चाइनीज निवेश ऐप्स से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: भूपेश अरोड़ा की जमानत रद्द, रोहित विज की याचिका खारिज

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी खबर की प्रतीकात्मक तस्वीर
याचिका में निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।

मूल धोखाधड़ी के केस में समझौता होने से मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध खत्म नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट; एलओएक्सएएम निवेश ऐप से शुरू हुई जांच में विदेशी नागरिकों, म्यूल बैंक खातों, हवाला और करोड़ों की रकम विदेश भेजने के आरोप

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली

चाइनीज निवेश ऐप्स के जरिए वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने भूपेश अरोड़ा को मिली जमानत रद्द कर दी है, जबकि इसी मामले से जुड़े रोहित विज की जमानत याचिका खारिज कर दी है।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मूल अपराध में समझौता हो जाने से उसके पीछे की आपराधिक गतिविधि समाप्त नहीं हो जाती।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी- एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट) बनाम भूपेश अरोड़ा मामले में अदालत की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, क्योंकि आरोपियों की ओर से मूल धोखाधड़ी की प्राथमिकी में समझौते और उसके निरस्त होने को मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही तथा जमानत के पक्ष में आधार बनाया गया था।
मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर-3 में हुई। ईडी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी- एडिशनल सॉलिसिटर जनरल) अनिल कौशिक और अधिवक्ता अर्कज कुमार पेश हुए। भूपेश अरोड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता और रोहित विज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने पक्ष रखा।

मूल धोखाधड़ी के केस में समझौते से PMLA की जांच खत्म होती है?

इस मामले का सबसे अहम कानूनी सवाल यह है कि यदि किसी निवेशक के साथ धोखाधड़ी के मूल मामले में समझौता हो जाता है और प्राथमिकी निरस्त कर दी जाती है, तो क्या उसी कथित धोखाधड़ी से उत्पन्न मनी लॉन्ड्रिंग की जांच भी खत्म हो जाएगी? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, इसका उत्तर केवल समझौते के आधार पर हां नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि मूल अपराध में समझौता अंतर्निहित आपराधिक गतिविधि को समाप्त नहीं करता। इसका अर्थ है कि मूल धोखाधड़ी के मामले का निपटारा और कथित अपराध से अर्जित रकम को छिपाने, स्थानांतरित करने या वैध दिखाने की गतिविधियों की जांच दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।
हालांकि, मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (पीएमएलए – प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट), 2002 के तहत कार्रवाई के लिए अनुसूचित अपराध और उससे संबंधित अपराध की आय का कानूनी संबंध जरूरी है। केवल संदिग्ध वित्तीय लेन-देन या विदेशी संबंध होने से अपने आप मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध सिद्ध नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का विस्तृत कानूनी प्रभाव उसके हस्ताक्षरित आदेश के सामने आने के बाद और स्पष्ट होगा।

भूपेश अरोड़ा की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द की?

भूपेश अरोड़ा को दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 फरवरी 2026 को नियमित जमानत दी थी। हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, अरोड़ा के खिलाफ ईडी की जांच हैदराबाद में दर्ज निवेश धोखाधड़ी के मामले और उससे जुड़ी कथित मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित थी। जमानत देते समय हाईकोर्ट ने कहा था कि मूल प्राथमिकी समझौते के आधार पर निरस्त हो चुकी थी और अरोड़ा को मूल मामले की आरोपपत्र सूची में आरोपी या फरार नहीं दिखाया गया था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि ईडी की ओर से अन्य प्राथमिकी और कथित व्यापक साजिश के संबंध में जो अतिरिक्त सामग्री पेश की गई, उसमें अरोड़ा की विशिष्ट भूमिका को लेकर स्वतंत्र और नया साक्ष्य पर्याप्त रूप से सामने नहीं आया था।
ईडी ने हाईकोर्ट के इस जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई 2026 को मामले में नोटिस जारी किया था। अब 29 सितंबर को जमानत रद्द किए जाने का अर्थ है कि हाईकोर्ट से मिली राहत बरकरार नहीं रही। हालांकि, गिरफ्तारी, हिरासत और आगे की प्रक्रिया के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत आदेश की शर्तें देखना जरूरी होगा।

रोहित विज की जमानत याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

इसी कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क में रोहित विज की भूमिका को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही गंभीर सवाल उठा चुका था।
10 अगस्त 2026 को जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव ने रोहित विज की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट के फैसले में ईडी के आरोपों के अनुसार, रोहित विज और उससे जुड़ी कंपनियों रंजन मनीकॉर्प प्राइवेट लिमिटेड तथा केडीएस फॉरेक्स प्राइवेट लिमिटेड का इस्तेमाल कथित तौर पर धोखाधड़ी से प्राप्त रकम को विभिन्न खातों के जरिए आगे भेजने और नकदी तथा विदेशी मुद्रा में बदलने के लिए किया गया था।
अदालत ने जमानत आदेश में भूपेश अरोड़ा और रोहित विज की कथित भूमिकाओं में अंतर किया था। हाईकोर्ट ने ईडी के आरोपों के आधार पर रोहित विज को कथित नकदी और विदेशी मुद्रा रूपांतरण व्यवस्था का प्रमुख संचालक बताया था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि रोहित विज को भूपेश अरोड़ा की जमानत के आधार पर समान राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने पीएमएलए की धारा 45 की दोहरी शर्तों का उल्लेख किया था।
इन शर्तों के अनुसार, अदालत को प्रथम दृष्टया संतुष्ट होना होता है कि आरोपी मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उसके कोई अन्य अपराध करने की आशंका नहीं है।
अब सुप्रीम कोर्ट में रोहित विज की जमानत याचिका भी खारिज होने से उन्हें इस मामले में राहत नहीं मिली है।

LOXAM निवेश ऐप से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की जांच कैसे शुरू हुई?

दिल्ली हाईकोर्ट के 10 अगस्त के फैसले के अनुसार, मामले की शुरुआत हैदराबाद के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी से हुई थी।
26 जुलाई 2022 को शिकायतकर्ता मोहम्मद गौस पाशा ने एलओएक्सएएम नाम के निवेश ऐप के जरिए 1.16 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी की शिकायत की थी। ऐप पर निवेश के बदले अधिक रिटर्न देने का वादा किया गया था।
जांच में कथित तौर पर सामने आया कि निवेशकों से प्राप्त रकम शिंदाई टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के खातों में पहुंची। इसके बाद कई वर्चुअल बैंक खातों और कथित म्यूल खातों के जरिए रकम आगे स्थानांतरित की गई।
म्यूल बैंक खाते ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल दूसरे लोगों की रकम को आगे भेजने या वित्तीय लेन-देन की वास्तविक पहचान छिपाने के लिए किया जाता है। कई मामलों में खाताधारक कमीशन के बदले अपने खाते का इस्तेमाल करने देते हैं।
ईडी के आरोपों के मुताबिक, इस नेटवर्क में रंजन मनीकॉर्प और केडीएस फॉरेक्स जैसी कंपनियों का इस्तेमाल हुआ। कथित तौर पर रकम को नकदी और विदेशी मुद्रा में बदलकर हवाला के जरिए दुबई और चीन तक पहुंचाया गया।
हाईकोर्ट के फैसले में चीनी और ताइवानी नागरिकों के नाम भी जांच के संदर्भ में दर्ज हैं। इनमें कथित तौर पर ऐप संचालित करने, कंपनियां स्थापित करने और बैंक खाते खुलवाने में भूमिका निभाने वाले विदेशी नागरिक शामिल हैं।
ये आरोप जांच एजेंसी की ओर से प्रस्तुत सामग्री और जमानत कार्यवाही में दर्ज तथ्यों पर आधारित हैं। इन्हें किसी आरोपी के खिलाफ अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

भूपेश अरोड़ा और रोहित विज मामले में सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत आदेश से क्या स्पष्ट होगा?

इस मामले का व्यापक कानूनी महत्व यह है कि मूल धोखाधड़ी के मामले में समझौता होने के बावजूद कथित अपराध से अर्जित संपत्ति की पहचान, उसके हस्तांतरण और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच का प्रश्न अलग बना रह सकता है।
लेकिन प्रत्येक आरोपी की भूमिका, अपराध की आय से उसका संबंध और पीएमएलए की वैधानिक शर्तों की पूर्ति का निर्धारण न्यायालय को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत आदेश से यह स्पष्ट होगा कि भूपेश अरोड़ा की जमानत रद्द करने और रोहित विज की जमानत याचिका खारिज करने के लिए पीठ ने किन विशिष्ट कानूनी आधारों को निर्णायक माना।