
मोहिनी सेंगर | नई दिल्ली
क्या नाबालिगों के लिए बदलेंगे सोशल मीडिया के नियम?
भारत में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर कानूनी बहस तेज हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसा मामला आया है जिसमें नाबालिगों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच देने से पहले माता-पिता की सहमति जैसे उपायों पर विचार करने की मांग की गई है। हालांकि, अभी 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पैरेंटल परमिशन अनिवार्य करने का कोई नियम लागू नहीं हुआ है। कोर्ट का नोटिस सरकार से जवाब मांगने की प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम फैसला नहीं।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा बनी बड़ा मुद्दा
इस मामले में बच्चों को अनुचित ऑनलाइन कंटेंट, प्राइवेसी और सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने के लिए उम्र आधारित नियम और यूजर वेरिफिकेशन जैसे उपायों की मांग उठाई गई है। इसी तरह दिल्ली हाईकोर्ट में भी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को रेगुलेट करने, कंटेंट फिल्टरिंग और प्राइवेसी सुरक्षा को लेकर याचिका पर सुनवाई हो चुकी है। कोर्ट ने केंद्र को याचिका और सुझावों पर विचार कर उचित फैसला लेने को कहा था।
फिलहाल फैसला सरकार के जवाब पर निर्भर
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र को नोटिस दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर तुरंत कोई नई पाबंदी लागू हो गई है। सरकार को अब अदालत के सामने अपना पक्ष रखना होगा। इसके बाद कोर्ट यह तय करेगा कि मामले में आगे किस तरह की कानूनी कार्रवाई या दिशा-निर्देश जरूरी हैं। ऐसे मामलों में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी भी अहम मुद्दे बन सकते हैं।
अगर नियम बना तो क्या बदल सकता है?
मामला आगे बढ़ने पर संभावित नियमों में उम्र की पुष्टि, अभिभावक की सहमति, बच्चों के लिए सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग्स और संवेदनशील कंटेंट पर अतिरिक्त सुरक्षा जैसे उपायों पर चर्चा हो सकती है। लेकिन इनमें से कोई व्यवस्था अभी सुप्रीम कोर्ट के इस नोटिस के कारण लागू नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल इसे ‘बैन’ या ‘पैरेंटल परमिशन अनिवार्य’ होने के बजाय बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ी एक चल रही कानूनी और नीतिगत बहस के रूप में देखना सही होगा।
