मशीनें हारीं, अब इतिहास की बारी! उज्जैन के ‘खड़े हनुमान’ का 1000 साल पुराना राज खुलेगा?

उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के दौरान खड़े हनुमान प्रतिमा को हटाने की कोशिशें असफल रहीं
उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के दौरान खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को हटाने की कोशिशें सफल नहीं हुईं। विशेषज्ञ प्रतिमा की नींव, गहराई और आसपास की संरचना की जांच कर रहे हैं।

मोहिनी सेंगर | नई दिल्ली

मलबे के बीच भी नहीं हिली प्रतिमा

उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के दौरान ‘खड़े हनुमान’ मंदिर की प्रतिमा को दूसरी जगह शिफ्ट करने की कोशिश की गई, लेकिन भारी मशीनों और कई प्रयासों के बावजूद प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली। मंदिर का ढांचा हट चुका है, लेकिन करीब 8 फीट ऊंची प्रतिमा अब भी वहीं खड़ी है। घटना के बाद श्रद्धालुओं के बीच इसे लेकर अलग-अलग मान्यताएं सामने आईं, हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसे चमत्कार मानने से पहले इसके तकनीकी और पुरातात्विक पहलुओं की जांच जरूरी है।

1000 साल पुराना होने का कितना दम?

इस प्रतिमा को लेकर सबसे दिलचस्प दावा इसकी संभावित उम्र का है। विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा मालवा क्षेत्र के बेसाल्ट पत्थर से बनी प्रतीत होती है और इसकी शैली का संबंध परमारकाल से हो सकता है। कुछ विशेषज्ञ इसे राजा भोज के दौर से जोड़ने की संभावना भी जता रहे हैं। हालांकि अभी इसे 1000 साल पुराना मान लेना अंतिम निष्कर्ष नहीं है। प्रतिमा की वास्तविक उम्र और निर्माण काल तय करने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक और ऐतिहासिक अध्ययन जरूरी है।

अब वैज्ञानिकों के बाद इतिहासकार लगाएंगे जोर

प्रतिमा को हटाने की कोशिशें फिलहाल रोक दी गई हैं। विशेषज्ञ इसकी नींव, आसपास की मिट्टी और संरचना की स्कैनिंग कर रहे हैं, ताकि यह समझा जा सके कि प्रतिमा आखिर किस तरह जमीन से जुड़ी हुई है। प्रशासन ने भी स्पष्ट किया है कि विशेषज्ञों की जांच और संत समाज व स्थानीय प्रतिनिधियों की सहमति के बाद ही आगे का फैसला लिया जाएगा। यानी अब सवाल सिर्फ प्रतिमा को हटाने का नहीं, बल्कि उसके इतिहास को समझने का भी बन गया है।

आस्था के बीच इतिहास की सबसे बड़ी पड़ताल

उज्जैन की यह प्रतिमा अब आस्था और इतिहास दोनों के केंद्र में है। अगर विशेषज्ञों की परिकल्पना सही साबित होती है, तो यह प्रतिमा क्षेत्र के मध्यकालीन इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण हो सकती है। फिलहाल इसकी उम्र को लेकर कोई अंतिम आधिकारिक निष्कर्ष नहीं आया है। ऐसे में ‘1000 साल पुरानी’ बात को तथ्य नहीं, बल्कि संभावना के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा। अब वैज्ञानिक जांच और इतिहासकारों की पड़ताल बताएगी कि सिंदूर के नीचे छिपी इस प्रतिमा की असली कहानी आखिर कितनी पुरानी है।