
यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई; केंद्र, आरबीआई और एनपीसीआई से जवाब तलब, तत्काल रोक लगाने से इनकार
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) से भुगतान करने वालों और कारोबारियों से जुड़ी बड़ी खबर है। सुप्रीम कोर्ट ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) वसूलने के नए ढांचे पर केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) से जवाब मांगा है। कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा है कि यूपीआई लेनदेन पर यह शुल्क वसूलने का कानूनी आधार क्या है? इस रकम से कमाई किसे होगी और वसूली गई राशि का बंटवारा किस तरह किया जाएगा?
केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुल्क लागू करने पर तत्काल रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारियों के हलफनामे दाखिल होने के बाद ही इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा। फिलहाल एमडीआर की वैधता पर अदालत ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
जवाब देः यूपीआई पर चार्ज वसूलने का कानूनी आधार क्या?
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई भुगतानों पर एमडीआर लगाने का प्रावधान किया गया है। अदालत ने केंद्र सरकार, आरबीआई और एनपीसीआई से नए शुल्क ढांचे के कानूनी आधार और इन संस्थाओं की भूमिका स्पष्ट करने को कहा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी जानना चाहा कि इस शुल्क से होने वाली कमाई आखिर किसे मिलेगी और अलग-अलग पक्षों के बीच इसका वितरण कैसे होगा? याचिकाकर्ता ने शुल्क लागू करने पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।
अब आगे क्या होगा? संबंधित अधिकारियों को अपना पक्ष हलफनामों के माध्यम से अदालत में रखना होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट शुल्क की वैधता और उससे जुड़े सवालों पर विचार करेगा। फिलहाल शुल्क को गैरकानूनी घोषित नहीं किया गया है।
छह साल से मुफ्त यूपीआई भुगतान व्यवस्था में बदलाव 15 अक्टूबर से
नए ढांचे के तहत केंद्र सरकार ने करीब छह साल से चली आ रही पूरी तरह मुफ्त यूपीआई भुगतान व्यवस्था में बदलाव किया है। 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के निर्धारित मर्चेंट भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाने का प्रावधान किया गया है। एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारी से भुगतान प्रक्रिया के लिए लिया जाता है। यह शुल्क सामान्यतः भुगतान स्वीकार करने और उसे संबंधित बैंक या भुगतान प्रणाली के माध्यम से निपटाने से जुड़ी सेवाओं के लिए होता है। नए ढांचे में सभी यूपीआई लेनदेन पर शुल्क नहीं लगाया गया है। व्यक्ति से व्यक्ति (पीयर-टू-पीयर) भुगतान और 2,000 रुपये से कम के भुगतान इस शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे।
75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतानों पर एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि संबंधी इनपुट जैसे आवश्यक और कम मुनाफे वाले क्षेत्रों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर प्रति लेनदेन 5 रुपये का निश्चित एमडीआर निर्धारित किया गया है। इस तरह नए ढांचे में शुल्क की दर भुगतान की राशि और कारोबार के क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग होगी।
याचिका में आरोप- बिना सुरक्षा और पारदर्शिता के लागू किया शुल्क
यह जनहित याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता ने दायर की है। इसमें केंद्र सरकार की 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह शुल्क पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू किया गया। याचिकाकर्ता ने 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर लागू एमडीआर ढांचे को रद्द करने या इसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग की है। वैकल्पिक तौर पर याचिका में मांग की गई है कि शुल्क व्यवस्था की पारदर्शी समीक्षा की जाए। इसके लिए सार्वजनिक परामर्श, वास्तविक आंकड़ों का प्रकाशन और प्रभाव का आकलन किया जाए।
साथ ही सूक्ष्म और लघु उद्यमों को संभावित आर्थिक बोझ से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग भी की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी याचिका में लगाए गए आरोपों पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। केंद्र और संबंधित संस्थाओं का जवाब आने के बाद ही शुल्क की वैधानिकता और इसके प्रभावों पर आगे सुनवाई होगी।

