बृज खंडेलवाल

आजकल बड़े शहरों में चमचमाती ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदल गई है। ग्रेनाइट, शीशे और एयर-कंडीशनर से सजे इन आलीशान घरों में अब सूरज निकलने के बाद आराम से सोना लगभग गुनाह समझा जाता है। अपने शर्माजी, भोर सुबह, सज संवर के जिम के लिए ड्राइव करते हैं, जहां हूरों से मिलकर उनका रक्तचाप नॉर्मल हो जाता है। उधर चौधरी साहब अपने फ्लैट की खिड़की से नजारा ताक रहे होते हैं। वो बताते हैं, “सुबह साढ़े छह बजे से ही फिटनेस का युद्ध शुरू हो जाता है। कोई जिम की तरफ भाग रहा है, कोई तैराकी कर रहा है। योगा मैट अलग-अलग “माइंडफुलनेस ज़ोन” में ऐसे बिछाए जाते हैं, जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान होने वाला हो। कुछ लोग तेज़-तेज़ चलते हैं, कुछ जॉगिंग करते हैं। सबके चेहरों पर ऐसा भाव होता है, जैसे सुबह पसीना बहाना ही इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा हो।”
जिम इतना भरा रहता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। स्विमिंग पूल में इतनी हलचल होती है कि पानी भी शायद आराम मांगने लगे। ध्यान लगाने वाले लोग इतनी गंभीरता से आंखें बंद करते हैं कि लगता है, अभी संतोष और आत्ममुग्धता के सहारे हवा में उड़ने लगेंगे। हर सुबह ग्रेटर नोएडा की एक पूरी सोसाइटी स्वास्थ्य सुधारने के एक बड़े अभियान में बदल जाती है। सवाल बस इतना है कि क्या इससे सचमुच स्वास्थ्य सुधर रहा है? कभी-कभी यह फिटनेस से ज्यादा एक महंगा जुनून लगता है। मेरा एक दोस्त, जो खुद जिम भक्त है, कहता है कि इतनी योगा, प्राणायाम और माइंडफुलनेस के बावजूद दुनिया पहले से ज्यादा स्वस्थ नजर नहीं आती। अस्पताल बढ़ रहे हैं, निजी क्लीनिक बढ़ रहे हैं और वेलनेस सेंटर भी हर गली में खुल रहे हैं।
अगर योगा के दावे आधे भी सच होते, तो शहर के आधे हृदय रोग विशेषज्ञ बेरोजगार हो जाते और बाकी आधे प्राणायाम सिखा रहे होते। उधर, पुराने विचारों वाले एक पंडित जी, इस मामले को बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि अपनी ताकत बचाने का फायदा, सुबह-सुबह उसे बेकार में खर्च करने से कहीं ज्यादा है। ट्रैफिक झेलना, दफ्तर की राजनीति सहना, बढ़ती महंगाई और कभी-कभी जीवन के अर्थ पर चिंता करना: ये सब अपने आप में काफी बड़ी एक्सरसाइज हैं। वह कहते हैं, “सुबह-सुबह तंग छोटे गारमेंट्स पहनकर खुद को क्यों सताते हो? जिंदगी खुद ही कम कसरत नहीं कराती क्या ?” बात में दम है। अमीर लोग सुबह अंधेरे में अपने शरीर को सज़ा देते हैं, ताकि बाद में गर्व से एवोकाडो टोस्ट खा सकें। शायद लंबी उम्र का असली राज जिम में नहीं, बल्कि आराम से सोने में हो। हाइ सोसाइटी के तमाम लोग सुबह वर्क आउट इसलिए करते हैं ताकि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में मजे लें। हो सकता है असली फिटनेस यह हो कि इंसान एक सभ्य समय तक बिस्तर में पड़ा रहे, अपनी ऊर्जा बचाए और उसे दुनिया की सबसे कठिन एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल करे, इस पागल होती दुनिया में थोड़ा-बहुत सामान्य बने रहने के लिए।
आज फिटनेस एक नया धर्म बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले लोग मोक्ष के लिए तपस्या करते थे, अब लोग सिक्स-पैक के लिए। एक तरफ जॉगर्स हैं। दूसरी तरफ योगा योद्धा। तीसरी तरफ जिम के पहलवान। चौथी तरफ वे लोग हैं, जो हाथ में महंगी पानी की बोतल लेकर सिर्फ इसलिए घूम रहे हैं ताकि सबको पता चले: भाई साहब, ये आज भी “हाइड्रेटेड” हैं। अब सुबह सोना पुराने जमाने की आदत हो गई है। जो आठ बजे उठता है, उसे शक की निगाह से देखा जाता है। लोग सोचते हैं, “बेचारा जिंदगी में कितना पीछे रह गया!” जबकि आदमी बेचारा बस नींद पूरी कर रहा होता है। और उधर गेट पर कंपटीशन के नतीजे आने लगे हैं:
“आज कितने कदम चले?”
“दस हजार।”
“बस? मैंने पंद्रह हजार किए।”
“मैंने बीस हजार।”
तभी एक सज्जन मोबाइल निकालकर कहते हैं, “मेरी स्मार्टवॉच कह रही है कि मैं आज बहुत स्ट्रेस में हूं।” बाकी लोग गंभीर हो जाते हैं। इतनी दौड़-भाग, इतनी योगा, इतना ध्यान और इतना प्राणायाम करने के बाद भी घड़ी बता रही है कि आदमी तनाव में है। अब घड़ी से बहस कौन करे? जिम में भी हालत कम मजेदार नहीं है। ट्रेडमिल पर लोग ऐसे दौड़ते हैं जैसे पीछे ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग तीनों लगे हों। मजे की बात यह है कि आधे घंटे बाद वही सज्जन लिफ्ट से ऊपर अपने फ्लैट में जाते हैं। सेकंड फ्लोर तक सीढ़ियों से जाने में कष्ट होता है। स्विमिंग पूल में लोग पानी को इतना मथते हैं कि लगता है समुद्र मंथन का ट्रायल चल रहा है। योगा क्लास में सब आंखें बंद करके “मन की शांति” खोज रहे हैं। क्लास खत्म होते ही पार्किंग में कार खड़ी करने को लेकर दो लोगों में युद्ध शुरू हो जाता है।
एक सज्जन रोज सुबह ध्यान करते हैं।
दूसरे सज्जन पूछते हैं, “कितनी देर?”
“एक घंटा।”
“फायदा?”
“बहुत शांति मिलती है।”
इतने में उनकी मेड छुट्टी मांग लेती है। सज्जन की आध्यात्मिक शांति तुरंत व्हाट्सऐप कॉल पर चली जाती है। आधुनिक जीवनशैली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। आदमी स्वास्थ्य पाने के लिए पहले खुद को बीमार करता है। सुबह अलार्म से नींद खराब करो। ठंडे पानी से नहाओ। जिम में शरीर तोड़ो। फिर प्रोटीन शेक पियो। उसके बाद ऑफिस जाकर आठ घंटे कुर्सी पर बैठो और शाम को डॉक्टर से पूछो, “डॉक्टर साहब, कमर दर्द क्यों रहता है?”
पहले इंसान खेत में काम करता था, पैदल चलता था, कुएं से पानी खींचता था। उसे फिटनेस ऐप की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज आदमी एयर-कंडीशनर में बैठता है, कार से जिम जाता है, ट्रेडमिल पर पांच किलोमीटर दौड़ता है और फिर कार से घर लौट आता है। इसे आधुनिक प्रगति कहते हैं। अब खाना भी पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता। पहले उसकी फोटो खींची जाती है। एवोकाडो टोस्ट, क्विनोआ सलाद और ग्रीन जूस के साथ सेल्फी जरूरी है। आखिर दुनिया को कैसे पता चलेगा कि आप स्वस्थ हैं? स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है: स्वस्थ दिखना। सोशल मीडिया ने तो फिटनेस को पूरा तमाशा बना दिया है। कोई आसन कर रहा है, कोई प्रोटीन पी रहा है, कोई “नो शुगर चैलेंज” चला रहा है। अगले दिन वही आदमी आधी रात को फ्रिज खोलकर रसगुल्ले ढूंढ रहा होता है। सच तो यह है कि आधुनिक इंसान ने हर चीज को प्रतियोगिता बना दिया है। पहले नौकरी की दौड़ थी। फिर पैसे की दौड़ हुई। अब नींद छोड़कर स्वस्थ होने की भी दौड़ शुरू हो गई है। शायद असली वेलनेस का राज इतना ही है; थोड़ा कम भागिए, थोड़ा कम दिखाइए और कभी-कभी बिना अपराधबोध के देर तक सो जाइए। क्योंकि इस दुनिया में जहां हर कोई फिटनेस का महर्षि बनने पर तुला है, सबसे बड़ा योगासन शायद यही है: आराम से करवट बदलो, चादर ओढ़ो और कहो; आज नहीं, कल से जिम पक्का!!
