी ने आगे कहा कि, “आजादी के बाद कई दशकों तक आदिवासी समाज को लगातार नजरअंदाज किया गया। अटल जी की सरकार ने आदिवासियों के लिए अलग मंत्रालय बनाया और बजट दिया। हमारी सरकार के दौरान अब आदिवासी कल्याण का बजट पहले के मुकाबले छह गुना बढ़ चुका है। पीएम जनमन के तहत सरकार उन आदिवासी भाई बहनों तक पहुंचेगी जिन तक अभी नहीं पहुंचा गया है। ये वो जनजातीय समूह हैं जिनमें से ज्यादातर अब भी जंगलों में रहने को मजबूर हैं। और उन्होंने अभी तक रेल देखने की बात तो छोड़े रेल की आवाज भी नहीं सुनी है अभी तक।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि, “देश में 22 हजार से ज्यादा गांवों में रह रहे ऐसे 75 जनजातियों में सबसे पीछे रह गए आदिवासी है। देश में इनकी संख्या लाखों में है। इन सबसे पिछड़े आदिवासियों को आजादी के 75 साल बाद मूलभूत सुविधाएं नहीं मिली। कभी पक्का मकान नहीं मिला। कई पीढ़ियों में बच्चों ने स्कूल का मुंह नहीं देखा।”

आपको बता दें, 17 नवंबर को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के लिए दूसरे चरण का मतदान होना है। इन दोनों ही राज्यों में आदिवासियों की बड़ी आबादी बसती है। और मतदान से ठीक पहले पीएम मोदी का इस योजना को लेकर ऐलान करना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में बस के खाई में गिरने से 30 लोगों की मौत अन्य घायल

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में एक बस के 250 मीटर नीचे गिर जाने से 30 लोगों की मौत हो गई है। यह बस जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ से जम्मू जा रही थी और संतुलन बिगड़ने की वजह से बस नीचे गिर गई ।

अन्य घायल लोगों की हालत भी गंभीर बताई जा रही है। घायलों को इलाज के लिए नजदीकी जीएमसी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हालांकि कयास यह भी लगाए जा रहे है कि मरने वालों का आंकड़ा बढ़ सकता है।

पुलिस ने बताया कि, प्रथम दृष्टया मामला ओवरटेकिंग का लगता है। रास्ते पर तीन बसें एक साथ चल रही थी और तीनों एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थी। इसी दौरान यह बड़ा हादसा हुआ। बाकी मामले की जांच अभी जारी है।

जीतनराम मांझी ने किया ऐलान नीतीश के खिलाफ छठ के बाद दिल्ली के राजघाट पर करेंगे धरना प्रदर्शन

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ छठ पूजा के बाद देश की राजधानी दिल्ली जाकर महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट पर प्रदर्शन करेंगे।

जीतनराम मांझी मंगलवार को पटना हाई कोर्ट स्थित अंबेडकर स्मारक पर मौन धरना देने पहुंचे थे। किंतु प्रशासन से अनुमति न मिलने के चलते उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया जिसके बाद उनका धरना स्थगित हो गया।

पटना हाई कोर्ट के बाहर मीडिया से बातचीत करते हुए जीतनराम मांझी ने कहा कि, “बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर हमारे भगवान हैं। हम उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण करके मौन धारण करना चाहते थे मगर इसकी इजाजत नहीं दी गई। विधानसभा में बोलने नहीं दिया जाता, लेकिन यहां पर भी उन्हें माल्यार्पण से रोका जा रहा है।”

मांझी ने आगे कहा कि, “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा में महिलाओं के बारे में अपशब्द और शर्मनाक बातें कहीं। मुझ जैसे दलित नेता, जो नीतीश से उम्र में बड़ा है राजनीतिक जीवन भी लंबा है उसका अपमान किया। विधानसभा में चुने हुए सभी छोटे-बड़े सदस्य माननीय होते हैं उनका आदर करना चाहिए। मगर नीतीश कुमार ने उनसे तू-तड़ाक किया और कहा कि कोई अक्ल नहीं है।”

एचएएम सुप्रीमो जीतनराम मांझी ने आगे कहा कि, “नीतीश ने सिर्फ जीतनराम मांझी का नहीं बल्कि बिहार और देश के सभी दलितों का अपमान किया है। एक राज्य का सीएम जो 13 करोड़ जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं उनके मुंह से जो बातें आई वह विचारणीय है। आरक्षण बिल पर हमने समर्थन दिया है। फिर उसमें विरोध की कौनसी बात है। ”

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव: पीएम मोदी ने राहुल गांधी के मेड इन चाइना बयान पर कहा- मूर्खों का सरदार किस दुनिया में रहते है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में मंगलवार को चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए अपनी सरकार के दौरान हुए कामकाज को गिनाते हुए कहा कि जो मुझे पहले 5 गाली देता था आज 50 देता है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम लिए बिना उनके एक बयान का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि, “मैंने सुना कल एक महाज्ञानी कांग्रेस के कह रहे थे कि भारत के पास, यहां के सब लोगों के पास मेड इन चाइना मोबाइल फोन होता है। एक महाज्ञानी कह रहे थे कि आप सबके पास मेड इन चाइना फोन होता है। अरे मूर्खों के सरदार, किस दुनिया में रहते हैं ये लगो। कांग्रेस के नेताओं को अपने देश की उपलब्धियां न देखने की मानसिक बीमारी हो गर्इ है। पता नहीं विदेश के कौन से चश्मे पहने हैं कि देश की स्थिति नहीं दिखती।”

पीएम मोदी ने कहा कि, “चुनाव के समय उन्हें मेक इन इंडिया को याद आती हो वे स्वदेशी के महत्व को कभी नहीं समझ सकते। आज पूरा देश लोकल के लिए वोकल हो रहा है। त्योहार पर भारत में बने उत्पाद खरीद रहा है। इस बार दिवाली में पौने चार लाख करोड़ रुपए की खरीदी देशवासियों ने और देश में बनी चीजों पर की। यह पैसा देशवासियों के जेब में गया। पहले एक-डेढ़ लाख करोड़ रुपए का बाहर का होता था।”

देश में मोबाइल उत्पादन और दिवाली पर मेड इन इंडिया सामानों की बिक्री के आंकड़े पेश करते हुए पीएम मोदी ने आगे कहा कि, “कांग्रेस सरकार और अब उनकी सरकार में कितना अंतर आया है। सच्चाई यह है कि आज भारत दुनिया में भारत मोबाइल फोन का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता है। जब कांग्रेस केंद्र में थी तो भारत में हर साल 20 हजार करोड़ से कम के मोबाइल बनते थे। आज भारत में साढ़े तीन लाख करोड़ के मोबाइल फोन बना करते हैं। करीब-करीब एक लाख करोड़ का मोबाइल तो भारत दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करता है।”

टनल में फंसे 40 मजदूरों को बचाने में जुटी टीमें, 900 मिमी पाइप से कमाल की उम्मीद: उत्तराखंड

उत्तराखंड के उत्तरकाशी स्थित टनल में फंसे 40 मजदूरों का रेस्क्यू अभी नहीं हो सका है। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ व अन्य टीमें रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी हुई है और लगातार प्रयास कर रही है।

बताया जा रहा है कि टनल में बार-बार मलबा आने की वजह से दिक्कते हो रही है। इस वजह से रेस्क्यू टीमों को नई तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

बता दें, रेस्क्यू टीमें टनल में 40mm के पाइप को इंस्टॉल कर मजदूरों को बाहर निकालने का रास्ता तैयार कर लेंगी ऐसी उम्मीद जताई जा रही है और शाम तक मजदूरों को बाहर निकाल लिया जाएगा।

घटना स्थल पर पहुंचे आपदा प्रबंधन सचिव रंजीत कुमार सिन्हा ने कहा कि, सुरंग में फंसे मजदूरों को मंगलवार रात या बुधवार तक बाहर निकाला जा सकता है।

मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने आगे कहा कि, अब तक करीब 15-20 मीटर तक मलबा निकाला जा चुका है और यह प्रक्रिया जारी है। हम ढाई फुट व्यास का स्टील पाइप मंगा रहे हैं जिसे बोरिंग के जरिए मलबे में डाला जाएगा और उससे लोगों को बाहर निकाला जाएगा। उम्मीद है कि हम कल रात या परसों तक फंसे लोगों को बाहर निकाल लेंगे।

उत्तरकाशी जिला आपातकालीन परिचालन केंद्र की सूची के अनुसार टनल में फंसे श्रमिकों में से 15 झारखंड, 8 उत्तर प्रदेश, 5 ओडिशा, 4 बिहार, 3 पश्चिम बंगाल, 2 उत्तराखंड, 2 असम और 1 हिमाचल प्रदेश के है।

आपको बता दें, यह घटना दिवाली वाले दिन को घटी थी। और तभी से टनल में फंसे श्रमिकों को ऑक्सीजन, खाने का पैकेट और पानी की सप्लाई पाइप लाइन के जरिए भेजी गई है।

कर्नाटक एग्जामिनेशन अथॉरिटी ने भर्ती परीक्षाओं में मुंह ढकने पर लगाया बैन, मंगलसूत्र को अनुमति!

कर्नाटक एग्जामिनेशन अथॉरिटी ने भर्ती परीक्षाओं में सभी प्रकार के हेड कवर को बैन कर दिया है। लंबे समय से चले आ रहे राज्य में हिजाब विवाद के बीच सरकार ने यह अहम फैसला लिया है।

अथॉरिटी ने परीक्षा के दौरान नकल को रोकने के लिए ब्लूटूथ इयरफोन, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट पर भी बैन लगा दिया है। किंतु इस आदेश में मंगलसूत्र और बिछओं पर बैन को लेकर अभी कुछ नहीं कहा गया है।

बता दें, हालांकि अथॉरिटी की तरफ से जारी आदेश में हिजाब का नाम कहीं अलग से नहीं लिखा गया है किंतु हेड कवर बैन में हिजाब खुद ब खुद शामिल हो जाता है।

आपको बता दें, राज्य में 18 और 19 नवंबर को कर्इ भर्ती परीक्षाएं आयोजित होने वाली है इसी बीच यह सरकार का बड़ा अहम फैसला है।

कर्नाटक में बीते दिनों पब्लिक सर्विस कमीशन के दौरान सामने आया था कि कुछ लड़कियों को एग्जामिनेशन हॉल में जाने देने से पहले मंगलसूत्र हटाने को कहा गया था। हालांकि अधिकारियों ने जांच के दौरान गले कि चेन, बिछुए और झुमके भी निकालने को कहा था। यह सब होने के बाद भाजपा ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर सवाल उठाए थे और कहा था कि परीक्षा में नकल रोकने के लिए ये कदम उठाए गए थे।

राज्य में हिजाब को लेकर विवाद जनवरी 2022 में शुरू हुआ था जब उडुपी के गवर्नमेंट पीयू कॉलेज में 5 लड़कियों को हिजाब पहनकर प्रवेश की अनुमति देने से इनकार किया गया था। इसके बाद लड़कियों ने कॉलेज के बाहर ही विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। 

मणिपुर हिंसा: केंद्र सरकार ने कट्टरपंथी मैतेई संगठनों पर लगाया 5 साल का बैन

केंद्र सरकार ने मणिपुर हिंसा को लेकर मैतेई समुदाय से जुड़े कुछ कट्टरपंथी संगठनों पर बैन लगा दिया है। इनमें- पीपल लिबरेशन आर्मी, यूनाइटेड नेशनल फ्रंट, मणिपुर पीपल आर्मी पर 5 साल का बैन लगा दिया है।

इन सभी संगठनों को केंद्र सरकार ने ऐसी गतिविधियों में सम्मिलित पाया है जो गैर कानूनी है शांति के खिलाफ है और नुकसान पहुंचाने वाली हैं। इसलिए इन पर बैन लगाया गया है।

केंद्र सरकार ने ये कदम उठाने से पहले कई और कदम उठाए थे जिनमें ज्यादा से ज्यादा सेना और सीआरपीएफ के जवानों की तैनाती शामिल है। साथ ही जांच को सीबीआई को सौंपने का फैसला भी लिया गया था।

बता दें, पहले के मुताबिक अभी मणिपुर में हिंसा की स्थिति में थोड़ा सुधार है। किंतु पहले सीएम आवास के पास जिस तरह से कई मौकों पर प्रदर्शन हो चुके है व हथियारों को जब्त किया गया और उपद्रव मचाया गया वो बेहद चिंतित करने वाली स्थिति थी।

आपको बता दें, मणिपुर में तीन समुदाय है इनमें से दो पहाड़ो पर बसे है और एक घाटी में बसा है। मैतेई हिंदू समुदाय है और यह 53 फीसदी घाटी में रहता है। वहीं बाकी दो समुदाय- नागा और कुकी ये दोनों ही आदिवासी समाज से आते हैं और पहाड़ों में बसे हुए हैं। लेकिन मणिपुर हिंसा तब भड़की जब मणिपुर का एक कानून है जो कहता है कि मैतेई समुदाय सिर्फ घाटी में रह सकते हैं और उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन खरीदने का कोई अधिकार नहीं होगा। हाई कोर्ट ने एक टिप्पणी में कहा था कि राज्य सरकार को मैतेई समुदाय की इस मांग पर विचार करना चाहिए और हाई कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद से ही राज्य की सियासत में तनाव हुआ और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए जिन्होंने हिंसा का रूप ले लिया।