भाजपा: भीतर पकती गुटबाजी

कांग्रेस के विपरीत प्रदेश भाजपा में खुले में कोर्ई लड़ाई नहीं दिखती। न तो एक दूसरे के खिलाफ कोई बयानबाजी होती है न संगठन और सरकार के बीच वर्चस्व की खींचतान दिखती है। फिर भी 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले भाजपा के बड़े नेताओं में अस्तित्व की जंग भीतर ही भीतर जारी है।

भाजपा के बीच गुट होने के बावजूद लड़ाई का कांग्रेस की तरह खुले में न आ पाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि सात महीने पहले मुख्यमंत्री बने जय राम ठाकुर ने न तो खुद अपना कोई गुट बनाने का प्रयास किया न प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार जैसे अपने वरिष्ठों की हैसियत को चुनौती देने की कोशिश की। जय राम अपनी सीमायें जानते हैं और उन्हें इस बात का एहसास है कि सरकार चलाने के लिए उन्हें इन नेताओं की मदद की ज़रुरत रहेगी। पार्टी के कई बड़े नेता स्वीकार करते हैं कि जय राम

धूमल और शांता कुमार के मुकाबले अफसरशाही पर कम पकड़ रखने वाले मुख्यमंत्री हैं और सरकार पर अभी वे धूमल और शांता जैसा दबदबा नहीं बना पाए हैं।

प्रदेश भाजपा में अभी भी सबसे ताकतवर खेमा पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का है। धूमल भले सत्ता से बाहर हैं लेकिन संगठन से लेकर सरकार तक में उनकी पैठ है। कारण है इतने सालों में उनके समर्थकों की लम्बी जमात का तैयार होना। पिछले साल दिसंबर में जब धूमल की विधानसभा चुनाव में हार के बाद अचानक जय राम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया था तो धूमल परदे से गायब से हो गए थे। लेकिन नए मुख्यमंत्री जय राम की उनसे लगातार मुलाकातों से जाहिर हो गया कि धूमल भाजपा की राजनीति में हाशिये पर नहीं गए हैं।

चर्चा यह भी है कि 2019 के लोक सभा चुनाव में धूमल को हमीरपुर से उनके बेटे अनुराग ठाकुर की जगह टिकट दिया जा सकता है, हालांकि यह अभी चर्चा तक सीमित है। दरअसल प्रदेश भाजपा में धूमल का मजबूत खेमा अपने नेता को राजनीति के बियाबान में नहीं देखना चाहता।

उनके हलके सुजानपुर में नगर परिषद् के अध्यक्ष और भाजपा नेता रमन भटनागर कहते हैं – ”उनका चुनाव हारना एक दुर्भाग्य पूर्ण अध्याय था जो पीछे छूट चुका है। वे अभी भी पार्टी के लिए वोट ले सकने वाले सबसे प्रभावशाली चेहरा हैं। अगले लोक सभा चुनाव में उनकी उपयोगिता साबित हो जाएगी।”

जाहिर है भाजपा में उनके समर्थक धूमल को कमजोर होता नहीं देखना चाहते। बहुत से नेता यह मानते हैं कि भले प्रदेश में जय राम की सरकार है, समर्थकों के लिए धूमल ही मुख्यमंत्री हैं। एक कार्यकर्ता ने कहा – हम अपने काम के लिए ठाकुर साब (धूमल) को ही कहते हैं और हमारे काम भी होते हैं। धूमल खुद राजनीति में सक्रिय हैं जिससे यह तो जाहिर हो ही जाता है कि वे अपने प्रभावशाली गुट को कमजोर नहीं होने देना चाहते।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती के नेतृत्व में विधानसभा के चुनाव हुए थे और पार्टी ने 44 सीटें जीती थीं। लेकिन सत्ती खुद अपना चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद वे अपने पद पर मजबूती से जमे हुए हैं। उनका अपना कोई मजबूत गुट नहीं हालांकि उन्हें धूमल के करीब ज़रूर माना जाता है। सत्ती की राजनीति में अपनी महत्वाकांक्षाएं रही हैं। वे युवा हैं और संगठन के व्यक्ति रहे हैं। यह माना जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का खेमा चुनाव के बाद सत्ती को पद से हटाकर नया अध्यक्ष चाहता था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

सत्ती को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में धूमल का बड़ा रोल रहा था। धूमल खुद सत्ती को हटाए जाने के पक्ष में नहीं, ऐसा माना जाता है। संगठन पर भले सत्ती की धूमल जैसी पकड़ नहीं, वे विवादास्पद भी नहीं रहे हैं। इस तरह सत्ती भी प्रदेश भाजपा में भविष्य की दौड़ में शामिल हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार इस समय काँगड़ा से सांसद हैं। नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते वहां घटी कुछ घटनाओं को लेकर तल्ख रहे शांता कुमार को अगले लोक सभा चुनाव में पार्टी टिकट की सम्भावना न के बराबर है। इसका कारण शांता की उम्र भी है। वे 2019 में 84 साल के होंगे जबकि उनके विपरीत उनके विरोधी माने जाने वाले धूमल 74 के आसपास होंगे। लिहाजा धूमल को टिकट मिलने की सम्भावना पार्टी के नेता जताते हैं। इस तरह भाजपा को काँगड़ा में नया उम्मीदवार ढूंढना होगा।

प्रदेश भाजपा और मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के लिए 2019 के लोक सभा चुनाव सबसे बड़ी चुनौती हैं। भले प्रदेश से लोक सभा की चार ही सीटें हैं, भाजपा की सरकार होने से नतीजे उसके प्रदर्शन के आधार से देखे जाएंगे। हो सकता है जय राम ठाकुर लोक सभा चुनाव के बाद खुद की नई इमेज बनाने के लिए कुछ करें ताकि यह प्रभाव खत्म हो कि वे धूमल जैसे वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव में नहीं।

पूछने पर जय राम ठाकुर कहते हैं कि उनके लिए सत्ता जन सेवा की चीज है। जय राम ने तहलका से बातचीत में कहा – मुझे जब मुख्यमंत्री चुना गया खुद मेरे लिए यह हैरानी भरा फैसला था। मैंने आलाकमान और विधायक दल के फैसले को सर माथे पर लेते हुए खुद को पूरी तरह सरकार के काम में लगा दिया। प्रदेश के सामने चुनौतियों का सामना करते हुए कुछ फैसले किये हैं और यह काम आगे भी जारी रहेगा। मैं 14 साल पहले प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना था और उस पद पर रहते हुए संगठन को मजबूत करने का काम किया। अब सरकार का जिम्मा मिला है और नम्रता से अपना जिम्मा निभा रहा हूँ। मुझे खुशी है कि मुझे अपने वरिष्ठ नेताओं का पूरा समर्थन मिला है। इस समय सरकार और संगठन मिलकर प्रदेश के विकास में जुटे हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि 2019 में पार्टी सभी चार सीटें जीतेगी। मैं इस बात पर फक्र महसूस करता हूँ कि हमारे विपक्षी दल के विपरीत हमारे (सरकार और संगठन) के बीच बहुत मधुर सम्बन्ध हैं। मेरा सौभाग्य है की देश में मोदी जैसा श्रेष्ठ व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर है और हमें और पार्टी को उनके और अमित शाह के नेतृत्व में काम का अवसर मिला है।

पार्टी में इसके बावजूद भीतर कहीं यह तो माना ही जाता है कि बड़े नेता खुद को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए इतनी जल्दी अपनी सक्रियता नहीं छोड़ेंगे। सक्रिय रहेंगे तो गुटों का प्रभाव भी रहेगा। तहलका ने इस मसले पर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल से भी बातचीत की। धूमल का कहना है कि जनता से जो वादे किये गए थे यह सरकार उस दिशा में काम कर रही है। प्रत्येक कार्यकर्ता पूरी ताकत से 2019 की तैयारी में जुटा है। यह पूछने पर कि क्या वे 2019 के लोक सभा चुनाव में उतरेंगे, धूमल ने कहा कि यह सोचना उनका काम नहीं। ”कौन चुनाव लड़ेगा इसका फैसला आलाकमान और पार्लियामेंट्री बोर्ड करता है। मुझे आज तक पार्टी ने जो भी जिम्मा सौंपा मैंने उसे निभाया। मेरे लिए पार्टी अहम् है पद नहीं।”

इस मसले पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती का कहना है कि प्रदेश में संगठन और सरकार में गज़ब का तालमेल है और कार्यकर्ताओं की आवाज सरकार तक पहुँचती है। ‘जनता के बड़े मसलों पर हम सरकार से लगातार संपर्क रखते हैं।’ उन्होंने कहा कि भाजपा की सरकारें अपनी महत्वकाँक्षाओं नहीं जनता की उम्मीदों के लिए काम करती हैं।