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सियासत का ‘सरकारी रंग’

यह आधा सच और आधा झूठ है।Ó जयपुर में शनिवार 7 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जनसभा में एक नया सियासी इतिहास रचा गया और लोगों ने सियासत के नए ‘सरकारी रंगÓ को अस्तित्व में आते देखा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तारीफों के पुल बांधते नजर आए तो वसुंधरा राजे प्रसन्नता से फूलती नजर आई। लेकिन मोदी ने राजे की तारीफों में इजाफा करते हुए जब अंदेशों की स्लेट को साफ किया कि, ‘भाजपा अगला चुनाव वसुंधरा राजे के चेहरे के साथ ही लड़ेगी तो उनकी प्रसन्नता की सीमा नहीं रही, लेकिन यह आधा सच था। मोदी ज्यों-ज्यों बोलते गए चुनावी सुगंध फैलती चली गई लेकिन चतुराई भरे नए ‘सरकारी रंगÓ के साथ। इसके साथ ही बाकी आधा सच नई उत्कंठा के साथ तब समझ में आया, जब मोदी ने एक बार भी वसुंधरा सरकार को ‘भाजपाÓ से जोड़कर संबोधित नहीं किया। क्या यह आधा झूठ था कि, ‘सरकारी रैली में मोदी ने चुनाव का आगाज कर दिया और जनता की तो छोडि़ए मंच पर मौजूद राज्यपाल कल्याण सिंह भी देखते रह गए।

कांग्रेस पर हमलावर होते हुए मोदी ने एक नया चुनावी जुमला फेंक दिया कि, ‘कांग्रेस के कई नेता अब ‘बेलÓ(जमानत) पर है, लिहाजा यह पार्टी बेलगाड़ी की तरह है। लेकिन कांग्रेस ने इस ‘तंजÓ को हाथों हाथ लिया और उसी शाम मोदी पर पलटवार करते हुए कहा, ‘मोदी तैयार रहें, जनता आगामी चुनावों में जब उन्हें सत्ता से बाहर खदेड़ेगी तो भाजपा के बहुत से नेता ‘बेलÓ पर नहीं ‘जेलÓ में होंगे। वरिष्ठ पत्रकार रमण स्वामी का कहना है कि, ‘दरअसल अगले लोकसभा चुनावों में किसी ना किसी थीम की जबरदस्त जरूरत थी, इस लिहाज से राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में भी यह जुमला दोहराया जा सकता है। इस स्थिति में ‘बेलÓ और ‘जेलÓ मुख्य चुनावी नारों का गौरव पाने के प्रबल दावेदार बन सकते हैं। स्वामी कहते हैं ‘बेल और जेल की ध्वनि और खनक, पहले के नारों जैसे बोफोर्स, गरीबी हटाओ, शाइनिंग इंडिया की अपेक्षा ज्य़ादा अच्छी है। हाल ही में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष बने मदनलाल सैनी का राजनीतिक मर्तबा बढ़ाने के लिए मोदी ने मंच पर पीछे की कतार में बैठे सैनी के अपने करीब बिठाया, और उनके साथ पुरानी नजदीकियों का भी जिक्र किया। प्रसन्नता के आवेग में भले ही वसुंधरा राजे इस परिदृश्य का गहन अर्थ नहीं समझ पाई, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि, ‘जब मोदी ने प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए नकार दिए गए मंच पर बैठे गजेन्द्र सिंह शेखावत का खास तौर से जिक्र किया, तब मंच पर पांच केन्द्रीय मंत्री और भी बैठे थे लेकिन उन्हें काबिले जिक्र नहीं समझा गया। विश्लेषकों का कहना है कि, ‘मंच पर केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री राघवेन्द्र सिह राठौर भी बैठे थे, लेकिन उनकी चर्चा को नकार कर मोदी ने इन कयासों पर भी फुलस्टाप लगा दिया कि, ‘राठौर आज नही ंतो कल राजस्थान में भाजपा के नए चेहरे हो सकते हैं।

मोदी ने प्रदेश के किसानों की नाराजी के मुद्दे को भांपते हुए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफे का जिक्र करते हुए फसल खरीद के भव्य आंकड़े गिनाए। वरिष्ठ पत्रकार कल्पेश याग्निक कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने डेढ़ गुना समर्थन मूल्य घोषित कर दिया तो नीति नीयत और निर्णय के रूप में बहुत अच्छा और आवश्यक कार्य किया, लेकिन हकीकत समझे ंतो वास्तविकता, व्यवस्था और व्यवहारिक रूप से बहुत कम किसानों को लाभ मिल सकेगा। क्योंकि स्वयं कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट कह रही है कि आधे से ज्यादा किसान तो ‘समर्थन मूल्यÓ के बारे में जानते तक नहीं? स्पष्ट है कि, जब जानेंगे ही नहीं तो मूल्य पाएंगे कैसे? याग्निक कहते है कि, ‘अंधेर, अनर्थ और आत्महत्या से घिरे किसान परिवारों को दोगुनी आमदनी का जो वचन दिया था, अभी तो उसका ही पालन होता कहीं दिखाई नहीं दे रहा। उनका कहना है, इस बार भी धान के समर्थन मूल्य को लें तो यह बढ़कर 1750 रुपए हुआ है जबकि स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों के मुताबिक यह प्रति क्विंटल 2340 रुपए होना चाहिए था तो कैसे खुश होगा किसान?

प्रधानमंत्री मोदी की राजस्थान यात्रा को देखते हुए उम्मीद की गई थी कि, राजस्थान में चल रही जल परियोजनाओं को गति देने के लिए विशेष पैकेज की घोषणा कर सकते हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जबकि बीते साल केन्द्रीय जल आयोग द्वारा स्वीकृत की गई इस योजना के पूरा हो जाने पर झालावाड़, बारां, कोटा, जयपुर तथा सवाई माधोपुर समेत तेरह सूखाग्रस्त जिलों में सिंचाई तथा पीने के पानी की आपूर्ति हो सकेगी।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है, ना कोई सौगात और ना विकास बस मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाकर लौट गए प्रधानमंत्री। पायलट कहते हैं, ‘जब लाभार्थियों से प्रधानमंत्री की बात ही नहीं करवाई गई तो ‘प्रधानमंत्री लाभार्थी-‘जनसंवाद सभाÓ का क्या मतलब हुआ? लेकिन चुनावी इम्तहान के लिए तो उन्हें पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से ही रूबरू होना पड़ेगा। फिलहाल तो शाह ने वसुंधरा राजे से अपनी चुनावी तैयारियों की रिपोर्ट तलब कर ली है।

सूत्रों का कहना है कि उसके बाद ही भाजपा अध्यक्ष राजस्थान समेत चुनावी राज्यों का दौरा करेंगे। सूत्रों का कहना है कि शाह ने चुनावी राज्यों में कांग्रेस को घेरने के लिए क्या क्या मुद्दे हो सकते हैं? इसकी भी रिपोर्ट भेजने के कहा है। इसके साथ ही राज्य सरकार की क्या उपलब्धियां रही, जनता के हितार्थ कौन कौन से फैसले लिए गए है, इसकी भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।

उधर वसुंधरा राजे ने अपने विधायकों के काम-काज का फीड बैक लेने के लिए प्रदेश के दौ सौ विधानसभा क्षेत्रों में विस्तारकों की तैनाती कर दी है। उनसे कहा गया है कि वे निडर होकर उनके काम-काज का बेबाकी से खुलासा करें। इसलिए शाह की जवाब तलबी का असर हो रहा है, इस बात में दम तो है।

मध्य प्रदेश में होंगे कांगे्रस और बसपा एक?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 2019 के आम चुनाव में पूरी सूझबूझ और तैयारी से चुनावी तालमेल कर रहे हैं। इसी साल के अंत में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने को हैं। उसके मद्दे नज़र कांगे्रस और बीएसपी का साथ होना आपस में तालमेल रखने की दिशा में एक बड़ी पहल है।

बसपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के नेताओं की विभिन्न मुद्दों पर बातचीत अर्से से चल रही है। दोनों पक्षों में एक ऊपरी सहमति तो बन गई है लेकिन दोनों ही पार्टियों के नेता पूरा ब्यौरा देने पर फिलहाल राजी नहीं हैं।

मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महासचिव दीपक बाबरिया का कहना है कि राज्य में साथ मिल कर चुनाव लडऩे की योजना पर चल रहा राय-मश्विरा अब भी जारी है। हालांकि तालमेल पर सहमति बन चली है। सहयोग के दूसरे मुद्दों पर भी बातचीत का सिलसिला विभिन्न स्तरों पर जारी है। उन्होंने कहा कि सीटों के बंटवारे के फार्मूले पर दोनों पक्षों में बातचीत का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। लेकिन फार्मूला क्या है और सीटों का अनुपात कितना रखा जाएगा इसके बारे में फैसले तक अभी कई और बैठकें होंगी। तब कहीं सहमति के आसार बनेंगे।

मध्यप्रदेश में 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में बीएसपी को चार सीटें मिली थी। राज्य की एक दर्जन सीटों पर यह दूसरे स्थान पर थी। इस दौरान राज्य में बीएसपी की ताकत और प्रभाव में बढ़ोतरी हुई है। कंाग्रेस ने बीएसपी की क्षमता और राज्य में संभावनाओं का आकलन करते हुए बसपा को अपना सहयोगी दल माना है।

कांग्रेस फिलहाल राजस्थान, और छत्तीसगढ़ में भी ऐसे दूसरे राजनीतिक दलों की तलाश में है जिनकी चुनावों में बढ़ी क्षमता का उपयोग करते हुए चुनावी रणक्षेत्र में मजबूती से उतर कर भाजपा को पराजित किया जा सके। हालांकि राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायल का मानना है कि राज्य में सभी सीटों पर कांग्रेस फिलहाल जीतने में सक्षम है। इसी कारण किसी और दल के साथ कोई बातचीत भी नहीं की गई है। वहां की सभी सीटों के आकलन की रपट कांग्रेस हाईकमान के पास है। उनके इशारे पर ही अगली कार्रवाई होगी।

 छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का पलड़ा कुछ इलाकों में मजबूत हैं लेकिन दूसरे कुछ कमज़ोर क्षेत्रों में कोई और एसी पार्टी दिख नहीं रही है जो आगे निकले। जानकारों के अनुसार राज्य भाजपा को पूरा भरोसा है कि इस बार भी रमन सिंह के ही नेतृत्व में छत्तीसगढ़ केसरिया ही बना रहेगा।

दुर्गम कंदरा में फंसे 12 बच्चों को बाहर निकालने का कीर्तिमान

यह जबरदस्त कहानी है विश्व बंधुत्व की। आपसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की यह एक मिसाल है जिसके चलते फुटबाल खेलने वाले 12 बच्चों और एक कोच को तंग दुर्गम कंदरा से बाहर निकालने में कामयाबी मिली। यह हौसला ही था बच्चों में जिसके चलते वे तकरीबन 20 दिन तक बिना पानी- भोजन के अंधेरे में रह सके।

 जीवन की यह असली कहानी है जो थाइलैंड में घटित हुई। लगभग सांस रोक कर पूरी दुनिया ने टीवी चैनेलों पर उस जटिलता को भांपा जिसमें 11 से 16 साल के 12 बच्चे और एक कोच 23 जून से फंस हुए थे, अनजाने में। इन बच्चों को निकालने में जुटे थाई नौसेना की एसईएएल टीम के जवान और ब्रिटेन के विशेषज्ञ, अमेरिका की इंडो पेसिफिक कमांड के पैरा-रिस्क टीम के लोग, आस्टेऊलिया, चीन, जापान के भूगर्भ विशेषज्ञ और एक अमेरिकी करोड़पति एलन मस्क। इन सबके संयुक्त प्रयास से मिली सफलता।

 उत्तरी थाईलैंड के चियांग रे की थाम लुआंग नांग नान गुफाओं में ये सभी बच्चे अपने कोच के साथ 23 जून को फुटबाल खेल की अपनी प्रैक्टिस के बाद लौटते हुए अंधेरे में खो गए। उसके बाद मानसून की हुई बारिश से गुफाओं में अंदर भी खासा पानी भर गया। गुफा के अंदर भी कई ऊंचे और निचले स्तर थे।ये बच्चे ऊँचाई की ओर ही ठिठके रहे। तकरीबन दो सप्ताह से भी ज़्यादा समय तक वहां फसे रहे। प्यास लगने पर ये गुफा में ऊपर पत्थरों से आते जल को पीते। लेकिन गुफा में निचली ऊबड़-खाबड़ तलहटी में कीचड वाला बारिश का पानी भरता जा रहा था। ऑक्सीजन भी घटती जा रही थी। बच्चों ने इंतजार किया राहत का, सहयोग का, हिम्मत नहीं छोड़ी । वे एक दूसरे का हौसला बंधाते रहे।

दो सप्ताह के निर्जन प्रवास, और तमाम मानसिक तनाव, शारीरिक कमजोरियों की देख-भाल के लिए सभी बच्चों को निकाल लिया गया। उन्हें फौरन एंबुलेसं से अस्पताल भिजवाया गया। जहां उनके तमाम परीक्षणों और उनके ‘नार्मलÓ होने पर अब उनके परिवारों में भेजा जाएगा।

उस शिक्षिका से क्यों खीझे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ?

काफी भव्य सुरक्षा व्यवस्था में अपना दरबार सजाए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री खुद शिक्षिका के पति त्रिवेंद्र सिंह रावत से उनके दरबार में जब एक दूसरी अध्यापिका ने तबादले की गुहार लगाई तो वे भड़क उठे। यह शिक्षक महिला थीं उत्तरा।

उनके पति की मौत हो चुकी है और वे बच्चों की देखभाल की भी पूरी जिम्मेदारी उनकी है। वे चाहती थी कि संवेदनशीलता के आधार पर उनका तबादला सुगम स्थल में कर दिया जाए। उत्तरकाशी के नौ गांव में जेष्टवाड़ी प्राथमिक स्कूल में दो जुलाई 2015 से वे समायोजित की गई थीं। पति के निधन के बाद बच्चों की देखरेख और घर-बार संभालने के चलते वे तीन अगस्त से दस मई 2017 तक स्कूल नहीं जा सकीं। बाद में उन्हें 16 जुलाई 2017 से आकस्मिक अवकाश लेना पड़ा और तब से अवैतनिक अवकाश पर रहीं।

अपनी गुहार उन्होंने गुरूवार को भव्य मुख्यमंत्री दरबार में लगाई। इस दरबार में गुहार लगाने वाले खड़े होकर याचना करते हैं और मुख्यमंत्री और उनके दूसरे मंत्री और नौकरशाह आसनों पर विराजमान रहते हैं। महिला शिक्षिका अपनी बात पूरी करती उसके पहले ही मुख्यमंत्री भड़क उठते हैं। तुरंत उनके सुरक्षाकर्मी सतर्क होते हैं और शिक्षक महिला को गलत तरीके से दरबार से बाहर निकालते हंैं। सोशल मीडिया पर वायरल यह वीडियो मुख्यमंत्री का स्वभाव और झुंझलाहट बताता है।

एक लंबे अर्से से तबादले की मांग कर रही बेवा और उम्रदराज उत्तरा जोशी का मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखती हैं। खासे असरदार तरीके से वे अपना निवेदन करती हैं। उस शिक्षिका के कुछ ही ओज भरे वाक्यों पर मुख्यमंत्री खीझ उठते हैं। वे उसे झिड़कते हैं। वहां मौजूद अधिकारियों और मीडिया के लोगों को भी मुख्यमंत्री के इस रवैए पर खासा आश्चर्य हुआ। आखिरकार वहां मौजूद सुरक्षा दस्ते उस शिक्षक महिला को दरबार से बाहर ले गए। यह व्यवहार था खुद एक शिक्षिका के पति का जो अब मुख्यमंत्री हैं। शिक्षक संगठनों ने भी इस पर विरोध जताया है।

उत्तराखंड में शिक्षा की जो दुव्र्यव्यवस्था है उसे दूर करने में मुख्यमंत्री या शिक्षा मंत्री और शिक्षा अधिकारियों की कोई दिलचस्पी नहीं है। इस कारण गांव-गांव, जि़ले-जि़ले में पब्लिक अंग्रेजी निजी स्कूल खूब पनपे हैं, जिनमें समाज के मध्यम वर्ग और विभाग के बच्चे भी इममें पढ़ते हैं।

उत्तराखंड के शिक्षा सचिव और शिक्षा अधिकारी अब प्रदेश में शिक्षा का स्तर ऊंचा करने के लिहाज से दशकों से कतई नहीं सोच रहे हैं। इसी कारण हरिद्वार, विकास नगर और देहरादून के कुछ नामी बड़े पब्लिक स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की ही पूछ है।

तहलका ब्यूरो

 

 

वे भी भाजपा में कर्मी थे।

एक ज़माना था जब भाजपा के लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और परस्पर सहयोग समाज में बेहतर तरीके से पहुंचाने के लिए याद किया जाता था। दौर था 1977 का। मध्यप्रदेश की जनता पार्टी सरकार में ओमप्रकाश रावल शिक्षा मंत्री थे। वे चाहते तो बडवानी में पढ़ाई की अपनी शिक्षक पत्नी का तबादला किसी अच्छे शहर भोपाल या इंदौर में करा सकते थे। लेकिन रावल ने ऐसा नहीं किया।

लेकिन जून महीने में जनता दरबार में पहुंचे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत लिखा हुआ आवेदन हाथ में लेकर पूछते हैं कि इसमें लिखा क्या है। शिक्षिका उससे कहती है कि यह तबादले का अनुरोध किया है वनवास का नहीं तो इतने पर मुख्यमंत्री तिलमिला उठते हैं। उनकी तिलमिलाहट देखकर उनके अधिकारी सतर्क हो जाते हैं। याचिक शिक्षिका के हाथ से फौरन छीन लिया जाता है। मुख्यमंत्री गुस्से में कहते हैं इसे बाहर निकालो। जेल भेजो।

 

‘कस्टडी में लोÓ इसे  गरजे मुख्यमंत्री

‘मुगले आजमÓ फिल्म में बादशाह -ए-हिंदुस्तान जिल्ले सुबहानी जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बने पृथ्वीराज कपूर ने भरे दरबार में जिस तरह अनारकली नाम की कनीज को दीवार में जिंदा चुनवा देने का हुक्म फरमाया था। लगभग उसी अंदाज में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक सरकारी अध्यापिका के लिए भरे दरबार में एलान किया- सस्पेंड करो इसे, कस्टडी में लो इसको।

दरबार

इस जनता दरबार में हुक्मरान और फरियादी रियाया के बीच का फासला किसी सामंत के दरबार जैसा ही था। दुनिया भर के खुले और लोकतांत्रिक समाज में जनता और उसके जन प्रतिनिधियों के बीच की नजदीकी और खुलापन वहां नहीं था। वहां काफी दूरी पर एक ओर फरियादी खडे थे, साथ ही खडा था मीडिया। सामने विराजमान थे राज्य के भाग्य विधाता, अपने मनसबदारों को साथ । यहीं फरियादियों में अपनी कहानी बताने आई थी उत्तरापंत बहुगुणा।

क्या थी फरियाद

पिछले 25 बरस से उत्तराखंड के एक जिले उत्तरकाशी के दुर्गम क्षेत्र के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती हंै उत्तरापंत बहुगुणा। उनका तबादला कहीं और कभी नहीं हुआ। जब तक पति जीवित थे उन्होंने मांग भी नहीं की क्योंकि जब तक पति थे बच्चों की देखभाल अच्छी तरह हो जाती थी। उन्होंने अपना आवेदन पहले ही दे रखा था। जब विपदा सुनाने की आवाज लगी तो अपनी फरियाद सुनानी उन्होंने शुरू की।

पिछले साल उत्तरापंत के पति की मौत हो गई। शिक्षिका पर बच्चों की परवरिश और पढ़ाई लिखाई की चुनौती आ गई। उन्हें उम्मीद थी कि शिक्षा विभाग उनका तबादला देहरादून कर देगा। जिससे वे बच्चों की ठीक ठाक परवरिश कर सके। पर कौन सुनता है। लगभग साल भर से वे काम पर भी नहीं गई। मुख्यमंत्री के कान भर दिए गए।

कुछ यूं हुआ विवाद

वे पूरी बात कह पाती तभी दरबारी अफसरों से घिरे मुख्यमंत्री की आवाज़ गूंजी , ‘बोलिए मत सस्पेंड कर दूंगा। अभी यहीं पर, सस्पेंड कर दूंगा। अभी बता दिया मंैने तुम्हें, सुरक्षा कर्मी शिक्षिका को बाहर ले जाने के लिए आगे बढ़ते हैं। उसके हाथ से माइक छीन लिया जाता है। उसे घेरे में लेकर बाहर ले जाते हैं। फिर मुख्यमंत्री की तेज आवाज़ सुनाई देती है- ‘इसकों सस्पेंड कर दीजिए। इसको सस्पेंड करो आज ही। इसे ले जाओ बाहर। बंद करो इसको। कस्टडी में लो इसको।

इतना बड़ा क्या अपराध कर दिया था उस शिक्षिका ने। जिसके कारण मुख्यमंत्री ने उसकी बात भी नहीं सुनी और उसकी गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। और तब बिना किसी दबाव के शिक्षिका ने तब मुख्यमंत्री को जवाब दिया,’तुम क्या सस्पेंड करोगे। मैं खुद को सस्पेंड कर रही हॅंू। सुरक्षा घेरा उसे बाहर ले जाता है। वह कहती है,’ चोर, उचक्के कहीं केÓ।

‘असंवेदनशील’ व्यवस्था

‘पूरी व्यवस्था इतनी असंवेदनशील हो गई है कि एक शिक्षिका 25 साल से दुर्गम इलाके में नौकरी कर रही है। आज उसे ज़रूरत है तो उसकी फरियाद पर कोई कान ही नहीं देता।Ó

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखंड

राजेश जोशी

फिर किसके लिए लगा ही था यह अनोखा दरबार

पर्दा है तो खुला नहीं हो सकता और खुला है तो पर्दा नहीं हो सकता। हरियाणा के अति प्रतिभाशील मुख्यमंत्री ने जून के अंतिम सप्ताह में ऐसा ‘खुला दरबारÓ लगाया कि प्रदेश की जनता अब माथापच्ची कर रही है कि इसे खुला दरबार कहें या पर्दा नशीं दरबार।

इस अनोखे दरबार में मीडिया के चंद चेहरे और मुख्यमंत्री साहब की चिलम भरने वाले नेता, इतिहास रचने जा रहे अपने ‘माननीय मुख्यमंत्रीÓ के सामने बैठे थे।

उसके बाद विशाल पर्दा लगा दिया गया। उस पर्दे के पीछे ‘वोटोंÓ से कुछ घंटों के लिए इंसानों में तब्दील शख्सियत के लिए कुर्सियां लगा दी गई। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि खुला दरबार, दरबारी नेताओं और पत्रकारों के लिए है या फिर जनता के लिए।

मुख्यमंत्री के पीछे ‘खुले दरबारÓ का एक बड़ा बैनर लगा था इसलिए इसे ‘खुला दरबारÓ की संज्ञा दे सकते हैं। वरना किसी भी रूप में यह दरबार खुला तो नही थां। मुगलिया शैली में लगे इस दरबार से दो बातें ज़रूर साबित हुई कि – मुख्यमंत्री जनता से रूबरू नहीं होना चाहते। शायद वजह यह हो कि पौने चार साल के कार्यकाल में अपने वायदे तक पूरे नहीं किए।

असलियत क्या है यह मुख्यमंत्री और उनके दरबारी ही बता सकते हैं। लेकिन यह ज़रूर है कि न पहले कभी ऐसा दरबार लगा और न भविष्य में इसके लगने के ही आसार हैं। मुख्यमंत्री ने वाकई एक इतिहास तो रच ही दिया। इस खुले दरबार को देख वैसा ही हास्य बार-बार उभर रहा था जैसा फिल्म ‘शोलेÓ में दिखा था। इसमें हीरोइन से हीरो पूछता है – तुम्हारा नाम क्या है बसंती।

इस अनोखे दरबार की खबर आपके लिए है। आप भी ठीक वैसा ही आनंद लीजिए।

उमेश जोशी, शशि जोशी

सुप्रीम कोर्ट से आप को संरक्षण मिला फिर भी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से यह साफ कह दिया कि दिल्ली के उपराज्यपाल के पास फैसला लेने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। असली अधिकार जनता और चुनी हुई सरकार का ही है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आम आदमी पार्टी (आप) को अदालत से ऐतिहासिक कानूनी जीत हासिल हुई है। यह तय हुआ कि देश की राजधानी दिल्ली में आखिरी फैसला लेने का अधिकार दिल्ली सरकार का है या दिल्ली के उपराज्यपाल का। इस फैसले पांडिचेरी को भी अब काफी राहत हुई होगी।

दिल्ली में कौन वाकई बड़ा अधिकारी है इस पर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले से एक लंबे विवाद का समाधान हो गया। जब से आप सरकार सत्ता में आई है तब से केंद्र की ओर से भेजे गए उपराज्यपाल उसकी तमाम फाइलें मंगाकर राजभवन में रखते रहे हैं। जिसके कारण आप सरकार बमुश्किल शिक्षा और स्वास्थ्य पर कुछ वाकई अच्छे काम कर सकी और बाकी व विवाद होता रहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्यों में केंद्र को अनचाही दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। जो लोकप्रिय इच्छा है उसे अमल में आने से कतई नही रोका जा सकता। अदालत ने कहा कि उपराज्यपाल को बाधक नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ी जीत है। अरविंद केजरीवाल की सरकार के दिल्ली में तीन साल सिर्फ विरोधों और धरनों मे ही गुजरे। अभी पिछले महीने भी वे उपराज्यपाल अनिल बैजल के विजिटर्स रूम में सोफों पर अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ धरने पर ही थे। अदालत ने कहा कि पूर्णता और अधिनायकवाद अराजकतावाद के लिए कोई जगह नहीं हैं

अदालत के अनुसार

  1. मंत्रिमंडल को सारे फैसलों की जानकारी उपराज्यपाल को ज़रूर देनी चाहिए। लेकिन हर मामले में उनकी सहमति होनी अनिवार्य नहीं है। अदालत ने यह साफ किया कि उपराज्यपाल ‘बासÓ नहीं है।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि भूमि, पुलिस और जनादेश में उपराज्यपाल की स्वतंत्र फैसला लेने की भूमिका संविधान में भी नहीं है।
  3. उपराज्यपाल सिर्फ एक प्रशासक हैं। उनकी भूमिका भी बहुत सीमित है वे राज्यपाल भी नहीं हैं। मंत्रिमंडल के ज़्यादातर परामर्श से वे बंधे हुए हैं।
  4. फैसला पढ़ते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने कहा कि उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार के साथ शांति के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
  5. आप सरकार ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ जिसके तहत उपराज्यपाल को दिल्ली के प्रशासनिक बॉस का दर्जा मिला था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश से असहमत होते हुए कहा कि उपराज्यपाल को मशीनी तरीके से काम नहीं करना चाहिए और दिल्ली मंत्रिमंडल के फैसलों पर रोक नहीं लगानी चाहिए।
  6. सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला तब आया है जब पिछले ही महीने केजरीवाल ने उपराज्यपाल के घर के अतिथिगृह में नौ दिन विरोध करते हुए गुजारे थे।
  7. आप ने बैजल से अनुरोध किया था कि वे अधिकारियों का बॉयकॉट रद्द कराने के लिए उचित कदम उठाएं। यह बॉयकॉट तब शुरू हुआ जब मुख्य सचिव अंशुप्रकाश ने फरवरी में आप के दो विधायकों पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी में कथित हाथापाई का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि आप विधायकों ने केजरीवाल के घर पर उनके साथ हाथापाई की।
  8. जब अधिकारियों ने काम करने का फैसला लिया तो केजरीवाल ने आंदोलन खत्म किया लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को फिर ताजा कर दिया। मांग का विरोध भाजपा तब से कर रही है जब से यह केंद्र में आई है।
  9. मतभेदों की शुरूआत तो तब से ही हो गई जब से आप 2015 में दिल्ली में सत्ता में आई। इसे 70 में से 67 सीटें मिली थीं। विपक्ष में भाजपा को सिर्फ तीन सीटें मिली थी। आप का आारोप है कि केंद्र सरकार तब से ही बदले की भावना से काम करती रही है, और इसके लिए उपराज्यपाल का सहयोग लेकर केजरीवाल सरकार के हर फैसले पर रोकथाम लगा देती रही है।
  10. आप जब सत्ता में आई तो केंद्र ने एक नियम निकाला जिसके तहत चुनी हुई सराकर के हर फैसले चाहे वह पुलिस, जनादेश या नौकरशाही की नियुक्तियों का हो उस पर चुनी हुई सरकार से बातचीत करे।

राजघाट: तालाबंदी से उपजे प्रश्न

”आज तो मानव ही मानव से डरते हैं। अरे, अपने पड़ोसी से डरते हैं। तब राष्ट्र की बात तो क्या बताऊँ? कोई किसी का बुरा नहीं कर सकता। मैं तो मानता हूं कि मनुष्य के दुख का कारण मनुष्य है। यह राजधानी का शहर होते हुए भी मरा हुआ सा लगता है। कोई किसी का एतबार नहीं करता। जो शान्ति है,

वह तो पुलिस के डर की शान्ति है। क्या बात कि अहिंसा का स्वराज्य हिंसा से रक्षित माना जाता है।महात्मा गांधी -(2-1-1948)

महात्मा गांधी के इन वचनों को और हमें उनसे बिछुड़े पूरे 70 साल बीत गए, परंतु न तो दिल्ली ही जीवंत हुई, न हमारा एक दूसरे पर विश्वास बढ़ा और सबसे खतरनाक बदलाव यह आया कि हमारा अहिंसा का साम्राज्य और भी अधिक शासकीय हिंसा और प्रलयंकारी व दमनकारी कानूनों पर निर्भर होता चला गया। इस कड़ी का नवीनतम उदाहरण 24 व 25 जून 2018 को गांधी समाधि, राजघाट की तालाबंदी है। वह क्यों हुई, किसके लिए थी, क्यों वह सरकारी नज़रिए से आवश्यक थी, यह सारे प्रश्न अनावश्यक हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इस तालाबंदी पर जिस तरह की प्रतिक्रिया आनी चाहिए थी, खासकर गांधी संस्थाओं, उनके पदाधिकारियों से, वह नहीं आई। इसमें बहुत आश्चर्य करने जैसा भी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों जो कुछ देश में चल रहा है, जिसमें सांप्रदायिकता, गायों के नाम पर हत्याएं, सार्वजनिक स्थलों पर पीट-पीट कर मार डालना, अपने से असहमत बुद्धिजीवियों पत्रकारों की हत्या पर कमोवेश अधिकांश गांधी विचार से जुड़ी संस्थाओं (अपवाद छोड़कर) का मौन साफ दिख रहा है कि वैचारिक स्तर पर ठहराव आता जा रहा है। अति बौद्धिकता भी बेहद खतरनाक होती है और हमें चालाक भी बना देती है। इसीलिए गांधी सिर्फ समझाइश नहीं देते वे चरखा चलाते हैं, वे कुष्ठ रोगियों की सेवा करते हैं, वे हरिजनों के लिए संघर्ष करते हैं, वे अखबार निकालते हैं, वे जेल जाते हैं,वे अनशन करते हैं, वे खादी को प्रोत्साहित करते हैं, वे किसानों के बीच जाते हैं, वे ग्रामोद्योगों की शुरूआत करते हैं और इस सबके अलावा वे आम जनता से मिलते हैं, बच्चों से खेलते हैं, खूब मुस्कराते हैं, तीखे व्यंग्य करते हैं और भविष्य का आधार भी रखते हैं। वे बेहद जीवंत हैं। वे दिल्ली नहीं है वे भारत के गांव हैं, जो इतने संकटों के बावजूद मुस्करा सकता है।

जिस समय राजघाट पर ताला लगा, उसी समय दिल्ली में गांधी जी की 150 वीं जयंती मनाने के लिए तैयारी समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक भी चल रही थी। वह बदस्तूर इन दोनों दिनों में अपनी भविष्य की योजना बनाती रही। समाधि पर ताला लगा रहा और विरोध बैठक 29 जून को हुई और इसे राष्ट्रव्यापी बनाने की अपील भी की गई। बात यहां समाप्त नहीं होती बल्कि यहां से शुरू होती है। उसी दिन राजघाट पर अरविंद मोहन ने ठीक बात कही कि इस घटना से यह फायदा तो अवश्य हुआ कि गांधी जन अपने-अपने मठों से बाहर निकले। भारत के कुछ भागों पर यह कथन एकदम सटीक बैठता भी है। वैसे यह भी सच्चाई है कि कई स्थानों पर अभी भी बौद्धिक विमर्श और रचनात्मक कार्य एक साथ चल रहे हैं और तमाम संकटों के बावजूद तमाम गांधीजन ऐसा कर रहे हैं। परंतु यह स्थिति इतनी व्यापक कैसे हो गई और भारत के अधिकांश लोग क्यों यह मानने लग गए कि गांधी विचार से जुड़े लोगों ने मौन धारण कर लिया है और वे अब सामाजिक विषमताओं को लेकर बहुत सक्रिय नहीं है। जब एक तबके ने नफरत या द्वेष का वातावरण तैयार करना शुरू कर रखा है। ऐसे में चुप बैठना क्या न्यायोचित कहलाएगा? जब राजनीतिक नेतृत्व दिशाहीनता की ओर अग्रसर हो तो व्यापक समाज सही दिशा पाने के लिए किसकी ओर देखे (जब सब ओर हिंसा का बोलबाला हो तो अहिंसा की पैरोकारी करने वाले भी क्या चुप बैठेगें)

63 साल की उम्र में गांधी ने स्वनिर्मित व बसा-बसाया साबरमती आश्रम छोड़ दिया और हरिजन यात्रा प्रारंभ कर दी थी। उसके बाद वे भारत के समृद्ध इलाके को छोड़कर संभवत: भारत के सबसे गरीब व वंचित इलाके विदर्भ के सेगांव, जो कि बाद में सेवाग्राम कहलाया में आकर बस गए और वहां से एक नई शुरूआत की। जिसे वे अपना सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार मानते थे, ऐसी ”वह तालीमÓÓ इसी सेवाग्राम की देन है। साथ ही ग्रामोद्योगों को लेकर एक नयी दिशा और विचार भी यहीं से नए परवान चढ़ा था। पर आज क्या हो गया है कि गांधीजनों की बहुत मंद सी आवाज़ हमारे कानों में पड़ रही हैं

यह भी नहीं कहा जा सकता है कि गांधी का कुनबा सुविधा भोगी हो गया है। तो फिर क्या है कि हम हमारे ‘कुलदेवताÓ को प्रसन्न नहीं कर पा रहे हैं। प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक कन्फ्युशस का कहना था, ”सत्य को जानते हुए भी उसके अनुकूल आचरण न करना कायरता है। ”हम यह नहीं कह सकते कि मेरे हिसाब से यही सच है क्योंकि सत्य तो एक ही है और गांधी ने सत्य को ईश्वर कहा है, ईश्वर को सत्य नहीं। वे सत्य को अहिंसा से भी ऊपर रखते थे। इसलिए इस व्यापक समुदाय की ओर से आ रही चुप्पी एक प्रश्न बनकर खड़ी हो गई है। किन्ही मुद्दों पर वैचारिक असहमति जताकर स्वंय को अलग करना एक बौद्धिक चतुराई भी है। नर्मदा बचाओं आंदोलन जैसे आंदोलनो की कार्यशैली को लेकर असहमति हो सकती है, परंतु क्या वे ”सत्याग्रहीÓÓनही हैं। बापू ने 31 दिसंबर 1947 को कहा था,’हमें अग्रेज़ों से लडऩा कठिन मालूम पड़ता था लेकिन आज में देखता हूं, तो वह लड़ाई बहुत ही सरल प्रतीत हो रही थी किन्तु आज की यह लड़ाई कठिन लग रही है। अंग्रेजो से तो हम तिल का ताड़ बनाकर, कुछ भी कह सकते थे लेकिन आज तो हम खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। कत्र्तव्य सामने होने पर उससे भागने लगते हैं। बिना शुद्धि के स्वराज्य कभी स्थापित नहीं हो सकता। हममें शुद्धि नहीं थी, इसलिए ऐसा राज्य हम लोगों के हाथ लगाÓ। वे आगे और अधिक समझाकर कहते है,’ मेरे विचार से यह स्वराज्य है ही नहीं, स्वराज्य का सच्चा अर्थ यही है कि मानव अपनी शासन सत्ता के अंतर्गत सरलता से जीये और अपने आसपास के लोगों को जिला सकेÓ। आज हमारा अपना शासन है और इसके बावजूद अंग्रेजों के शासन से ज़्यादा कठोर व दमनकारी कानून, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर थोपे जा रहे हैं। ऐसे में यह अवश्यंभावी हो जाता है कि गांधी विचार और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाला समुदाय स्वंय को एक बार फिर: वास्तविक ”स्वराज्यÓÓ के लिए प्रस्तुत करे।

सच तो यह है कि एक झिझक पूरे समाज में घर कर गई है जिसकी वजह से संघर्ष से आंख चुराई जाने लगी है। यह माना जाने लगा है कि काम किसी और का है। इस बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था को लेकर गांधी के विचारों की प्रासंगिकता को महज आलेखों, संस्थानों या सेमिनारों का विषय बना देने से बात आगे नहीं बढ़ेगी। गांधी जिस तीन ऊंगलियों वाली शिक्षा के बरस्क दस ऊंगलियों वाली शिक्षा की पैरवी क्यों करते थे, उस पर

गहन विचार करना ही होगा। रोज़गार निहित अर्थव्यवस्था की आंकड़ों के आधार पर छीछालेदर भर देने भर से बात नहीं बनेगी बल्कि हमें कुछ सार्थक, सकारात्मक व रचनात्मक करके दिखाना होगा। गांधी संस्थाओं, व्यक्तियों में इसे लेकर समझ भी है और कम मात्रा में ही सही परंतु संसाधन भी मौजूद हैं। वे ऐसी परंपरा के संवाहक भी हैं, जिसने पूरी दुनिया के सामने सत्य और अहिंसा को विकास के अनिवार्य उपकरणों की तरह रखा है। हमें उसी संपूर्णता को फिर अंगीकार करना होगा। बापू एक ही समय में ब्रिटिश शासन से टकराते हुए यह भी समझाते हैं कि खाते समय मुह से आवाज़ नहीं आनी चाहिए। वे सुबह कश्मीर समस्या पर बात करते हैं तो शाम को किसानों से मानव मल से खाद बनाने की विधि पर बात करते हैं। उनसे कुछ भी छूटता नहीं हैं। वे स्वंय को किसी श्रेणी या वर्ग में नहीं बांधते। वे झाडू लगाते समय भी चर्चा करते हैं और अप्रत्यक्ष रुप से जता देते हैं कि दोनों कार्य समान महत्व रखते हैं। राजघाट की तालाबंदी ने सारे देश को चेता दिया कि भविष्य में क्या होगा। सत्ता एक-एक कदम आगे बढ़ा रही है। पूना फिल्म संस्थान से शुरू हुआ बदलाव राजघाट तक पहुंच गया है और यह थम नहीं रहा है। इतनी निराशा के बावजूद हम आशावान हैं क्योंकि गांधी आज भी हमारे साथ है। भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा है,” यह सवेरा सार्थक जिस बात से हो। काम वह अपना शुरू इस रात से हो, आज से फिर रात होना बंद हो ले, बंध-बाधा आज की कल छंद हो ले, आज से संभव न हो अपनी निशा अब, आज से ऐसे जगें दुनिया जगा दें। आमीन

खरीफ की फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य घोषित लेकिन किसान नाराज़

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खरीफ की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित कर दिया है। सरकार का कहना है कि इससे किसानों को डेयोढ़े का लाभ बाजार में फसलों पर मिलेगा। यह बढ़ोतरी केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खास तौर पर चावल और दाल पर की है। यह दावा किया गया है कि इससे बजट में किया गया वादा पूरा कर दिया गया है, पर दूसरी ओर फसलों की कीमत पर किसान की चिंता भी काफी हद तक पूरी होने की बजाए और गहरा गई है।

यह बढ़ोतरी एक फसल उपजाने में लगी परिवार के श्रम की लागत और वास्तविक लागत को जोड़ कर निकाली गई है। किसानों में इस बात पर नाराज़गी है कि लागत मूल्य जो तय किया गया है वह गलत है। खेती लागत का कोई फार्मूला तैयार करते हुए दूसरे कई किस्म के खर्च भी जोड़े जाने चाहिए । मसलन फसल उत्पाद में जो पूंजी लगी है और ज़मीन और कुल खर्च पर जो ब्याज बनता है। यह सब उत्पाद की लागत काफी ऊंची कर देता है।

कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने कहा था कि किसानों को उनकी उपज का ज़्यादा डेयोढ़ा मिलना चाहिए। जबकि तब के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने फरवरी में कहा था कि खरीफ की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते हुए यह लागत का डेढ़ गुना होना चाहिए।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक किसान ने मेरठ के पास एक गांव में बताया कि जब फसल उपजाते हैं तो उसमें भूमि, पानी, खाद, बीज, कीटनाशक की लागत और परिवारिक श्रम के लिहाज से न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाना चाहिए। सरकार ने जो घोषणा की है उससे ऐसी संभावना नहीं बनी है कि वह इसे देखकर मयूर की तरह नाच उठे।

दरअसल किसानों की बड़ी रैलियों, तमिलनाडु और दूसरे राज्यों के किसानों के गन्ना की बकाया वूसली और फसलों पर सही उत्पाद मूल्य की मांग के साथ राजधानी में प्रदर्शन करने की घटनाओं के लिहाज से केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नया न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है।

जबकि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब और महाराष्ट्र के किसानों का कहना है कि यदि सी 2 लागत को जोड़ कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निकाला जाता तो वह घोषित समर्थन मूल्य का कम से कम चालीस फीसद ज़्यादा हो जाता।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में तकरीबन रुपए. 250 मात्र प्रति क्विंटल से बढ़ाकर रुपए. 1800 मात्र प्रति क्विंटल कर दिया है। इसके पहले इसकी कीमत रुपए.1550 मात्र प्रति क्विंटल थी। यदि इसमें सी 2 लागत भी जोड़ी जाती तो कुल कीमत रुपए. 2250 मात्र हो जाती।

फिलहाल जो पुनर्निधारित न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया गया है। वह केंद्र के रुपए 33,500 करोड़ मात्र पड़ेगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य एक तरह की बाजार में कीमत ऊंची रखने का एक सरकारी प्रयास है। जिससे खरीद के समय बाजार में कीमतें न गिरें। यह सरकार की ओर से नियत मूल्य है जिससे नीचे बाजार में खरीद नहीं होनी चाहिए।

कृषि संगठनों ने केंद्र सरकार की खेती उपज के समर्थन मूल्य पर चिंता जताई है और मांग की है कि राज्य सरकार को खरीद और भंडारण का सुरक्षित उचित प्रबंध करना चाहिए। जिससे व्यापारी तबका किसानों से मनमानी कीमत पर अनाज न ले सके। भारतीय किसान संघ के एक पदाधिकारी ने कहा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून के आखिरी सप्ताह में घोषणा की थी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करते हुए यह ध्यान रखेगा कि उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य डेढ़ गुना से कम न हो।

खरीफ की फसलों में धान मुख्य फसल है। इसकी बुवाई दक्षिण पश्चिम मानसून की शुरूआत के साथ ही शुरू भी हो गई है। खरीफ की कुछ फसलों में जहां खरीद की कीमत पहले से ही उत्पाद खर्च में डेढ़ गुना ज़्यादा है वहां यह बढोतरी कोई मायने नहीं रखती ‘खासतौरÓ पर धान, रागी और मूंग । जहां लागत कीमत डेढ़ सौ गुना से कम है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य का असर ज़्यादातर धान और दालों पर और दूसरे पोषक उत्पाद मसलन जौ, आदि पर पड़ता है। ऐसे में सकल उत्पादन का 0.2 फीसद न्यूनतम समर्थन मूल्य में जोड़ा गया।

न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में आने वाली फसलों में सिर्फ चावल और गेंहू ही नहीं है। खरीद की क्या प्रक्रिया सरकारें करेंगी उसकी घोषणा बाद में होगी। उत्पाद की लागत का हिसाब लगाने में 53 फीसद तो श्रम को जाता है। बाकी खर्च मसलन, खाद, कृषि में प्रयुक्त श्रम, कीटनाशक, बीज और सिंचाई का जोड़ घटाव के लिए बाकी 47 फीसद होता है।

सरकार ने इस बार खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करने में देर लगाई जबकि कई राज्यों में तो बुवाई शुरू भी हो चुकी थी । दरअसल सरकार यह हिसाब लगाने में जुटी थी कि समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का क्या असर बाजार पर पड़ेगा। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी से भारत का चावल उत्पाद का फीसद बढ़ सकता है। इस संबंध में चीन में भारतीय प्रधानमंत्री ने बातचीत भी की थी। पिछले साल यानी 2017-18 में लगभग 111 मिलियन टन फसल थी जो घरेलू मांग से कहीं ज़्यादा थी।

धान के उत्पाद में पानी की काफी ज़रूरत पड़ती है। ऐसे में इसकी बजाए धान के उन उत्पादों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिससे कम पानी में ज़्यादा धान बने और सरकारी खरीद ज़्यादा हो। इस बार न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी का महत्व यह है कि इसके तहत वे फसलें आ जाती हैं जो खरीफ के मौसम में कुल अनाज की 50 फीसद हैं। पिछले वर्षों में हुई खरीद की तुलना में यह बारह हजार करोड़ का अतिरिक्त अनुमानित बोझ है।

मध्यप्रदेश की बाल कल्याण मंत्री के इलाके में सबसे ज़्यादा कुपोषण

भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री और बुजुर्ग नेता बाबू लाल गौर ने अब अपनी ही सरकार के कामकाज़ पर और कुपोषण के मुद्दे पर बंदरबांट पर अपनी बात कही है। राज्य में बढ़ते कुपोषण पर राज्यपाल आनंदीबेन ने जहां मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को शीशा दिखा दिया है, वहीं भाजपा की राज्य में वापसी पर सवालिया निशान लगने लगे हैं

गौर के अनुसार समाज कल्याण और बाल मंत्री अर्चना चिटनिस कुपोषण पर चिंता ज़रूर जता रही हैं लेकिन कर कुछ नहीं रही हैं। वे तो मेरे साथ राज्य के कुपोषण क्षेत्रों के दौरे पर जाने को थीं लेकिन वे इतनी व्यस्त हैं कि अब इस साल तो कुछ करेंगी नहीं लेकिन आने वाले साल में ज़रूर करें। मध्यप्रदेश सरकार अपने आखिरी दिनों में कुछ नहीं करने को है, क्योंकि अब करने का समय ही नहीं बचा है। अपनी कुर्सी बचाने की पड़ी है। विधायक बाबू लाल गौर ने विधानसभा के मानसून सत्र में कुपोषण के आंकड़ों की मांग की थी। जो सूचना दी गई उसके अनुसार प्रदेश में बेहद कम वजन वाले बच्चे 1,26,218 हैं। यह आकलन भी 2015 का है। यानी सरकार इस मामले में न तो सक्रिय है और न ऐसी योजनाएं ही इसने बनाई हैं जिससे समस्या का समाधान युद्ध स्तर पर हो सके।

राज्य में मार्च 2015 में जहां कम वजन वाले बच्चे 1,26,218 थे उनकी गिनती मार्च 2016 में 90,537 और मार्च 2017 में 1,53,842 और मार्च 2018 में 1,03,083 हैं सवाल है कि सरकार ने इतनी बड़ी रकम खर्च कर दी पर कम वजन वाले बच्चों का वजन नही बढ़ा।

उनकी माताओं की स्थिति नहीं सुधरी लेकिन संख्या और बढ़ी। सरकारी धन के खर्च का लाभ जो समाज में दिखना था वह क्यों नहीं दिखा। सरकार ने इस पूरे मामले की ठीक तरह से छानबीन क्यों नहीं की। इस मामले में गंगा में प्रदूषण की तरह बढ़ोतरी क्यों होती रही।

महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस के अपने जिले बुरहानपुर में 2329 बच्चे बहुत कम वजन के मिले हैं। यानी वे अपने काम में पूरी तौर पर कामयाब नहीं हैं। हालांकि उनका दावा है कि खरगोन जिले में मार्च 2018 में कम वजन वाले बच्चों की संख्या सबसे ज़्यादा है। छिंदवाड़ा जिले में बेहद कम वजन वाले बच्चों की संख्या 2235, बालाघाट जिले में 913, सिवनी में 982 और बैतूल जिले में 1711 है।

पूरे राज्य में अति कम वजन वाले बच्चों की संख्या तेजी से डेढ़ लाख होने की ओर है। खरगोन और सतना जिले में सबसे कम वजन वाले बच्चे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री मे मांग की है कि वे आंगन बाड़ी केंद्रों में पोषण आहार के लिए दी जाने वाली राशि को और बढ़ाए । सरकार अभी तक कम वजन के प्रति बच्चे पर आठ रुपए और अति कम वजन के बच्चों पर बारह रुपए खर्च करती है। आज जब आठ रुपए में चाय नही ंआती, दूध और दलिया कहां से आएगा। इसे हाल-फिलहाल बीस रुपए प्रति बच्चे के मान से सरकार को तय करना चाहिए।

चुनावी शोर में मध्यप्रदेश में पक्ष और विपक्ष आरोप-प्रत्यारोप की रोटियां से केंगा और कम वजन वाले शिशु व बच्चे और अति कम वजन वाले शिशुओं को ब्रेड की स्लाइस पकड़ा कर सरकार पोषण के आंकड़े कीर्तिमान में बदल लेगें लेकिन समस्या बरकरार रहेगी अगले दशकों तक। क्योंकि पक्ष और विपक्ष या दल सिर्फ सपनों में ही राज्य की जनता को उलझाए हुए है।

ग्रामीण योजनाएं क्यों नहीं आती अमल में

केंद्र के भारी भरकम दावों के बावजूद महत्वपूर्ण योजनाएं जो 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद अमल में आनी शुरू तो हुई पर वे इसलिए बेहतर नहीं हुई क्योंकि ग्रामीण भारत को आसानी से कजऱ् नहीं मिला। ऐसी योजनाएं मसलन प्रधानमंत्री मुद्रार योजना (पीएमएमवाइ) जनधन और प्रधानमंत्री जनधन योजना (पीएमजेडीवाई) का पूरा ध्यान फाइनेंशियल इन्क्लूजन और क्रेडिट अवेलिबिलिटी पर था जिससे देश की ग्रामीण जनता को छुटकार दिलाना था।

दूसरी और छोटा कजऱ् लेने वाले उपभोक्ताओं की तादाद जो बढ़ी रहती थीं वह 2014 और 2017 के दौरान बेहद कम हुई है। यह तादाद वापस उन क्रूर महाजनों के पास लौट गई है जो खून की आखिरी बूंद तक चूस लेने के लिए मशहूर हैं।

यह जानकारी उस अध्धयन से मिली है जिसका शीर्षक है ‘एन्स्नेर्ड इन पावर्टी : ए स्टडी ऑन रूरल इन्डेटनेस इन इंडियाÓ। यह अध्ययन एसोचेम ने थॉट आरबिटरेज के साथ मिल कर किया है। इस में सरकार की बेहद इनोवेटिव योजनाएं जो बैंक के बाहर के लोगों को बैंक से जोडऩे के लिए बनाई गई थीं मसलन मुद्रा योजना, जनधन योजना और बीमा पेंशन योजना इनका इशारा था कि इन्फार्मल सेक्टर में क्रेडिट को किस हद तक कम किया जाए।

मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाहर करोड़ लोगों के लाभान्वित होने के लिए मुद्रा योजना के तहत सरकार के जरिए कजऱ् देने की योजना शुरू की थी। इससे गरीबों की जिंदगी में बदलाव की रोशनी और रोजगार की संभावनाओं को बढ़ाने का इरादा था।

शिड्यूल बैंकों की ग्रामीण कजऱ् उपलब्ध कराने की योजनाएं तो लगभग नौ फीसद ही मार्च 2014 से जून 2017 के दौरान रहीं। छोटे कजऱ्दारों की तादाद ज़रूर मार्च 2014 मे 36.5 फीसद से जून 2017 में 33 फीसद हो गई।

अध्ययन के अनुसार 2014 में जो योजनाएं अमल में आई थीं वे आसानी से ग्रामीण इलाकों में कजऱ् चुकाने में लाभकारी नहीं थी। और इन्होंने ग्रामीण इन्डेटेडडनेस में सहजता से न तो कजऱ् दिलाया और न ग्रामीण कजऱ् बढ़ोतरी में कोई सुधार ही किया बल्कि इससे नुकसान ही हुआ।

निजी कजऱ्ों (पर्सनल लोन) की हिस्सेदारी – जिसे कहते हैं गैर उत्पादी मामलों के लिए कजऱ् कुल ग्रामीण कजोंऱ् के लिए शिड्यूल बैंकों से 2014 से ज़रूर बढ़ता रहा। यह 2017 में लगभग 20 फीसद हो गया। सरकार की अपनी क्रेडिट स्कीमें भी इस झुकाव को कतई रोक नहीं पाई। इसके मायने हुए कि गैर संस्थानिक कजऱ्दाता जिनमें गांव का महाजन भी है वह कजऱ् देने वाला महत्वपूर्ण स्त्रोत है। भले कितना ही बदनाम वह रहा हो।

अध्ययन के अनुसार ग्रामीण कजऱ् ठीक ठाक दिया ज़रूर गया लेकिन गरीबों को नहीं बल्कि धंधा कमाने वाले धनपिपासुओं को ही।

तार-तार हुइ्र्र गंगा-जमुनी तहजीब

एक समय पूरी दुनिया में धर्मनिरपेक्ष गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए पहचान बनाने वाले शहर लखनऊ से आज धर्मांधता और धार्मिक असहिष्णुता की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। इन बातों ने शहर के आपसी भाई-चारे को शर्मिंदा कर दिया है। पिछले दिनों एक के बाद एक घटी घटनाओं ने पूरी दुनियां को हिला कर रख दिया है। दुनिया को यहां से तंगदिली, असहिष्णुता और पक्षपात की बदबू आने लगी है। सबसे ताज़ी घटना नोयडा के एक विवाहित जोड़े की है। दो अलग-अलग मज़हब के लोगों की शादी होने के कारण पासपोर्ट अधिकारी ने उन्हें पूरी तरह ज़लील किया। कारण सिर्फ इतना था कि लड़की अपना हिंदू नाम बदलना नहीं चाहती थी। इससे कुछ दिन पहले लखनऊ की ही एक लड़की ने मुस्लिम मकैनिक से अपना एयरटेल डिजीटल टीवी नेटवर्क में आई खराबी को ठीक करवाने से साफ इंकार कर दिया था। इसकी भारी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यकर्ता ने उस ‘ओला कैबÓ में सफर करने से इंकार कर दिया था जिसका ड्राईवर एक मुसलमान था।

पासपोर्ट वाले मामले में अधिकारी एकदम हरकत में आए और उन्होंने उस अफ सर का तबादला कर दिया। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता की भी जमकर आलोचना हुई। ‘ओलाÓ ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। एयरटेल ने तो उस महिला की बात मान कर उसे एक सिख टेकनीसियन दे दिया।

पर बात है पासपोर्ट के दफ्तर की। मोहम्मद अनास सिद्धीकी और तानवी सेठ की शादी को 12 साल हो गए हैं। उनकी छह साल की एक बेटी भी है। दोनों लखनऊ के रहने वाले हैं और दोनों ने पढ़ाई भी वहीं की है। यह जोड़ा अनास के परिवार के साथ ईद मनाने लखनऊ आया। ये दोनों छुट्टियां मनाने के मूड में थे। इस कारण तानवी अपना पासपोर्ट बनाने गई थी और अनास को अपने पासपोर्ट का नवीनीकरण करवाना था। दोनों ने रत्न एक्वेयर स्थित पासपोर्ट कार्यलय से ‘ऑनलाइनÓ समय ले लिया था। पर जब 20 जून 2018 को वे पासपोर्ट के दफ्तर पहुंचे तो उन्हें जीवन का सबसे बड़ा झड़का लगा। वहां मौजूद विकास मिश्रा नामक अधिकारी ने तानवी के साथ दुव्र्यवहार किया। उसे अपमानित किया। उसकी शादी के लिए उसे शर्मिदा किया गया और उससे पूछा गया कि शादी के बाद उसने अपना नाम मुसलमानों वाला क्यों नहीं रखा? फिर अधिकारी ने उसके पति से कहा कि वह हिंदू बन जाए और ‘फेरेÓ ले कर विवाह करे।

जब दोनों ने कहा कि धर्म उनका व्यक्तिगत मामला है और उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है तो अफसर उनके कागज़ एक तरफ फेंक दिए। उसका लहजा सख्त हो गया, उसकी आवाज़ ऊंची हो गई और वह इस जोड़े को डराने-धमकाने लगा। तानवी ने बताया कि वह हमें हर तरफ से शर्मिदा कर रहा था।

उसके इस तरह के व्यवहार से ये लोग डरे सही पर इन्होंने साहस नहीं छोड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया और सारी कहानी उस पर डाल दी। तावनी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भी ट्वीट किया। यह बात पूरे मीडिया में आग की तरह फैल गई। एक जोड़े को परेशान करने का मामला देखते ही देखते ‘बे्रकिंग न्यूज़Ó बन गया।

विकास मिश्रा ने अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने सिर्फ यह कहा था कि वह अपना ‘निकाहनामÓ वाला नाम ‘सादिया अनासÓ पासपोर्ट पर लिया ले। जिसे उसने इंकार कर दिया। पर, कुछ ही घंटों में उस अफसर का तबादला कर दिया गया और एक जांच समिति भी गठित कर दी गई। इस बीच गोमती नगर क्षेत्रीय पासपोर्स दफ्तर में इस जोड़े को बुलाया गया और पत्रकारों के कैमरों की चमक के बीच उन दोनों को पासपोर्ट सौंप दिए गए। इससे उनके चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई।

लेकिन एयरटेल कंपनी के पीडि़त के साथ ऐसा नहीं हुआ। शोयब को बिना किसी कसूर के एक ग्राहक के हाथों धार्मिक असहिष्णुता का शिकार होना पड़ा। केवल इसलिए कि उसका नाम शोयब था और वह मुस्लिम था। यह मामला तथ्यों की सारी मान्यनाओं के पार है और लोगों की कट्टपंथी सोच को दर्शाता है।

कुछ महीने पहनले नवाबों की नगरी में धार्मिक असहिष्णुता का एक और मामला सामने आया। हुआ यह कि प्रबंधकीय पद पर काम कर रही पूजा सिंह नामक महिला को अपने एयरटेल डीजीटल का नेटवर्क ठीक करवाना था। उसने कंपनी में फोन किया। वहां शोयब नामक टेकनीश्यिन से बात हुई जो एक मुसलमान था। पर पूजा ने यह कह कर उससे काम करने से इंकार कर दिया कि वह एक मुस्लिम है और उसे मुसलमानों पर विश्वास नहीं है। उसने कंपनी से किसी हिंदू को भेजने को कहा। निजी कंपनी के उसकी मांग को मानते हुए गगनजोत सिंह, जो कि एक सिख है को काम करने भेज दिया।

पूजा ने कृत्य की लोगों ने जम कर निंदा की। उसके ट्वीट से सोशल मीडिया में भारी हलचल मच गई। उसकी सोच की लोगों ने खूब आलोचना की। लोगों ने कहा कि यदि वह हिंदुत्व की ठेकेदार भाजपा जैसी पार्टी की सदस्य या समर्थक है या आरएसएस की नीतियों पर चलने वाली है, तो भी उसे किसी को धार्मिक आधार पर किसी का अपमान करने का हक नहीं है।

शाहरूख खान जैसे अंदाज में किसी ने ट्वीट किया – ‘मैं भी हिंदू हूं। कृपया शोयब को भविष्य में मेरे हर काम के लिए भेजें। और, पूजा को किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखाया जाए। उसे अलग टैक्नीशियन की नहीं अपितु अलग दिमाग की ज़रूरत है।Ó

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंंत्री उमर अब्बदुला ने कहा कि वे एयरटेल की जगह कोई और ब्रॉडबैंड लेंगे।  अब धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। बहुत से युवा आज कट्टर बाद की भाषा बोलने लगे है। कम से कम पहले लखनऊ में ऐसा नहीं होता था।