Home Blog Page 1318

गए थे बारिश से बचने मगर इमारत गिरने से हुई मौत

नोएडा के शाहबेरी में दो इमारतों के ढहने के बाद अब गाजियाबाद में रविवार को एक पांच मंजिली इमारत जमींदोज हो गई।

इसमें आठ साल के एक बच्चा समेत दो लोगों की मौत हो गई, जबकि छह लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

बच्चे को पहले मलबे से निकाल लिया गया था मगर बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

इमारत में कई मजदूरों के दबे होने की भी आशंका जताई जा रही है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ काम की तलाश में आये ये लोग निर्माणाधीन इमारत के पास रह रहे थे।

रविवार को रहने वाली जगह में बारिश का पानी भर गया तो सभी इमारत में चले गए। इसी दौरान हादसा हो गया।

यह भी बताया जा रहा है कि इन मजदूरों में से किसी का श्रम विभाग में रजिस्ट्रेशन नहीं है और न ही किसी सरकारी योजना का लाभ मिलता है।

यूपी सरकार ने मृतक के परिजन को दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है।

मामले में कमिश्नर स्तर की जांच के निर्देश भी दिए गए हैं। पुलिस ने बिल्डिंग हादसे में मनीष गोयल नाम के बिल्डर, प्रसनजीत गौतम नाम के प्लॉट मालिक समेत 6 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

खबर लिखने तक सभी आरोपी फरार थे। आरोपियों पर एनएसए के तहत कार्रवाई हो सकती है।

आरोपियों का पता लगाने के लिए पुलिस ने उनके करीबियों को हिरासत में ले लिया है।

नशे की गिरफ्त में फिर आया पंजाब

पंजाब में नशे का मुद्दा फिर उभरा है। पिछले विधानसभा चुनाव में यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा था। तब इस सीमाई राज्य के इतिहास में यह चुनावी मुद्दा खासा गंभीर था।

एक राजनीतिक के तौर पर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2015 में चुनावी रैली में पवित्र सिख पुस्तक (गुटका साहिब) की शपथ खाई थी कि यदि वे सत्ता में आए तो चार सप्ताह में नशे के इस व्यापार को खत्म कर देंगे। पंजाब की जनता ने कांग्रेस को 75 सीटें दिला कर कैप्टन की इच्छा पूरी की।

अपने चुनावी वायदे को ध्यान में रखते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पंजाब की समस्या पर ध्यान दिया और वे कदम उठाए जो पिछली अकाली-भाजपा सरकार नहीं ले सकी थी। सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने भी खुलकर सहयोग करके आदर्श नशा निवारण केंद्रों का निर्माण किया और जो पुराने केंद्र थे उन्हेंं मजबूत किया। कुछ ऐसे लोग जो राज्य पुलिस में अच्छे पदों पर थे और जिन पर दवाओं के कारोबार में सहयोग देने का शक था, उनके भी सबूत जुटाए गए।

तकरीबन पंद्रह महीने यह मुद्दा दबा रहा। अचानक एक महीने में यह मामला उछला और विपक्षी-आप और अकाली-भाजपा गंठजोड़ ने सरकार पर हल्ला बोल दिया। मीडिया में राज्य में नशे के चलते तीस लोगों के मरने की बात कही। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ब्रहम मोहिंदर ने इस तादाद को चुनौती दी। उन्होंने बताया कि जीरा और नवांशहर इलाकों में चार लोगों की मौत होने की बात कही। संबंधित स्वास्थ्य क्षेत्र और पुलिस अधिकारियों को मौत की असल वजह पता करने के निर्देश दिए गए। मुख्यमंत्री ने इन सभी मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटने का निर्देश दिया।

आश्चर्य इस बात पर है कि इन मौतों को लेकर जो राजनीतिक तूफान मचा उस पर किसी ने भी यह सोचने की कोशिश नहीं की आस-पड़ोस, परिवार, पुलिस, स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता, और दूसरे लोग क्यों नहीं इस सच की छानबीन कर पाए कि जब ये जिंदा थे तो ये आतंक के साए में थे। शोर सिर्फ मृत देहों पर मचाया जा रहा था। सत्ता पार्टी और सरकार को जिम्मेदार बताने में कोई पीछे नहीं था।

आज जो मसला दिख रहा है उसकी जड़ें वैयक्तिक व्यवहार, सामाजिक संपर्क और आर्थिक हालात पर है। यानी बात समाज की जिम्मेदारी और सुशासन की इस की अपनी विविधता पर थी। इसकी जिम्मेदारी उस समाज पर थी जिससे सीधा मुकाबला संभव था। लेकिन राजनीति अगली कतार में होती है। जिसे मुकाबले में सीधे-सीधे उतरना ही है अभी हाल, अकाली दल ने एक मिली जुली रणनीति तैयार की थी जिसे सरकार ने पूरी तौर पर नकार दिया था। दूसरी ओर चुने हुए जन प्रतिनिधि नशा लेने की जांच खुद ही करा कर अपनी प्रशंसा खुद कर रहे है।

सामुदायिक भागीदारी ज़रूरी है इस तरह की खतरनाक समस्या पर जो आज भी बरकरार है। लुुधियाना में रह रहे अंतरराष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक एसएस जोशी यही कहते हैं। वे उस सिविल सोसाइटी समूह से जुड़े हैं जिसने जुलाई के पहले सप्ताह में अभी हाल में हुई मौतों के खिलाफ प्रदर्शन भी किया था। हमारी भूमिका सरकार के साथ सहयोग की है। हम लोगों को प्रेरित कर रहे हैं, उत्साहित कर रहे हैं जिससे वे नशीले पदार्थों के खिलाफ आवाज उठाएं न कि सरकार के खिलाफ यह सरकार इसे खत्म कर सकती है। उन्होंने बताया एक चीज तो यह है कि पुलिस और विशेषज्ञ अब यह बता रहे हैं कि मौतें नशीले पदार्थों की सप्लाई पर रोक लगाने के बाद हुई। यह एसटीएफ की मुहिम की बदौलत हुआ जिससे विपक्ष की अपनी असहमतियां हैं। ज़मीनी स्तर पर लोग नशा विरोधी केंद्र और पुनर्वास केंद्रों का उपयोग कर रहे हैं। जो नई पहल हैं वह है ड्रग एब्यूज प्रिवेंशन ऑफिसर्स (डीएपीओ) और नेबरहुड बड़ी जिससे मरीज़ों को मनौवैज्ञानिक तौर पर नशीले पदार्थों से मुक्त होने में मदद मिलती है। जागरूकता फैलाने के लिए राज्य के शिक्षा संस्थाओं की जोड़ दिया गया है। फिर भी राजनीतिक उठापटक से जनहित को चोट पहुंचती है।

राजनीतिक उठापटक के दौर में विशेषज्ञ दीर्घकालिक समाधान ठहर जाते हैं। समस्या का कोई जल्द समाधान संभव नहीं है। क्योंकि यह समस्या रातों-रात नहीं उपजी है। तकरीबन तीस साल पहले पंजाब के गांव-गांव में अफीम का प्रचलन था वह भी रईस परिवारों में। पॉपी हस्क इसका एक सस्ता विकल्प होता है और इसे लेने वालों को कोई खास नुकसान भी नहीं होता।

नशीली पीढ़ी का दूसरा दौर तकरीबन बीस साल बाद शुरू होता है जब किशोर इलाज के बहाने नशा लेने लगते हंै। वे बड़ी मात्रा में खासी की दवा, और गोलियां लेने लगते है। जिसका उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

हैरोइन या सफेद पाउडर (चिट्टा) का निर्माण एक प्रयोगशाला में तकरीबन पंद्रह साल पहले हुआ। उस समय तक पंजाब में खेती से अच्छा पैसा आने लगा था और तभी यहां मकान, इमारतें बननी शुरू हुईं। खेती की ज़मीनों की कीमतें भी बढ़ीं। शहरों के पास की ज़मीनें और महंगी हो गई और कस्बों में भी अच्छी कीमत लगने लगी।

इसके चलते ‘चिट्टा’ एक महंगा नशीला पदार्थं बन गया। लेकिन समय गुजरा और बाज़ार ठहर गया। जो चिट्टा लेते हुए नशेड़ी बन गए थे उन्हें अब एक ग्राम और पांच ग्राम सें गुज़ारा करना पड़ता था। इन्हें बेचने वाले गांव-गांव फैल गए थे। पंजाब में करीब ऐसे 18,000 छोटे विक्रेताओं की गिरफ्तारी हुई।

विशेषज्ञ मानते हैं सरकार और समाज को यह देखना चाहिए कि नशा कोई आज की समस्या नहीं है बल्कि सनातन है। इसे रोकने का अब समय आ गया है। लेकिन नशीली वस्तुओं को लेने का समय और तरीका समय के अनुसार बदलना चाहिए।

कर्मचारियों का ‘डोप टेस्ट’ और विक्रेताओं को मौत की सिफारिश!

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को नशीली दवाओं के खिलाफ अपनी जंग छेडऩे के ऐलान पर अमल करने में 18 महीने लग गए। उन्होंने यह पहल तब की जब नशीली दवाओं की ज़्यादा मात्रा में लेने से हुई मौतों से पूरा प्रदेश हिल उठा।

उन्होंने राज्य के सवा तीन लाख सरकारी कर्मचारियों में ‘नशे की लत’ (डोप टेस्ट) की जांच के आदेश भी फौरन जारी कर दिए। मंत्रिमंडल ने एनडीपीएस एक्ट में संशोधन भी कर दिया। इसके तहत नशे के सौदागरों और छोटे विक्रेताओं को मौत की सज़ा की सिफारिश की गई है।

यह सभी जानते हैं कि पंजाब में मादक पदार्थों की सप्लाई अंतरराष्ट्रीय सीमा (ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान) से होती है। इसे सुनहरा अर्ध चंद्र भी कहते हैं। पंजाब की 553 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा इस तस्करी में उपयोग में आती है। आज न केवल यह राष्ट्रीय समस्या है बल्कि देश की सुरक्षा को भी खतरा हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि मादक दवाओं के खिलाफ गंभीर तौर पर युद्ध छेड़ा जाए और जनता का पूरा सहयोग लिया जाए। इससे पता लगेगा कि समस्या की असल जड़ कहां है।

अनिवार्य तौर पर नशे की लत की जांच और मादक द्रव्य बेचने वालों के लिए सज़ा-ए-मौत की सिफारिश की घोषणा से कुछ रोक तो लगेगी, लेकिन इससे मादक द्रव्यों की बिक्री पर जीत हासिल नहीं होगी।

पूरी दुनिया में मौत की सज़ा लगभग खत्म हो गई है और इसे अब दुर्लभ से दुर्लभ अपराधों के लिए ही सुरक्षित रखा गया है। ऐसे कदमों से यही जान पड़ता है कि समस्या के निदान की बजाए सिर्फ बलाए नाम कार्रवाई की जा रही है। नशे की समस्या कितनी विकराल है उसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि पंजाब के दो तिहाई घरों में कम से कम एक तो नशे का आदी है ही।

ऐसा नहीं है कि पहले नशे की लत से परेशान लोग और उन्हें नशा बेचने वाले गिरफ्तार नहीं किए जाते थे। पिछले ही साल 18,977 छोटे व्यवसाई इन मामलों में पकड़े गए और जेलों में बंद कर दिए गए। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार नॉरकाटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रापिक सब्स्टैंसेज से मिली जानकारी बताती है कि पूरे देश में ऐसे मामलों में तीस फीसद मामले अकेले पंजाब में हैं।

इस व्यापक आकार की समस्या के निदान के लिए ज़रूरी है कि इस आतंक के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ा जाए। देश में ड्रग माफिया इसलिए पनपता रहा है क्योंकि इसे राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है और बड़ी संख्या में इसमें पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों का सहयोग रहा है। एनडीपीएस कानून के तहत जो लोग गिरफ्तार किए गए हैं उनके पास से इस मादक द्रव्य की छोटी-छोटी पुडिय़ा ही मिली है। जहां बड़े-बड़े ड्रग माफिया हों वहां से यह बरामदगी महज रेहन जैसी ही है।

आज ज़रूरत है कि नशे की लत के कारणों को ठीक तरह से जाना-समझा जाए। यह जानकारी ली जाए कि कैसे नौजवान लोग इसमें कैसे फंसते हैं और कैसे नशा लेते-लेते इसके आदी हो जाते हैं। क्या कानून का पालन करने वाली एजेसियां अपनी पूरी ताकत से देश के तमाम ड्रग माफिया को नष्ट नहीं कर सकतीं। इस समस्या से जुड़े सभी लोगों को इस संबंध में विचार करना चाहिए। इन्हें यह जानकारी भी लेनी चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था जो भविष्य से नाउम्मीद है और इसकी रोज़गार के मामलों में भी भयावह है। यह सब नए सिरे से देखा जाना चाहिए। अधिकारियों को यह अध्ययन भी करना चाहिए कि कहीं निराश होकर तो नहीं, नौजवान मादक द्रव्यों का सेवन करने लगे हैं। कुछ ग्रामीणों ने खुद फैसला लिया है कि वे नशे के धंधे में लगे छोटे-बड़े व्यवसाइयों को धर दबोचेंगे और उन्हें पुलिस के हवाले कर देंगे। देखना है कि यह जागरूकता कहीं घातक जागरूकता का एक और रूप तो नहीं ले लेती।

पंजाब में फिर फैला नशा न जाने कितने मर गए

पंजाब में जून का महीना बेहद क्रूर महीना रहा। इस महीने में मादक द्रव्यों के अधिक उपयोग से 25 से ज्य़ादा मौतें हुई। यह एक सरकारी आंकड़ा है, इतना बड़ा है कि हो सकता है मरने वालों की गिनती इससे कहीं ज्य़ादा हो। यह बहुत बड़ा मुद्दा है। पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने राज्य में राज कर रहे शिरोमणि अकाली दल को इसी मसले पर सत्ता से बेदखल कर दिया। यह इतनी जबरदस्त लड़ाई थी कि अपने चुनाव प्रचार में और राज्य में कांग्रेस की सरकार बनाने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने यह वादा किया कि साल भर के अंदर वे पंजाब से मादक द्रव्यों का प्रसार बंद कराने की कोशिश करेंगे।

 मंत्री के कथन का मुकाबला

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ब्रहम मोहिन्दर मौतों के आंकड़ें को गलत बताते हैं। वे कहते हैं कि यह आंकड़ा बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है कि ड्रग को ज्य़ादा मात्रा में लेने से ये मौतें हुई हैं। यानी दो सप्ताह में 17 मौतों का नशे से हो जाना वाकई तकलीफ देह है। इससे अधिकारियों में नाराज़गी है।

आइए कुछ तथ्यों पर हम ध्यान दें। लुधियाना के जगरांव उप संभाग के सवादी कलां गांव में कुलजीत सिंह की मौत 29 जून को दवा की ज्य़ादा मात्रा लेने से हुई। उसका अंतिम संस्कार दो जुलाई को हुआ, जब उसका भाई आस्ट्रेलिया से आया। पुलिस ने मृत देह के पास से एक चम्मच, सिगरेट लाइटर और सिरिंज बरामद की थी। इससे यह बात प्रमाणित होती है कि उसकी मौत मादक पदार्थ लेने के कारण हुई।

उसकी पत्नी हरप्रीत ने पुलिस को जानकारी दी कि उसका पति खन्ना के रसूलड़ा गांव के निजी नशा मुक्ति (डी-एडीक्शिन) केंद्र में दो महीने से था। उसको 21 जून को वहां से मुक्ति दी गई। उसकी मां हरदीप कौर ने बताया केंद्र से बाहर आकर पहली बार उसने ‘चिट्टा’ (सफेद पाउडर) का इस्तेमाल किया। अमृतसर के गुमलता के जॉन की भी मौत नशे की लत के चलते हई। उसके पिता अमर सिंह ने पुलिस को बताया कि गांव में नशे की दवाएं बेचने वाले सौदागर बहुत दिनों से सक्रिय थे, लेकिन कोई सुनता थोड़े है। मुझे यह तो पता था कि उसे शराब पीने की लत है लेकिन मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह मादक द्रव्य भी लेता है।’ तरनतारन जि़ले के गांव ढोतियान के गुरमेज सिंह की भी मौत 25 जून को हुई। उसकी मां सविन्दर कौर ने कहा कि उसका बेटा नशेड़ी था। मादक द्रव्यों ने उसे हम से हमेशा के लिए छीन लिया। जब वह मरा तो मैंने उसकी नस के पास दवा भरी एक सीरिंज देखी।

बठिंडा में तलवंडी साबो के लवप्रीत की मौत 30 जून को हुई। उसके पिता जीवन खन्ना ने इस बात की पुष्टि की,’लवप्रीत की मादक द्रव्यों के प्रति रुचि दो साल पहले कुछ खराब लोगों की संगत में हुई’।

इसके बाद वह (स्मैक- हेरोइन) लेने लगा। फरीदकोट के कोटकपुरा में बलविंद्र सिंह की मौत 22जून को हुई उसकी लाश खेतों में मिली। उसके हाथ में सुई थी।

‘कट्स’ से हुई मौतें

पुलिस की जांच पड़ताल से बात साफ हुई है कि एडल्टरेटेड हेरोइन को कुछ दूसरे तत्वों के साथ मिला कर एक ऐसा कॉकटेल बनाया जाता है जो परमानंद की अनुभूति देता है। इसे स्थानीय भाषा में ‘कट’ कहते हैं। यह नशीला पदार्थ पंजाब के नशेडिय़ों में इस समय अच्छा लोकप्रिय है। परिवारों में इस कट से भय है। यह कोई नया मादक पदार्थ नहीं है। यह हेरोइन का ही एक एडल्टरेटेड रूप है। इसे शरीर में सुई के जरिए लेते हैं। यह एहसास होता है मानो देह में सीमेंट लग रहा हो। इसकी प्रतिक्रिया यह होती है कि सुई लगी रह जाती है और आदमी की तत्काल मौत हो जाती है।

डीजीपी सुरेश अरोड़ा कहते हैं सभी आईजी, डीआईजी और सीपी को अभी हाल में हुई एक बैठक में कहा गया है कि पिछले दिनों हुए इन तमाम मामलों में हर एक की जांच वे बारीकी से करें। पुलिस स्वास्थ्य विभाग और समाज की सिविल सोसायटी से भी संपर्क में रहेगी। ये सभी मिल कर मादक द्रव्यों के नशेडिय़ों का पुनर्वास करेंगे और इनके जरिए यह भी पता लगाएंगें कि मादक द्रव्य की तस्करी (स्मगलिंग) का क्या नेटवर्क है।

मादक द्रव्यों का व्यापार करने वालों को मौत की सज़ा

राज्य में मादक द्रव्यों में हुई बढ़ोतरी के कारण हुई मौतों के चलते पंजाब मंत्रिमंडल ने मादक द्रव्यों के मामले में जुड़े तमाम विक्रेताओं और तस्करों को सजा-ए-मौत देने पर गौर करने का अनुरोध किया है। मंत्रिमंडल की पिछले दिनों हुई एक बैठक में यह फैसला लिया गया। इसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने की। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर बात करने के लिए यह बैठक बुलाई थी। मंत्रिमंडल ने इस तथ्य पर फैसला लिया कि अभी पिछले दिनों राज्य में जो मौतें हुई हैं वे मादक द्रव्यों के अत्याधिक सेवन से और एडल्टरेटेड मादक द्रव्यों के चलते हुई हैं। मंत्रिमंडल ने यह भी तय किया कि अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) एनएस कल्सी रोज़-व-रोज़ इस पूरे मामले की समीक्षा करेगे। उनके नेतृत्व में बना कार्यकारी समूह यह भी ध्यान रखेगा कि मादक द्रव्यों का उपयोग कहां-कहां हो रहा है और उस पर कैसे काबू पाया जा सकता है। इस समूह में एसीएस(स्वास्थ्य), डीजीपी (लॉ एंड आर्डर), डीजीपी (इंटेलिजंस), और एडीजीपी (एसटीएफ) बतौर सदस्य होंगे।

मंत्रिमंडल की भी एक उप समिति गठित की गई है, जो सप्ताह में एक बार मिलकर पूरे हालात का जायजा लेगी और सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा करेंगी। इसकी बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह करेंगे। इस बैठक में स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा मंत्री भी होंगे। आप और शिरोमणि अकाली दल ने कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना की है कि पार्टी ने चुनाव पूर्व यह कहा था कि यह राज्य में बढ़ते मादक द्रव्यों के प्रसार को सत्ता में आने के चार सप्ताह में रोकेंगे। लेकिन वैसा यह सरकार नही कर सकी। पंजाब के मुख्यमंत्री ने राज्य में हुई मौतों पर जांच का आदेश दिया है और कहा है कि अपराधियों के खिलाफ अधिकारी सख्त कार्रवाई करें।

मुख्यमंत्री ने ये निर्देश भी दिए हैं कि राज्य के सभी कर्मचारियों को साल भर में एक बार जांच करानी चाहिए जिससे यह पता लगे कि वे नशा करते हैं या नहीं। उनके इस फैसले पर पंजाब की प्रमुख विपक्षी पार्टी आप ने एक पत्र भेजकर मुख्यमंत्री को सलाह दी है कि वे इस फैसले पर फिर विचार करें क्योंकि पुलिस-ड्रग माफिया गठजोड़ पर राजनीति होने लगेगी और मुद्दा भटक जाएगा। उधर सरकारी कर्मचारियों की विभिन्न यूनियनों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध किया। उनकी मांग है कि राजनीतिक हस्तियों को भी अपना टेस्ट कराना चाहिए जिससे यह साफ हो कि ऐसी समस्या से हमारे विधायक और सांसद भी अछूते हैं या नहीं। कई नेताओं, विधायकों और सांसदों ने तो यह टेस्ट भी कराना शुरू कर दिया है जिससे जनता में भरोसा जम सके।

यह ज़रूर कहा जाता है कि राज्य के पुलिस अधिकारियों और मादक द्रव्यों के तस्करों में काफी गहरे संबंध हैं और उसकी जांच ज़रूरी है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट किया है कि ‘मैंने यह आदेश दे दिया है कि पंजाब पुलिस के डीजीपी मादक द्रव्यों के कारण अभी हाल हुई तमाम मौतों के कारणों का जायजा लें और बेगुनाह युवकों की मौत के जिम्मेदार लोगों पर ऐसी कार्रवाई करें जिससे दूसरों को भी लगे कि यह कितना बड़ा अपराध है। सरकार मादक द्रव्यों के आदी हो रहे युवाओं और परिवारों के इलाज और पुनर्वास पर पूरा ध्यान देगी। हमें उम्मीद है पंजाब जिसने राज्य में हरित क्रांति की, आतंकवाद का मुकाबला किया वह मादक द्रव्यों के खिलाफ चल रही जंग में भी कामयाब होगा।

कड़ी सजा न होने से पनप रहा नशे का व्यापार

मादक द्रव्यों की लत के चलते पिछले दो महीनों में पंजाब के युवाओं की मौत के सरकारी आंकड़ें जो हों लेकिन अब राज्य की जनता तो यही मानती है कि न जाने कितने मर गए। लोक लाज की वजह से ही कई मौतें पुलिस रिकार्ड में नहीं आ पातीं। इसी कारण इस समस्या से सख्ती से निपटने के लिए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने उन्हें भी सजा-ए-मौत देने की सिफारिश की है जो पहली बार इस अपराध में पकड़े गए हैं।

पंजाब में मादक द्रव्यों की लत से निजात दिलाने वाले पुनर्वास केंद्रों और वहां के अधिकारियों-कर्मचारियों और पुलिस की मिलीभगत के चलते राज्य में फिर मादक द्रव्यों का काला जाल फैल रहा है। इस अवैध कारोबार में लगे लोगों पर सख्ती से सज़ा की कोई व्यवस्था न होने से यह धंधा फ ल-फूल रहा है। ज्य़ादातर पुनर्वास केंद्रों में मरीज़ों के लिए उपयुक्त साजो-सामान मसलन पलंग, बिस्तर, डाक्टरी उपकरण आदि का अभाव है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पंजाब में इलाज के लिए जो मरीज़ आते हैं वे 2016 में सरकारी और निजी अस्पतालों में 1.49 लाख थे। जबकि 2017 में यह तदाद 1.08 ही रही। इस साल के आंकड़े अभी तैयार हो रहे हैं। राज्य में 37 नशामुक्ति केंद्र और 22 पुनर्वास केंद्र हैं। गैर अधिकारिक तौर पर राज्य में तीन लाख से ज्य़ादा मरीज़ नशा लेने की प्रवृति के हैं। राज्य में हमने नशाखोरों की देखभाल के लिए महज 96 नशा मुक्ति निवारण केंद्र और 77 निजी पुनर्वास केंद्र हैं जो अपर्याप्त हैं।

चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन और रिसर्च (पीजीआई) में मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर और मादक द्रव्यों के निवारण व इलाज केंद्र के भी प्रमुख डा. देवाशीष वसु ने बताया कि पीजीआई के नशा निवारण केंद्र में सिर्फ बीस ही बिस्तर हंै और फिलहाल अठारह मरीज़ हैं। हर साल दो हज़ार नए मरीज़ पीजीआई में इलाज के लिए आते हैं और तकरीबन आठ हज़ार मरीज़ जो नशे की अपनी लत छुड़ाना चाहते हैं वे अपनी जांच कराने आते हैं।

डा. बसु का कहना है कि मादक द्रव्यों की लत के शिकार मरीज़ों का इलाज कितना प्रभावी रहा वह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कामयाबी को किस तरह लेते हैं। यदि तीन साल से यह लत पूरी तौर पर छूट जाए तो इसका फीसद महज बीस या तीस फीसद है। यदि बीच-बीच में तलब उठे या मरीज़ दवा लेना बंद कर दे और परिवार में ठीक-ठाक रहे तो यह भी कामयाबी है। यदि समाज में और काम की जगह भी लत की इच्छा न जगे तो यह फीसद चालीस से साठ फीसद भी हो सकता है। लेकिन ये सारी बातें दवाओं के प्रयोग और इससे संबंधित बातों पर मरीज़ की इच्छाशक्ति पर निर्भर करती हैं।

मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने यह तय किया था कि सत्ता में आने के महीने भर में वे राज्य को मादक द्रव्यों के सेवन की आदत से मुक्त कराएंगे। लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। तकरीबन डेढ़ साल बाद भी यही लगता है कि समस्या का तो अभी तरीके से पूरा आकलन भी नहीं हुआ है। हल करने की बात तो बाद में आएगी। सरकार के मादक द्रव्यों के प्रसार की रोकथाम के लिए कुछ कदम तो उठाए हैं लेकिन इसके नतीजे उत्साहवर्धक नहीं हैं। पिछले दिनों इस मादक द्रव्यों के धंधा चलाने वालों और समग्लरों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई। इस साल पंजाब में ‘हेरोइन’ की जो मात्रा पकड़ी गई वह दूसरे प्रदेशों की तुलना में सबसे ज्य़ादा है।

चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले दो सालों में पकड़े गए समग्लरों में बहुत कम को सज़ा मिली। पिछले छह महीनों में इस साल पंजाब में पुलिस, बीएसएफ, एनसीबी और दूसरी एजंसियों से 215 किलोग्राम हेरोइन पकड़ी गई। यह एक रिकार्ड है। जबकि पंजाब पुलिस ने पिछले साल सिर्फ 193 किलोग्राम हेरोइन जब्त की थी। पिछले साल 1,915.7 किलो गांजा भी पुलिस ने पकड़ा था। इस साल के पिछले छह महीनों में 1,817.06 किलोग्राम गांजा पकड़ा जा चुका है।

पंजाब में नशे की लत में जो मरीज़ हैं उनकी खासी बड़ी ताताद है। पिछले कुछ वर्षों में मादक द्रव्यों के सेवियों की तादाद खासी बढ़ गई है। ज़ाहिर हैं इनमें कई तो इससे निजात पाने कें लिए बेताब भी होंगे। इसी कारण इतनी बड़ तादाद में नशेडिय़ों का इलाज खासा कठिन है। तकरीबन चौदह सौ मरीज़ों को विभिन्न नशा निवारण केंद्रों में दाखिल भी कराया गया। ज्य़ादातर निजी तौर पर बने हुए जो नशा प्राथमिकता देते हैं। मोहाली के बाहर खरड़ में गुलमोहर कांपलैक्स में बने आकाश अस्पताल में तो मरीज़ों की लंबी कतार है। यहां दस बिस्तरों की व्यवस्था है। अस्पताल के मेडिकल-इन-चार्ज डा. जीवन बाबू ने बताया।

डा.बाबू के अनुसार जब मरीज़ खासी गंभीर अवस्था में होते हैं तभी उन्हें एडमिट करते हैं। उनका घर से भी ठीक इलाज हो सकता है। इलाज के दौरान जब मरीज़ अपनी लत के बारे में बताए और प्रयास करे तो उसकी वजह यही है कि घर पर उसे ठीक तरह से संभाला नहीं जा पा रहा है। ‘मरीज़ों में आत्म बल की बहुत ज़रूरत होती है। दुर्भाग्य से मरीज़ जब अपने रिश्तेदारों और दास्तों के पास पहुंचता है तो लत फिर लग जाती है। मरीज़ जब फिर व्यसनी होता है तो हमें फिर पुरानी दवाएं शुरू करनी पड़ती हंै।’

एक मरीज़ के संबंधी कुराली के रहने वाले ही भूपिंदर सिंह (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उसके बड़े भाई कुछ साल पहले मादक द्रव्य लेने के कारण बीमार पड़े थे उनका परिवार कृषक है। पूरे परिवार की देखभाल भूपिंदर ही करता था। लेकिन कुछ महीने से उनका व्यवहार बदल गया। फिर पता लगा कि वह मादक द्रव्य लेने लगे हैं। उन्हें इलाज के लिए लाया गया। शुरू में तो उन्होंने सहयोग दिया लेकिन बाद में वे फिर मादक द्रव्य लेने लगे। समस्या और बढ़ गई। घर में इतना पैसा नहीं है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करा सकें। वे घर में रहते हैं और उनका इलाज ठीक ठाक तरीके से चल रहा है। लेकिन परिवार को डर है कि कहीं फिर उन्हें लत न लग जाए क्योंकि मादक द्रव्य आसपास यह आसानी से उपलब्ध है। जब तक मरीज़ में आत्मबल नहीं होगा कि उसे यह नशा छोडऩा ही है तब तक उसमें यह संभावना बनी रहेगी कि जैसे ही नशीली वस्तु मिले। उसे वह ले।

नशा निवारण केंद्रों के निजी क्लिनिक यह बताने से बचते हैं कि उन्होंने ने कितने मरीज़ देखे। उनके पास उसकी वजह कानूनी तौर पर है जिसे पंजाब सब्स्टैस यूज़ डिसार्डर ट्रीटमेंट एंड काउंसिलिंग, एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर रूल्स 2011 जाना जाता है। इसके तहत पेशेवर चिकित्सक मरीज़ों के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकते।

पीजीआई, चंडीगढ़ के एक डॉक्टर ने अपना नाम न छापने के अनुरोध के साथ बताया कि ‘नशा लेने वालों की जब हालत बिगड़ जाती है तो उसे संभाल पाना आज भी बहुत कठिन है। इसे संभाल पाना निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों, मरीज़ों और उनके परिवारों के प्रयास से ही संभव है।’ जिस तेजी से आज समाज में नशे की लत बढ़ रही है उसे देखते हुए सभी को सजग और हर पल सहयोगी बने रहना होगा।

आधिकारिक आंकड़ों की बात करें तो इस साल जलंधर सिविल अस्पताल और कम्मुनिटी हेल्थसेंटर नूरमहल में तीन हज़ार नशा लेने वाले मरीज़ों की चिकित्सा की गई। पिछले कुछ महीनों मे मरीज़ों की तादाद खासी बढ़ गई है। यह एक अच्छी शुरूआत इसलिए कहीं जाती है क्योंकि ज्य़ादा से ज्य़ादा मरीज़ इलाज के लिए तो आज आ रहे हैं। यानी उनमें जीवन के प्रति उम्मीद की लौ है।

यह पूछने पर कि क्या मादक द्रव्यों के व्यापार से जुड़े लोगों को सजा-ए-मौत देने से क्या इस मसले का हल हो जाएगा। डा. देवाशीष बसु ने कहा कि समाज में मादक द्रव्यों की मादकता का जो असर है उसे एकदम खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे-धीरे उस पर काबू ज़रूर पाया जा सकता है। कोशिश यही की जाती है कि उसका बढ़ाव न हो।

पंजाब सरकार ने नशा मुक्ति निवारण और पुनर्वास केंद्र मोहाली जाने पर पता चला कि मादक द्रव्यों के लती होकर आने वाले मरीज़ों की तादाद दुगुनी हो गई है। यहां ज्य़ादातर मरीज़ 20-30 आयु वर्ग के हंै। मरीज़ों से दो सौ रुपए लिए जाते हैं। जिसमें इलाज, ठहराव और आधार का पैसा लिया जाता है। कुछ दिन बाद जब मरीज़ खुद को स्वस्थ महसूस करने लगता है तो उस पुनर्वास केंद्र में 50 रुपए रोज़ पर दाखिल किया जाता है। यहां इलाज कम से कम एक महीना चलता है। फिर मरीज़ घर आ जाता है। पूरा इलाज छह महीने और जारी रहता है। बाज़ार में ऐसे ही इलाज की कीमत रुपए एक हज़ार मात्र से रुपए तीन हज़ार मात्र प्रतिदिन है।

‘ज्य़ादातर लोग निजी अस्पतालों में इसलिए जाना चाहते हैं’ क्योंकि एक तो उनका भरोसा सरकारी डाक्टरों पर नहीं होता और वहां जमी भीड़ और गंदगी से उन्हें काफी परेशानी होती है। बताती है डा. अंशु गर्ग जो पंजाब सरकार की डिस्ट्रिक्ट डिएडिक्शन एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर, मोहाली की को-इंचार्ज हैं।

मरीज़ों से बातचीत में बताया कि उन्हें कारावास जैसी हालत में तालाबंद रखा जाता है। गेट पर एक सिपाही और गार्ड तैनात रहते हैं। किसी भी बाहरी व्यक्ति को अंदर आने की मनाही होती है।’ हमें यह सावधानी इसलिए बरतनी पड़ती है जिससे मरीज़ों को दी जा रही दवाओं के बीच कोई मादक दवा कोई बाहरी तत्व इन्हें न दे। पहले कई ऐसी घटनाएं हुई हैं। मरीज़ों को तीसरी-चौथी बार भी इलाज के लिए आना पड़ा है। जीवन संदेश फाउंडेंशन खरड़ में नौ बिस्तर का अस्पताल है। इनका दूसरा केंद्र दिल्ली में है। ‘हम इलाज नहीं करते सिर्फ पुनर्वास केंद्र चलाते हैं’ जहां सलाह के जरिए मरीज़ों की देखभाल करते हैं।

‘गरीब और अमीर, दोनों ही वर्ग के लोग मरीज़ के तौर पर नशा मुक्ति केंद्र पर आते हैं। तीन से पांच साल में दिल्ली में हमने तकरीबन डेढ़ सौ लोगों को स्वस्थ किया है।’ बताते हैं रघुबीर सिंह।

‘करतूत की सजा ज़रूर मिलेगी’

विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर ङ्क्षसह ने यह कहा था कि वे यदि जीते तो महीने भर में वे पंजाब में मादक द्रव्यों के फैलाव पर रोक लगा देंगे। लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री बने पंद्रह महीने हो गए। पिछले ही महीने तीस लोगों की मौत ज्य़ादा मात्रा में मादक द्रव्य लेने से हो गई। इसके बाद पूरे राज्य मेें बेचैनी है।

मुख्यमंत्री और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और नौकरशाहों ने फौरन अपनी सक्रि यता दिखानी शुरू की। मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी सरकारी कर्मचारीयों, अधिकारियों को हर साल ‘डोप टेस्ट’ कराना होगा। साथ ही मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में केंद्र से यह सिफारिश भी की गई कि मादक द्रव्यों को बेचने वालों को सज़ा-ए-मौत दी जाए। तहलका प्रतिनिधि राजू विलियम की मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से बातचीत के मुख्य अंश!

              पंद्रह महीने पहले आपने मादक द्रव्यों के मुद्दे पर जो वायदा किया था, क्या आपके नजरिए में कोई बदलाव आया है।

              मुझे नहीं पता कि ‘नजरिए में बदलाव’ से आपका क्या तात्पर्य है। मैंने तब तय किया था कि मैं इस आतंक को खत्म करूंगा और प्रदेश में बच्चों को इससे निजात दिलवाऊंगा। मेरा यह प्रण आज और भी मज़बूत हुआ है। मादक द्रव्यों की तस्करी करने वालों और इसे बेचने वालों ने हमारे राज्य को बर्बाद कर दिया है। इतना ही नहीं, इन्होंने भावी पीढ़ी को भी बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। यह सब होता रहे, मैं नहीं चाहता। भले कुछ भी हो। यह एक वादा था जो मैंने खुद से विधानसभा चुनावों के भी पहले किया था। मैं इसे पूरा करूंगा।

              आरोप विपक्ष का है कि मादक द्रव्यों के बड़े व्यापारी तो आपकी पकड़ से भी काफी दूर है?

              कुछ ने ज़रूर देश छोड़ दिया होगा लेकिन वे भी हमारे राडार पर है। एसटीएफ और राज्य की पुलिस और केंद्र की दूसरी एजंसियां बाकायदा उन पर निगरानी रख रही हैं। मैंने उनसे साफ कह रखा है कि दुनिया के दूसरे कोने में भी यदि ये अपराधी हों तो उन्हें उनकी करतूत की सज़ा दी जाए। यदि ज़रूरत हो तो उन्हें वापस लाएं जिससे उन्हें सज़ा मिले। इस बात की हम उन्हें अनुमति नहीं देंगे कि वे उन्मुक्त रहें। यह न केवल हमारे लिए बल्कि हमारे बच्चों के लिए भी ज़रूरी है।

              यह भी आरोप है कि इस काम के लिए तैनात किए गए एटीएफ और राज्य पुलिस के पर कतर दिए गए हैं और उन्हें ड्रग व्यापार की तह तक भी नहीं पहुंचने दिया जा रहा है?

              कोई पर कतई कतरे नहीं गए हैं। मैंने एसटीएफ का गठन सिर्फ एक मकसद से किया था। वह था कि मादक द्रव्यों की रीढ़ की हड्डी तोडऩा। मैंने उन्हें पूरी खुली छूट दी और उन लोगों ने ड्रग माफिया लोगों को घुटनों के बल बिठाने में कामयाबी पाई। उन्होंने पूरी कोशिश की है कि हमारे युवा लोगों तक ऐसी मादक दवाएं न पहुंचे। अभी हाल हमने यह कोशिश की पंजाब पुलिस के दायरे में भी उन्हें रखा जाए जिससे कमी न पड़े  ताकत की और दूसरी सहूलियतों की। एक विषय था एजंसी के तौर पर काम करने में कोई बाधा न हो। वे अभी भी काम कर रहे हैं। मसलन जैसे सुरक्षा  या सतर्कता विभाग जिसके अपने ब्यूरो हर कहीं हों। इनका इरादा बेहद साफ हैं कि उन्हें किसी भी हालात में मादक द्रव्य व्यापार की तह तक पहुंचना है जिससे पंजाब मादक दवाओं से मुक्त हो, एक साथ हमेशा के लिए।

              पहली बार मादक द्रव्यों का कारोबार करने वालों को सज़ा-ए-मौत की सिफारिश और सरकारी कर्मचारीयों के लिए ‘डोप टेस्ट’ से कया कुछ असर होगा?

              बेशक। जो मादक द्रव्यों की बिक्री से रातों-रात रईस होना चाहते हैं वे शायद कुछ करें। उन्हें यह अहसास होगा कि उनकी एक गलती या मादक द्रव्यों की ओर बढ़े कदम से वे जेल जा सकते हैं। यह संदेश अब बहुत साफ तरीके से उन तक पहुंच चुका है जो इस धंधे में लगे हैं। यह एक ऐसा गंभीर अपराध है कि हम किसी भी हालात में ऐसा कोई कानून से नहीं बचा सकते। मुझे भरोसा है कि जो मादक द्रव्यों के अपराधी बनना चाहते हैं उनके दिमाग में डर तो होगा ही।

              जहां तक अनिवार्य ‘डोप टेस्ट’ की बात है कि इससे यह बात साफ हो जाएगी कि यदि किसी ने मौज-मस्ती के बहाने भी मादक द्रव्यों का सेवन किया है तो उसकी नौकरी तो जाएगी और उसे कोई और मिलेगी भी नहीं। मुझे पता है कि ये कड़े कदम हैं लेकिन आज जो हालत है इससे भी ज्य़ादा कड़े कदम मेरी राय में उठाए जाने चाहिए।

              यह माना जा रहा है कि आपकी सरकार जो कदम उठा रही है वे रक्षात्मक ज्य़ादा हैं क्योंकि अचानक राज्य में मौतों की खबरें आईं। क्या राजनीतिक तौर पर आपकी ज़मीन घातक रही है?

              क्या मौत की सज़ा देने की सिफारिश और अनिवार्य ‘डोप टेस्ट’ रक्षात्मक (डिफेंसिव) कदम है? यह ज़रूर है कि मादक द्रव्यों के कारण इधर जो मौतें हुई हैं उनसे हम कड़े फैसले लेने को बाध्य हुए हैं। लेकिन एक बात हमें बड़े साफ तौर पर बतानी चाहिए कि ये फैसले रक्षात्मक नहीं हैं। ये कड़े कदम हैं जो किसी भी सरकार को ऐसी क्रूर समस्या के निदान के लिहाज से उठाने ही पड़ते। कुछ देशों में तो जल्द से जल्द सुनवाई कर सज़ा देने का प्रावधान भी है।

              बताया जाता है कि आपकी सरकार जबसे सत्ता में आई है तो मादक द्रव्यों के 18 हज़ार विक्रेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं और दो लाख नशेडिय़ों का इलात हो चुका है। फिर भी आप क्या कमी देखते हैं?

              आपने खुद ही बता दिया कि संख्या क्या है। एक चीज़ तो तय है कि हम किसी भी तरह आतंक के इस साए को नष्ट करना चाहते हैं। एसटीएफ के सामने वित्तीय संकट हैं। हमारी जो वित्तीय स्थिति है उसमें ही हमने यह तय किया है जो भी जैसी भी स्थिति है हम मादक द्रव्यों का व्यापार और फैलाव रोकेंगे।

              आप किस आधार पर यह कह सकते है कि विपक्ष इस मुद्दे को हवा दे  उभार रहा है?

              कैसे वे हवा दे रहे हैं। यह कांग्रेस ही थी। राहुल गांधी के नेतृत्व में तीन साल पहले यह मुद्दा उभरा था। इस मसले को फैलाने के लिए विपक्ष ही जिम्मेदार है। अकालियों ने अपने राज में अपनी सुविधा के लिए ड्रग माफिया को दस साल तक फलने-फूलने दिया। जहां ‘आप’ की बात है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें आरोप है कि पंजाब में उनके चोटी के कई नेताओं का मादक द्रव्यों से जुड़ाव है। वे हाल-फिलहाल इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ लेने की फिराक में हैं। यह दुख की बात है कि विपक्ष ऐसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर भी लाभ उठाने की सोच रहा है।

नीतीश ने मनवा ही लिया कि जद सबसे मज़बूत

जद (एकी) के सुप्रीमो और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नेताओं को अपनी माया में मुग्ध करने में कामयाब हो गए हैं। अपने सूबे में उनकी पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी और सबसे ज्यादा ताकतवर है, यह मनवा लिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी सबकी मंजूरी ले ली है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वे जो भी रणनीति तय करेंगे यानी भाजपा के साथ सीटों का तालमेल करेंगे, उसका कोई विरोध नहीं करेगा। राजद में भी ऐसे मौके पर उसके आला लालू प्रसाद को इसी तरह का अधिकार मिल जाता रहा है, जिस तरह नीतीश कुमार को पार्टी सुप्रीमो के चलते मिल गया है। इस मामले में जद (एकी) और राजद या नीतीश कुमार और लालू प्रसाद में कोई फर्क नहीं है।

सूबे में जद (एकी) किसी पार्टी से बड़ी और ताकतवर पार्टी है? राजद से या भाजपा से? राजद से तो नहीं है। राजद के विधायकों की संख्या ज्यादा है। वोट के हिसाब से राजद अव्वल है। यह बात जरूर है कि भाजपा के मुकाबले जद (एकी) बड़ी और ताकतवर है। आखिर नीतीश कुमार ने अपने नेताओं को अपनी पार्टी को सबसे बड़ा और ताकतवर बता कर क्या संकेत करना चाहा है? अपनी पार्टी के नेतों को आश्वस्त करने का उनका एक मकसद हो सकता है। दूसरा मकसद यह कि राजद अपने को बड़ी और ताकतवर पार्टी होने की भूल न करें।

नीतीश कुमार बहुत पहले से ही ऐसा रास्ता बना लेना चाहते हैं जिससे लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ तालमेल करने में सहूलियत हो। चुनाव में सीटों के बंटवारे के आधार में फेरबदल करना चाहते हैं। ऐसा होने पर ही वे ज्यादा सीटों की मांग कर सकेंगे। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने यह साफ कर दिया है कि वे भाजपा से ज्यादा सीटों की मांग करेंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें केवल दो ही सीट मिली थी लेकिन वोट का प्रतिशत कम नहीं था। फिर उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें ज्यादा सीटें भी मिली और वोट का प्रतिशत भी ज्यादा था। इस आधार पर सीटों की मांग करने पर उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है। भाजपा के लिए इसका काट करना आसान नहीं होगा।

पिछला विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार की अगुवाई में लड़ा गया। अगला विधानसभा चुनाव भी उन्हीं की अगुवाई में लड़ा जाएगा। बैठक में इन दोनों बातों पर जोर देने की आखिर जरूरत ही क्यों पड़ी। दरअसल यह इशारा किया गया कि सूबे में नीतीश कुमार ही सबसे ज्यादा प्रभावशाली नेता है। उनकी अगुवाई में ही चुनाव लड़ा जा सकता है और जीता जा सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव को कुछ समय के लिए दरकिनार कर दें, तो भी उसके पहले जो लोकसभा चुनाव लड़ा गया, सूबे में नीतीश कुमार की अगुवाई में ही लड़ा गया और कामयाबी भी मिली। वैसी ही स्थिति अब भी है। भाजपा के लिए यह अस्वीकार करना आसान नहीं होगा।

जद (एकी) की ओर से भाजपा पर दबाव देने की रणनीति उस समय तक अख्तियार की जाती रहेगी, जब तक लोकसभा चुनाव में सीटों पर सम्मानजनक तालमेल नहीं हो जाता। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में यह भी स्पष्ट हो गया। बैठक में पार्टी ने यह भी साफ किया कि पार्टी सांप्रदायिकता पर किसी तरह का समझौता नहीं करेगी। भाजपा पर दबाव देने और सांप्रदायिकता पर कोई समझौता नहीं करने को कहने के पीछे एक तीर से दो शिकार करने की चाल है। भाजपा को अपने वश में करना है ही, राजद की राजनीति को कुंद करना भी है।

राजद अपनी छवि को भाजपा की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी बनाने में सफल है। वह लगातार भाचपा को सांप्रदायिक पार्टी बता कर उसकी आलोचना करता रहा है। जद (एकी) भाजपा के साथ है, इसलिए वह उसे सांप्रदायिक तो नहीं बताती, लेकिन सांप्रदायिक पार्टी का सहयोगी बताती है। जद (एकी) को इसलिए यह जताने की मजबूरी है कि वह सांप्रदायिकता पर किसी तरह का समझौता नहीं करेगी। राजद की तुलना में वह भी सांप्रदायिकता का विरोध करने में कम नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कि राजद सेकुलर है तो वह भी उससे कम सेकुलर नहीं है। राजद सामाजिक न्याय की पार्टी है तो उससे बढ़-चढ़ कर वह सामाजिक न्याय की पार्टी है। कुल मिला कर यह कि जद (एकी) भाजपा के साथ रह कर भी सांप्रदायिकता विरोधी और सामाजिक न्याय की पार्टी है। जद (एकी) का मुकाबला किसी पार्टी से है तो वह है राजद।

जद (एकी) यह मान कर चल रही है कि भाजपा उस पर निर्भर है। वह अपने बलबूते पर कोई भी चुनाव लड़ कर ज्यादा कुछ हासिल नहीं कर सकती। उसका अकेला होना अपने को हासिए पर लाना होगा। वह जद (एकी) पर ज्यादा निर्भर है, जद (एकी) भाजपा पर ज्यादा निर्भर नहीं है। गठबंधन की राजनीति और उसकी अनिवार्यता के मद्देनजर दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। एक दूसरे की दोस्ती पर राजग निर्भर है। जद (एकी) और भाजपा की दोस्ती से लोजपा और रालोसपा को भी फायदा है। लोजपा और रालोसपा भी  सामाजिक न्याय की  पार्टी मानी जाती हैं।

राजद यह समझ रहा है कि जद(एकी) ही उसका बड़ा दुश्मन है। भाजपा भी दुश्मन है। लेकिन जद (एकी) को कमजोर करने से भाजपा भी कमजोर होगी। भाजपा के कमजोर होने से जद (एकी) कमजोर नहीं भी हो सकती है। जद(एकी) और भाजपा की दोस्ती राजद के लिए बर्बादी है। वह अपनी स्थिति मजबूत करने या अपने समर्थकों व वोट को सुरक्षित करने के लिए यह प्रचार करता रहा है कि नीतीश कुमार इतने मजबूर हैं कि वे भाजपा को छोड़ कर जाएंगे कहां। जद (एकी) और भाजपा की दोस्ती को वह मजबूरी बता रहा है। जद (एकी) राजद के काट और उसके वोट आधार में घुसपैठ करने के लिए ही भाजपा से अपनी दोस्ती को स्थिर और टिकाऊ  बता रहा है। जद (एकी) की ओर से भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर राजद को घेरा जा रहा है। राजद के पास इसका कोई काट नहीं है। भ्रष्टाचार का मुद्दा जम गया तो राजद का नुकसान तय है। जद (एकी) भ्रष्टाचार के मुद्दे ्रकी आड़ में यह साबित करना चाहता है कि भाजपा के साथ जाना उसकी मजबूरी थी। नीतीश कुमार ने धोखा किया, राजद का यह आरोप अब आकर्षक नहीं रह गया।

जद (एकी) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और उसमें हुई चर्चा व किए गए फैसले से सूबे की राजनीतिक स्थिति में फर्क आने की संभावना है। पहले नीतीश कुमार के खिलाफ राजद मुखर था। लेकिन अब राजद को अपने बचाव में खड़ा होना पड़ रहा है। जद (एकी) और भाजपा के बीच लोकसभा चुनाव में सीट का बंटवारा कोई बड़ी समस्या नहीं है, इस पक्ष में हवा बनती दिखती है। केवल एक ही शुबहा है कि चुनाव में प्रथानमंत्री नरेंद्र मोदी की बनी छवि से होने वाले नुकसान को नीतीश कुमार की छवि का प्रभाव कितना पाट पाएगी या नहीं।

नशे की गिरफ्त में हिमाचल

अभी तक पर्यटन और सेब के लिए मशहूर रहे हिमाचल में नशे का कारोबार खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है। एनसीआरबी की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि हिमाचल नशे के लिए दर्ज मामलों में तीसरे स्थान पर है। यहाँ प्रति लाख आबादी के हिसाब से दजऱ् घटनाओं का आंकड़ा 13.1 है जो देश में तीसरा सबसे ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में एनडीपीएस अधिनियम 1985 में विशेष और स्थानीय कानूनों (एसएलएल) अपराधों के तहत पिछले साल संज्ञेय अपराधों के 929 मामले दर्ज किये गए जो बेहद डरावनी तस्वीर पेश करते हैं।

प्रदेश में नशे के इन आंकड़ों के प्रति सरकारें कितनी गंभीर हैं यह इस तथ्य से साबित हो जाता है कि प्रदेश की राजधानी शिमला में नशा निवारण मुक्ति का एक भी केंद्र नहीं। न सरकारी न निजी। ऊपर से तुर्रा यह है कि हिमाचल में नशे के व्यापार में पकड़े गए आरोपियों को सजा मिलने का आंकड़ा बहुत कमजोर रहा है।

इसी साल 31 मार्च को प्रदेश के ऊना जिले के डांगोली गांव के 17 साल के युवा सुभाष (परिवर्तित नाम) की चिट्टा (हेरोइन) की ओवरडोज से मृत्यु हो गई। स्थानीय लोगों ने मौत के खिलाफ सड़कों पर जोरदार प्रदर्शन किया और क्षेत्र में नशे के कारोबार के अपराधियों के खिलाफ पुलिस की निष्क्रियता पर गहरा रोष जताया। कुछ महीने पहले हारोली में भी एक युवा ने इसी कारण अपना जीवन खो दिया था। पिछले एक साल में राज्य में नशीले पदार्थों के सेवन के कारण कम से कम चार लोगों की जान गयी है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2003 में राज्य में एनडीपीएस के तहत केवल 310 मामले दर्ज किए गए थे जो 2014 में 644 पर जा पहुंचे। यही आंकड़ा नवीनतम रिपोर्ट में 929 पहुँच गया है। उमंग फॉउण्डेशन के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि प्रदेश में विभिन्न सरकारें नशे का कारोबार रोकने में नाकाम रहीं हैं। यहाँ नशे की धड़ल्ले से बिक्री होती है, स्कूलों के बाहर नशे की पुडिय़ाँ बिकती हैं और सरकारी तंत्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। “सरकारों के अभियान भी कागज़ी साबित हुए हैं। इनमें गंभीरता और नीति की बेहद कमी दिखती है”।

हाल ही में एक पूर्व विधायक के नाबालिग बेटे को अपने तीन दोस्तों के साथ चरस के साथ हिरासत में लिया गया था। जिस वाहन में वे यात्रा कर रहे थे वह पूर्व विधायक के नाम पर थी

और उसमें ही 500 ग्राम चरस पकड़ी गयी थी। सभी चार को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया था। बाद में उन्हें उनके माता-पिता को सौंप दिया गया।

‘हिमाचल वॉचर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल में पिछले दस साल में एनडीपीएस मामले तीन गुना बढ़ गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘हिमाचल में बढ़ते नशीले पदार्थों के व्यापार का सबसे बड़े केंद्र कुल्लू, मनाली, मंडी, सिरमौर और शिमला हैं जहाँ बड़ी संख्या में युवा इसकी जकड़ में हैं। चरस का व्यापार कुल्लू में एक भयानक आकार ग्रहण कर रहा है जहां पर्यटकों की बड़ी संख्या रहती है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक विदेशियों में ज़्यादातर इज़राइली नागरिक इस धंधे से जुड़े हैं। नशे की खेती के जरिये स्थानीय किसानों को त्वरित कमाई के लिए “प्रेरित” किया जाता है।

“तहलका” की छानबीन के मुताबिक कुल्लू जिलों में मनाली, कासोल, मालाणा अभी भी नशीले पदार्थों के व्यापार के केंद्र हैं। विदेशी नागरिकों और स्थानीय निवासियों की तरफ से मलाणा और आसपास रेव पार्टियां आयोजित करना आम बात है। यहां तक आरोप हैं कि कुछ विदेशी नागरिक अवैध रूप (भारत सरकार से वैध अनुमति के बिना) मालाणा क्षेत्र में रह रहे हैं और वे स्थानीय लोगों की मदद से नशा व्यापार में शामिल हैं। पिछले सात सालों में 82 से अधिक विदेशी नागरिक, मुख्य रूप से ब्रिटिश, इस्राईली, डच, जर्मन, जापानी और इटालियन राज्य में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये गए हैं।

कुल्लू जिला नशे से सर्वाधिक प्रभावित है। एक अनुमान के अनुसार, यहां सालाना 2000 करोड़ के नशे का कारोबार होता है। इसके अलावा हिमाचली युवाओं में रासायनिक पदार्थों से बनाए गए नशे के उपयोग की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।

इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (आईजीएमसी) की एक अध्ययन रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ साल पहले न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की अध्यक्षता वाली हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की एक खंड पीठ ने एक फैसले में कहा था कि राज्य में 40 प्रतिशत युवा नशीली दवाओं के जाल में फंसे हैं। यह भी दिलचस्प तथ्य है कि उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस मुद्दे पर राज्य सरकार की खिंचाई की थी। राज्य के डीजीपी के अदालत में यह बताने पर कि सरकार ने बड़े पैमाने पर भांग उखाड़ो अभियान चलाया है, कोर्ट ने इसे कागजों तक सीमित बताया था। पुलिस अधिकारी ने बताया था कि राज्य के करीब 400 गांव में भांग की खेती होती हैं। राज्य सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक अकेली कुल्लू घाटी में 51,500 एकड़ जमीन में भांग की खेती की जाती और इस जिले में सालाना 2000 करोड़ रूपये के नशे का कारोबार होता है।

राज्य के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने स्वीकार किया कि हिमाचल प्रदेश में लगभग 27 प्रतिशत युवा नशीली दवाओं की गिरफ्त में हैं। उन्होंने कहा – ‘नशा एक सामाजिक समस्या है जिसे लोगों की भागीदारी के साथ ही रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि दवाइयों के खिलाफ प्रभावी ढंग से अभियान के लिए एक विशेष टास्क फोर्स (एसटीएफ) गठित की गयी है और शिमला, कांगड़ा और कुल्लू में तीन राज्य मादक पदार्थ अपराध नियंत्रण इकाइयां स्थापित की गई हैं।

लोगों का मानना है कि पड़ोसी राज्य (पंजाब) नशे से बुरी तरह प्रभावित है और हमारे राज्य में भी इसका खतरा एक गंभीर चुनौती है। मनाली निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले राज्य केबिनेट मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने कहा, ‘हमारी सरकार ने नशीले पदार्थों के प्रति शून्य सहनशीलता अपनाई है। चाहे वह मलाणा हो या कोई अन्य क्षेत्र। जय राम सरकार वर्तमान में नशे की खेती को नष्ट कर रही है।’ राज्य पुलिस अभियान के दौरान 19 जनवरी से 1 फरवरी तक, 27.515 किलोग्राम चरस, 215 ग्राम अफीम, 55.868 किलोग्राम गांजा, 37.175 ग्राम हेरोइन और 19 .83 ग्राम कोकीन पुलिस ने पकड़ी और 66 भारतीय और 7 नेपाली पुलिस ने गिरफ्तार किये थे।

यह भी एक चौंकाने वाला तथ्य है कि हिमाचल में नशे का बढ़ता खतरा विधानसभा चुनावों में कभी भी प्रमुख और गंभीर मुद्दा नहीं बना। राजनेता इस मुद्दे को विधानसभा में और बाहर कभी गंभीर रूप से नहीं उठाते हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और इंजीनियरिंग स्नातक राजेश धर्मानी इस बात से सहमत हैं कि राजनेताओं द्वारा उनके भाषणों में इस मुद्दे को शामिल करने की अत्यधिक आवश्यकता है। ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस तरह का मुद्दा गंभीरता से नहीं लिया जाता है। समय आ गया है कि हमें अपने युवाओं को इस खतरे से बचाने के लिए बड़ी और गंभीर पहल करें।’

पश्चिमी हिमालय में दूरस्थ घाटियां और ऊंचे पर्वत भांग और अफीम की खेती के बड़े क्षेत्र हैं। यहाँ का नशा बड़ी मात्रा में यूरोप पहुंच रहा है। दवाओं और एकदम पैसा कमाने की लालसा भी इन क्षेत्रों में विदेशियों को आकर्षित करती है जहां वे असंगठित दवा खेती का हिस्सा बन गए हैं। यह आरोप है कि उनमें से कुछ कभी भी अपने घरों को वापस नहीं लौटते और वहीं रह रहे हैं। कुछ ने तो स्थानीय औरतों से “विवाह” तक कर लिए हैं। कुल्लू, चंबा, मंडी, शिमला और सिरमौर जिलों में दुर्गम क्षेत्र के 2,480 से अधिक गांवों में भांग और अफीम की खेती का धंधा फैला हुआ है।

पंजाब और हरियाणा की सीमा के साथ लगते राज्य के क्षेत्र नशीली दवाओं के केंद्र बन गए हैं। नशा व्यापार के खतरे ने धार्मिक तीर्थ केंद्रों और पर्यटन स्थलों में भी खतरनाक अनुपात में अपने पाँव पसार लिए हैं। पूर्व एडीजीपी केसी सड्याल ने इस संवाददाता से बात करते हुए खुलासा किया कि हिमाचल प्रदेश में 58 प्रतिशत से ज़्यादा नशे का उत्पादन इज़रायल, इटली, हॉलैंड और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में तस्करी के जरिये पहुँच रहा है। ‘बाकी नेपाल, गोवा, पंजाब और दिल्ली, नेपाल या अन्य भारतीय राज्यों में पहुँच जाता है।’

काँगड़ा जिले में मैक्लोडगंज और आसपास के इलाके भी अवैध नशीले पदार्थों के केंद्र हैं। सड्याल ने कहा – ‘वैकल्पिक खेती (सब्जियों और फूलों की खेती) ही अफीम और भांग की खेती को नियंत्रित करने का एकमात्र तरीका है’।

हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘राज्य पहले भांग के लिए जाना जाता था जो पहाडिय़ों में उगाया जाता था और विदेशियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि अब सिंथेटिक नशा दवाओं की उपलब्धता और कुख्यात चिट्टा (हेरोइन) आ चुके हैं। युवाओं में खांसी सिरप, एंटी-ड्रिंपेंट्स और नींद वाली गोलियों का भी इस्तेमाल होता है जो सस्ती हैं”। ड्रग तस्करी अब राज्य में विदेशी, स्थानीय और देश के अन्य राज्यों के तस्करी करने वालों के रूप में राज्य में बहु-आयामी समस्या बन गई है। यह अब रहस्य की बात नहीं रही भांग और हशीश दशकों से हिमाचल में उगाए जाती रहे हैं और उपभोग के अलावा तस्करी में इस्तेमाल की जाती रही है।

हालिया रिपोर्ट में राज्य में काम कर रहे एक एनजीओ “हिमाचल वॉचर” ने बताया है कि बॉम्बे हेम्प कंपनी के प्रतिनिधियों ने अक्टूबर 2017 में राजभवन में गवर्नर देवव्रत से मुलाकात की और औद्योगिक हेमप को कृषि के सुधार के लिए समर्पित सामरिक संपत्ति के रूप में उपयोग करने और स्थानीय किसानों के सामाजिक-आर्थिक मानकों को ऊपर उठाने के साथ अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका को बढ़ावा देने के लिए एक प्रस्तुति दी। । ‘आनुवांशिक रूप से संशोधित भांग में .3 से 1 की ही मारक क्षमता होगी जो वर्तमान में उगा कर इस्तेमाल की जाने वाली भांग के 3 से 4 फीसद से कहीं कम है। “लिहाजा नशा करने वालों के लिए इसका उपयोग एक तरह से बेकार की चीज़ हो जाएगा”।

सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता शांता कुमार ने हाल ही में राज्य में नशे के बढ़ते खतरे के बारे में राज्य के मुख्यमंत्री को चेताया है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस समय प्रभावी उपाय नहीं करती है तो राज्य की युवा पीढ़ी गंभीर परेशानी में फंसने वाली है। उन्होंने कहा कि राज्य में बेरोज़गारी की बढ़ती संख्या नशे के खतरे में योगदान देने के प्रमुख कारणों में से एक है। उन्होंने कहा, ‘हमारे युवाओं में निराशा बढ़ रही है और वे नशीले पदार्थों की ओर जा रहे हैं।’

पुलिस की कार्य योजना

नशे, खासकर भांग की खेती के खिलाफ एक व्यापक अभियान 15 अप्रैल से राज्य के सभी जिलों में शुरू किया गया था। अभियान के दौरान किए जा रहे कार्य का विवरण देते हुए, पुलिस महानिदेशक, सीता राम मढऱ्ी ने बताया कि पुलिस, एनसीबी, एसएनसीबी, सीआईडी और वन, राजस्व, पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभागों जैसे प्रवर्तन एजेंसियों को शामिल करके ऐसी खेती को नष्ट करने के लिए एक संयुक्त अभियान शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘ये एजेंसियां 15 अगस्त, 2018 से पहले अफीम, अफीम और भांग विनाश पर प्रगति रिपोर्ट जमा करेंगी। सभी एसपी, महिला मंडल, युवक मंडल और अन्य गैर सरकारी संगठनों को जोड़ देंगे जबकि अफीम पोस्त और भांग की फसलों का विनाश किया जा रहा है।Ó उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास विभाग के समन्वय में कृषि और बागवानी विभाग संयुक्त रूप से अफीम पोस्त और भांग की खेती वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त वैकल्पिक नकद फसलों को अपनाने का प्रस्ताव प्रस्तुत करेंगे। नशीली दवाओं के दुरुपयोग पर छात्रों को संवेदनशील बनाने के लिए शिक्षा विभाग के नोडल प्रशिक्षण अधिकारी के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किया जाएगा। पीटीए और एसएमसी बैठकों के दौरान, छात्रों के माता-पिता भी इस मुद्दे पर चर्चा में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि दवाओं के दुरुपयोग पर शैक्षणिक संस्थानों में एक सप्ताह में परामर्श सत्र भी आयोजित किए जा रहे हैं। ‘इस तरह के परामर्श का मुख्य उद्देश्य छात्रों के माध्यम से दवाओं के आपूर्तिकर्ता तक पहुंचना है।’

राज्य पुलिस प्रमुख ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों के पास स्थित सभी दुकानों, ढाबों में सख्त निगरानी में रखी जा रही हैं और उनका निरीक्षण समय-समय पर किया जाता है और इन संस्थानों के आसपास संदिग्ध गतिविधियों को पुलिस को सूचित किया जाएगा। जनसंपर्क विभाग नशीली दवाओं के दुरुपयोग के दुष्प्रभावों पर नुक्कड़ नाटकों समेत विभिन्न तरीकों से बड़े पैमाने पर जागरूकता कार्यक्रम चलाएगा। हालांकि, आईएसटी, आईआरबीएन बनगढ़, ऊना की सड़क प्ले टीम पहले से ही कार्रवाई कर चुकी है। स्वास्थ्य विभाग जनता के बीच अपने प्रसार के लिए शिक्षा और जनसंपर्क विभागों के साथ 104 हेल्पलाइनों पर नशीली दवाओं के दुरुपयोग की प्रचार सामग्री साझा करेगा।

महिलाओं का योगदान

हिमाचल में महिलाओं ने भांग उखाड़ो अभियान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस अभियान में राज्य में 80 से ज्यादा माहिला मंडल शामिल हैं। कुल्लू जिले में माहिला मंडल की सदस्य कमला देवी ने कहा कि पुरुषों और युवाओं में नशीले पदार्थों की आदत से महिलाएं ही सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि एक बार नशे की चपेट में आये पुरुष अपने परिवार की जि़क्र करना बंद कर देते हैं और नशे के जुगाड़ में रहते हैं और परिवारों की देखभाल करना बंद कर देते हैं। ” नशे से उनकी सेहत का भी सत्यानाश हो गया है और घर चलाने का जिम्मा भी हम महिलाओं पर आन पड़ा है”। सिरमौर जिले के एक ऐसी ही सदस्य सत्यवती ने कहा कि महिलाएं सक्रिय रूप से भांग उखाडो का अभियान में प्रशासन और पुलिस की मदद कर रही हैं। कुल्लू और सिरमौर में बहुत से इतने दुर्गम इलाके हैं जहाँ पुलिस की भी पहुँच नहीं हो पाती। युवक मंडल भी इस काम में हाथ बटा रहे हैं।

भाजपा: भीतर पकती गुटबाजी

कांग्रेस के विपरीत प्रदेश भाजपा में खुले में कोर्ई लड़ाई नहीं दिखती। न तो एक दूसरे के खिलाफ कोई बयानबाजी होती है न संगठन और सरकार के बीच वर्चस्व की खींचतान दिखती है। फिर भी 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले भाजपा के बड़े नेताओं में अस्तित्व की जंग भीतर ही भीतर जारी है।

भाजपा के बीच गुट होने के बावजूद लड़ाई का कांग्रेस की तरह खुले में न आ पाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि सात महीने पहले मुख्यमंत्री बने जय राम ठाकुर ने न तो खुद अपना कोई गुट बनाने का प्रयास किया न प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार जैसे अपने वरिष्ठों की हैसियत को चुनौती देने की कोशिश की। जय राम अपनी सीमायें जानते हैं और उन्हें इस बात का एहसास है कि सरकार चलाने के लिए उन्हें इन नेताओं की मदद की ज़रुरत रहेगी। पार्टी के कई बड़े नेता स्वीकार करते हैं कि जय राम

धूमल और शांता कुमार के मुकाबले अफसरशाही पर कम पकड़ रखने वाले मुख्यमंत्री हैं और सरकार पर अभी वे धूमल और शांता जैसा दबदबा नहीं बना पाए हैं।

प्रदेश भाजपा में अभी भी सबसे ताकतवर खेमा पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का है। धूमल भले सत्ता से बाहर हैं लेकिन संगठन से लेकर सरकार तक में उनकी पैठ है। कारण है इतने सालों में उनके समर्थकों की लम्बी जमात का तैयार होना। पिछले साल दिसंबर में जब धूमल की विधानसभा चुनाव में हार के बाद अचानक जय राम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया था तो धूमल परदे से गायब से हो गए थे। लेकिन नए मुख्यमंत्री जय राम की उनसे लगातार मुलाकातों से जाहिर हो गया कि धूमल भाजपा की राजनीति में हाशिये पर नहीं गए हैं।

चर्चा यह भी है कि 2019 के लोक सभा चुनाव में धूमल को हमीरपुर से उनके बेटे अनुराग ठाकुर की जगह टिकट दिया जा सकता है, हालांकि यह अभी चर्चा तक सीमित है। दरअसल प्रदेश भाजपा में धूमल का मजबूत खेमा अपने नेता को राजनीति के बियाबान में नहीं देखना चाहता।

उनके हलके सुजानपुर में नगर परिषद् के अध्यक्ष और भाजपा नेता रमन भटनागर कहते हैं – ”उनका चुनाव हारना एक दुर्भाग्य पूर्ण अध्याय था जो पीछे छूट चुका है। वे अभी भी पार्टी के लिए वोट ले सकने वाले सबसे प्रभावशाली चेहरा हैं। अगले लोक सभा चुनाव में उनकी उपयोगिता साबित हो जाएगी।”

जाहिर है भाजपा में उनके समर्थक धूमल को कमजोर होता नहीं देखना चाहते। बहुत से नेता यह मानते हैं कि भले प्रदेश में जय राम की सरकार है, समर्थकों के लिए धूमल ही मुख्यमंत्री हैं। एक कार्यकर्ता ने कहा – हम अपने काम के लिए ठाकुर साब (धूमल) को ही कहते हैं और हमारे काम भी होते हैं। धूमल खुद राजनीति में सक्रिय हैं जिससे यह तो जाहिर हो ही जाता है कि वे अपने प्रभावशाली गुट को कमजोर नहीं होने देना चाहते।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती के नेतृत्व में विधानसभा के चुनाव हुए थे और पार्टी ने 44 सीटें जीती थीं। लेकिन सत्ती खुद अपना चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद वे अपने पद पर मजबूती से जमे हुए हैं। उनका अपना कोई मजबूत गुट नहीं हालांकि उन्हें धूमल के करीब ज़रूर माना जाता है। सत्ती की राजनीति में अपनी महत्वाकांक्षाएं रही हैं। वे युवा हैं और संगठन के व्यक्ति रहे हैं। यह माना जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का खेमा चुनाव के बाद सत्ती को पद से हटाकर नया अध्यक्ष चाहता था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

सत्ती को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में धूमल का बड़ा रोल रहा था। धूमल खुद सत्ती को हटाए जाने के पक्ष में नहीं, ऐसा माना जाता है। संगठन पर भले सत्ती की धूमल जैसी पकड़ नहीं, वे विवादास्पद भी नहीं रहे हैं। इस तरह सत्ती भी प्रदेश भाजपा में भविष्य की दौड़ में शामिल हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार इस समय काँगड़ा से सांसद हैं। नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते वहां घटी कुछ घटनाओं को लेकर तल्ख रहे शांता कुमार को अगले लोक सभा चुनाव में पार्टी टिकट की सम्भावना न के बराबर है। इसका कारण शांता की उम्र भी है। वे 2019 में 84 साल के होंगे जबकि उनके विपरीत उनके विरोधी माने जाने वाले धूमल 74 के आसपास होंगे। लिहाजा धूमल को टिकट मिलने की सम्भावना पार्टी के नेता जताते हैं। इस तरह भाजपा को काँगड़ा में नया उम्मीदवार ढूंढना होगा।

प्रदेश भाजपा और मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के लिए 2019 के लोक सभा चुनाव सबसे बड़ी चुनौती हैं। भले प्रदेश से लोक सभा की चार ही सीटें हैं, भाजपा की सरकार होने से नतीजे उसके प्रदर्शन के आधार से देखे जाएंगे। हो सकता है जय राम ठाकुर लोक सभा चुनाव के बाद खुद की नई इमेज बनाने के लिए कुछ करें ताकि यह प्रभाव खत्म हो कि वे धूमल जैसे वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव में नहीं।

पूछने पर जय राम ठाकुर कहते हैं कि उनके लिए सत्ता जन सेवा की चीज है। जय राम ने तहलका से बातचीत में कहा – मुझे जब मुख्यमंत्री चुना गया खुद मेरे लिए यह हैरानी भरा फैसला था। मैंने आलाकमान और विधायक दल के फैसले को सर माथे पर लेते हुए खुद को पूरी तरह सरकार के काम में लगा दिया। प्रदेश के सामने चुनौतियों का सामना करते हुए कुछ फैसले किये हैं और यह काम आगे भी जारी रहेगा। मैं 14 साल पहले प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना था और उस पद पर रहते हुए संगठन को मजबूत करने का काम किया। अब सरकार का जिम्मा मिला है और नम्रता से अपना जिम्मा निभा रहा हूँ। मुझे खुशी है कि मुझे अपने वरिष्ठ नेताओं का पूरा समर्थन मिला है। इस समय सरकार और संगठन मिलकर प्रदेश के विकास में जुटे हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि 2019 में पार्टी सभी चार सीटें जीतेगी। मैं इस बात पर फक्र महसूस करता हूँ कि हमारे विपक्षी दल के विपरीत हमारे (सरकार और संगठन) के बीच बहुत मधुर सम्बन्ध हैं। मेरा सौभाग्य है की देश में मोदी जैसा श्रेष्ठ व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर है और हमें और पार्टी को उनके और अमित शाह के नेतृत्व में काम का अवसर मिला है।

पार्टी में इसके बावजूद भीतर कहीं यह तो माना ही जाता है कि बड़े नेता खुद को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए इतनी जल्दी अपनी सक्रियता नहीं छोड़ेंगे। सक्रिय रहेंगे तो गुटों का प्रभाव भी रहेगा। तहलका ने इस मसले पर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल से भी बातचीत की। धूमल का कहना है कि जनता से जो वादे किये गए थे यह सरकार उस दिशा में काम कर रही है। प्रत्येक कार्यकर्ता पूरी ताकत से 2019 की तैयारी में जुटा है। यह पूछने पर कि क्या वे 2019 के लोक सभा चुनाव में उतरेंगे, धूमल ने कहा कि यह सोचना उनका काम नहीं। ”कौन चुनाव लड़ेगा इसका फैसला आलाकमान और पार्लियामेंट्री बोर्ड करता है। मुझे आज तक पार्टी ने जो भी जिम्मा सौंपा मैंने उसे निभाया। मेरे लिए पार्टी अहम् है पद नहीं।”

इस मसले पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती का कहना है कि प्रदेश में संगठन और सरकार में गज़ब का तालमेल है और कार्यकर्ताओं की आवाज सरकार तक पहुँचती है। ‘जनता के बड़े मसलों पर हम सरकार से लगातार संपर्क रखते हैं।’ उन्होंने कहा कि भाजपा की सरकारें अपनी महत्वकाँक्षाओं नहीं जनता की उम्मीदों के लिए काम करती हैं।

हिमाचल कांग्रेस की जंग

हिमाचल में विधानसभा चुनाव में हार के बाद प्रदेश कांग्रेस में जंग अभी तक के सबसे खतरनाक मोड़ पर है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पूरी ताकत से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सुक्खू को हटाने में जुट गए हैं वहीं सुक्खू Óअभी नहीं तो कभी नहीं’ की तर्ज पर वीरभद्र सिंह के मुकाबला कर रहे हैं। सुक्खू पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं जो इतनी मजबूती से वीरभद्र सिंह से टक्कर ले रहे हैं जबकि पूर्व में प्रदेश अध्यक्ष भले कोई रहा हो, चलती वीरभद्र सिंह की रही है।

सुक्खू समर्थकों का कहना है कि यह आर-पार की लड़ाई है और वे 85 साल के हो चुके वीरभद्र सिंह के सामने घुटने नहीं टेकेंगे। इन समर्थकों का आरोप है वीरभद्र सिंह प्रदेश कांग्रेस को अपना जेबी संगठन बनाकर रखना चाहते है लेकिन वे ऐसा नहीं होने देंगे। उनके मुताबिक पार्टी आलाकमान ने सुक्खू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा है और वे पूरी ताकत से राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी को प्रदेश में मजबूत करते रहेंगे।

उधर वीरभद्र सिंह खेमे का कहना है कि सुक्खू अप्रभावी प्रदेश अध्यक्ष हैं और उनके नेतृत्व में प्रदेश में कांग्रेस का भ_ा बैठ रहा है। समर्थकों के मुताबिक सुक्खू का कोई जनाधार नहीं और वे संगठन को गति नहीं दे पा रहे जिसकी हार के बाद सबसे ज्यादा ज़रूरत है।

प्रदेश कांग्रेस की नई प्रभारी रजनी पाटील पार्टी में इस गुटबाजी से बहुत परेशान हैं। वे लगातार प्रदेश के दौरे कर रही हैं लेकिन हर एक बैठक में उन्हें पार्टी को मजबूत करने से ज़्यादा गुटबाजी पर फोकस करना पड़ रहा है। कमोवेश हर बैठक में उन्होंने पार्टी जनों को गुटबाजी से बचने की सलाह दी है, लेकिन नेता हैं कि पूरी शिद्दत से अपने ÓकामÓ में जुटे हैं। बड़े नेताओं के खुले रूप से एक दूसरे के खिलाफ आ जाने से छोटे कार्यकर्ता भी जमकर बयानबाजियां कर रहे हैं इससे पार्टी की जमकर भद्द पिट रही है।

प्रदेश कांग्रेस की लड़ाई देखने से लगता ही नहीं कि बड़े नेताओं का लक्ष्य 2019 के लोक सभा चुनाव जीतना और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है। इसे देखकर तो लगता है कि वे अपनी मनमर्जी करके अपने स्कोर सेटल करने में जुटे हैं।

प्रदेश कांग्रेस के सबसे बड़ी खामी यही है कि वे पिछले तीन दशक से पूरी तरह वीरभद्र सिंह पर निर्भर रही है। आलाकमान ने भी इस पर कभी चिंतन नहीं किया की प्रदेश में नेतृत्व के गुणों वाले दूसरे नेता भी पैदा किये जाएं। बस वीरभद्र सिंह के सहारे चुनाव जीतने का लक्ष्य ही हावी रहा। एकाध बार जब कोशिश भी हुई या वीरभद्र सिंह की मर्जी के बाहर के नेता को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गयी तो वीरभद्र सिंह समर्थकों ने उस नेता को विफल करने में कसर नहीं छोड़ी। इसका नतीजा यह हुआ है कि पार्टी के पास जनाधार वाले नेताओं की ही कमी हो गई।

सुखविंदर सुक्खू जैसे पार्टी के हर स्तर पर काम कर चुके नेता को जब अध्यक्ष चुना गया तो वीरभद्र सिंह खेमे ने पहले ही दिन से उनकी मुखालफत शुरू कर दी। आज हालत यह है कि सुक्खू को काम ही नहीं करने दिया जा रहा। प्रदेश कांग्रेस में सुक्खू एक तरह से सुख राम और सत महाजन के बाद ऐसे पहले नेता हैं जिन्होंने वीरभद्र सिंह के सामने रीढ़ दिखाई है अन्यथा अन्य तो तिनके की तरह ही उड़ गए।

सुक्खू को कमजोर करने के लिए वीरभद्र सिंह उनके गृह जिले हमीरपुर में कुछ साल पहले ही भाजपा से कांग्रेस में आये राजेंद्र राणा को मजबूत कर रहे हैं। राणा सुक्खू की ही तरह राजपूत हैं, भले पार्टी में उन्हें ज्यादा लोगों का समर्थन हासिल न हो।

दो बड़े नेताओं की इस जंग के चलते पार्टी दोफाड़ होने जैसी हालत में है। वीरभद्र सिंह किसी भी सूरत में सुक्खू को अध्यक्ष पद से हटाना चाहते हैं। यह माना जाता है कि वे इस पद पर अपने समर्थक को बैठना चाहते हैं। यह भी चर्चा है कि वे अपनी पत्नी प्रतिभा सिंह को महिला और राजपूत होने के नाते अध्यक्ष पद पर बैठाना चाहते हैं। प्रतिभा दो बार मंडी सीट से सांसद रह चुकी हैं। ऐसा होने के स्थिति में संगठन पर भी वीरभद्र सिंह गुट का कब्ज़ा हो जाएगा जबकि कांग्रेस विधायक दल के पद पर वीरभद्र सिंह के ही कट्टर समर्थक ब्राह्मण नेता मुकेश अग्निहोत्री बैठे हैं।

वीरभद्र सिंह विरोधियों का कहना है यदि सुक्खू को उनके पद से हटाया जाता है तो इसका कार्यकर्ताओं में बड़ा गलत सन्देश जाएगा। जबकि वीरभद्र सिंह समर्थकों का आरोप है कि यदि सुक्खू को अध्यक्ष बनाकर रखा गया तो लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के जीतने की कोई गारंटी नहीं होगी। हालाँकि सुक्खू समर्थक कहते हैं कि वीरभद्र सिंह के जिस जनाधार का ढिंढोरा उनके समर्थक पीटते हैं वह 2017 के विधानसभा चुनाव में कहाँ था जबकि वीरभद्र सिंह को ही मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाकर चुनाव लड़े गए थे।

ख्बाहिशों की कतार

प्रदेश कांग्रेस में मुखर भले दो गुट – वीरभद्र सिंह और सुखविंदर सुक्खू – के हों, परदे के पीछे पांच और बड़े नेता मुख्यमंत्री बनने की ख्बाहिश रखते हैं। इनमें सबसे पहला नाम आशा कुमारी है जो एआईसीसी की सचिव और पंजाब की प्रभारी हैं। कांग्रेस सरकारों में मंत्री रह चुकी हैं। उन्हें आलाकमान के भी नजदीक माना जाता है और चम्बा के डलहौजी से चार बार विधायक बन चुकी हैं और प्रदेश में पहचान रखती हैं। कौल सिंह तो 2012 में मुख्यमंत्री के पद के पास पहुंचकर भी चूक गए। आठ बार के विधायक कौल सिंह कई बार मंत्री रहे हैं और मंडी जिले से ताल्लुक रखते हैं। लगातार आठ बार जीतने के बाद इस बार चुनाव हार गए हालाँकि प्रदेश में पहचान रखते हैं। जीएस बाली काँगड़ा जिले के हैं और इस बार अपना चुनाव हार गए। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं हालाँकि अपना कोई मजबूत समर्थक वर्ग नहीं। दिल्ली में कुछ बड़े नेताओं से पहचान रखते हैं। इसी जिले के सुधीर शर्मा भी इस बार अपना चुनाव हार गए। सुधीर को पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के करीब माना जाता है। सुधीर की गिनती प्रदेश कांग्रेस के भविष्य के नेताओं में की जाती है। मुकेश अग्निहोत्री ऊना जि़ले के हरोली से चौथी बार विधायक बने हैं। वीरभद्र सिंह के करीबी मुकेश कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं और पार्टी में उनके मुरीद उन्हें भविष्य का मुख्यमंत्री बताते हैं। आलाकमान के कई बड़े नेताओं के करीबी हैं जिनमें सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल भी शामिल हैं।