
आतिफ नूर खान, तहलका
नई दिल्ली: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि निर्वाचन आयोग के अधिकारों का इस्तेमाल कुछ मामलों में अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना किया गया। याचिका में ज्ञानेश कुमार को व्यक्तिगत रूप से ऐसे फैसले लेने से रोकने के साथ-साथ मामले के निपटारे तक उन्हें पद के कार्यों से निलंबित करने की मांग की गई है।
याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है। इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अलावा निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के साथ आयोग के सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
क्या है याचिका में मांग?
राकेश कुमार सिंह की याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निर्वाचन आयोग के सामूहिक अधिकारों का व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल करने से रोका जाए। याचिका में quo warranto की प्रकृति की रिट जारी करने की भी मांग की गई है, जिसके जरिए यह पूछा गया है कि उन्होंने कथित तौर पर व्यक्तिगत रूप से आयोग की शक्तियों का इस्तेमाल किस अधिकार के तहत किया।
इसके अलावा याचिकाकर्ता ने मामले की सुनवाई लंबित रहने तक CEC को पद के कार्यों से निलंबित करने तथा आयोग का कामकाज अन्य दोनों निर्वाचन आयुक्तों के साथ सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर संचालित करने का निर्देश देने की मांग की है।
याचिका में SIR से संबंधित कथित एकतरफा फैसलों, निर्देशों और Form-6 में किए गए बदलावों को भी चुनौती दी गई है। साथ ही इन मामलों की स्वतंत्र जांच के लिए SIT या न्यायिक जांच गठित करने की मांग की गई है।
SIR और Form-6 को लेकर क्या विवाद है?
मामला मुख्य रूप से मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) और मतदाता पंजीकरण से जुड़े प्रक्रियात्मक बदलावों को लेकर है।
याचिका में दावा किया गया है कि नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कामकाज से जुड़े विभिन्न मामलों में कम-से-कम 14 मौकों पर लिखित आपत्तियां या असहमति दर्ज की थी। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया तथा चुनावी डेटा और Form-6 से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
याचिका में आरोप है कि मई 2026 में Form-6 में बदलाव को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। इसके बाद भी ECINet पोर्टल पर Form-6 में ऐसी जानकारी मांगी गई, जो आवेदक या उसके रिश्तेदारों की पिछली SIR सूची में मौजूदगी से संबंधित थी। इन दावों को लेकर याचिका में मूल वैधानिक Form-6 को बहाल करने की मांग भी की गई है।
संविधान और 2023 के कानून का हवाला
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का हवाला दिया है।
याचिका के अनुसार, निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके अधिकारों का इस्तेमाल आयोग के सामूहिक निर्णय के तहत होना चाहिए। 2023 के कानून की धारा 18 में आयोग के कामकाज को लेकर सर्वसम्मति और मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय की व्यवस्था का उल्लेख है।
ECI का क्या कहना है?
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। ECI का कहना है कि अलग-अलग निर्वाचन आयुक्तों की ओर से किसी विषय पर विचार, टिप्पणी या आपत्ति दर्ज किया जाना अलग बात है और इसे आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। आयोग के अनुसार, उसके अंतिम आदेश और फैसले पूरे आयोग की मंजूरी और निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं तथा SIR से जुड़े फैसले भी आयोग की स्वीकृति से हुए हैं।
इस तरह एक ओर याचिका में आयोग के भीतर कथित मतभेद और एकतरफा निर्णयों का आरोप लगाया गया है, जबकि ECI का कहना है कि अंतिम फैसले सामूहिक और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला अभी बाकी
यह मामला अभी न्यायिक विचार के स्तर पर है। सुप्रीम कोर्ट के सामने दाखिल याचिका में लगाए गए आरोप याचिकाकर्ता के दावे हैं, जिन्हें अदालत ने अभी अंतिम रूप से सही या गलत घोषित नहीं किया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने इस चरण पर याचिका के आरोपों और मांगों के गुण-दोष पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि विवाद सीधे निर्वाचन आयोग की बहु-सदस्यीय निर्णय प्रक्रिया, SIR और मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़ा है।



