“33 लाख को नोटिस, 47 लाख नाम गायब! Delhi की Voter List में आखिर चल क्या रहा है?”

“33 लाख को नोटिस, 47 लाख नाम गायब! Delhi की Voter List में आखिर चल क्या रहा है?”
दिल्ली की मसौदा मतदाता सूची से करीब 47.56 लाख नाम बाहर रह गए हैं, जबकि 33.13 लाख मतदाताओं को “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के आधार पर नोटिस भेजे गए हैं।

मोहिनी सेंगर

47 लाख नाम बाहर, लेकिन कहानी सिर्फ डिलीट होने की नहीं

दिल्ली की मतदाता सूची को लेकर इन दिनों बड़ा सवाल है, आखिर करीब 47 लाख नाम कहां गए? 31 अगस्त को जारी मसौदा मतदाता सूची में करीब 97 लाख मतदाताओं के नाम हैं। इससे पहले दिल्ली की सूची में करीब 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे। यानी करीब 47 लाख नाम मसौदा सूची में शामिल नहीं हुए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी लोगों के वोट हमेशा के लिए खत्म हो गए हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक यह विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसमें पुराने रिकॉर्ड से नाम और जानकारी का मिलान किया गया है। जो योग्य मतदाता मसौदा सूची में नहीं हैं, वे दावा और आपत्ति की प्रक्रिया में अपना नाम जुड़वा सकते हैं।

असली पेच: 33.13 लाख वोटरों को क्यों मिला Notice?

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, मसौदा सूची से बाहर हुए नामों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो पते पर नहीं मिले या कहीं और चले गए। करीब 43.3 लाख नाम ऐसे मतदाताओं के हैं जिन्हें अनुपस्थित या स्थानांतरित माना गया। इसके अलावा करीब 2.8 लाख नाम मृत मतदाताओं के बताए गए हैं, जबकि करीब 1.4 लाख नाम दोहराव वाले रिकॉर्ड से जुड़े हैं। यानी 47 लाख का पूरा आंकड़ा केवल “मृत” या “फर्जी” मतदाताओं का आंकड़ा नहीं है। इसमें दिल्ली से बाहर जा चुके, रिकॉर्ड में दो बार दर्ज और अन्य कारणों से सत्यापन में नहीं मिले मतदाता भी शामिल हैं।

“Logical Discrepancy” का मतलब क्या है?

“लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” का मतलब आसान भाषा में मतदाता की मौजूदा जानकारी और पुराने रिकॉर्ड के बीच ऐसा अंतर, जिसे चुनाव आयोग को जांचना जरूरी लगा। मसलन, पुराने मतदाता रिकॉर्ड से नाम, उम्र, माता-पिता का नाम या दूसरी जानकारी पूरी तरह मेल न खाना। ऐसे मामलों में आयोग यह देखना चाहता है कि मतदाता वही व्यक्ति है और उसका रिकॉर्ड सही है। इसलिए नोटिस भेजकर उससे जानकारी या दस्तावेज मांगे जाते हैं। नोटिस मिलना अपने-आप में नाम कटने का मतलब नहीं है, बल्कि यह सत्यापन की प्रक्रिया का हिस्सा है।

अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा?

दिल्ली की मतदाता सूची में 47.56 लाख नाम मसौदा सूची से बाहर होने और करीब 33.13 लाख मतदाताओं को “नो मैपिंग” या “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के आधार पर नोटिस दिए जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं का मुख्य सवाल यह है कि जिन लोगों को नोटिस मिला, उनके नाम और नोटिस देने की सटीक वजह सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? उनका कहना है कि “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के लिए इस्तेमाल किए गए स्पष्ट नियम या मापदंड भी सामने नहीं रखे गए हैं। याचिका में मांग की गई है कि सभी नोटिस पाने वाले मतदाताओं की खोजी जा सकने वाली सूची, उनके पते और हर व्यक्ति को नोटिस देने का खास कारण सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी बताया जाए कि किसी मतदाता को “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” की श्रेणी में डालने का आधार क्या है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अगर नोटिस में समस्या ही स्पष्ट नहीं होगी, तो मतदाता उसके खिलाफ सही दस्तावेज देकर अपना पक्ष कैसे रखेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किया है।