ऐसा कहा जाता है कि अच्छे लोगों की चुप्पी बुरे लोगों की क्रूरता से ज़्यादा ख़तरनाक है। गाजा में जारी डरावने दृश्य के मामले में यही हो रहा है। यह वास्तव में मानवता पर संकट है और गाजा के अल-शिफ़ा अस्पताल में सैन्य छापे की हालिया रिपोट्र्स भयावह हैं। इससे भी भयावह बात यह है कि कई देश चुप हैं, जो तुच्छ मुद्दों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं; लेकिन इस गम्भीर संकट पर गहरी चुप्पी साध रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के प्रमुख मार्टिन ग्रिफिथ्स ने 15 नवंबर को एक्स को पोस्ट किया कि ‘नवजात शिशुओं, रोगियों, चिकित्सा कर्मचारियों और सभी नागरिकों की सुरक्षा को अन्य सभी चिन्ताओं पर हावी होना चाहिए। अस्पताल युद्ध के मैदान नहीं हैं।’
इसके जवाब में इजरायल का कहना है कि वह अस्पताल के नीचे कथित तौर पर कमांड सेंटर चलाने के लिए हमास के ख़िलाफ़ अस्पताल में लक्षित अभियान चला रहा है। हालाँकि अस्पताल परिसर में टैंकों की उपस्थिति ने स्थिति को भयावह बना दिया है।
यह स्पष्ट है कि इस सारे मामले में कूटनीति का सहारा नहीं लिया गया। अब समय आ गया है कि भारत युद्ध विराम के लिए दबाव बनाये। भारत ने कुछ दिन पहले ही संयुक्त राष्ट्र महासभा में युद्ध विराम के प्रस्ताव में हिस्सा नहीं लिया था। लेकिन ऐसी स्थिति में जब जीवन बचाने के लिए हर पल मायने रखता है, भारत को मानवीय संकट को कम करने के लिए निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए।
वास्तव में गाजा में तबाही हमास द्वारा इजरायल के 1,000 से अधिक लोगों को मारने और 240 लोगों को बंधक बनाने के क्रूर हमले का परिणाम है; लेकिन हमास को नष्ट करने और प्रतिशोध लेने के लिए 14,000 से अधिक लोगों को मारने के लिए इजरायल की प्रतिक्रिया और भी क्रूर है। कम-से-कम 70 प्रतिशत आबादी को जबरन विस्थापित किया गया है। इजरायल का गाजा में हमला मानवता की हत्या है। इसमें सबसे ज़्यादा पीडि़त बच्चे, महिलाएँ और निर्दोष लोग हैं। हर देश को पीड़ा को रोकने के लिए एक मौलिक ज़िम्मेदारी का सामना करना पड़ता है। भारत ने तनाव कम करने और शान्ति की जल्द बहाली की ज़रूरत पर अपना रुख़ अपनाया है; लेकिन उसे इजरायल से सार्थक सुधार के लिए दुनिया के अपरिहार्य भावनात्मक समर्थन जुटाना होगा। अब तो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी कहा है कि अस्पतालों की रक्षा की जानी चाहिए।
इजरायल-हमास युद्ध पर भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया इजरायल की ओर एक रणनीतिक झुकाव को दर्शाती है और फिर भी इसे इस कड़ी प्रतियोगिता में संयुक्त राज्य अमेरिका या किसी अन्य शिविर के साथ व्यापक संरेखण के रूप में ग़लत व्याख्या नहीं की जानी चाहिए। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भू-राजनीतिक संदर्भों में जो बात दोहरायी है, वह मध्य पूर्व में भारत के रुख़ के लिए भी उतनी ही सही है- ‘यह मत सोचिए कि भारत के लिए किसी धुरी में शामिल होना ज़रूरी है। भारत को अपनी पसंद चुनने का अधिकार है, जो उसके मूल्यों और हितों का संतुलन होगा।’ समय आ गया है कि भारत अपनी चुप्पी तोड़े और तत्काल युद्ध विराम के विकल्पों को स्पष्ट करने के लिए अपनी आवाज़ उठाये।
देश के 80 करोड़ ग़रीब निवासियों को अगले पाँच साल तक मुफ़्त अनाज का ऐलान हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक चुनाव सभा में यह घोषणा करते हुए उत्सुक नज़र आ रहे थे। इसका असर परखने के लिए उन्होंने सभा में उपस्थित जनता पर गहरी नज़र डाली। मानों देखना चाहते हों कि अनाज की ये बोरियाँ वोट में तब्दील होंगी या नहीं? चुनाव जनता का भला कर जाते हैं। राजनेता जो काम पाँच साल तक नहीं करते, वह चुनाव में करने को मजबूर होते हैं। साल 2014 में जब मोदी सत्ता में आये, तब भी ग़रीब जनता की संख्या 80 करोड़ थी और आज जब वे तीसरी बार जनता के बीच जाने के नज़दीक हैं, तब भी ग़रीब जनता 80 करोड़ ही है। देश की इकोनॉमी पाँच ट्रिलियन होने को है, जीएसटी और टैक्स से रिकॉर्ड कलेक्शन सरकार को मिल रहा है; लेकिन ग़रीबी ज्यों-की-त्यों है। ग़रीब नहीं घटने का एक मतलब यह भी है कि नौकरियाँ नहीं मिलीं। विश्व गुरु होने की यह गली काफ़ी सँकरी दिखती है।
तो फिर सरकार किस मुँह से देश के विकसित होने का दावा कर रही है? इस दौरान वैश्विक भूख सूचकांक 2023 की रिपोर्ट भी सामने आयी है। इसके मुताबिक, भारत की स्थिति एक साल पहले से ज़्यादा ख़राब हुई है। रिपोर्ट, जिसे भारत सरकार ने मानने से इनकार कर दिया है; के मुताबिक, कुल 125 देशों में भारत 111वें स्थान पर है। रिपोर्ट में चिन्ता की बात यह है कि देश के बच्चों में कुपोषण की दर सबसे अधिक 18.7 फ़ीसदी है। एक साल पहले भारत इस रिपोर्ट में 107वें स्थान पर था। आज़ादी के वक़्त देश की 25 करोड़ आबादी ग़रीब थी, जो उस वक़्त की आबादी की 80 फ़ीसदी थी।
भारत के कर्णधारों के लिए शर्म की बात यह है कि जिस पाकिस्तान का वे और देश का गोदी मीडिया रोज़ टाइम पास रिपोट्र्स के ज़रिये मज़ा$क उड़ाते रहते हैं, रिपोर्ट में उसका नंबर 102 है; यानी हमसे बेहतर। यहाँ तक कि बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका तक हमसे कहीं बेहतर हैं। बांग्लादेश 81वें, नेपाल 69वें और श्रीलंका कहीं बेहतर 60वें नंबर पर है। श्रीलंका का सबको पता है कि एक साल पहले उसने कितनी गम्भीर आर्थिक स्थिति देखी। लेकिन तय है कि भारत की प्रगतिशील सरकार के मुक़ाबले इन अपेक्षाकृत छोटे देशों ने भुखमरी से निपटने के लिए ज़मीन पर हमसे बेहतर रणनीति के साथ काम किया। जब चुनाव नहीं होते हैं, तो ग़रीबी अभिशाप होती है। चुनाव जब होते हैं, तो ग़रीबी दुधारू गाय बन जाती है। इसका बखान किया जाता है। प्रधानमंत्री ने हाल में कहा कि ग़रीब इस देश की सबसे बड़ी आबादी हैं। यह कहते हुए उनका लक्ष्य ग़रीबी ख़त्म करने का निश्चय नहीं, बल्कि उस आबादी को वोट में बदलने का अधिक दिखा। हो सकता है कांग्रेस के जातिगत जनगणना कार्ड को काउंटर करने के लिए मोदी ने यह कहा हो। लेकिन बात सिर्फ़ यही है कि यह सब राजनीति और सत्ता के लिए है; ग़रीबों के लिए नहीं।
देश में रोटी और राजनीति का यह खेल लम्बा है। समझ लीजिए, दोनों की जंग है। रोटी वाले रोटी के लिए लड़ रहे हैं, राजनीति वाले चुनाव के लिए रोटी को इतेमाल कर रहे हैं। राजनीति इस जंग में हमेशा जीत जाती है, रोटी हमेशा हार जाती है। रोटी की इस हार का ही नतीजा है कि देश में ग़रीबी है। रोटी की लड़ाई सबसे ज़्यादा ग़रीब लड़ता है। इसलिए ग़रीब राजनीति का हथियार है। उसे दाल-भात की तरह चुनाव में परोसा जाता है। ग़रीब भूखा रहता है, और राजनीति भर पेट खाती है। रोटी पैसे से आती है। लेकिन पाँच ट्रिलियन की इकोनॉमी के मुहाने पर खड़ा होने के बावजूद भारत की 80 करोड़ आबादी ग़रीब क्यों है? यह बात राजनीति वाले ग़रीब को बता नहीं पाते।
वैश्विक भूख सूचकांक-2023 से ज़ाहिर होता है कि भारत में ग़रीबी राजनीति की प्राथमिकता में नहीं। हालाँकि हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की इकोनॉमी को लेकर एक लिंक्डइन पोस्ट किया, जो बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था सही ट्रैक पर है। इस पोस्ट में प्रधानमंत्री ने हाल की दो रिसर्च का हवाला देते हुए भारत में लोगों के समृद्ध होने और अर्थव्यवस्था पूरी तरह से मज़बूत होने पर ख़ुशी ज़ाहिर की। प्रधानमंत्री ने शोध रिपोर्ट के जो अंश अपनी पोस्ट में शेयर किये, उनके मुताबिक भारतीयों की औसत आय में बीते नौ साल में सराहनीय उछाल दर्ज किया गया है। साल 2014 में जो आय 4.4 लाख रुपये थी, वो साल 2023 में बढक़र 13 लाख रुपये हो गयी। लेकिन यहाँ सवाल यही है कि ऐसा है, तो फिर ग़रीबी वैसी-की-वैसी ही क्यों है, और क्यों आपको 80 करोड़ ग़रीब भारतीयों को मुफ़्त अनाज देने को मजबूर होना पड़ रहा है?
वैसे भारत की कितनी आबादी ग़रीब है? इसका कोई सही आँकड़ा है नहीं। क्योंकि देश की संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आँकड़ों में काफ़ी अंतर है। ग़रीबी रेखा क्या है? इसे लेकर 2011-12 में तेंदुलकर कमेटी ने एक पैमाना तय किया था। पैमाना यह था कि यदि शहरी क्षेत्र का हर व्यक्ति 1,000 और ग्रामीण क्षेत्र का हर व्यक्ति 816 रुपये एक महीने में ख़र्च करता है, तो उसे ग़रीबी रेखा से नीचे नहीं माना जाएगा। मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार ने इसी मसले पर रंगराजन कमेटी बनायी, जिसने 2014 में दी अपनी रिपोर्ट में हर 1,407 रुपये वाले शहरी और 972 रुपये हर महीने ख़र्च करने वाले ग्रामीण को ग़रीबी रेखा से ऊपर बताया। चूँकि मनमोहन सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया, देश में ग़रीबी का पैमाना तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर ही तय होता है।
वैसे देश में 1956-57 से ग़रीबी संख्या का हिसाब रखना शुरू हुआ। मिन्हास आयोग ने तब बताया था कि देश में 21.5 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। अंतिम सरकारी आँकड़ा साल 2011-12 में सामने आया, जिसमें देश की 26.9 करोड़ अर्थात् 22 फ़ीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे बतायी गयी थी। हालाँकि रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट ने यह संख्या गाँव में 26 करोड़ और शहरों में 10 करोड़ (कुल 36 करोड़) बतायी थी, जिसे मनमोहन सरकार ने नहीं माना था। सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने देश में ग़रीबों की संख्या लगातार 80 करोड़ बतायी है। मुफ़्त अनाज और पाँच साल बढ़ाने के समय भी प्रधानमंत्री मोदी ने यही आँकड़ा बताया। इसी जुलाई में नीति आयोग ने अपने मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स में अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि पाँच साल में 13.5 करोड़ भारतीय ग़रीबी से बाहर आये हैं। आयोग ने इसका कारण न्यूट्रिशन और स्कूलिंग सुधार, सफ़ाई और खाना पकाने के लिए ईंधन के ज़्यादा इस्तेमाल को बताया था। रिपोर्ट के मुताबिक, 2015-16 में देश की 15 फ़ीसदी आबादी ही ग़रीबी रेखा से नीचे थी, जो 2019-21 तक घटकर 15 फ़ीसदी ही रह गयी। फिर भी देश की अनुमानित 140 करोड़ की आबादी में 80 करोड़ ग्रीन कैसे हैं? इस पर भी सवाल है। लेकिन यह सब आँकड़ों का खेल है। औसतन आँकड़े कभी सही तस्वीर नहीं दिखा सकते।
यह जानना भी ज़रूरी है कि पिछले नौ साल में मोदी सरकार ने ज़मीन पर वास्तव में क्या ग़रीबी कम करने के लिए कुछ किया है? वो दृश्य नहीं भूलना चाहिए कि कैसे 2020-21 में लॉकडाउन के कारण दिहाड़ी पर काम करने वाले मज़दूर विभिन्न प्रदेशों से अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गाँव को पैदल और भूखे पलायन करने को मजबूर हो गये थे। एक अनुमान के मुताबिक, इन लोगों की संख्या पाँच करोड़ से ज़्यादा थी। कई तटस्थ सर्वे बताते हैं कि इनमें से अधिकतर फिर अपने काम पर नहीं लौटे और इस तरह और कुछ करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से नीचे चले गये।
जिस देश में 80 करोड़ लोग ग़रीब हैं, उसमें फिर भी ग़रीबी एक मुद्दा नहीं है। है, तो चुनाव जीतने का एक हथियार भर। चुनाव में धर्म है, ग़रीबी नहीं है। धर्म के अस्तित्व के संकट में होने की चिन्ता है; लेकिन ग़रीब के भूख से मरने की नहीं। हज़ारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, कोई सडक़ पर धरना नहीं देता। किसी मंदिर के बाहर लाउडस्पीकर लगाकार विरोध या चिन्ता दर्ज नहीं करता। धर्म के लिए करता है। आगजनी भी करता है। तोडफ़ोड़ भी करता है।
जैसे ग़रीबी चुनाव जितवा देती है, वैसे ही धर्म भी चुनाव जितवाता है। लेकिन ग़रीबी चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाती। राजनेता ग़रीबी को भुनाना चाहता है, उसे ख़त्म नहीं करना चाहता। उसे डर है कि ग़रीबी नहीं रहेगी, तो चुनाव का एक हथियार ख़त्म हो जाएगा।
इलेक्टोरल बॉन्ड यानी चुनावी बॉन्ड राजनीतिक पार्टियों के लिए चाँदी बनाने का ज़रिया बन चुका है। यह बॉन्ड राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने का एक ऐसा नया तरीक़ा है, जिसका खेल आम लोगों की समझ से बाहर है। अब इसकी कुछ-कुछ जानकारियाँ छन-छनकर बाहर आ रही हैं, जिसे लेकर एक पढ़ा-लिखा वर्ग इस चंदे की गोपनीयता को सार्वजनिक करने की माँग कर रहा है, जो कि राजनीतिक पार्टियों को खटक रहा है। हालाँकि कुछ पार्टियाँ, जिन्हें इस बॉन्ड से बड़ा फ़ायदा नहीं मिल रहा है, वो भी इसे सार्वजनिक करवाना चाहती हैं, ताकि चुनावी बॉन्ड का बेजा फ़ायदा उठाने वाली पार्टियों की पोल खुल सके।
दरअसल चुनावी बॉन्ड योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक की निर्दिष्ट शाखाओं से 1,000 रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक के चुनावी बॉन्ड $खरीदे जा सकते हैं, जिनकी अवधि 15 दिनों की होती है। चुनावी बॉन्ड का इस्तेमाल सिर्फ़ पंजीकृत और उन्हीं राजनीतिक पार्टियों को दान देने के लिए किया जा सकता है, जिन्होंने पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में पड़े कुल वोटों में से कम-से-कम एक फ़ीसदी वोट हासिल किये हों। चुनावी बॉन्ड को सरकार लोकसभा चुनाव के वर्ष में अधिसूचित 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि के दौरान भी जारी कर सकती है। बहरहाल आँकड़े बताते हैं कि पिछले पाँच साल पहले चुनावी बॉन्ड लॉन्च किया गया था। यानी ये चुनावी बॉन्ड भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की मोदी सरकार ने शुरू कराया और हैरत वाली बात है कि आज भारतीय को देश की बाक़ी क़रीब 59 मान्यता प्राप्त सक्रिय राजनीतिक पार्टियों से ज़्यादा चंदा मिला है। यानी इन पाँच वर्षों में अकेले भाजपा को आधे से ज़्यादा चुनावी चंदा मिला है। लेकिन कोई भी पार्टी यह बताने को तैयार नहीं है कि उसे चुनावी बॉन्ड के ज़रिये कब, कितना चुनावी चंदा मिला? इसी के चलते चुनावी बॉन्ड की वैद्यता को लेकर अब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया है, जो कि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) की जनहित याचिका के तहत दायर किया है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, न्यायाधीश जे.बी. पारदीवाला और न्यायाधीश मनोज मिश्रा की पीठ कर रही है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनावी बॉन्ड की वैधता को लेकर हुई सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि हक़ीक़त में चुनावी बॉन्ड योजना कॉर्पोरेट घरानों से रिश्वत लेने का एक तरीक़ा है, जो कि राजनीतिक पार्टियों के बारे में जानकारी के नागरिकों के मौलिक अधिकार का सीधा-सीधा उल्लंघन है। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले $फैसलों का हवाला दिया और कहा कि अगर नागरिकों को उम्मीदवारों के बारे में जानने का अधिकार है, तो उन्हें निश्चित रूप से यह भी जानने का अधिकार है कि राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने वाले लोग कौन हैं? प्रशांत भूषण ने कहा है कि चुनावी बॉन्ड एक अपारदर्शी योजना है, जिसकी वजह से सिर्फ़ सरकार को ही पता होता है कि किस पार्टी को कितना चुनावी बॉन्ड के ज़रिये चंदा मिला? बाक़ी कोई पार्टी भी नहीं जान सकती कि इस बॉन्ड के ज़रिये किस पार्टी को कितना पैसा चंदे के रूप में मिला है? पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि जिन पार्टियों को किसी कम्पनी या पूँजीपति के द्वारा चंदा दिया गया है, मौज़ूदा मोदी सरकार ने उन पार्टी नेताओं के साथ-साथ चंदा देने वाली कम्पनियों और पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की कोशिश की है। दरअसल हिन्दुस्तान में गुप्त चंदे का मामला तो बहुत पहले से उठता रहा है; लेकिन उसमें तब भी मोटा-मोटी पता चल जाता था कि किस पार्टी के पास कितना चंदा आया या पार्टी की आमदनी कितनी है? उसके पास पैसा कितना है? लेकिन जबसे चुनावी बॉन्ड के ज़रिये पार्टियों को चंदा मिलने लगा है, तबसे यह गोपनीयता और ज़्यादा बढ़ गयी है। आज तक केंद्र की मोदी सरकार ने नहीं बताया कि भाजपा को अब तक कितना चंदा मिला है? चुनाव निगरानी संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते पाँच वर्षों में देश की राजनीतिक पार्टियों को क़रीब 9,208.23 करोड़ रुपये का चंदा मिला है। हालाँकि मेरे $खयाल से यह जानकारी पुख्ता नहीं है और जहाँ तक चंदे का सवाल है, यह इससे भी कई गुना ज़्यादा हो सकता है।
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, सन् 2016 से सन् 2022 के बीच के पाँच वर्षों में कुल छ: राष्ट्रीय पार्टियों और क़रीब 24 क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों को चुनावी बॉण्ड के ज़रिये क़रीब 9,208.23 करोड़ रुपये चंदे के रूप में मिले। इस चंदे में से अकेले भाजपा को क़रीब 5,271.97 करोड़ रुपये का चंदा मिला है, जबकि कांग्रेस को 952.90 करोड़ रुपये से ज़्यादा और बाक़ी क़रीब 2,983.36 करोड़ रुपये का चंदा बाक़ी की क़रीब 28 राजनीतिक पार्टियों को मिला है। यह हैरत की बात है कि इतने पर भी केंद्र की मोदी सरकार दूसरी पार्टियों के नेताओं के यहाँ छापेमारी कराने पर आमादा है और $खुद कई बड़े और ज़रूरी सवालों के जवाब देने से भी साफ़ इनकार कर देती है, जिसमें कि पीएम केयर्स फंड की जानकारी नहीं देना भी शामिल है।
बहरहाल चुनावी बॉन्ड मामले पर इसी साल 31 अक्टूबर से सुनवाई शुरू हुई थी। हालाँकि इससे एक दिन पहले ही अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने चुनावी बॉन्ड योजना के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि यह योजना राजनीतिक पार्टियों को दिये जाने वाले चंदे को सफेद धन (व्हाइट मनी) के रूप में इस्तेमाल करने को बढ़ावा देती है और नागरिकों को उचित प्रतिबंधों के अधीन हुए बिना कुछ भी जानने का सामान्य अधिकार नहीं होना चाहिए। हालाँकि यह बात समझ से परे है कि जो पार्टियाँ चुनावों में अनाप-शनाप काला धन उड़ाती हैं और जो राजनीति में आने से लेकर सत्ता में आने पर भी अपने खर्च और चंदे का हिसाब-किताब गड़बड़ रखती हैं, वो किस प्रकार से काले धन को स$फेद धन में बदलेंगी? क्योंकि अभी तक जितनी भी पार्टियों की सरकारें केंद्र या राज्यों में बनी हैं, हमने देखा है कि सत्ता में आने वाली पार्टियाँ तो मज़बूत हुई ही हैं, साथ ही उनके नेता, सांसद, विधायक और मंत्री सभी धन-संपत्ति में दिन दूने और रात चौगुने मज़बूत हुए हैं। फिर ये किस आधार पर कहा जा रहा है कि पार्टियाँ चंदे के रूप में कालाधन लेकर उसे सफेद कर रही हैं? लेकिन अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी के बयान से साफ़ है कि केंद्र की मोदी सरकार किसी भी हाल में इस पक्ष में नहीं है कि कोई भी चुनावी बॉन्ड के ज़रिये मिले चंदे या कहें कि कालेधन के बारे में जाने और सरकार भी यह नहीं चाहती कि इस लाभ की योजना में कोई बदलाव किया जाए।
हालाँकि एक महत्त्वपूर्ण बात अर्टानी जनरल आर. वेंकटरमणी ने साफ़ कर दी कि राजनीतिक पार्टियों के पास जो चंदा चुनावी बॉन्ड के ज़रिये आता है, वो कालाधन है या कहें कि एक नंबर का पैसा नहीं है। इसका मतलब यह भी हुआ कि सरकार को पता है कि किसके पास काला धन है? सरकार ऐसे लोगों को चंदा लेकर बख्श देती है और उनके ख़िलाफ़ कोई जाँच नहीं करवाती, बल्कि उन्हें उलटा लाभ पहुँचाती है। चुनावों में हर पार्टी कहती है कि वह कालेधन पर रोक लगाएगी। केंद्र में आने से पहले भाजपा की तरफ से भी ऐसे ही वादे किये गये थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो 2014 में सत्ता में आने से पहले ये तक कहा था कि उनकी सरकार केंद्र में बनते ही वह विदेशों में जमा कालाधन वापस लाएँगे। उन्होंने देश के हर नागरिक को 15-15 लाख देने का जुमला भी दिया था और यह कहा था कि उनके पास कालेधन वालों की लिस्ट है। लेकिन अब खबरें आ रही हैं कि उनके सत्ता में आने से पहले जितना कालाधन स्विस बैंकों का था, उससे क़रीब तीन गुना कालाधन उनके क़रीब साढ़े नौ साल के कार्यकाल में हो चुका है और अब वह कालेधन का नाम तक नहीं लेते। चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द करने की माँग करते हुए इस मामले में वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि आप (सरकार) उस जानकारी को पब्लिक डोमेन में न डालकर भ्रष्ट लेन-देन को संरक्षण दे रहे हैं। मैं एफआईआर दर्ज नहीं करा सकता, क्योंकि मुझ पर मानहानि का मुक़दमा हो जाएगा। मैं अदालत नहीं जा सकता, क्योंकि मेरे पास कोई डेटा नहीं होगा। तो हम किस अदालती आदेश की बात कर रहे हैं?
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट में चुनावी बॉन्ड के मामले में इसकी क़ानूनी वैधता को लेकर सुनवाई चल रही है और इस बारे में अब आम लोग भी जानना चाहते हैं कि आख़िर क्या इस तरह से राजनीतिक पार्टियों को कितना पैसा मिल रहा है? इसे पैसे से राजनीतिक पार्टियों को क्या फ़ायदा हो रहा है और उन्हें केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक कितना फ़ायदा पहुँचाती हैं, जिनसे उन्हें गुप्त रूप से चंदा मिलता है? ज़ाहिर सी बात है कि बिना फ़ायदे या लालच के कोई भी पूँजीपति या कम्पनी किसी पार्टी को चंदा नहीं दे सकती।
सवाल यह भी है कि आज जब चुनावी बॉन्ड का मामला इतना उछल चुका है, तब क्या साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर इसका कोई उलट असर पड़ेगा? क्योंकि भाजपा ने तो साफ़ कर दिया है कि जी, जो पैसा पार्टी के खाते में आया या नक़दी के रूप में उसके पास आया, वो तो हमें खुद नहीं पता कि आया कहाँ से, तो हम इसके बारे में कैसे बताएँ? यह तो वाहक बॉन्ड हैं। इस तरह से सैकड़ों करोड़ रुपये का गमन राजनीतिक पार्टियाँ साल भर में चुनावी चंदे या पार्टी चंदे के रूप में लेकर गमन कर जाती हैं और चुनावों में महँगे प्रचार से लेकर वोट खरीदने और सरकारें तोडऩे में इसका बेजा इस्तेमाल करती हैं।
वर्तमान लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था के अंतर्गत आने वाली लोक प्रशासनिक सेवाएँ सरकार के अलावा निर्वाचित कार्यकारी का प्रमुख अंग हैं। इसमें चयनित अधिकारी संवैधानिक नियमों के अनुरूप निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के निर्देश के अधीनस्थ प्रशासनिक उत्तरदायित्व सँभालते हैं। परन्तु भारतीय लोकतंत्र में यह परिभाषा थोड़ी अलग, थोड़ी अपूर्ण है। यहाँ प्रशासनिक वर्ग यानी नौकरशाही उपरोक्त के अतिरिक्त एक समानांतर सत्ताधारी है, जो स्वयं को इस जनतंत्र का स्वयंभू संचालक मानती है। इसका उदाहरण पिछले दिनों देखने को मिला, जब एक स्थानीय भूमि विवाद में उत्तर प्रदेश के बदायूँ ज़िले के एसडीएम ने सीधे प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को ही नोटिस भेजकर कोर्ट में पेश होने का आदेश दे दिया। यह सूचना सार्वजनिक होते ही प्रशासन में हडक़ंप मच गया।
हालाँकि प्रशासन द्वारा ऐसी गड़बडिय़ाँकरना कोई विशेष बात नहीं है। यह भी आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए कि किसी प्रशासनिक अधिकारी ने राज्यपाल को नोटिस दे दिया। ग़नीमत है, वरना नोटिस तो सीधे राष्ट्रपति को भी भेजा जा सकता था! और यह ऐसी घटना भी नहीं है, जिसे राष्ट्रीय महत्त्व दिया जाए। लेकिन महत्त्वपूर्ण है इस घटना का संदेश, कि ऐसे नौकरशाहों की प्रशासनिक तर्बियत किस प्रकार की होगी? जनता के कार्यों एवं सरोकारों के प्रति उनकी गम्भीरता का आलम क्या होगा?
नौकरशाही के ऐसे दुष्कार्यों का विश्लेषण करते हुए अमेरिकी समाजशास्त्री रॉबर्ट के. मर्टन ने प्रशिक्षित अयोग्यता (ट्रेंड इनकैपेसिटी) शब्द का प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य ऐसे मामलों से है, जिसमें किसी अधिकारी की योग्यताएँ या क्षमताएँ उसकी कमियों के रूप में कार्य करती हैं। क्रियाएँ, जो प्रशिक्षण तथा निपुणता पर आधारित थीं और जिन्हें भूतकालीन परिस्थितियों में सफलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सका; आज की बदली हुई परिस्थितियों में अनुपयुक्त प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट हो सकती हैं। ऐसा नोटिस अनुच्छेद-361 का उल्लंघन है। यह सामान्य बात है कि राष्ट्रपति एवं राज्यपाल जैसे पदों पर आसीन व्यक्तियों को ऐसे मामलों से संवैधानिक रूप से मुक्त रखा गया है। किन्तु अजीब तर्क है कि प्रतिष्ठित सिविल सेवा की परीक्षा पास करने वाले इन अधिकारियों को क्या सामान्य क़ानूनी एवं संवैधानिक नियमों का भी ज्ञान नहीं है? यदि ऐसा है, तो उक्त प्रकरण ऐसी सम्मानित परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। और यदि ऐसा नहीं है, तो इसका सीधा अर्थ है- गणतंत्र में नौकरशाही को बिना परिणाम की चिन्ता एवं बिना जवाबदेही की परवाह के कुछ भी करने की इजाज़त है। ऐसा क्यूँ है कि भारतीय नौकरशाही ख़ुद को सभी नियमों एवं विधानों से परे मानती है? आम जनता तक तो ठीक था, अब ये अहंमन्यता में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को भी नहीं बख़्श रहे हैं। संविधान के पालनकर्ताओं एवं संवैधानिक नियमों को जनता पर लागू कराने की ज़िम्मेदार जमात कैसे उसके मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाती है? नौकरशाही उसका सटीक उदाहरण है। अब ज़रा सोचिए कि ऐसे रूढि़वादी परंपरा के वाहकों का आम जनता के साथ कैसा रवैया होगा?
संभवत: इसी परिपेक्ष्य में हेराल्ड लास्की ने नौकरशाही को एक ऐसी व्यवस्था के रूप व्यक्त किया है, जिसमें यंत्रवत् कार्य के लिए उत्कंठा, नियमों के लिए लोचशीलता का बलिदान, निर्णय लेने में देरी, नवीन प्रयोगों का अवरोध और रूढि़वादी दृष्टिकोण जैसी बातें प्रभावी रहती हैं। हालाँकि भारतीय प्रशासनिक तंत्र बिलकुल रूढ़-लोचहीन भी नहीं है। हक़ीक़त में भारतीय जनतंत्र में एक ग़ज़ब की लोचशीलता एवं अनुकूलता का गुण है, जो राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान एवं समर्थ वर्ग के सम्मुख ही दिखता है। यह नौकरशाही की सत्ता का सबसे विचित्र सत्य है कि उसकी सारी हेकड़ी आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त वर्ग के सामने ग़ायब हो जाती है। आम वर्ग यानी निम्न वर्ग से लेकर मध्यम वर्ग के लोगों को हडक़ाने, धमकाने में माहिर ये प्रशासनिक सेवक सक्षम वर्ग के सामने मिमियाने लगते हैं। आम भारतीयों में नौकरशाही के प्रति हिक़ारत की यह एक बड़ी वजह है। वैसे भारतीय समाज में भारतीय सिविल सर्विस के आतंक एवं उसकी दुव्र्यवस्था के प्रति अरुचि एवं घृणा का इतिहास ब्रिटिश हुकूमत के समय का ही है। तब इसे इंपीरियल सिविल सर्विसेज कहते थे। सन् 1928 में मोतीलाल नेहरू समिति की रिपोर्ट ने सिफ़ारिश की थी कि भारत में उत्तरदायी शासन लागू होने तक अखिल भारतीय सेवाओं को स्थगित कर दिया जाए। यही नहीं, प्रथम गोलमेज सम्मेलन के दौरान भी सेवा सम्बन्धी उपसमिति के दो भारतीय सदस्यों ने इन सेवाओं को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह समाप्त किये जाने की माँग की थी। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भारतीयों के संघर्ष के विरुद्ध क्रूर दमन में आई.सी.एस. अधिकारियों को महारत हासिल थी। तब इन्हें ब्रिटिश सरकार की असैनिक अंग्रेज सेना कहा जाता था, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से पूरे राष्ट्र पर क़ब्ज़े का आधार बनी हुई थी। उस समय इन प्रशासनिक अधिकारियों को आम भारतीयों के प्रति घृणा करने की शिक्षा दी जाती थी। उस अनैतिक ज्ञान को नौकरशाही ने आज तक अपने कुण्ठित और अहंकारी मन में सहेजकर रखा है।
इसी कारण भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का मानना था कि नौकरशाह अति अहंकारी होते हैं और हम भारतीयों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। अप्रैल, 1940 में उन्होंने यह तक कहा था कि राष्ट्रीय सरकार का सबसे पहला काम आईसीएस को पूरी तरह समाप्त करना होगा। उनका मानना था कि जब तक आईसीएस और उसकी सर्वाधिकारवाद की भावना भारतीय प्रशासन में रहेगी, तब तक राष्ट्र में कोई नयी व्यवस्था स्थापित ही नहीं की जा सकेगी। वर्तमान दौर को देखकर प्रतीत होता है कि पं. नेहरू इस सम्बन्ध में पूरी तरह सही थे। हालाँकि संविधान सभा में सरदार पटेल और उनके कुछ समर्थक अखिल भारतीय सेवाओं के समर्थक बन गये। उन्होंने इसे जारी न रखने की स्थिति में इस्तीफ़ा देने तक की धमकी दे डाली। नतीजतन स्वतंत्र भारत में ब्रिटिश सत्ता की क्रूर एवं रुक्ष विरासत अखिल भारतीय सेवाओं का यह सुस्थापित, सुसंगठित शृंखलाबद्ध ढाँचा बना रहा। उस दौरान संविधान निर्माताओं ने स्वविवेक से अखिल भारतीय सेवाओं हेतु भर्ती की सुरक्षा, अनुशासन सम्बन्धी कार्रवाई आदि के मामले में कुछ कतिपय प्रकार के संवैधानिक सुरक्षा उपाय की व्यवस्था की; जो आज नौकरशाही के उदण्डता एवं अहंमन्यता का सुरक्षात्मक आवरण बन गये हैं।
इन संवैधानिक उपबंधों में अनुच्छेद-308 (संघ तथा राज्य की सेवाओं के उपबंध, जो समूचे भारत पर लागू होते हैं।)। अनुच्छेद-309 (विधानमंडल संविधान के उपबंधों के अधीन इन सेवाओं की भर्ती एवं सेवा शर्तों का विनियमन करेंगे), अनुच्छेद-310 (सिविल सेवकों द्वारा अपना पद राष्ट्रपति या राज्यपाल के प्रसादपर्यंत धारण करने की उद्घोषणा), अनुच्छेद-311 (सिविल सेवकों को उसे नियुक्त करने वाले प्राधिकारी के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा पदच्युत करने से निषेध) शामिल हैं। असल में संविधान की इन धाराओं ने एक ऐसी सुरक्षात्मक क़ानूनी ढाल बना दी है, जिसके अंतर्गत नौकरशाही किसी भी प्रकार से दुष्कृत्य एवं अभद्रता करने को उद्यत रहती है। हालाँकि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम-1976 द्वारा संविधान में भाग-14(क), अनुच्छेद-323(क) और 323(ख) द्वारा प्रशासनिक अधिकरणों का गठन किया गया, ताकि सिविल सेवकों के मामले में शिकायतों एवं विवादों का निपटारा त्वरित हो सके।
इसी शृंखला में प्रशासनिक सेवा अधिकरण अधिनियम-1985 में भी नौकरशाही से सम्बन्धित विवादों के निपटान हेतु अधिकरणों की स्थापना की गयी। किन्तु यहाँ भी भारतीय न्यायिक व्यवस्था का पुराना श्राप हावी रहा। यहाँ भी मामले न्यायालय की भाँति ही सालोंसाल खिंचते रहे। उनकी कार्यवाहियाँ उम्मीद के अनुरूप प्रभावी हो ही नहीं सकीं। इसलिए नौकरशाही को न्यायिक चाबुक का भी बहुत डर नहीं रहा है।
यही वजह है कि भारतीय जनतंत्र में एक समानांतर सत्ता की हामी नौकरशाही अपने सर्वाधिकारवाद एवं अहंकारी रवैये का निरंतर प्रदर्शन करती रहती है। जब कोई पुलिस अधिकारी किसी जनप्रतिनिधि को सार्वजनिक रूप से गालियाँ देता है, तो यह उसकी मानसिकता में बैठा नौकरशाही का सर्वाधिकारवाद ही बोल रहा होता है। जब कोई प्रशासनिक अधिकारी बिना सरकारी अनुमति के सरकारी राशन के वितरण पर रोक की सूचना जारी कर देता है, या कैमरे के सामने पद की गोपनीयता का ध्यान रखने के बजाय पदाधिकार की हीरोगीरी का प्रदर्शन करता है, तो यह उसका प्रशासनिक सत्ता के बूते कुछ भी करके और अपनी अकर्मण्यता को छिपाकर भी बच जाने का अहं होता है। जब कोई आईपीएस अधिकारी सोशल मीडिया पर अपराधियों को जाति के आधार चिह्नित करे, तो यह उसकी संवैधानिक मूल्यों के प्रति अशिष्टता ही होती है।
प्रश्न है, तो फिर विकल्प क्या है? इसका उत्तर हमें अतीत में स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं के विचारों तथा संविधान सभा की बहसों में तलाशना होगा। जो पहले नहीं हो पाया, उसे अब करने का प्रयास हो। हालाँकि इस विषय पर स्वतंत्र भारत की सरकारों की कार्यशैली का अतीत निराशाजनक रहा है। प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोट्र्स (1966 एवं 2005), ए.डी. गोरेवाला समिति रिपोर्ट (मार्च, 1951), भारत में लोक प्रशासन सर्वेक्षण रिपोर्ट (एप्पलेबी रिपोर्ट-1953), राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-
1981), रिबेरो कमेटी (1998), पद्मनभैया कमेटी (2000), मलिमथ कमेटी (2003), पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी की अध्यक्षता में मॉडल पुलिस एक्ट ड्राफ्टिंग कमेटी (2005) की रिपोट्र्स जैसी कितनी राजनीतिक, बौद्धिक उछलकूद के लिखित प्रमाण धूल फाँक रहे हैं। लेकिन इच्छाशक्ति विहीन सरकारें अब तक इस चरम रूढि़वादी संस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की हिम्मत नहीं जुटा पायीं। विख्यात सामाजशास्त्री मैक्स वेबर ठीक कहते हैं- ‘जो नौकरशाही के द्वारा एक बार शासित हुए हों, उससे विमुक्त कभी नहीं हो सकते। अफ्रो-एशियन देश भारत शुरू होकर विदेशी शासन से विमुक्त हो पाये; पर औपनिवेशिक शासकों द्वारा स्थापित नौकरशाही के व्यवहारों से नहीं।’
क्या भारत इस कुंठा से मुक्त हो सकता है? हालाँकि निकट भविष्य में तो सम्भव नहीं लगता। किन्तु यदि आगामी कुछ दशकों में यह सम्भव हो पाया, तो नौकरशाही से प्रताडि़त यह राष्ट्र विकास के नये रास्ते एवं प्रतिमानों के निर्माण में अधिक सक्षम होगा।
किसानों पर है प्रतिबंध और जमकर फूटे पटाखे, काम नहीं आये सरकारी उपाय
सुनील कुमार
ठंड बढऩे एवं हल्का कोहरा पडऩे के साथ ही उत्तर प्रदेश में वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। प्रदूषण के बढऩे से खाँसी, जुकाम एवं गले में खरासें पडऩे के मामले बढऩे लगे हैं। कहने को दिन में मौसम सामान्य रहता है एवं धूप भी निकल रही है; मगर सुबह शाम एवं रात को सर्दी चरम पर रहती है, जिसके चलते लोगों में मौसम में बदलाव वाले इन रोगों का संक्रमण फैल रहा है। देखा गया है कि जब सुबह शाम कोहरा छाया रहता है, तब साँस लेने में कठिनाई आती है; मगर जब दिन में धूप खिल जाती है, तो प्रदूषण कम हो जाता है।
प्रदूषण के मामले में डॉक्टर हरीश गंगवार कहते हैं कि सर्दी जुकाम, खाँसी एवं सामान्य बु$खार मौसम में बदलाव से होते हैं। मौसम कभी भी बदले इन रोगों के पीडि़तों की संख्या बढ़ ही जाती है; मगर जब सर्दी का मौसम आता है तब प्रदूषण बढऩे से संक्रमण बढ़ जाता है। अधिकतर लोग इन रोगों को केवल मौसमी संक्रमण मानकर इन्हें ठीक करने के लिए या तो दवाई नहीं कराते या मेडिकल स्टोर से अपनी जानकारी के हिसाब से गोलियाँ लेकर खा लेते हैं, जबकि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। डॉक्टर होने के नाते ऐसे रोगियों से मैं यही कहना चाहूँगा कि वे स्वयं डॉक्टर बनने का प्रयास न करें एवं न ही इन रोगों को हल्के में लें। कोई भी रोग छोटा नहीं होता एवं रोगों को लेकर लापरवाही किसी की जान भी ले सकती है।
प्रदूषण का स्तर जानलेवा
समाचारों एवं रिपोट्र्स की मानें, तो देश की राजधानी से सटे नोएडा,ग़ाज़ियाबाद एवं अन्य क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर अत्यधिक ख़तरनाक हो चुका है। केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में ही प्रदूषण नहीं बढ़ रहा है, बल्कि प्रदेश में कई अन्य छोटे बड़े जनपदों में भी प्रदूषण का स्तर तीव्रता से बढ़ता जा रहा है। कई क्षेत्रों में तो हवा की गुणवत्ता इतने निम्न स्तर की है कि साँस लेने में भी कठिनाई आ रही है।
सेवानिवृत्त अध्यापक बलवंत सिंह कहते हैं कि दीपावली के उपरांत प्रदूषण में और अधिक वृद्धि हुई, क्योंकि प्रतिबंध के उपरांत लोग पटाखे जलाने से नहीं माने। इसके कई कारण हैं, जिनमें दो प्रमुख कारणों में एक है- उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में दृढ़ इच्छाशक्ति में कमी एवं दूसरा कारण यह है कि सरकार द्वारा अभी तक इस दिशा में कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया है। इसका कारण भी यह है कि जनता इसे उसकी धार्मिक भावना पर आघात समझेगी। वर्तमान सरकार का तो चयन ही हिन्दुत्व के बलबूते पर हुआ है। इस कारण से वह कभी भी हिन्दुओं की धार्मिकता को चोट नहीं पहुँचाना चाहेगी।
12 नंबवर को दीपावली से पहले ही पटाखे फूटने का शोर आरम्भ हो गया था। दीपावली के बाद 15 नवंबर को उत्तर प्रदेश के अधिकतर जनपदों में प्रदूषण के आँकड़े एकत्रित किये गये थे। इन आँकड़ों के अनुसार ग्रेटर नोएडा में वायु प्रदूषण का वायु गुणवत्ता सूचकांक अर्थात एक्यूआई पीएम 311 पर एवं नोएडा में पीएम 317 एक्यूआई था। वहीं लोनी में पीएम 364 पर एवंग़ाज़ियाबाद में पीएम 367 एक्यूआई था। लखनऊ में एक्यूआई पीएम 283 पर था, तो मेरठ में पीएम 380 पर था। प्रयागराज में एक्यूआई पीएम 213 पर था, अलीगढ़ में एक्यूआई पीएम 240 पर एवं गोरखपुर में पीएम 178 पर था। इसके अतिरिक्त बाग़पत में एक्यूआई पीएम 360 पर, हापुड़ में पीएम 267 पर, बुलंदशहर में पीएम 247 पर, मुज़फ़्फ़रनगर में पीएम 275 पर, झांसी में पीएम 202 पर, वृंदावन में पीएम 186 पर, बरेली में पीएम 153 पर एवं आगरा में पीएम 191 पर एक्यूआई था।
ये वो जनपद हैं, जहाँ का वायु प्रदूषण दमघोंट रहा है एवं कई मौसमी रोगों को बढ़ा रहा है। इस बढ़ते प्रदूषण के चलते छोटे बच्चे, दमा एवं नज़ला के रोगी एवं बुजुर्ग अधिक समस्या से जूझ रहे हैं। इन सभी में संक्रमण का ख़तरा सदैव बना रहता है; मगर वायु प्रदूषण इनके शरीर पर अधिक असर करता है।
पराली जलाने पर दण्ड
उत्तर प्रदेश में हर वर्ष दीपावली पर करोड़ों रुपये के पटाखे जलाये जाते हैं; मगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसी को पटाखे जलाने पर किसी प्रकार का दण्ड देने का विधान नहीं बनाया है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों पराली एवं अन्य प्रकार का कूड़ा जलाने पर प्रतिबंध लगाने के अतिरिक्त भारी आर्थिक दण्ड एवं कारावास का प्रावधान किया है। इस दण्ड विधान के तहत खेतों में पराली अथवा अन्य प्रकार के फ़सलों के अवशेष जलाने को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। पराली अथवा फ़सलों के अन्य अवशेष जलाने पर किसानों के विरुद्ध आर्थिक एवं कारावास के दण्ड की यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार दो वर्ष पूर्व ही कर चुकी है।
अब इस व्यवस्था के नये-नये नियम भी बनते जा रहे हैं। इन नये नियमों के अनुसार पराली एवं दूसरे फ़सल अवशेषों को जलाने पर पर्यावरण को होने वाली हानि के नाम पर किसानों से दण्ड स्वरूप वसूली की जा रही है। इस व्यवस्था के तहत किसानों से 2,500 रुपये से लेकर 15,000 रुपये तक का आर्थिक दण्ड वसूला जा सकता है। उत्तर प्रदेश के राजस्व विभाग के तय मानकों के अनुसार दो एकड़ से कम खेत वाले किसानों को पराली अथवा अन्य फ़सल अवशेषों को जलाने पर 2,500 रुपये का दण्ड देना होगा, तो वहीं पाँच एकड़ खेत वाले किसानों को 5,000 रुपये एवं पाँच एकड़ से अधिक खेत वाले किसानों को 15,000 रुपये तक के अर्थ दण्ड वसूली पर्यावरण की हानि के नाम पर वसूलने का प्रावधान है।
किसानों के विरुद्ध नियम
पराली एवं अन्य फ़सलों के अवशेष जलाने को लेकर केवल उत्तर प्रदेश सरकार ही किसानों के विरुद्ध नहीं है, बल्कि किसानों के विरुद्ध केंद्र सरकार भी खड़ी है। केंद्र सरकार पराली अथवा अन्य फ़सलों के अवशेष जलाने से रोकने के लिए कई कड़े नियम बनाने के साथ ही राज्य सरकारों को निर्देश दे चुकी है कि वे हर स्थिति में किसानों को ऐसा करने से रोकें। केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को जारी किये गये दिशा-निर्देशों के अतिरिक्त केंद्र सरकार ने पराली एवं फ़सलों के अन्य अवशेष जलाने से रोकने के लिए सुझाव भी दिये हैं।
किसान विकास कहते हैं कि केंद्र सरकार तो पहले ही किसानों को अपना शत्रु मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आय दोगुनी करने का झाँसा देकर उनके विरुद्ध कृषि क़ानून बनाकर इस बात का संकेत पहले ही दे चुके हैं। यह तो भला हो किसानों का, जिन्होंने पिटाई खाकर एवं मौसम की मार झेलकर भी आन्दोलन किया एवं कृषि क़ानूनों को रद्द कराया। मगर किसानों से किये वादों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नहीं निभाया।
पंजाब पर लगाया आरोप
उत्तर प्रदेश में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार ने पंजाब के किसानों पर पराली जलाकर प्रदूषण फैलाने का आरोप लगाया है। सरकार की ओर से कहा गया है कि पंजाब में लगातार जलायी जा रही पराली के कारण उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं अन्य जनपदों में वायु प्रदूषण चरम पर पहुँच गया है। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता राजेंद्र दिवाकर कहते हैं कि अपनी त्रुटियों को दूसरों के ऊपर डाल देना अत्यधिक आसान होता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यहाँ किसानों के विरुद्ध षड्यंत्र रच दिया है एवं अब पंजाब के किसानों को दोष देकर वो अपनी नाकामी से बचाव का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे हैं; मगर उन्होंने न तो दीपावली पर जलने वाले पटाखों पर प्रतिबंध लगाया है एवं न ही वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले अन्य कारणों पर प्रतिबंध लगाया है।
इसके अतिरिक्त योगी सरकार स्वयं भी प्रदूषण को कम करने के लिए कोई उपाय नहीं कर रही है। सरकार ने पराली के उपयोग के लिए प्लांट भी उतने नहीं लगाये हैं, जितने कि उसे लगाने चाहिए। फैक्ट्रियों से 24 घंटे निकलता धुआँ एवं पटाखों से वायु प्रदूषण जितना फैलता है उतना घरों में लकड़ी कंडे जलाने एवं खेतों में पराली अथवा अन्य फ़सल अवशेषों के जलने से नहीं फैलता।
समाधान की आवश्यकता
वायु प्रदूषण कोई एक दिन की समस्या नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रदेश सरकार यह भी जानती है कि अगर किसानों के अतिरिक्त प्रदूषण बढ़ाने वाले किसी अन्य व्यक्ति को छेड़ा, तो ये सरकार के लिए महँगा सौदा साबित होगा। क्योंकि किसानों के अतिरिक्त प्रदूषण फैलाने वाले लोगों में गाड़ी मालिक, फैक्ट्रियों, मिलों एवं कम्पनियों के मालिक, पटाखे फोडऩे वाले आदि इसके लिए दोषी हैं। इसके अतिरक्त लकड़ी कंडे आदि ईंधन से भोजन बनाने, अलाव तापने एवं वन्य क्षेत्रों को अवैध रूप से काटने वाले भी वायु प्रदूषण बढ़ाने के दोषी हैं।
इसके अतिरिक्त सर्दियों में मौसम में आद्रता बढ़ जाती एवं वायुमंडल के ऊपरी सतह में दबाव बढ़ जाता है, जिसके कारण धूल एवं धुआँ पृथ्वी के निचले भाग पर बढऩे लगते हैं। मौसम विज्ञानियों ने दावा किया है कि उत्तर प्रदेश कम दवाब का क्षेत्र बन रहा है। अगर इस मौसम में वर्षा हो जाए, तो प्रदूषण से छुटकारा मिल सकता है।
मणिपुर में जातीय हिंसा को साढ़े छ: महीने हो चुके हैं और केंद्र सरकार से लेकर मणिपुर सरकार भी इस हिंसा को अब तक रोकने में नाकाम है। अभी कुछ दिन पहले ही इस हिंसा में एक जवान शहीद हो गया। मणिपुर हिंसा पर ग्राउंड की सही ख़बरें बाहर नहीं आ पा रही हैं और वही ख़बरें बाहर आ रही हैं, जो कि केंद्र और मणिपुर सरकारें चाहती हैं। मणिपुर हिंसा का प्रभाव दूसरे पड़ोसी राज्यों पर भी पड़ रहा है और ख़ासतौर पर मिजोरम के विधानसभा चुनावों पर इसका असर हावी रहेगा, जिसके आसार साफ़ नज़र आ रहे हैं।
जब केंद्र सरकार से लेकर मणिपुर सरकार भी हिंसा रोकने में नाकाम रही, तब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 13 नवंबर को नौ मैतेई चरमपंथी संगठनों और उनके सहयोगी संगठनों पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया कि ये संगठन राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ चला रहे हैं। लेकिन प्रश्न ये है कि क्या यह छोटा-सा क़दम उठाने से मणिपुर की हिंसा रुक सकी है या निकट भविष्य में रुक सकेगी? क्या हिंसा में शामिल एक पक्ष के संगठनों पर प्रतिबंध लगाने से हिंसा रुक सकेगी? अगर प्रतिबंध लगाना ही है, तो मैतेई चरमपंथी संगठनों पर ही नहीं, बल्कि कुकी चरमपंथी संगठनों पर भी लगाना चाहिए।
ऐसा लगता है कि मैतेई जो कि हिंसा से पहले और हिंसा के बाद शुरू के कई महीने तक भाजपा सरकार के पक्ष में थे, परन्तु अब उससे नाराज़ हैं। इसलिए मैतेई चरमपंथियों पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिससे उनकी नाराज़गी पड़ोसी राज्य मिजोरम में चुनाव प्रभावित न कर सके।
गृह मंत्रालय ने मैतेई चरमपंथी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया है, उसके अनुसार ये संगठन अगले पाँच साल के लिए प्रतिबंधित रहेंगे। इन संगठनों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और इसकी राजनीतिक शाखा, रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ), यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) और इसकी सशस्त्र शाखा मणिपुर पीपुल्स आर्मी (एमपीए) शामिल हैं। इन संगठनों के अतिरिक्त पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांग्लेईपाक (पीआरईपीएके) और इसकी सशस्त्र शाखा रेड आर्मी, कांग्लेईपाक कम्युनिस्ट पार्टी (केसीपी), कांगलेई याओल कनबा लुप (केवाईकेएल), कोआर्डिनेशन कमेटी (कोरकॉम) और एलायंस फॉर सोशलिस्ट यूनिटी कांग्लेईपाक (एएसयूके) पर भी पाँच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इन संगठनों पर ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम-1967 (37) के तहत प्रतिबंध लगाया है।
इससे कई साल पहले पीएलए, यूएनएलएफ, पीआरईपीएके, केसीपी, केवाईकेएल पर प्रतिबंध लगाया गया था। गृह मंत्रालय ने अपने एक बयान में कहा है कि केंद्र सरकार की राय है कि यदि मैतेई चरमपंथी संगठनों पर तत्काल प्रतिबंध लगाया गया और उन पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो उन्हें अपनी अलगाववादी, विध्वंसक, आतंकवादी और हिंसक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए उन्हें संगठित होने का अवसर मिलेगा। असल में पूर्वोत्तर के चरमपंथी गुटों सरकार के रिकॉर्ड में यह दर्ज है कि ये संगठन भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए हानिकारक ताक़तों के साथ मिलकर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का प्रचार करते हैं और आगे भी करेंगे। इस समय मणिपुर में हिंसा का दौर है, तब इनकी हिंसक गतिविधियाँ बढ़ी हैं। इससे पहले भी ये संगठन हिंसक गतिविधियों में शामिल रहे हैं। ऐसे में अगर इन चरमपंथी संगठनों को प्रतिबंध नहीं किया गया, तो ये लोगों की हत्याओं में शामिल होंगे और पुलिस तथा सुरक्षाबलों के जवानों को निशाना बनाएँगे।
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार अंकुश न लगाये जाने की स्थिति में ये संगठन अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार से अवैध हथियार और गोला-बारूद हासिल करेंगे और अपनी ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों के लिए जनता से बड़ी मात्रा में पैसे की वसूली भी करेंगे और अगर इन पर अभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया, तो ये और निरंकुश, हिंसक तथा मज़बूत हो जाएँगे। इसलिए परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार की राय में मैतेई चरमपंथी संगठनों को ग़ैर-क़ानूनी संगठन घोषित करना आवश्यक है और केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुसार यह अधिसूचना 13 नवंबर, 2023 से अगले पाँच वर्षों के लिए प्रभावी होगी।
मैतेई चरमपंथी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के बाद पूर्वोत्तर की राजनीति और गरमा गयी है। पूर्वोत्तर में हिन्दू और हिन्दू संगठनों में भाजपा और उसकी सरकारों के ख़िलाफ़ नाराज़गी और बढ़ गयी है। वाम नेता और केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने केंद्र सरकार के इस क़दम से नाराज़गी जतायी है। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मणिपुर में हिंसा के बारे में एक शब्द भी बोलने में 80 दिन लग गये। केंद्रीय मंत्रियों ने इस साल 3 मई को मणिपुर में भडक़ी हिंसा के मामले में तीन महीने तक इस पूर्वोत्तर राज्य का दौरा करने तक की परवाह नहीं की।
केरल के मुख्यमंत्री विजयन ने ये सब बातें पत्रकार जॉर्ज कल्लीवायलिल की मणिपुर हिंसा पर लिखी गयी किताब ‘मणिपुर एफआईआर’ का विमोचन करते हुए कहीं। वाम नेता ने कहा कि ऐसे समय में जब मुख्यधारा का मीडिया मणिपुर से हिंसा की ख़बरों को हल्का ही नहीं, बल्कि पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर रहा है। कल्लिवालिल ने वहाँ मानवता के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों का दस्तावेज़ीकरण करने की पहल की है। कुछ मीडिया आउटलेट्स छ: महीने से भडक़ी मणिपुर हिंसा को नज़रअंदाज़ करते रहे और कुछ ही घंटों के भीतर ही इजरायल पहुँच गये। इससे प्रमुख मीडिया आउटलेट्स और मीडिया घरानों की प्राथमिकताओं को स्पष्ट समझा जा सकता है कि वे किसके हितों के साथ गठबंधन कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री विजयन ने इस दौरान मणिपुर हिंसा की घटनाओं का ज़िक्र करते हुए एक आधिकारिक रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि इस घटना में 200 लोगों की मौत हो गयी और 1,000 से अधिक घायल हो गये, जबकि लगभग 5,000 घर जल गये। हिंसा भडक़ने के तुरन्त बाद विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने मणिपुर का दौरा किया, उन्हें रोकने की कोशिश की गयी, परन्तु न तो प्रधानमंत्री ने और न ही उनके मंत्रियों ने इस गम्भीर मामले को देखने और शान्त करने की कभी चिन्ता की।
इसमें कोई दो-राय नहीं कि मणिपुर हिंसा पर केंद्र सरकार ने बहुत देरी से एक ही क़दम बढ़ाया है और इजरायल पर हमले को लेकर इतने आँसू बहाये कि पूरी दुनिया हैरान थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मणिपुर हिंसा को रोकने को लेकर मैतेई चरमपंथी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने से पहले तक कोई क़दम न उठाने के चलते मणिपुर के पड़ोसी राज्य मिजोरम में चुनाव प्रचार के लिए भी नहीं जा सके। उनकी हिम्मत शायद इसलिए न पड़ी हो, क्योंकि मिजोरम के मुख्यमंत्री और मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के अध्यक्ष जोरमथांगा ने जब प्रधानमंत्री के मिजोरम में विधानसभा चुनाव प्रचार करने जाने की ख़बर सुनी, तो उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ मंच साझा करने से साफ़ मना कर दिया था।
विदित हो कि मिजोरम में भाजपा की मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के साथ गठबंधन की सरकार है। परन्तु मणिपुर हिंसा और उस तरफ़ प्रधानमंत्री, उनके केंद्रीय मंत्रियों और मणिपुर के भाजपा के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कोई पहल न करने से नाराज़ मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथंगा ने साफ़ कह दिया है कि फ़िलहाल भगवा पार्टी के साथ किसी भी तरह के गठबंधन का सवाल नहीं है।
फ़िलहाल मिजोरम में 7 नवंबर को वोटिंग हो चुकी है। इस 9वीं राज्य विधानसभा में कुल 40 सीटें हैं, जिसके लिए कुल 174 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिसमें 16 महिलाएँ भी हैं। इसलिए मिजोरम के विधानसभा चुनाव का परिणाम देखने वाला होगा, जो कि 3 दिसंबर को बाक़ी अन्य चार राज्यों के साथ ही सामने आएगा।
इसमें कोई दो-राय नहीं कि इसी साल 3 मई से भडक़ी मणिपुर हिंसा का असर मिजोरम पर भी हुआ है और अब भाजपा के ख़िलाफ़ पूर्वोत्तर राज्यों में और भी माहौल बन चुका है। ऐसे में भाजपा का पूर्वोत्तर राज्यों में एकछत्र सत्ता पाने का सपना टूटेगा और इसका असर सिर्फ़ पूर्वोत्तर तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दक्षिण भारत से लेकर पश्चिम और उत्तर भारत तक चुनावों में दिखेगा। हालाँकि पूर्वोत्तर में भाजपा की पकड़ बहुत अच्छी पहले से ही नहीं है, परन्तु पकड़ बनाने की जो कोशिश भाजपा ने पिछले 8-9 वर्षों में की है, उस मेहनत पर मणिपुर हिंसा ने पानी फेर दिया है। भाजपा को अगर सत्ता में रहना है, तो उसे देश में हिंसा को रोकना होगा और सबको साथ लेकर विकास की राह पर चलना होगा।
दुनिया में शाकाहार चीज़ें की कमी हो रही है और जनसंख्या बढ़ रही है। खेती की ज़मीन कम होने से ये सब हो रहा है। भूमि अधिग्रहण ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। भोजन की आपूर्ति और ग़रीबों की थाली से छिनते भोजन की इस चिन्ता को एक खाद्य भविष्यविज्ञानी की भविष्यवाणी ने और बढ़ा दिया है। खाद्य भविष्यविज्ञानी ने कहा है की आज से 100 साल के बाद 2123 तक भोजन की थाली से 10 खाद पदार्थ ग़ायब हो जाएँगे। भविष्यवक्ता ने कहा है की ये सभी 10 खाद्य पदार्थ संयंत्र आधारित हो जाएँगे। लोग इनको घरों में बननाने की जगह कम्पनियों से ख़रीदकर खाने लगेंगे और वो काफ़ी महँगे हो जाएँगे, जिससे आम लोग उन्हें नहीं ख़रीद पाएँगे। इन खाद्य पदार्थों में शहद, काबुली चना, दूध, दालें, अनाज आदि शामिल हो सकते हैं। इसके पीछे की वजह दुनिया की कई बड़ी कम्पनियों का इन चीज़ें को अपने क़ब्ज़ें में लेने की कोशिश है। इन कम्पनियों में हज़ारों अंतरराष्ट्रीय भूमि निवेशों की होड़ लगी हुई है।
देश में सरकार 2020 में तीन कृषि क़ानून लायी थी, जिनको किसानों के लम्बे आन्दोलन के बाद वापस ले लिया गया। लेकिन कई किसान आज भी मानते हैं कि सरकार ने अपनी योजना को हमेशा के लिए ठण्डे बस्ते में नहीं डाला है। जब अवसर मिलेगा, सरकार किसानों की ज़मीन छीनने का काम करेगी। देश में बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण होना चिन्ता का विषय है। पिछले दिनों डेलावेयर विश्वविद्यालय के नेतृत्व में एक नये शोध में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय कृषि भूमि का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण और जंगलों को नष्ट किये जाने से जैव विविधता का ख़तरा पैदा हो रहा है। यह अध्ययन एनएसएफ के सोशियो इकोलॉजिकल सिंथेसिस सेंटर के माध्यम से लाये गये अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उदाहरण है। लेकिन जैव विविधता के ऐसे अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण समझौतों भर से काम नहीं चलेगा।
हमारे देश में भूमि अधिग्रहण क़ानून-2013 के तहत गाँवों में भूमि अधिग्रहण पर चार गुना और शहरों में भूमि अधिग्रहण पर दोगुना मुआवज़ा देने का प्रावधान था। लेकिन अब यह मुआवज़ा घटकर दो गुना रह गया है। वहीं गाँवों में केंद्रीय परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण भूमि के सरकारी भाव पर ही होता है। सन् 2015 में सरकार ने भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन किया था, जिस पर कुछ राज्य सरकारों ने सवाल भी उठाये थे, देश की सरकार ने इसका स्पष्टीकरण दे दिया था। इस संशोधन वाले भूमि अधिग्रहण में साफ़ कहा गया है कि भूमि का मुआवज़ा राज्यों द्वारा निर्धारित मुआवज़ा ही होगा। भूमि अधिग्रहण सरकारी परियोजनाओं के लिए होने के लिए भू-अर्जन में प्रावधान दिये गये हैं। किसानों को भूमि अधिग्रहण से नुक़सान होता है। इससे उनकी कृषि योग्य भूमि छिन जाती है और वे मज़दूर बनने को मजबूर होते हैं। देश में कृषि भूमि के लगातार छिनने से शाकाहार वाले खाद पदार्थ की पैदावार भी कम होती जा रही है, जिससे हर किसी की थाली तक भोजन नहीं पहुँच पा रहा है। चिन्ता की बात यह है कि हमारे देश में किसानों की संख्या घट रही है।
स्विट्जरलैंड में बर्न विश्वविद्यालय से बाहर चलने वाले कई शोध और विकास संगठनों की एक संयुक्त अंतरराष्ट्रीय पहल से भूमि अधिग्रहण और उससे होने वाले नुक़सानों के चौंकाने वाले ख़ुलासे हुए हैं। इस पहल से सन् 2009 से अंतरराष्ट्रीय और घरेलू भूमि सौदों पर आँकड़े इकट्ठे किये गये हैं। शोध में कृषि भूमि निवेश के सबसे बड़े वैश्विक आँकड़े सामने आये हैं। सदी की शुरुआत के बाद से भूमि अधिग्रहण तेज़ी से बढऩे के कुछ उल्लेखनीय कारण हैं। सन् 2008 और सन् 2010 में वैश्विक खाद्य संकट ने खाद क़ीमतों में अचानक बढ़ोतरी ला दी, जिसे देखते हुए दुनिया भर में निर्यात पर प्रतीबंध लगा दिया गया। भूगोल और स्थानीय विज्ञान विभाग और संयंत्र और मृदा विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर काइल डेविस ने कहा है कि इन घटनाओं के कारण खाद्य आयात पर भरोसा करने वाले कई देशों ने महसूस किया कि वे इस प्रकार के दुनिया भर में होने वाले व्यवधानों से पडऩे वाले प्रभावों को नहीं झेल सकते। इन कमज़ोरियों को दूर करने के लिए खाद्य निवेश, विशेष रूप से कृषि अधारित निवेश आंशिक रूप से बढ़े। इसके अलावा पहली पीढ़ी की जैव ईंधन फ़सलों वाले देशों, जैसे- मकई, गन्ना और ताड़ के तेल आदि ने विभिन्न देशों को उन जगहों पर परियोजनाओं में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन दिया, जहाँ कृषि भूमि अपेक्षाकृत सस्ती थी। एक बार सस्ती कृषि भूमि का अधिग्रहण हो जाने के बाद इन वस्तुओं का उत्पादन करके उन देशों को निर्यात किया जाना आसान होता है, जो बदलाव और प्रसंस्करण के माध्यम से उनका उपयोग करते हैं।
इधर, ऐतिहासिक आधार पर जंगल नष्ट किये जा रहे हैं। कुछ समय पहले शोधकर्ताओं ने 40 देशों में बड़े पैमाने पर भू-स्थित अंतरराष्ट्रीय कृषि भूमि अधिग्रहण के वैश्विक आँकड़े इकट्ठे किये थे। इन अधिग्रहणों के ऐतिहासिक पर्यावरणीय प्रभावों और अधिग्रहण के लिए निवेशों के बाद कृषि भूमि के पूरी तरह से दोहन होने पर जैव विविधता पर इसके संभावित प्रभावों पर $गौर किया गया। शोधकर्ताओं ने विश्लेषण में पाया कि किस हद तक विभिन्न क्षेत्रों में कृषि भूमि पर निवेश ने जंगलों के नुक़सान की दरों को भी बढ़ाया है। एक शोधकर्ता ने कहा कि हमने भूमि निवेश पर आधारित चार अलग-अलग क्षेत्रों- लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप, एशिया और उप-सहारा अफ्रीका को देखा। अध्ययन में पाया गया कि उप-सहारा अफ्रीका और एशिया में ज़्यादातर निवेश जंगलों के विनाश से जुड़े हैं। इसे निर्धारित करने के लिए शोधकर्ताओं ने उच्च-रिजॉल्यूशन उपग्रह के आँकड़ों का उपयोग किया। इसमें पता चला कि वनों को हर साल कहाँ से कितना कम किया जा रहा है। इससे पता चला कि भूमि निवेश के चलते नुक़सान की दर काफ़ी अधिक थी। उन्होंने यह भी अध्ययन किया कि प्रत्येक तलसला के लिए अनुबंध वर्ष के सम्बन्ध में जंगलों का नुक़सान कब और कितना हुआ।
शोधकर्ताओं ने एशिया में भी भूमि निवेश के लिए अनुबंधों के बाद जंगलों के नुक़सान की दरों में बहुत उछाल पाया। उन्होंने साफ़ किया कि भूमि अधिग्रहण की नीयत से किये गये निवेशों से जंगलों के कटान में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। अफ्रीका में जितना नुक़सान वनों का अधिग्रहण से हुआ है, उससे थोड़ा ही कम नुक़सान भारत में वनों को हुआ है। इस क्षेत्र में निवेश करने वाले ऐसी जगहों का लाभ उठाते हैं, जहाँ शासन-प्रशासन की मिलीभगत हो। इसका मतलब जंगलों का नुक़सान सीधे निवेशकों के कारण ही नहीं हुआ है, बल्कि घूसख़ोरों के कारण भी हुआ है। इस मिलीभगत ने उत्तराखण्ड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों में वन क्षेत्रों को बड़ा नुक़सान पहुँचाया है। सवाल यह है कि यदि उस कृषि और वन भूमि को ऐसे ही ग्रसा जाता रहा, तो जैव विविधता का क्या होगा? लोगों का पेट कैसे भरा जाएगा? आँकड़ों में देखा जा सकता है कि पिछले दो दशकों में भूमि अधिग्रहण के लिए निवेश तेज़ी से बढ़ा है, जो कि भविष्य के लिए ठीक नहीं। भूमि अधिग्रहण की अधिकता के लिए निवेशक राजनीतिक और प्रशासनिक ताक़तों के साथ दोस्ती बढ़ाकर उनके सहारे का उपयोग कर रहे हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण से अनुमान लगाया गया है कि इसकी बहुतायत संभावित रूप से बढ़ सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो खाद्य पदार्थों के अलावा जैव विविधता का और संकट आना तय है। क्योंकि कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जो एक खाद्य पदार्थ उत्पादक प्राकृतिक प्रणाली है, जिसमें वृक्ष भी अहम हैं। आज दुनिया की एक बड़ी आबादी मांसाहार पर निर्भर है; लेकिन उनकी शाकाहार पर निर्भरता भी है, जिसे वो कभी भी शून्य नहीं कर सकते। इस तरह कृषि पर पूरी दुनिया के लोग निर्भर हैं। इसी के चलते एक वर्ग एक साज़िश के तहत कृषि भूमि के साथ-साथ वन भूमि पर भी अपना अधिकार जमाना चाहता है, जिसके लिए वह लगातार भूमि अधिग्रहण करने में लगा है।
तेज़ी से हो रहे इस भूमि अधिग्रहण से बचने के लिए हमारे देश के किसानों को एकजुट होकर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। अगर किसान इस समस्या के प्रति अभी भी जागरूक नहीं हुए, तो आने वाले समय में उद्योगपति भूमि के मालिक होंगे और किसान उनके खेती मज़दूर। ऐसा होने पर उद्योगपति खाद पदार्थों की मनमानी क़ीमत वसूल करने से नहीं चूकेंगे। देश के किसानों और दूसरे लोगों को चाहिए कि वे मिलकर उनकी भूमि के अधिग्रहण को रोकने की सरकार से माँग करें और भूमि पर किसानों को हमेशा के लिए अधिकार देने की माँग करें। अगर अभी ऐसा नहीं किया, तो भविष्य में कृषि भूमि, खाद संकट और जैव विविधता का सामना सबको करना पड़ेगा।
ईडी देश में लगातार छापेमारी और गिरफ़्तारी के लिए इतनी चर्चा में है कि उसने सीबीआई को भी इस मामले में पीछे छोड़ दिया है। विपक्षी नेताओं के लिए ईडी का मतलब शनि की साढ़ेसाती है। सभी में इसका डर भी है। ईडी केवल विपक्षी नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री और सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले हर व्यक्ति की ज़ुबान बंद करने के लिए केंद्र सरकार का हथियार है। लेकिन मोदी सरकार को समझना होगा कि इससे उसकी और ईडी की बदनामी और आलोचना हो रही है।
पिछले कुछ वर्षों से आम आदमी पार्टी के नेताओं पर ईडी शिकंजा कस रही है। आम आदमी पार्टी के किसी नेता पर एक भी कथित आरोप अगर कोई लगा दे, ईडी उस मामले को भी किसी आपराधिक मामले की तरह देखती है। सत्येंद्र जैन के बाद मनीष सिसोदिया, संजय जैन की गिरफ़्तारी के बाद आप संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी का नोटिस अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका है। कहा तो यह जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल को गिरफ़्तार करने का जाल बिछाना भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बहुत महँगा साबित होने वाला है।
कथित तौर पर यह भी चर्चा है कि 2024 में कुछ भी करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी हाल में सत्ता में वापसी चाहते हैं, जिससे विपक्षी दलों को पूरी तरह ख़त्म कर सकें। उनका मक़सद भारत पर एकछत्र शासन करने का है, जिसे पूरा करने के लिए ही वह जाँच एजेंसियों और पुलिस तक का सहारा ले रहे हैं। कथित आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को कुचल देते हैं और ऐसे मामलों को ख़ुद गृह मंत्री अमित शाह देखते हैं। गुजरात में भी यह जोड़ी राज्य की सत्ता में रहने तक ऐसे ही आरोपों से घिरी रही। अब ईडी, सीबीआई और पुलिस के दुरुपयोग के आरोप मोदी सरकार पर लग रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री, दिल्ली
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब हर जगह अपनी गिरफ़्तारी की चर्चा करते घूम रहे हैं। 02 नवंबर के ईडी के नोटिस को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री केजरीवाल विधानसभा चुनावों के प्रचार के लिए निकल गये थे। उनके इस क़दम पर भाजपा नेताओं ने धरना-प्रदर्शन शुरू कर ड्रामा शुरू कर दिया और यह शोर मचाया कि केजरीवाल सही में भ्रष्टाचारी हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मोदी सरकार दिल्ली के मुख्यमंत्री को गिरफ़्तार करके आम आदमी पार्टी को ख़त्म करना चाहती है। इसके जवाब में आप विधायक एकमत हो चुके हैं कि अगर अरविंद केजरीवाल को गिरफ़्तार भी कर लिया जाता है, तो भी वह मुख्यमंत्री बने रहेंगे और सरकार जेल से ही चलेगी। इससे पहले 01 नवंबर को दिल्ली की शिक्षा मंत्री आतिशी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर कहा था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 02 नवंबर को गिरफ़्तार कर लिया जाएगा। उन्होंने दावा किया था कि 2024 के चुनाव से पहले अकेले मुख्यमंत्री केजरीवाल ही गिरफ़्तार नहीं होंगे, बल्कि उनके बाद झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के अलावा कई राज्यों के बड़े नेता गिरफ़्तार किये जाएँगे।
दिल्ली के मुख्यमंत्री को ईडी के नोटिस को लेकर 06 नवंबर को आम आदमी पार्टी के विधायक दल की दिल्ली विधानसभा में बैठक हुई। बैठक के बाद दिल्ली के कैबिनेट मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया है कि अगर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी होती है, तो वह जेल से ही दिल्ली सरकार चलाएँगे, क्योंकि दिल्ली की जनता ने उनको ही जनादेश दिया है। संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि मुख्यमंत्री को ट्रायल के बहाने जेल में रखा जाए, तो उनको इस्तीफ़ा देना पड़ेगा।
सवाल यह है कि सौरभ भारद्वाज को ऐसा क्यों कहना पड़ा? क्योंकि भाजपा नेता इंतज़ार कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री केजरीवाल को गिरफ़्तार किया जाए और आम आदमी पार्टी की दिल्ली की सत्ता तहस-नहस हो। लेकिन यह इतना आसान नहीं है और अगर ऐसा होता है, तो इसका उलटा असर भाजपा पर भी पड़ेगा। क्योंकि अरविंद केजरीवाल सिर्फ़ मुख्यमंत्री ही नहीं हैं, बल्कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और संयोजक भी हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी अब एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसके समर्थकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अगर ईडी मुख्यमंत्री केजरीवाल को गिरफ़्तार करती है और पाँच राज्यों में आम आदमी पार्टी को बढ़त मिलती है, तो यह मोदी सरकार के लिए और सिरदर्दी वाली बात होगी।
हालाँकि ईडी की ताबड़तोड़ कार्रवाइयों पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि ईडी एक स्वतंत्र जाँच एजेंसी होते हए भी मोदी सरकार के इशारों पर काम कर रही है। लेकिन हाल ही में एक ऐसी चर्चा सामने आयी है, जिसमें कहा जा रहा है कि ईडी सिर्फ़ विपक्षियों और विरोधियों को ही नहीं डरा रही है, बल्कि रूठे हुए भाजपा के नेताओं की ज़ुबान बंद करने का काम भी कर रही है।
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बारे में भी कुछ ऐसा ही कहा जा रहा है। कहा जा रहा है कि उन्होंने राजनीति से रिटायर होने का जो बयान दिया था, वो भी ईडी के डर से वापस ले लिया। जब वह अपने रिटायरमेंट के बयान से 24 घंटे के अंदर पलटीं, तो कहा जाने लगा कि यह ईडी के डर से ही उन्होंने किया। हालाँकि कहने वाले कुछ भी कहते हैं और राजनीति में कयास, आरोप-प्रत्यारोप लगते रहना कोई नयी बात नहीं है। राजनीति में अफ़वाहों और आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला चलता रहता है। क्योंकि राजनीति में अंदर$खाने चली जाने वाली चालों के बारे में हर कोई नहीं जान पाता, जिसके चलते अफ़वाहें उडऩा आम बात है।
हालाँकि वसुंधरा राजे का भाजपा के शीर्ष नेताओं से टकराव किसी से छुपा नहीं है। टकराव इस हद तक बढ़ चुका है कि राजस्थान की राजनीति से भाजपा के ज़रिये उनके सत्ता तक पहुँचने के रास्ते बन्द कर दिये गये हैं। उनके कई क़रीबियों तक को विधानसभा का टिकट नहीं दिया गया है। इसी से नाराज़ वसुंधरा राजे ने झालावाड़ की सभा में कहा कि मुझे लग रहा है अब मैं रिटायर हो सकती हूँ। उनके इस बयान से राजस्थान की राजनीति गरमा गयी। लेकिन 24 घंटे बीतने से पहले ही उन्हें अपने रिटायरमेंट के बयान को वापस लेना पड़ा और कहना पड़ा कि मैं कहीं नहीं जा रही हूँ।
राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि वसुंधरा के इस बयान से उनके समर्थकों को भाजपा से कटना तय था, जिससे राजस्थान में पार्टी को बड़ा नुक़सान होता। इसलिए उन पर दिल्ली से दबाव पड़ा कि वह अपना बयान वापस लें। वहीं कुछ जानकार यह कह रहे हैं कि वसुंधरा के बेटे, बेटी और दामाद के कुछ मामले ईडी के पास हैं और ऐसे में अगर वसुंधरा दाएँ-बाएँ हुईं, तो उनकी फाइल कभी भी खुल जाएगी। इस तरह से भाजपा की केंद्रीय लॉबी उन्हें राजस्थान की सत्ता से दूर रखकर भी उनके समर्थक मतदाताओं को नहीं खोना चाहती।
राजनीति के जानकार यह बात पहले से ही कह रहे हैं कि राजस्थान में भाजपा मतलब वसुंधरा राजे और कांग्रेस मतलब अशोक गहलोत ही हो चुके हैं। हालाँकि यह कोई अंतिम सत्य नहीं है। क्योंकि राजनीति में जिसका सूरज चढ़ा होता है, उसी की जय-जयकार होती है। लेकिन जैसे ही किसी को कुर्सी से दूर किया जाता है या उसकी सत्ता छिनती है, तो उसे भुलाने में लोगों को समय नहीं लगता। ऐसे कई उदाहरण राजनीति में भरे पड़े हैं। लेकिन ईडी की अगर बात की जाए, तो यह पहली बार है कि ईडी से डराने के आरोप मोदी सरकार पर लग रहे हैं। लेकिन वसुंधरा के मामले में यह बात सच है कि भाजपा उनके समर्थन के बिना नहीं जीत सकती। यह बात भाजपा की दिल्ली की जोड़ी को भी साफ़ नज़र आ रही है। इसका एक मज़बूत उदाहरण वसुंधरा राजे की पोस्टरों, बैनरों में वापसी है।
दरअसल पिछले कई महीनों से वसुंधरा राजे की तस्वीर पोस्टरों और बैनरों से $गायब थी; लेकिन अब अचानक उनकी तस्वीर एक बार फिर भाजपा के पोस्टरों और बैनरों में दिखने लगी है। जानकार कह रहे हैं कि इसके पीछे केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति है। लेकिन सवाल वही है कि ईडी का उपयोग किस तरह से किसके लिए कहाँ किया जाना है? क्या यह भाजपा का दिल्ली नेतृत्व तय कर रहा है?
अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने कमर कस ली है। वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले दोनों लोकसभा चुनावों के परिणामों को दोहराना चाहती है और केंद्र की सत्ता में बने रहने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपना रही है।
भाजपा के दृष्टिकोण से देखें, तो उत्तर प्रदेश राज्य उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं, जो केंद्र की सत्ता पर क़ाबिज़ होने में काफ़ी मददगार साबित होती हैं। यदि 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखें, तो भाजपा को 62 सीटें मिली थीं, जबकि उसके सहयोगी अपना दल (एस) को दो सीटें मिली थीं। वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 10, समाजवादी पार्टी को पाँच और कांग्रेस को एक सीट मिली थी। जबकि भाजपा गठबंधन एनडीए का वोट शेयर 51.19 प्रतिशत था।
भाजपा के इस वोट शेयर को देखें, तो इसमें एक बड़ा हिस्सा दलित वोटों का भी है। पिछले कुछ वर्षों में दलितों की उत्पीडऩ की अनेक घटनाएँ सामने आने और आरोपियों में भाजपा से जुड़े लोगों के नाम आने से भाजपा को अपने दलितों वोटों के छिटकने का डर सताने लगा है। यही कारण है कि दलित वोटों का गणित दुरुस्त करने के अभियान में भाजपा अभी से लग गयी है। इसके अलावा भाजपा की रणनीति का सबसे मुख्य मुद्दा है- बसपा के आधार वोटरों में सेंधमारी करना। भाजपा के इस अभियान के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविदास मंदिर में भजन कीर्तन करने से लेकर दलितों के पाँव तक पखार चुके हैं, तो वहीं आगामी आम चुनाव को ध्यान में रखकर भाजपा एक पूरी रणनीति के तहत पूरे उत्तर प्रदेश में जगह-जगह दलित सम्मेलनों के आयोजन कर रही है। साथ ही उत्तर प्रदेश के प्रत्येक विधानसभा सीटों पर भाजपा समर्पित 2,000 दलित प्रतिनिधियों को तैयार करने की भी रणनीति है, जिसमें ख़ासतौर से वकील, इंजीनियर, डॉक्टर व शिक्षाविदों सहित प्रबुद्ध राजनीतिकर्मियों को जोड़ा जाएगा।
भाजपा के सभी विधायकों को यह ज़िम्मेदारी दी गयी है कि वे अपने विधानसभा क्षेत्र में 2,000 दलित प्रतिनिधियों को तैयार करें। हालाँकि इस ज़िम्मेदारी से अधिकतर भाजपा विधायकों के हालत ख़राब हैं, क्योंकि भाजपा से दलित समुदायों के लोग काफ़ी नाराज़ हैं। ऐसे में भाजपा विधायकों को न सिर्फ़ दलितों के नाराज़गी का शिकार होना पड़ रहा है, बल्कि दलित प्रतिनिधियों को तैयार करने का काम भी असंभव-सा प्रतीत होने लगा है।
विगत दो माह में हापुड़, अलीगढ़, लखनऊ और गोरखपुर में दलित सम्मेलन हो चुके हैं, जबकि ऐसे सम्मेलन प्रयागराज और कानपुर में भी आयोजित होने हैं। विदित हो कि बीते 17 अक्टूबर को हापुड़ में आयोजित दलित महासम्मेलन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे बड़ा दलित हितैषी बताया। जिस पर विपक्ष के नेताओं और कई दलित बुद्धिजीवियों ने सवाल उठाये। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि भाजपा वोटों के लालच में पाखण्ड करती है। वह दलित चेहरे तो नेता के तौर पर पेश करती है; लेकिन किसी को भी ताक़त नहीं देती। सभी को नंबर चार या पाँच पर ही रखती है। लेकिन कांग्रेस में ऐसा नहीं है। कांग्रेस ने दलित वर्ग से आने वाले मल्लिकार्जुन खडग़े को न सिर्फ़ राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया, बल्कि उन्हें शक्ति भी दी।
उत्तर प्रदेश के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी व ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष एस.आर. दारापुरी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार आजकल जगह-जगह दलितों का सम्मेलन करके उनका कल्याण करने तथा दलित हितैषी होने का दावा कर रही है। उसके इस दावे की पोल गोरखपुर में गत 10-11 अक्टूबर, 2023 को सरकार द्वारा दलितों के लिए ज़मीन माँगने पर दलित नेताओं को जेल में डालने की घटना से पूरी तरह से खुल जाती है। इस गिरफ़्तारी से भाजपा ने उत्तर प्रदेश के दलितों को यह संदेश दिया कि अगर दलित भविष्य में कोई भी अधिकार की माँग उठाएँगे, तो उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। एनसीआरबी के वर्ष 2020 के आँकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार के मामले राष्ट्रीय दर से काफ़ी ऊँचा है। उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी प्रदेश की कुल आबादी का 21 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार का दर 30.7 प्रतिशत है। जो राज्य के कुल अपराध के लगभग एक-तिहाई के आसपास है।
यह भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि दलितों पर अपराध के जो सरकारी आँकड़े हैं, उससे भी अधिक अपराध दलितों के प्रति होने के दावे दलित बुद्धिजीवियों द्वारा किये जाते हैं। दलित बुद्धिजीवी कहते हैं कि बहुत सारे अपराधों के शिकार लोग या तो थाने तक नहीं जाते हैं, या उनकी एफआईआर दर्ज नहीं होती। वहीं पुलिस का दलित विरोधी नज़रिया भी काफ़ी आड़े आता है। इस हिसाब से देखा जाए, तो प्रदेश में दलितों पर अपराध आँकड़ों से ज़्यादा हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश में दलितों की दयनीय स्थिति योगी सरकार के दलित विरोधी होने का प्रमाण देते हैं।
योगी सरकार ने पिछले दिनों एससी / एसटी की ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख्त से जुड़े नियमों में बदलाव कर उसे शिथिल कर दिया। अब एससी / एसटी की ज़मीन डीएम की अनुमति के बिना ही ख़रीदी जा सकेगी। माना जा रहा है नियम में इस बदलाव से दबंगों द्वारा डरा-धमका कर अथवा बहला-फुसलाकर दलितों की भूमि लेना अब आसान हो गया है, क्योंकि डीएम की अनुमति की बाध्यता को हटा दिया गया है।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इन दिनों नारियों और नारीवादियों के निशाने पर हैं। चीनी महिलाएँ उनके उस बयान से काफ़ी नाराज़ हैं, जिसमें उन्होंने वहाँ की युवतियों और अकेली महिलाओं से बच्चे पैदा करने के लिए शादी करने की अपील की है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि परिवार का नया ट्रेंड स्थापित करने में महिलाओं की भूमिका समाज में सबसे अहम है। ग़ौर करने वाला बिन्दु यह है कि राष्ट्र प्रमुख ने हाल में बीजिंग में आयोजित नेशनल वुमेन कांग्रेस की बैठक में यह बयान दिया। यह इकाई चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के अंतर्गत काम करती है और हर पाँच साल में एक बार ऐसी बैठक का चीन में आयोजन किया जाता है।
सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी लम्बे समय से इस मंच का इस्तेमाल महिलाओं के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त करने के लिए करती आ रही है। पूर्व में ऐसे मौक़ों पर चीनी महिलाओं की घरेलू व कामकाजी दोनों भूमिकाओं पर अधिकारिक बयान आते थे; लेकिन इस बार शी जिनपिंग के संबोधन में कार्यस्थल पर महिलाओं वाला मुद्दा नदारद था और उनका सारा ज़ोर शादी करके बच्चे पैदा करने पर था। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि हमें सक्रिय होकर शादी की नयी संस्कृति और बच्चे पैदा करने वाली संस्कृति को प्रोत्साहित करना चाहिए। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं की प्रेम व शादी, बच्चे पैदा करने और परिवार सम्बन्धी विचारों को लेकर जो भी राय है, उस राय को प्रभावित करने में पार्टी के अधिकारियों को अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
दरअसल शी जिनपिंग की इस चिन्ता के पीछे चीन के सामने खड़ा आर्थिक व सामाजिक संकट है। चीन इस बात से भी भयभीत है कि जिस तरह विश्व में उसके ख़िलाफ़ घेरेबंदी की जा रही है, उससे दुनिया की फैक्ट्री का तमग़ा उसके हाथ से छिन सकता है। विश्व में उसके प्रति अविश्वास का माहौल गहराता जा रहा है और दूसरी तरफ़ घरेलू मोर्चे पर भी कई चुनौतियों का सामना चीन कर रहा है। इसमें प्रमुख वजह वहाँ जनसंख्या वृद्धि दर का कम होना है।
चीन अब आबादी के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर आ गया है और भारत पहले नंबर पर। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो ने इस साल के शुरुआत में एक जानकारी साझा की थी। इसमें कहा गया है कि पिछले छ: दशक में पहली बार जनसंख्या में गिरावट आयी है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि देश की आबादी बड़ी तेज़ी से बूढ़ी होती जा रही है। ग़ौरतलब है कि चीन ने पहले जो एक बच्चा नीति अपनायी और सख़्ती से उस पर अमल किया, उससे इस देश में कई जनसांख्यिकीय बदलाव आये। चीन ने सन् 2016 में दो बच्चा नीति लागू की। लेकिन बहुत कम समय में इसके विपरीत नतीजे उसके सामने आने लगे। इस योजना के अपेक्षित नतीजे सामने नहीं आने पर सन् 2021 में चीन तीन बच्चा नीति की पैरवी करने पर उतर आया।
इन दो वर्षों में चीन ने बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कई क़दम उठाये; पर सफलता नहीं मिली। इस असफलता से चीन प्रमुख शी जिनपिंग व सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की मौज़ूदा चिन्ता में हैं। लेकिन क्या यह किसी तरह महिलाओं को बच्चे पैदा करने व उनके पालन-पोषण की ओर धकेलना नहीं है? इसमें महिलाओं की मर्ज़ी के बिना भी उनका शोषण होगा व उन्हें जबरदस्ती बच्चे पैदा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। शी जिनपिंग ने नेशनल वीमेन काग्रेंस में महिला नेताओं को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे महिलाओं को परिवार से जुड़ी अच्छी कहानियाँ सुनाएँ और उनका मार्गदर्शन करें कि वे चीन के पारंपरिक गुणों को किस तरह आगे लेकर जा सकती हैं।’
यह हक़ीक़त है कि चीन में महिलाएँ बच्चे पैदा करने से बच रही हैं और ऐसे में बच्चे भी कम पैदा हो रहे हैं। इस देश में बच्चों को पालना व उन्हें अच्छी शिक्षा देना बहुत महँगा है। इसके साथ ही लैंगिक भेदभाव व युवा पीढ़ी में शादी न करने का रुझान भी कारण हैं। ऐसे में शी जिनपिंग को महिलाओं से अपील करने के बजाय पारिवारिक संस्कृति पर ज़ोर देना चाहिए और महिलाओं को इसके लिए सम्मानित व पुरस्कृत करना चाहिए।
दरअसल चीन में महिलाएँ घर से बाहर निकल काम करने पर फोकस कर रही हैं। लेकिन वहाँ सत्ताधारी सरकार व पितृप्रधान समाज, दोनों ही उनके दमन में खड़े हो जाते हैं। लेकिन महिलाओं का एक वर्ग ऐसा है, जो इस तरह के दमन के ख़िलाफ़ संघर्षरत है। बहरहाल सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी, खासकर शी जिनपिंग और चीन की नारियाँ व नारीवादी एक बार फिर आमने-सामने हैं।