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एक ‘टैं टैं टों टों’ लड़की जिसे संगीत से चित्र बनाने हैं

वह एक लड़की थी, स्कूल बस के लंबे सफर में चेहरा बाहर निकालकर गाती हुई, ‘रंगीला’ का कोई गाना और इस तरह उसके संगीत की धुन पर कोर्स की कविताएं याद करती हुई, जिन्हें स्कूल के वाइवा एग्जाम में सुना जाता था. वाइवा पूरी क्लास के सामने होता था. ऐसे ही एक दिन वह टीचर के पास खड़ी थी और कविता उस संगीत से इतना जुड़ गई थी कि पहले उसे उसी धुन पर कविता गुनगुनानी पड़ रही थी और तभी बिना धुन के टीचर के सामने दोहरा पा रही थी. ‘याई रे’ की धुन टीचर ने सुनी तो उन्होंने डांट दिया. लेकिन घर में ऐसा नहीं होता था. कभी कोई मेहमान आता, कोई फंक्शन होता या पिकनिक पर जाते तो गाना सुनाने को कहा जाता था. गाते हुए अच्छे से चेहरे और हाथों की हरकतें कर दो तो घरवाले बहुत खुश होते थे- अरे, आशा से अच्छा गाया है तुमने यह गाना. और वह कहती है कि अच्छा गाती भी थी. मगर आप उसके कहने पर मत जाइए. एक फिल्म आई है ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’. उसमें सुनिए कि कैसे वह चुनौती और बदले से भरा ‘कह के लूंगा’ गाती है, और उसी के साथ बच्चों-सी प्यारी आवाज में ‘टैं टैं टों टों’. उसका नाम स्नेहा खानवलकर है. ऐसी मराठी संगीतकार, जो ‘जिया तू बिहार के लाला’ कंपोज करती है और आप अब भी कहते हैं कि मोहब्बत, दूसरों की इज्जत और बराबरी संविधान के रास्ते से आएगी. 

लेकिन फिलहाल दुनिया बदल डालने की बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय हमें अपनी कहानी पर लौटना चाहिए, जहां स्नेहा से गाना गाने के लिए कहा गया है और वह अच्छी बच्ची की तरह गरदन झुकाकर बैठ गई है, दोनों हथेलियां गोद में रखकर, और गाना शुरू कर रही है. गाने में उसका हमेशा अलग जोन में आ जाना इसलिए भी है कि उसे हमेशा लगता रहा कि जो परंपरागत अच्छी मानी जाने वाली आवाज है, लता, आशा, चित्रा या कविता की, या सुनिधि की, वह उससे बहुत दूर है. यूं तो बचपन से ही तारीफ मिलती थी और कहा जाता था कि सिंगर बनो तुम, लेकिन उसे कहीं न कहीं लगता रहा कि उसकी आवाज को स्वीकार नहीं किया जाएगा. और उसे दूसरों के हिसाब से ढलने और उन्हें खुश करते रहने में जिंदगी नहीं बितानी थी. लेकिन जिंदगी बितानी कैसे थी? एक मध्यवर्गीय मराठी परिवार था. पिता इंजीनियर थे, भाई भी इंजीनियर. स्नेहा की ड्रॉइंग अच्छी थी तो कहते थे कि इसे आर्किटेक्ट बनाएंगे. पर स्नेहा तो म्यूजिक को लेकर ‘टची’ होती जा रही थी. सब मेटल सुन रहे हैं तो उसे क्यों नहीं समझ आ रहा? ‘संगीत मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ जैसी यह भावना ही उसे संगीत में और डुबोती गई. 

उसकी एक और खासियत थी कि जब भी बातें करती थी, उनमें ध्वनियां बहुत स्वाभाविक ढंग से आती थीं. मोटरसाइकिल पर कहीं जाने की बात करनी हो तो उसके ‘ढक ढक ढर्र’ स्टार्ट होने की आवाज के बिना पूरी नहीं होती थी. किसी अंग्रेजी गाने के बोल नहीं आते थे तो ‘टैंग टैंग टिंग टिंग’ या ऐसी ही किसी मजेदार ध्वनि से रीप्लेस करके गाती रहती थी. उसे इसमें मजा आता था कि कितने सारे वाद्ययंत्रों की आवाजों की हम नकल करते हैं, कर सकते हैं और तब वह नकल अलग ही आवाज बन जाती है और उस इंस्ट्रूमेंट का चरित्र ही बदल देती है. तब उसे नहीं पता था कि उसे कुछ साल बाद ‘साउंड ट्रिपिंग’ नाम का एक टीवी शो करना है, जिसमें वह भारत के गली-मोहल्लों-गांवों-खेतों-मैदानों-पहाड़ों में जाकर आवाजें ढूंढ़ेगी और उनसे संगीत रचेगी. उसने पंजाब की प्रतिभावान नूरा बहनों के साथ मिलकर और उसमें स्पोर्ट्स कमेंट्री मिलाकर तुंबी का ‘टुंग टुंग’ बनाया. एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी की आवाजों से ‘स्क्रैप रैप’ बनाया और अफ्रीकन मूल की कर्नाटक में रहने वाली एक जनजाति के कोंकणी गीत से ‘येरे येरे’ बनाया. उसके गानों में झाडू की आवाजें भी आईं, कपड़े धोने की आवाजें भी और मुर्गे की बांग भी.  उसने ट्रक की सारी आवाजों से ‘ट्रकां वाला गीत’ रचा और वही ‘कु कु कु कु फुतर फू’ जैसे कोरस लाई. 

लेकिन तब वह दसवीं में थी और ठीक से नहीं जानती थी कि उसे क्या करना है. उन्हीं दिनों उसका परिवार मुंबई शिफ्ट हो गया. वे तो शायद बेटी को इंजीनियर या आर्किटेक्ट बनते देखना चाहते थे, लेकिन मुंबई में बेटी ने चारों तरफ मास कम्युनिकेशन और एनिमेशन जैसी चीजों का शोर देखा. पढ़ाई के साथ एनिमेशन का कोर्स करने लगी. लेकिन उसे उन एनिमेटर्स की तरह नहीं बनना था जो एक कंप्यूटर के सामने स्थिर बैठे-बैठे, चाइनीज फूड खाते-खाते पूरा दिन गुजार देते थे. उसे वहां घुटन होने लगी. तब एनिमेशन से निकलकर वह ‘इश्क विश्क’ के आर्ट डायरेक्टर उमंग कुमार की इंटर्न बन गई. वे बारहवीं की छुट्टियों के दिन थे. वहां वह सबसे छोटी थी और उसे कोई गंभीरता से नहीं लेता था. उसका इतना महत्व तो था कि वह वहां काम कर रहे मजदूरों से अच्छे से कम्युनिकेट कर लेती थी और काम करवा लेती थी. लेकिन वहां लड़की के छाता लेकर आने के सीन के लिए छाते को पोंछते-सजाते हुए वह जान गई थी कि वह उसकी दुनिया नहीं थी. 

‘ओए लकी ओए’ की धुन व गायकों की खोज में स्नेहा खानवलकर पंजाब के गली-कूचों में घूमीं तो ‘जिया हो बिहार के लाला’ के लिए त्रिनिदाद और टोबैगो

मां-पिता उन दिनों तक तंग आ गए थे. वह बार-बार फील्ड बदल रही थी और उन्हें लग रहा था कि बस भाग रही है. पिता चाहते थे कि इससे अच्छा तो गायकी में ही कुछ करे, लेकिन उसने साफ मना कर दिया था. वे उसे एनिमेशन की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजना चाहते थे, लेकिन इसके लिए किया जाने वाला तामझाम, पेपरवर्क और बहुत सारा खर्च उसके स्वभाव से बिल्कुल उलट था. इसलिए वह चुप होकर घर बैठ गई. उसने इस बार नहीं बताया कि वह संगीतकार बनने की सोच रही है. 

तो स्नेहा घर में ही वॉकमैन में अपनी धुनें रिकॉर्ड करने लगी, कभी-कभी दो-तीन हजार में आ जाने वाले कीबोर्डिस्ट्स को घर बुलाकर अपनी स्क्रैच धुनें तैयार करने लगी. उन्हीं दिनों उसने कहीं तिग्मांशु धूलिया का एक इंटरव्यू पढ़ा और कहीं से उनका फोन नंबर ढूंढ़कर फोन किया. उन्होंने मिलने बुलाया और फिर अपनी फिल्म ‘किलिंग ऑफ अ पोर्न फिल्ममेकर’ के दो गाने बनाने को कहा. वे गाने रिकॉर्ड भी हुए. लेकिन वह फिल्म बीच में ही रुक गई. यह थोड़ा परेशान करने वाला तो था लेकिन इसी रास्ते से उसे रामगोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप मिले. उसके बाद उसने रुचि नारायण की फिल्म ‘कल’ का एक गाना बनाया और मनीष श्रीवास्तव की फिल्म ‘गो’ में संगीत दिया. लेकिन दिबाकर बनर्जी की ‘ओए लकी लकी ओए’ उसकी पहली सोलो फिल्म थी. 

वह कोई और फिल्म थी जिसके लिए उन्होंने काम शुरू किया था लेकिन बनी ‘ओए लकी लकी ओए’. फिल्म में दो ही गाने होने थे. एक टाइटल गीत और एक ‘तू राजा की राजदुलारी’. स्नेहा उन्हें तलाशने पंजाब गई. ‘ओए लकी’ गाने के लिए उसे देशराज लचकानी को खोजना था. खोजने के लिए वह गांवों, कस्बों, शहरों में बेपरवाह घूमती है. किसी भी नुक्कड़ पर ठहरकर चाय या पान वाले से पूछती हुई कि यहां आस-पास कोई गायक रहता है क्या? कोई कुछ बताता है तो गाड़ी में साथ बिठा लेती है और इस तरह किसी के भी घर पहुंच जाती है, उसे सुनती है. यह उसका अपना टैलेंट हंट है जिसमें वह वे आवाजें खोजती है जो उसे बांधकर अपने आंगन में बिठा लें. 

 खैर, पंजाब और हरियाणा के उसके खजाने से ‘ओए लकी’ का संगीत निकला और हिंदी सिनेमा की चौथी महिला संगीतकार के कदमों की बेपरवाह आवाज. पुरुषों के वर्चस्व वाले एक क्षेत्र में जहां यह उपलब्धि थी, वहीं चुनौती भी थी. और इकलौती चुनौती नहीं. ‘शुरू में किसी ने कहा था कि अभी तो तुम फीमेल की तो बात ही मत करो. अभी तो ना तुम्हारी उम्र तुम्हारे साथ है, ना तुम फिल्म या संगीत के बैकग्राउंड से हो. तीसरा लड़की हो और चौथा, दुबली-पतली सी हो. डांटोगी, तो भी कितना सीरियसली लेगा कोई? पुराने इंडस्ट्री के म्यूजिशियन लगातार ढूंढ़ते रहते हैं कि कुछ अलग होगा इसमें. मुझे फील होता रहता है कि मुझे जज किया जा रहा है. ऐसा भी कई बार हुआ कि रिकॉर्डिंग हो रही है और सब सिगरेट पीने बाहर चले गए या आपस में बातें करने लगें. लेकिन यही सब इसे एक्साइटिंग बनाता है. मेरी रिकॉर्डिंग पर कुछ भी आम नहीं रहता.’ 

इसके बाद उसने दिबाकर की ही ‘लव सेक्स और धोखा’ का संगीत दिया. इसी बीच अनुराग कश्यप ने उसे मिलने के लिए बुलाया और अपनी फिल्म का संगीत देने का प्रस्ताव रखा जिसमें उन्हें बिहारी लोकसंगीत रखना था. फिर से ‘लोकसंगीत’ सुनकर वह एक मिनट हिचकिचाई, लेकिन उसे त्रिनिदाद टोबैगो का वह चटनी संगीत याद आया जो उसे बहुत पसंद था और जिसे उन्नीसवीं सदी में वहां जाने वाले बिहारियों की अगली पीढ़ियों ने बिहारी और हिंदी फिल्मों के संगीत में वहां का कुछ मिलाकर बनाया था. उसने कहा कि वह एक ही शर्त पर संगीत बनाएगी कि उसे त्रिनिदाद जाने दिया जाए. अनुराग ने तुरंत हामी भर दी. 

अब नया सफर शुरू हुआ. उसने त्रिनिदाद और टोबैगो की गलियों में वैसे ही संगीत ढूंढ़ा, जैसे पंजाब में ढूंढा था. पूरे एलबम के गीत उसने बाद में बिहार में ही खोजे. चटनी म्यूजिक ने उन्हें बस एक रंग दिया. इस बार स्नेहा ने और भी ऐसी आवाजें चुनीं जिन्हें मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा स्वीकार नहीं करता. स्नेहा को इलेक्ट्रॉनिक संगीत बहुत पसंद है और असल दुनिया की हदों तक जाने की तो वह कोशिश कर ही रही है, लेकिन उसे इलेक्ट्रॉनिक संगीत की हदों तक भी जाना है. वह कहती है कि तकनीक ने उसका बहुत साथ दिया है. उसे आगे भी साउंड्स के साथ इसी तरह खेलते रहना है. वह सब करना है जो संगीत में पहले कभी नहीं हो सका. 

और जब उसके हाथ में एक हॉर्न है, जिसे मेरे मोहल्ले में गन्ने बेचने वाला बजाया करता था, और वह नियम से रोज तीन बार अपने घर में खाना खाने के लिए आने वाली गली की गर्भवती बिल्ली को गोद में लेकर पुचकार रही है, वह कहती है कि एक दिन देखना, म्यूजिक से इस हाथ को भी ड्रा किया जा सकेगा. 

मुझे उसकी बात पर पूरा यकीन है. आपको है? 

-गौरव सोलंकी

‘हर कारोबारी को 10 फीसदी मुनाफा दान करना चाहिए’

पिछले साल अन्ना हजारे और उनका जनलोकपाल आंदोलन मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा. इस आंदोलन ने आम जनता में एक तरफ जितनी तारीफ बटोरी उतना ही इसे विवादों में घसीटने की कोशिश भी होती रही. इसी दौरान अन्ना हजारे को 25 लाख रुपये का ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ पुरस्कार मिला. जाहिर है जब राजनीतिक स्तर पर इस आंदोलन को बदनाम करने की कुछ सचेत कोशिशें चल रही हों तब पुरस्कार के भी कई निहितार्थ निकाले गए. इस पुरस्कार को देने वाला ‘सीताराम जिंदल फाउंडेशन’ भी उस समय फिर चर्चा में आया और उसके संस्थापक व इस्पात दिग्गजों में शुमार सीताराम जिंदल भी. वे भारत में भ्रष्टाचार-विरोधी लोकपाल बिल का सार्वजनिक तौर पर सबसे पहले समर्थन करने वाले चुनिंदा कारोबारियों में शामिल हैं. जिंदल बताते हैं, ‘अन्ना का समर्थन करने पर मेरे कई कारोबारी मित्र मुझसे नाराज हो गए थे. मुझे इसके लिए धमकियां भी दी गईं.’ 

यह पहला मौका होगा जब शायद इस कारोबारी को किसी सरोकारी काम के लिए धमकियां मिली हों. लेकिन उन्होंने इस बार भी दिल की आवाज सुनी और वे लोकपाल सहित अन्ना आंदोलन के समर्थन पर अड़े रहे. यहां उनके व्यक्तित्व की वही खूबी दिखाई दी जिसकी वजह से वे भारत के सबसे सरोकारी कारोबारियों में गिने जाते हैं. वह खूबी है, भले की बात एक बार तय करना और जब इस पर भरोसा जम जाए तो उसे हर कीमत पर आगे बढ़ाना. इस सोच वाले ‘जिंदल अल्युमिनियम लिमिटेड’ के  इस संस्थापक का जनकल्याण और परोपकार की तरफ झुकाव उसी दौर में शुरू हो गया था जब ज्यादातर कारोबारियों का ध्यान किसी भी तरह मुनाफा बढ़ाने की तरफ होता है. सन 1932 में हरियाणा के हिसार जिले में पैदा होने वाले सीताराम जिंदल ने जब भारत के प्रसिद्ध जनकल्याण ट्रस्ट ‘सीताराम जिंदल फाउंडेशन’ की स्थापना की तब उनकी उम्र मात्र 37 साल थी. आज देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे ही लगभग 19 जनकल्याण ट्रस्टों की स्थापना करवा चुके सीताराम जिंदल ने दक्षिण भारत के 100 पिछड़े गांवों को भी गोद लिया है. जिंदल के ट्रस्ट इन सभी गांवों में लोगों को साफ पानी, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने के साथ-साथ इनको रोजगार दिलवाने के लिए जरूरी प्रशिक्षण भी देते हैं. इस्पात और अल्युमिनियम के कारोबारी होने के बावजूद प्रकृति से प्यार करने वाले जिंदल ने सन 1979 में बेंगलुरु में ‘जिंदल नेचरकेयर संस्थान’ की स्थापना भी की. यहां लोगों का प्राकृतिक पद्धतियों से इलाज होता है. 

जनकल्याण की तरफ अपने शुरूआती दौर याद करते हुए जिंदल बताते हैं, ‘हमारी पैदाइश हिसार के छोटे-से गांव नवला में हुई थी. बचपन से अपने चारों तरफ गरीब मजदूरों, औरतों और बच्चों की खराब हालत देखकर मुझे हमेशा दुख होता था. हमेशा लगता था कि ईश्वर ने हमें इतना दिया तो यह ऊपरवाले का करम है पर हमारे आस-पास बहुत सारे लोग हैं जो बहुत बदतर जिंदगी जी रहे हैं. मैं हमेशा सोचता था कि अगर जिंदगी में मौका मिले तो दूसरों के लिए जरूर कुछ करना चाहिए. फिर जब 1961 में हमने अपनी पहली फैक्ट्री डाल कर काम शुरू किया तो हमें बहुत जल्दी मुनाफा होने लगा. हमने दो  साल के भीतर ही वहां एक बड़ा अस्पताल बनवाया और बस शुरुआत हो गई.’ 

इसके बाद सन 1978 में ‘सीताराम जिंदल फाउंडेशन’ की स्थापना हुई और दिल्ली-बेंगलुरु सहित देश के कई शहरों में जिंदल फाउंडेशन के स्कूल,अस्पताल और कल्याणकारी आश्रम बनवाए गए. अब जिंदल फाउंडेशन हर साल आर्थिक रूप से कमजोर और मेधावी बच्चों के लिए 10,000 छात्रवृत्तियां जारी करता है. साथ ही मानवता के लिए, भ्रष्टाचार के खिलाफ और ग्रामीण विकास के लिए काम करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए भी संस्थान ने कई पुरस्कार घोषित किए हैं. 

दुनिया के सबसे अमीर व्यापारियों में शुमार होने के बाद भी भारतीय व्यापारियों में बिल गेट्स या वारेन बफेट की तरह जनकल्याणकारी अभियान चलाने का कोई ट्रेंड नजर क्यों नहीं आता? आम जनता के मन में गाहेबगाहे उठने वाले इस सवाल पर जिंदल कहते हैं, ‘ हमारे यहां लोग किटी पार्टियों और शराब में करोड़ों रुपये खर्च करने में कोई गुरेज नहीं करते पर गरीब को एक रुपया देने में जान निकल जाती है. मेरा मानना है कि बड़े कारोबारियों को अपने मुनाफे का 10 प्रतिशत तो दान करना ही चाहिए.’ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए लोकपाल बिल का पुरजोर समर्थन करते हुए वे कहते हैं, ‘सभी राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति करवाने और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने वाला एक मजबूत लोकपाल बिल बहुत जरूरी है वरना संविधान की आड़ में हमारे नेता इस देश को लूटते रहेंगे. मुझे सच में लगता है कि अगर एक मजबूत लोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो अगले 10 सालों में हमारी संसद पूरी तरह गुंडों से भरी होगी.’ 

साथ ही नई फैक्ट्रियां डालने के लिए भारत के कई कॉरपोरेट संस्थानों द्वारा आए दिन किए जा रहे भूमि-अधिग्रहण को लेकर अपना रुख साफ करते हुए वे कहते हैं कि स्थानीय लोगों की सहमति के बिना उनकी जमीनें हड़पने से ही हमारे आसपास यह सारा संघर्ष हो रहा है. एक समावेशी भू-अधिग्रहण नीति की दरकार पर जिंदल जोर देते हैं, ‘विकास और कारखाने हमारे लिए बहुत जरूरी हैं. पर जिन लोगों की जमीने जाएं, उनकी सहमति होनी चाहिए. फिर उन्हें मुआवजे के साथ-साथ विस्थापित करने और उनके परिवार के किसी एक सदस्य को नौकरी देने की जिम्मेदारी कंपनी की होनी चाहिए.’

बेताल का साथी!

‘तुम कौन हो?’ ‘मैं बेताल हूं.’ ‘और तुम! तुम भी बेताल हो क्या?’ ‘नहीं तो…’ ‘तो यूं क्यों लटके हुए हो?’ ‘क्या केवल बेताल ही लटक सकता है इस देश में?’ ‘बेताल की लटकने की तो आदत है, मगर तुम बेताल का साथ क्यों दे रहे हो?’ ‘अरे बेवकूफ! मैं लटका नहीं हूं, लटकाया गया हूं.’ ‘किसने लटकाया है?’ ‘जन गण मन के भाग्य विधाताओं ने, और किसने!’ ‘मगर तुम्हारे शरीर में इतने घाव कैसे?’ ‘ इसे संसदीय भाषा में संशोधन कहते हैं.’ ‘कितने वर्षों से लटके हो?’ ‘याद नहीं…’ ‘बताओ न!’ ‘मोटे तौर पर यह समझ लो कि तुम्हारी जैसी दो पीढ़ियां तो बड़ी हो गई हैं.’ ‘तुम इतने बडे़, मतलब बुजुर्ग तो नहीं लगते!’ ‘तुम्हारी शंका की वजह क्या है?’ ‘अगर तुम बरसों से लटके हुए हो, तो तुम्हारे बाल-दाढ़ी-नाखून बढ़ने चाहिए थे, मगर ऐसा नहीं है.’  ‘मैं सच कह रहा हूं. मैं बरसों से लटका हुआ हूं.’

‘माना, फिर भी  तुम्हारे बाल-दाढ़ी-नाखून बढे़ क्यों नहीं!’ ‘काट दिए गए, सब काट दिए गए. मेरे नाखूनों पर तो विशेष कृपादृष्टि की गई. उन्हें एक-एक करके काटा जा रहा है.’ ‘किसने काटे?’ ‘वही जन गण मन के भाग्य विधाता…’ ‘मगर क्यों?’ ‘ वे मुझे सुंदर-सा… सुंदर-सा क्या, वास्तव में सुंदर बनाना चाहते हैं!’ ‘माफ करना, मगर ऐसे तुम कब तक लटके रहोगे?’ ‘ जब तक मेरे मुंह में दांत बचा रहेगा, तब तक.’ ‘दांत…’ ‘यह देखो! देखो, मेरे मुंह में कितने कम दांत बचे हुए हैं.’ ‘सचमुच, तुम बहुत ही उम्रदराज हो. तुम्हारे तो अधिकांश दांत गिर गए है.’ ‘गिरे नहीं तोडे़ गए हैं.’ ‘तोडे़ गए हैं! ’ ‘भयभीत न हो, लोकतांत्रिक भाषा में कहता हूं, तोडे़ नहीं निकाले गए हैं.’ ‘मगर क्यों?’ ‘ताकि मैं काट न सकूं.’ ‘ वह सब तो ठीक है मगर, ऐसे लटके-लटके तो एक दिन तुम मर जाओगे!’ ‘घबराओ नहीं, मैं मरूंगा नहीं.

वे मुझे मरने नहीं देंगे.’ ‘कौन?’ ‘ च्च…च्च… च्च…’ ‘ समझ गया! समझ गया!  मैं बताता हूं, वही जन गण मन के भाग्यविधाता न!’ ‘शाबास!’ ‘ थैंक्यू! मगर मुझे तुम्हारे ऊपर दया आती है.’ ‘ऐसा भला क्यों?’ ‘तुम न जीवित ही हो, न तुम्हें मर कर मुक्ति ही मिल रही है.’ ‘मैं कर भी क्या सकता हूं सिवाय इंतजार करने के.’ ‘अच्छा, मैं कुछ कर सकता हूं!’ ‘तुम क्या कर सकते हो?’ ‘अगर मैं नहीं तो, जनता तो कुछ कर सकती है न!’ ‘जनता… कुछ जानते भी हो! जनता का मतलब आधुनिक लोकतंत्र की शब्दावली में भीड़तंत्र हो गया.’ ‘तब!’ ‘तब क्या?’ ‘तुम्हारा उद्धार कैसे होगा?’ ‘सब जन गण मन के भाग्यविधाता की इच्छा पर निर्भर करता है.’ ‘और देश की इच्छा… देश की इच्छा का कुछ नहीं!’ ‘देश!’ ‘तुम हंस क्यों रहे हो?’ ‘देश, देश का मतलब समझते हो!’

‘अब तुम्हीं समझाओ!’ ‘देश यानी जन गण मन के भाग्यविधाताओं का समूह.’ ‘तुम आधुनिक लोकतंत्र की आधुनिक शब्दावलियों के मानी मत समझाओ! उसे अपने पास ही रखो . मुझे बस यह बताओ कि तुम धरातल पर कब उतरोगे या यूं ही लटके रहोगे?’ ‘धरातल पर तब उतरूंगा, जब मुझमें इतनी ही शक्ति बची रह जाए कि चल-फिर न सकूं. जहां उतार कर बैठाया जाए, वहां बैठूं तो बैठा ही रहूं. चलने की कोशिश करूं, तो चल बसूं.’ ‘ऐसा क्यों भला? ‘क्योंकि जिस दिन धरातल पर सुंदर नहीं अपने शक्तिशाली रूप में मैं आ गया, तो जन गण मन के कई माननीय-सम्माननीय भाग्यविधाता लटक जाएंगे. समझे अहमक!’

अब मैं क्या कहता! मैं लटकते लोकपाल और उसके साथ लटक रहे बेताल को वहीं लटका हुआ छोड़ घर आ गया. बेताल बहुत खुश था. उसका अकेलापन दूर भगाने के लिए उसको एक साथी मिल गया था. शायद इसलिए!

-अनूप मणि त्रिपाठी

‘मंझली चाची के इस हश्र पर मैं खुश होऊं या दुखी?’

बात उन दिनों की है जब मैं इंटर में पढ़ती थी. पिता जी सरकारी नौकरी में थे और उनकी तैनाती नागपुर में थी. हम अपनी मां के साथ धनबाद में रहते थे. पांच भाई-बहनों में मैं सबसे छोटी थी. मेरी मां स्कूल में टीचर थीं. हालांकि हम लोगों की अभिभावक बड़ी मां थीं. धनबाद में हमारा एक बड़ा-सा संयुक्त परिवार था. हम दो बड़े चाचा और उनके परिवारों के साथ रहते थे. पिता जी को भी मेरी बड़ी मां ही ने पाला-पोसा था. देखा जाए तो बड़ी मां मेरे पिता की भाभी ही नहीं उनकी मां जैसी भी थीं. बड़े पापा के गुजर जाने के बाद वे हमारे साथ ही रहती थीं. 

बड़ी मां से मेरी बहुत छनती. वे हमें तरह-तरह के पकवान बनाकर खिलातीं. हम भाई-बहनों को आइस्क्रीम, चाट, समोसे वगैरह खाने के लिए पैसे देने आदि का काम अक्सर बड़ी मां ही किया करती थीं. मेरी मां स्कूल के काम के बाद समय निकाल कर शाम का नाश्ता बनातीं. वे रात का भी खाना बनातीं. मेरी मां को बड़ी मां बहुत स्नेह करती थीं. 

बड़ी मां का हम लोगों के प्रति प्रेम भरा रुख बड़े चाचा और मंझले चाचा के परिवार को फूटी आंखों नहीं सुहाता था. वे बड़ी मां से मन ही मन कुढ़ते रहते . मौका पाकर बदसलूकी भी कर देते थे. उनका बड़ी मां के प्रति यह व्यवहार मुझे नागवार गुजरता. मैं सोचती थी कि बड़ी मां चने का सत्तू परिवार के सभी सदस्यों के लिए तैयार करती हैं. मंझले चाचा के घर का गेहूं चुनती हैं. उसे धो-फटक कर सुखा भी देती हैं. बड़े चाचा के यहां जाकर खुद ही चना और उड़द दाल हाथों से लोढ़ी-पाटी में पीसकर बड़ी बनाती हैं. उन्हें धूप में सुखा भी देती हैं. सूख जाने पर समेट कर शीशे के बर्तनों में भर कर रख तक देती हैं. फिर भी उन्हें बदले में ऐसा व्यवहार क्यों मिलता है? परिवार के सभी सदस्यों के लिए वे इतना करती हैं. फिर भी ये लोग उनके साथ बदसलूकी क्यों करते हैं? मैं जब भी इसके खिलाफ बोलती तो छोटी होने की वजह से मुझे चुप करा दिया जाता.

एक दिन मैं कॉलेज से लौटी ही थी. घर में घुसी तो देखा कि मेरे बड़े चचेरे भाई बड़ी मां को मारने के लिए हाथ उठाए खड़े हैं. मेरे ये भैया पुलिस की नौकरी में हैं. हालांकि मैं उन्हें गुस्से से आगबबूला होते देख एकबारगी डर गई थी, लेकिन अगले ही पल मुझमें न जाने कहां से हिम्मत आ गई कि मैंने दौड़कर उनका हाथ पकड़ लिया. नतीजा यह हुआ कि मैंने बड़ी मां को थप्पड़ लगने से बचा लिया. हालांकि इस घटना से वे गहरे तौर पर आहत हुईं और उस रात खाए बगैर ही सोने चली गईं. इस घटना को गुजरे कुछ समय हुआ था कि अगला वाकया मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा झटका बनकर आया. उस रोज सुबह के वक्त बड़ी मां दातून कर रही थीं. मेरे वही भैया आए और हिकारत के भाव से बोले, ‘मुंह में दो-एक दांत बचे हैं फिर घंटों दातून क्यों कर रही है रे बुढि़या?’ 

‘मरने वाली तो गई…चलो दीदी के हाथों में जो सोने के कंगन हैं उन्हें रोने का बहाना करते हुए निकाल लेते हैं. एक तुम रख लेना, एक मैं’

यह सुनकर मैं अवाक रह गई. बड़ी मां भी एकदम से बिफर उठीं. उन्हें अचानक ही खांसी शुरू हो गई. मैं अपनी मां और भाइयों को आवाज लगाती उससे पहले मैंने देखा कि बड़ी मां वहीं आंगन में एक तरफ लुढ़क गई हैं. दवाई लेने मैं घर के अंदर भागी. चम्मच में डालकर उन्हें पिलानी चाही तो देखा कि उनकी आंखें खुली हुई हैं. मुझे समझते देर न लगी कि बड़ी मां नहीं रहीं. मौत को पहली बार इतने करीब से देखा और महसूस किया था मैंने. क्या करूं, समझ में नहीं आ रहा था. मेरी मां और चाचियां, बड़े और मंझले चाचा, तीन चचेरे भाई, एक चचेरी बहन, मेरे अपने तीन सहोदर बड़े भाई और एक बहन, सभी वहां इकट्ठे हो गए थे. सभी अपनी राय दे रहे थे. मेरे बड़े भाई ने तत्काल मेरे पिता को नागपुर तार द्वारा खबर भेजी. मेरे पिता तार पाते ही धनबाद के लिए चल पड़े.

बड़ी मां का शव आंगन में रख दिया गया. टोले-मोहल्ले के लोग उन्हें देखने पहुंचने लगे. इसके बाद जो हुआ वह और हैरान करने वाला था. भीड़ का फायदा उठा कर मेरी मंझली चाची ने मेरी मां से कहा, ‘मरने वाली तो चली गई. इसमें हम लोग क्या कर सकते हैं. चलो, दीदी के हाथों में जो सोने के कंगन हैं उन्हें रोने का बहाना करते हुए निकाल लेते हैं. एक तुम रख लेना और एक मैं.’ 

 मां स्तब्ध रह गईं. उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया. लेकिन चाची कहां मानने वाली थीं. बड़ी मां के शव से लिपट कर उन्होंने रोने का जो नाटक किया वह देखने लायक था. हालांकि सोने के कंगन तो वे नहीं निकाल सकीं. पर बड़ी मां के कान के बुंदे निकालने में उन्हें कामयाबी मिल गई. खैर, मेरे पिता जी दूसरे दिन सुबह होते-होते धनबाद पहुंच गए और फिर बड़ी मां का क्रियाकर्म कर दिया गया.

समय बीतता गया. बड़ी मां के गुजर जाने से जो जख्म पैदा हुए थे वे समय के साथ भर गए. लेकिन मंझली चाची की करतूत मैं आज तक नहीं भुला सकी. चाची ने बड़ी मां के कान से चुराए बुंदे बिना झिझक पहन लिए. लेकिन ऊपर वाले का न्याय देखिए, कुछ ही दिनों के बाद उन्हें कान से सुनाई देना बंद हो गया. कुछ दिन बाद वे विधवा भी हो गईं. मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि मेरी मंझली चाची के इस हश्र पर मैं खुश होऊं या दुखी.

(लेखिका नीरा सिन्हा धनबाद में रहती हैं)

गुंडे चढ़ रहे छाती पर!

 

सात जून. गोरखपुर डिविजनल जेल. जेल से थोड़ी ही दूरी पर मैं और मेरा फोटोग्राफर दो घंटे से खड़े हैं. राइफल के साथ एक दर्जन के करीब पुलिसकर्मी जेल के विशाल गेट पर तैनात हैं. जेल परिसर के बाहर भी पुलिस का एक दल तैनात किया गया है. किसी को हम पर शक न हो इसलिए हमने अपनी गाड़ी जेल की दीवार से थोड़ी दूर एक पेड़ के नीचे खड़ी कर रखी है.

लगभग एक बजे काले शीशों वाली एक सफेद टाटा सूमो (UP 53 AS 8797) जेल के बाहर आकर रुकती है. दो लोग इसमें से निकलते हैं. दोनों की बेल्ट पर वॉकी-टॉकी लगे हैं. अगले आधे घंटे तक उनके और जेल गार्डों के बीच बातचीत होती रहती है. इस दौरान कभी-कभी सम्मिलित ठहाके भी सुनाई देते हैं. 

दो बजे के आस-पास नीले रंग का एक मिनी ट्रक वहां आकर रुकता है. इस पर लिखा है 207 वज्र. तीन कांस्टेबल और एक सब इंस्पेक्टर बाहर आते हैं. वॉकी-टॉकी वाले दोनों व्यक्तियों से थोड़ी देर की बातचीत के बाद सब इंस्पेक्टर जेल के भीतर चला जाता है. 15 मिनट बाद वह अमरमणि त्रिपाठी के साथ बाहर आता है. त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के खतरनाक गैंगस्टर और अब समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता हैं. 58 साल का यह शख्स मधुमिता शुक्ला की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहा है. मधुमिता गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली एक नवोदित कवयित्री थी जिसकी 22 साल की उम्र में लखनऊ स्थित उसके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. यह मई, 2003 की घटना है. हत्या इसलिए हुई क्योंकि मधुमिता ने अपने पेट में पल रहे अमरमणि त्रिपाठी के बच्चे को गिराने से इनकार कर दिया था. हत्या के वक्त उसे छह महीने का गर्भ था. त्रिपाठी तब बसपा सरकार में मंत्री थे. हत्याकांड पर बवाल मचने के बाद मायावती ने त्रिपाठी को न सिर्फ सरकार और पार्टी से रुखसत कर दिया था बल्कि इस मामले को सीबीआई के सुपुर्द भी कर दिया था. जांच में त्रिपाठी को दोषी पाया गया था.

लेकिन जब से अखिलेश यादव ने राज्य के नए मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता संभाली है, तब से त्रिपाठी सजा सिर्फ कागजों पर काट रहे हैं. सही मायने में देखा जाए तो वे आजाद हैं. पिछले तीन महीने से हर दोपहर पुलिस की एक गाड़ी त्रिपाठी को लेने जेल में आती है. ऊपर-ऊपर से इसका मकसद होता है उन्हें इलाज के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर ले जाना. लगभग इसी समय त्रिपाठी का निजी वाहन भी जेल पहुंचता है. जेल से बाहर निकलने के बाद त्रिपाठी पुलिस की गाड़ी में नहीं बल्कि अपनी आरामदेह गाड़ी में सवार होते हैं. पुलिस वाहन उनके पीछे चलता है. गाड़ी बीआरडी मेडिकल कॉलेज पहुंचती है जहां त्रिपाठी एक प्राइवेट लक्जरी रूम में भर्ती होते हैं. तहलका के पास पुख्ता जानकारी है कि इसके बाद अगले कई घंटों तक इस कमरे में एक दरबार लगता है. इसमें उनके गैंग के सदस्य और समर्थक भी होते हैं. रोज की इस पंचायत में त्रिपाठी शिकायतें सुनते हैं, फोन लगाते हैं, अफसरों को चिट्ठियां लिखते हैं, प्रॉपर्टी के सौदों का मोलभाव करते हैं, जमीन के झगड़ों में मध्यस्थता करते हैं और अपने गैंग के साथ बैठक भी करते हैं. शाम को उन्हें फिर जेल पहुंचा दिया जाता है ताकि उम्र कैद का दिखावा जारी रखा जा सके.

उम्रकैद का मतलब है आजीवन कैद. लेकिन व्यवहार में देखा जाए तो कोई अपराधी 14 साल के बाद अपनी रिहाई के लिए अपील कर सकता है जो ज्यादातर मौकों पर मंजूर भी हो जाती है. बहुमत पाई समाजवादी पार्टी की सरकार का कार्यकाल 2017 में पूरा होना है. त्रिपाठी 2003 से जेल में हैं. इसलिए यह माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के साथ ही त्रिपाठी की कैद एक तरह से खत्म हो गई है.

त्रिपाठी के जेल के गेट से बाहर निकलते ही एक आदमी फुर्ती से टाटा सूमो के दरवाजे के पास खड़ा हो जाता है. नीला कुरता, चमड़े की चप्पल और काला चश्मा पहने त्रिपाठी गाड़ी की ओर बढ़ते हैं. हम तस्वीरें खींचना शुरू कर देते हैं. त्रिपाठी की नजर हम पर पड़ जाती है. वे पीछे मुड़ते हैं और सीधे हमारी तरफ आते हैं.

धमकी भरे अंदाज में कहते हैं, ‘किसी की इजाजत के बगैर उसकी तसवीरें लेना ठीक बात नहीं है.’

‘मैं अपनी हद जानता हूं. मैं एक सार्वजनिक सड़क पर खड़ा हूं और सार्वजनिक हित का काम कर रहा हूं.‘ मैं कहता हूं.

‘कौन हैं आप’, उधर से सवाल दागा जाता है.

 ‘मैं एक पत्रकार हूं. दिल्ली से आया हूं, ‘यह कहने के साथ ही त्रिपाठी को अपना विजिटिंग कार्ड थमाता हूं.

‘आप पहले मुझसे क्यों नहीं मिले?’, त्रिपाठी फिर पूछते हैं.

इसके बाद वे मेरे सहयोगी की तरफ मुड़ते हैं और उसे तुरंत पहचान लेते हैं. वह एक स्थानीय फोटो पत्रकार है. त्रिपाठी कहते हैं, ‘बचवा, तुम तो यहीं के हो. सब अच्छा है?’ वे उसके चेहरे पर अपने दोनों हाथ रखते हैं और जोर से दबाते हैं. तब तक पुलिसकर्मी और त्रिपाठी के आदमी भी हमें चारों तरफ से घेर चुके हैं.

त्रिपाठी फोटो पत्रकार को आदेश देते हैं, ‘पिक्चरें डिलीट कर दो.’

मैं हस्तक्षेप करते हुए कहता हूं, ‘तस्वीरें डिलीट नहीं होंगी.’

त्रिपाठी मेरी तरफ मुड़ते हैं. कुछ देर सोचते हैं और फिर कहते हैं, ‘प्लीज, अब आप चले जाएं.’

मैं कहता हूं, ‘पहले आप.’

जवाब आता है, ‘नहीं, हम आपके प्रोटोकाल में खड़े हैं.’

मैं कार में बैठता हूं और ड्राइवर से चलने के लिए कहता हूं. 100 मीटर आगे जाने के बाद हम रुकते हैं और कुछ और फोटो खींचते हैं. 

हमारी योजना अस्पताल में त्रिपाठी के दरबार की तस्वीरें लेने की भी थी. लेकिन बाद में हमने यह विचार त्याग दिया. हमें लगा कि चूंकि हमें देख लिया गया है इसलिए ऐसा करना सुरक्षित नहीं होगा. 

त्रिपाठी का पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक व्यवस्थित अपराध सिंडीकेट है. उनका रिकॉर्ड खंगालने पर तीन दर्जन से भी ज्यादा मामलों के बारे में पता चलता है जिनमें उन पर हत्या, फिरौती वसूलने, अपहरण, हत्या की कोशिश जैसे संगीन आरोप रहे हैं. मधुमिता हत्याकांड की सीबीआई जांच से पहले किसी भी स्थानीय अदालत में उनके खिलाफ कोई फैसला नहीं हो पाया था. इन मामलों में अक्सर गवाह या तो बयान से मुकर जाते या फिर सबूत गायब हो जाते थे. केस स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से चले, यह सुनिश्चित करने के लिए फरवरी, 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि मधुमिता हत्याकांड की जांच एक विशेष सीबीआई जज द्वारा देहरादून में की जाए. त्रिपाठी के गढ़ गोरखपुर से 800 किमी दूर. 

लेकिन जहां सुप्रीम कोर्ट ने  न्याय की प्रक्रिया में त्रिपाठी को एक खतरा माना वहीं 2007 के चुनावों में समाजवादी पार्टी ने उन्हें महाराजगंज जिले की लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से टिकट दे दिया. त्रिपाठी ने जेल से ही चुनाव लड़ा और 20,000 वोट से जीत गए. इसके छह महीने बाद अक्टूबर, 2007 में देहरादून स्थित अदालत ने उन्हें मधुमिता शुक्ला हत्या मामले में उम्रकैद की सजा सुना दी. 

मायावती के पांच साल के शासनकाल के दौरान त्रिपाठी देहरादून जेल में ही रहे. जून, 2011 में अदालत ने उन्हें उनकी मां के अंतिम संस्कार के लिए गोरखपुर आने की इजाजत दे दी. बताया जाता है कि अंतिम संस्कार के दौरान बीमारी का बहाना बनाकर वे बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो गए. अस्पताल के कुछ अधिकारियों की मदद के चलते वे दो महीने से भी ज्यादा समय तक अस्पताल में रहने में सफल हो गए. जब यह बात प्रकाश में आई तो मायावती सरकार ने वापस उन्हें देहरादून जेल में भेज दिया. यही नहीं, इस मामले में एक पुलिस इंस्पेक्टर और चार कांस्टेबलों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी हुई. इसके साथ ही यह भी आदेश हुआ कि उन डॉक्टरों के खिलाफ जांच हो जिन्होंने त्रिपाठी को उनके मनमुताबिक मेडिकल रिपोर्टें दीं. 

लेकिन 15 मार्च को एक तरफ अखिलेश सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे और दूसरी ओर त्रिपाठी को देहरादून से गोरखपुर डिविजनल जेल ले लाया जा रहा था. यादव प्रभुत्व वाली समाजवादी पार्टी में त्रिपाठी एक अहम ब्राह्मण नेता हैं. चूंकि उन पर आपराधिक आरोप साबित हो चुके थे, इसलिए वे कोई चुनाव नहीं लड़ सकते थे. ऐसे में सपा ने 2012 के विधानसभा चुनाव में उनके बेटे अमनमणि त्रिपाठी को महाराजगंज जिले की ही नौतनवा सीट से टिकट दे दिया. लेकिन माना यही जा रहा था कि असली उम्मीदवार तो अमरमणि त्रिपाठी ही हैं. उन्होंने जेल से ही एक वीडियो भी जारी किया जिसमें उन्होंने वोटरों से उनके बेटे को वोट देने की अपील की थी. वीडियो में उन्होंने कहा था कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनाए और गिराए हैं. वोटरों से वे कह रहे थे कि उन्होंने हमेशा अपने लोगों की रक्षा की और अब उनकी बारी है कि वे इसका बदला चुकाएं और उनके सम्मान की रक्षा करें. 

15 मार्च को एक तरफ अखिलेश मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे और दूसरी ओर त्रिपाठी को देहरादून से गोरखपुर डिविजनल जेल ले लाया जा रहा था

तहलका को पता चला है कि गोरखपुर वापस आने के लिए त्रिपाठी ने अपने खिलाफ गोरखपुर और इसके आस-पास के जिलों में चेक बाउंस होने संबंधी तीन फर्जी केस दर्ज करवाए. स्थानीय पुलिस अधिकारी बताते हैं कि इन मामलों में शिकायत करने वाले त्रिपाठी के अपने ही लोग हैं. इसके बाद त्रिपाठी के वकीलों ने अदालत को बताया कि अदालती कार्यवाही के लिए ज्यादा व्यावहारिक यह होगा कि पेशी के लिए उनका मुवक्किल देहरादून के बजाय गोरखपुर से आए. अदालत से इस संबंध में एक आदेश भी ले लिया गया. इसके बाद त्रिपाठी गोरखपुर जेल में आ गए जहां वे कैदी से ज्यादा एक आजाद व्यक्ति हैं. नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, ‘अगर स्वतंत्र जांच हो तो चेक बाउंस होने के इन फर्जी मामलों की सच्चाई सामने आ सकती है. इससे पता चल जाएगा कि कैसे अमरमणि त्रिपाठी न्याय का मखौल उड़ा रहे हैं.’

चेक बाउंस संबंधी ये मामले फर्जी थे, यह बात गोरखपुर में सभी जानते हैं. हर चेक के मामले में धनराशि 50 हजार से एक लाख रु तक थी. देखा जाए तो करोड़ों रु के आसामी त्रिपाठी के लिए यह रकम कुछ भी नहीं. गोरखपुर में बहुत-से लोग मिलते हैं जो दबी जबान में बताते हैं कि कैसे ये मामले बनाए गए ताकि त्रिपाठी गोरखपुर में रह सकें. स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि त्रिपाठी जब चाहें, कोई भी जेल में उनसे मिलने आ सकता है. यह भी कि वे जेल के भीतर मोबाइल और कंप्यूटर का बेझिझक इस्तेमाल करते हैं. जब त्रिपाठी जेल परिसर से बाहर निकल रहे थे तो हमने खुद भी उनके एक सहयोगी के हाथ में एक लैपटॉप बैग देखा था.

बीती 20 अप्रैल को गोरखपुर के एसएसपी आशुतोष कुमार ने गृह विभाग को एक गोपनीय रिपोर्ट भेजकर जेल से बाहर त्रिपाठी की अवैध आवाजाही के बारे में बताया था. सूत्रों के मुताबिक एसएसपी ने जेल के बाहर त्रिपाठी के समर्थकों के अवैध जमावड़े और जेल में उनकी निर्बाध पहुंच की वीडियोग्राफी भी की थी. लेकिन अब तक कुमार की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

त्रिपाठी के बेटे अमनमणि 7,837 वोटों के मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे. उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार कौशल किशोर ने हराया था. लेकिन इससे पिता-पुत्र की इस जोड़ी पर कोई फर्क नहीं पड़ा. जिला प्रशासन को उनकी दबंगई अब भी झेलनी पड़ती है. जेल के भीतर से ही त्रिपाठी खुल्लमखुल्ला जिले के अधिकारियों को निर्देश देती चिट्ठियां भेजते हैं. जैसे कि वे सजायाफ्ता अपराधी न होकर कोई मंत्री हों. तहलका के पास मौजूद ऐसे दो पत्र बताते हैं कि जिला प्रशासन को न सिर्फ त्रिपाठी की तरफ से ऐसे पत्र मिल रहे हैं बल्कि वह उनके निर्देशों के हिसाब से कार्रवाई भी कर रहा है. 

उदाहरण के लिए, चार मई को त्रिपाठी ने महाराजगंज की जिला पंचायत के अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी को एक पत्र लिखा. इसके शब्द हैं : ‘राज्य वित्त आयोग योजना के तहत, मैं अपने विधानसभा क्षेत्र में निम्नलिखित चार कार्यों का प्रस्ताव करता हूं. कृपया जनहित में इन्हें प्राथमिकता के आधार पर करवाएं.’ करीब हफ्ते भर बाद 12 मई को त्रिपाठी ने इन्हीं अधिकारी को एक और पत्र लिखा. इसमें उन्होंने करीब आधा दर्जन कार्यों की एक सूची देते हुए उन्हें पूरा करने के लिए कहा था. अधिकारी ने इंजीनियर को निर्देश दिए जिसमें कहा गया था कि त्रिपाठी द्वारा बताए गए कार्यों को मंजूरी दी जाए. 

विकास कार्यों में दखलअंदाजी तो त्रिपाठी की कारगुजारियों का छोटा पहलू है. महाराजगंज से कांग्रेस विधायक कौशल किशोर मुख्यमंत्री को लिख चुके हैं कि सपा की सरकार बनने के बाद त्रिपाठी के गैंग ने 68,000 वर्गफुट क्षेत्रफल वाली सरकारी जमीन के एक टुकड़े पर कब्जा कर लिया है. किशोर कहते हैं, ‘अगर सरकार पूर्व विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती तो मैं यह मुद्दा विधानसभा में उठाऊंगा’.

अमरमणि त्रिपाठी अकेले अपराधी नहीं हैं जिन्हें अखिलेश यादव के बागडोर संभालने के बाद राहत मिली है. उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के कुख्यात अपराधी और समाजवादी पार्टी के विधायक अभय सिंह भी अब पुरानी रंगत में लौट आए हैं.मायावती के शासनकाल के एक बड़े हिस्से में अभय सिंह हमीरपुर जेल में रहे. यह उनके विधानसभा क्षेत्र फैजाबाद से 300 किलोमीटर दूर है. अभय को हमीरपुर जेल में रखने के पीछे बसपा सरकार का तर्क यह था कि इससे उन्हें उनके गैंग से दूर रखा जा सकेगा और जिले में कानून व्यवस्था भी बेहतर होगी. लेकिन अखिलेश की ताजपोशी के दो दिन बाद यानी 17 मार्च, 2012 अभय सिंह को हमीरपुर से स्थानांतरित करके फैजाबाद डिविजनल जेल में भेज दिया गया. राज्य सरकार का दावा था कि हमीरपुर जेल में अभय सिंह की जिंदगी को खतरा है. अपने इलाके की जेल में लौटने के बाद सिंह वहां राजसी ठाठ-बाठ से रहने लगे. 

नवभारत टाइम्स के जिला संवाददाता वीएन दास कहते हैं,‘फैजाबाद जेल में अभय सिंह से हर रोज 100-150 समर्थक मिलने आते हैं.’ नियम कहते हैं कि एक सप्ताह में किसी भी कैदी से छह से ज्यादा लोग मिलने नहीं आ सकते. दास आगे बताते हैं, ‘चर्चा यह भी है कि सिंह जेल में कंप्यूटर और मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.’ दास ने अपनी एक खबर में इस बात का भी जिक्र किया था कि सिंह जेल में भी गैर-कानूनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं. लेकिन न जेल अधिकारियों ने और न ही जिला प्रशासन ने उस खबर को संज्ञान में लिया. 

24 मई को समाजवादी पार्टी की सरकार ने यह निर्णय लिया कि फैजाबाद जिले में यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज एक मामला वापस लिया जाए (पत्र संख्या 104 डब्ल्यूसी/सेवन-जस्टिस-5-2012-42). सिंह के खिलाफ लंबित 18 मामलों में से यही एक ऐसा मामला है जिसमें उन्हें जमानत नहीं मिली थी जिसके चलते वे जेल में दिन गुजार रहे हैं. राज्य सरकार ने फैजाबाद न्यायालय में कहा कि इस मामले को ‘न्याय के हित’ में वापस लिया जा रहा है. जिला पुलिस के नए एसएसपी रमित शर्मा ने राज्य सरकार की इस इच्छा पर अपनी सहमति जाहिर की है. हालांकि दो साल पहले इसी जिला पुलिस ने अभय सिंह के खिलाफ यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था. दो साल पहले दर्ज की गई प्राथमिकी संख्या (677/10) में यह कहा गया था, ‘सिंह का आतंक आम लोगों में इस कदर व्याप्त है कि वे उनके खिलाफ गवाही देने तक से डरते हैं.’ 

राज्य चुनाव आयोग के सामने पेश किया गया सिंह का हलफनामा भारतीय दंड संहिता की धाराओं का संग्रह लगता है. यह बताता है कि सिंह के खिलाफ 18 आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें उनके खिलाफ हत्या, उगाही, सार्वजनिक कर्मचारियों को प्रताड़ित करने, दंगा, गैर-कानूनी तरीके से भीड़ जुटाने, अवैध हथियार रखने जैसे आरोप हैं. 

उत्तर प्रदेश में किसी माफिया डॉन के खिलाफ आरोप साबित करना असंभव सा है. अपराधियों के खिलाफ चल रही जांच-पड़ताल की कार्रवाइयों में या तो ढिलाई बरती जाती है या फिर गवाह बयान से मुकर जाते हैं. सिंह को लखनऊ जेल के अधीक्षक आरके तिवारी की हत्या के मामले में बरी किया जा चुका है. गौरतलब है कि इस मामले में सभी 36 गवाह अपने बयान से पीछे हट चुके हैं. सिंह के गैंग का संबंध पूर्वी उत्तर प्रदेश के खतरनाक मुख्तार अंसारी गैंग से भी है. दोनों गैंग हत्या, अपहरण और जबरन वसूली जैसे अपराधों में लिप्त हैं. 

लेकिन समाजवादी पार्टी के टिकट और बीएसपी के खिलाफ चुनावी लहर ने अभय सिंह को फैजाबाद के गोसाईंगंज विधानसभा क्षेत्र से विधायक बनवा दिया. सिंह ने चुनाव भारी अंतर से जीता था. मामला वापस लेकर सरकार ने सिंह की जेल से रिहाई का रास्ता भी साफ कर दिया. न्याय का मजाक उड़ाते हुए फैजाबाद में तैनात सब-इंस्पेक्टर संजय नागवंशी ने न्यायालय के समक्ष 28 मई को कहा कि इस मामले को वापस लिया जाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. एक साल पहले इन्हीं संजय नागवंशी ने अभय सिंह को नामजद करने की सिफारिश की थी. सिंह को 28 मई को ही हवालात से छोड़ दिया गया. 

सिंह पर फैजाबाद में ही गैंगस्टर एक्ट के दो अन्य मामले (संख्या 361/05 और 2808/05) भी चल रहे हैं. इसी एक्ट के तहत लखनऊ में दर्ज चार और मामलों (केस संख्या 428/1999, 269/2000, 224/2001, 310/2008, ) में भी उनके खिलाफ कभी-भी सुनवाई शुरू हो सकती है. पुलिस द्वारा दर्ज इन मामलों पर नजर डालें – जोकि 1999 से 2012 के बीच भाजपा, बीएसपी और सपा की सरकारों के शासनकाल में दर्ज किए गए हैं – तो पता चलता है कि सिंह की आमदनी का मुख्य जरिया उगाही, हफ्ता वसूली और सरकारी टेंडरों पर जबरन कब्जा रहा है.

सपा सरकार का सिंह के खिलाफ मामले को वापस लेने का निर्णय हैरान करने वाला है. सिंह के खिलाफ छह मामलों में सरकारी वकील यह साबित करने में लगे हुए हैं कि वे संगठित अपराधों के सरगना रहे हैं जबकि जिस एक मामले में उन्हें न्यायालय से जमानत नहीं मिली उसी में सपा सरकार ने उनके खिलाफ लगे आरोप वापस ले लिए. राज्य सरकार अभय सिंह पर छह मामलों में गैंगस्टर का आरोप सिद्ध करना चाहती है और एक विशेष मामले में उन्हें आरोप से मुक्त करना चाहती है. सवाल उठता है कि यह कैसा विरोधाभास है.

हम यह सवाल फैजाबाद के एसएसपी रमित शर्मा से करते हैं

उनके कार्यालय में मैं शर्मा से सवाल करता हूं, ’अभय सिंह के मामले को वापस लेने के पीछे क्या वजह है?’

शर्मा कहते हैं, ‘यह अदालत और पुलिस के बीच का मामला है. हमने अदालत को अपनी राय दे दी है.’

‘जो कि जहां तक मेरा अंदाजा है, उन्हें फायदा पहुंचाने वाली है.’, मैं कहता हूं.

शर्मा गुस्से में कहते हैं, ‘आप यह सवाल करने वाले कौन होते हैं?’

‘मेरे हिसाब से जनहित में यह जानना जरूरी है कि आखिर क्यों दो मामलों में पुलिस अभय सिंह को कानून और व्यवस्था के लिए खतरा मानती है मगर तीसरे में नहीं.  ’

‘नोटबुक उठाइए और जाइए’, जवाब आता है.

अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता का अधिकार इस्तेमाल करने की मैं एक और कोशिश करता हूं, ‘लेकिन मेरा मानना है कि लोगों को यह जानने का अधिकार है.’

‘जाते हैं कि मैं आपके खिलाफ कारवाई करूं?’, सिपाही को मुझे बाहर करने का संकेत करते हुए शर्मा कहते हैं. नोटबुक उठाकर मैं वहां से निकल जाता हूं. लेकिन फैजाबाद में दो दिन पड़ताल करने के दौरान तहलका को पता चला कि एक ओर अभय सिंह पर लगे आरोपों को वापस लिया जा रहा है तो दूसरी ओर उनके विरोधियों पर झूठे मामले लादे जा रहे हैं.

18 मई को सिंह गैंग के एक सदस्य विजय गुप्ता ने जबरन वसूली का आरोप पुलिस में दर्ज कराया. विचित्र बात तो यह है कि गुप्ता पर पहले से ही गुंडा टैक्स की वसूली के आरोप हैं. गुप्ता पर यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत हत्या का मामला चलाया जा रहा है. लेकिन रमित शर्मा के नेतृत्व में जिला पुलिस ने गुप्ता की शिकायत पर 30 मई को चार लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मातंबर सिंह ने यह पाया कि पुलिस गुप्ता के आरोपों की पुष्टि के लिए कोई भी ठोस सबूत नहीं जुटा पाई. गुप्ता ने अपनी शिकायत में विनय सिंह का उल्लेख किया है. विनय, अभय सिंह के गांव के ही रहने वाले हैं. वे कहते हैं, ‘विधानसभा चुनाव में हमने अभय सिंह के खिलाफ प्रचार किया था. जिला पुलिस उनके इशारों पर काम कर रही है और राजनीतिक वजहों से हमारे खिलाफ मामले चलाए जा रहे हैं.’

अखिलेश की ताजपोशी के दो दिन बाद यानी 17 मार्च 2012 को अभय सिंह को हमीरपुर से स्थानांतरित करके फैजाबाद डिविजनल जेल में भेज दिया गया

फैजाबाद के विकास कार्य से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पीडब्ल्यूडी, सिंचाई, राजकीय निर्माण निगम और जिला जल निगम से जुड़े ठेके अभय सिंह और उसके गैंग के सदस्यों को सौंपे जा रहे हैं. यह कोई अचरज की बात नहीं है. पिछले 15 साल के दौरान राज्य की सभी पुलिस एजेंसियों ने अभय सिंह और उसके गैंग के सदस्यों के मामले में यह पाया है कि वे विकास कार्यों से जुड़े अधिकारियों और ठेकेदारों को धमकियां देते रहे हैं और उनसे कमीशन वसूलते रहे हैं.मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी पारी की शुरुआत में कहा था कि उनकी यह सरकार सबसे अलग होगी. सपा की पिछली सरकारों का कार्यकाल सरकार और अपराधी तत्वों के बीच गठजोड़ का उदाहरण बन गया था. ऐसे में जब अखिलेश ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली डीपी यादव को अपनी पार्टी में नहीं आने दिया तो यह धारणा बनी कि वे जो कह रहे हैं उस पर अमल करने की दिशा में भी वे गंभीर हैं.  

लेकिन साफ था कि अपने पिता मुलायम, चाचा शिवपाल और वरिष्ठ नेता आजम खान जैसे कई सत्ता केंद्रों के बीच में खड़े अखिलेश के हाथ पूरी तरह से खुले नहीं थे. ऐसे में जब उन्होंने कम से कम ऐसे आठ लोगों को टिकट दिए जो पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक पक्के अपराधी हैं तो मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस पर सवाल उठाने में नाकामयाब रहा.

1. शेरबाज खान- दर्जन भर से ज्यादा आपराधिक मामलों के इतिहास वाले खान को चांदपुर से टिकट मिला. इनमें फर्जीवाड़े से लेकर यूपी गैंगस्टर एक्ट तक आरोप थे. खान को चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा.

2. भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित को डिबाई, बुलंदशहर से टिकट दिया गया. पंडित पर बलात्कार, अपहरण, फिरौती वसूलने आदि जैसे कई आरोपों में मुकदमे दर्ज हैं जिनका उनके चुनावी शपथ पत्र में भी जिक्र है. पंडित को जीत मिली.

3. कुख्यात डकैट लाला राम के बेटे रामेश्वर सिंह यादव का रिकॉर्ड 50 से भी ज्यादा आपराधिक मामलों का है. यादव को एटा के अलीगंज से उतारा गया और उन्हें भी जीत मिली.

4. एक समय दो दर्जन से ज्यादा मामलों में आरोपी हिस्ट्रीशीटर दुर्गा प्रसाद यादव को आजमगढ़ से सपा का टिकट मिला. आठ साल पहले यादव पर एक अस्पताल में चार लोगों की हत्या का आरोप लगा था. यादव न सिर्फ चुनाव जीते बल्कि उन्हें मंत्री पद भी दिया गया. हाल ही में उन्होंने मीडिया से कहा था, ‘उत्तर प्रदेश में अपराध नहीं रुकेगा चाहे भगवान भी यहां सरकार बना ले.’

5. मित्रसेन यादव को दिसंबर 2011 में फैजाबाद के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने एक मामले में सात साल की कड़ी सजा सुनाई थी. एक समय वे दो दर्जन से भी ज्यादा मामलों में आरोपी थे. उन्हें फैजाबाद की बीकापुर सीट से टिकट मिला और वे जीते भी.

6. महबूब अली- 1999 से 2011 के बीच दर्ज हुए 12 आपराधिक मामलों के आरोपी अली को ज्योतिबा फुले नगर की अमरोहा सीट से टिकट दिया गया था. एक स्टिंग ऑपरेशन में वे यह कहते हुए दिखे थे कि वे अपने आधिकारिक वाहन में ड्रग्स लेकर जा सकते हैं. वे अब कपड़ा और रेशम उत्पादन मंत्री हैं. 

­7. अभय सिंह

8. माफिया डॉन विजय मिश्रा—25 आपराधिक मामलों के इतिहास वाले मिश्रा को संत रविदास नगर की ज्ञानपुर विधानसभा सीट से टिकट मिला था. मिश्रा पर हत्या से लेकर फर्जीवाड़े, दंगा फैलाने, लूटपाट जैसे कई आरोप हैं. 2002 और 2007 में भी सपा के टिकट पर इसी सीट से विधायक रहे हैं. इस बार भी वे जीते.

जिन आठ नामों का जिक्र ऊपर हुआ है, इनमें से तीन-अभय सिंह, शेरबाज खान और विजय मिश्रा ने जेल से ही चुनाव लड़ा. सिंह अब आजाद हैं. मिश्रा जेल में हैं मगर यह नाम की ही जेल है. इस स्टोरी के लिखे जाने तक दो हफ्ते से वे लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल के प्राइवेट एसी रूम में थे. अदालत ने मिश्रा को बजट सत्र के लिए विधानसभा जाने की इजाजत भी दे दी थी, मगर इस शर्त के साथ कि उन्हें लखनऊ जिला जेल की साधारण बैरक में रखा जाएगा और रोज विधानसभा की कार्यवाही खत्म होते ही वापस जेल पहुंचा दिया जाएगा. लेकिन बीमारी के बहाने मिश्रा ने खुद को अस्पताल में भर्ती करवा लिया. पुलिस वाहन के बजाय अपनी टोयोटा फॉर्च्यूनर गाड़ी में सवार होकर वे रोज विधानसभा जाते थे. ये दोनों गाड़ियां मिश्रा के प्राइवेट वार्ड के बाहर खड़ी थीं. 

मायावती सरकार के कार्यकाल में मिश्रा के 13 महीने मेरठ जेल में कटे. यह जगह उनके प्रभाव वाले इलाहाबाद, वाराणसी और संत रविदास नगर जैसे इलाकों से सैकड़ों किलोमीटर दूर थी. उन पर 12 जुलाई, 2010 को इलाहाबाद में बम से एक हमला करने का आरोप था. यह हमला मायावती सरकार मंे मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पर किया गया था. इसमें इंडियन एक्सप्रेस अखबार के फोटोग्राफर की मौत हो गई थी. नंदी और उनके सुरक्षा अधिकारी इस घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. आठ महीने तक मिश्रा फरार रहे. आखिरकार यूपी स्पेशल टास्क फोर्स ने दिल्ली पुलिस की मदद से उन्हें दिल्ली के ही उनके एक ठिकाने से 11 फरवरी , 2011 को गिरफ्तार किया था. अखिलेश यादव के शपथ लेने के थोड़ी ही देर बाद 15 मार्च को सरकार ने एक आदेश पारित किया. इसमें कहा गया था कि मिश्रा को उनके गृहनगर इलाहाबाद की नैनी जेल लाया जाए. 

जब हम मिश्रा से उनके प्राइवेट रूम में मिले तो उन्होंने अस्पताल में रहने के कई कारण गिनाए. उन्होंने बताया कि उन्हें स्पोंडिलाइटिस, स्लिप डिस्क और हाई कोलेस्ट्राल की शिकायत है. लेकिन एक घंटे की बातचीत के दौरान हमें उनमें दर्द के कोई लक्षण नहीं दिखे. वे बेड पर सीधे बैठे हुए थे. बातचीत के दौरान वे बेड से उछलकर सोफे पर हमारे बगल में बैठ गए. इस दौरान उनका प्राइवेट स्टाफ उन्हें सूखे मेवे, चाय और सिगरेट पेश करता रहा. हमें पता चला कि मिश्रा अस्पताल में मरीजों के लिए परोसा जाने वाला खाना नहीं खाते. बाद में हमें यह भी पता चला कि सरकार मिश्रा पर चल रहा बम हमले वाला मामला वापस ले सकती है. मिश्रा द्वारा लिखे गए वे दो पत्र तहलका के पास हैं जिनमें उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि उनके खिलाफ दर्ज 15 आपराधिक मामले वापस लिए जाएं.

जिस दिन तहलका ने अमरमणि त्रिपाठी को अवैध तरीके से जेल से बाहर जाते पकड़ा, उसी दिन प्रदेश के जेल राज्य मंत्री इकबाल महमूद भी गोरखपुर में थे. हम गोरखपुर सर्किट हाउस में उनसे मिले और उन्हें वह सब बताया जो देखा था. महमूद का जवाब था कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. हमने उन्हें बताया कि त्रिपाठी ने हमें अप्रत्यक्ष रूप से धमकी दी और हमसे तस्वीरें डिलीट करने के लिए कहा. इसके जवाब में उनका भाषण तैयार था, ‘हमारे युवा मुख्यमंत्री को बदनाम करने के लिए साजिश हो रही है. विरोधियों को लग गया है कि कम से कम अगले 20 साल तक इस नौजवान को सत्ता से नहीं उखाड़ा जा सकता. इसलिए वे झूठी अफवाहें फैला रहे हैं. ‘ जैसे ही हम जाने को हुए उन्होंने पूछा, ‘तो क्या आपने तस्वीरें डिलीट कर दीं?’ आखिर में हम अंबिका चौधरी से मिले. चौधरी, अखिलेश की कोर टीम में होने के साथ-साथ राजस्व मंत्री भी हैं. जब हमने उन्हें अपनी पड़ताल के बारे में बताया तो उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि अपराधियों को खुला छोड़ना सरकार की नीति नहीं है. उनका कहना था, ‘मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि किसी भी तरह की अवैध गतिविधि को ऊपर से कोई मंजूरी नहीं है. मायावती के कार्यकाल में प्रशासन पूरी तरह से ढह गया था. चीजों को पटरी पर लाने के लिए नई सरकार को कम से कम छह महीने चाहिए.’

(वीरेंद्र नाथ भट्ट के सहयोग के साथ)

 

दुश्मनी का दांव

बिहार के गांव-देहात में एक कहावत बहुत प्रचलित है. जब टनाटन धूप निकली रहे, बादल का कहीं कोई अता-पता न हो और अचानक टपाटप बारिश होने लगे तो कहीं सियार की शादी हो रही होगी. पिछले पखवाड़े जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने सबसे भरोसेमंद राजनीतिक परिवार के खांटी सदस्य नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा और उसके बाद दोनों दलों के शब्दवीर बयानों का बाणयुद्ध करने लगे तो एक बड़े वर्ग का यही कहना था- कुछ नहीं, यह सियार की शादी है.

दरअसल अब तक नीतीश इतनी बार मोदी पर निशाना साध चुके हैं कि अब उनके कहे को गुड़ खाए-गुलगुले से परहेज कहकर चुटकी ली जाती है. राजनीतिक प्रेक्षक कहते हैं कि अपनी राजनीतिक यात्रा आगे बढ़ाते रहने के लिए मोदी को रोमांटिक दुश्मन बनाए रखना और उसका अहसास कराते रहना नीतीश की जरूरत और मजबूरी दोनों है. कुछ वैसे ही जैसे बिहार में लालू प्रसाद की सक्रियता नीतीश को कुछ अलग और नई उम्मीदों का नेता बनाने में रामबाण की तरह काम करती रही है. 

जानकार मानते हैं कि नीतीश ने राष्ट्रपति चुनाव में प्रधानमंत्री की बात छेड़कर और मोदी को निशाने पर लेकर यह एक गहरी चाल भी चली है. दरअसल बिहार की राजनीति में वे इन दिनों लगातार चक्रव्यूह में घिरते नजर आ रहे थे. बक्सर के चैसा में सेवायात्रा के दौरान उनके काफिले पर हमला हुआ. रणवीर सेना सुप्रीमो मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद पटना में हुई गुंडागर्दी से उनके सुशासन पर सवाल उठे. इसके अलावा एक साल पहले फारबिसगंज में हुए पुलिस गोलीकांड के बाद भी न्याय न मिलने से अल्पसंख्यक समुदाय के एक हिस्से में बढ़ते आक्रोश और दिल्ली में सारी जोर आजमाइश के बाद बिहार लौटे लालू प्रसाद की सक्रियता ने भी नीतीश को परेशान कर रखा था. दूसरी ओर मीडिया का एक खेमा भी उनके निष्पक्ष आकलन में लग गया था. ऐसे में नीतीश ने मोदी कार्ड का इस्तेमाल करके सभी सवाल हाशिये पर धकेल दिए और सबको उलझे रहने के लिए एक झुनझुना भी थमा दिया.  

एक-दूसरे को घेरने का नीतीश और मोदी का यह खेल 2008 में शुरू हुआ था. यह बात अलग है कि दरमियान दोनों नेता हाथ मिलाकर मीडिया में पोज भी देते रहे. 2008 में कोसी बाढ़ के बाद नरेंद्र मोदी ने बिहार को पांच करोड़ रुपये दिए थे. नीतीश ने यह रकम लौटा दी. नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की दोस्ती का पोस्टरमार प्रचार हुआ तो नीतीश इतने गुस्से में आए कि उन्होंने भाजपा के केंद्रीय नेताओं के साथ पटना में आयोजित भोज रद्द कर दिया था. नीतीश ने बाद में भी मोदी फोबिया बनाए रखा. 2009 में लोकसभा और 2010 में विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश ने मोदी को बिहार में प्रचार के लिए नहीं आने दिया. 

इस बीच मौका पाकर नरेंद्र मोदी भी नीतीश पर निशाना साधते रहे. पिछले पखवाड़े से जिन बयानों को लेकर सियासी गरमी बढ़ी है, उनकी शुरुआत भी मोदी ने ही की. 10 जून को मोदी ने गुजरात में भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में कहा कि बिहार कभी शानदार राज्य हुआ करता था लेकिन वहां की जातिवादी राजनीति और जातीय नेताओं ने उसे पीछे धकेला है. इसके बाद नीतीश ने तुरंत मोदी का नाम लिए बगैर कहा कि लोगों को अपना घर देखना चाहिए. लेकिन जानकारों के मुताबिक इतना भर कह देने से मोदी को जवाब नहीं दिया जा सका था, इसलिए 15 जून को जब अपनी पार्टी के राज्य कार्यकारिणी की बैठक की बारी आई तो नीतीश ने दूसरा राग छेड़ मोदी को कुरेदा. बिहार प्रदेश जदयू कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने कहा कि देश का प्रधानमंत्री सेक्युलर होना चाहिए और बिहार जैसे पिछड़े प्रदेश की चिंता करने वाला भी. लेकिन मीडिया में यह बयान उभर न सका. नीतीश ने फिर इसी बात को थोड़ा और विस्तारित करते हुए एक अखबारी इंटरव्यू के जरिए प्रसारित किया तब जाकर हो-हंगामा शुरू हो सका. 

मोदी बनाम नीतीश के नाम पर शुरू हुआ यह उफानी खेल भले ही अतीत की तरह जल्द ठंडा पड़ जाए लेकिन इससे उठे सवालों की आग जल्द शांत नहीं होने वाली

हो सकता है मोदी बनाम नीतीश के नाम पर शुरू हुआ यह उफानी खेल पहले की तरह शीघ्र ही नेपथ्य में चला जाए. लेकिन इस बार का यह रगड़ा-झगड़ा कई सवालों को खड़ा कर चुका है और आगे भी करेगा. नीतीश ने प्रधानमंत्री पद के लिए धर्मनिरपेक्षता का हवाला दिया है तो इससे उनके सामने भी कई ऐसे सवाल खड़े होंगे, जिनका जवाब वे आसानी से नहीं दे पाएंगे. नीतीश कुमार और भाजपा का जोड़ काफी पुराना है. यह 1996 में तब हुआ था जब जदयू के बजाय नीतीश समता पार्टी के नेता थे. तब बिहार में समता पार्टी के छह सांसद हुआ करते थे और भाजपा के 18. आज भाजपा के 12 सांसद हैं और जदयू के 20. बेशक बिहार में जदयू बड़े भाई की भूमिका में है, और नीतीश का कद बहुत बड़ा हो चुका है, लेकिन इस सफर तक पहुंचने में नीतीश से कई गलतियां ऐसी भी हुई हैं जिनकी भरपाई सिर्फ नरेंद्र मोदी से दूरी बना लेने से होने की गुंजाइश नहीं दिखती. नीतीश के पुराने साथी व निष्कासित विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि पूछते हैं कि जब गुजरात कांड हुआ था तब नीतीश केंद्रीय मंत्री थे. गुजरात कांड के खिलाफ इस्तीफा वगैरह देने की बात तो दूर, उन्होंने मोदी के खिलाफ या गुजरात कांड के खिलाफ एक बयान तक नहीं दिया था. लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान कहते हैं, ‘नीतीश कुमार को यह बताना होगा कि तब वे क्यों चुप्पी साधे हुए थे?’

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नीतीश के लिए गुजरात कांड के बाद वर्षों तक मोदी पर मौन एक सवाल की तरह रहेगा. स्थानीय स्तर पर वैसी ही एक गलती उन्होंने एक साल पहले तब की थी जब राज्य में फारबिसगंज गोली कांड हुआ था. इस घटना में पुलिस की गोली से अल्पसंख्यक समुदाय के पांच लोगों की मौत हो गई थी. नीतीश ने तब भी इस घटना पर मौन साध लिया था जो आज भी जारी है.  

और इन घटनाओं को भी छोड़ दें तो आज जो एनडीए है उसमें चार दल ही प्रमुख हैं. जदयू के अलावा जो तीन दल हैं वे क्रमशः भाजपा, अकाली दल और शिवसेना हैं. भाजपा को छोड़ भी दें तो शिवसेना और अकाली दल धर्मनिरपेक्ष राजनीति करते हैं या धर्मसापेक्ष, यह सबको पता है. इन तीन दलों के साथ बने रहकर नीतीश धर्मनिरपेक्षता को अहम औजार बनाते हैं तो कहा जाता है कि उन्हें इनसे अलग होकर बात करनी चाहिए. और फिर यदि भाजपा की ही बात करें तो मोदी से परहेज रखने वाले नीतीश पिछले दिनों आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रैली में मेजबान की तरह घूम चुके है, जिसमें आडवाणी रामरथ यात्रा का गौरवगान करते फिर रहे थे. लालू प्रसाद यादव तो यहां तक कहते हैं कि नीतीश जो अभी कह रहे हैं, वह आडवाणी के इशारे पर ही हो रहा है. हालांकि जदयू के वरिष्ठ नेता व राज्यसभा सदस्य वशिष्ठ नारायण सिंह का कहना है कि नीतीश या जदयू ने धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री की बात कोई अलग से नहीं कही है. वे कहते हैं, ‘यह तो संविधान में ही वर्णित है और इस मांग से भला किसी को क्या आपत्ति होगी?’  

अब भाजपा की बात. भाजपा के कुछ नेता पहली बार इस तरह नीतीश के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए देखे गए वरना इसके पहले भी नीतीश भाजपा को दरकिनार कर राज्य में अभियान चलाते रहे हैं और गुजरात वाले मोदी को निशाने पर लेते रहे हैं. भाजपा की ओर से भी गठबंधन तक तोड़ देने की बात कही गई. बिहार प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष डॉ सीपी ठाकुर बेपरवाही वाले अंदाज में कहते हैं कि जब गठबंधन टूटना होगा, टूट जाए लेकिन हमें दूसरे से सर्टिफिकेट की दरकार नहीं.

जानकार कहते हैं कि बिहार में भाजपा के नेता यदि इस कदर साहस जुटाकर बयान देने की स्थिति में हैं तो इसके पीछे भाजपा सवर्णों और शहरमिजाजी मतदाताओं के सहारे अपनी मजबूती का आकलन कर रही है. लेकिन यह भी एक किस्म का भ्रम जैसा ही है. पिछले सात साल में नीतीश कुमार भाजपा के इस किले में भी सेंधमारी कर चुके हैं. अभी हाल ही में पटना नगर निगम चुनाव में मेयर पद के चुनाव में भी यह देखा गया. भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान होने की भी गुंजाइश है. एनडीए में जदयू भरोसेमंद साथी की तरह 16 साल से बना हुआ है. भाजपा 2014 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजू जनता दल, अन्नाद्रमुक, असम गण परिषद, तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों की ओर निगाह लगाए हुए है, लेकिन सत्ता के लिए भानुमति का कुनबा बनाना तभी संभव होगा जब पुराने साथी भाजपा के साथ बने रहेंगे.

बहरहाल, दोनों दलों के शब्दवीर मौन साध रहे हैं. बयानों की लड़ाई की धार कुंद पड़ती जा रही है. संभव है फिलहाल गठबंधन चलता रहे और प्रधानमंत्री का मुद्दा गुजरात विधानसभा चुनाव तक हाशिये पर रखा जाए, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में जदयू का प्रणब के पक्ष में जाना दूसरी रणनीति का संकेत भी दे रहा है. 

नीतीश के बारे में यह सबको पता है कि वे हनुमान चालीसा पाठ की तरह रट्टामार अंदाज में केंद्र सरकार, कांग्रेस और कांग्रेस की नीतियों को कोसते रहते हैं. कभी बिहार के साथ नाइंसाफी के सवाल पर तो कभी किसी और मसले पर. उसी कांग्रेस के बड़े चेहरे प्रणब मुखर्जी के पक्ष में जदयू का जाना और फिर मजबूत तर्कों को भी गढ़ना आगे का संकेत दे रहा है. जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने कहा कि आज जो महंगाई है वह भाजपा के नेता भी नियंत्रित नहीं कर सकते. लगे हाथ तिवारी ने प्रणब की तारीफ भी की. हालांकि बाद में शरद यादव ने इसके लिए तिवारी को घुड़की दी और कहा कि केंद्र सरकार ही महंगाई के लिए जिम्मेवार हैं लेकिन यादव की इस बात का असर निचले स्तर तक नहीं हो सका. महंगाई के खिलाफ जब भाजपा ने बंद का एलान किया तो जदयू कार्यकर्ता इससे अलग रहे. 

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘असल मामला प्रणब मुखर्जी के साथ जाने का है. ऐसा करके नीतीश भाजपा को यह बता चुके हैं कि वे अलग राह अपनाने की स्थिति में हैं. आगामी लोकसभा चुनाव तक वे कांग्रेस से इसी आधार पर मोलतोल करने की स्थिति में रहेंगे और भाजपा से अलग होने की स्थिति आएगी तो केंद्र सरकार से विशेष पैकेज वगैरह लेकर अपने आधार को मजबूत करेंगे, जो कांग्रेस के सहयोग से ही संभव है.’ वे आगे जोड़ते हैं,  ‘आप ऐसे भी तो देखिए कि यदि कल नीतीश यूपीए के साथ चले जाते हैं तो उन्हें कितने फायदे होंगे. एक तो लालू की धार कमजोर पड़ जाएगी. कांग्रेस जो बिहार में अपना सब कुछ गंवा चुकी है, वह नीतीश के सहारे फिर अपनी जमीन तैयार करने की कोशिश में लग जाएगी. अगर अगली लोकसभा में  भंवरजाल बनता है तो कांग्रेस के बाहरी समर्थन से शीर्ष पद पर विराजमान होने की गुंजाइश को एकदम से नकारा  भी तो नहीं जा सकता न!’

बदलाव के इंतजार में…

सौ दिन किसी सरकार की समीक्षा के लिए ज्यादा नहीं होते तो कुछ मोर्चों पर कम भी नहीं होते. अखिलेश यादव ने भी सत्ता के सौ दिन पूरे कर लिए हैं. चुनाव से ठीक पहले और ठीक बाद तहलका से उन्होंने बात की थी. उस दौरान अखिलेश की नई राजनीति की बड़ी चर्चा थी. डीपी यादव को सपा में आने से रोककर उन्होंने बड़ा नाम कमाया था. सपा को हाईटेक बनाने का सेहरा उनके सिर बंधा था. उस साक्षात्कार में उन्होंने कई बड़े वादे किए थे. सौ दिन बाद उनके तब के वादों के आधार पर उनके शासन का विश्लेषण किया जा सकता है. अखिलेश का पहला वादा था कि जनता की पहुंच हम तक बहुत आसान रहेगी, वे मायावती जी की तरह महलों के बंधक नहीं बनेंगे. पर आज अखिलेश कितने उपलब्ध हैं इसकी बानगी लखनऊ के एक पत्रकार पेश करते हैं, ‘चुनाव से पहले रोज-रोज हेलीकॉप्टर में बैठा कर घुमाने का प्रस्ताव भेजते थे. अब उनके चेले-चपाटे भी नहीं सुनते.’

सौ दिन के उनके शासन में कोसी कलां और प्रतापगढ़ में सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं, मुसलिमों की 40-50 झोपड़ियां जलाई जा चुकी हैं, कानपुर में सपा कार्यकर्ता सौरभ यादव पर सरेआम गोलियां चलाई जा चुकी हैं, सुल्तानपुर में पुराने पत्रकार शीतल सिंह के बेटे पीयूष सिंह से दस लाख रुपये की लूट हो चुकी है और कार्रवाई करने गई पुलिस और डीएम को लोग पीट चुके हैं. आखिरी दोनों जुड़े हुए मामलों में अखिलेश सरकार के राज्य मंत्री शंखलाल माझी का नाम सामने आ रहा है. कानून व्यवस्था वह मसला था जिसे लेकर सबके मन में सपा के प्रति हमेशा से आशंका बनी हुई थी. तब उन्होंने तहलका के माध्यम से लोगों को विश्वास दिलाया था कि सूबे की कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए वे अपने प्रिय चाचा रामगोपाल यादव के नेतृत्व में एक कमेटी गठित करेंगे. खुद अखिलेश भी उस कमेटी के सदस्य रहेंगे. उन्होंने इस कमेटी को आईटी इनेबल्ड बनाने का वादा भी किया था ताकि पूरे सूबे की जनता अपनी परेशानी सीधे लखनऊ तक पहुंचा सके. आज सौ दिन बाद किसी को नहीं पता कि कमेटी किस दशा में है और चाचा रामगोपाल जी उस कमेटी के बारे में क्या राय रखते हैं. 

अखिलेश की बोहनी ही खराब हो गई थी. जिस दिन नतीजे आ रहे थे उसी दिन झांसी में सपाइयों ने पत्रकारों और मतगणना कर्मियों को बंधक बना लिया. वे दबंगई के दम पर हार को जीत में बदलने पर आमादा थे. फिरोजाबाद में सपा कार्यकर्ता फायरिंग करने लगे जिसमें एक 13 साल की बच्ची की मौत हो गई. बाद में शपथ ग्रहण का उत्पात तो पूरे देश ने देखा ही. इसके बाद बदायूं की पुलिस चौकी में लड़की के साथ बलात्कार हो गया. लिस्ट बहुत लंबी है. भ्रष्टाचार के मसले पर मायावती से अखिलेश की तुलना करने के लिए तो कम से कम दो-तीन साल चाहिए लेकिन कानून व्यवस्था की बात करने के लिए तीन महीने पर्याप्त हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के तीन महीने के भीतर ही अपने विधायक उमाकांत यादव को जेल भेज दिया था. अखिलेश के शासन में तीन महीने के भीतर ही जेल में बंद कई अपराधियों को बाहर पहुंचाने का बंदोबस्त कर दिया गया है.

नई राजनीति के जहाज पर सवार होकर लखनऊ पहुंचे अखिलेश यादव को भी शायद नरेंद्र मोदी की तरह राजधर्म सीखने की जरूरत है

राजा भैया को मंत्री बनाकर जो शुरुआत हुई थी वह रुकी नहीं. 15 मार्च को अखिलेश का शपथ ग्रहण हुआ और 17 मार्च तक अमरमणि त्रिपाठी और अभय सिंह जैसे अपराधियों का उनके गृह जिलों में पुनर्वास कर दिया गया. अभय सिंह के ऊपर लगा गुंडा एक्ट सरकार के इशारे पर वापस ले लिया गया है. अमरमणि त्रिपाठी जैसा अपराधी, जिसे उम्र कैद की सजा हो चुकी है, जिसका बेटा सपा के टिकट पर पिछला विधानसभा चुनाव लड़कर हार चुका है, वह सपा के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?  

18 मई को अखिलेश ने पूरे सूबे के पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाई और उन्हें 15 दिन के भीतर कानून व्यवस्था सुधारने की चेतावनी दी. मगर महीने भर के भीतर ही दो-दो सांप्रदायिक दंगे हो गए. कोसी कलां में 22 दिन तक बाजार बंद रहा. लोग घरों से बाहर नहीं निकले. वहां के एक व्यक्ति ने तहलका दफ्तर में फोन करके विनती की कि हम वहां आएं, खुद हालात देखें और तब कुछ लिखें. पुलिस की एकतरफा कार्रवाई से वह इतना डरा हुआ था कि अपना नाम-पता तक बताने को तैयार नहीं था. ऐतिहासिक रूप से 1,300 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ, 156 लोगों को जेल में डाल दिया गया. जिन लोगों की दुकानेण फूंक दी गई तो वे ही आरोपित बनाए गए हैं. एक पक्ष के लोगों को जेल में रखकर दूसरे पक्ष को खुश किया जा रहा है. स्थानीय निवासी कुलदीप गुर्जर कहते हैं, ‘प्रशासन के लोग हमारे खिलाफ काम कर रहे हैं. चुन-चुन कर एक ही समुदाय को जेल में डाला जा रहा है. आप चाहें तो गिरफ्तार लोगों की लिस्ट उठाकर देख लीजिए.’

नई राजनीति के जहाज पर सवार होकर लखनऊ पहुंचे अखिलेश यादव को भी शायद नरेंद्र मोदी की तरह राजधर्म सीखने की जरूरत है. प्रशासन निष्पक्ष व्यवहार करना नहीं सीख पाया है. प्रतापगढ़ जिले का अस्थान गांव भी इसी स्थिति से गुजर रहा है. एक समुदाय की 40-50 झोपड़ियां जला कर राख कर दी गईं. जिले के एसपी ओपी सागर ने बलात्कार की शिकार लड़की की शव यात्रा उसी बस्ती से निकालने की इजाजत दे दी जहां के लोगों पर इस अपराध का शक जताया जा रहा था. बाद में वे सफाई दे रहे थे, ‘मुझे उम्मीद नहीं थी कि मामला इतना बढ़ जाएगा.’ इन मामलों को देखकर अखिलेश के बारे में एक राय यह भी बनती है कि कुछ मामलों में वे बिल्कुल अपने पिता जैसे ही हैं. 2007 में सपा को सत्ता से बाहर करवाने में एक भूमिका मऊ के दंगों की भी थी. उस दौरान मुलायम सिंह ने भी आज के अखिलेश जैसा ढीला रुख ही अपनाया हुआ था.   

साक्षात्कार में अखिलेश ने एक और महत्वपूर्ण बात कही थी. सपा बदले की राजनीति नहीं करेगी. मूर्तियां और पार्क नहीं तोड़े जाएंगे. आज अखबारों में छपी वह फोटो सबके लिए कौतूहल का विषय है जिसमें एक कर्मचारी लखनऊ के आंबेडकर पार्क की लाइटें उखाड़ कर लिए जा रहा है. आंबेडकर ग्रामसभा विकास विभाग का नाम बदल कर राममनोहर लोहिया समग्र ग्राम विकास विभाग कर दिया गया है. दलितों को ठेकों में आरक्षण समाप्त कर दिया गया, प्रोन्नति में आरक्षण व्यवस्था समाप्त हो गई. कहने का मतलब है कि बाकी कुछ हो न हो मगर चुन-चुन कर मायावती के कार्यकाल में शुरू हुई परियोजनाओं पर कैंची चलाई जा रही है. कुल 23 योजनाएं जो मायावती सरकार ने शुरू की थीं उन्हें खत्म कर दिया गया है.  

अखिलेश के आगमन के बाद उत्तर प्रदेश में एक और गौर करने लायक बदलाव दिख रहा है. पिछले डेढ़ दशकों के दौरान लोग चुनावों के दरमियान होने वाला लाउडस्पीकरों का कानफोड़ू शोर भूल गए थे. वे दिन फिर से लौट आए हैं. आजमगढ़ में स्थानीय निकाय के चुनाव के लिए खड़े एक सपा समर्थित प्रत्याशी कहते हैं, ‘सब अखिलेश भइया की कृपा है. उन्होंने सबको लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करने की छूट दिला दी है.’ जैसा कि उत्तर प्रदेश का पुराना अनुभव रहा है, छूट और सपा की कोई सीमा नहीं होती. क्या रात में बारह बजे और क्या भोर में पांच बजे, गली-गली में कर्मठ, निर्भीक, युवा, ईमानदार और हरदिल अजीज उम्मीदवार अपने मुंह मिट्ठू, तोता, मैना बने हुए हैं. वे शहर-बाजारों की दीवारें जितनी बदसूरत हो सकती हैं उससे ज्यादा करने में लगे हुए हैं, इस वादे के साथ कि जब वे जीतेंगे तब हमारे नगर और ज्यादा स्वच्छ, चमकदार, आदर्श पानी-बिजली से भरपूर हो जाएंगे. ऐसा लगता है जैसे उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग भी अपना कामकाज भूल गया है. 

चुनाव से पहले वाले साक्षात्कार में अखिलेश को एक बात बहुत नागवार गुजरी थी. आजम खान और शिवपाल यादव के साथ उनके रिश्तों के सवाल पर उन्होंने यह कह कर बात बीच में काट दी थी कि ‘नहीं, हमारे बीच लट्ठ चल रहे हैं. आज सौ दिन बाद लखनऊ के हर बड़े पत्रकार, अधिकारी और जानकार की जुबान पर यही बातें हैं. आजम खान की अपनी सत्ता है, शिवपाल की अपनी. सरकार के भीतर रस्साकशी की एक लकीर इस एक घटना के जरिए खींची जा सकती है. 17 जून को शिवपाल यादव ने बाकायदा घोषणा की कि सात बजे के बाद सूबे के शहर, मॉल और बाजार बंद हो जाएंगे क्योंकि राज्य के पास बिजली नहीं है. इसके लिए बाकायदा सरकारी विज्ञप्ति और प्रेस नोट भी जारी हुआ. जानकार बताते हैं कि इस आदेश को मुख्यमंत्री की हरी झंडी भी थी. लेकिन 18 जून को आजम खान विधानसभा को जानकारी देते हैं कि यह महज प्रस्ताव है कानून नहीं. जो चीज सरकारी विज्ञप्ति का हिस्सा बन चुकी थी, उसके बारे में आजम खान का यह बयान बड़ा अजीब था.

बिजली से याद आया. उत्तर प्रदेश में जिसकी लाठी उसी की बिजली हो गई है. इटावा, कन्नौज, मैनपुरी और औरैया जैसे सपा के गढ़ों को 24 घंटे बिजली मिल रही है. बची- खुची रामपुर (आजम खान), हरदोई (नरेश अग्रवाल), बाराबंकी (जिले से तीन मंत्री) चली जा रही है. सपा राष्ट्रपति चुनाव के समीकरण बिठाने में व्यस्त हैं और दीदारगंज विधानसभा के निवासी तीन दिन से बिजली को तरस रहे हैं. जिस आजमगढ़ ने दस की दसों विधानसभा सीटें सपा को दी थीं वे अपना दोष पूछ रहे हैं. संजरपुर में चाय की दुकान पर बीड़ी पीकर लू को मात देने की कोशिश कर रहे नूरुद्दीन अंसारी की सुनिए, ‘इहो अपने बापै के तरह एकदम फेल बाटे.’ यानी ये भी अपने पिता जी की तरह असफल है. 

­उत्तर प्रदेश कोई गुजरात, तमिलनाडु जैसा समृद्ध राज्य तो है नहीं. दो लाख करोड़ से ज्यादा का तो कर्ज का बोझ है. एक दूरदर्शी नेता, प्रचंड बहुमत और पांच साल दूर खड़े चुनाव के मद्देनजर होना यह चाहिए था कि सरकार बजट में इस समस्या से निपटने के उपाय करती. कर्ज के कुचक्र से उत्तर प्रदेश को बाहर निकालने के लिए कुछ कड़े फैसलों की दरकार थी. लेकिन अखिलेश ने जो बजट पेश किया उससे ऐसा लगा मानो चुनाव पांच साल बाद नहीं पांच महीने बाद होने वाले हैं. छूट, लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ते की बरसात हुई और असल मुद्दे छूट गए. 

एक संदेश अखिलेश की प्रशासनिक अक्षमता को लेकर भी जा रहा है. आलम यह है कि जिन अधिकारियों का ट्रांसफर अखिलेश के इशारे पर हुआ उन्हें 24 घंटे के भीतर ही वापस लेना पड़ा. आईएएस अधिकारी माजिद अली और संजय प्रसाद के मामले सबके सामने हैं. पंचम तल (मुख्यमंत्री सचिवालय) पर अनीता सिंह की लॉबी का दबदबा है. उनसे बाहर का अधिकारी बाहरी है फिर चाहे वह कोई अली हों या प्रसाद.  जिस तरह से नौकरशाही काबू से बाहर है, उसी तरह अखिलेश के मंत्री भी बेकाबू हैं. बड़े जतन से उन्होंने नई ट्रांसफर नीति बनाई थी. इसके मुताबिक मंत्री अपने विभाग के 15 फीसदी से ज्यादा कर्मचारियों का ट्रांसफर नहीं कर सकते, वह भी समूह ग और घ के कर्मचारी. इससे ज्यादा ट्रांसफर के लिए मुख्यमंत्री की सहमति लेनी होगी. पंचम तल में तैनात एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘हार्टीकल्चर मंत्री राज किशोर सिंह, लोक निर्माण राज्य मंत्री सुरेंद्र पटेल और स्टांप एवं न्यायालय शुल्क मंत्री दुर्गा यादव ने इसके खिलाफ न सिर्फ विद्रोह कर दिया बल्कि इसके खिलाफ जाकर ट्रांसफर भी किए.’ 

मुलायम सिंह यादव ने सौ दिन पूरे होने पर अखिलेश यादव को सौ नंबर दिए हैं. यह उनका पुत्रप्रेम ही होगा क्योंकि कुछ दिन पहले तक वे यह आरोप लगा रहे थे कि पिछली सरकार के विश्वासपात्र नौकरशाह अखिलेश को काम नहीं करने दे रहे हैं, उन्हें अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं. अगर मुलायम सिंह के पिछले बयान को सही मान लें तो यह अखिलेश की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े कर देता है. और उनके बाद के बयान पर भी. अचानक ही उन्होंने ऐसा क्या कर दिया कि उन्हें 100 नंबर दे दिए जाएं?

बदलाव का वाहक?

क्या उत्तर प्रदेश की जनता को उस बदलाव की झलक भी दिखाई दे रही है जिसकी उम्मीद वे अखिलेश से लगाए बैठे हैं?

राजनीति की कई विशेषताओं में से एक यह भी है कि यह कई बार अपनी सहूलियत के हिसाब से भविष्य का अंदाजा लगाती है, उसे हम पर थोपती है और फिर उसी के आधार पर हमारे वर्तमान के साथ खिलवाड़ भी करती है. इस बात को 105 दिन पुरानी सरकार वाले उत्तर प्रदेश के नजरिये से देखते हैं.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है. यहां महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कई ऐसे लोग हैं जो गंभीर आरोपों के घेरे में हैं. थोड़ा खुलकर कहें तो उत्तर प्रदेश में कई अपराधों के कई आरोपितों और दागियों को, उनके सारे किए-धरे को नजरअंदाज करके, जनता के सर-माथे पर बिठा दिया गया है. ऐसा क्यों हो रहा है, का मानक जवाब कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारी राजनीति में एक ही है – उन्हें किसी अदालत ने अब तक अपराधी घोषित नहीं किया है.

माना कि हमारा संविधान कहता है कि जब तक किसी को सजा न हो उसे अपराधी न माना जाए मगर वह यह तो नहीं कहता कि बड़े और जघन्य अपराधों के आरोपितों को तब तक लाखों-करोड़ों लोगों के भाग्य का विधाता बना कर रखा जाए. एक व्यक्ति को जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो अपराधी न मानना अलग बात है, लेकिन इस पर कोई अदालती फैसला आने तक उसे सरकारी खजाने और लोगों के अच्छे-बुरे की चाबी सौंपे रखना कितना सही है? अगर बाद में वह अपराधी साबित हो जाता है तो? तब तक क्या वह देश और इसके वासियों का काफी नुकसान नहीं कर चुका होगा? मगर राजनीति के अनुमान उसे कभी वह अपराधी भी हो सकता है, मानने को तैयार नहीं होते. या मानते भी हैं तो यह नहीं मानते कि उन्हें इसके लिए अदालत से सजा भी मिल सकती है. या फिर वे इस बात को तवज्जो देने लायक ही नहीं समझते.

ऐसे अनर्थ की आराधना में उत्तर प्रदेश का हमेशा से ही एक मुकाम रहा है. मगर इस बार अब तक सामान्य-सी मानी जाने वाली यह बात उतनी सामान्य भी नहीं.

अखिलेश यादव को उनकी पार्टी और मीडिया बदलाव का वाहक, नई राजनीति का प्रतीक, प्रयोगवादी समाजवादी, उत्तर प्रदेश का नीतीश कुमार, देश का भविष्य, राहुल का सपाई जवाब और न जाने क्या-क्या विशेषणों से विभूषित करते रहे हैं. अब अगर वही अखिलेश, राजा भैया को पहली खेप में ही सरकार के जेल और खाद्य सरीखे विभागों का सिरमौर बना देते हैं तो बात सामान्य कैसे रह जाती है? इसके बाद अमरमणि, अभय यादव और विजय मिश्रा जैसे सपा के अपराधी या दागी राजनेता जेल को अपना घर समझ लें तो इसमें आश्चर्य कैसा? अगर नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे सचिवालय के सबसे महत्वपूर्ण अफसरों पर ही तरह-तरह के आरोप हों और उनकी नियुक्ति का आधार पिछली सरकार ने उनके साथ कितना बुरा किया और जाति-धर्म आदि हों तो आप ऐसों से चलने वाले प्रशासन से स्वच्छता की कितनी उम्मीदें बांध सकते हैं?

आज उत्तर प्रदेश में सुशासन के मुद्दे पर कोई भी सवाल उठाने पर पहला जवाब मिलता है कि नई सरकार है, नया मुख्यमंत्री है उसे हमें थोड़ा समय देना चाहिए. कम से कम छह महीने. यानी फिर से अपनी सहूलियत वाला अनुमान. भविष्य में सब अच्छा होने वाला है अभी चिंता क्यों करना? चलो मान लिया कि अभी अखिलेश यादव की सरकार को ज्यादा समय नहीं हुआ है मगर उनकी सरकार ने बनते ही अपराधियों को उपकृत करते वक्त यह क्यों नहीं सोचा? उनके लिए क्यों सरकार बदलते ही वक्त बदलने का दौर शुरू हो गया? सवाल यह भी है कि इस राज में कानून व्यवस्था पहले से ज्यादा क्यों बिगड़ गई है. माना कि उसे पिछली सरकार के मुकाबले बेहतर करने में थोड़ा वक्त लग सकता है मगर वह कम से कम यथास्थिति में तो रहे.

हो सकता है कि अब तक की जमी-जमाई राजनीति की कुछ ‘व्यावहारिक मजबूरियां हों जिनके चलते अखिलेश इतनी जल्दी चीजों को बदलने की स्थिति में नहीं हों. हो सकता है चीजें पूरी तरह से उनके नियंत्रण में अभी नहीं हो. मगर उन्हें कम से कम कुछ ‘पूत के पांव पालने में’ दिख जाने वाले कदम उठाने से किसने रोका है. प्रबंधन का एक बड़ा सिद्धांत है कि चीजों को शुरुआत से ही नियंत्रित करना होता है. कुछ संदेश शुरुआत से ही जाने चाहिए और ये जुबानी नहीं बल्कि आपके कदमों और क्रियाओं के होने चाहिए. अगर ऐसा न हो तो चीजों के स्थायी रूप से हाथ से निकल जाने का खतरा खड़ा हो जाता है.

हालांकि अखिलेश से पूरी तरह मोहभंग होने जितनी देर कम से कम अभी नहीं हुई है.

मगर इसमें उतनी देर भी नहीं है.

नीतीश में कितने नरेंद्र ?

गौर से देखा जाए तो नीतीश कुमार खेल नरेंद्र मोदी वाला ही खेल रहे हैं, लेकिन कुछ ज्यादा सयानेपन से.

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार में क्या अंतर है? यह सवाल किसी भी नीतीश प्रेमी को आहत कर सकता है. आखिर नरेंद्र मोदी पर जिस तरह गुजरात दंगों के दाग हैं, उस तरह का कोई दाग नीतीश कुमार पर नहीं लगा है. नरेंद्र मोदी के विरुद्ध सामाजिक संगठनों, संवैधानिक संस्थाओं और अदालतों तक की जैसी और जितनी टिप्पणियां हैं, नीतीश कुमार को अभी तक वैसी टिप्पणियों का सामना नहीं करना पड़ा है. नरेंद्र मोदी के गुजरात में अल्पसंख्यक मारे गए हैं, नीतीश कुमार के बिहार में अल्पसंख्यक विकास के नए एजेंडे का हिस्सा हैं. नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक हैं तो नीतीश कुमार समाजवादी. 

इस सवाल को चाहें तो पलट कर भी पूछ सकते हैं- नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी में क्या समानताएं हैं? दोनों पिछले कई वर्षों से- कम से कम 15 वर्षों से- एक ही राजनीतिक गठबंधन एनडीए को मजबूत करते रहे हैं और उसके महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं. नरेंद्र मोदी अपने लिए गुजरात के विकास पुरुष की छवि चाहते हैं तो नीतीश कुमार बिहार के विकास पुरुष की. अब तो नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार, दोनों एनडीए की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी हैं. ना ना करते नीतीश कुमार ने अपने पत्ते खोल भी दिए हैं- एनडीए से मांग की है कि वह जल्दी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करे और ऐसे किसी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाए जो धर्मनिरपेक्ष हो और सभी समूहों को स्वीकार्य हो. 

ऐसा व्यक्ति एनडीए कहां से लाएगा? बीजेपी के भीतर उसकी यह तलाश पूरी नहीं होनी है. इस कसौटी पर शिवसेना और अकाली दल जैसे सहयोगी भी नहीं उतरते. ले-देकर एक नीतीश कुमार का नाम बचता है- यानी एनडीए या तो उनका नाम प्रस्तावित करे या फिर वे अलग से अपनी राजनीतिक बिसात बिछाएंगे.फिलहाल नीतीश कुमार सिर्फ यह इशारा कर रहे हैं कि 2014 के चुनावों की कमान नरेंद्र मोदी को दी गई तो वे एनडीए से अलग हो जाएंगे. जेडीयू के भीतर उनका समर्थक खेमा यहां तक कह रहा है कि अगर 2002 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को बाहर कर दिया होता तो 2004 में एनडीए की यह हालत नहीं होती. 

बेशक, नरेंद्र मोदी को 2002 में बाहर कर दिया जाना चाहिए था- इसलिए नहीं कि उनके चलते चुनावों के नतीजों में फर्क पड़ा, बल्कि इसलिए कि वे भारतीय लोकतंत्र के एक बड़े अपराधी हैं. उन्होंने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मुहैया न कराके, मुख्यमंत्री के पद को कलुषित किया है. लेकिन जेडीयू का तर्क यह है कि उनकी वजह से एनडीए 2004 का चुनाव हारा. यानी क्या अगर 2004 में एनडीए जीत जाता- जैसे गुजरात में मोदी जीतते गए- तो क्या जेडीयू इस फैसले का समर्थन करती? 

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी में अगर कोई अंतर है तो नीतीश ही इस अंतर को सबसे पहले मिटाते नजर आ रहे हैं

दरअसल जेडीयू ने अभी तक इस फैसले का समर्थन ही किया था. वरना अगर बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को बाहर नहीं किया तो नीतीश कुमार एनडीए में क्यों बने रहे? दस साल पुराना अपराध उन्हें अचानक अब क्यों सालने लगा है? क्या सिर्फ इसलिए कि अब जेडीयू को भान हुआ है कि नरेंद्र मोदी को साथ रखने का सौदा नुकसानदेह साबित हुआ? या उसे यह लग रहा है कि नरेंद्र मोदी के साथ रहने के नहीं, उनके साथ दिखने के नुकसान कहीं ज़्यादा हैं? आखिर नीतीश कुमार कुछ साल पहले मोदी के साथ अपनी एक तस्वीर के इस्तेमाल पर जिस तरह बौखलाए थे, उसका तो संदेश बस यही था कि मोदी साथ भले रहें, लेकिन नजर न आएं. 

दरअसल नीतीश कुमार खेल नरेंद्र मोदी वाला ही खेल रहे हैं, लेकिन कुछ ज़्यादा सयानेपन से. जिस तरह नरेंद्र मोदी गुजरात के सामाजिक अन्याय के सवाल को गुजरात के विकास के नारे से कुचल डालते हैं, कुछ उसी तरह नीतीश कुमार भी बिहार के विकास की बात करते हुए बिहार के सामाजिक टकरावों से जुड़े सवालों की अनदेखी करते हैं. यही नहीं, 2002 में मारे गए अल्पसंख्यकों के इंसाफ के साथ जो रवैया नरेंद्र मोदी का रहा है, वही 1996 में बथानी टोला में मारे गए दलितों के इंसाफ के साथ नीतीश कुमार का रहा है. बथानी टोला के इंसाफ के सवाल से बिहार सरकार कई स्तरों पर आंख चुराती रही. पटना उच्च न्यायालय से आए फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने में भी सरकार को तीन महीने लग गए. बीच में इस हत्याकांड के मुख्य आरोपित ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या हो गई तो पटना में मुखिया समर्थकों को उपद्रव मचाने की ठीक वैसी ही खुली छूट दी गई जैसी 2002 में नरेंद्र मोदी ने अपने यहां के दंगाइयों को दी थी. जाहिर है, अपने राज्य में न्याय को लेकर जो संवेदनशीलता किसी मुख्यमंत्री में होनी चाहिए, वह कम से कम इस मामले में नीतीश कुमार नहीं दिखा रहे.  

दरअसल नीतीश कुमार कहने को अतिपिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महादलितों को लेकर एक समावेशी राजनीति साध रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी सरकार के ढेर सारे मंत्री उसी सामंती पृष्ठभूमि और मानसिकता के हैं जिनसे रणवीर सेनाएं बनती हैं और सामाजिक न्याय की बुनियाद पर प्रहार करती हैं. अगर नीतीश ऐसे तत्वों को बढ़ावा देते हैं तो वाकई इस लेख के शुरू में उठाया गया यह सवाल जायज हो जाता है- कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी में आखिर क्या अंतर है?  अगर कोई अंतर है- जो इन पंक्तियों के लेखक को भी लगता है कि है- तो नीतीश कुमार ही इस अंतर को सबसे पहले मिटाते दिख रहे हैं. बिहार के विकास का सवाल वैध है, लेकिन नीतीश जैसे समाजवादी को याद रखना चाहिए कि वह सड़कें बना देने और शहरों में रात के पहरे बिठा देने भर से पूरा नहीं होगा, उसके लिए भूमि सुधार से लेकर खेती-बाड़ी और उद्योग-धंधे तक दुरुस्त करने होंगे. 

नीतीश ठीक कहते हैं कि बिहार के विकास की चुनौती गुजरात के विकास से कहीं ज्यादा बड़ी है. लेकिन बिहार की उद्यमिता और प्रतिभा को देखते हुए यह नामुमकिन नहीं है, बशर्ते विकास के सवाल को महज राजनीति के सवाल में न बदल दिया जाए.

ब्रिटिश राज की वापसी

कंपनी के तीन दर्जन से अधिक लोगों ने मेरे घर पर आकर नारेबाजी की, शीशा व दरवाजा तोड़ा और मुझे धमकी दी कि बांध का विरोध करना बंद कर दो नहीं तो तुम्हें जिंदा जला देंगे.

बीते 22 जून को जल पुरुष राजेन्द्र सिंह एवं स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद उत्तराखंड के श्रीनगर शहर के पास कलियासौड़ में गंगा तट पर स्थित सिद्धपीठ धारी देवी के दर्शनों को पहुंचे. यह मंदिर जीवीके कंपनी द्वारा निर्माणाधीन श्रीनगर जल विद्युत परियोजना की 30 किलोमीटर लंबी झील के डूब क्षेत्र में आता है. उन्हें स्थानीय प्रशासन ने गिरफ्तार करके हरिद्वार भेज दिया. इनके पीछे बांध कंपनी के सुरक्षाकर्मियों, कर्मचारियों और ठेकेदारों का काफिला इन्हें खदेड़ता हुआ-सा पुलिस के साथ चल रहा था. इसी मार्ग पर मेरा निवास स्थान पड़ता है. मेरे निवास के सामने से स्वामी सानंद के निकल जाने के बाद कंपनी के कर्मचारियों और पुलिस के बीच कुछ गुफ्तगू हुई. इसके बाद कंपनी के लगभग 40 लोग मेरे निवास पर उतर आए. इन लोगों ने नारेबाजी की, शीशा व दरवाजा तोड़ा और मुझे धमकी दी कि दो दिन के अंदर बांध का विरोध करना बंद कर दो नहीं तो तुम्हें इस घर में जिंदा जला देंगे. 

मामला श्रीनगर परियोजना की अवैधता का है. परियोजना को 1985 में पर्यावरण स्वीकृति मिली थी. 1994 में पर्यावरण मंत्रालय ने नोटिफिकेशन जारी किया जिसके अनुसार पहले दी गई स्वीकृतियों की क्षमता बढ़ाने पर नई स्वीकृति लेना अनिवार्य बना दिया गया. पांच वर्ष में निर्माण कार्य चालू न होने की स्थिति में भी नई स्वीकृति लेने की व्यवस्था दी गई. इसके बाद मंत्रालय ने एक और नोटिफिकेशन जारी किया जिसके अनुसार 2004 तक कंस्ट्रक्शन प्लिंथ लेवल तक नहीं आने की स्थिति में भी नई स्वीकृति लेना अनिवार्य होगा. पर अपने ही इन आदेशों को नजरअंदाज करते हुए, पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों ने 2006 में 20 वर्ष पहले श्रीनगर परियोजना को दी गई स्वीकृति को वैध घोषित कर दिया.

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय के इस निर्णय को अवैध ठहराया और कंपनी से नई पर्यावरण स्वीकृति लाने को कहा. लेकिन कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले लिया और गंगा पर बांध का निर्माण करती रही. इसी दौरान पर्यावरण मंत्रालय को भाजपा की नेता उमा भारती से शिकायत मिली. जून, 2011 में  मंत्रालय ने कंपनी को परियोजना पर कार्य बंद करने का आदेश जारी किया जो आज भी लागू है. लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से कंपनी परियोजना का काम करती रही. इन अनियमितताओं के बावजूद परियोजना का निर्माण जारी रहने के विरोध में मैं विभिन्न न्यायालयों में याचिकाएं दायर करता रहा हूं. मेरे इस काम से कंपनी और उसमें लगे स्थानीय ठेकेदार नाखुश हैं, इसलिए उन्होंने मुझ पर हमला किया.

स्थानीय लोगों की आपत्ति है कि परियोजना का विरोध पहले क्यों नहीं किया गया? सच यह है कि परियोजना के खिलाफ 2008 में मैंने पहली याचिका डाली थी. इसके बाद क्रमवार तीसरी याचिका पर चार साल के बाद उच्च न्यायालय ने पर्यावरण स्वीकृति को अवैध ठहराया है. सिद्धपीठ धारी देवी के सदस्य 700 से अधिक दिन से धरने पर बैठे हुए हैं. इस बीच राज्य सरकार को ज्ञापन भी दिए गए. पर्यावरण मंत्रालय एवं राज्य सरकार ने इन विरोधों को अनदेखा किया.  

दूसरी आपत्ति है कि परियोजना बंद होने की स्थिति में स्थानीय लोगों के रोजगार और ठेकों का हनन होगा. यह सही है. पर ये रोजगार के अवसर कंस्ट्रक्शन के दौरान मात्र पांच साल तक रहते हैं. इससे ज्यादा दीर्घकालीन रोजगार का हनन खुद परियोजना से हो रहा है. लगभग 400 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में आ रही है. इस भूमि पर जंगल और कृषि से उत्पन्न होने वाले रोजगार का हनन होगा. उत्तराखंड की बहती नदियों के नैसर्गिक सौंदर्य के बीच अस्पताल, विश्वविद्यालय और सॉफ्टवेयर पार्क बनाए जा सकते हैं जो हजारों स्थायी रोजगार उत्पन्न कर सकते हैं. क्षेत्र के सौंदर्य एवं पर्यावरण के नष्ट होने से विकास की इस संभावना पर ब्रेक लग जाएगा. उत्तराखंड की पहचान चारधाम यात्रा से है. तमाम होटल और टैक्सी चालक इस देवत्व की रोटी खाते हैं. गंगा को बांधने, सुखाने और सड़े हुए पानी की झीलों में तब्दील करने से उत्तराखंड का यह देवत्व समाप्त हो जाएगा और चारधाम यात्रा प्रभावित होगी. 

तीसरी आपत्ति यह है कि उत्तराखंड के आर्थिक विकास के लिए जल विद्युत अति उपयुक्त स्त्रोत है. मेरा विरोध जल विद्युत का नहीं है. मैंने सुझाव दिया था कि 30 किलोमीटर लंबी झील बनाने के स्थान पर रुद्रप्रयाग से नहर लाकर जल विद्युत बनाई जा सकती है. इससे गंगा का स्वच्छंद बहाव कायम रहेगा और धारी देवी मंदिर भी नहीं डूबेगा. मैने ऐसी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का आर्थिक आकलन किया है. मैंने पाया कि झील में पनपते मलेरिया के कीटाणु, मछली और बालू के नुकसान आदि की गणना की जाए तो ऐसी परियोजनाओं के कारण देश को 700 करोड़ रुपये की हानि होगी जबकि 155 करोड़ रुपये का लाभ होगा. फिर भी इस परियोजना को बनाया जा रहा है. नुकसान आम आदमी उठाता है लेकिन लाभ दिल्ली और देहरादून के नागरिकों एवं नौकरशाहों को होता है. सरकार द्वारा कंपनी को दिया जा रहा समर्थन अनुचित है. सरकार को चाहिए कि बांध समर्थकों और विरोधियों के बीच संवाद स्थापित कराए, दोनों पक्षों को सुने और ऐसा रास्ता निकाले जो दोनों पक्षों के सही तर्कों को जोड़े.

जनहित स्वतंत्र एवं पारदर्शी रूप से तय किया जाना चाहिए. सरकार का मंसूबा राज्य के प्राकृतिक संसाधनों को दिल्ली और देहरादून पहुंचाना है. इसके लिए सरकार जनता को अस्थायी रोजगार का प्रलोभन देकर अपनी संस्कृति, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को नष्ट करने को उकसा रही है बिल्कुल वैसे ही जैसे ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को प्रलोभन देकर स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलवाई थी.