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साझे की सफल फसल

राजस्थान के बीकानेर से दक्षिण-पूर्व की तरफ बढ़ने पर हर तरफ या तो रेत पसरी नजर आती है या फिर छोटी-मोटी झाड़ियां. इस इलाके में किसी भी तरह की खेती नहीं होती. थोड़ी-बहुत हरियाली वहीं दिखती है जहां कुछ घास खुद ही उग आई हो. दो घंटे बाद हम राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 65 से बाईं तरफ कटती एक सड़क पर मुड़ते हैं. यह रास्ता डीडवाना नाम के कस्बे को जा रहा है. अचानक ही हमारे आस-पास का धूसरपन हरियाली में बदलने लगता है. रेतीली जमीन पर चारों तरफ पेड़ हीं पेड़ दिखते हैं. हमें पता चलता है कि यह बकलिया फार्म्स है जहां 30 हेक्टेयर जमीन पर लगभग 14,000 जैतून के पेड़ लगाए गए हैं. राजस्थान में ऐसे सात फार्म हैं और ये सारे ही भारत और इजराइल के बीच खेती में हो रहे एक खास सहयोग का नतीजा हैं. 

इस बदलाव की शुरुआत तब हुई जब 2006 में राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इजराइल की यात्रा पर गई थीं. इस देश के दक्षिणी इलाके में बने जैतून के एक फार्म ने उनका ध्यान खींचा. इजराइल की जलवायु राजस्थान से मिलती-जुलती है. राजे को लगा कि खेती का यह प्रयोग तो राजस्थान में भी किया जा सकता है. उनके आग्रह पर इजराइल की सरकार भी इस दिशा में मदद के लिए तैयार हो गई. ऐसा नहीं था कि इससे पहले देश के सूखे इलाकों में इस तरह की कोशिशें नहीं हुई थीं. हुई थीं मगर वे सफल नहीं हो पाई थीं. दूसरी तरफ इजराइल था जो सघन पौधारोपण और बूंद-बूंद या टपक सिंचाई पद्धति के बल पर शुष्क जमीन में जैतून उगाने में कामयाब रहा था. राजे चाहती थीं कि ऐसा ही कुछ राजस्थान में भी हो. बाजार में जैतून के तेल की काफी मांग है.

राजस्थान से शुरू हुआ यह प्रयोग धीरे-धीरे हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार में भी जड़ें जमा रहा है और इससे फायदा पाने वाले किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है

इसके बाद राज्य में राजस्थान ऑलिव कल्टीवेशन लिमिटेड (आरओसीएल) नाम का एक उपक्रम बनाया गया. इसमें पैसा सरकार ने लगाया और विशेषज्ञता इंडोलिव नाम की एक इजराइली कंपनी और सिंचाई उपकरण बनाने वाली पुणे स्थित फिनोलेक्स प्लैसन इंडस्ट्रीज ने. इसके बाद राजस्थान के छह जिले चुने गए जहां जैतून के पौधे की सात किस्में उगाई जानी थीं. अधिक उत्पादन देने वाले जैतून के पौधों की कलमें इजराइल से आयात की गईं. टपक सिंचाई तकनीक (इसका आविष्कार इजराइल ने ही किया था) का इस्तेमाल किया गया. खाद, मृदा परीक्षण आदि की विशेषज्ञता भी इजराइल से आई.

इसका नतीजे काफी अच्छे रहे हैं. जिन सात जिलों में जैतून की खेती का यह प्रयोग हुआ, उनमें से चार में उत्पादन काफी अच्छा रहा है. इस कामयाबी से उत्साहित राजस्थान सरकार ने राज्य में जैतून की खेती को बढ़ावा देने के लिए काफी रियायतों की घोषणा की है. मसलन सरकार किसानों को जैतून की कलमों पर 75 फीसदी की सब्सिडी देगी. खाद में प्रति हेक्टेयर 3,000 रु की सब्सिडी दी जाएगी और टपक सिंचाई के लिए 90 फीसदी की. बीकानेर के उत्तर में बसे लुखरणसर में जैतून तेल उत्पादन के लिए एक रिफाइनरी भी बन रही है.

लुखरणसर में हुए जैतून पौधारोपण के सुपरवाइजर सीताराम यादव कहते हैं, ‘पिछले साल हमने हरे जैतूनों का अचार बनाया था. लेकिन रिफाइनरी बनने के बाद हम जैतून का इस्तेमाल तेल बनाने के लिए करेंगे.’ बकलिया फार्म्स के मैनेजर कैलाश कलवनिया हमें रेत में हुआ यह चमत्कार दिखाते हैं. फूलों का मौसम खत्म हो चुका है और पेड़ों से छोटे-छोटे जैतून फूट रहे हैं. कलवनिया बताते हैं, ‘हमने जो सात किस्में लगाई थीं उनमें बर्निया सबसे कामयाब रही है.’ इजराइली विशेषज्ञ गेडेऑन पेलेग ने राजस्थान में जैतून परियोजना की जिम्मेदारी ले रखी है. 68 साल के पेलेग बताते हैं कि इस रेतीली जगह में जैतून की खेती का काम इस तरह नहीं हुआ है कि सीधे इजराइल की नकल कर ली गई हो. वे कहते हैं, ‘यहां के लिए कौन-सी किस्म सबसे अच्छी है, यह समझने में हमें वक्त लगा.’ 

राजस्थान में हुए इस प्रयोग से उत्साहित इजराइल अब पूरे देश में खेती और बागवानी के अलग-अलग क्षेत्रों में यही सफलता दोहराने की तैयारी में है. इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया भी जा चुका है जब 2008 में दोनों देशों के लिए बीच एक कृषि सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए. दिसंबर, 2011 में भारत और इजराइल के कृषि मंत्रालयों ने तीन साल की एक योजना को आखिरी स्वरूप दिया. इसमें कृषि विशेषज्ञों के संयुक्त दौरे, परिचर्चाएं और किसानों के लिए कोर्स जैसी चीजें शामिल हैं. इस समझौते की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके तहत कई उत्कृष्ता केंद्र बनेंगे जिनसे भारत के कई राज्यों के किसानों को उस शोध और तकनीक का फायदा मिल सकेगा जिसके लिए इजराइल दुनिया भर में जाना जाता है. इन केंद्रों की स्थापना के लिए अभी तक सात राज्यों की सरकारों के साथ इजराइल का समझौता हो चुका है. 

सफलता की यह कहानी राजस्थान और हरियाणा के आगे भी जाती है. महाराष्ट्र में भी आम के क्षेत्र में इस प्रयोग के उत्साहजनक नतीजे दिख रहे हैं

हरियाणा सरकार द्वारा दी गई सब्सिडी इससे अलग थी. अब उन्होंने अपने फार्म में 6,000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल और जोड़ लिया है. अब वे रीटेलरों को भी अपना माल बेचते हैं और खुले बाजार में भी. बजाज कहते हैं, ‘मेरे खेतों में छह महीने में  विभिन्न सब्जियों का 50 हजार किलो उत्पादन हुआ है.’ इनमें टमाटर भी है और शिमला मिर्च भी. और सफलता सिर्फ सब्जियों तक सीमित नहीं है. भिवानी जिले में रमेश तंवर छह हेक्टेयर में कीनू उगा रहे हैं. यह सफलता उन्हें सिरसा स्थित उत्कृष्टता केंद्र की सहायता से मिली है. वे बताते हैं, ‘इस केंद्र से हमें कई तकनीकें मिलीं जिससे उत्पादन बढ़ गया है.’  सिरसा केंद्र में जैतून उगाने का प्रयोग भी हो रहा है. हालांकि अभी यह काफी शुरुआती अवस्था में है.

तंवर और बजाज के फार्म उस 200 एकड़ जमीन का एक हिस्सा हैं जिसमें भारत-इजराइल उत्कृष्टता केंद्र द्वारा दी गई तकनीकों की मदद से खेती हो रही है. हरियाणा में बागवानी विभाग के महानिदेशक सत्यवीर सिंह कहते हैं, ‘अब हमारा लक्ष्य 10 हजार हेक्टेयर का है.’ ऐसे हर केंद्र की स्थापना राज्य सरकार द्वारा दिए गए छह करोड़ रु से हुई है. आम, फूल और शहद उत्पादन के लिए तीन नए केंद्र भी खोले जा चुके हैं. हरियाणा सरकार गांवों के स्तर पर इन उत्कृष्टता केंद्रों के 14 छोटे संस्करण भी स्थापित कर रही है. बागवानी विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक अर्जुन सिंह सैनी कहते हैं, ‘इससे सही मायनों में यह सुनिश्चित होगा कि तकनीक किसान तक पहुंचे.’ ये केंद्र किसानों की ही जमीन पर बनेंगे. सरकार इसके लिए 25 लाख रु देगी.

इनका स्वामित्व किसानों के पास ही होगा. सैनी इसे पब्लिक-प्राइवेट-फार्मर पार्टनरशिप कहते हैं. कहानी राजस्थान और हरियाणा के आगे भी जाती है. महाराष्ट्र में भी आम के क्षेत्र में इस प्रयोग के उत्साहजनक नतीजे दिख रहे हैं. उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने के लिए समझौता करने वाले राज्यों की कड़ी में सबसे नया नाम बिहार का है जहां आम और नींबू प्रजाति के फल उगाने के लिए उन्नत तकनीक का लाभ लिया जाएगा. सैनी का मानना है कि देश को दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है. वे कहते हैं कि खेती के मामले में बुनियादी चीजों से आगे जाना होगा. दिल्ली स्थित इजराइली दूतावास में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, विज्ञान और कृषि के काउंसलर यूरी रुबिन्सटाइन उनकी बात से सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘हमारी कई जरूरतें एक जैसी हैं. शायद यही वजह है कि भारत सकार ने इस मोर्चे पर अमेरिका जैसे बड़े देशों के बजाय इजराइल के साथ साझेदारी का फैसला किया.’

‘डिग्री तो गुलाम बनाए खातिर सरकार दे रही है, कौनो महान बनाए खातिर नहीं’

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली एक गैरसरकारी संस्था से जुड़ा होने के चलते मुझे अक्सर ही ग्रामीण इलाकों की यात्राओं पर जाना पड़ता है. मुझे भी नई-नई जगहों पर घूमने का बहुत शौक है. एक यही तो आकर्षण था जिसकी वजह से मैं यह नौकरी करने को तैयार हो गया था. उस दिन भी जब दिल्ली ऑफिस से फोन आया कि कल झारखंड जाना है तो मैं यह भूल गया कि कल ही तो बीस दिन के बाद घर लौटा हूं और शरीर किसी भी यात्रा से इनकार कर रहा है. मैंने झट से हां कर दी और अगले ही दिन झारखंड के लिए निकल पड़ा. यात्रा शुरू करते ही मैं मन ही मन झारखंड की एक तस्वीर अपने मन में बुनने लगा. एक ऐसे राज्य की तस्वीर जहां चहुंओर पसरी गरीबी की वजह से कोई भी इंसान हथियार उठाने पर विवश हो जाए और नक्सली या माओवादी बनने को तैयार हो जाए. ट्रेन की गति के साथ मेरी उत्सुकता में भी इजाफा हो रहा था. 

हालांकि रांची स्टेशन पर पहुंचते ही मेरी कल्पनाओं के घोड़े ठहर-से गए. नजारा मेरी कल्पनाओं की तस्वीर से बिल्कुल उलट था. स्टेशन कैंपस में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स और स्टेशन के ठीक सामने खड़ा एक भव्य-सा ‘चाणक्य’ होटल- यह दृश्य मेरी तस्वीर को सिरे से नकार रहा था. फिर अगले ही पल मुझे लगा कि मैं राज्य की राजधानी में हूं और यहां से वास्तविक स्थिति नहीं समझी जा सकती. मैं अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा. अगले दिन सुबह मैं जिला रांची के रातू नामक ब्लाक के भोंडा गांव में था.

इस गांव की दशा मेरी कल्पनाओं की तस्वीर वाले झारखंड से काफी मेल खाती थी. मुझे अपने काम के लिए बच्चों के बीच जाना होता है. इस सिलसिले में मेरी मुलाकात नौ साल के एक बालक से हुई. उसका नाम संग्राम था. मैंने उसे  गणित के कुछ सवाल हल करने को दिए. उसने उन्हें झट से हल कर दिखाया. कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में घूमने के बाद मेरा अनुभव यह कहता है कि संग्राम जैसे बच्चे आसानी से हर कहीं नहीं मिलते. मैंने उससे पूछा, ‘बेटे, तुम कौन -सी कक्षा में पढ़ते हो?’ उसने जवाब दिया, ‘मैं स्कूल नहीं जाता.’मैं हैरत में पड़ गया. स्कूल क्यों नहीं जाते, और तुम्हें यह सब पढ़ना-लिखना कौन सिखाता है, यह सवाल पूछने पर संग्राम का कहना था, ‘बाबूजी सिखाते हैं, और वही स्कूल नहीं जाने देते.’ 

‘हजार लोगन में एक का उदाहरण मत दो बाबूजी, 999 का उदाहरण देकर बात करो, तब जानें कि इस शिक्षा प्रणाली में कितना दम है’

मेरी संग्राम के बाबू जी से मिलने की इच्छा प्रबल हो गई थी. मैंने उससे पूछा कि क्या वे घर पर हैं. उसने जवाब दिया, ‘हां, घर पर ही हैं.’ मैंने उससे कहा कि वह मुझे अपने घर ले चले.  जल्द ही हम वहां जा पहुंचे. घर के आंगन में ही कोई 35-36 साल का व्यक्ति पेड़ की छांव में खाट पर लेटा आराम कर रहा था. संग्राम ने उनसे जाकर कहा, ‘बाबू जी, ये तुमसे मिलने आए हैं.’ उन सज्जन ने मेरी ओर देखा और फिर खाट बिछाकर मुझे बैठने को कहा. मैंने उन्हें अपना परिचय देने के बाद कहा, ‘आपका बेटा बहुत ही होशियार है और अपनी उम्र के बच्चों के मुकाबले काफी तेज भी है.’ उन्होंने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. फिर मैंने उनसे पूछा कि वे संग्राम को स्कूल क्यों नहीं भेजते. इस पर मुझे जवाब मिला, ‘काहे भेजें स्कूल?’ ‘आप नहीं चाहते कि वो स्कूल जाकर पढ़ना-लिखना सीखे?’, मैंने पूछा. संग्राम के बाबू जी ने जवाब दिया, ‘क्यों? वो पढ़ना-लिखना नहीं जानत है का? आप ही तो अभी कहे हैं कि वह बहुत ही होशियार है?’ इस पर मैंने कहा, ‘हां, लेकिन पढ़-लिख कर डिग्री हासिल करके बड़ा आदमी बन सकता है.’ 

संग्राम के पिता ने दार्शनिक अंदाज में कहना शुरू किया, ‘किसने आपसे यह कह दिया कि डिग्री से आदमी बड़ा बन जात है? इंसान अपने ज्ञान और कर्मों से बड़ा होत है बाबूजी. हमको ई व्यवस्था और सरकारी शिक्षा में कोई बिश्वास नाहीं. हम भी यह जान रहे हैं कि पढ़ना-लिखना जरूरी है, तभी न संग्राम को हम घर पर पढ़ना सिखा रहे हैं, परन्तु डिग्री की हमको कौनो जरूरत नाहीं है. स्कूल के बच्चों से ज्यादा तो संग्राम आज भी कर सकत है. और डिग्री तो गुलाम बनाए खातिर सरकार दे रही है, कौनो महान बनाए खातिर नहीं.’

 ‘लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं जो आपके जैसे गांव से ही निकल कर महान बने हैं. उन्होंने भी इसी सरकारी शिक्षा को ही ग्रहण किया और फिर सारे विश्व में अपना नाम.’ मुझे बीच में ही रोक कर वे बोल पड़े, ‘उदाहरण मत दीजिए, बाबूजी. उदाहरण तो हम भी दे सकत हैं. नेताजी (सुभाष चंद्र बोस) ने तो अफसरी की परीक्षा पास करके भी नौकरी को लात मार दी थी, देश की सेवा खातिर. आज उनकी तरह कितने लोग कर सकते हैं? ऐसा-वैसा उदाहरण देकर ही ई लोग इस गंदी व्यवस्था को बनाए हुए हैं और सभी लोग उदाहरण को सुनकर वैसा ही बनने की भेड़ चाल में लग जात हैं. हजार लोगन में किसी एक का उदाहरण मत दो बाबू जी, बाकी का 999 लोगन का उदाहरण देकर बात करो, तब जानंे कि इस व्यवस्था में और आपकी शिक्षा प्रणाली में कितना दम है.’ उस दिन मुझे उस गांव के व्यक्ति की बात से एहसास हुआ कि उसने कितना सच बोला था. एक ऐसा सच जिस पर हम कभी ध्यान नहीं देते. यह बात कितनी सच है कि उदाहरण तो हमेशा अपवादों के ही दिए जाते हैं.

‘ताकत की दवाओं का मायावी बाजार’

हमारे किस्से, कहानियां, पौराणिक व्याख्यान अफवाह जैसे गल्प तथा लोककथाएं ऐसी जड़ी-बूटियों, जादुई किस्म के पेय पदार्थों और चमत्कारी हकीमी नुस्खों के जिक्र से भरे हैं जिनका सेवन करते ही सात हाथियों के बराबर बल आ जाता है. मनुष्य को सदियों से ही ऐसे जादुई नुस्खों की तलाश रही है जो लेते ही शरीर को ताकत और जोश से भर दें. आदमी पौष्टिक भोजन, फल-फूल, हरी सब्जियों का सेवन, व्यायाम, सात्विक जीवन व्यवहार, खेलकूद आदि के पेचीदे और घुमावदार रास्तों को छोड़कर चोर रास्ते खोजता है. जिस्मानी तथा दिमागी ताकत बढ़ाने के इन ‘शॉर्ट कट्स’ की तलाश करने वाले भोले मूर्खों के लिए सदियों से बाजार में कुछ न कुछ जादुई दवाइयां, पेय पदार्थ, गोलियां बिकती रही हैं. आज तो जीवन यूं भी पूरी तरह से बाजार के कब्जे में है. आज एनर्जी ड्रिंक्स, ताकत और मांसपेशियां बनाने का वादा करने वाले प्रोटीन पाउडर, प्रोटीन ड्रिंक्स, दिन भर चुस्त-दुरुस्त रखने का दावा करने वाली कैप्सूल गोलियों का एक बड़ा लेकिन मायावी बाजार तैयार हो गया है. 

 ताकत देने का दावा करने वाले इन पेय पदार्थों और गोलियों तथा पाउडरों के डिब्बों ने बेहद शातिराना समझदारी से अपने शिकार चुने हैं. कौन हैं इनके शिकार? एक तो बढ़ती उम्र के बच्चे. कौन नहीं चाहता कि उसका बच्चा लंबा और स्वस्थ हो और ऐसा होशियार हो कि हमेशा अव्वल आए. टीवी और प्रिंट मीडिया की आड़ में तैयार मोर्चों से इन शिकारों को बाजार द्वारा ‘सिटिंग डक’ की तरह आसानी से शिकार बनाया जा सकता था. वही किया भी गया. झूठे-सच्चे दावे. दूध में  ‘ताकत तथा विटामिनों से ठसाठस’ भरे डिब्बे दो चम्मच मिलाकर गटागट पी जाने वाले बच्चे जो रातों-रात लंबे हो रहे हैं. वे बच्चे जो कभी पढ़ाई में फिसड्डी थे, बाबर के बेटे का नाम तक याद नहीं कर पाते थे, वे ही आज ऐसे किसी चमत्कारी पाउडर का सेवन करके इतने होशियार हो गए हैं कि बेचारा टीचर भी हैरान रह गया. विज्ञापनों की दुनिया में इन चमत्कारी नुस्खों वाली ताकत भरी चीजों का सेवन करके बच्चे हृष्ट-पुष्ट और होशियार बन रहे हैं. 

‘प्रोटीन ड्रिंक्स का करोड़ों रुपये का बाजार खड़ा कर दिया गया है. मेडिकल की दृष्टि से देखें तो यह बात स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद डरावनी  है’

अब घर-घर में ऐसे बच्चे हैं जो दुबले हैं, मां-बाप को कमजोर प्रतीत होते हैं. जो वैसे तो पढ़ाई में ठीक- ठाक हैं परंतु माता-पिता की वास्तविक महत्वाकांक्षी आशाओं के अनुरूप नहीं हैं. यही मां बाप बाजार जाकर ये डिब्बे उठा लाते हैं. मां को पता नहीं कि ऐसे डिब्बों के सौ ग्राम पाउडर में मात्र सात ग्राम प्रोटीन होती है, दो ग्राम वसा होती है, विटामिन की सस्ती गोलियों के बराबर कुछ यहां-वहां के विटामिन होते हैं और बाकी का कार्बोहाइड्रेट यानी शक्कर जैसी चीजें. बस अब आप इसकी दो-तीन चम्मचें दूध में मिलाकर चमत्कार की उम्मीद में बैठ जाएं तो यह आपकी मूर्खता है. तीन चम्मच में एक ग्राम प्रोटीन भी ठीक से नहीं होती है. और विज्ञापन में जो बच्चा बढ़ता दिखाया जाता है वह? इसे नेताओं के खोखले वादों की भांति मान लें बस. उनको वादा करने से नहीं रोका जा सकता. और हमारे देश में झूठे दावे करने वाले विज्ञापनों को भी. पर सही बात तो यह है कि बच्चे का विकास इनके बूते कतई संभव नहीं है. ये न दें. बच्चे को बढि़या खाना दें. यदि बच्चा कम वजन का है तो रोज दो केले, पचास ग्राम मूंगफली के दाने दें और उसके आटे में तीन-चार चम्मच तेल मिलाकर फिर रोटी पकाएं. यह वजन बढ़ाने का ज्यादा वैज्ञानिक तरीका है. इन डिब्बाबंद ताकत के पाउडरों से कुछ भी उम्मीद न करें. यह तो एक उदाहरण हुआ. दूसरा उदाहरण आंखें खोलने वाला है.

जिम जाना तथा मांसपेशियां (डोले-सोले) बनाना आज की नौजवान पीढ़ी के लिए नशे जैसा है. वे इसके लिए कुछ भी करने को तत्पर हैं. सलमान और ऋतिक जैसा मस्कुलर शरीर बनाने के लिए एक दीवानापन जैसा फैला है चहुंओर. ये इनके दूसरे शिकार हैं. बाजार की ताकतों ने इनकी ताकत की चाहत को खूब भुनाया है. मांसपेशियां बनानी हैं तो खूब अंडे खाओ और प्रोटीन ड्रिंक्स लो, ऐसी ही सलाह दी जाती है जिम में. प्रोटीन पाउडर भी बहुतायत में नए-नए नामों से उपलब्ध हैं. जिम के ट्रेनर समझाते हैं कि मांसपेशियां बनानी हैं तो खूब प्रोटीन खाओ. प्रोटीन ड्रिंक्स का करोड़ों रुपये का बाजार खड़ा कर दिया गया है. मेडिकल दृष्टि से देखें तो यह बात स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद डरावनी है. यदि नौजवान प्रोटीन ही प्रोटीन खाने पर आमादा होगा तो कार्बोहाइड्रेट स्वतः ही कम खाया जाएगा. आपकी भूख तो उतनी ही है, यह खा लो या वह खा लो. नतीजा? कार्बोहाइड्रेट का ‘प्रोटीन स्पेयरिंग’  प्रभाव नहीं रह जाता. कार्बोहाइड्रेट ठीक मात्रा में न मिलने पर इनका शरीर फिर प्रोटीन से ऊर्जा प्राप्त करने लगता है और प्रोटीन जब इतनी ज्यादा इस्तेमाल होती है तो उसके जो एंड प्रोडक्ट्स’ बनते हैं वे किडनी को खराब कर सकते हैं. मांसपेशियां फिर भी नहीं बन पातीं क्योंकि प्रोटीन ड्रिंक्स से प्राप्त अतिरिक्त प्रोटीन तो ऊर्जा बनाने में काम आ जाती है. नतीजा? न खुदा ही मिला, न विसाले सनम. यह सब बेहद अवैज्ञानिक तथा शरीर के लिए हानिकारक है. प्रोटीन ड्रिंक्स तथा पाउडरों के जाल में न फंसें. अब तीसरी और अंतिम बात.

‘एनर्जी ड्रिंक्स’ नामक पेय पदार्थों का भी बड़ा बोलबाला है आजकल. तुरंत ताकत देने वाले पेय, ऐसी गोलियां जो दिन भर आपको चुस्त और दुरुस्त रखती हैं. इस भागदौड़ से भरी जिंदगी में किसको ऐसा चमत्कारी नुस्खा नहीं चाहिए. घर के कामों में खटती औरतें, दफ्तर और घर के बीच भागते अधेड़ लोग, थकान से भरे बूढ़े- सभी को ये एनर्जी ड्रिंक्स आकर्षित करते हैं. ये इनका तीसरा शिकार हैं. तुरंत ताकत कौन दे सकता है? ग्लूकोज पाउडर जैसी कोई चीज या ऐसा नशीला पदार्थ जो आपका मूड बढि़या कर दे. यही सब इन ड्रिंक्स में है. कैफीन इतनी मात्रा में है कि एक-दो ड्रिंक से ज्यादा लिया तो आप इसके आदी हो जाएंगे. नशे की लत न पालें, इनसे बचें. इनके अलावा विटामिन की गोलियों, ताकतवर बनाने वाले कैप्सूलों, टॉनिकों का भी बेहद बड़ा मार्केट है आज. पर उनके मायावी खेलों की चर्चा फिर कभी.

आम और आम

आम आदमी से यह देश पटा पड़ा है, जैसा कि हम सब जानते हैं. यत्र तत्र सर्वत्र आम ही आम नजर आते हैं. खास लोगों की यह आम राय है कि आम के कारण ही यह देश आम हो गया है. मगर विश्वपटल पर देश की जो असली पहचान बनी, आमों के चलते ही बनी है. हिंदुस्तान में उत्थान चाहे जिसका हुआ हो, मगर संख्यावृद्धि तो आमों की हुई, इस बात पर किसी को कोई शक है क्या?

आम तौर पर आम रसीला होता है, पर यह जरूरी नहीं कि आम आदमी आम होने के कारण ऊपर से रसीला दिखे. रोजमर्रा की मुसीबतों से लोहा लेने के कारण आदमी जो आम होता है, वो सख्त हो जाता है. मगर चाहे जितना भी सख्त हो जाए, रहेगा तो आम ही. अंदर से रसीला. कुछ लोग इसे जिजीविषा कहते हैं. यह एक खुला रहस्य है कि कुछ आम लोग ऊपर से तो सख्त होते है,मगर अंदर से उतने ही पिलपिले होते हैं. कुछ ऐसे भी आम होते हैं जो सख्त दिखने की एक्टिंग करते हैं, ताकि कोई उन्हें चूस न सके. आम आदमी का सारा जीवन अपने रस को बचाने की कवायद में ही गुजर जाता है, मगर क्या वो बच पाता है?

 अब यहां एक जिज्ञासा सहसा उछली एक बूंद की तरह से उछली क्या आम आदमी के जीवन में भी रस होता है? रस कैसे नहीं होगा, आजादी के बाद से ही इनको वादा-घोषणा-दिलासा के पत्थर से पकाया जा रहा है. रस तो होगा ही. अब दूसरी जिज्ञासा उछली, क्या आम आदमी का रस उसके लिए ही होता है! चिंतन-मनन खास लोगों का काम है, हम जैसे आम लोगों का नहीं. सो, यह जिज्ञासा उनके हवाले. कुल जमा इतना है कि यह आम आदमी, आम की तरह से सबके जीवन में रस घोलता है. अगर यह न हो तो राजनीति नीरस हो जाए. संसद खामोश हो जाए. नारे न गढे़ जाएं. रैली का रैला न हो. देश हमेशा खुला रहे, कभी बंद न हो. चक्का चलता रहे, कभी जाम न हो. विकास का पत्ता किसके लिए डोले! योजनाओं के अंकुर फिर किसके नाम से फूटे! 

अब इधर आमों के साथ क्या हो रहा है? आम को खास बनाने की कवायद हो रही है. आम को खास-खास महानुभावों का नाम दिया जा रहा है. कमाल है एक आम का नाम तो ‘नवाब’ ही रख दिया गया है . कुछ आम तो सिर्फ विदेशियों को खिलाने के लिए ही उगाए जाते हैं. इन आमों को खास बनते आम लोग बड़ी हसरत भरी निगाहों से देख रहे हैं. वे सोच रहे हैं, अरे आम तो पहले से ही हमारे लिए खास थे, ऐसे में इनको किसके लिए खास बनाया जा रहा है. और जब खास बनाना ही है तो हमें बनाओ, आम तो पहले से ही फलों का राजा है. खास को और खास बनाने की क्या जरूरत! क्या महज खास नाम रखने से कोई आम खास हो जाता है? आम हो सकते हंै, मगर आमजन नहीं. यहां आम आदमी का खास बनने का रास्ता आम नहीं है. यह बात आम लोगों से बेहतर खास लोग जानते हंै. मगर हुजूर आपसे किस अहमक ने कहा कि आम लोगों को खास बनाइए! खास बनाइए या न बनाइए,कम से कम उनका जीवन स्तर थोड़ा सुधार दीजिए. बस. आम तौर पर आम आदमी यही चाहता है. मगर यहां तो वह अपना जीवन स्तर ऊपर उठाने की आरजू लिए ही खुद यहां से उठ जाता है. 

यह कहानी आजादी के बाद से बदस्तूर जारी है. मगर कुछ खास लोगों (नाम न छापने की शर्त पर) का कहना है कि नवउदारीकरण के बाद आम लोगों का जीवन बदला है. आधिकारिक रूप से जिसकी घोषणा हर साल 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से की जाती है. सच है, आम आदमी का जीवन बदला है. पहले उसको चूसा जाता था, अब उसकी चटनी बन रही है.

बगैर भूमिका की कविताएं

पुस्तक: नयी सदी के लिए चयन /पचास कविताएं 

कवयित्री: सविता सिंह 

मूल्य: 65रुपये 

पृष्ठ: 80

प्रकाशन: वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

वाणी प्रकाशन ने ‘नयी सदी के लिए चयन’ सीरीज में 100 कवियों की 50 प्रतिनिधि कविताओं का संचयन प्रकाशित करने की योजना बनाई है, जिसमें तुलसीदास से लेकर वर्तमान समय में लिख रहे कवियों को शामिल किया गया है. इस योजना के अनुसार हरेक कवि की 50 कविताएं बिना किसी भूमिका के पाठकों तक सीधे पहुंचाने की है. इसी प्रयास के तहत सविता सिंह की पचास प्रतिनिधि कविताओं का संकलन आज हमारे बीच है. 

संकलन की कविताएं, एक लंबी कविता ‘चांद, तीर और अनश्वर स्त्री’ सहित विस्तृत फलक पर विविध अनुभूतियों और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती हैं, जिसका मुख्य स्वर ‘स्त्रीवादी’ है. कवयित्री सविता सिंह अपनी कविताओं के संदर्भ से कविता की उपस्थिति और उसके राजनीतिक संकल्प को ‘कविता का जीवन’ शीर्षक कविता में अभिव्यक्त करती हैं : मुझसे भी जटिल जिंदगी जिएंगी मेरी कविताएं/ सोई रहेंगी कोई सौ साल…/ तब भी उन्हें यह संसार अनुपम ही लगेगा अपनी क्रूरता में / तब भी वे ढूंढ़ेंगी प्रेम और सहिष्णुता ही इस संसार में.  

यह संकलन एक सचेत कवयित्री का संकलन है जो विद्रूपताओं के खिलाफ अपना मैंडेट देती हैं, सुंदर, स्वस्थ मुक्ति के स्वप्न रचती हैं और यथार्थ  की विडंबनाओं से वाकिफ भी है. ‘मुक्ति के फायदे’ और ‘याद रखना नीता’ शीर्षक कविताएं स्त्री मुक्ति के सपने को ‘को-ऑप्ट’ कर लिए जाने के सत्य की ओर इशारा करती हैं, सचेत करती हैं- ‘अच्छा है मुक्त हो रही हैं मिल सकेंगी स्वच्छंद संभोग के लिए अब/ एक समय जैसे मुक्त हुआ था श्रम पूंजी के लिए (मुक्ति के फायदे) तथा ‘याद रखना नीता/ एक कामयाब आदमी सावधानी से चुनता है अपनी स्त्रियां/ बड़ी आंखों सुन्दर बांहों लम्बे बालों सुडौल स्तनों वाली प्रेमिकाएं / चुपचाप घिस जाने वाली सदा घबराई धंसी आंखों वाली मेहनती/ कम बोलने वाली पत्नियां (याद रखना नीता). संकलन की ‘मुश्ताक मियां की दौड़’ कविता जैसी कविताएं सांप्रदायिकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद द्वारा पोषित क्रूरता को संबोधित करती हैं तो ‘जहाँ मेरा देश था’ कविता नवसाम्राज्यवाद के प्रति आगाह करती है. सविता सिंह ने हिंदी कविता को पिछले 10 साल में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, स्त्रीवादी स्वर और सौंदर्य शास्त्र के साथ.  

-संजीव चंदन

 

 

अनबूझ अनुवाद

‘प्रकाशक प्रति शब्द 10 या 15 पैसे देता है. इसके बाद आप उम्मीद करें कि बढ़िया अनुवाद हो जाए. क्या यह संभव है? ‘विश्व क्लासिकल साहित्य शृंखला (राजकमल प्रकाशन) के संपादक सत्यम के ये शब्द उस बीमारी की एक वजह बताते हैं जिसकी जकड़ में हिंदी अनुवाद की दुनिया आजकल है. अनुवाद यानी वह कला जिसकी उंगली पकड़कर एक भाषा की अभिव्यक्तियां दूसरी भाषा के संसार में जाती हैं और अपने पाठकों का दायरा फैलाती हैं. लेकिन इस कला की सेहत आजकल ठीक नहीं. जानकारों के मुताबिक हिंदी में होने वाले अनुवाद का स्तर बहुत खराब है. इसके चलते दूसरी भाषा की अच्छी रचनाओं को हिंदी में पढ़ने का आनंद काफी हद तक जाता रहता है. जैसा कि कवि और पत्रकार पंकज चौधरी कहते हैं, ‘बहुत सारी अंग्रेजी भाषाओं के  प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों को पढ़ने का मन होता है. लेकिन कई बार अंग्रेजी से  अनूदित होकर हिंदी में आई किसी किताब को पढ़कर लगता है कि इससे अच्छा तो मूल किताब ही पढ़ ली जाती.’

अपने काम को लेकर ज्यादातर अनुवादकों के अनुभव अच्छे नहीं होते. कहानीकार और दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर प्रभात रंजन कहते हैं, ‘पेंगुइन जैसा बड़ा प्रकाशक डिमाई आकार के एक पन्ने (औसतन 300-350 शब्द) के लिए 80 रुपये देता है. राजकमल और वाणी प्रकाशन का रेट थोड़ा ठीक है. वे प्रति शब्द 40 पैसे देते हैं.’ पेंगुइन प्रकाशन में हिंदी संपादक की जिम्मेदारी संभाल चुके सत्यानंद निरुपम भी कहते हैं, ‘प्रकाशक प्रति शब्द 22 पैसे मेहनताना देते हैं जबकि गैरसरकारी संगठन (एनजीओ) एक रुपया प्रति शब्द या इससे ज्यादा भी दे देते हैं. जबकि साहित्य की सामग्री का अनुवाद एनजीओ की सामग्री की तुलना में कहीं ज्यादा कठिन होता है.’ पेंगुइन प्रकाशन में हिंदी संपादक रियाज उल हक का कहना है, ‘अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की दर अब 100-135 रुपये प्रति पृष्ठ कर दी गई है.’ लेकिन कुछ अनुवादकों का मानना है कि यह दर भी बहुत राहत देने वाली नहीं है.

लेकिन अनुवाद की बदहाली का कारण सिर्फ कम मेहनताना नहीं है. विशेषज्ञता की कमी भी इसके लिए जिम्मेदार है. सत्यम कहते हैं, ‘यूरोप में विशेषज्ञ अनुवादकों की लंबी परंपरा रही है. मसलन चेखव का अनुवाद करने वाले उनके साहित्य के शोधार्थी रहे हैं. उन पर लगातार लिखने या उन्हें जानने वालों को ही यह जिम्मा मिलता रहा है. वहां प्रकाशक अनुवादकों को काम सौंपते समय बहुत सतर्क रहते हैं. लेकिन भारत में आपको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें अनुवादकों को अनुवाद के विषय की कोई जानकारी नहीं होती है. यही वजह है कि स्थिति ‘हंसिया के ब्याह में खुरपी का गीत’ जैसी हो जाती है.’
प्रकाशकों द्वारा अनुवादकों का नाम नहीं दिया जाना भी एक बड़ा कारण है. ‘गीतांजलि के हिंदी अनुवाद’  पुस्तक के लेखक देवेंद्र कुमार देवेश कहते हैं,  ‘प्रकाशक अनुवादकों का नाम किताब में शामिल नहीं करना चाहते.’ इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं, ‘दरअसल वे अनुवाद के काम को दोयम दर्जे का मानते हैं. खास तौर पर बांग्ला से हिंदी में अनूदित किताबों में नाम देने की परंपरा रही ही नहीं है. नाम दिए जाने से अनुवादकों की जिम्मेदारी तय होती है और जाहिर- सी बात है कि वे काम को गंभीरता से लेते हैं.’ कमोबेश यही आलम अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में भी है. एक अनुवादक और लेखक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के काम को चलन में लाने वाला प्रभात प्रकाशन आम तौर पर अपने अनुवादकों का नाम किताब में शामिल नहीं करता.

अनुवादकों की जिम्मेदारी के बारे में अनुवादक विमल मिश्र कहते हैं, ‘मूल रचनाकार अपनी रौ में लिखता जाता है, उस पर कोई बंदिश नहीं होती. लेकिन अनुवादक को रेलगाड़ी की तरह पटरी पर चलना पड़ता है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘जैसे इंिजन के ड्राइवर की जिम्मेदारी होती है मुसाफिरों को उनके गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचाने की, ठीक वैसी ही जिम्मेदारी अनुवादक की होती है मूल रचना के भाव को अनूदित रचना में समेकित करने की. अनुवादक को जवाब देना पड़ता है – प्रकाशक को, पाठकों को और मूल पुस्तक के रचनाकार को भी.’ हालांकि जब हम मुद्दे के दूसरे पहलू यानी प्रकाशकों को टटोलते हैं तो समस्या की एक और भी वजह सामने आती दिखती है. वाणी प्रकाशन के मालिक अरुण माहेश्वरी कहते हैं,  ‘काम और पैसे देने वालों की कोई कमी नहीं है. हमने सआदत हसन मंटो की कहानी उर्दू से हिंदी में करवाई. अनुवादक महोदय ने चवन्नी नामक पात्र को चन्नी कर दिया. इसमें पैसे का मामला कहां है? हम मेहनताना तय करना अनुवादकों पर छोड़ देते हैं. हकीकत तो यह है कि अनुवाद की किताबें हमारे लिए मुनाफा देने वाली नहीं होती हैं. ‘ऐसा पूछने पर कि इसकी वजह क्या है, माहेश्वरी कहते हैं, ‘अनुवाद की किताब तैयार करने में अनुवादक, प्रूफ रीडर और संपादक को अलग-अलग पैसा देना होता है.’ अनुवादकों को मुंहमांगी कीमत देने के नाम पर माहेश्वरी महात्मा गांधी के पौत्र और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी का नाम गिनाते हैं. गांधी ने वाणी प्रकाशन के लिए विक्रम सेठ की किताब ‘ए सुटेबल ब्वॉय’ का अनुवाद किया है.

‘मूल रचनाकार पर कोई बंदिश नहीं होती. लेकिन अनुवादक को रेलगाड़ी की तरह पटरी पर चलना पड़ता है’

लेकिन जानकारों के मुताबिक ऐसे उदाहरण इक्का-दुक्का हैं और ज्यादातर अनुवादक गोपाल कृष्ण गांधी की तरह अपना मेहनताना खुद तय करने जैसी स्थिति में नहीं होते. और रही बात कम मुनाफे की तो अगर ऐसा होता तो इस समय बाजार में अनूदित सामग्री की जो बाढ़ आई हुई है वह नहीं दिखती. इस बाढ़ का बड़ा हिस्सा अंग्रेजी के प्रकाशकों पेंगुइन और हार्पर कॉलिन्स से आता है. सत्यम कहते हैं, ‘ज्यादातर मामलों में अनुवाद मशहूर किताबों का ही होता है. अंग्रेजी के बड़े लेखकों की किताब का हिंदी में अनुवाद कराया जाता है, इसलिए लाइब्रेरी से खरीद बड़े पैमाने पर हो जाती है. इन किताबों के अनुवाद के कई संस्करण प्रकाशित होते हैं और इनसे प्रकाशक लंबे समय तक मुनाफा कमाते हैं.’वैसे वजहों पर भले ही सहमति न हो, लेकिन इस पर सब सहमत हैं कि अनुवाद के स्तर में गिरावट आई है. अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के मामले में ऐसे भी कई उदाहरण मिल जाते हैं जहां दो शब्दों से लेकर तीन-तीन पैराग्राफ या कई पन्ने छोड़ दिए जाते हैं. अंग्रेजी के कई मुहावरे जिनका हिंदी में अनुवाद हो सकता है और जो पाठकों की दिलचस्पी बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं, उन्हें अनुवादक हिंदी पाठकों के स्तर का हवाला देकर छोड़ देते हैं. इसे समझने के लिए यहां यथार्थवाद के प्रवर्तक और प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक स्तांधाल के सबसे चर्चित उपन्यास ‘सुर्ख और स्याह’ का सहारा लिया जा सकता है. इस उपन्यास में विभिन्न अध्यायों की शुरुआत में कोई पद्यांश या सूक्ति या फिर कथन दिया गया है जिसके साथ किसी विख्यात हस्ती का नाम है. ये उपन्यास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. मगर हिंदी में पहली बार प्रकाशित अनुवाद से ये नदारद थे.

अनुवाद में लापरवाही का यह सिलसिला अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद तक ही सीमित नहीं है. बांग्ला के कई क्लासिक उपन्यासों के अनूदित संस्करण दशकों से हिंदी पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय रहे हैं. लेकिन इनमें भी बड़ी भूलें मौजूद हैं. 20वें पुस्तक मेले में शरतचंद्र और रवींद्रनाथ ठाकुर के उपन्यासों के नए हिंदी अनुवाद का विमोचन किया गया. इन किताबों का नए सिरे से अनुवाद कराने की जरूरत पर राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक माहेश्वरी का कहना था, ‘ये किताबें अब रॉयल्टी से बाहर हो चुकी हैं. मगर इन किताबों के जो हिंदी संस्करण बाजार में बिक रहे हैं वे आधे-अधूरे हैं. उनके अनुवाद बहुत खराब हैं. पन्ने के पन्ने गायब हैं. बांग्ला में कुछ कहा गया है और हिंदी अनुवाद में कुछ और.’ राजकमल से प्रकाशित ‘पथ का दावा’ के अनुवादक विमल मिश्र किताब की भूमिका में लिखते हैं, ‘शरत बाबू के उपन्यास ‘पथेर दाबी’ का हिंदी अनुवाद ‘पथ का दावा’ होगा न कि ‘पथ के दावेदार’. दरअसल इस उपन्यास के कथानक का मूल आधार ‘पथ का दावा’ नाम की समिति है. हिंदी के ‘दावेदार’ शब्द के लिए बांग्ला में ‘दाबिदार’ शब्द है.’

खराब अनुवाद की एक बड़ी वजह अनुवादकों में नजरिये का अभाव होना भी है. किसी समाज में किसी शब्द का क्या मतलब है, इसे समझे बगैर अनुवाद कर देने से अर्थ का अनर्थ होना तय है. दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए अंग्रेजी में ‘कंपरेटिव लिटरेचर’ के तहत मुंशी प्रेमचंद का प्रसिद्ध उपन्यास ‘गोदान’ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ाया जा रहा है.  गोदान शीर्षक की व्याख्या करते हुए अनुवादक ने इसे ‘अ गिफ्ट ऑफ काऊ’ लिखा है जबकि इसका ठीक अनुवाद ‘ऑफरिंग ऑफ अ काऊ’ होगा. किसी प्रियजन के मरने के बाद ब्राह्मण आत्मा को मुक्त करने के नाम पर यजमान पर दान-दक्षिणा के लिए दबाव बनाता है. इसे यजमान की इच्छा पर नहीं छोड़ता. ‘गोदान’ का पूरा कथानक ही वर्णवादी व्यवस्था की इस कुरीति के खिलाफ है. वरिष्ठ पत्रकार राजेश वर्मा कहते हैं, ‘अनुवाद हमेशा भाव का होता है. शब्द का अनुवाद करने की कोशिश करेंगे तो हमेशा गड़बड़ियां पैदा होंगी.’
एक और अहम बात यह है कि तीन-चार दशक पहले तक कई नामी-गिरामी साहित्यकार व्यापक स्तर पर अनुवाद किया करते थे. उनका काम बाकी लोगों के लिए मिसाल होता था. अशोक माहेश्वरी अनुवादकों की फेहरिस्त सामने रखते हुए मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा और द्रोणवीर कोहली जैसे नामवर साहित्यकारों का भी नाम लेना नहीं भूलते.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्यों आज नामचीन साहित्यकार अनुवाद की कला से दूर होने लगे हैं. इसके जवाब में अशोक माहेश्वरी कहते हैं, ‘आज साहित्यकारों के लिए अनुवाद रोजी-रोटी का विकल्प नहीं रह गया है. विश्वविद्यालय में पढ़ाने से लेकर फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में पटकथा लेखन तक उनके लिए कई दरवाजे खुल गए हैं.’ दरअसल अनुवाद एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में बदल देने की कला भर नहीं है. इसके जरिए एक भाषा में कही गई बात, उसमें छिपे या प्रकट भावों को बहुत ही संजीदगी से दूसरी भाषा में अनूदित करना होता है. निरुपम कहते हैं, ‘अनुवाद के जरिए आप एक संस्कृति का भी अनुवाद कर रहे होते हैं. इसे समझे बगैर अच्छा अनुवाद नहीं किया जा सकता. अगर यह काम ठीक से नहीं होगा तो भाषा की समृद्धि का सवाल  पीछे छूटेगा ही, साथ ही अनूदित किताबों के बाजार की संभावनाएं भी कमजोर होंगी.’

‘कमजोर सरकार के कारण ये नौकरशाह मनमानी कर रहे हैं’

झारखंड एकेडमिक काउंसिल में फैली अराजकता का आलम यह है कि परीक्षा के नतीजे दो बार घोषित किए गए जिससे सारे टॉपर तक बदल गए. सीबीएसई बोर्ड में जो छात्र फेल था वह यहां का टॉपर बन गया. राज्य के शिक्षा मंत्री बैजनाथ राम, जिनका बेटा और बेटी इस साल लगातार दूसरी बार फेल हो गए हैं, अनुपमा को बता रहे हैं कि काउंसिल की अध्यक्ष लक्ष्मी सिंह इन सारी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार हैं

झारखंड बोर्ड का रिजल्ट सुबह कुछ और था, शाम को कुछ और हो गया. यह गड़बड़ी कैसे हुई?

यह झारखंड एकेडमिक काउंसिल की लापरवाही है. इसी कारण कभी टॉपरों की लिस्ट बदल दी जाती है तो कभी टॉपर को फेल कर दिया जाता है, एक ही विद्यार्थी दो-दो जगहों से परीक्षा दे देते हैं. इन गड़बडि़यों को हम ठीक करके रहेंगे. पर पहले अधिकारियों पर कार्रवाई की जरूरत है. 

विभाग आपका है, कार्रवाई तो आप ही को करनी है. 

सरकार अपने तरीके से एक्शन लेती है. हमने सरकार को सही तथ्यों से अवगत करा दिया है. कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है.जेएसी की अध्यक्ष लक्ष्मी सिंह से आपकी पुरानी तकरार है. पिछले साल भी आप उन्हें हटाने की बात कर रहे थे पर आज तक उन्हें शोकॉज नोटिस तक जारी नहीं हो सका? अगर मेरे हाथ में होता तो कब का हटा चुका होता. यह मुख्यमंत्री पर निर्भर करता है कि वे कब कार्रवाई करते हैं. 

मुख्यमंत्री आपकी बात सुनते क्यों नहीं है? 

मुझे नहीं पता वे क्या सोच रहे हैं. लेकिन दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी. किसी को मनमानी करने की छूट लोकतंत्र में नहीं दी जा सकती.

आपका पुत्र और पुत्री लगातार दूसरी बार फेल हो गए. कहीं वे जानबूझकर निजी खुन्नस तो नहीं निकाल रही हैं? 

यह निजी बात है. बेहतर होता कि एक जांच टीम बनाकर जांच होती. एक शिक्षक का बेटा फेल नहीं होता. एक अधिकारी का बेटा सीबीएसई में फेल हो गया और जेएसी में टॉपर बन गया. चाहता तो मैं भी ऐसा कर सकता था. लेकिन मैं बेईमानी से शिक्षा हासिल करने के पक्ष में नहीं हूं. मैंने अपने पद और रुतबे का कभी दुरुपयोग नहीं किया है.

तो क्या आप अपने बच्चों की कॉपी का पुनर्मूल्यांकन करवायेंगे? 

इस मामले में भी काउंसिल अध्यक्ष ने अनियमितता बरती है. मेरे बच्चों ने सामान्य पुनर्मूल्यांकन का आवेदन दिया लेकिन उनकी कॉपियों की स्पेशल स्क्रूटनी की गई. क्या जेईसी अध्यक्षा बताएंगी कि किस अधिकार के तहत उन्होंने ऐसा किया है. काउंसिल में ऐसी गड़बडि़यों का अंबार है. स्क्रूटनी करने वाले लोग खुद अयोग्य हैं.

आपको इतनी शिकायतें हैं काउंसिल अध्यक्ष से. आपने इस्तीफे तक की धमकी दी. क्या उन्हें हटाया जाएगा? 

मैंने सरकार से साफ-साफ कहा है कि इन्हें अविलंब हटाया जाए. इससे राज्य का अहित हो रहा है. आज यदि सर्वेक्षण करवा लिया जाए तो राज्य के अस्सी फीसदी से ज्यादा लोग उन्हें पद से हटाने के पक्ष में हैं. इस महिला के कारण काउंसिल की विश्वसनीयता खत्म हो गयी है.

एक अधिकारी के सामने विभाग का मंत्री इतना बेबस क्यों है?  

हमारी सरकार कमजोर है इसलिए. जब तक स्थाई और स्थिर सरकार नहीं बनेगी, ब्यूरोक्रेसी हावी रहेगी. वे राज्य को अपने हिसाब से चलाते रहेंगे. जब मंत्री को अधिकार ही नहीं रहेगा तो भला अधिकारी क्यों उसकी बात सुनेगा.

झारखंड का शिक्षा विभाग आए दिन अजब-गजब करतबों और आपसी तकरार के कारण ही चर्चा में रहता है. कुछ सकारात्मक योजना भी है इसके पास?

हमारी प्राथमिकता है कि पहले शिक्षकों को स्कूल तक पहुंचाएं. जो सीटें खाली पड़ी हैं उन्हें भरा जाए. जल्द ही हम यह कानून बनाने जा रहे हैं कि किसी भी शिक्षक को कम से कम दस साल ग्रामीण क्षेत्रों में जरूर रहना होगा. इसके अलावा कोई भी शिक्षक अब एक ही स्कूल में दस साल से ज्यादा किसी भी हाल में नहीं रह पाएगा.

कपूर आयोग: गांधी जी की हत्या

जिस आयोग ने विनायक दामोदर सावरकर की भूमिका को इस मामले में संदिग्ध बताया.  

महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में कुल सात लोगों को सजा सुनाई गई थी. इनमें से मुख्य आरोपित नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को तो फांसी हो गई थी और बाकी लोगों को उम्र कैद. गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र में हिंदू सभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर पर भी मुकदमा चला था लेकिन उन्हें अदालत ने बरी कर दिया था.

इस मामले में उम्र कैद की सजा पूरी करने वाले तीन आरोपित- मदल लाल पाहवा, गोपाल गोडसे और विष्णु करकरे जब 1964 में पुणे लौटे तो उनके जेल से छूटने पर एक कार्यक्रम आयोजित हुआ. यहीं डॉ जीवी केतकर जो तरुण भारत अखबार के संपादक थे, ने एक ऐसा बयान दिया जिसने 16 साल बाद गांधी जी की हत्या के मामले को एक बार फिर चर्चा में ला दिया. बाल गंगाधर तिलक के पोते, डॉ केतकर का कहना था कि गांधी जी की हत्या के छह महीने पहले उन्हें इसकी सूचना मिल गई थी और उन्होंने तत्कालीन बंबई प्रांत के मुख्यमंत्री बीजी खेर को इस बारे में सतर्कता बरतने की सलाह देते हुए सूचना भिजवा दी थी.

डॉ केतकर के इस बयान के बाद तुरंत ही संसद सहित महाराष्ट्र विधानसभा में हंगामा होने लगा. अखबारों में कहा जा रहा था कि गांधी जी की हत्या की सूचना सरकार को पहले से थी तो सुरक्षा पुख्ता क्यों नहीं की गई? इन स्थितियों में केंद्र सरकार ने सांसद और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील गोपाल स्वरूप पाठक की अगुवाई में गांधी जी की हत्या के पीछे षड्यंत्र की नए सिरे से जांच के लिए एक आयोग बना दिया. लेकिन कुछ ही दिनों बाद पाठक केंद्रीय मंत्री बन गए. तब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग बनाया गया. इस आयोग ने तीन साल तक मामले की गहन छानबीन की. पहली बार सावरकर के दो सहयोगियों के हलफनामे को भी आयोग ने जांच में शामिल किया. ये हलफनामे अदालत में प्रस्तुत नहीं किए गए थे. तीन साल की जांच के बाद आयोग ने जो जांच रिपोर्ट दी उसमें साफ-साफ कहा गया कि बेशक कोर्ट ने सावरकर को इस मामले में दोषी न ठहराया हो, लेकिन कुछ लोगों के हलफनामे और दूसरे सबूत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि सावरकर और उनके संगठन की गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र में सक्रिय भूमिका थी.  

-पवन वर्मा

दरबार के दागी रतन

जिस हल्ले के साथ अखिलेश की सत्ता में वापसी हुई थी, वह मंद पड़ रहा है. जिस नई राजनीति की चर्चा थी, उस पर सवाल उठाए जा रहे हैं. ऐसा व्यक्ति जो चौतरफा आरोपितों, दागियों और भ्रष्टों से घिरा है, क्या वह ईमानदार फैसले ले सकता है? आखिर क्या मजबूरी रही अखिलेश यादव की जो उन्होंने चुन-चुन कर ऐसे अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जिनके ऊपर तरह-तरह के आरोप हैं. जयप्रकाश त्रिपाठी की रिपोर्ट.

 


 

अनिता सिंह

पद: सचिव, मुख्यमंत्री 

मामला: गोमतीनगर भूमि घोटाला

मौजूदा स्थितिः सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन

अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही 15 मार्च की दोपहर आईएएस अधिकारी अनीता सिंह को मुख्यमंत्री के सचिव पद का तोहफा दिया. 2005 में सपा सरकार के कुछ करीबी नेताओं व अधिकारियों को नियम-कानूनों को दरकिनार कर गोमतीनगर जैसे पॉश इलाके में प्लाट आवंटित करने का आरोप सिंह पर है. खुद उनके नाम भी एक प्लॉट आवंटित हुआ था. मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने के बावजूद अखिलेश यादव ने उन्हें इतना महत्वपूर्ण ओहदा दिया. दबी जुबान से यह भी कहा जा रहा है कि अनीता सिंह को मुलायम सिंह के पिछले कार्यकाल में सपाइयों के प्रति दिखाई गई हमदर्दी का इनाम दिया गया है.

 

 

 

राजीव कुमार, प्रमुख सचिव

राजीव कुमार

पद: प्रमुख सचिव 

मामला: नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाला

मौजूदा स्थितिः सीबीआई चार्जशीट दाखिल हो चुकी है

राजीव कुमार सचिवालय के सबसे महत्वपूर्ण ओहदे पर हैं. इनके ऊपर नोएडा के प्लाट आवंटन घोटाले में सीबीआई की चार्जशीट है. मुलायम सिंह के पिछले कार्यकाल में मुख्य सचिव रही नीरा यादव के साथ राजीव कुमार पर नोएडा भूमि आवंटन घोटाले के छींटे पड़े थे. सीबीआई ने उन्हें आरोपित बनाया था. मामला अभी गाजियाबाद की सीबीआई कोर्ट में चल रहा है. मई, 2012 में सीबीआई कोर्ट ने बयान दर्ज करवाने के लिए राजीव कुमार को तलब किया था. 

 

 

पंधारी यादव

पद : विशेष सचिव, मुख्यमंत्री 

मामला : सोनभद्र में तैनाती के दौरान मनरेगा में करोड़ों रुपये का गबन हुआ  

मौजूदा स्थितिः मामला रफा-दफा कर दिया गया है

मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात आईएएस पंधारी यादव आज जितना सपा के करीब हैं मार्च, 2012 से पहले तक उतना ही बसपा सरकार के भी करीब थे. दो साल से अधिक समय तक यादव सोनभद्र जिले के डीएम रहे और उनके कार्यकाल में करोड़ों के घपले मनरेगा में होते रहे. केंद्र व राज्य सरकार की जांच टीमों ने दौरा करके इस घोटाले को उजागर किया. बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने सीबीआई जांच को टालने के लिए निचले स्तर के कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया और यादव को डीएम के पद से हटा कर यमुना एक्सप्रेसवे अथारिटी में भेज दिया.

 

 

 

राकेश बहादुर

पद: चेयरमैन, नोएडा अथॉरिटी 

मामला: नोएडा में पांच सितारा होटलों के प्लॉट आवंटन में घोटाला. प्रवर्तन निदेशालय में मनी लॉन्डरिंग मामला

मौजूदा स्थितिः प्रवर्तन निदेशालय को उनके जवाब का इंतजार है

नोएडा अथारिटी के चेयरमैन राकेश बहादुर पिछली सपा सरकार में भी इसी पद पर तैनात थे. 2006 में नोएडा में थ्री, फोर व फाइव स्टार होटलों के लिए प्लॉट आवंटन हुए थे. इसमें कथित घोटाले को देखते हुए बसपा सरकार ने 2007 में इन आवंटनों को रद्द कर दिया था. साल 2009 में राकेश बहादुर को मायावती ने निलंबित भी कर दिया था. 2010 में प्रवर्तन निदेशालय ने इनके खिलाफ मनी लॉन्डरिंग का केस दर्ज करके नोटिस जारी किया है.

 

 

संजीव सरन

पद: सीईओ, नोएडा

मामला: नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाला

मौजूदा स्थितिः मामला आर्थिक अपराध शाखा के हवाले कर दिया गया

संजीव सरन मुलायम सिंह की सरकार में नोएडा के सीईओ थे और अखिलेश सरकार में फिर से उसी पद पर भेजे गए हैं. 2006 में नोएडा में हुए 4,000 करोड़ से भी अधिक के कथित भूमि घोटाले में पूर्ववर्ती बीएसपी सरकार के कार्यकाल में इन्हें निलंबित कर दिया गया था. नोएडा के सेक्टर 20 थाने में इनके खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज हुई थी. बाद में यह मामला आर्थिक अपराध शाखा की मेरठ ब्रांच को सौंप दिया गया. विडंबना है कि जिस पद पर रहते हुए सरन भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे और फिलहाल जांच का सामना कर रहे हैं उसी पद पर सपा सरकार ने उन्हें फिर से विराजमान कर दिया है. 

 

सदाकांत

पद: आयुक्त, समाज कल्याण विभाग 

मामला: प्रतिनियुक्ति के दौरान लेह लद्दाख में 200 करोड़ रु.का सड़क घोटाला

मौजूदा स्थितिः सीबीआई जांच जारी है.

सदाकांत इस समय  समाज कल्याण विभाग के आयुक्त हैं. वे दो साल पहले केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गृह मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत थे. उस समय लेह-लद्दाख में 200 करोड़ रुपये का सड़क घोटाला हुआ. सीबीआई ने 2010 में केस दर्ज करते हुए सदाकांत को भी आरोपित बनाया. उनके दिल्ली स्थित घर की तलाशी भी हुई थी. इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार ने घोटाले का सूत्रधार मानते हुए सदाकांत की प्रतिनियुक्ति बीच में रद्द करके उन्हें बीच में ही उनके मूल काडर उत्तर प्रदेश वापस भेज दिया. 

 

 

 

 

महेश गुप्ता

पद: आबकारी आयुक्त  

मामला: 1998 में कर्मचारी भर्ती घोटाला

मौजूदा स्थितिः सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल कर दिया है

आबकारी जैसे महत्वपूर्ण विभाग में आयुक्त का पद संभाल रहे महेश गुप्ता का दामन भी सीबीआई जांच से दागदार है. 1998 में सूचना विभाग में कर्मचारियों की हुई भर्ती में घोटाले की जांच सरकार ने सीबीआई से करवाई. भर्ती घोटाले के समय गुप्ता सूचना विभाग में निदेशक थे. सीबीआई ने 2008 में महेश गुप्ता सहित कई अन्य अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी.

 

बृहत्तर आयामों की समझ

पुस्तक: समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन

लेखक: रजनी तिलक, रजनी अनुरागी

मूल्य: 600 रुपये 

पृष्ठ: 322

प्रकाशन: स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली

युवा कवयित्रियों रजनी तिलक और रजनी अनुरागी के संपादन में ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’ का पहला खंड आ चुका है. इसमें करीब 28 दलित महिला हस्ताक्षरों को शामिल किया गया है. यह अपनी तरह की अकेली पहल है. यह किताब भारतीय समाज के बिखराव को भी दिखलाती है, कि किस तरह यहां शोषण की भी श्रेणियां हैं. अब महादलित की बात भी उठने लगी है. जब तक ये पीड़ित तबके खुद अपनी आवाज बुलंद नहीं करते तब तक उनकी ओर हमारा समर्थ तबका देखता तक नहीं. आवाज उठाने पर भी मात्र तुष्टीकरण की नीयत से काम लिया जाता है.
नतीजा दलित लेखन से दलित महिला लेखन को खुद को अलगाना पड़ता है. इस बारे में रजनी संपादकीय में  लिखती हैं, ‘दलित साहित्यकारों की इसमें रुचि भी नहीं थी कि दलित लेखिकाओं को ढूंढ़ा जाए और उन्हें नरचर किया जाए.’ उनका आरोप है कि ‘अन्यथा’, ‘अपेक्षा’ और ‘हंस’ जैसी ख्यातिनाम पत्रिकाओं ने भी दलित पुरुष लेखकों के संपादन में जो दलित विशेषांक निकाले उनमें भी दलित महिला लेखन की उपस्थिति सांकेतिक ही रही. उनकी आपत्ति है कि ‘पितृसत्तात्मक सोच वाले दलित साहित्यकारों ने अपने वैचारिक भटकावों को ‘पंथ’ का नाम दे दिया है. अंतर्जातीय विवाहों को ‘जारकर्म’ का ठप्पा देते फिर रहे, बेहतर होता कि वे खुद को ‘भगवा’ घोषित कर देते.
दलित साहित्यकारों की ‘वैचारिक उठापटक’ और ‘खेमेबंदी’ भी उनके संघर्ष को कमजोर कर रही है. आश्चर्यजनक है कि इतने बंटवारे के बाद भी हमारे रहनुमा शाइनिंग इंडिया के नारे लगाते नहीं थकते. पर यह कैसा शाइनिंग भारत है, इसकी बाबत अनुरागी अपनी कविता में लिखती हैं, ‘गतिशील भारत में रोते-बिलखते, मजदूर जीवन जीते/ लूले, लंगडे़, अंधे, कुबडे़ भारत की सही तस्वीर दिखाते भारतीय.’ और यह भारत की राजधानी दिल्ली में आइटीओ की तस्वीर है. पुस्तक की संपादकीय सोच सही है कि इस बंटवारे से बाहर आकर आंबेडकरवादी दृष्टिकोण के संदर्भ में  ‘बृहत्तर समाज के साथ संवाद चाहिए ताकि हम दुनिया बदलने में अपनी संगत दे सकें.’ पुस्तक में साहित्य और विमर्श के तमाम मुद्दों पर सामग्री इकट्ठी की गई है. इससे गुजरना भारतीय समाज के बृहत्तर आयामों की एक सही समझ देता है.
-कुमार मुकुल