
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
ऑटिज्म सहित कई बीमारियों के इलाज के नाम पर स्टेम सेल थेरेपी के इस्तेमाल को लेकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों को महत्वपूर्ण एडवाइजरी जारी की है। एनएमसी ने स्पष्ट किया है कि स्टेम सेल थेरेपी को सामान्य इलाज के तौर पर केवल उन्हीं बीमारियों में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिन्हें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू) ने मंजूर किया है। मंजूर सूची से बाहर किसी बीमारी के लिए स्टेम सेल का इस्तेमाल सामान्य चिकित्सा उपचार के रूप में नहीं किया जा सकता।
यह एडवाइजरी एनएमसी के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड के सचिव डॉ. राघव लैंगर ने जारी की है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के 30 जनवरी 2026 के उस फैसले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) के इलाज में स्टेम सेल थेरेपी से जुड़े मुद्दे पर विचार किया गया था। एनएमसी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने देखा था कि स्टेम सेल थेरेपी को क्लिनिकल ट्रायल के नियामकीय ढांचे से बाहर नियमित व्यावसायिक चिकित्सा उपचार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
ऑटिज्म के इलाज में स्टेम सेल को लेकर क्या कहा गया?
एनएमसी की एडवाइजरी का सीधा मतलब है कि ऑटिज्म के मरीजों को स्टेम सेल थेरेपी को सामान्य या नियमित इलाज बताकर नहीं दिया जा सकता, जब तक वह सरकार की मंजूर मानक उपचार सूची में शामिल न हो। स्टेम सेल ऐसी कोशिकाएं होती हैं, जिनमें शरीर में अलग-अलग तरह की कोशिकाओं में बदलने की क्षमता होती है। इसी वजह से इनके जरिए कई बीमारियों के इलाज की संभावनाओं पर शोध किया जाता है। लेकिन किसी बीमारी के लिए संभावित उपचार और ऐसा उपचार जिसे नियमित चिकित्सा पद्धति के तौर पर मंजूरी मिल चुकी हो- दोनों अलग बातें हैं। एनएमसी ने इसी अंतर को लेकर डॉक्टरों को सावधान किया है।
इन बीमारियों में स्टेम सेल थेरेपी की अनुमति
एनएमसी की एडवाइजरी के साथ संलग्न एमओएचएफडब्ल्यू की सूची के मुताबिक, सामान्य इलाज के तौर पर स्टेम सेल थेरेपी की अनुमति मुख्य रूप से कुछ गंभीर रक्त कैंसर, रक्त विकार और प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़ी बीमारियों में है।
वयस्कों में-
- एक्यूट मायलोइड ल्यूकेमिया तेजी से बढ़ने वाला रक्त कैंसर
- एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमियाः: सफेद रक्त कोशिकाओं से जुड़ा तेजी से बढ़ने वाला रक्त कैंसर
- क्रॉनिक मायलॉयड ल्यूकेमियाः धीरे-धीरे बढ़ने वाला एक प्रकार का रक्त कैंसर
- मायलोफाइब्रोसिसः बोन मैरो में असामान्य ऊतक बनने से खून बनने में परेशानी
- मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोमः बोन मैरो में स्वस्थ रक्त कोशिकाएं ठीक से नहीं बन पातीं
- क्रॉनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमियाः एक प्रकार का धीरे बढ़ने वाला रक्त कैंसर
- लिम्फोमाः शरीर की लसीका प्रणाली का कैंसर
- हॉजकिन्स लिम्फोमाः: लसीका प्रणाली का एक विशेष प्रकार का कैंसर
- मल्टीपल मायलोमाः बोन मैरो की एक विशेष रक्त कोशिका का कैंसर
- गंभीर एप्लास्टिक एनीमियाः बोन मैरो में रक्त कोशिकाएं बहुत कम बनना
- जर्म सेल ट्यूमरः प्रजनन से जुड़ी शुरुआती कोशिकाओं से बनने वाला कैंसर
- मल्टीपल स्क्लेरोसिसः प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा नसों को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी
- सिस्टमिक स्क्लेरोसिसः प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़ी बीमारी, जिसमें त्वचा और कुछ अंगों में कठोरता आ सकती है
बच्चों में-
- थैलेसीमिया/ सिकल सेल डिजीजः आनुवंशिक रक्त विकार
- ऑस्टियोपेट्रोसिसः हड्डियों के असामान्य रूप से कठोर और घने होने की दुर्लभ बीमारी
- इविंग्स सार्कोमाः हड्डियों या आसपास के ऊतकों का दुर्लभ कैंसर
- न्यूरोब्लास्टोमाः बच्चों में होने वाला एक दुर्लभ कैंसर
इसके अलावा बच्चों की सूची में कई प्रकार के ल्यूकेमिया, लिम्फोमा, गंभीर एप्लास्टिक एनीमिया, प्रतिरक्षा तंत्र की गंभीर बीमारियां और बोन मैरो से जुड़ी आनुवंशिक बीमारियां भी शामिल हैं।
खास बात: एनएमसी ने साफ कहा है कि मेसेन्काइमल स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन को किसी भी बीमारी के लिए मानक इलाज के तौर पर मंजूर नहीं किया गया है।
मंजूर सूची से बाहर इलाज करना है तो क्या होगा?
एनएमसी और आईसीएमआर की ओर से जारी दस्तावेज के मुताबिक, मंजूर बीमारियों से बाहर स्टेम सेल का इस्तेमाल रिसर्च यानी शोध के संदर्भ में ही किया जा सकता है। इसके लिए निर्धारित नियामकीय और नैतिक नियमों का पालन जरूरी होगा। आईसीएमआर के पत्र में बताया गया है कि स्टेम सेल में किए गए बदलाव की प्रकृति के आधार पर नियामकीय प्रक्रिया अलग हो सकती है। अगर स्टेम सेल में मिनिमल मैनिपुलेशन यानी बहुत कम स्तर का बदलाव किया गया है तो शोध स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के नियमन के तहत आएगा। वहीं, कोशिकाओं में इससे अधिक स्तर का बदलाव होने पर शोध केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के नियमन के दायरे में आएगा।
ऐसे शोध के लिए संस्थागत एथिक्स कमेटी की मंजूरी और निर्धारित परिस्थितियों में संबंधित राष्ट्रीय समिति की मंजूरी भी जरूरी बताई गई है।
क्लिनिकल ट्रायल में भी मरीज से इलाज का शुल्क नहीं
आईसीएमआर के दस्तावेज में कहा गया है कि स्टेम सेल से जुड़ा शोध स्वीकृत क्लिनिकल ट्रायल के हिस्से के तौर पर ही किया जा सकता है। इसके लिए आईसीएमआर की नैतिक गाइडलाइंस का पालन करना होगा। इसमें मरीज की लिखित सूचित सहमति (इनफॉर्म्ड कंसेंट) लेना जरूरी है। आसान भाषा में इसका अर्थ है कि मरीज को यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि उसके ऊपर किस तरह का शोध या उपचार किया जा रहा है और उससे संबंधित जरूरी जानकारी समझने के बाद उसकी सहमति ली जाए। ऐसे क्लिनिकल ट्रायल में मरीज से इलाज के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए। इलाज या शोध के दौरान चोट या मौत होने की स्थिति में मुआवजे का प्रावधान भी होना चाहिए।
बिना मंजूरी स्टेम सेल इलाज को बताया गया गैरकानूनी
आईसीएमआर के पत्र में स्पष्ट किया गया है कि जो स्टेम सेल उपचार मंजूर मानक उपचार वाली बीमारियों की सूची में शामिल नहीं हैं और जिन्हें सीडीएससीओ या डीएचआर की ओर से निर्धारित नियमों के तहत मंजूरी नहीं मिली है, उन्हें गैरकानूनी माना जाएगा और कानून के मुताबिक कार्रवाई हो सकती है। एनएमसी ने भी कहा है कि मंजूर बीमारियों की सूची से बाहर स्टेम सेल थेरेपी का बिना अधिकृत शोध प्रक्रिया के प्रशासन, प्रिस्क्रिप्शन, प्रचार या विज्ञापन पेशेवर कदाचार माना जाएगा।
नई व्यवस्था में डॉक्टरों पर भी हो सकती है कार्रवाई
एनएमसी ने सभी राज्य चिकित्सा परिषदों को निर्देश दिया है कि इस तरह की शिकायतें मिलने पर मामलों की जांच की जाए। अगर उचित प्रक्रिया के बाद किसी पंजीकृत डॉक्टर को पेशेवर कदाचार का दोषी पाया जाता है तो संबंधित मेडिकल काउंसिल उसके खिलाफ लागू कानून और नियामकीय प्रावधानों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है। एनएमसी ने यह भी याद दिलाया है कि डॉक्टरों को देश के कानून और चिकित्सा संबंधी नियमों का पालन करना होता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और उसे बढ़ावा देना उनकी पेशेवर जिम्मेदारी का हिस्सा है।
क्यों महत्वपूर्ण है एनएमसी की यह एडवाइजरी?
इस एडवाइजरी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि स्टेम सेल थेरेपी को हर बीमारी का इलाज बताकर मरीजों को नहीं दिया जा सकता। किसी बीमारी में इसका इस्तेमाल नियमित इलाज के रूप में तभी हो सकता है, जब वह निर्धारित मंजूर सूची में शामिल हो। इसके बाहर स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल शोध के निर्धारित नियमों के तहत ही किया जा सकता है। खास तौर पर ऑटिज्म के मामले में यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एनएमसी की एडवाइजरी सीधे सुप्रीम कोर्ट के उस मामले के संदर्भ में जारी हुई है, जिसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी के इस्तेमाल का मुद्दा उठा था। एनएमसी ने अपने सभी पंजीकृत डॉक्टरों, मेडिकल संस्थानों और अन्य संबंधित पक्षों से इन नियमों का कड़ाई से पालन करने को कहा है। नियमों से विचलन होने पर नियामकीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।



